| हिज़्र की रात और[1]... ओमा शर्मा |
पिछले शुक्रवार मेरे साथ एक वाकया हुआ:
मैं राजधानी एक्सप्रेस में दिल्ली से मुम्बई की यात्रा पर था. यह गाड़ी स्टेशन से अपने निर्धारित समय पर रवाना हुई. मेरी लोअर बर्थ थी. कोच ए-2 में नौ नंबर. मैं अपनी सीट पर समय से पहले चुपचाप जा बैठा. इन्हीं अंतरालों में सह-यात्रियों की आवा-जाही, भागमभाग, साजो-सामान का वैचित्र्य और अलविदा के जो विविध दृश्य बनते हैं, उन्हें देखना मुझे दिलकश लगता है. मेरे पास कोई सामान नहीं था, सिवाय एक बैग के जिसमें मेरी दो-तीन किताबें और कुछ ऐसा-वैसा सामान जो हमेशा रहता है… घर की चाबियों के एक्सट्रा सेट, आई-ड्रॉप्स, पैन, नेलकटर, सेनेटाइजर, चश्मा और कुछ रूपए. नीचे वाली दोनों सीटों के नीचे सामने वाली सीट के एक बुजुर्ग दिखते यात्री ने पहले से ही सामान से भरी पाँच-सात बोरियाँ पसरा दीं थीं जिससे दूसरों को अपने-अपने सामान रखने में परेशानी होती जाती थी. बातचीत में पता चला कि बोरियों में जिप-चेन हैं जो खेलकूद के कपड़ों के लिए उपयोग होती है. वापी में ये उतार दी जाएंगी जिसके लिए उसने हमारे सामने ही किसी से बात कर ली थी.
वापी स्टेशन अगले दिन सुबह साढ़े सात बजे आना था. सामने एक युवक था, घोट-मोट ओर आत्मलीन, जिसने कानों में ईयर-प्लग चढ़ा रखे थे और वह निरंतर किसी न किसी से मराठी में बेधड़क बातें किए जाता था. मैंने अपनी किताब खोल ली और घीमे-धीमे पढ़ने लगा. पानी की बोतल पहले ही मिल गई थी. बाद में चाय-नाश्ता भी आ गया. मैंने अपनी टिकट में इस बार खाने का विकल्प नहीं रखा था क्योंकि राजधानी का खाना भारी हो जाता है. घर से खाकर चला था. अमूमन थोड़ा कुछ अपना लेकर चलता हूँ जो न भी हो तो थोड़े भुने हुए चने, कोई फ़ल या एकाध कुकीज़ से मेरा काम हो जाता है. लेकिन आज हड़बड़ी में वह सब रह गया. मैंने सोचा अगले स्टॉप यानी मथुरा पर ले लुंगा .
मथुरा स्टेशन कोई सात बजे आया. केबिन के अन्दर हल्का अंधेरा हो आया था. मैंने अपने मोबाइल-पर्स उठाए और नीचे रखे जूतों में पांव डालकर कोच के बाहर आ गया. दरवाजे के पास ही एक टी-स्टाल थी जहाँ मेरे काम की दोनों चीजें थीं. मैं उन्हें लेकर ट्रेन की तरफ मुड़ा ही होऊंगा कि… वह पल आ गया जो अभी तक अकल्पित था.
यानी ट्रेन चल निकली. लेकिन यह कोई बड़ी बात नहीं. शुरू में ट्रेन धीमे ही चलती है. लेकिन यह क्या? उसके दरवाजे लॉक भी हो गए! न सिर्फ मेरे वाले कोच के बल्कि पूरी ट्रेन का कोई ऐसा कोच नहीं जहाँ दरवाजे उसी तरह लॉक न हो चुके हों! अपनी लाचारी-मजबूरी में मैंने एक-दो दरवाजों को भागते हुए खींचा-खटखटाया भी… कि कुछ हो जाए. मगर सब व्यर्थ.
राजधानी या कुछ दूसरी गाडि़यों में चलते ही दरवाज लॉक हो जाने की सुविधा(?) संभवत: पिछले दिनों ही शुरू की गई है जिनका मुझे पता नहीं था . शायद बहुतों का न हो.
क्या ऐसा भी हो सकता है? इतने बरसों से पसंद से रेल यात्राएं करता रहा हूं और आज अभी-अभी ये! मेरी ऊपर की साँस ऊपर और नीचे की नीचे रह गई. क्या करूं? मुझे अपने घर जाना है. वहाँ बच्चे और पत्नी इन्तजार करते होंगे. अलावा इसके ट्रेन के अन्दर मेरा बैग है. उसमें ज्यादा कुछ नहीं तो दो-तीन जरूरी किताबें हैं. क्या एक मामूली लापरवाही की इतनी बड़ी सजा.
क्या करूं ?
मुझे परेशान होते स्टेशन के कई लोगों ने देखा. कई लोगों ने तरस खाया. कुछ हैरान भी हुए और कुछ को कुछ नहीं हुआ. लेकिन थर्मस में एक चाय बेचता लड़का था जिसने खड़े-खड़े रास्ता सुझाया .
“कहाँ जाना था?”
“मुंबई.”
“उधर चार नम्बर प्लेटफॉर्म पर पश्चिम एक्सप्रेस आने वाली है. वह भी मुम्बई जाएगी. जल्दी से वहीं चले जाओ. अभी मिल जाएगी.”
उसके लफ़्ज़ और लहजा ईमान से भरे थे.
“और हाँ, फौरन 139 पर फोन कर दो. वो कुछ मांगेंगे, पीएनआर बगैरा. जो भी सामान छूटा है, बता देना. मिल जाएगा. अब जल्दी से चार नम्बर पर चले जाओ.”
कैसा रहमदिल, मददगार इंसान था जो उस बदहवास अंधड़ के बीच सारे रास्ते और उम्मीदें खोल दे रहा था! अभी छूट चुकी मेरी ट्रेन प्लेटफॉर्म संख्या तीन पर थी. चार नम्बर उसके सामने ही था. वह प्लेटफॉर्म जरा छोटा था क्योंकि ट्रैक के उस ओर सपाट जमीन थी. प्लेटफॉर्म दस कदम बाद शुरू हो रहा था. खाली ट्रैक को देखकर मैं नीचे उतरा और लपककर प्लेटफॉर्म पर चलने लगा जो आती हुई पश्चिम एक्सप्रेस के प्रतीक्षारत यात्रियों से अटा पड़ा था. मैंने एसी कोचों के बारे में पूछा जो पीछे की तरफ बताए गए. मैं बढ़ता चला ही जा रहा था कि वहीं एक अधिकारी का केबिन खुला मिल गया जिसमें एक कर्मचारी कुछ हिसाब-किताब करने में जुटा हुआ था. मैंने उसे खट से टोककर अपनी परेशानी बतायी तो उसने भी 139 पर सम्पर्क करने की बात कही. यानी उस चाय वाले लड़के ने सही कहा था. मैंने उससे एक कागज मांगा और कुर्सी पर बैठकर अपने मोबाइल में रखी ई-टिकट से वे सब जानकारियां उतारने लगा जो 139 पर मांगी जा सकती थीं.
मुझे पता था कि यदि बात हुई तो मोबाइल पर बात करते हुए मैं उन्हें मोबाइल से लोकेट करने में समय जाया करूंगा. मैं जैसे ही बाहर निकला ट्रेन प्लेटफॉर्म पर अपनी धीमी रफतार से आती दिखी. मधुरा छोटा स्टेशन है. राजधानी की तरह यह भी बहुत देर तो न रुकती होगी. भीड़ के जमघट के बीच तेज कदम धरते हुए मैं एसी डिब्बों की तलाश में सांस रोके बढ़े जा रहा था. कितने सारे तो स्लीपर डिब्बे थे. मैंने सोचा सेकेंड एसी में घुसुंगा क्योंकि थर्ड एसी ज्यादा भरा-भरा होता है. सेकन्ड एसी में गुंजाइश रहेगी. वहाँ शायद बात बन जाए. लेकिन जब चार-पांच डिब्बे थर्ड एसी के निकल गए तो मुझे डर लगने लगा कहीं ट्रेन चल न दे. संयोग से उसके अगले ही डिब्बे के सामने एक टीटी साहब अपना परिचित काला कोट चढ़ाए खड़े मिल गए. मैंने यथासम्भव धैर्य से उन्हें अपनी परेशानी बताई, राजधानी एक्सप्रेस का वह टिकट भी सबूतन दिखाया जिसमें आज की तारीख, कोच-सीट संख्या सभी थे.
“छूट कैसे गई?”
(ऐसी कैफियत में भी जनाब को कहानी सुननी थी!)
“मैं जरा कुछ लेने उतरा था.”
“राजधानी में तो वैसे ही सब मिलता है.”
“जी, वो तो है. आप कोई बर्थ हो सके तो देखें… जो भी…”
मैं अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही उन्होंने मना कर दिया.
“पूरी गाड़ी पैक्ड हैं. अभी आरएसी क्लीयर नहीं हुआ है. कोई सीट है ही नहीं.”
उसने पूरी बेरुखी से मुझे चलता कर दिया. कुछ और लोग भी उसके चारो तरफ मंडरा रहे थे. उन्हें भी इसका वही सपाट जवाब था. संयोग से, कोच के अगले छोर पर दरवाजे के बाहर वर्दी चढ़ाए एक व्यक्ति खड़ा था. मैंने उससे पूछा तो बताया कि वह इस डिब्बे का अटेडेंट है. मैंने उसे अपना नाम बताया और साथ में परेशानी भी. फटाफट टिकट भी दिखा डाला.
“आप अंदर चलिए, ट्रेन चलने वाली है.”
“सीट तो मिल जाएगी?”
मैं अनिश्चिय से भरा था इसीलिए उसका धधका बना हुआ था.
“अरे महाराज, आप अंदर तो चलिए. अंदर चलकर कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा.”
अभी तक मेरी सांस अटकी हुई थी. भले हुआ कुछ न हो लेकिन बैठे-ठाले की एक परेशानी तो गले आ ही पड़ी थी. एक ख्याल वापस दिल्ली लौटते का भी आया था जो टैक्सी के रास्ते तीन घंटे का होता. लेकिन उसके साथ एक धुंधली शर्मिन्दगी जुड़ी थी: क्या कहूंगा घर जाकर कि मुझसे ट्रेन क्यों छूट गई?
लेकिन जब एक इंसान, एक ट्रेन अटेंडेंट ने, टीटी की दिलतोड़ ना के बाद भरोसा दिलाया तो जैसे मेरी जान में जान आयी. गनीमत थी कि मेरा पर्स साथ था जिसमें मेरे जाने तीन-चार हजार रूपए तो थे. आड़े वक्त की किसी टिकट-पेनेल्टी या व्यावहारिक इनाम-इकराम के लिए मैं तैयार था.
जैसी ही ट्रेन चली, अटेंडेंट ने कोच के बाहर अपनी नियत सीट के नीचे की जगह- जो किसी अंडरग्राउंड सीट का भरम देती थी- बैठने को दे दी. वहाँ पर किसी पीढ़े पर बैठने की तरह आराम से बैठा जा सकता था. नीचे खूब सारे एक्स्ट्रा तकिए-बिछोने वहाँ गर्दिश करते पड़े थे. दो-तीन और लोग वहीं मुझसे सटकर बैठे थे. कुछ देर अटेंडेंट ने अपना जरूरी काम किया होगा. लेकिन आधा घंटे में वह आ गया और छूटते ही मिठास से फिर आश्वस्त करने लगा कि ‘आपको मुम्बई लेकर ही जाएंगे’. इस दरम्यान, मुझे लगातार किसी टीटी के आने की आशंका सता रही थी क्योंकि भले मेरे पास किसी प्रीमियम ट्रेन का टिकट हो लेकिन फिलहाल मैं जिसपर सवार था, उसका तो सामान्य टिकिट भी नहीं था.
2.
इस तरह नीचे सटकर, घिचपिच बैठे यात्रा करने ने अरसा पहले की मेरी स्मृति जगा दी. एक दौर था लड़कपन का जब साधारण दर्जें में ही रेल यात्रा की जाती थी – खुर्जा से दिल्ली की. पता नहीं कौन सी ट्रेन हुआ करती थी लेकिन सब उसे पैसेंजर ही कहते. हम सोचते सब ट्रेनें ऐसी ही होती हैं! हर स्टेशन पर उसे रुकना होता: वैर, चोला, सिकंदरपुर, दनकोर, दादरी … और पूरी भीड़ के बीच हर स्टेशन पर कुछ न कुछ नई सवारियां उसमें और आ घुसतीं. टीक या शीशम की बड़ी पुख्ता पट्टीदार बर्थ होतीं. दरवाजे तक ट्रेन ठसाठस भरी रहती, कुछ जांबाज तो पायदान पर सहारे से लटके रहते. बैठने की जगह के बारे में सोचना फिजूल था लेकिन बैठना होता तो हम ऊपरवाली बर्थ पर जा चढ़ते जहाँ भीड़ के धक्कों से तो राहत रहती मगर हवा भरपूर न मिलने कारण दूसरी तरह से जी घुटता. लेकिन उसमें घबराने का सवाल ही नहीं था.
गर्मी, पसीना और धक्का-मुक्की जीवन के संगी-साथी थे. थोड़ी देर में कोई आंखों की बीनाई में इजाफ़ा करने का सुरमा बेचने आ जाता. नमूने के तौर वह लोगों की आंखों में दो बूंदें डालता. लगता, तेजाब डाल दिया हो! वे बिलबिला उठते, पीड़ा से आंखें मिच जातीं. जल्द ही जब उनकी आंखों से पानी रिसने लगता तो वह विजयी भाव से सबको बताता कि इस पानी के निकलने का मतलब ही है कि आँखें कमजोर हैं. लेकिन कोई बात नहीं. इस सुरमे का दो महीने सेवन करें. केवल दो महीने. आपकी आंखें बिल्कुल ठीक हो जाएंगी. जैसे हजारों की हो भी गई हैं. जिन भाइयों के चश्मा लगा है, इस दवा से शर्तिया उतर जाएगा. एक शीशी का मूल्य केवल दो रूपया. दो रूपया, दो रूपया, दो रूपया. मगर रूकिए. कंपनी ने परचार के लिए अपने मुल्क के गरीबों की आंखों की कमजोरी को देखते हुए अब दो रुपए में एक नहीं, दो शीशियां…बहन लेले, भाई लेले, बच्चा लेले, जवान लेले, सभी को दो रूपए में दो शीशियाँ और लो जी! आपकी आंखों की रोशनी सलामत! किसी डॉक्टर के पास जाने का झंझट नहीं. इममें सोचना नहीं. पैसा हाथों का मैल. एक बार आंखों की रोशनी चली जाए, आप सूरदास बन जाओ, तो जिन्दगी भर पछताओ…
उसकी बातें भीतर कहीं सिहरा देतीं. गांव-देहात में न जाने कितने लोग थे जिनकी आंखें कुछ नहीं तो कुपोषण से खराब रहतीं. चेचक के कारण कितनों को बचपन से ही आधा-अधूरा दिखता. क्या पता शीशी काम कर जाए. थोड़ा भी फायदा हुआ तो जाएंगे तो दो रूपए ही l मगर दो रूपए कोई छोटी रकम थी? खुर्जा से दिल्ली का पैसेंजर का किराया डेढ़ रूपए था.
