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Home » गुंजन उपाध्याय पाठक की कविताएँ

गुंजन उपाध्याय पाठक की कविताएँ

युवा कवयित्री गुंजन उपाध्याय पाठक की इन कविताओं में रूपक अनुभव में बदल जाते हैं और अतिशयोक्तियाँ यथार्थवादी औज़ार बन जाती हैं. खुरदरी भाषा एक नैतिक असुविधा पैदा करती है, जहाँ हिंसा और कामना घुलमिल से जाते हैं. अनुभव की निर्ममता में ये कविताएँ ढलती जाती हैं. प्रस्तुत है.

by arun dev
February 2, 2026
in कविता
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गुंजन उपाध्याय पाठक की कविताएँ
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गुंजन उपाध्याय पाठक की कविताएँ 

१.
देवियाँ

देवियाँ रोटियाँ बेल रही हैं
थोड़ी शिकन और झिझक के साथ
कुछ किट्टी पार्टी में शामिल हैं
कुछ रातों के वीरानों को आँखो में सजाए ठहाके लगा रही हैं
विकर्षण को बार-बार
फाउंडेशन समझ कर
मसलती हैं अपनी देह

देवियाँ नौकरी घर बच्चों और शेयर बाजार के बीच खीज रही हैं

बसों, ट्रेनों, हवाई जहाजों में
पुरुष बांहों का दाब देह पर झेलती हुई
थोड़ी और गाढ़ी करती हैं लिपस्टिक
पानी के साथ घूंट भरती हैं
एंग्जाइटी की नन्ही गोली
सर दर्द से बेहाल हो चीखती हैं
निर्ममता से दूसरी देवियों को पटकती हैं
जूतियों की खटखट
उनके माथे में गूंजती हैं

ये देवियाँ
जिन्हें चाहिए थी मुहब्बत
देह की गिरह को खोलने वाला मन
चरमोत्कर्ष के शीर्ष का ताब
मान मनौव्वल करने वाला हृदय
शॉपिंग मॉल में
खरीदती हैं ढेरों कपड़े किताबें और काजल

हलक में खींचती हैं धुँए के साथ सुनहरे ख़्वाब
एक अदद बाँह
एक अदद साँस के बिना
झोंक देती हैं फिर से खुद को
देह को देह से रगड़ने के लिए
अपनी ही देह के अपरिचय के साथ
अगले दिन की दिनचर्या में.

 

 

२.
लगन का महीना

आषाढ़ के बादल गरजते हैं और
भीतर तक एक भय
देह में अपनी पैठ बनाता है

भूख नहीं आती
और जी मिचलाता है
पेट में बौराए ख्वाबों की सड़ांध मचती है
शाम से एक ताप
नसों में उतरता है
रात नवोदित छिपकलियों की संसार में डूबी
छत निहारते हुए
एकाएक कब ये छिपकलियाँ
इतनी बड़ी हो जाती हैं कि
पता नहीं चलता उसकी देह में इस लिजलिजेपन की वजह क्या है
दूर कहीं ढोलक पर औरतों का मुक्त कंठ
गाता है गीत समधी की छिनरई का
उसकी देह एक अव्यक्त
भंवर में फंसती जाती है

वह अपनी ठंडी उंगलियों से लिपटे
एक एक फूंक को यूं देती है हवा
जैसे यह किसी ध्यान की अवस्था हो
ऐसे में छत पर गिरते मेघ
माथे के अंदर टीस-सी भरते हुए
गाते हैं कोई शोक गीत

यह वही महीना है जब
माँ बेटियों की कराहों पर
चुप्पियाँ साध लेती हैं
और जुगनू अपनी ही रोशनी से राख हुए जाते हैं.

 

 

३.
स्त्रियों की स्थिति

किसी के पास इतना वक्त नहीं था कि
उसे सुन पाता
या फिर उसकी कहन में ही दोष था
चीखती तो सिसकी तक सूखी रहती

उसके सहस्रों हाथ,
हजारों जांघें, सैकड़ों गर्दनें
न जाने कितनी पिंडलियाँ
कितने ही स्तन
कितने ही योनियाँ थी कि
कभी वह स्त्री रही होगी पर
आश्चर्य हो सकता था
वह एक साथ हजारों पुरुषों को निगल सकती थी

अपने हाथों से अपनी छातियों पर मारती
अकुलाहट होंठों तक न छलकती
नाभि को कितनी ही बार तेज चाकू से काटा
न जाने कैसे कोई एक ख़्वाब सिहरता रह गया

वह मौत मौत चीखती
जिंदगी उसके लम्हों में इज़ाफ़ा करती

पिछले कुछ सालों से वह दैत्य हो चुकी थी
उसकी ख्वाहिशें
बरगद की जड़ों की तरह
गाढ़ी होकर
सीने में धंसती जाती

वह हार जाती
और सब स्त्रियाँ डिस्काउंट में
उसकी साध पातीं

आजकल स्त्रियों की स्थिति
पहले से बेहतर है
कहते हुए लोग उसकी उपमा देते.

