| घर वापसी का सफ़र रविन्द्र कुमार |
ड्रीमलाइनर
अभी मैं ब्रिटिश एयरवेज़ के बोइंग 787 ‘ड्रीमलाइनर’ जहाज़ में आसमान से 35 हज़ार फीट की ऊँचाई पर लगभग 900 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहा हूँ. यह अपने आप में एक चमत्कार है कि इस विशाल जहाज़ में लगभग 250 लोग सवार हैं, और हम अगले लगभग 10 घंटे के लिए हवा में रहेंगे. इतने लोगों का वज़न, उनका 23+23 किलो का चेक-इन और 23+23 किलो केबिन का सामान, और लगभग 1 लाख लीटर ईंधन मिलाकर 2 लाख किलो से भी ज़्यादा वज़न वाली यह मशीन हवा में तैर रही है! यह ‘मेटल ट्यूब’ इंजीनियरिंग का अजूबा है. हम समंदर, पहाड़, दरिया और झीलें पार करते हुए उड़ रहे हैं. जहाँ बाहर का तापमान -50°C है. और हैरानी की बात तो यह है कि इस अनंत आसमान में हम अकेले नहीं हैं. इस वक्त दुनिया भर में हमारे साथ-साथ करीब 10 से 20 हज़ार अन्य जहाज़ भी हवा में मौजूद हैं. और रोज़ाना एक लाख से ज़्यादा उड़ानें भरी जाती हैं. वैसे तो प्रकृति ने ‘रुपेल वल्चर’ जैसे कुछ दुर्लभ पक्षियों को 37,000 फीट तक उड़ने की क्षमता दी है, लेकिन इतने विशाल और भारी ढांचे को इतनी ऊँचाई पर सुरक्षित उड़ाना… इंसान ने अपने दिमाग से सच में क्या कुछ हासिल नहीं कर लिया है.
यह लिखते-लिखते मैं दो ग्लास वाइन पी चुका हूँ, खाना खा चुका हूँ, और एक मूवी देख चुका हूँ, मगर मेरा मन काफ़ी अशांत है. एकदम अशांत. हो सकता है फिल्म ने मेरे अंदर कुछ हिला दिया हो. फिल्म का नाम था ‘‘अकाल: द अनकॉन्कर्ड‘ यह गिप्पी ग्रेवाल की लिखी और डायरेक्ट की हुई मूवी थी, इसमें उसके दोनों बेटे गेस्ट या एक्टिव अपीयरेंस में हैं शायद. यह महाराजा रणजीत सिंह की मौत के बाद एक गाँव पर हुए अफगान हमले पर आधारित थी. फिल्म में हीरो की पत्नी का कत्ल कर दिया जाता है, और मेरी आँखों से आँसू बहने लगते हैं. मेरा गला बीच-बीच में रुंध जाता है, जब मैं हीरो के बेटे को अपनी माँ को बचाने के लिए लड़ते हुए देखता तो मुझे रोना आता.
अभी भी मेरे कलेजे में हूक सी उठ रही है. मुझे पता है कि कहानी है, मगर फिर भी. मुझे मौत से बहुत खौफ लगता है, मैं मौत के बारे में अक्सर सोचता हूँ. मुझे नहीं पता क्यों. मैंने फिल्म खत्म होने से पहले अपने केबिन हेड से अपना लैपटॉप निकाला और यह सब टाइप करना शुरू कर दिया. मेरी सीट 30 बी है, एग्जिट डोर/इमरजेंसी से जस्ट ऊपर. अगर जहाज़ गिरता है या कुछ अनहोनी होती है तो मुझे या मेरे बाजू में बैठे लोगों को यह इमरजेंसी एग्जिट खोलने में मदद करनी होगी और लोग कूदेंगे. हमारी सीट के नीचे सेफ्टी जैकेट्स रखी हैं, जिनका मुख्य उदेश्य है कि अगर जहाज़ पानी में यानी किसी समंदर के ऊपर उतारना पड़े तो लोग डूबें ना. मैं जब भी कोई फ्लाइट लेता हूँ तो हर बार फ्लाइट अटेंडेंट केदिशा निर्देश ध्यान से सुनता हूँ कि सब ठीक से समझ लूँ, कि इमरजेंसी में जहाज़ के दरवाज़े कैसे खुलेंगे, लाइफ जैकेट कैसे निकालनी है, ऑक्सीजन मास्क पहले खुद पहनना है, फिर किसी और की मदद करनी है. पता नहीं कब कोई अनहोनी घट जाए.
