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Home » कश्मीर की वह आवाज़, जिसे इतिहास ने कभी सुनना ही नहीं चाहा : त्रिभुवन

कश्मीर की वह आवाज़, जिसे इतिहास ने कभी सुनना ही नहीं चाहा : त्रिभुवन

by arun dev
July 8, 2026
in आलेख
Reading Time: 10 mins read
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कश्मीर की वह आवाज़, जिसे इतिहास ने कभी सुनना ही नहीं चाहा : त्रिभुवन
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हब्बा ख़ातून
कश्मीर की वह आवाज़, जिसे इतिहास ने कभी सुनना ही नहीं चाहा

त्रिभुवन

कुछ पुस्तकें केवल पुस्तकें नहीं होतीं. वे किसी एक वैभवशाली भाषा में बच रह गई किसी गहरी कमी को भी पूरा करती हैं. हर क़िताब प्रकाश का एक स्रोत लेकर आती है और वह एक ऐसे विवेक की तस्वीर गढ़ता है, जो समय के अंधेपन को देखने की दृष्टि देता है. वे हमारे साहित्यिक जीवन के अँधेरे में रोशनी का कोई नया दरवाज़ा खोलती हैं. ख़यालों की सघन खामोशियों में लफ़्ज़ों की नई सदाएँ घोलती हैं. और कई बार तो लिपियाँ ही बौद्धिक चेतना के किवाड़ों पर ताले जड़ देती हैं. हाल ही प्रकाशित गीताश्री की ‘हब्बा की खोज : बुलबुल-ए-कश्मीर : शख़्सियत और शायरी’ ऐसी अनूठी पुस्तक है, जो उन हवाओं को थाम लेती है, जो शायद लिपियों के कारण हमारे ज़ेहन की अंधी खिड़कियों पर सर पटकर लौट जाती हैं. यह एक शायरा पर लिखी पुस्तक भर नहीं है. यह उस स्त्री-स्वर की तलाश है, जिसे इतिहास ने लोककथा, लोक ने समय के दर्द का प्र्रेमगीत, प्रेम ने आर्तनाद और सत्ता ने निर्वासन की धूल बना दिया.

हब्बा ख़ातून को याद करना सिर्फ़ एक कवयित्री को याद करना नहीं है. यह कश्मीर की विद्रोही और सूफ़ियाना स्मृति को क़रीने से एक सूरत देना है. यह एक स्त्री की उस आवाज़ को सुनना है, जो अपनी देह, अपने प्रेम, अपने विरह, अपने अपमान, अपने संगीत और अपने भूगोल के बीच से बोलती है. वह केवल यूसुफ़ शाह चक की प्रेमिका या पत्नी नहीं है, वह कश्मीर की आत्मा का वह स्त्री-पक्ष है, जिसे दरबारों ने कम, लेकिन पहाड़ों, घाटियों और झरनों ने अधिक याद रखा.

गीताश्री की पुस्तक की सबसे बड़ी खू़बी यही है कि वह हब्बा को क़िस्से से निकालकर फिर से मनुष्य बनाती है. हिन्दी में हमारे यहाँ अक्सर ऐसी स्त्रियाँ दो तरह से लिखी जाती हैं. या तो वे किंवदंती बना दी जाती हैं या करुणा की मूर्ति. गीताश्री हब्बा को न तो केवल किंवदंती रहने देती हैं, न केवल विरहिणी. वे उसे खोजती हैं सड़क पर, स्मृतियों में, लोकगीतों में, कश्मीर की सांस्कृतिक धुंध में, इतिहास के टूटे हुए अभिलेखों में, बिहार की धूल-धूसरित आबोहवा में, विद्वानों की बातचीत में और उन जगहों पर जहाँ स्मृति और विस्मृति साथ-साथ रहती हैं.

यही कारण है कि यह पुस्तक पारंपरिक अर्थ में सिर्फ़ जीवनी या एक जीवन का रिपोर्ताज भर नहीं है. यह यात्रा भी है, रिपोर्टिंग भी है, सांस्कृतिक खोज भी है, स्त्री की ऐतिहासिक अनुपस्थिति की जाँच भी है और कविता के पीछे छूटे जीवन की तलाश भी. गीताश्री ने जहाँ-जहाँ जाकर तथ्यों की पड़ताल की है, पुस्तक में पत्रकारिता की साख आती है. एक अच्छी पत्रकारिता केवल घटना नहीं पकड़ती, अनुपस्थिति की किर्चियों और टूटे ख़्वाबों के भीतर से रिसते यथार्थ को रेखांकित करती है. वह यह भी पूछती है कि जो बात इतिहास में नहीं है, वह लोक में क्यों है? जो लोक में है, वह दस्तावेज़ में क्यों नहीं है? जो दस्तावेज़ में है, वह स्त्री के अनुभवों से कितना दूर है?

हब्बा ख़ातून की चर्चा करते हुए हमें सबसे पहले यह स्वीकार करना चाहिए कि भारतीय भाषाओं में स्त्री-कवियों की परंपरा जितनी वैभवशाली है, उसका आलोचनात्मक पुनर्पाठ उतना विराट् नहीं. ललद्यद हैं, मीराबाई हैं, अक्कमहादेवी हैं, अंडाल हैं, बहिनाबाई हैं, महादेवी हैं, अमृता प्रीतम हैं, परंतु इन सबके बीच हब्बा ख़ातून का नाम अक्सर एक रोमानी उदासी के साथ लिया जाता रहा है. जैसे वह कोई पहाड़ी धुन हो. जैसे वह कोई प्रेम-विरह की लोककथा हो. जैसे वह यूसुफ़ शाह चक की अनुपस्थिति में गाई गई आवाज़ हो. लेकिन हब्बा इससे बहुत बड़ी हैं. यहाँ जिन स्त्रियों के नाम लिए जा रहे हैं, दरअसल, वे नाम भर नहीं हैं. वे अपने-अपने कालखंड के चेहरे से कुछ रंग उड़ाकर, कुछ उसकी आंखों से पूछकर और कुछ उसके दिल पर हाथ रखकर लम्हों की तस्वीर बनाती रही हैं, समय की परछाईं को महससू करती रही हैं और उसमें कोई प्रकाश का कोई स्रोत तलाशती रही हैं.

हब्बा ख़ातून प्रेम की कवयित्री हैं, लेकिन प्रेम उनके यहाँ निजी भावुकता नहीं है. प्रेम उनके यहाँ आत्मा की राजनीतिक अवस्था है. वह स्त्री के अस्तित्व का पहला निजी स्वराज्य है. वह उस समाज में स्त्री का घोषित आत्म-अधिकार है, जहाँ विवाह, कुल, राजवंश, धर्म, राजनीति और पुरुष-निर्मित नैतिकता स्त्री को नाम देती है, पर आवाज़ नहीं देती. हब्बा की आवाज़ इसी नामहीनता के विरुद्ध उठती है. पुरुष हर कालखंड की मिट्‌टी उड़ाकर हवा की सम्त चलने की कोशिशें करता रहा है, लेकिन स्त्रियों ने कभी किसी समय को अपनी हिफ़ाज़त की पनाहगाह नहीं बनाया. इसी निर्भयता ने उनके भीतर अपने माता-पिता के घर से किसी मक़्तल तक जैसे घरों को भी निरापद सुकून वाली जगह मानते हुए मेंहदी की महक के साथ चले जाने का आस्वाद घोला है.

सिमोन द बोव्वार ने स्त्री की स्थिति पर विचार करते हुए यह बताया था कि स्त्री पैदा नहीं होती, बनाई जाती है. हब्बा ख़ातून इस वाक्य की कश्मीरी प्रतिध्वनि जैसी लगती हैं. ज़ून से हब्बा बनने की प्रक्रिया केवल हर्फ़ों का बयान भर नहीं है. यह समाज की संवेदनहीन भट्‌ठी में स्त्री को ढालने और स्त्री के स्वयं को पुनः अपने हाथों से रचने की प्रक्रिया है. वह पहले घर की लड़की है, फिर विवाह की स्त्री, फिर प्रेम की आकांक्षिणी, फिर सत्ता से जुड़ी महिला, फिर विरह की गायिका और अंतत: लोक की स्मृति है.

लेकिन इन सब नामों के पार वह क्या है? यहीं गीताश्री की खोज शुरू होती है. हिन्दी में मैं विहगावलोकन करता हूँ तो एक ही पुस्तक दिखती है : हब्बा ख़ातून. काजल सूरी की यह पुस्तक मूलत: डोगरी से हिन्दी में होकर आई है और यह एक नाटक है. लेकिन हब्बा की खोज वस्तुतः हब्बा के भीतर छिपे उस प्रश्न की खोज है, जिसे इतिहास ने कभी ठीक से दर्ज नहीं किया. क्या एक स्त्री का प्रेम इतिहास का विषय हो सकता है? क्या उसकी पीड़ा राजनीतिक घटना हो सकती है? क्या उसका गीत राज्य-हानि का दस्तावेज़ हो सकता है? क्या उसका विरह केवल पुरुष-वियोग नहीं, भूगोल-वियोग भी हो सकता है?

 

2.

हब्बा ख़ातून पर लिखी गई पुस्तकों की परंपरा अपने-आप में बताती है कि वे कश्मीर की मात्र एक प्रेमकथा-नायिका नहीं हैं, इतिहास, लोक-स्मृति, स्त्री-स्वर, विरह, संगीत और कश्मीरी सांस्कृतिक अस्मिता के बीच स्थित एक जटिल और बहुपरतों वाला रचनात्मक व्यक्तित्व हैं. हब्बा को समझने की कोशिश उर्दू, कश्मीरी, हिन्दी, सिंधी, अरबी, फ़ारसी और अंगरेज़ी—सातों भाषाई संसारों में अलग-अलग ढंग से हुई है. कहीं वे यूसुफ़ शाह चक की प्रेमिका या रानी के रूप में सामने आती हैं, कहीं “बुलबुल-ए-कश्मीर” के रूप में, कहीं कश्मीरी गीत-परंपरा की संस्थापक शक्ति के रूप में और कहीं इतिहास तथा लोककथा के बीच लगातार खोजी जाने वाली स्त्री के रूप में.

इस परंपरा में सबसे पहले उल्लेखनीय पुस्तक मोहम्मद मुजीब का उर्दू नाटक “हब्बा ख़ातून” है, जो 1952 में मकतबा जामिया लिमिटेड, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ. यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि हब्बा पर आधुनिक भारतीय भाषाओं में शुरुआती काम जीवनी या शोध-पुस्तक के बजाय नाटक के रूप में सामने आया, यानी हब्बा शुरू से ही मंच, कथा और स्मृति की स्त्री रही हैं. इसके बाद एसएल साधु की साहित्य अकादेमी की “मेकर्स ऑव इंडियन लिट्रेचर” शृंखला में प्रकाशित “हब्बा ख़ातून” ने हब्बा को गै़र-कश्मीरी पाठकों तक पहुँचाने का काम किया. यह मोनोग्राफ़ हब्बा के जीवन, समय, कविता और प्रभाव को व्यवस्थित रूप से समझने की कोशिश सीमित दायरे में करता है. इसी पुस्तक का उर्दू अनुवाद मोहम्मद ज़मां आज़ुर्दा ने किया, जो साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ.