 

 

४.
लैला

दोनों ऐसे निहारती हैं एक दूसरे को
जैसे आईना देख रही हों
धीरे-धीरे
बदन से उतारती हैं कपड़े कि जैसे
साँप छोड़ता हो अपनी ही केंचुली

एक की आँखें शर्म से मुंदी जा रही हैं
और दूसरी जैसे
पलकें झपकाना भूल चुकी है
एक साथ
एक सी
जैसे कोई यक्षिणी उतर आई हो देह में
विस्मृत कराती
किसी चुम्बकीय आकर्षण से बंधी
हैरत से जुड़ी उनकी आँखें
जैसे खोल देना चाहती हों कोई तिलिस्म

उनकी देह इस कदर
आग और बर्फ थी
होंठ जैसे किसी बारूद के गोलों की तरह दहकते हुए

वो छूती हैं
और महसूस करती हैं उस तड़प को
उलझती हैं
अस्फुट-सी गरजती बरसती हैं
जैसे दो भेड़िए
एक दूसरे में
गुत्थमगुत्था
किसी भूखे जानवरों सी
लगभग चबाने पर आमादा
एक दूसरे को पी जाने की ख्वाहिश

दोनों ही स्त्रियाँ
दोनों ही “लैला”.

 

5.
काग़ज़ की गुड़िया

खुद को
अनावृत्त करके
मुग्ध होती हूँ
देखती हूँ आईने में उभरे अपने अक्स को

हौले से मुसकुराती हुई
अपनी ही नाजुकी पर
और पल भर में ही
भिंचे होंठ से चीख पड़ती हूँ

क्या सचमुच
उसे चाहे जाने का अधिकार नहीं है?
क्यों नहीं वो दो जोड़ी आँखें
उसमें ढूँढ पाती हैं
वह मुहब्बत
क्यों वह उसे काग़ज़ की गुड़िया कहकर
हँस पड़ता है
क्यों वह एक लम्हा
कील की तरह उसके माथे में
धंस पड़ता है

कि अचानक आभास होता है
इस स्नानागार से बाहर
उसका इंतिज़ार हो रहा होगा.
रोटी सिंकेंगी अपने तमाम ताप को समेटे हुए
एक और गिल्ट के साथ कि
उसने जानबूझकर
आज सबकी दैनिकचर्या में
अपनी मनहूसियत घोल दी है.

 

 

6.
चौरासी

इस बेतुके जीवन के
अंत से ठीक पहले
इश्क़ की इनायतें
शायद लुका-छिपी में हारकर
उमड़ पड़ी हैं मन के आँगन में
छीजती दीवारों पर अल्पनाएँ उभर आई हैं

सांझ की बेहयाई में
कोई उतारता है अपना खोल;
दिन और रात दहलीज़ पर ठिठके खड़े हैं

चाँद की कुबड़ पर तड़प की
नर्गिसी खिल उठी है
समर्पण का यह अंदाज़
कुछ ऐसा है कि— जानते हुए भी कि
इन चौरासी सिद्ध कलाओं का
योग नहीं है मेरी हथेलियों में
मैं बाट जोहती हूँ उस बेला की, जब
धड़कनों में उन्माद की लय बहे

इश्क़ का धुआँ कुछ ऐसे उतरे धमनियों में कि
वैद्य तक को गुमान न हो
अप्सराएँ रश्क करें

सारे झूठ, सारे भरम
तुम्हारे स्नेहसिक्त शब्दों में परिवर्तित होकर
वास्तविकता की तरह मेरे भाग्य पर टपकें
अवांछनीयता की चोट पर
तुम्हारे शब्द छलकते रहें किसी मरहम की तरह

जानते हो
जेठ की दुपहरी में
इश्क़ की अठखेलियाँ तपती नहीं
बरसती हैं.

 

गुंजन उपाध्याय पाठक
पटना
पीएच.डी (इलेक्ट्रॉनिक्स) मगध विश्वविद्यालय.