लंदन अभी 7 घंटे दूर है. मैं पहली बार इस रास्ते से आ रहा हूँ. मैं हमेशा दुबई या कतर के रास्ते आता-जाता हूँ. मैंने नहीं सोचा था कि मुझे कभी लंदन जाना होगा. यहाँ एयर होस्टेस ब्रिटिश इंग्लिश बोल रही हैं, मेरे कान अमेरिकन इंग्लिश सुनने के अभ्यस्त हैं, तो जब कोई अनाउंसमेंट होती है तो मैं अपने साइड वाले से पूछता हूँ कि “व्हाट डिड शी से?” और साइड वाला दयालु इंसान बहुत प्रेम से बता देता है कि इसने यह कहा है. हमें अभी चिकन करी, राइस और भिंडी की सब्ज़ी मिली थी. भिंडी पकी हुई थी, मेरे दाँत में फंस रही थी तो मैंने उसको नहीं खाया, सिर्फ चिकन और राइस खाए, उसके बाद एक चीज़ केक का टुकड़ा खाया. मेरे ठीक सामने 5 हाथ की दूरी पर दोनों साइड टॉयलेट हैं. शायद सुबह का टाइम है. जहाज़ कई टाइम ज़ोन्स क्रॉस कर चुका है. टॉयलेट यूज़ करने वालों की आवाजाही शुरू हो रही है. अमेरिकन घड़ी के हिसाब से अभी टाइम हुआ है शाम के 5. लंदन में कुछ और टाइम हो रहा होगा और भारत में कुछ और.
मेरे सामने से अभी एक अधेड़ उम्र की एयर होस्टेस गई है, जो अपने आप में एक अजूबा है. फ्लाइट इंडस्ट्री ट्रेडिशनली ब्यूटी स्टैंडर्ड को लेकर काफी सख्त रही है, जो अपने आप में अजीब बात है. शायद वह महिला भारतीय है या भारतीय मूल की है. हो सकता है पाकिस्तानी हो, नेपाली हो, बांग्लादेशी या भूटानी हो, सभी के तो नैन-नक्श एक से दिखते हैं.
कल रात को मैं बिल से बात कर रहा था. विलियम ‘बिल’ डिसेंको. मेरा अमेरिकन फ्रेंड, फिलॉसफ़र और गाइड. जब मैं पहली बार अमेरिका गया था तो उस भले इंसान ने ही मुझे अपने घर और दिल में पनाह दी थी. मैं उसको नहीं जानता था, न ही वो मुझे, यह उसका परोपकारी काम है, जो वह पिछले 30 साल से कर रहा है. इंटरनेशनल स्टूडेंट को अपने यहाँ होस्ट करके. उसने अभी तक 50 से ज़्यादा देशों के सैकड़ों बच्चों को अपने घर में रखा है. जब कोई नया स्टूडेंट यूनिवर्सिटी पढ़ने जाता है, तो उसके शुरुआती अरेंजमेंट, कुछ बिल जैसे दयालु फैमिली-होस्ट करते हैं, वो भी बिना एक पैसा लिए. मैं जब पहली बार आया था तो मुझे बिल मेरे नाम की तख्ती लिए एयरपोर्ट पर खड़ा मिला था, उसके साथ में एक चाइनीज़ और नेपाली लड़के और थे. ये सभी लोग मेरे शुरुआती दोस्त बने थे और अभी भी दोस्त हैं.
बिल उस समय लगभग 74 साल का था, मगर बहुत ही एक्टिव था. मेरे लिए एक कल्चरल शॉक था कि इतना बूढ़ा आदमी इतने बड़े घर में नितांत अकेला रहता है. अपना सारा काम खुद करता है. अभी पिछले कुछ हफ्तों से मैं देख रहा हूँ कि बिल कमज़ोर और बूढ़ा होता जा रहा है, एकदम जैसे उम्र ने उसको जकड़ लिया हो. कल हम एयरपोर्ट आने के लिए उसके पिकअप ट्रक में सामान चढ़ा रहे थे तो मैं उससे कह रहा था कि
“बिल, सामान तुम मत उतारो, मैं भारी सामान खुद उतार लाऊंगा”, तो उसने मुझे कहा कि
“डू यू थिंक आई एम वीक?”
मैंने कहा नहीं. यह सिर्फ एक हिंदुस्तानी आदत है कि बूढ़े आदमी की जगह जवान आदमी काम करे.
आज रात को 2 बजे उठ गया था, 3 बजे बिल के साथ एयरपोर्ट पर निकल आया. 6 बजे फ्लाइट थी, सिएटल के लिए. घुप अंधेरी रात, रोड लगभग सुनसान, सिवाय एक-दो ट्रक्स के. शरीर थका हुआ था. आँखें नींद से बोझिल थीं, मगर ट्रैवल की एक अजीब-सी बेचैनी थी. मुझे किसी भी प्रकार की यात्रा एंग्ज़ायटी देती है.