जाने देते हैं.
जो ईश्वर करे.
उसके बाद कोई नामर्दी की दवा बेचने आता. उमकी कहानी उस कच्ची उम्र में भी रोचक लगती… औरत खुश नहीं रहती है, बात-बेबात चिड़चिड़ाती है, जब-तब मायके जाने की जिद करती है… क्यों? आदमी … आदमी खेत-क्यार में काम करके थक जाता है, बच्चों से परेशान रहता है, खेत को पाला मार जाता है, फसल को नीलगाय रौंद देती है, साहूकार तगादा करता है और उधर… बीबी के ताने पर ताने. हमारे पास आयुर्वेद की गोलियां हैं. खानदानी काम है. एक गोली सोने से एक घंटा पहले गुनगुने पानी से पंद्रह दिन. जी हाँ, महीना नहीं, केवल पंद्रह दिन लेनी है. फिर आप देखिए आपके घर में कैसी रोनकें आ जाएगी. बीबी राखी बांधने पीहर अकेली नहीं जाएगी. दो रूपए में एक शीशी. एक शीशी में तीस गोली. असर न आए तो हम इसी ट्रेन में रोज चलते हैं. दादा-परदादा के टैम से चलते हैं, जब चाहो आकर पकड़ लेना और काम की लगे तो दुआ देना. हमें आपके पैसे से ज्यादा दुआओं की जरूरत है…
फिर कोई पकोड़े या नमकीन वाला आ जाता जिसके लालच से उस कच्ची उम्र में बचना ज्यादा चुनौतिपूर्ण होता. घर से आठ बजे कलेवा-सा कुछ लिया होगा, पहले बस ने छकाया फिर ये पैसेंजर ही तीन घंटे इन्तजार के बाद आयी. इस दौरान टोंटी से पानी जरूर एक-दो बार गटका होगा मगर खाने की तो सोची ही नहीं गई. और फिर यहाँ तो बात स्वाद की भी थी जिसे भूख हवा देने लगी थी.
3.
वक्त जाया न करते हुए मैंने वहीं, अटेंडेंट की सीट के नीचे बैठकर रेलवे की आपातकालीन सुविधा के नंबर 139 पर, दो-चार आजमाइशों के बाद अंततः एक सचमुच के व्यक्ति से बात कर ली. ट्रेन में बैग छूटने की बात बताई. पीएनआर के साथ कोच-सीट संख्या बता दिए. मैंने उन्हें यह भी बता दिया कि मैं राजधानी के पीछे ही मुंबई जाने वाली पश्चिम एक्सप्रेस में सवार हो गया हूं. आप मेरा बैग किसी तरह रिकवर करा दें, उसे मुबंई सेन्ट्रल स्टेशन के क्लॉक-रूम में जमा करा दें जहाँ से मैं कल ही उसे हस्तगत कर लूंगा. उस व्यक्ति ने ज्यादा न सुनते हुए यही कहा कि पहले बैग के बारे में पता कर लेते हैं फिर देखेंगे कि क्या किया जा सकता है. मैंने इधर पानी की बोतल से दो-चार घूंट भरे और अपने साथ होते औचक आ टपके घमासान के बारे में सोचने लगा. रात आठ बजे की हवाई यात्रा की टिकट भी मिल रही थी लेकिन मैंने उसे जाने दिया था. मुंबई रात ग्यारह बजे घर पहुंचकर सोउंगा ही और उधर सुबह तो ट्रेन पहुंचा ही देती है. जैसे घर सोना वैसे ट्रेन में, तो फिर हवाई यात्रा का झंझट क्यों ? दिल्ली में दो घंटे का मार्जिन तो ट्रैफिक-रास्ते के लिए रखना पड़ता है. शुक्र रहा कि पीछे आती ये ट्रेन तुरंत मिल गई . पता नहीं क्या होगा ?
मैं यह सब सोच रहा था कि एक अनजान नम्बर से कॉल आ गई. बाहर की खड़खड़ाहट से बचकर इत्मीनान से बात करने के लिहाज से मैं कोच के अन्दर चला गया और एक सीट पर टिकने लायक जगह देखकर बतियाने लगा. इस बार कॉल मेरी छूटी ट्रेन के ए-2 कोच के टीटी साहब का था. उन्होंने बैग की जानकारी ली. उसका रंग-प्रकार आदि. सामान क्या है ? पैसे ? मैंने जो बताया तो पक्का हो गया. बैग को खंगालने के बाद उन्होंने बताया कि पैसे तीन हजार नहीं, उनतीस सौ हैं . मैंने सबके साथ सहमति दिखाई और कोच से वापस बाहर आ गया.
तभी वहाँ काला कोट चढ़ाए युवतर दिखता एक टीटी सामने से आया. मैंने उसे अपनी परेशानी बताई. राजधानी का टिकट उसे भी दिखाया. छूटे हुए सामान की बाबत 139 पर चल रही शिकायत का जिक्र किया.
“लेकिन इस ट्रेन का तो टिकट नहीं है ना?”
इस कोट के काले रंग में बेरुखी मीजान से ज्यादा घुली होती है शायद.
“जी, इस ट्रेन का तो नहीं है. वह ट्रेन जैसे ही छूटी, यह वाली उसके पीछे आती दिखी तो इसमें चढ़ गया. अब आप जो समझें.”
“पेनल्टी लगेगी.”
“जी.”
कहकर उसने अपनी रसीद बुक निकाल ली.
मैं सामने था. मैंने अपना पर्स निकाल लिया.
जो नियम-कानून है उसे तो मानना पड़ेगा.
मैंने अपने जीवन में अपने प्रतिपक्षियों पर बहुत कम जीतें हासिल की होंगी. याद भी नहीं. मौका भी नहीं आता है.
और यहाँ एक कमाल हुआ चाह रहा था.
मेरा पर्स और उसकी रसीद बुक खुले के खुले रहे गए जब उसने कहा:
“आप सेकेंड एसी में हमारे बड़े टीटी साहब से मिल लो ना. वहाँ कोई सीट मिल जाएगी.”
“उनसे तो मैं मथुरा में, ट्रेन के बाहर मिला था. कोई सीट की संभावना से उन्होंने मना किया था.”
“अरे आप जाइए तो सही, वे कुछ रास्ता निकालेंगे.”
उन्होंने भलमनसाहत से ही कहा था. मगर मेरा मन नहीं था. चिरौरी करना, मिन्नतें करना मेरा मिज़ाज नहीं है. सीट खाली है और दे सकते हो तो दे दो. जो पेनल्टी लगे, लगा लो. वर्ना मैं अटेंडेंट की सीट के नीचे किसी तरह वक्त गुजार लूंगा. एक रात की तो बात है. लेकिन अटेंडेंट ने ही कहा कि दूसरे वाले टीटी सीनियर हैं. वे कुछ कर सकते हैं इसलिए अच्छा रहे मैं उनसे मिल लूं. मुझे तीन या चार कोच का अड़चन भरा रास्ता नीम-अंधेरे तय करना पड़ा जब वे महाशय मिले. उन्होंने बताया कि फिलहाल तो बर्थ नहीं है लेकिन सवाई माधोपुर या कोटा जंक्शन पर गुंजाइश हो सकती है. तब तक मैं जैसे-तैसे इन्तजार कर लूं.
वापस आकर जब मैंने ओंकारनाथ तिवारी यानी अपने कोच अटेंडेंट को यह बात बताई तो वह तमतमाया, “उसकी मां का…” उसने तबियत से टीटी के लिए गाली निकाली और निजी जिम्मेवारी लेते हुए आश्वस्त किया कि “शर्माजी, मैं ब्राह्मण का बेटा हूँ. परशुराम का वंशज… एक शरीफ ब्राह्मण इतना परेशान है, और उसे एक सीट न मिले? कोई बात नहीं. आपको सीट मैं दूंगा. मैं ब्राह्मण…” कहकर उसने अपनी मूँछों पर ताव दिया जो वैसे की सामान्य से अधिक दमदार और तनी-ठनी थीं. उसकी बताई अपनी इस जातिगत प्रतिष्ठा के बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं होगा लेकिन ओंकार था कि अपने जाति-वंश के दंभ से हर दो मिनट में कुछ बल्लियां चढ़ जाता. अपने जातिगत बिरादरेपन के आवेश में जल्द ही उसने मेरे समक्ष अपनी राजनैतिक पक्षधरता की भी उड़ान भरनी शुरू कर दी…” ये दो दोनों गुजराती साले, रंगा-बिल्ला, ये देश चलाएंगे … गुजराती आदमी को एक ही चीज आती है, धंधा करना… तो ये देश के साथ धंधा कर रहे हैं. रोज कुछ नया बेच दे रहे हैं…”
मुझे लगा यह मजदूर वर्ग से आता है, बहुत संभव है वाम धारा के नज़दीक हो. लेकिन उसने मुझे फिर से चौंकाने में देर नहीं की. “नेता तो एक ही है: योगीजी. उसे शासन करना, चलाना आता है… आपने कभी सुना कि उसका किसी बड़े कारोबारी के साथ कोई सम्बंध है? क्योंकि है ही नहीं. वो एक पैसा नहीं खाता है- बोलो क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण है न! दोनों गुज्जू भाई उसे हटाने में लगे रहते हैं लेकिन आज तक उसका बाल-बांका नहीं कर पाए. क्यों? ब्राह्मण… ब्राह्मण सच्चे देशभक्त होते हैं…”
उसके उद्गार में आह, क्या आत्मलिप्त लज़्ज़त थी!
उसकी ब्राह्मण-गाथा अथाह और अपरंपार थी.
मैं असमंजस में था. इमकी राजनीतिक उग्रता का क्या करूं ? इसने मुझे मदद करने का वादा किया है- टीटियों के सहयोग के बगैर. पता नहीं कैसे होगा? लेकिन कहावत है ना कि जिसकी थाली खो जाती है वह उसे सुराही में भी उसे ढूँढने की उम्मीद रखता है. हाँ, उसकी नियत सीट कम से कम ट्रेन में बैठे रहने का आधार तो बनी ही हुई थी और ट्रेन निरंतर गंतव्य की तरफ चल रही थी. दोनों गुजरातियों की उसकी राय को मूक समर्थन देने में कोई हर्ज़ नहीं था लेकिन योगी कौन सा उनसे अलग था? बुल्डोजर न्याय, एनकाउंटर और भी बहुत कुछ. लेकिन मैंने कोई प्रतिवाद नहीं किया … जब तक कि उसने योगी-चालीसा का एक और दौर नहीं शुरू कर दिया.
“योगी में सब डरते हैं.” उसने सगर्व जड़ा.
“डर या डराकर रखना तो किसी की लियाकत नहीं ओंकार भाई.”
“उसने सारे गुंडों का सफाया कर दिया.”
“कर दिया क्योंकि वह खुद एक गुंडा रहा है.”
मैंने जैसे अपनी यात्रा-सीट दांव पर लगा दी!
ओंकार की हवाइयाँ उड़ गईं.
ये किस किस्म का ब्राह्मण हुआ जो योगीजी, हमारे योगीजी के बारे में ऐसा सोचता है!
“अरे सरजी… ओम शिव शिव…आपको किसी ने गलत सूचना दी है. हो ही नहीं सकता.”
औचक ही मानो उसका पांव गर्म तवे पर पड़ गया हो.
बिरादरेपन से उसने मेरे किए अपराध की अपने ईश्वर से माफी मांगी.
“नहीं भाई, पुलिस के रिकार्ड में उसके खिलाफ केस दर्ज रहे हैं.”
अपनी जरूरत को परे हटाकर मानो मैं अपने त्राता को त्रस्त करने लगा.
“सब झुट्ठे केस होंगे… आपको भी किसी ने बहकाया होगा… योगीजी ऐसा कर ही नहीं सकते… हम लोग परशुराम के वंशज हैं…”
तभी मेरा फोन एक बार फिर बज उठा. फिर एक बार अनजान नम्बर था. मैंने उठाया तो उधर से बताया गया कि मेरा बैग सवाई माधोपुर स्टेशन के रेलवे थाने में रखवा दिया जाएगा जहाँ से मैं उसे ले सकता हूं .
“सुनिए.” मैंने पूरा ठहरकर बात शुरू की. “मेरी आज एक ट्रेन मिस हो गई है, दूसरी किसी तरह मिली है. मैं किसी रेलवे थाने नहीं जा सकूंगा.”
“लेकिन साब, जब्त समान की वापसी की कार्यवाही तो करनी पड़ती है. रेलवे के नियम है. उसके बगैर कैसे देंगे?”
“कोई बात नहीं, मत दीजिए. बैग अपने पास रखिए या फैंक दीजिए. पश्चिम एक्सप्रैस सवाई माधोपुर दो मिनट ही रूकती है. बैग लेने मैं थाने-वाने गया तो ये भी छूट जाएगी.. आप किसी को मेरे कोच, अभी मैं बी-6 में बैठा हूं, के सामने बैग के साथ भेज दीजिए, वरना रखे रहें.”
मेरा रूख देखकर उसने अलबत्ता अपनी मजबूरी में कहा कि साहब जो नियम-कानून हैं हम तो उनके तहत की काम कर सकते हैं.
“नियम-कानून लोगों की मदद के लिए ही तो बने हैं भाई. आप बताएं, क्या मैं ट्रेन छोड़कर एक बैग को लेने चला जाऊं जबकि मेरे बच्चे पहले से ही मेरे पहुंचने का इंतजार करते होंगे … जो नुकसान होगा, हो जाएगा. “
मेरा रवैया देख उसने अपने बड़े साहब से बात करने और सही आदेश मिलने की बात कही जिसमें मैंने इतना और कहा कि जब साहब से बात करो तो उनसे मेरी भी बात करा देना .