‘अधखुली आँखों के ख़्वाब’ और ‘दो तिहाई चाँद’ कविता संग्रह प्रकाशित.
gunji.sophie@gmail.com

Tags: 20262026 कवितागुंजन उपाध्याय पाठक
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Comments 13

  1. Akhilesh says:
    2 weeks ago

    गहरी आत्मदया और आत्मग्लानि से भरपूर इन कविताओं में अनुभव की जगह सामान्यीकरण अधिक बह रहा है। कवियत्री को अभी लम्बा रास्ता पार करना होगा

    Reply
  2. अर्चना लार्क says:
    2 weeks ago

    आज Gunjan की कविताएं पढ़ते हुए मेरी सुबह हुई। कितनी शानदार कवि हैं ये, पहले से जानती हूँ। लेकिन आज जो कविताएं पढ़ी मैंने ये विषयवस्तु से लेकर कविता में कवित्व को बनाए रखना, साथ ही कविता में उभरते हुए काव्य बिंब, रूपक कविता के शिल्प पक्ष को गहन तो बनाते ही हैं और कविता के भाव पक्ष को नया आकाश भी देते हैं।
    आज जबकि कविता में काव्य तत्व मिसिंग सा है, सब निबंधात्मक। ऐसे में गुंजन की कविताएं गहन अर्थवत्ता के साथ समकालीन कविता में पुरजोर तरीके से अपनी उपस्थिति रखने में सफल हैं। बहुत बहुत बधाई. मैंने समकालीन कविता में कई सालों बाद इतनी गहरी इस कलेवर की कविता पढ़ी। वाह। 🌺

    Reply
  3. माताचरण मिश्र says:
    2 weeks ago

    स्त्रियां गुंजन उपाध्याय का मुख्य उपादान हैं,वे स्त्रियों के इस महारण में संजय जैसी दृष्टि रख सकी हैं, देवियों इस रण में अभिमन्यु सी पुरूषों के मध्य में अपने को जीवन के रगड़ से बचतीं बचातीं देवियों के समूह में दो लैलाएं हैं ढोलक पर समधी को गारी में निपटाती हैं और अग्निगर्भा बन पुरूषों से रूबरू निपटने की हौसलामंद हैं,ये आज की औरतें छुई मुई नहीं हैं, गुंजन जी को बधाइयां,,,,

    Reply
  4. ललन चतुर्वेदी says:
    2 weeks ago

    गुंजन जी की कविताओं में स्त्री मन अनावृत्त हुआ है.व्यष्टि की पीड़ा जब समष्टि की पीड़ा बन जाती है तो ऐसी कविताएँ संभव होती हैं.

    Reply
    • Twinkle Rakshita says:
      1 week ago

      कविताओं की समझ कम है मुझे मतलब मैं नहीं लिख पाती, मुझे बेहद मुश्किल लगता है कि और ऐसे में आज गुंजन दी कि कविताओं को पढ़कर यह और मुश्किल लगने लगा कि इतनी गूढ़ भावनाओं को इतनी सरलता के साथ कैसे पिरोया जा सकता है…?
      “यह वही महीना होता है जब मां बेटियों की कराह पर चुप्पियां साध लेती हैं”
      कुछ चटका भीतर और बस यहीं पर ठहरी हुई हूं।
      अच्छी कविताओं के लिए खूब बधाई गुंजन दी….

      Reply
  5. रश्मि लहर says:
    2 weeks ago

    उफ़! कितनी सजीव, अंतर्मन को पिघलाती हुई रचनाऍं हैं…

    Reply
  6. Arun kamal says:
    2 weeks ago

    गुंजन की कविताएँ विलक्षण हैं,ख़ासकर लगन का महीना और लैला, कल्पनाप्रवण,साहसिक।

    Reply
  7. Abhinaw Kumar Upadhyay says:
    2 weeks ago

    मैने पहली बार गुंजन जी को पढ़ा है। अफसोस हुआ कि आज तक क्यों नहीं पढ़ पाया। कितनी ताज़ा और नई सी कविताएँ हैं। आजकल अधिकांश समकालीन कविताएँ पहले से पढ़ी हुई सी लगती हैं। ऐसे में गुंजन जी की कविता देर तक मन को घेरे रखती है…..बहुत देर तक।

    Reply
  8. Anonymous says:
    2 weeks ago

    पढ़ ली सभी कविताएँ। बहुत अच्छी है और मन में देर तक ठहरती हैं। स्त्री-मन के अलग-अलग आयामों को रेखांकित करती हैं ये। कुछ बिंब नए हैं, और शिल्प भी कसा हुआ है। कवि के लेखन और चिंतन में अपेक्षित ग्रोथ का पता देने वाली इन कविताओं के लिए बधाई गुंजन बाबू! 💖

    Reply
  9. Kavi Rajender Kumar Raju Tyagi says:
    1 week ago

    आपकी विद्वता आपकी लेखनी काबिले तारीफ है जो भाव लिखे हैं i वह एक स्त्री की छवि को दर्शाता हैं और कुछ अलग छलकता है ये कवि की मन की परिभाषा है स्त्री के बारे में अवगत करता है लाजबाव है गुंजन जी आप इसी तरह से लिखती रहे धन्यवाद