कश्मीरी साहित्यिक अध्ययन में अमीन कामिल का काम अत्यंत केंद्रीय है. उनकी “कुलयात ए हब्बा ख़ातून” हब्बा की कविता को पाठ, चयन और आलोचनात्मक विवेचना के स्तर पर समझने के लिए आधारभूत सामग्री प्रदान करती है. अमीन कामिल का महत्त्व इसलिए भी अधिक है कि उन्होंने हब्बा को केवल प्रेम-विरह की लोक-कवयित्री के रूप में नहीं, कश्मीरी काव्य-भाषा की एक बड़ी रचनात्मक शक्ति के रूप में पढ़ने की राह खोली. इसी परंपरा में “हब्बा ख़ातून पेठ महमूद गमियेस ताम” मरगूब बनिहाली संपादित कश्मीरी आलोचना और साहित्यिक संदर्भों में हब्बा को महमूद गामी तक की काव्य-यात्रा से जोड़ता है.

अंगरेज़ी में प्रो. एसएन वाखलू की “हब्बा ख़ातून : दॅ नाइटिंगेल ऑव कश्मीर” ने हब्बा को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाया. यह पुस्तक हब्बा के जीवन, प्रेम, विरह और कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति को एक लोकप्रिय लेकिन गरिमामय ढंग से प्रस्तुत करती है. इसके साथ ही गुलाम रसूल मलिक अनूदित “हब्बा ख़ातून : कॉलेक्टिड पॉएम्स” का विशेष महत्त्व है, क्योंकि हब्बा के जीवन पर लिखी गई दंतकथाओं से अलग उनकी कविता तक पहुँचना किसी भी गंभीर पाठक के लिए ज़रूरी है. हब्बा को समझने का सबसे विश्वसनीय रास्ता अंततः उनके गीतों से होकर ही जाता है.

उर्दू में जीआर भट की “हब्बा ख़ातून तवारीख़ के आईने में” एक अलग तरह की ज़रूरत पूरी करती है. हब्बा के जीवन से जुड़ी सबसे बड़ी समस्या यही है कि उनके बारे में लोक-कथाएँ बहुत हैं, लेकिन प्रामाणित दस्तावेज़ कम हैं. यह इस बात का संकेत है कि हमारी भाषाओं में बहुत सारा लेखन आलस्य और जड़ता से जनित एक वाग्विलास बनकर रह जाता है. इसलिए यह पुस्तक हब्बा की ऐतिहासिकता, यूसुफ़ शाह चक से उनके संबंध, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और कश्मीरी इतिहास में उनकी स्थिति को लेकर उठने वाले प्रश्नों को केंद्र में लाती है. इसी क्रम में गुलाम हसन तालिब की कश्मीरी पुस्तक “हबीबा हब्बा ख़ातून” भी उल्लेखनीय है, जो हब्बा के जीवन और कश्मीरी सांस्कृतिक स्मृति को स्थानीय दृष्टि से देखने की कोशिश करती है.

लेकिन राजकमल प्रकाशन से हाल ही प्रकाशित “हब्बा की खोज” केवल हब्बा की जीवनी नहीं, एक सतत खोज-यात्रा है—इतिहास, आख्यान, लोकगीत, भूगोल, स्त्री-स्मृति और यायावरी के बीच हब्बा के बिखरे हुए जीवन-चिह्नों को जोड़ने का प्रयास. हब्बा के बारे में निर्णायक दस्तावेज़ों का अभाव ही इस पुस्तक की प्रेरणा बनता है. गीताश्री हब्बा को किसी एक अंतिम निष्कर्ष में कै़द नहीं करतीं, वे उन्हें कश्मीर की सामूहिक चेतना, स्त्री-विरह और ऐतिहासिक विस्थापन की जीवित आवाज़ के रूप में खोजती हैं और हर फुटप्रिंट के बारे में पाठक की जानकारी में रखते हुए आगे बढ़ती हैं.

हब्बा ख़ातून पर उपलब्ध साहित्य को देखें तो एक दिलचस्प क्रम बनता है—मोहम्मद मुजीब की नाटकीय हब्बा, एसएल साधु की परिचयात्मक-अकादमिक हब्बा, अमीन कामिल का पाठ-संपादित और आलोचनात्मक हब्बा, एसएन वाखलू की लोकप्रिय-सांस्कृतिक हब्बा, जीआर भट की इतिहास-दृष्टि वाली हब्बा, गुलाम रसूल मलिक की अनूदित कवितामय हब्बा, काजल सूरी की रंगमंचीय हब्बा और गीताश्री की खोजती हुई, चलती हुई, स्त्री-दृष्टि से पुनर्पाठ करती हुई हब्बा. यही पूरी परंपरा बताती है कि हब्बा ख़ातून किसी एक किताब, एक कथा या एक प्रेम-प्रसंग में समाप्त नहीं होतीं. वे कश्मीर की उस आवाज़ का नाम हैं जो इतिहास में धुंधली है, लोक में उजली है और कविता में अब भी गाती हुई प्रतिध्वनित होती है.

3.

हब्बा ख़ातून का जीवन किंवदंतियों से घिरा है. वे कश्मीर की सोलहवीं शताब्दी की कवयित्री, गायिका और लोक-स्मृति में जीवित स्त्री हैं. उन्हें ‘बुलबुल-ए-कश्मीर’ कहा गया. लेकिन बुलबुल कहना भी कई बार स्त्री-कवियों के साथ अन्याय है. बुलबुल कहकर हम उनकी आवाज़ को मधुर तो बना देते हैं, पर उसकी बौद्धिकता और साहसिकता को कम कर देते हैं. हब्बा केवल गाने वाली स्त्री नहीं थीं, वे अनुभव को गीत में बदलने वाली चेतना थीं. वे बुलबुल नहीं, चेतना का वह विस्फोटक बुलबुला थीं, जिसने अपने कालखंड की परतों को हिला दिया और साबित किया कि कोई सताई हुई स्त्री उठ खड़ी हो तो वह दर्शन से लेकर राजनीति और संस्कृति से लेकर सभ्यता तक एक नए राग-विराग का रूप हो सकती है, जिसकी प्रतिध्वनियाँ इतिहास के वक्र वक्ष पर कई सदियों तक गूंजती रहती हैं.

उनके गीतों में जो विरह है, वह साधारण प्रेम-विरह नहीं है. वह उस स्त्री की पीड़ा है, जिसने प्रेम को अपना जीवन-सत्य माना और फिर इतिहास ने उस प्रेम को छीन लिया. यूसुफ़ शाह चक का निर्वासन, कश्मीर की राजनीतिक पराजय, मुग़ल सत्ता का प्रवेश और एक स्त्री का अकेलापन—ये सब मिलकर हब्बा की कविता में उस विरह को जन्म देते हैं, जो व्यक्ति से शुरू होकर सभ्यता तक जाता है. इसका काफी दिलचस्प वर्णन गीताश्री ने शुरू से आख़िर तक किया है और जहाँ-जहाँ भी कंट्राडिक्शंस आए हैं, इतिहास से जुड़े लोगों को रूबरू किया है.

ललद्यद और हब्बा ख़ातून की तुलना यहाँ बहुत ज़रूरी है. ललद्यद की वाणी आत्मज्ञान, वैराग्य और आध्यात्मिक उद्घाटन की वाणी है. वह भीतर की तपस्विनी हैं. वे देह और जगत के बंधनों को तोड़ती हैं. हब्बा ख़ातून जगत को नहीं छोड़तीं. वे जगत की ज्वालाओं में ज़ुल्म की तपिश सह-सहकर जगमगाती हैं. वे प्रेम करती हैं, पीड़ा सहती हैं, गाती हैं, याद करती हैं, प्रतीक्षा करती हैं. ललद्यद का आध्यात्मिक मार्ग भीतर की मुक्ति का है, हब्बा का मार्ग भीतर और बाहर दोनों की बेचैनी का है.

ललद्यद कहती हैं—स्वयं को पहचानो. हब्बा कहती हैं—स्वयं को खोने की पीड़ा को भी अपनी अस्मिता बनाओ. ललद्यद में निर्गुण चेतना की चमक है. हब्बा में लोकधुन की नमी है. ललद्यद का वाख दार्शनिक पैनेपन की मिसाल है. हब्बा का वचुन भावनात्मक विस्तार है. ललद्यद साधना की आग हैं. हब्बा विरह की बर्फ़ में जलती लौ हैं. और अगर हम निगाह को थोड़ा कश्मीर से बाहर दौड़ाएं और राजस्थान तक ले आएं तो मानो यह एक स्त्री क्रांति की ही सदी थी. हब्बा से छप्पन साल पहले मीरा ने मेवाड़ में प्रेम के दर्शन की जो द्युति प्रकट की थी, वह ऐसी लपट बनी कि उससे उनका पूरा समाज आज तक इतना टूटा और खंडित है कि 528 साल बीत जाने के बाद भी वह किसी बेटी का नाम मीरा रखने का साहस नहीं कर पाता.

कश्मीर की सांस्कृतिक आत्मा न तो ललद्यद के बिना पूरी होती है और न ही हब्बा के बिना. लेकिन हम अगर भारतीय उपमहाद्वीप की बात करें तो इसमें ऐसी असंख्य सचेतन स्त्रियां आ मिलती हैं, जो एक विराट् यथार्थ बुनती हैं. एक आत्मा को निर्वस्त्र देखती है तो दूसरी आत्मा को घायल और बिंधा हुआ पाती है. एक ने मुक्ति की भाषा दी तो दूसरी ने प्रेम और वियोग का व्याकरण. मीरा ने विषपान किया था, लेकिन ललद्यद और हब्बा ख़ातून ने जिस विष का पान किया था, क्या उसके बिना उनका दार्शनिक चैतन्य आसान था?

भारतीय समाज का स्त्री इतिहास बताता है कि उसके भीतर एक ‘अजनबीपन’ और ‘बहिष्करण’ के विचारों की एक शृंखला है. इस दृष्टि से हब्बा ख़ातून वह स्त्री हैं, जिसे समाज बार-बार बाहर करता है, लेकिन वही बहिर्गमन उसे असाधारण बनाता है. स्त्री जब अपने घर में भी अजनबी हो, विवाह में भी अनचीन्ही और अनचाही हो, सत्ता में भी अवांछित और अनमनी उपस्थिति हो और प्रेम में भी अंततः अकेली रह जाए, तब उसका गीत निजी नहीं रहता. वह समूची स्त्री-जाति की स्मृति बन जाता है.