बिल कह रहा था कि उसका प्लान अभी 20 साल और जीने का है, मैं भी चाहता हूँ कि वह एक अच्छा और स्वस्थ जीवन जिए. ताकि मेरे बच्चे भी उस दयालु दाढ़ी वाले गोरे बूढ़े को देख लें जिसने एक अनजान देश में मेरा जीवन बहुत आसान और अर्थवान बनाया. मगर उसका खुद का जीवन, एकदम वीरान. सूना है. वो करोड़पति है. पैसे की कोई कमी नहीं है. सारी उम्र उसने खूब कमाया है. जीवन बहुत अच्छे से जिया है. वो 1949 में पैदा हुआ था, और अभी 76 साल का है. मैं चाहता हूँ कि वह और जीए, खूब अच्छी लाइफ. मगर वह नितांत अकेला रहता है. इस उम्र में.
शायद डॉली भी इतना ही अकेले रहती है. ट्रिज़ भी. ये दोनों बिल से भी बड़ी हैं. चक भी. वो तो अपनी कार को ही अपना घर समझता है. मैं बिल से पूछ रहा था कल कि वो कहीं और रीलोकेट होने की तो नहीं सोच रहा है. और उसने कहा कि हाँ अगर वह कहीं जाना चाहे तो इडाहो या वाशिंगटन. मैंने कहा कि इस उम्र में वो कहाँ इतना तामझाम मूव करेगा, इसी शहर में रहे, यहाँ उसका अच्छा घर है, उसके डॉक्टर हैं, उसके दोस्त हैं, आदि-आदि.
विचार
अमेरिका के हिसाब से अभी बजे हैं रात के 10. दिन है 17 जून. लंदन में बजे हैं सुबह के 6 और दिन है 18 जून. भारत में अभी दिन के साढ़े 9 बजे होंगे. मुझे इस मेटल ट्यूब में बैठे कई घंटे हो गए हैं. भौतिकी का सिद्धांत है कि आप किसी मूविंग बॉडी में बैठे हैं तो आपके शरीर का हर कण उसी स्पीड से मूव करता है, यानी लगभग एक हज़ार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से. मगर क्योंकि हम इतने कम समय में कई टाइम ज़ोन पार कर लेते हैं, शायद इसी वजह से जेट-लैग होता है.
मेरी साइड वाली सीट पर एक ब्रिटिश लड़की बैठी है. मैं कैसे जानता हूँ कि ब्रिटिश है? उसके लहज़े से. दूसरी बाजू में कोई मैक्सिकन बंदा बैठा है वह भी एक भारी-भरकम ‘सीक्रेट्स ऑफ सीक्रेट’ टाइप की किताब पढ़ रहा है. अमेरिका में दुनिया के हर कोने से आकर लोग बसे हैं, और हर नेशनैलिटी, रीजन का अपना एक डिफरेंट एक्सेंट है. मैं यहाँ इतने साल रह चुका हूँ कि मुझे कुछ-कुछ अंतर समझ आने लगा है.
अगर आपके खूब सारे दोस्त हैं, जो केवल अपनी जात-बिरादरी या देश के नहीं हैं तो आप धीरे-धीरे यह अंतर आसानी से पहचानना शुरू कर देते हैं कि फ्रेंच आदमी कौन से शब्द के आखिर में क्या ड्रॉप करता है. यूरोप की कोई औरत कैसे बोलती है. अफ्रीकी देशों से आया आदमी कौन से शब्द पर ज़्यादा ज़ोर देता है और कौन से पर नहीं? अमेरिकन का खुद का एक अलग लहज़ा है बोलने का, और वो हर स्टेट में कुछ-कुछ बदलता है. भारत वाले, विशेषकर मेरे जैसे लोग बेचारे खिचड़ी हैं. पहली जनरेशन वाले. बड़े शहरों से आए, हाई-फाई अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़े लड़के-लड़कियाँ अमेरिका आने से पहले अमेरिकन्स से ज़्यादा अमेरिकन होते हैं. जैसे कुछ बंगाली भद्रलोक, कुछ साउथ इंडियन, कुछ नॉर्थ इंडियन.
इनका एक बहुत ही स्टैंडर्ड रूट है: जादवपुर, सेंट स्टीफंस, JNU- यूएसए. यह महज़ एक उदाहरण है. इनकी बोल-चाल, रहन-सहन, खान-पान, फिल्म, गीत-गाने, गेम, कला की पसंद सब अमेरिकन से भी ज़्यादा अमेरिकन है. भारत की एक टॉप लेयर वाली आबादी इतनी समृद्ध है कि उनके लिए भारत में भी अमेरिका जैसी सुविधाएँ हैं. और ये ‘ग्लोब-ट्रॉटर्स’ हैं. ये शरीर के स्तर पर ही भारत में रहते हैं, मेंटली ये ‘ग्लोबल सिटीज़न्स’ हैं, बस इनको और इनके बच्चों को पासपोर्ट पर एक स्टाम्प की दरकार भर होती है… इस पर फिर कभी.
