| इक्कीस एक सौ बाईस पुनरावृत्ति नहीं मुहम्मद रैहान |
ख़ालिद जावेद के बारे में यह कहना कि वे बार-बार मृत्यु को ही अपना विषय बनाकर लिखते हैं, पहली दृष्टि में सही प्रतीत हो सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा कहना विषय और सृजनात्मक अनुभव अथवा विकास के बीच के अंतर को अनदेखा करना है. साहित्य में पुनरावृत्ति और सृजनात्मक अनुभव के बीच अंतर शायद यही है कि पुनरावृत्ति में अर्थ अपनी जगह स्थिर हो जाते हैं, जबकि सृजनात्मक अनुभव में विषय अपनी पूर्ववर्ती अर्थवत्ता को बनाए रखते हुए नए संदर्भ, नए अनुभव और नए प्रश्न उत्पन्न करता है. बड़े कथा-लेखक की सृजनात्मक दुनिया इसी निरंतर विस्तार का नाम है.
दोस्तोयेव्स्की अपराध, पाप, अंतरात्मा और मुक्ति की ओर बार-बार लौटते हैं, काफ़्का पराएपन, भय और सत्ता की अज्ञात व्यवस्थाओं से बार-बार संवाद करते हैं, काम्यू मृत्यु, निरर्थकता और अस्तित्वगत अकेलेपन को अलग-अलग रूपों में खोजते हैं, और मार्सेल प्रूस्त समय, स्मृति, प्रेम और विस्मृति के वृत्तों में निरंतर विचरण करते हैं. इन लेखकों की महानता इस बात में नहीं है कि उन्होंने बहुत सारे विषय अपनाए, बल्कि इस बात में है कि उन्होंने सीमित विषयगत वृत्तों को असाधारण अर्थ-विस्तार प्रदान किया.
प्रोफ़ेसर ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य पर विचार करते हुए ‘मृत्यु’ को एक केंद्रीय शब्द के रूप में नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. लेकिन वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि उनके यहाँ मृत्यु बार-बार क्यों आती है, असली प्रश्न यह है कि हर बार मृत्यु किस नए अर्थ-रूप में हमारे सामने आती है. कोई लेखक मृत्यु को विषय बना सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी प्रत्येक रचना में मृत्यु का अर्थ एक ही होगा. ख़ालिद जावेद के यहाँ मृत्यु कभी जैविक अंत है, कभी आत्मबोध का रूपक, कभी धार्मिक भय, कभी अस्तित्वगत निरर्थकता, कभी सभ्यतागत पतन और कभी आध्यात्मिक-अतींद्रिय संभावना. इस दृष्टि से ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य में मृत्यु एक स्थिर विषय अवश्य है, लेकिन उसका अर्थ स्थिर नहीं है.
“मौत की किताब” में मृत्यु जीवन के बाहर घटित होने वाली कोई अमूर्त घटना नहीं, बल्कि मानव चेतना के भीतर निरंतर उपस्थित वास्तविकता है. मृत्यु का बोध मनुष्य को अपने अस्तित्व, अपनी पहचान, अपनी इच्छा और अपनी सीमाओं के बारे में सोचने के लिए विवश करता है. यहाँ मृत्यु एक अंत से अधिक एक प्रश्न बन जाती है. मनुष्य कौन है? उसकी शारीरिक उपस्थिति का क्या अर्थ है? अपनी मृत्युशीलता के ज्ञान के साथ वह किस प्रकार जीवित रहता है? यही प्रश्न “मौत की किताब” को केवल मृत्यु के विषय पर लिखी गई पुस्तक बनने से बचाते हैं. यहाँ मृत्यु एक अस्तित्वगत दृष्टिकोण में बदल जाती है.
ख़ालिद जावेद की विशेषता यह है कि वे मृत्यु को महज़ दार्शनिक समस्या नहीं बनाते. वे उसे शरीर, इंद्रियों, भय, अकेलेपन और रोज़मर्रा के मानवीय अनुभव के भीतर उतार देते हैं. यही कारण है कि उनके यहाँ मृत्यु पर विचार केवल अमूर्त दर्शन नहीं रह जाता, बल्कि वह एक शारीरिक और संवेदनात्मक अनुभव में बदल जाता है.