हब्बा की त्रासदी यह नहीं कि वे अकेली थीं. त्रासदी यह है कि उनका अकेलापन सामूहिक था. हर वह स्त्री, जिसे प्रेम करने का अधिकार नहीं मिला, हर वह स्त्री, जिसे विवाह में सम्मान नहीं मिला, हर वह स्त्री, जिसे सत्ता ने प्रतीक बना दिया पर मनुष्य नहीं माना, हर वह स्त्री, जिसकी आवाज़ लोकगीत तो बनी पर इतिहास नहीं बनी, सब हब्बा में आकर मिलती हैं. लेकिन हब्बा ख़ातून हो या ललद्यद या फिर गीताश्री ही क्यों न हों,  इस रचनाप्रक्रिया का एक एक्रीतुर फ़ेमिनिन भी है. यानी पुरुष-प्रधान भाषा, तर्क, व्यवस्था, अनुशासन और सत्ता के बनाए हुए ढाँचे को तोड़ने की एक सतत प्रक्रिया, जो सीधा, नियंत्रित, क्रमबद्ध, तार्किक, निर्णायक और सत्ता-केंद्रित पुरुष लेखन को ध्वस्त करती हुई आगे बढ़ती है. एक्रीतुर फ़ेमिनिन पुरुष वर्चस्ववाद के विरुद्ध बहती हुई, टूटती हुई, स्मृतियों में लौटती हुई, देह से बोलती हुई, इच्छा से चमकती हुई, पीड़ा से भी अर्थ बनाती हुई भाषा पद्धति है. यह पद्धति कहती है कि स्त्री केवल विषय नहीं है, वह अपनी भाषा और अपने स्व की निर्माता भी है. हम संवैधानिक रूप से फ्रांसीसी क्रांति से समता, स्वतंत्रता, बंधुता और सामाजिक न्याय लेते हैं, क्योंकि इनके बिना पुरुष नागरिक का जीवन जीवन नहीं रह जाता. इसके प्रतिकूल हम उसी फ्रांस की साहित्यिक क्रांति से एक्रीतुर फ़ेमिनिन की अवधारणा लेने से संकोच कर जाते हैं, क्योंकि वे स्त्री नागरिक को स्वतंत्रता की वह पीठिका देता है, जिससे वह सहज ही पुरुष के बराबर आ खड़ी होने की दृष्टि और शक्ति पा लेती है.

दरअसल, एक्रीतुर फ़ेमिनिन में स्त्री अपनी देह से लिखती है. इसका अर्थ अश्लील या जैविक अर्थ में नहीं है, यह कि स्त्री अपने अनुभव, अपनी देह-स्मृति, अपनी कामना, अपने गर्भ, अपने रक्त, अपने दूध, अपनी पीड़ा, अपने प्रेम, अपने अपमान और अपनी मुक्ति की बेचैनी से भाषा रचती है. हब्बा ख़ातून की यह बेचैनी कई युगों को छूती हुई चलती है.

यह भाषा अक्सर सीधी रेखा में नहीं चलती. वह नदी की तरह बहती है. वह कभी गीत बनती है, कभी रुलाई, कभी स्मृति, कभी स्वप्न, कभी प्रतिरोध. इसलिए स्त्री को अपने शरीर से लिखना चाहिए, क्योंकि सदियों तक स्त्री के शरीर पर पुरुषों ने लिखा, अब स्त्री स्वयं अपने शरीर, मन और अनुभव की भाषा लिखे. हब्बा ख़ातून को इस दृष्टि से देखें तो उनकी कविता एक्रीतुर फ़ेमिनिन का भारतीय-कश्मीरी रूप लगती है. वे कोई घोषणापत्र नहीं लिखतीं, वे स्त्रीवाद का नारा नहीं देतीं, लेकिन उनका विरह, उनका प्रेम, उनका गाना, उनका अकेलापन और उनका स्त्री-स्वर पितृसत्ता के विरुद्ध अपने आप खड़ा हो जाता है.

 

 

4.

गीताश्री ने हब्बा ख़ातून के जीवन को जिस सादापन से देखने की कोशिश की है, वह सहजता कई परतों को उघाड़ती है. यह काम वे और भी अधिक तन्मयता से कर सकती थीं, लेकिन संभवत: पाठकीय रुचियों का ख़याल रखते हुए वे हब्बा ख़ातून के दर्द की बंद गली की ख़ाक में पोशीदा आंसुओं से बनी पगडंडियों को सुदूर कश्मीर से बिहार तक अधिक तलाशती रहीं.

गीताश्री बताती हैं, हब्बा का गीत केवल यूसुफ़ शाह चक के वियोग का गीत नहीं है. वह स्त्री की इच्छा का गीत है. वह उस स्त्री की आवाज़ है, जिसे समाज ने पत्नी, प्रेमिका, रानी या लोककथा में बाँधना चाहा, लेकिन जिसने अपनी आवाज़ से स्वयं को बचा लिया. ख़ासकर तब जब स्त्री अपनी चुप्पी को भाषा बना दे, अपने विरह को दर्शन बना दे, अपने प्रेम को प्रतिरोध बना दे और अपने दु:ख को लोक-स्मृति में बदल दे. हब्बा ख़ातून, ललद्यद, मीराबाई, अक्कमहादेवी से लेकर अमृता प्रीतम, तसलीमा नसरीन, अरुंधती रॉय तक सबको इस दृष्टि से पढ़ना बहुत रोचक और ज़रूरी है.

और यही दृष्टि है, जो हमें दक्षिण एशिया के पिछले एक हज़ार वर्षों के इतिहास को स्मरण कराती है, जिसमें यदि स्त्री-स्वर की कोई अदृश्य, दीर्घ और रूहानी नदी दिखाई देती है तो वह किसी एक भूगोल, एक धर्म, एक भाषा या एक राजकीय सीमा में क़ैद नहीं है. वह बल्ख़ की राबिया से शुरू होकर कन्नड़ की अक्का महादेवी, महाराष्ट्र की जनाबाई-मुक्ताबाई-सोयराबाई, कश्मीर की ललद्यद और हब्बा ख़ातून, राजस्थान की मीरा, बंगाल की चंद्रावती, मुग़ल संसार की ज़ेबुन्निसा, अफ़ग़ानिस्तान की नाज़ो अना और आयशा दुर्रानी, श्रीलंका की गजमन नोना, नेपाल की योगमाया, बंगाल की बेगम रोकैया और आधुनिक उपमहाद्वीप की महादेवी, अमृता, सूफ़िया कमाल, महाश्वेता, किश्वर नाहिद, फ़हमीदा रियाज़, परवीन शाकिर, सारा शगुफ़्ता, तसलीमा नसरीन और नादिया अंजुमन तक आती हुई एक अद्भुत स्त्री-ध्वनि है. यह ध्वनि कभी वाख है, कभी वचन, कभी पद, कभी गाथा, कभी भजन, कभी ग़ज़ल, कभी लोकगीत, कभी पुकार और कभी चीख़. और कभी एक हर्फ़ निकाले बिना भी एक साँस में सारी बातें कह देने का सीता जैसा साहसिक ताप.

एक हिसाब से देखा जाए तो कश्मीर की धरती पर दर्शन और काव्यात्मकता का यह स्त्री चैतन्य बहुत पुराना है. लोपामुद्रा, घाेषा, अपाला, रोमशा, विश्ववारा, गार्गी वाचक्नवी और मैत्रेयी जैसी ब्रह्मवादिनियों ने पुरुष सूक्तकारों को विचलित किए रखा था. स्त्री दमन की पौराणिक शैतानियत से पहले अंधेपन ने स्त्री को इस तरह दृष्टि-नियंत्रित नहीं किया था. समय के साथ समानता और समानता के आनंद का यह पुरुष जाने किस क्षण क्रूरता के स्त्री विरोधी मनुष्य में बदल गया. इसके बाद तो स्त्री टूटती ही गई, लेकिन वह अपनी आत्मा की स्वरावली को कभी नहीं भूली.

हालांकि बहुत बार साफ़ लगता है कि जाने इतिहास की किस ख़ाक में इन स्त्रियों के आँसू पोशीदा हैं,  लेकिन फिर भी इन सबने हमेशा एक-दूसरे को किताबों के रास्ते ही प्रभावित किया हो, ऐसा इतिहास प्रमाणित नहीं करता. इतिहास से भी बड़ी चीज़ है मनुष्य की भीतरी स्मृति. एक स्त्री ने दूसरी को कई बार सीधे पढ़कर नहीं, अपने भीतर उसी अग्नि को फिर से पहचानकर प्रभावित किया. वे एक-दूसरे की शिष्या नहीं थीं, पर वे एक-दूसरे की आत्मीय पूर्वज थीं. वे किसी औपचारिक परंपरा की सदस्य नहीं थीं, पर वे एक गुप्त स्त्री-वंशावली की सहयात्री थीं. वे एक-दूसरे से दूर थीं—बल्ख़, कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, बंगाल, सिंध, अफ़ग़ानिस्तान, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, मालदीव—लेकिन उनके हृदय के भीतर की संवेदनाओं के रूहानी तार एक साथ झंकृत होते रहे.

हम बहुत बार इतिहास के मील-पत्थर पर खड़े होकर प्रमाणों से मुलाक़ात की उम्मीदें लगाए बैठे रहते हैं, लेकिन फिर अचानक दिखता है कि स्त्री के लिए इतिहास का तो हर लम्हा ही ज़ुल्मतों की कहानी है. चारों तरफ एक धुंध है. राबिया बल्ख़ी दसवीं सदी की इसी धुंध में खड़ी पहली बड़ी रोशनी की तरह दिखाई देती हैं. फ़ारसी कविता की आरंभिक स्त्री-ध्वनियों में उनका नाम प्रेम, विद्रोह और त्रासदी के साथ आता है. वे उस स्त्री की प्रतीक हैं जिसके प्रेम को समाज ने अपराध माना, लेकिन जिसकी कविता ने प्रेम को आत्मा का अधिकार बना दिया. राबिया के बाद अक्का महादेवी आती हैं—लगभग बारहवीं सदी की कन्नड़ वचन परंपरा की वह निर्वस्त्र आत्मा, जिसने शरीर पर समाज के स्वामित्व को ठुकरा दिया. अक्का ने वस्त्र उतारे भर नहीं, उन्होंने पितृसत्ता की आँख से स्त्री को देखने का पूरा विधान ही उतारकर परे फेंक दिया. वे कहती हैं कि देह मेरी है, ईश्वर मेरा है, प्रेम मेरा है और मुक्ति भी मेरी ही होगी. यह स्वर बाद की सदियों में मीरा, ललद्यद और हब्बा की आत्मा में एक अलग ढंग से फिर बजता है.