मैं लहज़े की बात कर रहा था, अपने राम न इधर के हैं ना उधर के, बोलते हैं ‘कॉफी’, निकलता है ‘काफ़ी’. अच्छी बात यह है कि मैं धीरे-धीरे कुछ-कुछ शब्द पिक कर रहा हूँ. शुरुआत में आया था तो सामने वाला आदमी कहता कि “से इट अगेन”, अभी नहीं कहता है या इतना नहीं कहता है. हो सकता है कि मेरे दोस्तों की इंडियन एक्सेंट समझने की क्षमता अच्छी हो गई हो. या मेरी इंग्लिश का लहज़ा दुरुस्त हो गया हो.
पिछले वीक मैं अपने डिपार्टमेंट हेड के साथ बैठा था. प्रोफेसरों और ग्रेजुएट स्टूडेंट सामान्यता समर में कहीं ना कहीं रिसर्च ट्रिप या किसी और वेकेशन पर जाते हैं. इधर यह बहुत कॉमन है. हम तीन दोस्त बैठे थे, एक ने कहा कि वह पिट्सबर्ग जा रहा है. आर्काइवल रिसर्च के लिए. प्रोफेसर ने एक लंबा-चौड़ा प्लान बताया- कॉन्फ्रेंस, आर्काइव्स और फैमिली वेकेशन के लिए. मैंने कहा कि मैं भी घर जा रहा हूँ. एक दोस्त ने कहा कि वो देश को छोड़कर तो नहीं मगर उसे किसी लाइब्रेरी में फेलोशिप मिली है, वो वहाँ जाएगा. तो कद्रदान, बात चलते-चलते पहुँच गई फ्लाइट में समय काटने की. सबसे पहले प्रोफेसर ने कहा कि “आई लव लॉन्ग फ्लाइट्स”, क्योंकि इससे मुझे 10-12 घंटे बिना इंटरप्शन के मिल जाते हैं और मैं अपना लैपटॉप लेकर अपना काम करता हूँ शांति से. हो सकता है प्रोफेसर बिज़नेस क्लास में फ्लाई करता हो और आराम से पैर पसारकर, अपनी गोद में लैपटॉप रखकर अपनी नई किताब के 10 पेज लिख मारता हो. हमारी क्षमता तो इकॉनमी की है, अगर टाइम पर कुछ सेविंग या ग्रांट न हो तो इसके लिए भी तोते उड़ जाएँ. और इकॉनमी, जैसा कि किसी एक भारतीय विद्वान ने कहा है, ‘कैटल क्लास’ है. खैर यह बहुत ही अतिशयोक्तिपूर्ण और कुछ हद तक फूहड़ बात है.
अमेरिका से भारत आने का इकॉनमी का किराया, कम से कम मैं जिस रूट (अमेरिकन एक्सेंट में ‘राउट’, ब्रिटिश में ‘रूट’) से आता हूँ उधर लगभग 2000 डॉलर है, और भारत में कितने ही लोग हैं जो 2 हज़ार डॉलर का ट्रैवल हर साल अफोर्ड कर पाते हैं? खैर, यहाँ इकोनॉमिक इनइक्वालिटी की बात नहीं कर रहा हूँ. मंगलदास जी इधर-उधर बहक जाते हैं.
लंदन
अभी मैं लंदन एयरपोर्ट पर बैठा हूँ, टर्मिनल 5, गेट 53, अगली फ्लाइट 2 घंटे से कम समय में है. यहाँ का सिक्योरिटी चेक ऐसा हुआ है जैसे हम कोई अपराधी हों. मेरे तो जूते भी निकलवाये गए, ऊपर से साइड में खड़ा करके कहा गया कि “साहब आप रुकिए ज़रा, आपको एक बार फिर चेक करेंगे.” मन ही मन में सोचा कि भाई कर लो जो करना है, अब मना थोड़ी कर सकते हैं. उसके बाद एक आदमी ने हमारे हाथ के दोनों साइड एक कोरोना टेस्ट करने जैसी बड़ी सी पट्टी घुमाई और उसको एक मशीन में डाला जैसे कोई हम बीमारी साथ ले आए हों. उसके बाद एक हुज़ूर हमारी वाटर बॉटल पर टूट पड़े, बोले टेस्ट करेंगे. भाई, पी के देखोगे क्या कि क्या लेकर आया हूँ? छोटे बच्चे, मोटे बच्चे, दूध पीते बच्चे, बच्चों के माँ-बाप, भाई-बहन, सबको लाइन में खड़ा करके मशीन से गुज़ार रहे हैं. हो सकता है यह सबकी सुरक्षा के लिए ज़रूरी है, मगर क्या कोई और दूसरा तरीका नहीं है इस प्रताड़ना से बचने का?
