गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज़
|
निस्संदेह, ऐसे सवालों में से एक है जो लोगों द्वारा उपन्यासकारों से सबसे अधिक पूछे जाते हैं. जैसा पूछने वाला होता है आप उसी के मुताबिक़ हमेशा कोई-न-कोई संतोषजनक उत्तर देते हैं. इतना ही नहीं, इस सवाल का जवाब देने का प्रयास करना उपयोगी भी है, क्योंकि जैसा कहा जाता है, विविधता में आनंद तो है ही है, उसके भीतर सत्य तक पहुँचने की संभावना भी छिपी रहती है. एक बात तो तय है: मेरा मानना है कि जो लोग स्वयं से सबसे अधिक बार यह प्रश्न पूछते हैं कि उपन्यास कैसे लिखा जाता है, वे स्वयं उपन्यासकार ही होते हैं. और हम भी हर बार अपने आपको इसका एक अलग उत्तर देते हैं.
ज़ाहिर है, मैं उन लेखकों की बात कर रहा हूँ जो मानते हैं कि साहित्य एक ऐसी कला है जिसका मक़सद दुनिया को बेहतर बनाना है. दूसरे प्रकार के लेखक वे हैं जो यह मानते हैं कि साहित्य एक ऐसी कला है जिसका मक़सद उनके बैंक खाते को बेहतर बनाना है, उनके पास लेखन के ऐसे नुस्खे होते हैं जो न केवल सटीक होते हैं, बल्कि गणित के सूत्रों की तरह ठीक-ठीक हल भी किए जा सकते हैं. संपादक इस बात को अच्छी तरह जानते हैं. हाल ही में एक संपादक ने मुझे यह बताया तो मुझे बहुत मज़ा आया कि उसके प्रकाशन संस्थान के लिए राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार जीतना कितना आसान था. सबसे पहले, उन्हें निर्णायक मंडल के सदस्यों के बारे में छानबीन करनी पड़ती थी, उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में, उनके काम के बारे में, उनकी साहित्यिक रुचियों के बारे में. उस संपादक का मानना था कि इन सभी तत्वों का योग अंततः निर्णायक मंडल की सामूहिक रुचि का एक औसत निकाल देता है. ‘कंप्यूटर इसी काम के लिए होते हैं,’ संपादक ने कहा. यह जान लेने के बाद कि किस प्रकार की पुस्तक के पुरस्कार जीतने की सबसे अधिक संभावना है, वे उस तरीके के बिल्कुल उलट चलने लगते थे जैसा हम सामान्य जीवन में करते हैं. यानी यह खोजने के बजाय कि ऐसी पुस्तक कहाँ मौजूद है, वे यह पता लगाने में लग जाते कि कौन-सा लेखक-चाहे अच्छा हो या साधारण-उसे गढ़ने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त होगा. इसके बाद बाकी सब कुछ केवल अनुबंध का मामला रह जाता था: उस लेखक को बैठाकर ठीक नाप-तौल के मुताबिक़ वह किताब लिखवाना, जो अगले वर्ष का राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार जीत सके. चिंता की बात यह थी कि संपादक ने इस पूरे खेल को कंप्यूटरों की गणना के हवाले कर दिया था, और कंप्यूटरों की बताई हुई संभावना छियासी प्रतिशत तक सटीक होती.
इसलिए असली समस्या यह नहीं है कि उपन्यास कैसे लिखा जाए, या कहानी कैसे लिखी जाए, बल्कि यह है कि उसे गंभीरता से कैसे लिखा जाए, भले ही बाद में उसे कोई पुरस्कार न मिले और उसकी एक भी प्रति न बिके. यही वह सवाल है जिसका कोई निश्चित उत्तर मौजूद नहीं है. और यदि कोई यह बात सबसे अच्छी तरह जान सकता है, तो वह वही व्यक्ति है जो यह लेख लिख रहा है, मन ही मन इस आशा के साथ कि शायद इसी बहाने उसे अपनी पहेली का कोई समाधान मिल जाए. क्योंकि मैं मेक्सिको स्थित अपनी स्टडी में लौट आया हूँ, जहाँ एक वर्ष पहले मैंने कई अधूरी कहानियाँ और एक उपन्यास शुरुआत करके छोड़ गया था. अब मुझे ऐसा लगता है जैसे धागे का वह सिरा ही नहीं मिल रहा, जिससे उलझी हुई गेंद को सुलझाना शुरू करूँ. कहानियों के मामले में कोई समस्या नहीं रही, वे कूड़ेदान में जा चुकी हैं. एक वर्ष बाद उन्हें दोबारा पढ़ने के बाद मैं यह कहने का साहस करता हूँ-और शायद यह सच भी हो-कि उन्हें मैंने लिखा ही नहीं था. वे यूरोप में रहने वाले लैटिन अमेरिकी लोगों के जीवन पर आधारित साठ या उससे अधिक कहानियों की एक पुरानी परियोजना का हिस्सा थीं. उनका सबसे बड़ा दोष जिसके कारण मैंने उन्हें फाड़कर फेंक दिया: मुझे स्वयं उन पर विश्वास नहीं था.