हम भारतीय धरती पर धर्म, संस्कृति और राजनीति की छनती हुई नज़रों से स्त्री की दुनिया को देखें तो हमें रज़िया सुलतान भी एक ग़ुलाम वंश के बादशाह के आंगन में अपने जज़्बात, जाँबाज़ी, बेख़्वाबियों, अफ़सानों, महताबों और तमन्नाओं की दुनिया के साथ आगे बढ़ती दिखती हैं. वह कैसी बेकसी रही होगी, जब रज़िया को उनके भाइयों और वर्चस्वादी पुरुषों ने किसी नियाज़-आमेज़ ख़ामोशी से सहने के बजाय सहमी हुई ख़ामोश आहों में उसके प्रेमी के साथ मौत के घाट उतार दिया था. उसे भी पिता ने सिखाया था कि वह कुछ लिखे, कुछ पढ़े, लेकिन राज चलाना भी सीखे. बकायादा ख़रीदे गए एक गु़लाम की इस बेटी के भीतर एक लड़की लगातार खिल रही थी. एक इस्पाती औरत ढल रही थी. और एक जोशीला दिमाग़ इस तरह काम कर रहा था कि वह 31 साल की उम्र में इस पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में पहली महिला शासक बन गईं और वह भी एक बंद इस्लामिक व्यवस्था के द्वार-दरवाज़े की अर्गलाओं को तोड़कर. इसकी प्रतिध्वनियाँ दसों दिशाअों में पहुंचीं और लोग हत्प्रभ रह गए.

महाराष्ट्र की जनाबाई, मुक्ताबाई और सोयराबाई इस स्त्री-धारा में श्रम, जाति और भक्ति का नया आयाम जोड़ती हैं. जनाबाई चक्की पीसती हुई, घर का काम करती हुई, दासी की तरह जीवन जीती हुई भी कविता में अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाती हैं. वह कहती हैं कि ईश्वर महलों में नहीं, रसोई और श्रम में भी उतर सकता है. मुक्ताबाई कम आयु में ही एक दार्शनिक प्रखरता लेकर आती हैं, उनके भीतर आध्यात्मिकता और बुद्धि का अद्भुत मेल है. सोयराबाई दलित स्त्री-अनुभव को भक्ति के भीतर दर्ज करती हैं. यहाँ स्त्री केवल प्रेमिका या संत नहीं है, वह श्रम करती हुई, अपमान झेलती हुई, जाति और लिंग की दोहरी दीवारों से टकराती हुई मनुष्य है. यही वह स्वर है जो आधुनिक काल में सावित्रीबाई फुले और महाश्वेता देवी तक आता है.

फिर कश्मीर की बर्फ़ीली, रहस्यात्मक और दार्शनिक घाटी में ललद्यद प्रकट होती हैं. ललद्यद केवल कश्मीरी शैव साधिका नहीं हैं, वे स्त्री के आत्म-निर्वासन और आत्म-प्रकाश की मूर्ति हैं. उन्होंने घर छोड़ा, देह की सामाजिक परिभाषाओं को तज दिया, भाषा को लोक में उतारा और आध्यात्मिक अनुभव को संस्कृत की ऊँची दीवारों से निकालकर कश्मीरी वाखों में बदल दिया. ललद्यद के बाद हब्बा ख़ातून आती हैं— कश्मीर की ज़ून, प्रेम और विरह की “बुलबुल”. ललद्यद आत्मा की निर्वसन साधिका हैं, हब्बा विरह की गाती हुई रानी. एक ने कहा कि भीतर की खोज ही मुक्ति है, दूसरी ने कहा कि प्रेम के खो जाने पर भी स्वर नहीं खोना चाहिए. ललद्यद ने आत्मा को बचाया, हब्बा ने स्मृति को. एक आध्यात्मिक प्रतिरोध है, दूसरी भावनात्मक उद्वेलन. दोनों मिलकर कश्मीर की स्त्री-आत्मा का अद्भुत द्वंद्व रचती हैं.

इसी काल-धारा में मीरा आती हैं— राजस्थान की राजमहलों से निकलकर लोक की अनश्वर गायिका. मीरा ने पति, कुल, राज्य, प्रतिष्ठा और मर्यादा— सबको कृष्ण-प्रेम के सामने अस्वीकार कर दिया. यह केवल भक्तिवाद नहीं था, यह स्त्री का अपना प्रेम चुनने का ऐतिहासिक साहस था. मीरा में अक्का की देह-मुक्ति, ललद्यद का आंतरिक संन्यास और हब्बा का प्रेम-विरह— तीनों अलग-अलग संगीतों की तरह मिलते हैं. इसलिए मीरा केवल मंदिरों की आरती नहीं हैं, वे स्त्री की निजी आकांक्षा का राजनीतिक दस्तावेज़ भी हैं.

बंगाल की चंद्रावती इस परंपरा में एक और असाधारण मोड़ हैं. उन्होंने रामायण को सीता की दृष्टि से देखा. यह कितना बड़ा काम था—जिस महाकाव्य को पुरुषों ने पुरुष-नायकों की मर्यादा में बाँधा, चंद्रावती ने उसके भीतर स्त्री के दुःख, अपमान और प्रश्न को केंद्र में रख दिया. यह स्त्रीवादी पुनर्पाठ का बहुत पुराना उदाहरण है. आधुनिक विश्वविद्यालयों और आलोचनाओं से सदियों पहले चंद्रावती ने यह समझ लिया था कि कथा बदलनी हो तो दृष्टि बदलो. रामायण वही रहेगी, लेकिन यदि सीता बोलेगी तो पूरा महाकाव्य बदल जाएगा. ऐसे में भवभूति की सीता और कालिदास की शकुंतला जीवंत हो उठती हैं.

ज़ेबुन्निसा मख़्फ़ी मुग़ल सत्ता के भीतर कविता की कै़द और स्वतंत्रता दोनों का नाम हैं. वे राजकुमारी थीं, लेकिन कविता में वे सत्ता से अधिक संवेदना की स्त्री हैं. उनके बाद नाज़ो तोखी और आयशा दुर्रानी अफ़ग़ान संसार में स्त्री-बुद्धि, मातृ-शक्ति और कविता की अलग परंपरा बनाती हैं. नाज़ो अना केवल कवयित्री नहीं, पश्तून स्मृति की मातृ-प्रतिमा हैं. आयशा दुर्रानी शिक्षित, साहित्यिक और सांस्कृतिक स्त्री की छवि प्रस्तुत करती हैं. इसी अफ़ग़ान धरती पर आगे चलकर मलालाई मैवंद युद्ध-क्षेत्र में लोक-वीरांगना बनती हैं और आधुनिक समय में मीना केशवर कमाल तथा नादिया अंजुमन स्त्री-मुक्ति और कविता की क़ीमत अपने जीवन से चुकाती हैं.

श्रीलंका की गजमन नोना, नेपाल की योगमाया और बंगाल की बेगम रोकैया इस परंपरा को आधुनिक चेतना की दहलीज़ तक लाती हैं. गजमन नोना सिंहली कविता में स्त्री-विनोद, व्यंग्य और काव्य-कौशल की तेजस्वी उपस्थिति हैं. योगमाया न्यौपाने धार्मिक-सामाजिक सुधार और स्त्री-अधिकार की ऐसी आवाज़ हैं, जो नेपाल की परंपरागत संरचनाओं से टकराती हैं. बेगम रोकैया ने पर्दे, अशिक्षा और स्त्री-गु़लामी के ख़िलाफ़ आधुनिक स्त्री-कल्पना का ऐसा संसार रचा, जिसमें स्त्री केवल करुणा की वस्तु नहीं, भविष्य की निर्माता है. उनकी “सुल्ताना का सपना” इस पूरी परंपरा में कल्पना की क्रांतिकारी उड़ान है—जहाँ स्त्री पृथ्वी पर पहली बार अपने लिए आकाश बनाती है.

सावित्रीबाई फुले और पंडिता रमाबाई इस धारा में निर्णायक आधुनिक हस्तक्षेप हैं. सावित्रीबाई ने स्त्री और शूद्र शिक्षा को केवल सुधार नहीं, सामाजिक क्रांति बनाया. वे जनाबाई-सोयराबाई की श्रमशील और अपमानित स्त्री को स्कूल तक ले जाती हैं. पंडिता रमाबाई ने धर्म, जाति, विधवा-जीवन और स्त्री-अधिकारों पर अपने समय की सबसे निर्भीक आलोचनाएँ कीं. इसीलिए वे केवल सुधारक नहीं, भारतीय स्त्री-विवेक की निर्मम और कठिन आवाज़ हैं.

 

5.

बीसवीं सदी में महादेवी वर्मा इस परंपरा को करुणा, सौंदर्य और स्त्री-अंतरंग की गहरी दार्शनिक ऊँचाई देती हैं. उन्हें “आधुनिक मीरा” कहना आसान है, लेकिन वे मीरा की पुनरावृत्ति नहीं हैं. महादेवी में मीरा का विरह है, पर वह वैराग्य नहीं, आधुनिक स्त्री का अस्तित्वगत एकांत है. सुभद्राकुमारी चौहान स्वतंत्रता की ध्वनियों को समय के अनुष्ठान की लय पर पौरुषपूर्ण बुन्देलखंडी आल्हा शैली में इस तरह ढालती हैं कि वह ब्रिटिश शासन के धातु की त्वचा पर तेजाब की तरह बरसती हैं. अमृता प्रीतम इस परंपरा में विभाजन की चीख़ लेकर आती हैं. जब वे वारिस शाह को पुकारती हैं तो वास्तव में वे पंजाब की समूची स्त्री-देह, बलात्कार, विस्थापन और रक्त-इतिहास को आवाज़ देती हैं. हब्बा का कश्मीर और अमृता का पंजाब— दोनों जगह प्रेम इतिहास की हिंसा से घायल है.

इन सबको साथ पढ़ना दक्षिण एशिया की स्त्री-संवेदना का एक  अद्भुत जुगराफ़िया खोलता है. यह जुगराफ़िया बताता है कि स्त्री ने हमेशा केवल रोना नहीं रोया, उसने रोने को राग बनाया. उसने केवल प्रेम नहीं किया, प्रेम को प्रतिरोध बनाया. उसने केवल ईश्वर को नहीं पुकारा, ईश्वर की आड़ में पितृसत्ता को चुनौती दी. उसने केवल विरह नहीं सहा, विरह को भाषा की आग बना दिया. उसने केवल घर नहीं छोड़ा, अपने सपनों के वधस्थल को ही घर की परिभाषा में रख दिया. उसने केवल समाज से सवाल नहीं किया, समाज को अपने सामने कठघरे में खड़ा कर दिया.

राबिया से अक्का, अक्का से जनाबाई, जनाबाई से ललद्यद, ललद्यद से मीरा, मीरा से हब्बा, हब्बा से चंद्रावती, चंद्रावती से रोकैया, रोकैया से सावित्रीबाई, सावित्रीबाई से महादेवी, महादेवी से अमृता, अमृता से किश्वर-फ़हमीदा-परवीन-सारा तक यह कोई सीधी वंशावली नहीं है. यह रक्त की वंशावली नहीं, रूह की वंशावली है. यह गुरु-शिष्या परंपरा नहीं, दर्द की अंतर्ध्वनि है. यह इतिहास की सड़क पर चलती हुई पंक्ति नहीं, आकाश में चमकते तारों का मंडल है—एक तारा अफ़ग़ानिस्तान में जलता है, दूसरा कश्मीर में, तीसरा राजस्थान में, चौथा बंगाल में, पाँचवाँ श्रीलंका में, छठा नेपाल में, लेकिन रात एक ही है और प्रकाश की आकांक्षा भी एक ही.