कुछ देर बाद उसने फोन पर सूचित किया कि जब पश्चिम एक्सप्रेस सवाई माधोपुर पहुंचने की होगी आप मुझे – मुझे उस आरपीएफ कॉन्स्टेबल का नाम याद है क्योंकि तभी मैंने उसका नम्बर मोबाइल में सेव कर लिया था- राजबीर सिंह– को फोन कर लें.
मेरा बैग और मेरी किताबें मुझे जल्द मिल जाने वाले थे. जबकि अभी तक मैं किसी दूसरी ट्रेन में टिकट या सीट की अधिकृत व्यवस्था के बगैर मजे से यात्रा कर रहा था. यह सब किसी नंबर पर कॉल करने से मुमकिन हो गया, यह कितनी अचरज और आश्वस्ति की बात थी!
बस घंटे दो-घंटे की बात थी.
मौका देखकर मैंने पत्नी को फोन कर दिया, संक्षेप में वाकया बता दिया और हिदायत दे दी कि बच्चों को कुछ न बताए. मैं खुद बता दूंगा.
4.
“अंकलजी मैनु त्वाडी सारियाँ गल्लां सुणी सी. मैं करनाल रेहन्दा सी. त्वाडे नाल ऐवी गल्ला हुई सी फिर भी तुसी सारों दे नाल चंगी तरा गल्लां करदे पए ओ. मैं आपसे बहुत छोटा सी. मैं त्वाडे कोल इक रिक्वस्ट करनी सी … तूसी मना नई करोंगे…प्लीज.”
अटेंडेंट की सीट पर मेरे बगल में अभी तक चुपचाप बैठा लड़का मेरे सामने खड़ा होकर अपनी जुबान – पंजाबी- में सामने प्रकट होकर गुहार मचाने लगा.
‘रिक्वेस्ट’ … मैं इसकी क्या मदद कर सकता हूँ? मैं सोचने लगा. क्या हुआ इसे?
लड़का देहाती और भला सा था. चेहरे पर चार-पाँच दिन की बेगरी बेतरतीब दाढ़ी उगी थी.
कोई तीस-बत्तीस वर्ष का रहा होगा.
“मैं घर तों परांठे लाया सी. देसी घी के. मैं इन्नी देर तों देख रियाँ सी, तुसी कुछ खाना तो खायाई नहीं … मेरे परांठे तुझी ख़ा लो. बहुत सारे हैंगे. मैं त्वाडे कोल हाथ जोड़ दा सी.”
कहकर उसने फिर एक बार फिर प्रार्थना में हाथ जोड़ लिए .
मुझे उसके पराँठे खाने में कोई हिचक नहीं थी. लेकिन भूख ही नहीं थी. मथुरा पर अपने कोच के बाहर वाली स्टाल ने भुने हुए चनों का पैकेट मैंने वहीं कहीं फटाफट उदरस्त कर लिया था. उसके बाद पानी पीता रहा था.
“भाई, क्या नाम है तुम्हारा, (उसने बताया कुलदीप) कुलदीप मैं सच कह रहा हूँ, रात को मैं खाना नहीं खाता हूँ…मतलब रोटी-चावल नहीं. यही आदत है.”
लेकिन इस बार ओंकार उसके समर्थन में शामिल हो गया .
“बालक मन से कह रहा है तो खा लीजिए सर. ब्राह्मण तो देवता होते हैं. इसे उसका दिया भोग समझें.”
मन में आया अब तो पक्का नहीं खाऊंगा.
ये खुद के साथ मुझे भी अपने जातिगत-नर्क में झोंके चला जा रहा है.
लेकिन वह युवक प्रार्थना के शिल्प में भरसक ऐसी विराट मानवीय विनम्रता से झुका खड़ा था कि मैंने अपना सारा ताम-झाम फैंक डाला और खाने के लिए खड़ा हो गया .
“चलो भाई, निकालो, खाते हैं… तुम्हारे पंजाब के परांठे.”
लड़के की बाँछें खिल गईं.
नीचे रखे बैग से उसने एक पुलिंदा निकाला जिसमें 12-15 परांठे तो होंगे ही. साथ में लंबे कटे आलुओं की मसालेदार सूखी सब्जी. मैंने एक परांठे के ऊपर थोड़े से आलू रखे और उसका ‘रोल’ बनाकर खाने लगा(मेरी बेटी देखती तो कहती: सच कार्ब एबयूज!). मैंने उसे भी साथ खाने को कहा. मुझे अपने परांठे खाते हुए वह यूं देख रहा था मानो उसकी कोई दुआ कुबूल हो गई हो! इतना खुश… ऐसी दिली खुशी जो किसी रहस्मयी तृप्त-भाव से चेहरे और आंखों से टपकती है… ईश्वर के नूर सी!.
“क्यों?” उसकी जिरह पर एक बारगी मैं खुद से सवाल करता-सा लगा था.
एकाएक सवाल वाहियात और अश्लील होकर फुर्र हो गया.
क्या इतना काफी नहीं कि इस ऊबड़-खाबड़ झंझावात के ऐन बीचोबीच, कोई इन्सानीयत और जीवन में भरोसे की जिन्दा मिसाल-मशाल बनकर मुझे नसीब हुआ था. कोई परिचय नहीं, कोई दूसरा लेना-देना नहीं, न शायद आगे होगा, लेकिन उनके पास रोटियां थीं जिनसे उसके जाने एक भूखे इन्सान को संतुष्ट किया जा सकता था. क्या इतना काफी नहीं था?

5.
सवाई माधोपुर स्टेशन पर जैसे ही गाड़ी रुकने लगी, मुझे राजबीर सिंह दिख गए- उनके हाथ में मेरे मरून बैग ने पहचान सरल कर दी थी. साथ में एक और भी पुलिसिया रहा होगा. मैं झट से उतरा और बैग की तरफ लपका. उन्होंने एक कागज –जिसमें उनतीस सौ रुपए वापस किए जाने की बात थी- पर मेरे दस्तखत लिए और कागज और स्वंय के साथ साथी को मोबाइल देकर एक तस्वीर खींच ली. ताकि अमानत-जब्ती लौटाने का सबूत रहे. मैंने राजबीर को स्वतःस्फूर्त खुश होकर कुछ रुपए देने चाहे तो उन्होंने हाथ जोड़कर मना कर दिया: “ये तो मेरा फर्ज था साब”.
बैग में अन्दर रखी W.G. Sebald की Austerlitz की बहाली को मैं ही महसूस कर सकता था. इस क्लासिक को ट्रेन और मुम्बई में पढ़े जाने का इरादा था मगर…
राजबीर सिंह की सावधान मुद्रा की फोटो मेरे मोबाइल में आज भी रखी है. जीवन की ऐसी शानदार, सकारात्मक चीजों को ट्विटर या दूसरे सोशल मीडिया में प्रस्तुत किया जाना चाहिए. लेकिन मैं ट्विटर पर सक्रीय नहीं हूँ. फिर इस दुनिया में जो लोग अच्छा कर रहे हैं, इसे रोज अपनी तरह से और चुपचाप ही बेहतर करने में लगे हैं. इस तरह के प्रोत्साहन की सबको तो नहीं पड़ी रहती होगी.
६.
तभी एक और अनजान फोन.
“आप वहीं हैं शर्माजी है न जिनका बैग छूट गया था?”
“जी, बैग मिल गया, सवाई माधोपुर पर.”
“अच्छा हुआ. अब आप मेरी बात सुनिए, आप मेरे जूते पहन आए होंगे.”
“नहीं जी, मैं क्यों आपके जूते पहनूंगा?”
“अरे भाई साहब, पहन आए हैं. आपके जूते यहीं रह गए थे.”
“तो आप उन्हें पहन लें, एक से ही तो हैं.”
“नहीं, एक से नहीं हैं. आपका मुझसे एक साइज छोटा है. आपके ब्लैक है जबकि मेरे नेवी ब्लू.”
वाकई ऐसा था.
शाम के झिटपुटे में मथुरा स्टेशन पर जो जूता मिला उसे पांव में डालकर मैं चल दिया था.
मैंने जूते के भीतर से सोल को देखा तो यकीन हो गया.
“तो क्या करें साब, क्या नाम है आपका?”
“रामलाल. मैं वही हूँ जो बोरियाँ… मेरी ट्रेन सुबह साढ़े सात बजे वापी पहुंचेगी.”
“रामलालजी, मेरी तो वहाँ साढ़े ग्यारह पहुंचेगी.”
“ठीक है, मैं आपसे सुबह बात कर लूंगा.”
“ठीक है”
मैंने एक बार फिर खुद को देखा और सोचने लगाः किसी एक नामालूम, अयाचित और बिगड़ेल पल ने अपना यह क्या कुछ जलवा बिखेर दिया है!
7
सवाई माधोपुर पर अपने बैग की आश्चर्यजनक बहाली से लैस होकर जब मैं बड़े टीटी साहब से पास प्रसन्न मुद्रा में पहुंचा तो बोले : “आपके लिए कोटा से एक बर्थ सेकेन्ड एसी की हो जाएगी.”
“लेकिन आप तो कह रहे थे कि पूरी गाड़ी फुल है?
“अरे, जब चार लोगों के सामने पूछोगे तो यही कहना पड़ेगा ना! आपको बाद में मिलने आना चाहिए था… “
उनकी बात सही थी .
लेकिन मेरी उस मासूम फितरत का क्या जो जैसी भी हो, सामने वाले की बात को सहज-सत्य मानकर चलती है.
“आपके पास कोई भी श्रेणी की टिकट होती तो जुर्माना नहीं लगता.”
“आप कायदे अनुसार जो भी जुर्माना है, ले लें. मुझे तो जाना है.”
उन्होंने अपने मोबाइल के केलकुलेटर पर पेनेल्टी और टिकट का हिसाब कर लिया.
“आपका टिकट बनाउंगा कोटा पहुंचकर ही. कोटा से मुम्बई. उसमें आपको कम लगेगा. अभी नहीं बना सकता. आनलाइन में टाइम रिकार्ड हो जाता है.”
मैं क्या कहता? एक ट्रेन क्या छूटी… खैर-ख्वाबों की बरसात ही हो गई.
कोटा स्टेशन का इंतजार करते हम आपस की बातें करने लगे.
वे राजस्थान के मीना जी थे. भरतपुर से . लेकिन अब रतलाम बस गए हैं.
“रतलाम क्यों?”
“वह हमारी रेलवे का जोनल हैडक्वार्टर है, तो वहाँ ज्यादा रहना हुआ. शहर भी ठीक है. वहीं मकान बनवा लिया है. सेवानिवृत्ति में अभी सात साल बाकी हैं.
मैंने उन्हें मुम्बई के अपने जीवन की कुछ बातें साझा कीं. इतने में वह युवतर टीटी साहब भी आ गए और साधिकार बीच में पसर गए. उन्होंने बताया कि अभी तक डिनर नहीं ले पाए हैं जबकि रात के ग्यारह बज रहे थे.
“क्यों?”
मैंने आश्चर्य व्यक्त किया तो बोले “चार कोच हैं मेरे हवाले. ट्रेन आधा-पौन घंटे बाद किसी न किसी स्टेशन पर या किसी दूसरी वजह से रुकती है. कोई चढ़ता है, उतरता है. कभी किसी पैसेंजर को कोई शिकायत रहती है तो टीटी को ही पकड़ते हैं.”
रात के सन्नाटे में दिल की बातें.
रेलवे क्या, सारे सरकारी विभागों में अंडर-स्टाफिंग की समस्या है-इतनी बेरोजगारी के चलते. कोई लेख भी लिख दो तो जो वास्तविकता है उसपर धेला फ़र्क न हो. वह कहाँ बदलेगी? शाम की थकान अब सिर चढ़कर बोलने लगी थी. शुक्र था, कोटा जंक्शन आते ही एक बर्थ मिल गई जिसपर मैं पसर गया. आज इतना कुछ हुआ मगर मुझे अब कुछ सोचने की फुर्सत कहाँ थी.
८.
सुबह देर तक सोता रहा. ट्रेन में मुझे नींद भी ज्यादा आती है. फ्रेश होने के बाद कॉफी पी और बैग में रखी अपनी दो रागी-कुकीज़ खा लीं. उपर की सीट थी तो लेटे-लेटे ही सोता-पढ़ता रहा. कुछ देर बाद आदतन बेटी का फोन आया तो मैंने अपने साथ हुई कथा संक्षेप में बता दी. अब कोई हर्ज़ नहीं था. वह हैरतन सुनती रही. “आप ट्रेन से चले ही क्यों थे, दिल्ली-मुम्बई के बीच कितनी सारी तो फ्लाइट्स हैं?” उसके मासूम प्रश्न का कोई संतोषजेमक उत्तर मेरे पास नहीं था- सिवाय इसके कि ऐसे यादगार अनुभव हवाई यात्रा में कहाँ मिलते हैं. “यू आर सो इंपोसीबल पा” उसने हताशा में दम भरा और जोड़ा “अब हो गया ना इतना ‘अनुभव’. आगे में फ्लाइट से ही चलना.”
एक अवस्था के बाद बेटियां माँ-बाप की तरह ख्याल रखने लगती हैं.
“आपकी ट्रेन कहाँ पहुंची शर्मा साहब? मैं वापी स्टेशन पर आपका इन्तजार कर रहा हूँ.”
ये रामलाल जी थे, वही महाशय, गफलत में जिनके जूते पहनकर मैं मथुरा उतर गया था. मेरी ट्रेन उनकी ट्रेन के वापी स्टेशन पहुंचने के चार घंटे बाद पहुंची. उन्होंने इत्मीमान से इंतजार किया- ऐसा जूता मोह! मुझे भी राहत रही कि मुझे मेरे जूते भी मिल गए. वापी तक ट्रेन काफी खाली हो चुकी थी तो वे मेरे कोच में ही आकर बैठ गए. एक और जीवन अपनी पूरी कहानी के साथ मेरे आगे प्रसरा पड़ा था. सत्तर साल को छूती उमर मगर यात्राओं से लदा काम करना पड़ रहा है.
“क्या करें? लड़का प्राइवेट सेक्टर में है. जब मर्जी नौकरी छूट जाती है. बोरिवली में वन बीएचके कर लिया है. पत्नी के घुटने खराब हो गए हैं. एक पोती है जो स्कूल जाती है. मुम्बई में स्कूलों के कितने तो खर्चे होते हैं. सोचता हूं जब तक हाथ-पांव चल रहे हैं, करता रहूं.”