मैं इतना अहंकारी नहीं हूँ कि यह कहूँ कि जब मैंने उन पन्नों को टुकड़े-टुकड़े किया और फिर उनकी कतरनों को अलग-अलग बिखेर दिया ताकि उन्हें दोबारा जोड़ा न जा सके, तब मेरा हाथ नहीं काँपा. मैं काँप रहा था, और केवल मेरा हाथ ही नहीं. इसका कारण यह था कि कागज़ फाड़ने से जुड़ी एक स्मृति मेरे भीतर बसी हुई है. वह स्मृति कुछ लोगों को हौसला देने वाली लग सकती है, लेकिन मुझे वह उदास कर देती है. यह स्मृति जुलाई 1955 की है, जब मैं एल एस्पेक्टादोर के विशेष संवाददाता के रूप में यूरोप जाने वाला था. यात्रा की पूर्व संध्या पर कवि होर्खे गाइतान दुरान बोगोता में मेरे कमरे में आए और मुझसे आग्रह किया कि मैं मीतो पत्रिका में प्रकाशित करने के लिए उन्हें कुछ दे जाऊँ. मैं अभी-अभी अपने कागज़ों की छँटाई कर चुका था. जिन्हें मैं सुरक्षित रखने योग्य समझता था, उन्हें अलग रख दिया था, और जिन्हें मैं पूरी तरह निराशाजनक मानता था, उन्हें फाड़कर फेंक दिया था. गाइतान दुरान, जिनमें साहित्य के प्रति अतृप्त भूख थी और उससे भी अधिक छिपी हुई संभावनाओं को खोज निकालने का जुनून, कूड़ेदान में पड़े कागज़ों को खंगालने लगे. अचानक उन्हें कुछ ऐसा मिल गया जिसने उनका ध्यान खींच लिया. ‘लेकिन यह तो प्रकाशित किए जाने लायक़ है,’ उन्होंने कहा. मैंने उन्हें समझाया कि मैंने उसे क्यों फेंक दिया था. वह मेरे पहले उपन्यास लीफ़ स्टॉर्म का एक पूरा अध्याय था, जो तब तक प्रकाशित हो चुका था. मेरे विचार में उसका ईमानदार ठिकाना कूड़ेदान के अलावा और कोई नहीं हो सकता था. गाइतान दुरान इससे सहमत नहीं हुए. उनका मानना था कि संभव है वह अंश उपन्यास के भीतर अनावश्यक रहा हो, लेकिन अपने आप में उसका एक अलग साहित्यिक मूल्य था. उन्हें प्रसन्न करने के लिए, न कि इसलिए कि उन्होंने मुझे पूरी तरह आश्वस्त कर दिया था, मैंने उन्हें उन फटी हुई कतरनों को जोड़कर उस अध्याय को एक स्वतंत्र कहानी की तरह प्रकाशित करने की अनुमति दे दी.
हम इसका शीर्षक क्या रखें?’ उन्होंने पूछा. उन्होंने ‘हम’ का प्रयोग किया था, और शायद ही कभी कोई बहुवचन सर्वनाम उतना उपयुक्त रहा हो जितना उस क्षण लगा. ‘मुझे नहीं पता,’ मैंने कहा. ‘क्योंकि यह तो बस इसाबेल का एकालाप है, जब वह माकोन्दो में बारिश होते हुए देख रही है.’ गाइतान दुरान ने लगभग उसी समय, जब मैं यह बात कह रहा था, पहले पन्ने के ऊपर लिख दिया- ‘मोनोलॉग ऑफ इसाबेल वॉचिंग इट रेन इन मकोंदों’. इस तरह मेरी उस कहानी का प्रकाशन हुआ जिसे आलोचकों ने और विशेष रूप से पाठकों ने सबसे अधिक सराहा. फिर भी उस अनुभव ने मुझे उन पांडुलिपियों को फाड़ना बंद करना नहीं सिखाया जिन्हें मैं प्रकाशन योग्य नहीं समझता था. उसने मुझे केवल यह सिखाया कि उन्हें इस तरह फाड़ना चाहिए कि बाद में उन्हें किसी भी तरह जोड़कर फिर से तैयार न किया जा सके.