इन स्त्रियों ने दक्षिण एशिया को यह सिखाया कि कविता केवल अलंकार नहीं, जीवन की गवाही है, भक्ति केवल समर्पण नहीं, अस्वीकार की पराकाष्ठा भी हो सकती है, प्रेम केवल निजी नहीं, सभ्यता के ख़िलाफ़ मनुष्य की सबसे बड़ी अपील भी हो सकता है, और स्त्री केवल इतिहास की पात्र नहीं, इतिहास की रचयिता भी है. वे अलग-अलग युगों में जन्मीं, अलग-अलग भाषाओं में बोलीं, अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों से आईं, लेकिन उनके भीतर एक ही रूहानी प्रकंपन था—स्वतंत्र होने की आकांक्षा, प्रेम करने का अधिकार, अपनी देह और आत्मा पर अपना स्वामित्व और उस दुनिया को बदल देने की जिद जहाँ स्त्री से पहले उसकी चुप्पी मांगी जाती है.

इसीलिए राबिया बल्ख़ी, अक्का महादेवी, ललद्यद, मीरा, हब्बा ख़ातून, चंद्रावती, ज़ेबुन्निसा, सावित्रीबाई, महादेवी, अमृता, सुफ़िया, महाश्वेता, किश्वर, फ़हमीदा, परवीन और सारा—ये सब अलग-अलग नाम नहीं हैं. ये दक्षिण एशिया की स्त्री-आत्मा के अलग-अलग स्वर हैं. इन्हें साथ पढ़ना मानो एक ऐसे अदृश्य वीणा-वृंद को सुनना है जिसमें हर तार अलग है, पर प्रकंपन एक है, हर भाषा अलग है, पर पीड़ा एक है, हर भूगोल अलग है, पर मुक्ति की तड़प और आकांक्षा एक है.

स्त्री-लेखन की कई अवधारणाएं हैं और हम उनमें झांककर देखें तो उसमें स्त्री की देह, स्मृति, संवेदना और असंरचित भाषा की बड़ी भूमिका है. हब्बा का काव्य इसी अर्थ में स्त्री-लेखन का भारतीय-कश्मीरी रूप है. वह नियमबद्ध दरबारी भाषा में नहीं बोलता. वह धुन में बोलता है. वह रुलाई में बोलता है. वह पहाड़ी प्रतिध्वनि में बोलता है. वह किसी पुरुष आलोचक की स्वीकृति लेने नहीं आता. वह जीवन से निकलता है और लोक में चला जाता है.

गीताश्री की पुस्तक का महत्व इसीलिए और बढ़ जाता है. हिन्दी में हमें ऐसी पुस्तकों की ज़रूरत बहुत अधिक है. हमारे साहित्य में स्त्रियों पर बहुत लिखा गया है, लेकिन स्त्री-कवयित्रियों की खोज अक्सर या तो शैक्षणिक रही है या भावुक. गीताश्री ने इसमें तीसरा रास्ता चुना है- पत्रकारिता, यात्रा, लोक-स्मृति और साहित्यिक विवेक का परिपथ.

वे हब्बा को पढ़ती भर नहीं, खोजती हैं. वे पूछती हैं. लोगों से बात करती हैं. विद्वानों से मिलती हैं. कब्र के सवाल को भी उठाती हैं. बिहार में हब्बा की कब्र होने की भरपूर संभाव्यता पर बातचीत दर्ज करती हैं. कश्मीर में कब्र न होने की बात भी सामने लाती हैं. प्रो. इम्तियाज़ अहमद, प्रो. यूसुफ़ टैंग जैसे इतिहास-लेखकों में हब्बा की पहली उपस्थिति पर चर्चा करती हैं तो अग्निशेखर जैसे साहित्यकार से सिर्फ़ हब्बा ख़ातून ही नहीं, रूपभवानी, अरणिमाल और रूपा के बारे में बातचीत करती हैं. मुज़फ़्फ़र अली से हब्बा के प्रेम-बोध पर बात करती हैं. असगर वजाहत जैसे लेखक से भी संवाद करती हैं. यह पुस्तक केवल हब्बा पर लिखा गया भावात्मक लेखन नहीं है, यह हब्बा के चारों ओर बने स्मृति-लोक की जाँच है.

किसी स्त्री-कवयित्री की खोज में कब्र का प्रश्न मामूली नहीं होता. पुरुषों की कब्रें इतिहास बन जाती हैं, स्त्रियों की कब्रें किंवदंती. यूसुफ़ शाह चक की समाधि बिहार में एक ऐतिहासिक स्मृति के रूप में चिन्हित होती है, पर हब्बा की कब्र कहाँ है—यह प्रश्न स्वयं बताता है कि इतिहास ने स्त्री के शरीर और स्मृति के साथ कैसा व्यवहार किया.

हब्बा जैसे चरित्रों की विडंबना यही है कि लोक उन्हें अमर कर देता है और इतिहास उन्हें अस्पष्ट छोड़ देता है. लोक गीत में उन्हें बचाते और सहेजते हैं, पर दस्तावेज़ में नहीं. इतिहास उनकी प्रेमकथा से आकर्षित होता है, लेकिन उनकी बौद्धिकता से असहज रहता है. गीताश्री इस असहजता को बखूबी पकड़ती हैं.

हब्बा का प्रेम दरअसल सत्ता-विमर्श भी है. यूसुफ़ शाह चक केवल प्रिय नहीं हैं, वे कश्मीर की स्वदेशी सत्ता के अंतिम बड़े प्रतीक भी हैं. उनका मुग़ल सत्ता से संघर्ष, उनका निर्वासन और फिर कश्मीर का राजनीतिक रूपांतरण— इन सबने हब्बा के विरह को ऐतिहासिक बना दिया. इसीलिए हब्बा का वियोग केवल पति-वियोग या प्रेमी-वियोग नहीं है. वह कश्मीर-वियोग है.

जब कोई स्त्री अपने प्रिय को खोती है तो वह निजी त्रासदी होती है. जब वही प्रिय एक पराजित राज्य का प्रतीक हो तो वह त्रासदी इतिहास बन जाती है.

जैसा कि हम बाज़ बहादुर और रानी रूपमती की कहानी में देखते हैं. कुछ वर्ष पहले जब “रानी रूपमती की आत्मकथा” आई थी तो उसने भी आंसुओं को रवाँ करती आंखों के भीतर उदास मौसमों के खिले फूलों को देखा था. लेकिन प्रेमी को खो देने वाली वह स्त्री जब कवयित्री हो तो वह इतिहास गीत बन जाता है. हब्बा ख़ातून के साथ यही हुआ.

रानी रूपमती के प्रेमी शासक बाज़ बहादुर को अंतत: अकबर के सामने 1570 में समर्पण करना पड़ा था. लेकिन रूपमती उससे पहले ही 1561 में मारी जा चुकी थी. कमोबेश यही युसुफ़ शाह चक के साथ हुआ. वह 22 सितंबर 1592 को पुरी में मारे गए और बिहार के पटना से 100 किमी दूर इस्लामपुर से तीन मील उत्तर-पूर्व स्थित बिस्वाक में दफ़नाए गए. लेकिन बताते हैं कि उनकी मृत्यु के कई साल बाद भटकती हुई हब्बा भी वहीं पहुंच गईं. वे जहाँगीर के शासनकाल में 1609 में कश्मीर से बिहार तक 2000 किलोमीटर तक का सफ़र करके भटकते हुए, लेकिन अपने ग़मे-मुहब्बत को बेशक़ीमती मानते हुए अपने प्रेमी पति की कब्र पर पहुंचीं और वहीं प्राण छोड़ दिए. सिर्फ़ अपने आंसुओं के वैभव और सिसकियों की थाती को इतनी दूर लेकर आना और ज़ुल्मत के अंधेरे का शिकार नहीं होना ही उन्हें सामान्य मनुष्यों से समूचे इतिहास में एकदम अलग खड़ा कर देता है. कुछ समय के लिए ही सही, लेकिन हब्बा ने एकबारगी तो बिहार के उस इलाक़े को भी कश्मीरी सूफ़ियाना मौसिकी से सराबोर कर दिया. हालांकि गीताश्री ने इसे कुछ दूसरी तरह अपने अनुसंधान के आधार पर लिखा है.

कश्मीरी सूफ़ियाना मौसिकी में उनके वचुन का महत्व इसी वजह से बड़ा है. उनकी रचनाएँ पढ़ने से अधिक गाने की चीज़ हैं. यह बात बहुत महत्त्वपूर्ण है. जो कविता गाई जाती है, वह किताब में बंद नहीं रहती. वह स्मृति में चलती है. वह पीढ़ियों के गले से गुजरती है. वह पहाड़ों, नदियों, खेतों, घरों और औरतों के श्रम के बीच जीवित रहती है.

हब्बा की कविता लोकधुनों में इसलिए बची, क्योंकि वह लोक के अनुभव से पैदा हुई थी. उसमें दरबारी काव्य का कृत्रिम सौंदर्य नहीं था. उसमें जीवन का कच्चा नमक था. उसमें स्त्री की साँस थी. उसमें प्रेम की वह बेचैनी थी, जो धार्मिक भी हो सकती है, सूफ़ियाना भी, सांसारिक भी और अस्तित्ववादी भी.

हब्बा का प्रेम ईश्वर और मनुष्य के बीच झूलता है. प्रियतम कभी मनुष्य है, कभी अनुपस्थित सत्य. विरह कभी यूसुफ शाह से है, कभी आत्मा से, कभी कश्मीर से, कभी उस नियति से जिसने स्त्री को प्रतीक्षा बना दिया. यही हब्बा को बड़ी कवयित्री बनाता है. छोटी कवयित्री प्रेम में रोती है, बड़ी कवयित्री प्रेम में सभ्यता का दुःख सुनकर उसे रागों में गूंथ लेती है.

हब्बा ख़ातून की कविता में स्त्रीवाद आधुनिक नारे की तरह नहीं आता. वह अनुभव की तरह आता है. वे घोषणा नहीं करतीं कि मैं स्त्री हूँ और मुझे अधिकार चाहिए. वे गाती हैं और गीत ही अधिकार बन जाता है. वे रोती हैं और रुलाई प्रतिरोध बन जाती है. वे प्रेम करती हैं और प्रेम पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्री का आत्म-साक्ष्य बन जाता है.

आधुनिक स्त्रीवाद कई बार भाषा में बहुत स्पष्ट होता है, लेकिन अनुभव में कम. हब्बा का स्त्रीवाद अनुभव में स्पष्ट है, भाषा में लोकधर्मी. उनकी कविता यह बताती है कि स्त्री की मुक्ति केवल घर छोड़ने में नहीं, अपनी आवाज़ पाने में है. आवाज़ अगर मिल जाए तो स्त्री लोक-स्मृति को बदल सकती है.