एक चाय वाले लड़के को रोककर मैंने उनसे साथ चाय पीने का आग्रह किया तो उन्हें कुछ याद आया. अपने बैग से ताजा कुरकरे सींग-चने का एक मिनी पैकेट मुझे थमाते बोले “वापी में अच्छी क्वालिटी के मिलते हैं. घर के लिए दो किलो ले रहा था तो सोचा आपके लिए भी ले लूं. लीजिए.”
मैं पता नहीं भाग्यवादी हूँ या नहीं नहीं मगर यह निश्चय ही कुछ संचित कर्मों का सुफल है जो एक यात्रा के भटकाव के बहाने मुझे यूं बैठे-ठाले सौंपा जा रहा है.
ऐसी सदाशयता का कोई प्रतिदान सम्भव होगा ?
बोरिवली स्टेशन पर वे उतर गए. बाकायदा अलविदा कहा.

९.
अब मेरे आमने सामने कोई यात्री नहीं था. साइड वाली बर्थ पर एक अधेड़ सज्जन थे. कुछ देर बाद वे सामने आकर बैठ गए-बजाहिर बतियाने की मुद्रा में. उम्र पता नहीं कितनी थी लेकिन हुलिया मरियल सा था.
“मैंने आपकी बातें सुनी.”
मेरे मुंह से निकलने को हुआ “अरे, मार डाला.”
“कब?”
“ जब सुबह आप अपनी बेटी से बातें कर रहे थे.”
अजीब इंसान है, कनसुनई करता है और बता भी रहा है.
मगर कहा सिर्फ इतना : “जी हाँ, ट्रेन ही नहीं छूटी, दूसरा बहुत कुछ भी हुआ.”
“मेरे भी एक बेटी है. मातारानी की ब्लैसिंग. नीट की तैयारी कर रही है.”
अनुपस्थिति में भी बेटियां उपस्थित रहती हैं.
“मेरे दो हैं.” मैंने उनकी बात को अन्यमनस्क समर्थन दिया.
“आप क्या काम करते हैं?”
“जी मैं कुछ नहीं करता, सेवानिवृत्त हूँ.”
“ तो पहले कहाँ काम करते थे?”
यह एक किंचित असहज प्रश्न होता है. लेकिन हमारे आसपास निरा सहज होकर मजे से सींग मारता रहता है. आधे घंटे का बमुश्किल साथ है. मैं कहीं भी रहा हूं, क्या फर्क पड़ेगा?
झूठ बोलने से मैं हरगिज बचता हूं. खैर, उन्हें बता दिया.
“और आप?”
जब पूछा है तो पूछा भी जाएगा.
“आपको क्या लगता है?”
सुनते हैं बाल्जाक लोगों के हाव-भाव देखकर उसका पेशा बता देते थे. पेरिस की गलियों में अपनी युवावस्था में बहुत चप्पलें घिसीं थीं. मुझमें तो दूर-दूर तक ऐसी प्रतिभा नहीं. लोग पेशे बदलते भी तो हैं.
“मुझे कुछ नहीं लगता. फिर मुम्बई में पता नहीं कितनी तरह के धन्धे और गोरखधंधे हैं… “
“मैं लोगों को बताता नहीं हूं लेकिन आपको बताता हूं… आयम ए बुकी… “
कहकर वह रहस्यमय ढंग से मुस्कराया.
“यू मीन क्रिकेट बुकी? मैंने अपनी हैरत को संभाले पूछा.
“जी हाँ… वैसे बुकी तो हर जगह हो सकते हैं. होर्स रेसिंग में खूब होते हैं. उसमें तो सट्टा लीगल है. सरकार को टैक्स मिलता है पर हाँ, हमारे यहाँ क्रिकेट में ज्यादा होता है… “
“इतने छापे वगैरा के बावजूद? “
“एक बात बताइए कहीं कोई मैच हो रहा है… मैं अपने सर्कल के लोगों के बीच सट्टा चलाता हूं… कौन हारेगा-जीतेगा, सेन्चुरी लगाएगा, कितने विकिट लेगा… लोग अपने हिसाब से पैसा लगाते हैं, कोई हारता है, कोई जीतता हैं… लॉटरी जैसा. सरकार का इसमें क्या नुकसान होता है? “
उसने बड़ा वाजिब सवाल पूछ डाला था जिसका मैं जवाब दे सकता था. मगर जाने दिया.
“अच्छा ये बताए, कब से कर रहे हैं इसे ?”
“पच्चीस साल तो हो ही गए… पच्चीस साल पहले पंजाब से बम्बई आया था.. तब से ही. मेरा दूर का चाचा था यहाँ. वही लेकर आया. लाया तो फिल्मों में काम कराने को था लेकिन बुकी बन गया… “
“फैमिली कहाँ हैं?”
“फैमिली पंजाब में रहती है. फगवाड़ा में. उन्हीं से मिलकर लौट रहा हूं. दो महीने में एक बार जाता हूं. इस बार देर से गया…बीमार हो गया था. उस पर अस्पताल वालों ने गलत जगह इंजेक्शन लगा दिया.”
कहकर उसने अपनी वह पीड़ित बाजू सामने कर दी.
“आपकी बेटी को मालूम है आप बुकी हैं… “
हर पिता अपनी बेटी की नजर में अदद हीरो होना चाहता ही है.
उसने तौबा में बारी-बारी से दोनों कानों को छुआ.
“बेटी, बेटी को कैसे बता सकता हूँ जी?”
“वह कभी पूछती नहीं है, पापा क्या करते हो?”
“पूछती है.”
“क्या बताया?”
“प्रॉपर्टी एजेंट हूँ.”
“बेटी से झूठ?”
“झूठ तो है लेकिन गलत नहीं है… वह नीट क्वालीफ़ाई कर जाए तो…”
भीतर कहीं एक पिता की बेबस, बेकस बेआवाज कराह थी.
मुझे लगा मामला निजी या गंभीर न हो जाए जबकि मेरी रुचि तो पहली बार झोली में आ पड़े एक साक्षात क्रिकेट बुकी में थी .
“अच्छा ये बताइए, ये स्टेक्स कैसे तय होते हैं … हारने-जीतने, सेंचुरी आदि के…”
“ये समझ लीजिए की हर मैच का शहर, फिर राज्य, फिर देश और फिर इंटरनेशनल लेवल पर सट्टा चलता है… मुंबई में हर तीसरा आदमी इसे खेलता है. इसका हैड-क्वार्टर लंदन है, वहीं से चलता है. वहाँ से दुबई… दुबई से इंडिया.”
“और लेन-देन… आज के डिजिटल दौर में रकम कैसे ट्रांसफर होती है?”
अपने विभाग को छोड़े ज्यादा दिन नहीं हुए हैं, इसलिए ‘मनी-ट्रेल’ या ‘मोडस-ओपरेंड़ी’ जाहिर उत्सुकता और चुनौती की चीज रहती हैं.
“आपने म्यूल-एकाउंट्स का नाम सुना है?”
“सुना है.”
तभी ट्रेन का गंतव्य यानी बांद्रा टर्मिनस आ गया.
किसी कथा के अंत की तरह रहस्य अपनी झिल्ली के पीछे नीम-खुला सा था.
उसे और अनावृत करना उसके सौन्दर्य को संदिग्ध करता.
10
ट्रेन से उतरने से पहले मैंने एक नजर अपने बैग और जूतों पर डाली. वापसी से पहले गई पिछले घंटों में उन्होंने भी अपनी अलग यात्राएं की थीं. वे वैसे ही थे.
लेकिन ट्रेन के बाहर जैसा उजास फैला था वैसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था.
[1] आज न जाने राज के क्या है
हिज़्र की रात और इतनी रौशन.
जिगर मुरादाबादी
|
ओमा शर्मा
मुंबई में रहते हैं. |

एम. ए., एम. फिल (अर्थशास्त्र) भविष्यदृष्टा’, ‘कारोबार’ और ‘दुश्मन मेमना’ कहानी संग्रह तथा स्टीफ़न स्वाइग की आत्मकथा और उनकी कहानियों के हिन्दी अनुवाद आदि प्रकाशित. विजय वर्मा, इफको सम्मान, रमाकांत स्मृति कथा सम्मान, स्पंदन कथा सम्मान, शिवकुमार मिश्र स्मृति सम्मान आदि से सम्मानित.


टिप्पणी
एक छूटी हुई ट्रेन के बहाने ओमा शर्मा जी की
यह कहानी अजनबियों की मानवीयता का जश्न बन जाती है। चायवाला, अटेंडेंट, पराँठे बाँटता युवक, जूते लौटाता बुज़ुर्ग — हर किरदार बिना किसी स्वार्थ के मदद करता है। बीच में ओंकार के ज़रिए जातिगत दंभ और राजनीतिक पूर्वाग्रह की परतें भी खुलती हैं, जो कथा को यथार्थवादी बनाती हैं। सबसे मार्मिक है बुकी वाला प्रसंग — एक पिता जो बेटी की नज़र में सम्मान बचाने झूठ बोलता है। कुल मिलाकर, यह भटकाव और अफरा-तफरी में भी इंसानियत की सहज गर्मजोशी को उकेरती एक सादा पर गहरी कहानी है।
शानदार कहानी 🍃 मन उम्मीद से भर गया 🍃 एक यात्रा में हम कितनी यात्राएं करते हैं 🍃 कितनी बाकी रहती हैं 🍃
बहुत सम्मान ✨✨
वरिष्ठ कथाकार ओमा शर्मा की कहानी ‘हिज्र की रात’ एक बेहद साधारण सी रेल-यात्रा से शुरू होकर अंततः जीवन, अकेलेपन और मानवीय संवेदनाओं के एक गहरे दार्शनिक रूपक में बदल जाती है। मथुरा स्टेशन पर अचानक ट्रेन छूट जाने और दरवाजों के स्वचालित लॉक हो जाने की छोटी सी घटना के बहाने लेखक ने आधुनिक तकनीकी व्यवस्था की निर्ममता और उसमें घिरे आम इंसान की लाचारी को बहुत ही मार्मिक ढंग से उकेरा है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई इसकी भाषा इतनी सहज और सजीव है कि प्लेटफॉर्म की भागमभाग, सह-यात्रियों की हलचल और छूट जाने का वह ठंडा अहसास सीधे पाठक के दिल पर असर करता है। संकट के उस पल में एक चाय वाले लड़के के जरिए मानवता की जो छोटी सी उम्मीद दिखाई देती है, वह कहानी को केवल एक घटना न रखकर अपनों से बिछोह और अकेलेपन की एक जीती-जागती मानवीय दास्तान बना देती है।
ट्रेन की रफ्तार से चलती घटनाओं से परिपूर्ण कहानी। बेहद दिलचस्प और प्रभावी।
अंत तक आते-आते कहानी मनुष्यता की एक नई खिड़की भी खोल जाती है।
ओमा को एक खूबसूरत कहानी रचने के लिए बहुत-बहुत बधाई।
आपबीती या जगबीती को इतने मन से, सरलता के साथ लिखने का अनोखा हुनर है। एक सांस में पढ़ी जाने वाली कहानी। बल्कि कहानी की प्राकृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाली कहानी। हालांकि कहानियों को लेकर समालोचन की दृष्टि साफ नहीं है। लेकिन यह शानदार चयन है।
बहुत दिनों बाद एक कहानी पढ़ी, जो सचमुच ही एक कहानी लगी। लेखक वही देता है, जो कुछ वह बटोरता है। बाहर रूप-कुरूप, अच्छा-बुरा, दुर्गंध-सुगंध सबकुछ है। यह लेखक का अपना चुनाव होता है कि वह किसको सहेजता और विकसित करता है। मानवात्मा में सौंदर्य को देख पाने की दृष्टि भी अर्जित करनी होती है और उस दृष्टि से विकसित मानवीय आलोक को भी। बहुत बहुत बधाई और अभिनंदन लेखक ओमा जी को। साथ में समालोचन के संपादक अरुण जी को भी।
खूबसूरत कहानी के लिए ओमा शर्मा जी को बहुत-बहुत बधाई। इस कथा की सबसे बड़ी विशेषता यह कि कुछ आकस्मिकताओं और उनसे जुड़ी हुई छोटी-छोटी घटनाओं के भीतर से एक समूचा औसत जनजीवन और मनुष्य व्यवहारों के दुनिया झांकने लगती है ।चलती हुई ट्रेन नहीं, यह एक अद्भुत गतिमान दृश्य जगत है। मनुष्य व्यवहारों में छिपे मनोभावों की बहुत ही सुंदर झांकी इस कहानी में उभरी है।
ओमा शर्मा की यह रचना यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण और यथार्थवादी कहानी के बीच की सीमाओं को मिटाते हुए एक बेहद सजीव, प्रामाणिक और आत्मीय आख्यान रचती है। राजधानी एक्सप्रेस के छूट जाने जैसी एक अप्रत्याशित और तनावपूर्ण घटना से शुरू होकर यह पाठ महज़ एक असुविधा का ब्योरा नहीं रहता, बल्कि समकालीन भारतीय समाज की बहुरंगी संवेदना और उसके नैतिक ढाँचे का जीवंत आईना बन जाता है।
पहले तो कहानी के शीर्षक को स्पष्ट करूं कि हिज़्र की रात और इतनी रौशन।
माने प्रिय से बिछुड़ने की रात है, अंधेरा है लेकिन यह स्मृति की रोशनी से जगमगा रही है।
कहानी के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि सहयात्रियों ने (रेल कर्मचारियों सहित) उनकी कितनी मदद की है, ध्यान रखा है।
आगे यह कहानी अपने समय से टकराती प्रतीत होती है लेकिन टकराने के बजाय स्पर्श भर करती है। इससे सिर्फ यह जाहिर होता है कि सत्ता के शीर्ष नेतृत्व के प्रति सवर्णों में असंतोष है। परीक्षाओं में पेपर आउट को लेकर लोगों में नाराजगी है।
लोग जरूरतों के लिए सट्टेबाजी और म्यूल एकाउंट्स से रूपया कमाने के लिए जोखिम उठाते हैं। म्यूल एकाउंट्स माने दूसरे के वैध खाते से अवैध लेन-देन।
कहानी की सबसे बड़ी खासियत है इसकी पठनीयता। आप बिना किसी अवरोध के एक बैठक में कहानी पढ़ते हैं। किन्तु कहानी से हासिल सहयात्रियों का सहयोग है जो वे अपने से अनजान यात्री के साथ करते हैं। उसकी परेशानियों के समाधान में साथ निभाते हैं।
समालोचन और रचनाकार दोनों को साधुवाद।
एक साँस में पढ़ गई जैसे कोई संस्मरण पढ़ रही हूँ। बहुत अच्छी लगी कहानी। अब क्या होगा वाला भाव कहीं रुकने ही न दिया। यकीनन अच्छे लोग अभी भी हैं इस दुनिया में !