    Reply
  10. पायल भारद्वाज says:
    1 week ago

    देवियाँ कविता की ‘देवियाँ रोटी बेल रही हैं’ पंक्ति से शुरू होतीं कवि गुंजन की ये कविताएँ ‘जेठ की दुपहरी में तपती बरसती इश्क़ की अठखेलियों’ तक पहुँचते हुए इस पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के जीवन को किसी एक बिंदु पर स्थिर नहीं करतीं बल्कि उसे एक निरंतर चलने वाली ऐसी प्रक्रिया की तरह सामने रखती हैं जिसमें रोज़मर्रा का संघर्ष, अस्तित्व की लड़ाई, देह और मन के द्वंद्व, अवसाद, एकाकीपन व दबी हुई कामनाएँ एक-दूसरे में गुंथी हुई हैं।

    इन कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि ये स्त्री को न तो केवल पीड़िता बनाकर प्रस्तुत करती हैं और न ही किसी आदर्श शक्ति के रूप में। यहाँ स्त्री एक जटिल, संवेदनशील और संघर्षरत मनुष्य है।

    गुंजन की सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि स्त्री के दैनिक अनुभवों से संवाद करती है; रसोई, नौकरी, यात्रा, सामाजिक मेलजोल, सौंदर्य-बोध, यौनिक असहजता और मानसिक थकान ये सब अनुभव कविता में किसी घटना की तरह नहीं, बल्कि जीवन की सहज लेकिन पीड़ादायक लय की तरह आते हैं। स्त्री का संघर्ष यहाँ किसी बड़े नारे या प्रतिरोध के रूप में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे क्षणों में घटित होता है जहाँ वह चुप रहती है, सहती है, समायोजन करती है और फिर उसी चुप्पी में भीतर-ही-भीतर टूटती जाती है।

    इन कविताओं में देह एक महत्वपूर्ण केंद्र है, लेकिन यह देह मात्र भौतिक नहीं बल्कि स्मृतियों, भय, कामनाओं और अपराधबोध से भरी हुई देह है। शारीरिक अनुभव और मानसिक द्वंद्व एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। देह पर समाज की निगाह, स्पर्श और अपेक्षाएँ जिस तरह से अंकित होती हैं, वे स्त्री के मन में अवसाद और आत्म-संदेह का बीज बो देती हैं। यही कारण है कि इन कविताओं में गहन एकाकीपन दिखाई देता है।

    गुंजन की कविताएँ स्त्री मन के उन अप्रकट कोनों तक जाती हैं, जहाँ छुपी हुई कामनाएँ साँस लेती हैं। ये कामनाएँ स्वाभाविक मानवीय ज़रूरत की तरह सामने आती हैं। कवि इन इच्छाओं को अपराधबोध से मुक्त करने का साहस करती है और यही साहस इन कविताओं को ज़रूरी बनाता है।

    रूपकों और बिंबों के प्रयोग में गुंजन की भाषा विशेष रूप से परिपक्व दिखाई देती है। वे जटिल और संवेदनशील बातों को सीधे कहने के बजाय उन्हें बिंबों के माध्यम से पाठक के भीतर उतारती हैं। ये बिम्ब और प्रतीक अभिव्यक्ति को गहराई देते हैं। यह प्रतीकात्मकता कविता को बोझिल नहीं बनाती बल्कि उसकी मार्मिकता को और तीव्र करती है।
    ये कविताएँ अपनी कहन में जितनी मार्मिक हैं, उतनी ही साहसिक भी। समग्र रूप में कवि गुंजन की ये कविताएं स्त्री-अनुभव की गहरी, सच्ची और बेबाक अभिव्यक्ति है, जो समकालीन हिंदी कविता में एक सशक्त और ज़रूरी हस्तक्षेप के रूप में दर्ज होती है।

    Reply
  11. Anonymous says:
    1 week ago

    लैला अद्भुत है। मैं पढ़ कर सोचता रहा कि मैं भी किसी की लैला हूँ। यह कवि की नई उड़ान है। यह क़ायम रहे।

    Reply
  12. कृष्ण समिद्ध says:
    5 days ago

    “दोनों ऐसे निहारती हैं एक दूसरे को
    जैसे आईना देख रही हों..,”

    गुंजन उपाध्याय पाठक की कविताएँ छोटे-छोटे दृश्य खंडों में आगे बढ़ती हैं, जहाँ प्रत्येक दृश्य सामाजिक यथार्थ का एक अलग स्तर खोलता है। इन कविताओं का सबसे बड़ा कौशल यह है कि वह निजी अनुभूतियों को सामूहिक स्त्री-इतिहास की प्रतिध्वनि में बदल देती हैं। इसलिए गुंजन की कविताएँ देह, मन और स्वप्न की अनकही थकान लिखती हैं। उनकी कविताएँ स्त्री-अनुभव को बाहरी आवरण से मुक्त करती है – विशेषकर लैला।

    Reply

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