गीताश्री की पुस्तक में हब्बा-कालीन कश्मीर, स्त्रियाँ और घरेलू हिंसा जैसा अध्याय इसलिए बहुत महत्त्वपूर्ण है. यह हब्बा को केवल प्रेमिका के रूप में नहीं, अपने समय की स्त्री के रूप में देखने का रास्ता खोलता है. किसी भी कवयित्री को समझने के लिए उसके कालखंड को समझना अनिवार्य है. समय घड़ियाल का जबड़ा है, जिसमें न जीवन अपना रहता है, न मौत अपनी, न अमल अपना और न जीना अपना. लेकिन यह सब प्रेम में संभव है. प्रेम का भी समाजशास्त्र होता है. विरह का भी इतिहास होता है. विवाह का भी सत्ता-तंत्र होता है. स्त्री की चुप्पी का भी वर्ग, जाति, धर्म और भूगोल होता है.

हब्बा का जीवन इस दृष्टि से केवल काव्यात्मक नहीं, समाजशास्त्रीय पाठ भी है. वह बताता है कि मध्यकालीन समाज में स्त्री की इच्छा का स्थान क्या था. वह यह भी बताता है कि लोकस्मृति स्त्री को बचाती है, पर कई बार उसे मिथक बनाकर उसकी जटिलता कम भी कर देती है. गीताश्री की पुस्तक इसी मिथकीय परत को खुरचती है. पुस्तक का अध्याय “हब्बाकालीन कश्मीर, स्त्रियाँ और घरेलू हिंसा” इस मामले में कुछ पहलुओं पर अच्छा फोकस करता है.

यहाँ पठन की एक और ज़रूरी बात आती है. हब्बा ख़ातून पर हिन्दी में लिखना केवल हिन्दी पाठकों को कश्मीर से परिचित कराना नहीं है. यह भारतीय भाषाओं के बीच संवाद की ज़रूरत को भी सामने लाता है. हिन्दी पाठक कश्मीर को अधिकतर राजनीति, आतंक, सेना, अनुच्छेद, चुनाव, पर्यटन या बर्फ़ के भूगोल से जानते हैं. लेकिन कश्मीर को उसकी कवयित्रियों से जानना, उसकी लोकधुनों से जानना, उसकी स्त्री-आवाज़ से जानना—यह बिल्कुल दूसरी तरह का सांस्कृतिक अनुभव है.

कश्मीर को समझना हो तो केवल नक़्शा नहीं देखना चाहिए. ललद्यद को पढ़ना चाहिए. हब्बा को सुनना चाहिए. अरणिमाल को याद करना चाहिए. सूफ़ियाना मौसिकी की रगों में उतरना चाहिए. गीताश्री जैसी पुस्तकें यही रास्ता बनाती हैं.

हब्बा की खोज में जो पत्रकारिता है, वह पुस्तक को ज़िंदा बनाती है. अकादमिक लेखन कई बार तथ्य देता है, लेकिन जीवन नहीं देता. यात्रा-वृत्तांत कई बार दृश्य देता है, पर विवेक नहीं देता. भावुक लेखन कई बार करुणा देता है, पर पड़ताल नहीं देता. गीताश्री इन तीनों को जोड़ती हैं—तथ्य, यात्रा और करुणा.

इस पुस्तक की पठनीयता इसीलिए है कि वह केवल शोध-सामग्री नहीं लगती. उसमें खोज का रोमांच है. जैसे कोई रिपोर्टर किसी पुरानी स्त्री-आवाज़ के पीछे-पीछे चल रही हो. कहीं एक दस्तावेज़ मिलता है. कहीं एक लोककथा. कहीं एक विद्वान का संदेह. कहीं एक कब्र का विवाद. कहीं एक गीत का अंश. कहीं एक ग़लतफ़हमी. कहीं इतिहास की धूल. कहीं प्रेम की रोशनी.

और इन सबके बीच हब्बा धीरे-धीरे सामने आती हैं. पूरी नहीं आतीं. शायद आ भी नहीं सकतीं. बड़ी स्त्रियाँ अक्सर पूरी नहीं मिलतीं. वे अपने पीछे स्वर छोड़ जाती हैं, देह नहीं.

हब्बा ख़ातून की सबसे बड़ी उपस्थिति उनकी अनुपस्थिति में है. उनकी कब्र का न मिलना भी एक सांस्कृतिक तथ्य है. जिस स्त्री को कश्मीर ने गाया, उसे इतिहास ने कहाँ रखा? यह प्रश्न किसी भी संवेदनशील पाठक को परेशान करता है. यूसुफ शाह चक की समाधि बिहार में मिलती है, पर हब्बा का अंतिम ठिकाना धुँधला है. यह धुँधलापन केवल भौगोलिक नहीं, पितृसत्तात्मक इतिहास का धुँधलापन भी है.

स्त्रियों को इतिहास अक्सर उनके संबंधों से याद रखता है—किसकी बेटी, किसकी पत्नी, किसकी प्रेमिका, किसकी रानी. हब्बा इन संबंधों से आगे जाती हैं. वे अपनी आवाज़ से याद रहती हैं. यह उनके स्त्रीत्व की नहीं, उनकी रचनात्मक सत्ता की विजय है.

 

 

6.

यहाँ हब्बा की तुलना मीरा से की जा सकती है, लेकिन सावधानी के साथ. मीरा का प्रिय कृष्ण है, हब्बा का प्रिय यूसुफ़ है और उससे अधिक अनुपस्थित जीवन भी. मीरा में भक्ति प्रेम को पारलौकिक बनाती है. हब्बा में प्रेम लोक और इतिहास से बँधा रहता है. मीरा सामाजिक बंधनों को धार्मिक प्रेम में तोड़ती हैं. हब्बा सामाजिक बंधनों को सांसारिक प्रेम और काव्यात्मक रुलाई में तोड़ती हैं.

मीरा ने कहा- मेरे तो गिरधर गोपाल. हब्बा मानो कहती हैं- मेरे तो वे भी हैं जो चले गए, और वह घाटी भी है जो पीछे छूट गई. हब्बा की कविता का स्वर कहीं-कहीं अमृता प्रीतम की स्मृति भी जगाता है. अमृता ने वारिस शाह को पुकारा था- पंजाब की बेटियों के दर्द को सुनने के लिए. हब्बा अपने प्रिय को पुकारते हुए कश्मीर की आत्मा को पुकारती हैं. एक स्त्री की आवाज़ जब भूगोल को संबोधित करने लगती है, तब वह केवल साहित्य नहीं रहती, सभ्यता की साक्षी बन जाती है.

हब्बा की कविताएँ और गीत यह बताते हैं कि प्रेम और राजनीति कभी पूरी तरह अलग नहीं होते. सत्ता जब जीवन में प्रवेश करती है तो प्रेम भी बदल जाता है. निर्वासन केवल राजा का नहीं होता, प्रेमिका का भी होता है. राज्य पर कब्ज़ा हो तो स्त्री के गीत में भी छाया पड़ती है. मुग़ल सत्ता के प्रसंग में हब्बा को पढ़ना इसलिए ज़रूरी है. यूसुफ शाह चक की पराजय और निर्वासन ने उनके काव्य को वह ऐतिहासिक अंधेरा दिया, जिसमें उनकी आवाज़ और दीप्त हो उठी. दु:ख कई बार कविता को नष्ट कर देता है, लेकिन कुछ कवियों में दु:ख कविता का दूसरा जन्म कराता है. हब्बा दूसरी श्रेणी में हैं.

कश्मीरी लोक-स्मृति में यूसुफ शाह चक का निर्वासन राज्य-हानि का प्रतीक है. पर हब्बा के गीत इस राजनीतिक घटना को भावात्मक और सांस्कृतिक अर्थ देते हैं. सत्ता के इतिहास में यह घटना पराजय है, हब्बा की कविता में यह वियोग है, लोक में यह गाथा है, और आधुनिक आलोचना में यह स्त्री की ऐतिहासिक आवाज़ है.

गीताश्री की पुस्तक ऐसे ही स्थलों पर बहुत उपयोगी हो जाती है. वह पाठक को बताती है कि हब्बा को केवल भावुकता से नहीं समझा जा सकता. उनके लिए इतिहास, लोक, भूगोल, संगीत, स्त्री-अनुभव और राजनीति सबको साथ पढ़ना होगा.

हब्बा की कविता में सूफ़ियाना तत्व भी है, लेकिन उसे सतही अर्थ में नहीं समझना चाहिए.

सूफ़ियाना प्रेम केवल ईश्वर से मिलन की इच्छा नहीं है. वह अहं के गलने, प्रिय में खो जाने, अनुपस्थिति में उपस्थिति खोजने और दर्द को ज्ञान में बदलने की प्रक्रिया है. हब्बा का विरह इस अर्थ में सूफ़ियाना है कि वह पीड़ा को आत्मा की गहराई में बदल देता है.

लेकिन हब्बा को केवल सूफ़ी कह देना भी पर्याप्त नहीं. वे लोक-कवयित्री भी हैं. वे स्त्री-कवयित्री भी हैं. वे राजनीतिक शोक की कवयित्री भी हैं. वे प्रेम की दार्शनिक कवयित्री भी हैं. वे संगीत की कवयित्री भी हैं. उनके भीतर कई हब्बाएँ रहती हैं.

गीताश्री की पुस्तक का शीर्षक—हब्बा की खोज—इसलिए बहुत सार्थक है. हब्बा मिलती नहीं, खोजी जाती हैं. और हर खोज में एक नई हब्बा मिलती है. एक हब्बा लोकगीतों में है. एक हब्बा कश्मीर की पहाड़ियों में है. एक हब्बा यूसुफ़ शाह चक की स्मृति में है.

एक हब्बा स्त्री की पीड़ा में है. एक हब्बा इतिहास की अनुपस्थिति में है. एक हब्बा हिन्दी पाठक की प्रतीक्षा में है.

यह पुस्तक हिन्दी पाठक को कश्मीर की स्त्री-स्मृति से जोड़ती है. यही इसका बड़ा सांस्कृतिक महत्व है. हिन्दी में अक्सर उत्तर भारतीय मैदानी साहित्यिक चेतना का प्रभुत्व रहा है. पहाड़, सीमांत, कश्मीर, पूर्वोत्तर, आदिवासी भूगोल, दक्कन, मरुभूमि—इन सबकी स्त्री आवाज़ें हिन्दी संसार में बहुत कम पहुँचती हैं. गीताश्री की पुस्तक इस अभाव को भरती है.

हमें ऐसी पुस्तकों की सचमुच बहुत ज़रूरत है. भारतीय उपमहाद्वीप्रीय भाषाओं की असाधारण स्त्रियों पर हिन्दी में गंभीर, पठनीय, शोधपूर्ण और संवेदनात्मक पुस्तकें बहुत कम हैं. कई बार हिन्दी में जो आता है वह या तो अनुवादित सूचनात्मक सामग्री होती है या शुष्क अकादमिक लेखन. गीताश्री का काम इस अर्थ में अलग है कि वह पाठक को साथ लेकर चलती हैं. वह हब्बा को पेडेस्टल पर नहीं रखतीं. वे उन्हें खोजती हैं. यह खोज ही पुस्तक का नैतिक केंद्र है. किसी स्त्री को खोजने का अर्थ है- उस पर बनी धारणाओं को संदेह से देखना. किसी कवयित्री को खोजने का अर्थ है- उसके गीतों के पीछे का जीवन देखना. किसी लोक-नायिका को खोजने का अर्थ है- लोक की स्मृति और इतिहास की चुप्पी दोनों को सुनना.