वरिष्ठ साहित्यकार ओमा शर्मा जी का रोचक शैली में रचा रूपकात्मक बखान। यात्रा प्रसंग से आगे बढ़ कर भारतीय समाज की झांकी प्रस्तुत करती है यह कहानी । भारतीय समाज की गपशप और सहयात्रियों से सहयोगात्मक संबंध बनाने की प्रवृत्ति का समाजशास्त्रीय चित्रण लगभग फोटो गैलरी का आनंद बन कर उभरी है । ओमा जी साधुवाद।
समालोचन पर ‘हिज़्र की रात और…’ पढ़ी। दिलचस्पी बरकरार रही लेकिन बड़ी बात है कि मनुष्यता की जलती लौ पर विश्वास जगाती रही जो आज के समय में निरंतर दुर्लभ होती जा रही है। बधाई🙏… पंकज मित्र
जीवन मे विश्वास पुख्ता करने वाली कहानी ।
मजा आ गया….क्या कथा है…..चेहरे पर मुस्कराहट आती-जाती रही।
कहानी आपाधापी में नहीं पढ़ना चाहता था इसलिए सोचा कि रात को तसल्ली से पढ़ूँगा। अभी पढ़ी और एक ही साँस में पूरी कर गया। कहानी में जबरदस्त पठनीयता और प्रवाह है। घटनाएँ जिस तरह एक-दूसरे से जुड़ती चली जाती हैं, वह बहुत आकर्षक है।
ये सभी घटनाएँ आप मुझे पहले बता चुके थे। मेरे मन में एक हल्का-सा संदेह था – कि इनसे एक बहुत अच्छा संस्मरण या यात्रा-वृत्तांत तो बन सकता है, लेकिन कहानी? मगर अंत तक पहुँचते-पहुँचते मेरी यह आशंका निर्मूल साबित हुई। इसकी खूबी ही यही है कि आपने अलग-अलग घटनाओं के भीतर छिपी हुई एक ‘कथा’ को पहचाना है। छोटे-छोटे अनुभवों और घटनाओं के भीतर छिपे ‘मनुष्य’ को खोजा है। यहाँ कोई बड़ा दावा या स्टेटमेंट नहीं है, बस आम प्रसंग, मामूली-से लोग, उनसे होने वाले पल भर के संवाद और उनके व्यवहार हैं। लेकिन इन्हीं के बीच धीरे-धीरे कहानी का अर्थ और उसका भाव-संसार बनता जाता है।
हमारे इस मुश्किल और कई बार बहुत निराशाजनक समय में यह कहानी जिस तरह छोटी-छोटी घटनाओं के जरिए हमारी आशा को बचाए रखती है, वह बहुत अच्छा लगा। कहानी का अंत बहुत सकारात्मक है, बल्कि पूरी कहानी में ही एक गहरी सकारात्मकता मौजूद है। इसके पात्र – सरदार जी, अटेंडेंट, टीटी और दूसरे लोग, जो थोड़ी-थोड़ी देर के लिए आते हैं – सब अपने ढंग से याद रह जाते हैं। ऐसे लोग, जिन्हें हम रोज़मर्रा की ज़िंदगी में देखकर भी शायद नहीं देखते। पहली नज़र में ये बिल्कुल सामान्य लगते हैं, लेकिन थोड़ा-सा खुरचते ही उनके भीतर से एक बिल्कुल नया और अप्रत्याशित आदमी निकल आता है। इसे पढ़कर लगा कि जिन घटनाओं को मैं संस्मरण या यात्रा-वृत्तांत की सामग्री समझ रहा था, उनमें कहानी की संभावना आप मुझसे कहीं पहले पहचान चुके थे। बहुत अच्छी कहानी लगी।
बढ़िया कहानी। बधाई 💐 इसे ताज़ा हवा के झोंके सी कहानी कह सकते हैं।
यात्राएं हमें समृद्ध करती है। अंत में बैग और जूते को ध्यान से देखकर पहनना।
भटक भी जाओ तो ठहरना मना है।
विश्वास जो धुंधला पड़ता जा रहा है इस यात्रा ने उसे नया-सा किया है।
कहानी के माध्यम से समाज और राजनीतिक टिप्पणी आपने की वह भी लेखन में कम ही दिखाई पड़ती है।
‘बेटियां’ सच में 😊
आपकी एक और कहानी है जिसमें नायक का पर्स खो गया था जो मिल जाता है।
ये जो खोने के बाद वापस मिलने की खुशी या संतोष है उसकी निहायत जरुरत है।
सर को पुनः बधाई
बहुत अच्छी कहानी। पढ़ने वाले को भी साथ यात्रा कराती।कितने टेसन,कितने लोग,कितने धंधे।और एक रात के सफर में अतीत से अब तक के रेल के सफ़र कितना बदल गया । धंधे भी लोग भी और जीवन भी।छोटी सी कहानी में कितना कुछ समेट दिया।रोचकता के साथ एक सांस में। बधाई
उम्मीद से भरी…
ओमा शर्मा की कहानी ‘हिज्र की रात और…’
एक अनायोजित यात्रा में इंसानियत की तलाश और उसकी सुखद प्राप्ति!
प्रस्तुत कहानी में एक ट्रेन छूट जाती है- सरसरी तौर पर कहानी का केंद्रीय मुद्दा बहुतों को यही लग सकता है मगर यह घटना दरअसल इस कहानी की शुरुआत है. इसी बिंदु पर यह कहानी एक तरह से शुरू होती है और क्रमशः आगे बढ़ती है. जैसे जैसे कहानी खुलती है यह स्पष्ट होता जाता है कि यह कहानी एक छूटी हुई ट्रेन की कथा से कहीं अधिक है।
मथुरा स्टेशन पर एक ग़लती की वजह से कथा नायक की राजधानी एक्सप्रेस छूट जाती है और इसके साथ ही उसकी तयशुदा यात्रा अनिश्चितता के घेरे में आ जाती है. मगर यही से उसके लिए एक ऐसी औचक यात्रा की शुरुआत हो जाती है जिसमें मिलने वाला हर व्यक्ति जीवन और समाज का एक अलग चेहरा उसके सामने रखता है.
संक्षेप में यह कहानी संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और गल्प का एक सुंदर कॉक टेल प्रस्तुत करती है जो अर्थ गंभीर होने के साथ-साथ रोचक भी है. दूसरे शब्दों में कहानी की एक दिलचस्प यात्रा जो जीवन के विभिन्न रंग और पहलुओं से परिचय कराती चलती है.
मानवीय पर्यवेक्षण कहानी की एक आधारभूत विशेषता है। रेलवे स्टेशन की जीवंत तस्वीरें जैसे चाय बेचने वाला लड़का, टीटी, रेलवे कर्मचारी, क्रिकेट का बुकी आदि- सभी जैसे अपनी अपनी छोटी और अनोखी दुनिया का निदर्शन कराने आते हैं. सबकी अपनी कथा है, सीमाएं हैं और प्राथमिकता अथवा पूर्वाग्रह हैं. कोई नियम की दुहाई दे सहयोग से पीछे हटता है तो कोई नियम की आड़ ले कर नियम तोड़ता है. यहाँ जाति का दंभ भी दिखता है और राजनीतिक आग्रह भी. इन सबके बीच कोई सरल ह्रदय व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के अनजान मुसाफ़िरों को अपने घर से लाए पराठे खिला देता है.
इस सफ़र के दौरान लेखक एक बहुरंगी संसार की झलक अपने पाठकों को दिखाता चलता है जिस में तरह तरह के लोग अपनी व्यक्तिगत विशेषता और अंतर्विरोधी प्रकृति के साथ नज़र आते हैं. यहाँ कोई एक पहचान में बंधा नहीं है. सब अपने आप में विशिष्ट हैं.
ओंकारनाथ के चरित्र को ही लें. यह अपने आप में एक जटिल और अद्भुत चरित्र है. विचारों से वह बेहद कट्टर है. उसमें जातिगत श्रेष्ठता बोध और राजनीतिक आग्रह प्रबल है. उसके विचारों से कथानायक के विचार बिल्कुल नहीं मिलते. दोनों में इस बिंदु पर घोर असहमति और टकराव पैदा होता लेकिन जब कुछ यात्री संकट में पड़ते हैं तब इसी ओंकारनाथ के चरित्र का एक और अनदेखा पहलू सबके सामने आता है. वह यात्रियों की मदद करने सबसे आगे आता है.
इस बिंदु पर आ कर हमें मानवीय चरित्र के एक जटिल पक्ष का साक्षात्कार मिलता है. विचारों से भले वह कट्टर और असहमत हो मगर मनुष्यता से उसकी कोई असहमति नहीं. उसके पूर्वाग्रह उसके उदार मन और मनुष्यता के रास्ते पर बाधा बन कर नहीं खड़े होते. यहाँ उसके व्यक्तित्व का विरोधाभास बहुत स्पष्ट हो कर उभरता है.
कुलदीप के पराँठों का प्रसंग कहानी का भावात्मक केंद्र है। लोगों में पराठे बाँटते हुए उसमें कोई दिखावा या ओढ़ी हुई विनम्रता नहीं है बल्कि एक सहज आत्मीयता और आग्रह है.
एक और चरित्र राजवीर का जो किसी इनाम या प्रशंसा की अपेक्षा में लोगों की मदद नहीं करता. उसका यह कहना कि ‘ये तो मेरा फर्ज था साब’ उस मानवीय गरिमा को रेखांकित करता है. अपने निष्काम भाव से किए नेक काम के लिए वह किसी पारितोषिक की अपेक्षा नहीं करता और कुछ भी लेने से मना कर देता है.
कहानी में आए इन छोटे छोटे दृश्य और घटनाओं में इसकी मूल संवेदनाएं उभरती और आकार लेती हैं- मनुष्यता बड़े आदर्शों में नहीं, अक्सर रोटी, पानी, एक सीट, एक फोन और एक छोटे-से भरोसे में प्रकट होती है।
बेहद साधारण-से शब्दों में कही गई एक बड़ी और गहरी बात! इसकी व्याख्या में कई पन्ने खप सकते हैं!
भाषा कहानी के भाव और विचारों को स्पष्टता से व्यंजित करने में सक्षम है. बोलचाल, आत्मसंवाद, व्यंग्य, स्थानीय भाषिक लहजे और सहज हास्य का सम्मिश्रण इसे जीवंत बनाता है।
लेखक यहाँ ख़ुद को भी कोई रियायत नहीं देता. स्वयं भी कठघरे में खड़ा होता है. वह स्वीकारता है, उससे भी भूल हो सकती है, कभी वह असहाय हो सकता, झिझक सकता है, पूर्वाग्रह का मारा हो सकता है मगर डिफेंसिव होने के बजाय वह अपनी इन मानवीय दुर्बलताओं पर मुस्कुराने में भी सक्षम है. यह ख़ुद पर हँस सकने का नैतिक साहस कहानी को उपदेशात्मक होने से बचाता है। कोरा आदर्श परोसना यहाँ लेखक का ध्येय नहीं.
बचपन में की गई रेल यात्रा की सुखद स्मृतियाँ वर्तमान की यात्रा के बीच सेतु का काम करती है. हर नया कुछ पुराने की याद दिलाता है. वर्तमान के साथ साथ अतीत भी हमारे भीतर कहीं ना कहीं बना रहता है जो किसी घटना विशेष से जीवित हो उठता है.
सुरमे और देसी दवाओं के फेरीवालों से लेकर ठसाठस भरी बर्थों तक, यहाँ केवल निजी स्मृति नहीं, बल्कि बदलते भारत के तेज़ी से बदलते परिवेश का एक विश्वसनीय ब्योरा है. किसी दस्तावेज़ की तरह यह प्रामाणिक और समय के पन्नों पर संग्रहित होती समय की गवाहियाँ हैं.
इसी तरह अंतिम ‘बुकी’ प्रसंग कहानी को एक अप्रत्याशित अँधेरे संसार में ले जाता है।
बुकी का चरित्र भी कई शेड्स लिए हुए हैं. वह अपराध करता है मगर अपनी बेटी से अपना पेशा छिपाए रखना चाहता है. यहाँ एक अपराधी का एक पिता में बदल जाना जो कहीं से विवश है और लाचार भी है, कहानी को मार्मिक बना देता है. लोग उसके अपराध को देखते हुए भी उसके जीवन के इस पहलू को नकार नहीं पाते और कहीं ना कहीं सहानुभूति का अनुभव करते हैं. वाक़ई किसी व्यक्ति को उसके चरित्र के किसी एक पहलू को आधार बना कर समग्रता में समझा नहीं जा सकता.
कहानी का विस्तार कई जगह उसकी गति को बाधित करता ज़रूर प्रतीत होता है. इसे एक सीटिंग में पढ़ना सबके लिए आसान नहीं होगा. यह धैर्य और मनोयोग की माँग करती है. वैसे पढ़ते हुए पाठक यह ज़रूर महसूस करता है कि इस कथा का फैलाव इस विस्तृत अनुभव संसार का स्वाभाविक हिस्सा है.
राजनीतिक संवाद कहीं कहीं लाउड प्रतीत होते हैं.
कहानी में एक घटना दूसरी घटना को जन्म देती चलती है. और हर नया प्रसंग कथा पात्र को एक नए अनुभव और नए मनुष्य के सम्मुख ला खड़ा करता है. इस तरह कथा का शिल्प मूलतः आकस्मिकता पर निर्मित है.
अंतिम दृश्य में वर्णित सुबह का उजास प्रतीकात्मक है. यह महज़ सुबह का उजास ना हो कर कथानायक के इस यात्रा के दौरान हुए अनुभवों का वह बहुमूल्य समुच्चय है जो अपनी मानवीयता, उदारता, सकारात्मकता और परोपकार जैसे गुणों से भोर के उजाले की तरह दीप्तिमान है.
जूते बदल जाते हैं, बैग छूटकर लौट आता है, सीट अनिश्चित रहती है, लेकिन अंततः जो चीज़ बची रहती है, वह है मनुष्य की मनुष्यता पर भरोसा! यह इस मुश्किल और अजीब यात्रा की सबसे दुर्लभ प्राप्ति है.