“नेमत ख़ाना” में ख़ालिद जावेद की सृजनात्मक चेतना एक अलग दिशा ग्रहण करती है. यहाँ भूख केवल भोजन की आवश्यकता नहीं रह जाती, बल्कि वह मानव अस्तित्व की मूलभूत बेचैनी का प्रतीक बन जाती है. भूख शरीर से शुरू होती है, लेकिन शरीर पर समाप्त नहीं होती. वह इच्छा बन जाती है, वंचना बन जाती है, वर्गगत अनुभव बन जाती है, सामाजिक असमानता का बोध उत्पन्न करती है और अंततः मनुष्य की अस्तित्वगत असुरक्षा से जुड़ जाती है. यहाँ शरीर ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य में एक बुनियादी माध्यम के रूप में सामने आता है. शरीर केवल वह वस्तु नहीं है जिसके माध्यम से मनुष्य दुनिया को महसूस करता है, बल्कि शरीर स्वयं दुनिया के साथ उसके संबंध का स्थल है.
इसलिए “मौत की किताब” और “नेमत ख़ाना” को अलग-अलग विषयगत खाँचों में रखना शायद उचित नहीं होगा. दोनों में एक ही बड़ी सृजनात्मक दुनिया के अलग-अलग पहलू दिखाई देते हैं. शरीर, भूख, इच्छा, यातना, अकेलापन और मृत्यु— ये सभी तत्व एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि गहराई से परस्पर जुड़े हुए हैं.
“इक्कीस एक सौ बाईस” इसी सृजनात्मक क्रम में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन उपस्थित करता है. यहाँ मृत्यु केवल जीवन के अंत का नाम नहीं रह जाती, बल्कि मृत्यु के बाद की संभावना में प्रवेश करती है. यही वह बिंदु है जहाँ ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य में एक नई आध्यात्मिक-अतींद्रिय परत उत्पन्न होती है. मृत्यु के बाद की यात्रा, नरक, दंड, मुक्ति, वापसी, प्रेम और मानव अस्तित्व की सार्थकता— ये सभी प्रश्न उपन्यास को ऐसे क्षेत्र में ले जाते हैं जहाँ धार्मिक कल्पना, अस्तित्ववादी चिंतन और साहित्यिक प्रतीक एक-दूसरे से संवाद करने लगते हैं.
यह परिवर्तन इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यहाँ ख़ालिद जावेद मृत्यु को दोबारा बयान नहीं कर रहे हैं, बल्कि मृत्यु के बाद की संभावना को अपने सृजनात्मक अनुभव का हिस्सा बना रहे हैं. यदि “मौत की किताब” में प्रश्न यह था कि मृत्यु के बोध के साथ मनुष्य अपने अस्तित्व को किस तरह समझता है, तो “इक्कीस एक सौ बाईस” में प्रश्न यह बन जाता है कि यदि मृत्यु अंत नहीं है, तो फिर मानव अस्तित्व की सार्थकता कहाँ स्थापित होती है? यह प्रश्न उपन्यास को एक नए वैचारिक क्षितिज में प्रवेश कराता है.
“इक्कीस एक सौ बाईस” में नरक की अवधारणा भी विशेष ध्यान की माँग करती है. यदि नरक को केवल धार्मिक आस्था की पारंपरिक अवधारणा के रूप में पढ़ा जाए, तो उपन्यास की सृजनात्मक जटिलता सीमित हो जाएगी. साहित्यिक पाठ में धार्मिक प्रतीक अपनी मूल अर्थवत्ता को बनाए रखते हुए नई अर्थ-परतें भी निर्मित कर सकता है. ख़ालिद जावेद के यहाँ नरक एक ऐसी सृजनात्मक जगह बन जाता है जहाँ दंड, अपराध, भय, अकेलापन, मुक्ति और मानवीय इच्छा एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं. यहाँ धार्मिक अवधारणा साहित्यिक प्रतीक में बदल जाती है. यही साहित्य की शक्ति है कि वह दर्शन या धर्म की किसी अवधारणा को केवल प्रस्तुत नहीं करता, बल्कि उसे मानवीय अनुभव में ढाल देता है. इस दृष्टि से “इक्कीस एक सौ बाईस” वास्तव में मृत्यु के माध्यम से मानव अस्तित्व की एक नई व्याख्या का प्रयास है.