हब्बा ख़ातून पर लिखते हुए यह भी समझना होगा कि वे केवल अतीत की कवयित्री नहीं हैं. वे आज की स्त्री के लिए भी प्रासंगिक हैं. आज भी प्रेम करने वाली स्त्री से समाज असहज होता है. आज भी स्त्री की इच्छा को संदेह से देखा जाता है. आज भी स्त्री के विरह को साहित्यिक बना दिया जाता है, पर उसके अधिकार को राजनीतिक नहीं माना जाता. हब्बा की आवाज़ हमें यह बताती है कि स्त्री का दुःख भी ज्ञान है. स्त्री का प्रेम भी दर्शन है. स्त्री की प्रतीक्षा भी इतिहास है. स्त्री का गीत भी प्रतिरोध है.

हब्बा ख़ातून की कविता को पढ़ते हुए यह भी लगता है कि प्रेम स्त्री के लिए केवल भाव नहीं, जोखिम है. पुरुष प्रेम करे तो कथा बनती है, स्त्री प्रेम करे तो समाज उसे प्रश्न बना देता है. हब्बा ने इस जोखिम को जिया. उनका प्रेम निजी था, लेकिन उसकी कीमत ऐतिहासिक हुई. वह प्रेम जिसमें स्त्री अपनी आवाज़ पाती है, पितृसत्ता उससे डरती है. क्योंकि बोलती हुई प्रेमिका केवल प्रेमिका नहीं रहती, वह अपने जीवन पर दावा करती हुई मनुष्य बन जाती है. हब्बा इसी दावे की कवयित्री हैं.

गीताश्री ने इस दावे को गंभीरता से लिया. यह उनकी लेखकीय ईमानदारी है. उन्होंने हब्बा को केवल सुंदर, करुण, पहाड़ी, रोमानी स्त्री बनाकर नहीं छोड़ा. उन्होंने प्रश्न पूछे. उन्होंने प्रमाण खोजे. उन्होंने मतभेदों को दर्ज किया. उन्होंने बातचीतों को जगह दी. उन्होंने लोक और इतिहास के बीच की दरारों को छिपाया नहीं.

यही काम एक अच्छी पत्रकार-लेखक कर सकती है. इस पुस्तक की चर्चा करते हुए डॉ. कर्ण सिंह की प्रस्तावना का होना भी अर्थपूर्ण है. कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति, राजकीय इतिहास और भारतीय बौद्धिक परंपरा के बीच डॉ. कर्ण सिंह का अपना स्थान रहा है. उनकी प्रस्तावना पुस्तक को एक सांस्कृतिक वैधता देती है, पर पुस्तक की शक्ति अंततः गीताश्री की अपनी खोज में है.

हब्बा ख़ातून पर गंभीर काम करते समय एक कठिनाई हमेशा रहेगी— इतिहास और किंवदंती का अंतर. लेकिन बड़ी लोक-स्त्रियों को केवल इतिहास के कठोर तराजू से नहीं तौला जा सकता. लोक-स्मृति भी एक प्रकार का इतिहास होती है, बस उसका लेखन कागज़ पर नहीं, लोगों के गले में होता है. हब्बा का वास्तविक इतिहास शायद उतना नहीं मिलेगा जितना उनका स्मृति-इतिहास मिलेगा. पर क्या स्मृति-इतिहास कम महत्त्वपूर्ण है? बिल्कुल नहीं. कई बार लोक किसी स्त्री को इसलिए बचाता है, क्योंकि राजकीय इतिहास उसे बचाना नहीं चाहता.

हब्बा ख़ातून के मामले में यही हुआ लगता है. वे लोक में इसलिए बचीं क्योंकि लोग उन्हें गाते रहे. वे स्त्रियों की स्मृति में इसलिए बचीं क्योंकि उनके गीतों में अपना दुःख पहचाना गया. वे कश्मीर में इसलिए बचीं क्योंकि उनका विरह कश्मीर के विरह से जुड़ गया. हब्बा की खोज इसलिए केवल साहित्यिक परियोजना नहीं, स्मृति-न्याय की परियोजना भी है. यह उस स्त्री को फिर से उसके नाम, उसके स्वर और उसके सांस्कृतिक स्थान के साथ उपस्थित करती है जिसे इतिहास ने आधा देखा था.

आज जब साहित्य भी कई बार बाज़ार, पुरस्कार, प्रचार और तात्कालिक चर्चाओं में उलझ जाता है, हब्बा जैसी कवयित्री पर ऐसी पुस्तक लिखना सांस्कृतिक धैर्य का काम है. यह धीमा काम है. इसमें त्वरित सनसनी नहीं, खोज का संतोष है. इसमें रचना की चमक नहीं, स्मृति की धूल है. और सच्चा लेखक वही है जो धूल से भी अर्थ निकाल सके.

हब्बा ख़ातून के गीतों की दार्शनिक गहराई इसी धूल में छिपी है. वे बताती हैं कि अनुपस्थिति भी उपस्थिति हो सकती है. प्रिय का न होना, प्रिय का होना समाप्त नहीं करता. कई बार अनुपस्थित प्रिय अधिक व्यापक हो जाता है. वह देह से निकलकर स्मृति, संगीत, भूगोल और लोक में फैल जाता है. यूसुफ शाह चक शायद व्यक्ति के रूप में चले गए, लेकिन हब्बा के गीतों में वे अनुपस्थित सत्ता, खोए हुए प्रेम और पराजित कश्मीर के रूप में लौटते रहे.

इस अर्थ में हब्बा का काव्य मृत्यु और अनुपस्थिति के विरुद्ध स्मृति की लड़ाई है.

उनकी आवाज़ पूछती है-

जिसे तुमने निर्वासित किया, क्या वह सचमुच चला गया? जिसे तुमने पराजित किया, क्या वह लोकगीत में नहीं बचेगा? जिस स्त्री को तुमने अकेला छोड़ा, क्या वह गीत बनकर तुम्हारे इतिहास से अधिक दीर्घायु नहीं होगी?

हब्बा का जवाब है-

हाँ, गीत सत्ता से लंबा जीता है. साम्राज्य समय की धारा में विगलित हो जाते हैं, लेकिन सियाह ज़ुल्फ़ों की सुंदरता और चैतन्य में बहती हुई प्रेम की तवील राताें की राहतों के स्वप्निल हुजूम सदैव जीवंत रहते हैं.

यही कारण है कि हब्बा ख़ातून आज भी जीवित हैं. यूसुफ़ शाह चक इतिहास की पुस्तकों में हैं, हब्बा लोक की साँस में हैं. सत्ता की हार-जीत बदलती रहती है, पर गीत यदि जनता के भीतर उतर जाए तो वह शताब्दियों तक रहता है. हब्बा की कविता हमें यह भी सिखाती है कि स्त्री की रचना को पढ़ने के लिए केवल साहित्यिक उपकरण पर्याप्त नहीं. हमें समाजशास्त्र चाहिए, इतिहास चाहिए, नारीवादी दृष्टि चाहिए, संगीत की समझ चाहिए, लोक-संस्कृति की विनम्रता चाहिए और प्रेम के सामने सिर झुकाने की क्षमता चाहिए. और चाहिए एक्रीतुर फ़ेमिनिन.

गीताश्री की पुस्तक इन सब दिशाओं को पाठक के लिए खोलती है. यही उसका बड़ा योगदान है. इस पुस्तक को पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि हिन्दी संसार को अपने दायरे से बाहर निकलना चाहिए. केवल हिन्दी पट्टी के अनुभव से भारतीय साहित्य नहीं बनेगा. कश्मीर की हब्बा, कर्नाटक की अक्कमहादेवी, तमिल की अंडाल, महाराष्ट्र की बहिनाबाई, पंजाब की अमृता, केरल की कमला दास की आत्म-स्वीकृति से जुड़ी आवाज़ें, पूर्वोत्तर की स्त्रियाँ—  इन सबको जोड़कर ही भारतीय स्त्री-साहित्य की पूर्ण छवि बनेगी. हब्बा ख़ातून इस पूर्ण छवि की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं.

वे प्रेम की कवयित्री हैं, लेकिन प्रेम में दार्शनिक हैं. वे विरह की कवयित्री हैं, लेकिन विरह में ऐतिहासिक हैं. वे लोक की कवयित्री हैं, लेकिन लोक में विश्व-साहित्य की ऊँचाई रखती हैं. वे स्त्री की कवयित्री हैं, लेकिन स्त्री में समूची मनुष्यता की पीड़ा सुनती हैं. गीताश्री ने इस हब्बा को हिन्दी में लाकर एक ज़रूरी काम किया है. यह पुस्तक हब्बा को हिन्दी पाठक के सामने रखती ही नहीं, हिन्दी पाठक की परीक्षा भी लेती है. क्या हम स्त्री की लोक-आवाज़ को गंभीरता से पढ़ने को तैयार हैं? क्या हम प्रेम को केवल रोमानी विषय न मानकर इतिहास और राजनीति से जोड़कर देखने को तैयार हैं? क्या हम कश्मीर को केवल समाचारों से नहीं, कविताओं से भी समझना चाहते हैं?

अगर हाँ, तो यह पुस्तक हमारे लिए ज़रूरी है. हब्बा ख़ातून की असली शक्ति यह है कि वे अतीत में रहकर भी वर्तमान को संबोधित करती हैं. वे आज की स्त्री से कहती हैं—अपना स्वर बचाओ. वे आज के लेखक से कहती हैं— लोक में जाओ. वे आज के इतिहासकार से कहती हैं— स्त्रियों की अनुपस्थिति पढ़ो. वे आज के पत्रकार से कहती हैं— कब्रों, गीतों और स्मृतियों से भी तथ्य निकलते हैं. वे आज के पाठक से कहती हैं—कविता को केवल शब्द मत समझो, यह किसी सभ्यता की बची हुई साँस भी हो सकती है.

गीताश्री की पुस्तक इसी बची हुई साँस को सुनने का आमंत्रण है. अंततः हब्बा ख़ातून को पढ़ना प्रेम के राजनीतिक अर्थ को समझना है. यह समझना है कि जब कोई स्त्री गाती है तो वह केवल मन बहलाने के लिए नहीं गाती. वह अपने समय की गवाही दे सकती है. वह अपने अपमान को संगीत बना सकती है. वह अपने अकेलेपन को लोक-स्मृति बना सकती है. वह अपने विरह को इतिहास से लंबा कर सकती है.