कहानियों को फाड़कर फेंक देना लगभग निहायत ज़रूरी होता है, क्योंकि उन्हें लिखना कुछ-कुछ कंक्रीट ढालने जैसा है. इसके विपरीत, उपन्यास लिखना ईंटें जोड़कर दीवार बनाने जैसा है. इसका मतलब यह है कि यदि कोई कहानी पहली कोशिश में जम न पाए, तो उसे संवारने की ज़िद करना उचित नहीं. लेकिन उपन्यास अपेक्षाकृत आसान होता है- आप उसे फिर से शुरू कर सकते हैं. मेरे साथ इस बार भी यही हुआ. जिस उपन्यास को मैं आधा-अधूरा छोड़ गया था, उसमें न तो लहजा सही था, न शैली, और न ही पात्रों के व्यक्तित्व. लेकिन यहाँ भी कारण वही था: मुझे स्वयं उस पर विश्वास नहीं था. समाधान खोजने के लिए मैंने दो ऐसी किताबें दोबारा पढ़ीं, जिनके बारे में मुझे लगा था कि वे मेरे काम आएँगी. पहली थी फ्लोबेयर का सेंटिमेंटल एजुकेशन. यूनिवर्सिटी के दिनों की अपनी अनिद्राओं के बाद मैंने उसे फिर कभी नहीं पढ़ा था. इस बार उसे पढ़ने का मक़सद केवल यह था कि कहीं अनजाने में ऐसी समानताएँ न आ जाएँ जो संदेहास्पद लगें. लेकिन उससे भी मेरी समस्या का समाधान नहीं हुआ. दूसरी पुस्तक थी यासुनारी कावाबाता की ‘हाउस ऑफ द स्लीपिंग ब्यूटीज़’. तीन वर्ष पहले इस पुस्तक ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया था और आज भी मुझे वह एक अत्यंत सुंदर कृति लगती है. किंतु इस बार वह भी किसी काम की नहीं निकली. मैं उसमें वृद्ध लोगों के यौन व्यवहार के बारे में कुछ संकेत खोज रहा था, लेकिन पुस्तक से मुझे यह समझ में आया कि वृद्ध जापानियों का सेक्स लाइफ़- जो जापानी समाज की अन्य अनेक बातों की तरह विचित्र प्रतीत होता है- वृद्ध कैरेबियाई लोगों के सेक्स लाइफ़ से बिल्कुल अलग है. जब मैंने भोजन की मेज़ पर अपनी चिंता का ज़िक्र किया, तो मेरे बेटों में से एक- वही जिसमें सबसे अधिक व्यावहारिक समझ है- बोला, ‘कुछ साल और इंतज़ार करिए, फिर आपको इसका अनुभव खुद ही हो जाएगा.‘
लेकिन दूसरे बेटे ने, जो एक कलाकार है, अधिक ठोस सलाह दी. ‘द सॉरोज़ ऑफ यंग वर्थर को फिर से पढ़ो,’ उसने कहा. उसकी आवाज़ में मज़ाक का ज़रा भी पुट नहीं था. मैंने सचमुच ऐसा करने की कोशिश की. केवल इसलिए नहीं कि मैं एक बहुत आज्ञाकारी पिता हूँ, बल्कि इसलिए भी कि मुझे ईमानदारी से लगा कि गेटे का यह प्रसिद्ध उपन्यास मेरे काम आ सकता है. लेकिन सच यह है कि इस बार मैं उसके दुखद अंतिम संस्कार पर रो भी नहीं पाया, जैसा पहली बार हुआ था. मैं आठवें पत्र से आगे ही नहीं बढ़ सका. वही पत्र जिसमें वह पीड़ित युवक अपने मित्र विल्हेम को लिखता है कि अपने एकांत कुटीर में रहते हुए उसे धीरे-धीरे सुख का अनुभव होने लगा है. यहीं आकर मुझे लगा कि मेरी अपनी स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. इसलिए अब मुझे बार-बार अपनी जीभ दाँतों तले दबानी पड़ती है, ताकि रास्ते में मिलने वाले हर व्यक्ति से यह न पूछ बैठूँ— ‘भाई, एक बात बताओ, आखिर उपन्यास लिखा कैसे जाता है?’