हड़बड़ी में अपना फोन सिक्योरिटी वाले की ट्रे में ही भूल जाता हूँ, फिर भागा जाता हूँ, गनीमत है कि फोन मिल गया. आकर लंबी साँस लेता हूँ और ब्रिटिश एयरवेज के लाउंज में बैठ जाता हूँ, और हीथ्रो एयरपोर्ट के वाई-फाई से फोन कनेक्ट करता हूँ. यह भी नाम-पता पूछकर ही कनेक्ट करता है. मुझे जी भर कर इब्ने इंशा की किताबें याद आ रही हैं, अगर इंशा इधर होते तो इन सबको कितने मज़ेदार तरीके से लिखते. मेरे पास वो शब्द हैं ही नहीं. अपनी बात को कह-भर देना और घुमा-फिराकर कहना, सजा-धजाकर कहना—इनमें कुछ तो अंतर होता ही होगा. खैर जैसी भी है अपनी खुद की भाषा है.
अभी एक और अजूबा देखा. एयरपोर्ट पर कम से कम 10 आदमी टकरा चुके हैं जो महिलाओं वाली स्कर्ट पहने घूम रहे हैं. मुझे लगा कि कोई ड्रेस कोड होगा, मैंने अभी गूगल बाबा से पूछा तो पता चला कि यह कुछ एयरलाइंस की पॉलिसी है, इन्क्लूसिव स्पेस बनाने की. ऊपर से कम्फर्ट और नॉर्म्स को चैलेंज करने की बात भी है. यह मज़ेदार है.
पिछले साढ़े तीन घंटे से लंदन में हूँ. लास्ट फ्लाइट ने एक उजाड़ रनवे पर लाकर खड़ा कर दिया था, और जहाज़ रुकते ही लोगों में अफरा-तफरी मच गई थी. मुझे लगता था कि केवल भारत वाले ही उकड़ू होकर दंड-बैठक लगाने को तैयार रहते हैं प्लेन में, मगर इधर तो…..! बाद में पता चला कि लोगों की 20-30 मिनट बाद ही कोई कनेक्टिंग फ्लाइट है.
उस उजाड़ से रनवे से मेन टर्मिनल तक पहुँचने के लिए कई बसें लाइन में खड़ी थीं. दस मिनट तक कई घुमावदार रोड से होते हुए, बस ने हमें टर्मिनल 5 पर लाकर पटक दिया. यह बहुत आम बात है एयरपोर्ट पर. होता ही इतना बड़ा है. भारत में जब पहली बार प्लेन में बैठे थे तो सिक्योरिटी चेक के बाद, मेन टर्मिनल पर आ गए, फ्लाइट का टाइम हो गया था. किसी ने कहा कि बस आने वाली है, उसमें बैठना है. मेरा एकदम से जी घबराया कि इतने हज़ार रुपये दे दिए और बस में लेकर जाएंगे. बाद में पता चला कि यह बस तो प्लेन तक लेकर जाएगी, तब जाकर साँस में साँस आई.
मैं लंदन एयरपोर्ट पर बैठा सोच रहा था कि कुछ दिन यहाँ रुकें, वो सब देखें जिन ऑफिसों से भारत पर राज किया गया था, मगर उसके लिए चाहिए वीज़ा, टिकट और टाइम, जो तीनों नहीं हैं. देशों ने लोगों के आने-जाने पर कितने ताम-झाम कर दिए हैं.
मैं एक दिन ऐसे ही अपने दोस्त डग से बहस कर रहा था कि 1930 से पहले आना-जाना इतना मुश्किल नहीं था, जितना कि अब है. यह मॉडर्न पासपोर्ट वीज़ा सिस्टम प्रथम विश्व युद्ध के बाद का मामला है, इससे पहले तो लोग किसी सम्मानित आदमी की चिट्ठी ले जाते और पहुँच जाते पानी के जहाज़ में बैठकर. भारत के प्रवासी कब से दुनिया के सुदूर देशों में जा रहे हैं? मगर उधर भी एक पेंच है, और वो भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना का हिस्सा है. अगर आप गिरमिटिया नहीं थे, और मज़दूरी करने नहीं जा रहे थे या किसी मजबूरी में नहीं जा रहे थे तो आप उस 2-4 प्रतिशत उच्च-जातीय और धनाढ्य पुरुष-महिलाओं का हिस्सा थे, जो लंदन, पेरिस और पता नहीं कहाँ-कहाँ जाकर पढ़ाई, व्यापार, क्रांति सब कर रहे थे.