हब्बा ने यही किया. और गीताश्री ने उस हब्बा को खोजने की कोशिश की, जिसे हम बहुत बार सुनते थे, पर सचमुच जानते नहीं थे. हिन्दी में यह पुस्तक इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह हमें बताती है—भारतीय साहित्य की स्त्री-परंपरा अभी पूरी तरह लिखी नहीं गई है. बहुत-सी हब्बाएँ अभी खोजी जानी बाकी हैं. बहुत-सी ज़ूनियाँ अभी अपने नाम की प्रतीक्षा में हैं. बहुत-सी स्त्रियाँ लोकगीतों में जीवित हैं, पर आलोचना में अनुपस्थित. ‘हब्बा की खोज’ इस अनुपस्थिति के विरुद्ध एक सुंदर, गंभीर और पठनीय हस्तक्षेप है.

हब्बा ख़ातून को याद करते हुए आख़िर में यही कहा जा सकता है कि वे केवल कश्मीर की बुलबुल नहीं हैं. वे कश्मीर की घायल आत्मा की गायिका हैं. वे प्रेम की दार्शनिक हैं. वे स्त्री-अनुभव की आदिम साक्षी हैं. वे लोक-संगीत की वह लौ हैं जिसे इतिहास की आँधियाँ बुझा नहीं सकीं. और गीताश्री की पुस्तक उस लौ के पास बैठकर लिखा गया एक दीर्घ, संवेदनशील, खोजी और ज़रूरी पाठ है—ऐसा पाठ जिसकी हिन्दी में बहुत प्रतीक्षा थी.

 

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भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, कुछ इस तरह आना,’ शूद्र: एक लंबी कविता,’ और राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .’ त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं.

thetribhuvan@gmail.com

Tags: 20262026 आलेखगीताश्रीत्रिभुवनहब्बा ख़ातून
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Comments 8

  1. पवन करण says:
    6 days ago

    भारतीय उपमहाद्वीप की बात करें तो इसमें ऐसी असंख्य सचेतन स्त्रियां आ मिलती हैं, जो एक विराट् यथार्थ बुनती हैं. एक आत्मा को निर्वस्त्र देखती है तो दूसरी आत्मा को घायल और बिंधा हुआ पाती है.

    भारतीय समाज का स्त्री इतिहास बताता है कि उसके भीतर एक ‘अजनबीपन’ और ‘बहिष्करण’ के विचारों की एक शृंखला है.

    स्त्री को अपने शरीर से लिखना चाहिए, क्योंकि सदियों तक स्त्री के शरीर पर पुरुषों ने लिखा, अब स्त्री स्वयं अपने शरीर, मन और अनुभव की भाषा लिखे.

    स्त्री के लिए इतिहास का तो हर लम्हा ही ज़ुल्मतों की कहानी है. चारों तरफ एक धुंध है.

    स्त्री केवल इतिहास की पात्र नहीं, इतिहास की रचयिता भी है.

    हब्बा ख़ातून की कविता में स्त्रीवाद आधुनिक नारे की तरह नहीं आता. वह अनुभव की तरह आता है. वे घोषणा नहीं करतीं कि मैं स्त्री हूँ और मुझे अधिकार चाहिए. वे गाती हैं और गीत ही अधिकार बन जाता है. वे रोती हैं और रुलाई प्रतिरोध बन जाती है. वे प्रेम करती हैं और प्रेम पितृसत्ता के विरुद्ध स्त्री का आत्म-साक्ष्य बन जाता है.

    आधुनिक स्त्रीवाद कई बार भाषा में बहुत स्पष्ट होता है, लेकिन अनुभव में कम. हब्बा का स्त्रीवाद अनुभव में स्पष्ट है,

    विस्तार की सीमा का अतिक्रमण करता…..धरोहर लेख।

    Reply
  2. अणु शक्ति सिंह says:
    6 days ago

    जिस गहनता से किताब लिखी गई है, पढ़ा भी उसी तरह गया है। गीता श्री की पत्रकारिता और साहित्यिक समझ का सुंदर तत्व है यह किताब। उन्होंने हब्बा को जिस तरह खोजा है, ठीक उसी तरह त्रिभुवन सर ने उनके लिखे की पड़ताल की है। अच्छी किताब को इस तरह पहचाना जाना सुखद है।

    Reply
  3. सीमांत सोहल says:
    6 days ago

    बहुत अच्छा, बहुत गहरा और बहुत अन्वेषण लिए हुए आपने लिखा । मैं आपका मुरीद हुआ त्रिभुवन भाई ।🙏

    Reply
  4. Rajaram Bhadu says:
    5 days ago

    गीता श्री और त्रिभुवन अलहदा किस्म के पत्रकार हैं और साहित्य में दोनों की अपनी तरह की सक्रियता है। इस किताब के बहाने त्रिभुवन दक्षिण एशिया के प्रमुख स्त्री- स्वरों में अन्तर्सूत्रता स्थापित करने की कोशिश करते हैं। साथ ही उन्हें ऐतिहासिक क्रम की अनवरता में देखते हैं। इस तरह लेख समीक्षा से आगे स्वायत्तता अख्तियार कर लेता है।

    समालोचन ऐसी दुर्लभ जगहों में से है जहां सांस्कृतिक अध्ययनों से साक्षात्कार संभव होता है।

    Reply
  5. राजेंद्र जोशी says:
    5 days ago

    क्या हर बड़ी रचना एक ही आलोचनात्मक दृष्टि में समा सकती है?

    त्रिभुवन की समीक्षा पढ़ते हुए स्पष्ट होता है कि यह किसी औपचारिक पुस्तक-परिचय का लेख नहीं, बल्कि हब्बा खातून के साथ एक गंभीर बौद्धिक मुठभेड़ है। उपन्यास के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैचारिक आयामों को समझने का उनका श्रम निर्विवाद है। इसलिए यह समीक्षा सहमति जितनी ही संवाद की भी अधिकारी है।

    यहीं से कुछ प्रश्न जन्म लेते हैं।

    बड़ी रचनाओं की प्रकृति ही ऐसी होती है कि वे अपने अर्थों को किसी एक पाठ में समाप्त नहीं होने देतीं। वे प्रत्येक गंभीर पाठक से एक नया संवाद रचती हैं। इसलिए किसी भी आलोचनात्मक लेख की शक्ति उसके अंतिम निष्कर्षों में नहीं, बल्कि उन संभावनाओं में निहित होती है जिन्हें वह पाठक के सामने खोलता है।

    त्रिभुवन का विवेचन गहरी वैचारिक सजगता से संपन्न है। फिर भी कहीं-कहीं यह आभास होता है कि आलोचक की दृष्टि पाठ के साथ चलने के बजाय उससे थोड़ा आगे निकल जाती है। तब उपन्यास का सौंदर्यशास्त्र, उसकी भाषिक संरचना और उसकी कलात्मक अनिश्चितता अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। प्रश्न वैचारिकता का नहीं, उसके अनुपात का है—क्या दृष्टि रचना से विकसित होती है, या रचना को अपने पूर्वनिर्धारित प्रतिमानों में व्यवस्थित करने लगती है?

    हब्बा खातून इतिहास का पुनर्लेखन भर नहीं है। वह इतिहास, स्मृति, लोक, मिथक और स्त्री-अनुभव के बीच निर्मित एक बहुस्तरीय कलात्मक संसार है। उसकी शक्ति किसी एक विमर्श में नहीं, बल्कि इन सभी के बीच बने रहने वाले तनाव में निहित है।

    गीतां श्री की भाषा इस उपन्यास की केंद्रीय उपलब्धियों में है। वह सूचना नहीं देती, अनुभव रचती है; सीधी नहीं चलती, स्मृति की तरह लौटती, ठहरती और खुलती है। यहाँ भाषा विचार की वाहक मात्र नहीं, स्वयं विचार का सृजन करती है। इस पक्ष पर यदि कुछ और ठहरकर विचार होता, तो उपन्यास की रचनात्मकता अधिक स्पष्ट होकर सामने आती।

    इतिहास का व्यवहार भी उल्लेखनीय है। यहाँ तथ्य और कल्पना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक साझा संवेदनात्मक सत्य के सहनिर्माता हैं। इसी प्रकार हब्बा खातून भी केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं रह जातीं; वे विरह, स्मृति, भाषा और सांस्कृतिक असुरक्षा का जीवंत रूपक बन जाती हैं। इस रूपक को केवल वैचारिक धरातल पर नहीं, उसकी काव्यात्मक संरचना में भी पढ़े जाने की आवश्यकता है।

    अंततः प्रश्न उपन्यास का नहीं, आलोचना के स्वभाव का है। क्या उसका दायित्व अर्थ को निश्चित करना है, या उसके लिए नए द्वार खोलना? श्रेष्ठ आलोचना निर्णय सुनाने से अधिक पाठक की दृष्टि का विस्तार करती है। वह अंतिम शब्द नहीं कहती; अगले पाठ की संभावना बचाकर रखती है।

    त्रिभुवन की समीक्षा का महत्त्व इसी में है कि वह बहस की शुरुआत करती है। यदि कहीं उसका सीमांत दिखाई देता है, तो केवल इस अर्थ में कि वह रचना की बहुध्वन्यता की अपेक्षा अपने निष्कर्षों पर कुछ अधिक विश्वास करती प्रतीत होती है। संभव है दूसरा पाठक उसी उपन्यास से भिन्न अर्थ ग्रहण करे; यही किसी बड़ी कृति का स्वाभाविक सौभाग्य है।

    साहित्य का सत्य कभी किसी एक व्याख्या में समाप्त नहीं होता। उसका एक अंश हमेशा पाठ के बाहर नहीं, बल्कि पाठक के भीतर बचा रहता है। शायद इसी कारण बड़ी रचनाएँ बार-बार पढ़ी जाती हैं और गंभीर आलोचनाएँ भी बार-बार पुनर्पाठ की माँग करती हैं।

    Reply
  6. VED PRAKASH says:
    5 days ago

    हब्बा खातून की खोज की समीक्षा प्रेरित करती है मूल रूप में पढ़ने के लिए समीक्षक को धन्यवाद एवं साधूवाद

    Reply
  7. पयोद जोशी says:
    5 days ago

    यह पुस्तक समीक्षा से बहुत आगे जाकर भूगोल, राजनीति और इतिहास पर भी स्त्री विमर्श के बरक्स एक गंभीर टिप्पणी और प्रश्न करता आलेख है । शुक्रिया आदरणीय त्रिभुवन जी।

    Reply
  8. Sapna Saini says:
    5 days ago

    हब्बा खातून जिसे इतिहास,भूगोल, ‌राजनीति ने ओझल कर दिया, गीताश्री मैम ने उसे फिर अपने कड़े परिश्रम और खोज से नये रूप में पुनर्स्थापित कर स्त्री संघर्ष को नये आयाम दिए हैं। इस पुस्तक को जितनी बार पढ़ा जाएं उतनी बार हब्बा नये रूप में सामने आती है। त्रिभुवन सर का आलेख इस पुस्तक पर गहराई से किया गया अन्वेषण है। गीताश्री मैम को दिल की गहराइयों से शुक्रिया की उन्होंने ‘कश्मीर की बुलबुल’ हब्बा खातून को आधुनिक स्त्रीवाद के परिप्रेक्ष्य में विवेचित किया है। 🙏🙏🙏।

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