इस दृष्टि से एक ट्रेन के छूट जाने की कहानी महज़ दिल्ली से मुंबई की यात्रा ना रह कर अंततः कथा नायक के जीवन की सबसे यादगार यात्रा बन जाती है. व्यवस्था से मनुष्य तक और आकस्मिक दुर्घटनाओं से अद्भुत अनुभव तक की यह अनियोजित यात्रा अंत में कथा नायक के साथ साथ हम पाठकों के लिए भी अविस्मरणीय बन जाती है.
कहानी जो जीवन के बीचोंबीच से उठाई गई है! शानदार! बधाई ओमा शर्मा जी!
अभी सुबह सुबह यह कहानी पढ़ी। कमाल किस्सागोई! ओमा शर्मा जी की कथा कहन की मुरीद हूँ। इस कहानी ने मेरी उस मुरीदगी में दो तीन सिरे का इज़ाफ़ा और कर दिया है। डिजिटल पन्ने पर कहानी पढ़ रही हूँ, ऐसा मैं कई बार भूल गई। लगा कि मैं ही छूट गई हूं ट्रेन पकड़ने से। मेरे ही जूते बदल गए हैं। लगा कि जैसे कोई सपना देख रही हूँ जिसमें कई बार ऐसे हमशक्ल लेकिन तंग लेकिन अधूरे हादसे पेश आते रहे हैं और हम उन सपनों को पूरा महज़ इसलिए करना चाहते हैं ताकि हमारी छूटी हुई ट्रेन हम वापस पा सकें और साजो सामान भी। लेखक ने जादुई यथार्थ का बख़ूबी इस्तेमाल किया है। वही रोज़मर्रा की घिसी पिटी बातें लेकिन उन्हीं घिसे हुए तलों से कुछ नया, उम्मीद भरा, सबक देता हुआ किस्सा है, जिसे नाम दिया है हिज़्र की रात और…! हिज़्र की रात पढ़ते हुए मेरा हिंदी भाषी भारतीय मन किसी रोमांटिक वाकये का कयास कर रहा था और मैंने कहानी, यक़ीन कीजिए, इसी जलते बुझते भरोसे के साथ पढ़नी शुरू की थी, लेकिन आधी से ज़्यादा कहानी होते होते तक भी मुझे अंदाज़ा नहीं था इसमें एक भी स्त्री पात्र का समावेश नहीं होने वाला। कहानी पढ़ते हुए मज़ा आया और आगे बढ़ने की जिज्ञासा लगातार बंधी रही। यही कहानी या किसी भी लिखत की पहली कसौटी होती है। सो ओमा शर्मा जी की यह कहानी वाकई बहुत सुंदर, अच्छी और यादगार रहने वाली कहानी है। कहानी में मुख्य पात्र की राजनैतिक प्रतिबद्धता और नियम पालन तथा दंड विधान की स्वीकार्यता के साथ दृश्यों का सूक्ष्म विवरण और मनः स्थिति की नब्ज़ टटोल भी इस कहानी को पाठक से बाँधती है। कहानी में रेल व्यवस्काथाआ का पूरा हिसाब किताब होना एकदम वाजिब है। कम शब्दों में इसे इस तरह कह सकते हैं कि यह एक मौजूं कहानी है जिसके भीतर वे सारे डर समाए हैं जो कि किसी भी सावधान, सतर्क और सरलमना यात्री के मन में सांस लेते रहते हैं। वे बाहर नहीं आते। आते भी हैं तो एक आध करके। इतने सारे डर एक साथ हक़ीकत बनकर सामने आए लेकिन फिर अंत में आए सुखांत ने मौसम सुहावना कर दिया।
बहुत अच्छी कहानी है। एक सामान्य यात्रा के बहाने बेहद सहजता से कई जीवन सत्य उद्घाटित हो गए। ओ हेनरी की कहानियों में जीवन सच जितनी खूबसूरती और सहजता से आता है, उसकी एक झलक आप इस कहानी में देख सकते हैं।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इस कहानी का सबटेक्स्ट है। लेखक का जो बैग ट्रेन में खो गया है, उसमें एक उपन्यास Austerlitz (by W.G. Sebald) भी है। और इसका जिक्र यूं ही नहीं है। इसका जिक्र कहानी को और गहराई व विस्तार दे देता है, जो कहानी को उस नाजी-काल के हत्यारे समय से जोड़ देती है, जिधर कमोवेश हमारी ट्रेन बहुत तेजी के बढ़ रही है।
इतने सारे अच्छे लोगों का मिलना और सुखद संयोग स्वप्न की बात है। अच्छी कहानी।
बहुत ही खूबसूरत। पढ़कर मजा आ गया। जिंदगी से भरपूर। एक किस्सागो के लिए लोगों के बीच रहना कितना ज्यादा फलदाई होता है। जैसे बहार आ गई हो।
वाह।
मुझे लगा कि यह तयशुदा रास्ते से मनुष्य के बाहर निकल जाने की कहानी है। ट्रेन छूटती है और उसके साथ कथाकार की यात्रा का कल्पित अनुशासन भी टूट जाता है। इसके बाद संयोगों की एक श्रृंखला है। चायवाले लड़के से लेकर अटेंडेंट, टीटी, कुलदीप, राजबीर सिंह और रामलाल तक। ये किरदार अपनी छोटी-छोटी सामाजिक जटिलताओं, पूर्वाग्रहों, आग्रहों और सहज उदारताओं के साथ उपस्थित हैं। खास बात यह है कि कहानी मनुष्य को उसके किसी एक नैतिक परिचय में बंद नहीं करती। ओंकारनाथ तिवारी के भीतर पूर्वाग्रह भी हैं और मदद करने की तत्परता भी। रेलवे की व्यवस्था में नियम भी हैं और उन्हीं नियमों के बीच रास्ता निकालती हुई मानवीय संवेदना भी।
अक्सर हम मनुष्य को उसकी सूरत से पहचानते हैं, जबकि संकट उसकी सीरत का पता देता है। शायद इसीलिए यात्रा में टकराए ये लोग कथाकार के साथ घर तक चले आते हैं। खोया हुआ बैग मिलना, अजनबी का अपने खाने में से हिस्सा साझा करना, गलत जूते पहन लेने जैसी मामूली-सी घटना का किसी दूसरे मनुष्य की प्रतीक्षा और अपनत्व में बदल जाना; अच्छा यह है कि इन गतिविधियों को ओमा जी ने मानवीयता के स्टीरियोटाइप बनाकर वर्णित नहीं किया।
अंत में कथाकार को दिखाई देता ‘उजास’ मात्र एक नयनाभिराम छवि नहीं है। मैं भी उस रात में उनके साथ चलता हुआ कई छोटे-छोटे उजालों से गुजरा। एक ख़ूबी यह भी है कि कहानी मनुष्यता को घटित होते हुए दिखाती है। उत्कृष्ट साहित्य हमारी ही किसी भूली हुई चीज़ को फिर से देखने व पहचानने की आँख दे देता है। ‘हिज़्र की रात…’ ने यही किया है।
अच्छी कहानी. इस कहानी की यात्रा के साथ हम अपनी यात्रा के बीतें अहसासों को ढूंढने लगते हैं.
यथार्थ के समानांतर एक कल्पना का संसार जो जीवंत है. कई दफे अकल्पनीय तो कई दफे जीवन में इतना धंसा मानों हम वहीं कहीं एक किरदार के तौर पर उपस्थित हैं. प्रिय लेखक ओमा जी के कथा संसार ऐसे खींचता है मानों जितनीद देर है सबकुछ आपके जीवन में घटित है. एक ट्रेन यात्रा, एक मुसाफिर जीवन के दुर्योग, संयोग और उसके बीच में समाज में रचे-बसे पूर्वाग्रहों से तैयार मानस में धूप-छांव होता जीवन. ऐसी कहानियां स्मृति में घर बना लेती हैं. ऐसा हिज्र जो अचानक घटता है और संयोगों के बीच बुनता हुआ एक ऐसे यथार्थ में बदलता है जहां मानवीयता अलग रूप में सामने होती है. कहानी सबसे सुंदर बात उसकी पठनीयता है.प्रवाह में मानों बहता चला जाता है. दिल्ली से मुंबई और मुंबई से दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस से इतना जाना हुआ कि क्या कहूं लेकिन ऐसा लगा जैसे दोबारा वहां हूं. यह यात्रा और कहानी जैसे लेखक के भीतर दर्ज है वैसे ही यह कथा सदा दर्ज होती रहेगी. ओमा सर बहुत बहुत बधाई आपको एक शानदार कहानी के लिए.
उजास फ़ैलाती कहानी
ओमा शर्मा की कहानियाँ चाव से पढ़ती हूँ। कल हिज़्र की रात और…भी पढ़ी।
कहानीकार अपने अनुभव संसार को पाठकों से साझा करता है। वह अनुभवों में से क्या चुन कर परोसे यह उसकी मर्जी, उसका चुनाव। ओमा शर्मा की पैनी-संवेदनशील नजर आज के समय पर है। नकारात्मक समय में जब चारो ओर बस दुर्घटनाओं, हादसों, अविश्वास का माहौल है, ऐसे समय में एक सकारात्मक, विश्वास भरी कहानी बड़ी आश्वस्तिदायक लगी। यह ट्रेन की यात्रा के साथ, छोटे-छोटे संवादों, बनते मानवीय रिश्तों की एक रोचक-सरस यात्रा रही। आगे क्या होगा? यह जानने की उत्सुकता, कहानी की जान, इस कहानी में शुरु से अंत तक बनी रही।
आत्मलीनता के समय में स्टेशन पर रहमदिल, मददगार चाय बेचता लड़का, युवतर टीटी, खाने की रिक्वेस्ट करता पंजाबी लड़का कुलदीप, अनुपस्थिति में भी उपस्थित बेटियाँ आज की पीढ़ी – जेन जी का एक भिन्न चेहरा दिखा रही हैं। ये भी इसी सिस्टम के भीतर रह रहें हैं, सिस्टम से अवश्य परेशान होंगे/हैं। ये सिस्टम बदल नहीं सकते, मगर अपने तई उससे जूझ रहे हैं, उसे एक मानवीय चेहरा प्रदान कर रहे हैं। कहानीकार का इस पीढ़ी को, इन अनजान लोगों को एक पहचान देना कहानी को नई ऊर्जा देना है। एक और निरंतर किसी-न-किसी से मराठी में बेधड़क बातें किए जाता जेन जी युवक सामने बैठा है’। ‘घोट-मोट ओर आत्मलीन, जिसने कानों में ईयर-प्लग चढ़ा रखे थे’।
आज के भारत की इस तस्वीर में एक अधेड़ सज्जन, बुकी हैं, जिसकी बेटी नीट की तैयारी कर रही है। वह बुकी है, यह बात वह अपनी बेटी को कैसे बता सकता है। वाक्य देखिए, हर पिता अपनी बेटी की नजर में अदद हीरो होना चाहता ही है।
छोटे-छोटे संवाद कितना कुछ कहते हैं। “वह कभी पूछती नहीं है, पापा क्या करते हो?” “पूछती है.” “क्या बताया?” “प्रॉपर्टी एजेंट हूँ.” “बेटी से झूठ?” “झूठ तो है, लेकिन गलत नहीं है… वह नीट क्वालीफ़ाई कर जाए तो…” भीतर कहीं एक पिता की बेबस, बेकस बेआवाज कराह थी। “यू आर सो इंपोसीबल पा” उसने हताशा में दम भरा और जोड़ा “अब हो गया ना इतना ‘अनुभव’। आगे में फ्लाइट से ही चलना”, एक अवस्था के बाद बेटियाँ माँ-बाप की तरह ख्याल रखने लगती हैं। आज की जेनरेशन की बेटियाँ ही पिता से ऐसे प्रेम और अधिकार से बात कर सकती है। पिछली पीढ़ी तो पिता के सामने ही नहीं आ पाती थी।
कूपे का अटेंडेंट ओंकारनाथ तिवारी है, एक ओर यात्रियों का सहायक, उन्हें भरोसा दिलाता, दूसरी ओर जातीय दंभ से भरा हुआ। यह भी इस समय की एक वास्तविकता है। आज का एक और यथार्थ हैं, बुजुर्ग सत्तर के आस-पास के रामलाल गलती से जिसके जूते शर्मा जी पहन नीचे उतर आए थे। रामलाल का ‘‘लड़का प्राइवेट सेक्टर में है। जब मर्जी नौकरी छूट जाती है। बोरिवली में वन बीएचके कर लिया है। पत्नी के घुटने खराब हो गए हैं। एक पोती है, जो स्कूल जाती है। मुम्बई में स्कूलों के कितने तो खर्चे होते हैं। सोचता हूँ जब तक हाथ-पाँव चल रहे हैं, करता रहूँ।”
वो ट्रेन यात्रा क्या जो नॉस्टाल्जिक न बना दे। यहाँ भी एक समय की सामान्य ट्रेन की यात्रा का रंगारंग स्मरण है। पक्का इस कहानी ‘हिज़्र की रात और…’ को पढ़ते हुए हर पाठक स्मृति में गोता लगाते हुए अपनी किसी ऐसी ही यात्रा को जरूर याद करेगा।
ऐसी सदाशयता का कोई प्रतिदान सम्भव होगा? कहानी ट्रेन के भीतर-बाहर उजास फैलाती है। उजास फ़ैलाने वाली कहानी लिखने केलिए ओमा शर्मा, पाठक तक पहुँचाने केलिए समालोचन एवं अरुण देव को बधाई!
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कल्पना मनोरमा
“हिज्र की रात और…” कहानी आज पढ़ी। कहानी में जीवन की तरह घटनाएँ चलती और चुकती रहती हैं। पाठक विगत और वर्तमान में आवाजाही करता रहता है। वस्तुओं को साथ लेकर सफ़र पर निकला कथानायक उनसे बिछड़ता ही नहीं, बल्कि रास्ते भर उन सभी वस्तुओं का स्मरण करता रहता है। ध्यान यह भी करता है कि फ्लाइट ली जा सकती थी, लेकिन नायक रेल की यात्रा पसंद करता है।
हर खंड में विडंबना और आम आदमी के और उसके जीवन को दर्शाते हैं। आम आदमी क्या सोचता है? कैसे घर चलता है? कैसे अपने मन को तुष्टि के बुर्ज पर साधे रखता है? आदि।
“ट्रेन से उतरने से पहले मैंने एक नज़र अपने बैग और जूतों पर डाली। वापसी से पहले गए पिछले घंटों में उन्होंने भी अपनी अलग यात्राएँ की थीं। वे वैसे ही थे। लेकिन ट्रेन के बाहर जैसा उजास फैला था, वैसा मैंने कभी महसूस नहीं किया था।”
दसवें खंड पर आकर लगता है कि कहानी यहाँ आकर रुकती नहीं, बल्कि खुल जाती है। और बताती है कि वस्तुएँ अपना रंग-रूप बदलने में भले समय लेती हैं, लेकिन व्यक्ति प्रतिपल बदलता है। कथानायक को उजाला देखकर याद आता है कि उसने ऐसा उजाला कभी देखा ही नहीं था। दरअसल उस उजाले में उसे नए अनुभव से मिली नई नज़र, नए आत्मबोध की स्वीकारता शामिल होती है।
संस्मरणात्मक कहानी बहुत अच्छी लगी। आपको खूब बधाई सर।
एकदम ज़मीनी कहानी लिख डाली इस बार तो आपने. ओमा जी बल्कि अंत तक पहुँचते पहुँचते अंडरवर्ल्ड के तहखाने में भी उतर गए.