भारत के जितने महापुरुष हैं, जिनका देश को बनाने-बिगाड़ने में जो भी योगदान है, आप उनको ठीक से जानेंगे तो पाएंगे, कि कम से कम ब्रिटिश रूल के दौरान तो कुछ भारतीय, (ज़्यादातर सवर्ण पुरुषों) ने ब्रिटिश राज से उपजे अवसरों का बढ़-चढ़ कर फायदा उठाया और लंदन, न्यूयॉर्क, जर्मनी और ना जाने कहाँ-कहाँ गए. व्यापार करने गए, एमआईटी से लेकर कैंब्रिज तक प्रोफेसर हुए, बिज़नेसमैन हुए. आज उनके पोता-नाती बड़े मज़े से कहते हैं कि हम आम आदमी हैं, मिडिल क्लास हैं, प्रवासियों की संतानें हैं आदि-आदि. मगर ब्रिटिश राज के दौरान, शिक्षा से जुड़ा यह प्रवास मुख्य रूप से उच्च-जातीय और अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित था जिसका इन लोगों ने खूब धूम-धाम से फायदा उठाया था. कहने को भले कुछ भी कहें.
दिल्ली की फ्लाइट
अभी यहाँ सुबह के 10 बजे हैं. यह सब टाइप करते-करते दिल्ली जाने वाली फ्लाइट के वेटिंग रूम में भारतीय लोगों की भीड़ लग रही है. हिंदुस्तानी छैले, जैसा कि श्रीलाल शुक्ल ने कहा है, आधे उजले-आधे मैले, अपने परिवार के साथ, मस्त विचरण कर रहे हैं.
अभी बोर्डिंग की अनाउंसमेंट हो गई है, और एकदम से हिंदुस्तानी लोगों में भगदड़ जैसी मच गई है. लोग इधर-उधर सरपट दौड़ रहे हैं. यह विशेष गुण हमारी अपनी भारतीय ईजाद है. मेरे सामने एक औरत बैठी है. मैंने ट्रेन में (एक टर्मिनल से दूसरे टर्मिनल तक आने के लिए) उस औरत को बात करते सुना था, एकदम ठेठ अलवर वाली राजस्थानी में ‘छै-बारा’ वाली. मैं समझ गया कि यह अपने साइड की कोई है. आदमी भाषा के सहारे अनजान आदमी से भी कनेक्शन ढूँढ लेता है. मगर किसी अनजान औरत से बात शुरू करना भी अपने आप में महाभारत है. मैंने हिम्मत करके कहा,
“क्या आप राजस्थान से हैं?”
औरत ने झट कहा कि “हाँ मैं जयपुर के पास से हूँ, शाहपुरा.”
मैंने कहा, “हाँ मुझे आपकी आवाज़ से समझ आ गया था. आप कहाँ जा रहे हैं?”
उसने बड़े ही कॉन्फिडेंस से जवाब दिया कि “इंडिया ट्रिप के लिए.”
मैंने कहा, “बहुत बढ़िया बात है, आप लंदन में क्या करती हैं?”
उन्होंने कहा कि “पति की नौकरी है.”
मैंने कहा, “ठीक है, मैं भी दिल्ली वाली फ्लाइट के गेट पर ही जा रहा हूँ.”
मैं उसके पास जाके बैठा कि कुछ और बात करूँगा, थोड़ा टाइम कट जाएगा, मगर उस औरत ने चूज़ किया कि मेरे जैसे फालतू आदमी से बात करने से अच्छा है वो किसी को व्हाट्सएप पर कॉल करगी. मैंने कहा कि यह भी अच्छा है. “ठीक है आई विल लीव यू टू योर प्राइवेसी, प्लीज़ कैरी ऑन विद योर कॉल,” और मैं चार्जर का प्लग तलाशने दूसरी साइड में चला गया. देर टक्कर मारने के बाद एक सॉकेट मिला, मगर उसका सिस्टम दूसरा था. फोन केवल 20 प्रतिशत है.
पिछले करीब 20 घंटे से इन मेटल ट्यूब में बैठा दिमाग, मन, शरीर सारा सुस्त हो गया है. पता नहीं प्रोफेसर जोंस किस अच्छे सफ़र की बात कर रहे थे. लंदन एयरपोर्ट पर इंग्लिश के अलावा हिंदी में अनाउंसमेंट हो रही है! मेरे बगल में कोई बूढ़ा बैठा है, तमिल में कोई किताब पढ़ रहा है. उसे हिंदी शायद समझ नहीं आ रही होगी.