मदद
मैंने कभी कोई पुस्तक पढ़ी थी, या कोई फ़िल्म देखी थी, या शायद किसी ने मुझे एक सच्ची घटना सुनाई थी, जिसका कथानक कुछ इस प्रकार था: नौसेना का एक अधिकारी अपनी प्रेमिका को चोरी-छिपे एक युद्धपोत पर अपने केबिन में ले आता है. वहाँ, उस दमघोंटू और सीमित जगह के भीतर, वे दोनों एक असीम प्रेम का अनुभव करते हैं, और कई वर्षों तक किसी को भी उसके वहाँ होने का पता नहीं चलता. मैं किसी भी ऐसे व्यक्ति से विनती करता हूँ जो इस सुंदर कहानी के लेखक को जानता हो कि कृपया मुझे तत्काल सूचित करे. मैं इतने लोगों से पूछ चुका हूँ लेकिन कोई नहीं बता पाया. अब तो मुझे यह संदेह होने लगा है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि यह कहानी मैंने स्वयं ही गढ़ ली हो और अब मुझे याद न हो. धन्यवाद.
(25 जनवरी 1984, एल पाइस, मैड्रिड)
|
प्रभात रंजन
|

तीन कहानी संग्रह और एक उपन्यास ‘कोठागोई तथा ‘हिंदी मीडियम टाइट’ पुस्तक प्रकाशित. अंग्रेज़ी से हिन्दी में 25 से अधिक पुस्तकों का अनुवाद. ‘सहारा समय कथा सम्मान’, ‘प्रेमचंद कथा सम्मान’, ‘कृष्ण बलदेव फेलोशिप’, ‘द्वारका प्रसाद अग्रवाल उदीयमान लेखक पुरस्कार’ से सम्मानित.


Super
एक लेखक, कवि या कलाकार की रचना प्रक्रिया को लेकर मार्केज़ की दृष्टि अद्भुत है। उनकी इस दृष्टि को इस वक्त में लाना बहुत जरूरी लगता है, इस दौर का हर लेखक/ कवि सम्भवतः इसी संकट से गुजर रहा है। कलाकार अधिकतर समय स्वयं को स्वीकारने और खारिज करने की तकलीफ़ से ही गुजरता रहता, इस दौर में जब हर चीज़ को बेहद आसानी से कुचला जा सकता है, ऐसे में सवाल लेखन की प्रासंगिकता को लेकर भी है। ठीक उसी वक्त मार्केज की लिखने पर यह दृष्टि एक आस्था की तरह है। प्रभात जी के अनुवाद में वो बात तो है जिससे पढ़ते हुए अनुभूति होती है कि हम अनुवाद नहीं, सीधे मार्केज को पढ़ रहे हैं। शुक्रिया।
Shandar…..Mai bhi khuch likuga
बहुत खूबसूरत। पढ़कर मजा आ गया। प्रभात रंजन जी का अनुवाद भी बेहद प्रवाहमय है।
शानदार है। वाह।
मारक्वेज का इंटरव्यू Art of Fiction No ६९ पेरिस रिव्यू के Winter, 1981 अंक में निकला था उसका लिंक अंत में दे रहा हूँ | वह पूरा इंटरव्यू अनुवाद के योग्य और अत्यंत महत्त्वपूर्ण है | पेरिस रिव्यू के कुछ इंटरव्यूज़ का – या उनके चुने हुए अंशों का – मैं अनुवाद करना चाहता था, पर अनुमति ओर अपनी कार्य शक्ति की विवशता के कारण ऐसा नहीं कर सका | प्रभात जी सिद्धहस्त अनुवादक हैं | वे यह काम भी करें तो बहुत अच्छा हो | मारक्वेज ने उपन्यास-लेखन की परिभाषा ही बदल दी. पिछली सदी के अंत ओर इस सदी के प्रारंभ के लैटिन अमरीकी कथा-लेखन ने तो साहित्य-लेखन की परिभाषा भी किसी हद तक बदल डाली है | लिंक है -https://www.theparisreview.org/interviews/3196/the-art-of-fiction-no-69-gabriel-garcia-marquez
मदद वाला अंतिम हिस्सा तो सबसे अद्भुद है.
प्रभावपूर्ण और प्रवाहपूर्ण अनुवाद ने मार्केज के इस वक्तव्य को ग़ालिबन मूल से ज्यादा रोचक बना दिया है।