यह बदलाव सुखद है.यही तो असल दुनिया है.तभी तो कहते हैं-Truth is Stranger than fiction .
Congratulations!
कुछ सूखे हुए फूल हिज्र की रात में मिले
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कुछ कहानियाँ ज़बान पर रखी पैरासिटामोल की तरह होती हैं। स्वाद कड़वा पर बीमारी में एक हरियाली -सी उम्मीद कि —
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो।
( फ़ैज़ साहब )
इधर वरिष्ठ साहित्यकार ओमा शर्मा जी की कहानी “हिज़्र की रात और” समालोचना पर आई है। पढ़ने के बाद लगा ये कहानी कुछ पेरासिटामोल के स्वाद की तरह ठहरती है।
एक पाठक की तरह प्रथम, मैंने इस कहानी में बैठी भावनाओं की हथेली थामी । फर्स्ट पर्सन में चलती ये कहानी ट्रेन के डिब्बे में जन्म लेती है और देखते ही देखते कुछ देर बाद घुटने चलते बच्चे से, अपने मजबूत पैरों पर खड़ी हो जाती है । फिर क्या ? अपने आस-पास के घटित संसार को हमें दिखाती है ।
किंतु, आँख से जो दृश्य दिख रहा है वो देखना नहीं है। इसी सूत में ये कहानी बड़ी ख़ूबसूरती बंधी है।
ट्रेन की सीट के नीचे ठठास से रखीं बोरियाँ, मनुष्य जीवन के उस हाड़ तोड़ कमाई से किए संग्रह का प्रतीक है जिसे वो चाहकर भी चिता/ क़ब्र में साथ नहीं ले जा सकता। आगे लेखक की मथुरा में ट्रेन का छूटना उस यूनिवर्स की घंटी है कि मनुष्य अदना -सा किरदार है इस धरती पर और उसके चाह अनुसार रास्ते नहीं मिलते। भले वो लाख गूगल मैप से दिशा तलाश कर ले । इस जीवन दर्शन के साथ आगे बढ़ते हुए कहानी उन भले अजनबी लोगों से मुलाकात करवाती है जिनके भरोसे पृथ्वी चक्कर लगा पा रही है । चाय बेचने वाला, कोच अटेंडेंट, पराठे खिलाने वाले पंजाबी लड़का, पुलिसवाला राजबीर ये सब लोग और हाँ वो दुनियादार टीटी फिर अंत में म्यूल अकाउंट वाले क्रिकेट बुकि को कैसे भुला जा सकता है ? हाँ, ये तो पक्का है कि सबके जीवन में ऐसे भले अजनबी लोग याद की तरह इकट्ठे रहते हैं जिनसे जीवन में एक बार मिलने पर मृत्यु तक हम दोबारा नहीं मिल पाते हैं। तभी इस हिज्र से पाठक का हाथ छूटना मुश्किल है।
अब कौन होगा जिसकी बालपन की स्मृतियों की ट्रेन में सामान बेचने वालों की तुकबंदियाँ जमी हुई ना हो?
ओमा जी ने ठीक उस रील को रिप्ले कर दिया। उस नॉस्टेल्जिया पर निश्चित ही हर पाठक देर तक ठहरेगा और कुरेदेगा अपने उन छुपे कोनों को ठंडी आह ! भरते-भरते।
हमारे जीवन में जितने फूल हैं, उनमें असहमति का फूल सब से ज़्यादा खूबसूरत है फिर चाहे वो राजनैतिक असहमति हो या सामाजिक या दर्शन,नजरिये की असहमति। ख़ैर ! जाने दे? इस व्यक्तिगत राय को, आप स्वयं कहानी में जाएँ । इससे इतर कहानी के बाँकपन में देश की वर्तमान राजनीति , जाति के दंभ से जुड़ी ढुलमुल विचार को मुखर होकर जगह दी गई है ।जिसकी सजग रूप से जरूरत भी है।
जब शैशव अवस्था से कहानी किशोरवय में टहल करती है तो हंसी के कई रंग कहानी में छिटकने लगते हैं। रामलाल जी के जूते पहनकर लेखक का चले आना। जो कहानी का पहला सह- किरदार है । ये वाकिया ठीक चेखव की उस पंक्ति को ध्वनित करता है कि “अगर रंगमंच के स्टेज पर बंदूक है तो वो अंत में चलनी चाहिए।” हालांकि यहाँ मुझे देर तक रुकना था पर यदि हर पाठक स्वयं महसूस करे तो बेहतर है।
उस हिज्र की रात के हर पहर में कहानी एक नई परत खोलती जाती है । मुंबई की चमक के दुख , प्राइवेट सेक्टर में नौकरी चले जाने का भय, पिता का बेटी की नीट परीक्षा की चिंता, बुकी का परिवार वालों से डर के ताप में ये पंक्ति “अनुपस्थित में भी बेटियाँ उपस्थित रहती हैं।” शीतल जल की तरह जून के सूखे कंठ को राहत देती है ।
………
अब कहानी के क्राफ्ट, टूल , टेक्निक पर पर विचार करती हूँ तो —
१. character wants और character needs के बीच जरूरी है कि चरित्र, कहानी की आवश्यकता के अनुसार चले । ठीक उस रात यही हुआ। चरित्र व कहानी ने अपना रास्ता स्वयं तय किया। उसकी पीठ पर लेखक को धक्का देने की कोशिश नहीं करनी पड़ी ।कहानी के चरित्र ही कहानी को पाठक के क़रीब लाते गए ।
२. किसी एक कहानी में outer story और inner story का समावेश कहानी को वृहद आकाश देती है। ओमा जी की इस कहानी में पिता-पुत्र, पिता- पुत्री के साथ मानसिक द्वंद, राजनैतिक बहस, महानगर व अपराध की कहानियाँ भी साथ चलती हैं ।
३.यदि progressive complication कहानी में नहीं है और वो एक सपाट सड़क है तो पाठक के भीतर कैसे घर बनाएगी? ये कहानी नदी, नाले, दर्रे, पहाड़, समुद्र लाँघकर , संघर्ष करते हुए गंतव्य तक पहुँचती है तो पाठक की थमी साँस को राहत देती है क्योंकि कहानी और जीवन भिन्न कहाँ?
………
अंत में एक बात—
1. क्या लेखक जी को अपनी रेल यात्रा के दौरान कोई स्त्री नहीं मिली?
2. या ओमा जी ने जानबूझ कर स्त्री चरित्र को कहानी से दूर रखा?
3. या फिर मान लिया जाए कि स्त्री देश में सुरक्षित नहीं हैं इसलिए ऑनलाइन यात्रा कर रही है? उम्मीद है इसका उत्तर लेखक की अगली कहानी/ sequal में मिलेगा।
……….
शुक्रिया समालोचन
शुक्रिया ओमा शर्मा जी
ओमा शर्मा जी की कहानी यथार्थ के साथ संवाद करते हुए उस कल्पना को जीती है जिस कल्पना को हम सब साकार होते देखना चाहते हैं। कल्पना एक ऐसी दुनिया की जहां मानवता और सकारात्मक सर्वोपरि हो और कोमलता और सदाशयता हर हृदय में वास करे। पात्र अमूमन वही हैं जो हमारे आसपास हर ट्रेन यात्रा के दौरान होते हैं। हां उनकी सजीव प्रतिक्रियाएं, समन्वयता और सद्भाव पुष्ट कर उम्मीद की रोशनी भरती हैं। ओमा जी शब्दों से दृश्य उकेरने में माहिर हैं। इसलिए कहानी पढ़ते पढ़ते हम कब खुद यात्रा करने लगते हैं, सहयात्री बनकर सब कुछ देखने सुनने लगते हैं पता ही नहीं चलता। उल्लेखनीय तो यह भी है कि वर्तमान की तमाम दुश्वारियां बताते हुए भी हर प्रसंग का अंत बेहतर कल की आशा से होता है। संवाद प्रायः सरल, सहज और संक्षिप्त रखना भी ओमा जी की विशेषता है। खंडों में बटी यह कहानी सिनेमा के सीक्वेंस की भी याद दिलाती है। पढ़ने के दौरान एक दो जगह प्रूफ की त्रुटियां लगी। डिजिटल में ठीक करना आसान है। ओमा जी को इस कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई। आपकी लेखनी यूं ही सशक्त होती रहे, एक पाठक के तौर पर मेरी ओर से यह शुभकामना है।
आपकी कहानी ‘हिज्र की रात और..’ पढ़ी।
आपके पास किस्सागोई की अगाध राशि है जिसे आप खुले हाथों से अपनी कहानियों में निछावर करते चलते हैं। यह बात आपकी कई कहानियां पढ़ने के बाद कह रहा हूं।
इस कहानी का पहला वाक्य ही कहानी कहने की भारतीय परंपरा के साथ में किसी अंतरंग दोस्त को आपबीती सुनाने के तरीके से शुरू होती है।
पिछले शुक्रवार मेरे साथ एक वाकया हुआ:
यह वाक्य ही पाठक को उत्सुक और सजग बना देता है।
यह केवल यात्रा वृत्तांत या संस्मरण नहीं बल्कि अनेक कथाओं को समेटती हुई एक लंबी कथा है ।
इसमें भारतीय मनुष्य के अनेक चेहरे हैं । एक बेहद मददगार और मानवीय भारतीय नागरिक जाति का अहंकार और श्रेष्ठताबोध लिए मौजूद है ।
कोई पराठें खिला रहा है, कोई बर्थ दिला रहा है तो कोई यह बता रहा है कि ठीक अगले प्लेटफार्म पर दूसरी गाड़ी आ रही है जल्दी सवार हो जाइए। तो कोई अपने जूते के लिए परेशान है।
इतने अनूठे और दिलचस्प किरदार एक कहानी में बहुत कम मिलते हैं । वो भी किसी ट्रेन की यात्रा पर लिखी गई कहानी में, जिसमें बचपन की स्मृति भी रेखांकित है ।
क्या ही संयोग है कि मैंने शायद पिछले महीने सत्यजीत रे की महत्वपूर्ण फिल्म ‘नायक’ रीगल सिनेमाघर में देखी ,जिसमें भी एक रात की यात्रा और दिलचस्प किरदारों की आवाजाही है। इसका आपकी कहानी से कोई संबंध नहीं बस एक स्मृति जाग उठी।
दिल्ली से मुंबई की यह दिलचस्प दास्तान तब अपने उरुज पर पहुंचती है जब बुकी की बातचीत और एक पिता के अंतरद्वंद्व सामने आता है।
कहानी बेहद पठनीय है और ज़िंदगी की यात्रा को समेटे हुए हैं।
सर,आपको धन्यवाद कि आपने एक शानदार कहानी मुझ जैसे अनगिनत पाठकों तक पहुंचाई।
एक ट्रेन बीच रस्ते छूट गई ,दूसरी ले ली तो फिर धड़कने तेज करने वाली कहानी शुरू हो जाती है। कथन रीति सिनेमेटिक है।उतार चढ़ाव,मोड़, व संघर्ष का बयान तटस्थता और भागीदारी के सहारे बड़े ही रसप्रद तरीके से ओमा जी ने किया है।जीवन के रूपक का पूरी कहानी में होता है।आरंभ अँधेरे से,संघर्ष से हुआ और अंत उजाले से होता है।दो गाड़ियां है , दाेनों की दो पटरियां पर एक साथ बात चलती है और सहजता से बनती है।द्विविध जीवन के रूपक का कला से भरा बोधात्मक अनुभव कराने के लिए अभिनंदन ।
कहानी कहने के और अनुभव को संक्रांत करने के लिए कहानी कार कोई बड़े ढोंग रचे बगैर जीवन का अर्थ कैसे बताया जा सकता है ,यह कहानी बताती है।कलाकार तो रचना करके अपने एकांत में चल जाता है,पर उस रचना के प्रतिध्वनि इस संसार के अवकाश से उठते है उस से ही अर्थ का जन्म होता है।हृदय को अर्थ से सम्प्रुक्त करनेवाली कहानी के लिए एक भावक की ओर से ओमजी का आभार।
कहानी पढ़ी
बढ़िया कहानी। इसे नवजात ओस की मानिंद जैसी कहानी कह सकते हैं।
यात्राएं हमें समृद्ध करती है। नए अनुभव देती हैं पहली बार जाना मैट्रो के अलावा साधारण ट्रेनों में आटोमेटिक लाक वाले दरवाजे होते हैं बैग सुरक्षित मिलना सुखद महसूस करवाता है वहीं जूते बदलना प्रसंग हंसी में तब्दील हो जाता है मोदी योगी ब्राह्मण जैसे राजनीतिक पुट से कहानी जीवंत हो गई पंजाबी परांठे और वापी का चुरमुरा एहसास दिलाता है कि दुनिया में अभी मानवता बची है। कहानी कुछ यात्रा संस्मरण जैसी लगी।
आपको ढेर सारी बधाई
पहली पंक्ति से आखिरी पंक्ति तक एक सपाटे में पढ़ा ले जाती है यह कहानी। एक अच्छी कहानी की यह भी एक विशेषता होती है। यह इसलिए भी अच्छी कहानी है, क्योंकि गढ़ी हुई नहीं है। मौलिक कथ्य। अनुभूत घटनाक्रम। जीवन के कितने ही रंग सहजता और प्रामाणिकता से इस कहानी में एक साथ चमक उठते हैं। पाठक ऐसी ही कहानियों के निकट आना चाहता है, दुर्भाग्य से अनुभवजन्य कहानियां इधर कम लिखी जा रही हैं। आपको बहुत बधाई ओमा जी।
-हरि मृदुल, मुंबई।
वरिष्ठ कथाकार ओमा शर्मा जी की यह कथा “हिज्र की रात ओर इतनी रोशन” पढ़ कर लगा रेलगाड़ी के एक रोचक सफर से लौट कर सुरक्षित घर पहुंच गया हूँ।मगर यह केवल एक यादगार सफर की स्मृति ही नहीं है कहानी के माध्यम से लेखक जाति,संप्रदाय,क्षेत्र,वर्ण भेद से ऊपर मानवता रेलवे, पुलिस विभाग,के सहयोग ओर सहयात्रियों की आत्मीयता “रात के सन्नाटे में दिल की बातें” करते बीतती है।युवा बच्चों की बेरोजगारी में माल ढोते,बुकी जैसा अवैध काम करते वृद्ध, करुणा जगाते हैं। प्लेन के सफर में ऐसे अनुभव मिलना मुश्किल हैं।ओंकार जैसे लोगों को भी ऐसी राजनीति से बचने ओर जागृत रहने की आवश्यकता है जिनकी सोच में जनता के दुख दर्द नहीं पूंजीवादी व्यस्था है।समालोचना और लेखक ओमा शर्मा को बहुत बहुत बधाई ,शुभकामनाएं।
Om Sharma is master of story telling. This story is giving us hope of life. Otherwise we never seen anything good-happening while we travel by train. Congratulations to the writer.