खैर, सब उछल-कूद भागा-दौड़ के बाद फ्लाइट अपने निर्धारित टाइम पर बोर्ड हुई, मगर आधे घंटे की देर से टेक-ऑफ हुई, क्योंकि एटीसी के सिग्नल मिलने में कुछ देर हुई. फ्लाइट के अंदर का नज़ारा ऐसा था कि मानो ब्रिटिश एयरवेज़ नहीं एयर इंडिया या इंडिगो में बैठे हों. 4 फ्लाइट अटेंडेंट इंडियन, मोस्ट लाइकली नॉर्थ इंडियन, नाम से पता चल रहा था. बट इट कुड बी मिसलीडिंग. फ्लाइट के अंदर भी पहले इंग्लिश में अनाउंसमेंट हुआ. उसके बाद एक सजीले नौजवान ने तत्समनिष्ठ हिंदी, जिसे उसने अपने फोन में रोमन में लिख रखा था, से देखकर हिंदी में विमान-पाठ पढ़ा, पुराने ज़माने के दूरदर्शन एंकरों की तरह.
इस बार भी मेरा टिकट इमरजेंसी एग्जिट के साथ में था, मगर पिछली फ्लाइट की तरह बीच में न होकर विंडो सीट पर था. बीच में एक सरदार जी आकर बैठ गए, जो काफी भारी-भरकम थे, क्योंकि उनका आधा शरीर मेरी सीट में आ रहा था. सरदार जी के साथ में एक आंटी बैठी थीं. हमारे पीछे एक कुनबा बैठा था जिसमें स्कूल जाने वाली दो लड़कियाँ, जो लंदन के किसी स्कूल में पढ़ती हैं और उनकी माँ, जो कभी दिल्ली में पली-बढ़ी थी, दिल्ली के सूरते-हाल पर दुख मना रही थी. एक बार तो मैं पीछे मुड़कर अपना ओपिनियन देना चाह रहा था, फिर रुक गया, मैं बहुत ज्यादा थका हुआ था और इस फ्लाइट में भी मुझे लगभग 10 घंटे और काटने थे.
तो मैंने अपनी आदत के अनुसार सरदार जी से बात करनी शुरू कर दी. पता चला कि सरदार जी मीट प्रोसेसिंग का कारखाना चलाते हैं. भारत और देश-विदेश में बिज़नेस के सिलसिले में घूमते रहते हैं. सरदार जी ने बताया कि उनका बिज़नेस पिछले साल से घाटे में जा रहा है. मैंने इस पर ज्यादा बात करना उचित नहीं समझा.
कुछ देर बाद खाना आया, खाना खाया, और थोड़ा सा टांगें सीधी करके लेट गया. आँख खुली तो सीट के सामने वाले मॉनिटर पर ‘3 आवर्स टू दिल्ली’ दिख रहा था. मैं बहुत खुश हुआ कि चलो, फाइनली घर पहुँच रहे हैं. मगर जैसे-जैसे घर नज़दीक आ रहा था, पैरों में फिरकी बंधने लगी थी. तो मैंने तीन घंटे काटने के लिए एक मूवी, ‘डंब एंड डंबर’ देखना शुरू किया, हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया और समय भी कट गया. आधे घंटे की दूरी बचने पर अनाउंसमेंट हुआ कि दिल्ली पहुँचने वाले हैं और यात्रियों कृपया ‘यह करें और यह न करें’— छोटी मगर मोटी बातें.

घर वापसी
फाइनली फ्लाइट दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाई अड्डे पर लैंड हुई. अब दो काम करने थे, पहला तो अपना इमिग्रेशन क्लियर करना था और दूसरा जो 23-23 किलो के दो भारी-भरकम बैग भरकर लाया हूँ उनको कन्वेयर बेल्ट से उतारना. दोनों ही काम बिना किसी देरी के और आसानी से हो गए. मगर इस बार जो नया डेवलपमेंट देखने को मिला वो यह कि लगेज उतारने में भी प्रायोरिटी का ऑप्शन आ गया है, शायद कोई पोर्टर टाइप के लोग हैं जो आपके बदले में आपका बैग उतारकर आप तक पहुँचा देंगे. मुझे लगता है कि हिंदुस्तानी आदमी का बस चले तो वो अपना पिछवाड़ा धुलवाने के लिए भी नौकर रख ले. इसके चक्कर में एक भले आदमी ने मेरा एक बैग गलती से उतारकर साइड में रख दिया. गुस्सा आया, फिर सोचा कि इस बेचारे की गलती नहीं है.
मैं इंडियन कस्टम के काउंटर से होते हुए अपने 3 बैग और एक पीठ पर लदा थैला लेकर सरपट करता हुआ बाहर आ गया. मेरी पत्नी निशा गुलदस्ता लिए बाहर खड़ी थी, उसके साथ थी हमारी दोस्त अंजलि जिसने ‘भैया-दीदी की एयरपोर्ट वाली’ फोटो खींची.
मैं एक हल्का कोट पहने हुए था. मगर एयरपोर्ट से बाहर आते ही गर्म हवा का भभका-सा लगा. तुरंत कोट बाहर निकाला. हमने कैब बुक की. हमारे पास 4 बैग थे और हम 3 लोग. एक स्विफ्ट वाला कहता है कि हम आपको ले चलेंगे. हमने कहा कि “भाई ले चल, इसी लिए इतनी रात को यहाँ खड़े हैं.” मगर ये इतना सामान कहाँ फिट करेगा, उसने कहा आप देखते जाइये और उसने तीनों बैग आगे वाली सीट पर फिट कर दिए. बॉडी क्लॉक के हिसाब से मेरा दिन था, इसलिए मैं थोड़ा-सा अलर्ट था. गाड़ी चल पड़ी एयरपोर्ट के बाहर से होते हुए, और जैसे ही हम थोड़ा बाहर निकले एकदम बदबू का खूबसूरत झोंका, कूड़े-कचरे का पहाड़, फुटपाथ पर लेटे लोग, और हॉर्न की काँव-काँव. मैंने मेरे दोनों साइड में बैठी दोनों देवियों से कहा कि यही मैं मिस कर रहा था पिछले साल भर से, और उनको खुशवंत सिंह के हवाले से बताया कि आदमी भले ही कितने भी फर्स्ट वर्ल्ड में रह ले, कितना भी सिंगल डिजिट एक्यूआई में रह ले, मगर कुछ लोगों का मन इसी भभके में आकर ही रमता है.
खैर खतरनाक ट्विस्ट और टर्न्स लेते हुए गाड़ी हमारे रेंटेड अपार्टमेंट वाली गली के सामने खड़ी थी. हम उतरकर हिसाब-किताब कर ही रहे थे कि एक अधेड़ उम्र का आदमी गली में दौड़ते हुए गया. मैंने पूछा कि इस समय यह क्यों दौड़ रहा है? उसके पीछे-पीछे एक 12-13 साल की लड़की दौड़ती हुई आई, हमसे पूछती है कि “क्या आपने इधर से एक आदमी को दौड़ते देखा?”
मैंने कहा “हाँ इधर गया है, मगर हुआ क्या?”
उसने कहा कि “वो मेरा बाप है, मुझे और मेरी माँ को पीटकर भाग रहा है.”
इसके पीछे दो और आंटी-नुमा लुगाइयाँ भागती हुई आईं, एक फोन पर कह रही थी कि “साले को छोडूंगी नहीं आज.”
मैंने अपने बैग घसीटते हुए दरवाज़े के अंदर कर दिए. निशा ने कहा—”वेलकम होम.”
| रविन्द्र कुमार ओरेगन विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के आधुनिक दक्षिण एशियाई इतिहास पर शोध कार्य कर रहे हैं. ravinderkumar955@gmail.com |




शानदार। गजब और सहज प्रवाह। बयान इतना खालिस मुक्तलिफ संस्कृतियों की ऊपरी परतें बारीकी से शामिल होती चली गईं।
शायद आपकी मुराद “मुक्तलिफ” से लफ्ज़ “मुख्तलिफ़” है।
बढ़िया लिखा है।…..रसदार।
पढ़ कर मज़ा आया। लफ्ज़ “शायद” काबिल ए ज़ीक्र है। शायद लेखक ने इस का इस्तेमाल सस्पेंस पैदा करने के लिए किया है। इस पर “दो ग्लास” वाइन का भी ज़िक्र है। इस तरह पाठक “वहम” का शिकार हो जाता है। एक कयास है कि लेखक ख्वाब में है। लेकिन सवाल ये उठता है, कि फिर ये अन्यत्र समालोचन पर कैसे आया। लिहाज़ा ख्वाब की बात कमज़ोर हो जाती है। इस तरह इश्तियाक़ क़ायम रहता है, ताकि किसी रो से ये राज़ खुल जाए।
वाह! क्या ही रवानगी! ग़ज़ब लिखा! जिओ !
बहुत ही अच्छा लिखा है। सजीव दृश्य, यथार्थ, विचार, तरल भाषा और इन सबके बीच मनुष्य। ऐसे रेखाचित्र हमेशा प्रभावित करते हैं। आशा है रवींद्र कुमार से इस तरह के और टेक्स्ट पढ़ने को मिलेंगें।