कहानी आज पढ़ी। कितने दिनों बाद ऐसी कहानी पढ़ी जिसमें अंत तक रोचकता बनी हुई थी। एक भी पंक्ति बोझिल नहीं। हास्य के साथ साथ विचार भी। एक रात मात्र की कहानी में इतने सारे पहलू। कई बार लगा अब तो कुछ बुरा घट जाएगा, पर जीवन कभी कभी अच्छे अनुभव भी बिना किसी प्रयत्न के दे देती है। आपकी कहानी से विश्वास होता है कि अभी भी लोग बिना किसी कारण भी, बिना किसी लोभ के भी आपके हितैषी हो सकते हैं।
ओमा शर्मा जी की पूर्व में बहुत सी कहानियां पढ़ी हैं और उनकी किस्सागोई तथा विषय में धीरे-धीरे गहरे उतर जाने की शैली मुझे प्रभावित करती रही है। इसलिए इस कहानी को भी दो-चार पंक्तियाँ पढ़कर छोड़ देने का मन नहीं हुआ। अध्यापकों के जीवन में फुर्सत वैसे भी अब कोई सहज उपलब्ध चीज़ नहीं रही, इसलिए इसे कल रविवार को पढ़ना शुरू किया तो फिर कई बार पढ़ती चली गई।
रेल यात्रा के बहाने लिखी गई यह कहानी दरअसल मनुष्य और मनुष्यता की यात्रा है। एक छूटी हुई ट्रेन, छूटा हुआ बैग, गलत पहने हुए जूते और एक अनजान ट्रेन में बिना टिकट बैठ जाने की मजबूरी से शुरू हुआ यह किस्सा रास्ते में इतने तरह के लोगों से मिलवाता है कि लगता है भारतीय रेल अपने साथ पूरा समाज लेकर चलती है। ओंकारनाथ का जातिगत दंभ और राजनीतिक जुनून है तो उसी के बीच कुलदीप के पराँठों में बिना किसी परिचय के उमड़ती आत्मीयता भी है। राजबीर सिंह का अपना फर्ज निभाना, रामलाल का जूते के बहाने सुबह तक इंतजार करना और फिर रास्ते के लिए चने देना, ये छोटे-छोटे प्रसंग कहानी को भीतर तक मानवीय बना देते हैं।
मुझे सबसे अधिक यह बात छू गई कि लेखक किसी को पूरी तरह अच्छा या बुरा बनाकर नहीं छोड़ते। हर आदमी अपने भीतर कई परतें लेकर चलता है। कोई पूर्वाग्रहों के साथ भी मददगार है, कोई अपने गलत पेशे के भीतर भी एक बेचैन पिता है और कोई बिना किसी रिश्ते के अपना खाना आपके सामने खोल देता है। यही इस कहानी की खूबसूरती है।
एक प्रसंग पर मैं ठिठकी भी। ओंकारनाथ जिस आत्मविश्वास से योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मण मानकर उनकी सारी खूबियों का श्रेय उनके ब्राह्मण होने को दे रहा था, वहाँ मन हुआ कि काश लेखक उसे रोककर बता दे कि कि योगी आदित्यनाथ ब्राह्मण नहीं हैं। उनका मूल नाम अजय मोहन सिंह बिष्ट है और वे उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के राजपूत परिवार से आते हैं। यानी बेचारा ओंकार अपनी जिस ‘ब्राह्मण-गाथा’ पर इतना इतराता हुआ आगे बढ़ रहा था, उसका एक बड़ा नायक ही उसकी उस जातिगत सूची में था ही नहीं।तब फिर ओंकारनाथ की प्रतिक्रिया क्या होती या वह किस ट्रांस में चला जाता ये रोचक पढ़ना और भी होता फिर भी मुझे यह प्रसंग कहानी के व्यंग्य को और गहरा करता हुआ लगा।
और शायद इसीलिए अंत में बैग और जूते तो अपने-अपने स्थान पर लौट आते हैं, लेकिन यात्रा के दौरान मिले लोग मन में अपनी जगह बना चुके होते हैं। कहानी पढ़कर लगा कि कभी-कभी जीवन हमारी बनाई हुई योजना बिगाड़कर हमें वह अनुभव दे देता है, जिसकी हमें बिल्कुल उम्मीद नहीं होती।
ओमा जी कमाल की उछल कूद मचाते हुए कब गंभीर हो जाते हैं, कब चंचल, यह आंकना मुश्किल हो जाता है। A character arc shouldn’t be superimposed on a story. It comes out of the story और यही कथन खिलकर कहानी में उभरा है। ओमा जी अपनी कहानियों से रोमांस करना बख़ूबी जानते हैं। यह उनका आत्मसात्कृत
वैभव है जो सौंदर्य प्रतीति का एक ख़ूबसूरत उदाहरण है। Audience engagement और Thematic emphasis उनकी कहानियों से जुड़े दो स्वीकारात्मक पक्ष हैं। मुझे यहां Leo Tolstoy का एक कथन याद आता है, “All great literature reduces to just two basic plots: a man goes on a journey, or a stranger comes to town.” यह कहानी उनके मास्टरपिसिस में से एक है। ट्रेन छूटने से दूसरी ट्रेन पकड़ने तक, किसी के पराठे ऑफर करने से सामान मिलने तक, बेटी की याद में एक पंक्ति पर अटकने से जूते बदलने की वाली परिस्थिति तक, ओमा जी अपने पाठकों को एक ज़िग-ज़ैग राईड दे रहे हैं और स्वयं अपनी स्टडी टेबल पर बैठकर मुस्कुरा रहे हैं। ओमा जी की यह कहानी मेरी पिछले दिनों पढ़ी गयीं कुछ कहानियों को overshadow करती हुई मुझे relaxed महसूस करा रही है। कहते हैं सिर्फ़ वही लोग गहरा दु:ख सह सकते हैं जो गहराई से प्यार करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन प्यार करने की यही ज़रूरत उनके दु:ख को कम करने और उन्हें ठीक करने का काम भी करती है, उसी प्रकार मैं ओमा जी को कहानीकार होने से पहले मैं एक पाठक के रूप में जानती हूं। वे बहुत पढ़ते हैं, उनके पास अनुभव हैं, दृष्टिकोण है, सृजनशीलता है। उनकी कलात्मक साधना उन्हें ऊंचा खेलने देती है। यही खेल वे कहानियों में खेलते हैं। एक बेहतरीन कहानी के लिए जानकारी का सुसंगत होना ज़रूरी है और ओमा जी जानते हैं कि उन्हें किस मात्रा में कौन से पात्र से क्या करवाना है। John Le Carre का कथन – “The world of spying is my genre. My struggle is to demystify, to de-romanticise the spook world, but at the same time harness it as a good story” यहां फिट बैठता है। ओमा जी की सम्पदा से हम पाठक, अधिक लाभान्वित हो रहे हैं।
– जोशना बैनर्जी
ओमापन से भरी सुंदर कहानी! बतकही के माहिर कहानीकार हैं, ओमा!यह कहानी,उनकी ही पुरानी कहानी ‘भविष्यदृष्टा ‘ की याद दिलाती है! बधाई , ओमा को और समालोचन को!
इस कहानी का distinguishing feature यह है कि व्यक्ति हीं नहीं वस्तुये भी पात्र हैं,ट्रेन, प्लेटफार्म, परांठे, जूते,सभी कुछ। बधाई
आपकी कहानी ‘हिज्र की रात…’ पर कल की अत्यन्त संक्षिप्त टिप्पणी के बाद यह ख्याल कि इस कहानी की विशिष्टता यह है कि इसमें व्यक्ति ही नहीं वस्तु भी पात्र है, कुछ और पुख्ता हुआ है। चूंकि रेल का प्रसंग है इसलिए आर.एल. स्टीवेनसन की कविता ‘फास्टर दैन फेयरीज़ ,फास्टर दैन विचेज़…’ याद आई। दनदनाती हुयी, दौड़ती हुयी रेल, स्वयं में एक चरित्र बन जाती है। दूसरी कहानी प्रेमचंद की ईदगाह है जिसमें चिमटा अन्य खिलौनो को मुँहतोड़ जवाब देता हुआ अन्ततोगत्वा हामिद और अमीना के साथ एक जीवंत पात्र बन जाता है।
दुनिया में जहाँ चारों तरफ इस वक्त मार-काट और बुराइयों का बोलबाला है, ऐसे समय में इस तरह की कहानी, जो दरअसल सच्ची घटनाओं पर आधारित है, तपती हुई पेशानी पर रखे रूई के ठंडे फाहे जैसी महसूस होती है। जिस तरह एक के बाद एक घटनाक्रम आगे बढ़ता है, मन धक-धक करता है कि अब क्या होगा, अब क्या होगा और हर बार हमारी सारी आशंकाओं को निर्मूल साबित करते हुए कुछ न कुछ सकारात्मक होता चला जाता है। जिंदगी और लोगों को लेकर एक उम्मीद बनती है कि सच्चाई और अच्छाई अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
कहानी पठनीय है, धाराप्रवाह है। शुरू करते हैं तो खत्म करके ही छूटती है और शायद कहानी की सबसे बेसिक, सबसे ज़रूरी खूबी यही होती है। शब्दों का चयन ऐसा है कि पढ़ते हुए चित्र बनते चले जाते हैं। यह एक बहुत चित्रात्मक कहानी है। ट्रेन, जूते, वह पंजाबी लड़का, टीटी और वह वापी वाला बुजुर्ग इंसान, जिसके साथ नायक के जूते एक्सचेंज हो गए थे,ये सब जैसे आँखों के सामने दिखाई देने लगते हैं। इस सुंदर कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई
शर्मा साहेब की चर्चित रचना ‘हिज्र की रात और…’ एक छूटी हुई ट्रेन की घटना के माध्यम से आधुनिक व्यवस्था की निर्ममता और मानवीय संवेदनाओं की गर्माहट को सामने लाती है। मथुरा स्टेशन पर राजधानी एक्सप्रेस छूट जाने और सामान ट्रेन में रह जाने के बाद लेखक मजबूरी में पश्चिम एक्सप्रेस से बिना सीट यात्रा शुरू करते हैं। इस कठिन परिस्थिति में चायवाले, कोच अटेंडेंट, कुलदीप जैसे सहयात्री और आरपीएफ कांस्टेबल राजबीर सिंह जैसे अजनबी उनकी सहायता करते हैं। कहानी यह भी दिखाती है कि व्यक्ति के सामाजिक पूर्वाग्रहों और पेशे के बावजूद उसके भीतर इंसानियत जीवित रह सकती है। संकट, बिछोह और अनिश्चितता के बीच अजनबियों से मिली आत्मीयता लेखक के मन में मनुष्य और उसकी संवेदनशीलता के प्रति भरोसा जगाती है।
संक्षेप में , शर्मा साहेब की लेखनी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे साधारण-सी घटना को भी गहरी मानवीय संवेदना, सूक्ष्म मनोविज्ञान और जीवन के व्यापक अर्थों से जोड़कर एक यादगार साहित्यिक अनुभव बना देते हैं।
वायरल बुखार के कारण इस कहानी तक देर से पहुॅंचा। यह कहानी एक साधारण रेल-यात्रा की घटना को आधार बनाकर जाति, राजनीति, सामाजिक पहचान और वैचारिक मतभेदों के बीच मनुष्य और मनुष्यता की जटिल पड़ताल करती है। यात्रा के दौरान उत्पन्न संकट धीरे-धीरे पात्रों के बाहरी परिचय और वैचारिक आग्रहों से परे उनके मानवीय पक्ष को सामने लाता है। कहानी यह दिखाती है कि सामाजिक और राजनीतिक विभाजन हमें एक-दूसरे से दूर तो कर सकते हैं, लेकिन संकट की घड़ी में मानवीय संवेदना उन दूरियों को पाटने की क्षमता रखती है।
कहानी की विशेषता यह है कि इसमें मनुष्यता किसी आदर्श या उपदेश के रूप में नहीं आती, बल्कि व्यवहार की छोटी-छोटी घटनाओं में दिखाई देती है। अनजान व्यक्ति की मदद करना, साथ खड़ा होना, भोजन बाँटना और कठिन समय में सहारा देना—ये सामान्य लगने वाले कार्य ही कहानी को गहरी मानवीय अर्थवत्ता प्रदान करते हैं। विशेष रूप से बाँटा गया भोजन आत्मीयता, सहभागिता और विश्वास का मार्मिक प्रतीक बन जाता है।
कहानी यह प्रश्न भी उठाती है कि हमारी सामाजिक पहचान और वैचारिक प्रतिबद्धताएँ आखिर मनुष्य होने के अनुभव से कितनी बड़ी हो सकती हैं। कुछ हद तक उत्तर स्पष्ट है—संकट के क्षण में विचारधाराओं की सीमाएँ धुंधली पड़ जाती हैं और संवेदना का वास्तविक अर्थ सामने आता है। इस कहानी की सबसे प्रभावशाली बात है कि यह किसी एक वर्ग या विचारधारा को नायक बनाए बिना मनुष्यता की साझा जमीन तलाशती है। इस ज़रूरी कहानी के लिए Oma Sharma सर को खूब बधाई। साथ ही, समालोचन का भी आभार 🙂 🙏🏻
साधारण सी कहानी लगी ! एकदम सपाट ! मैं थोड़ा ही पढ़कर बोर हो गया और कहानी बड़ी प्रेडेक्टिव लगने लगी !!