“इक्कीस एक सौ बाईस” के कुछ अंशों में केंद्रीय पात्र की शारीरिक पीड़ा और उसकी रहस्यमय अवस्था से विज्ञान-कथा जैसा अनुभव भी उत्पन्न होता है. लेकिन इसे केवल विधागत वर्गीकरण के रूप में देखना शायद उचित नहीं होगा. विज्ञान-कथा सामान्यतः संभावित दुनिया की रचना के माध्यम से मानव अस्तित्व के बारे में प्रश्न उठाती है. ख़ालिद जावेद भी शारीरिक और चिकित्सकीय विवरणों के माध्यम से ऐसी असाधारण स्थिति निर्मित करते हैं जिसमें पाठक को अपने परिचित मानवीय अनुभव से बाहर निकलना पड़ता है. चिकित्सकीय शब्दावली, शरीर की संरचना, बीमारी और शारीरिक परिवर्तनों का विवरण उपन्यास के वातावरण को केवल अमूर्त या दार्शनिक बने रहने नहीं देता; वे उसे एक अत्यंत भौतिक धरातल पर स्थापित करते हैं.
हालाँकि यही बात कुछ पाठकों के लिए बाधा भी बन सकती है. जिस पाठक को चिकित्सा-विज्ञान का बुनियादी ज्ञान न हो, उसके लिए पाठ की कुछ परतें कठिन हो सकती हैं. लेकिन पाठ को कठिन पाना और उसे सृजनात्मक रूप से कमज़ोर मान लेना एक ही बात नहीं है. किसी पाठ की कठिनता तभी समस्या बनती है जब उस कठिनता का कोई सौंदर्यात्मक या अर्थगत औचित्य न हो. यदि कठिनता पाठ की आंतरिक तर्क-व्यवस्था का हिस्सा है, तो वह उसकी सृजनात्मक संरचना का अंग बन जाती है. यहाँ एक उद्धरण देखिए :
“यह सच है कि वह अपने गुर्दे के दर्द को अच्छी तरह पहचानता है. युवावस्था से ही. डॉक्टर ने कहा था कि गर्मी और पानी की कमी के कारण गुर्दे में पथरी बन गई है. एक नहीं, कई पथरियाँ बन गई हैं. वह एक्स-रे की रिपोर्ट देख रहा था. संभव है कि पथरियाँ पहले बनी हों और उनके टूटे हुए छोटे-छोटे कण गुर्दे के मांस और झिल्ली को भेदकर बाहर आ गए हों. इन कणों में यूरिक एसिड भी भरा हो सकता है. ये कण बाहर निकलकर रक्त में घूम रहे हैं, जिनकी वजह से शरीर का सारा रक्त गर्म और अम्लीय हो गया है. पत्थर के यही कण त्वचा पर कोढ़ से मिलते-जुलते घाव पैदा कर रहे हैं, लेकिन इसका उलटा भी हो सकता है. यानी त्वचा का यही विकार रक्त तक पहुँच रहा है और गुर्दों की सफ़ाई नहीं हो पा रही है, जिसके कारण वहाँ यूरिक एसिड, कैल्शियम और सोडियम इकट्ठा हो रहे हैं. इन्हीं से ये पथरियाँ बन रही हैं. ऑपरेशन तो अनिवार्य है.”
(उपन्यास : “इक्कीस एक सौ बाईस”, ख़ालिद जावेद, पृ. 99)
“इक्कीस एक सौ बाईस” के संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष प्रेम का है. ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य को अक्सर मृत्यु, शरीर, यातना और अँधेरे के संदर्भ में पढ़ा जाता है, लेकिन “इक्कीस एक सौ बाईस” में प्रेम की उपस्थिति उनकी सृजनात्मक दुनिया के एक अपेक्षाकृत भिन्न पक्ष को सामने लाती है. ‘वह’ और ‘लड़की’ का संबंध महज़ एक रोमानी घटना प्रतीत नहीं होता. इस संबंध के माध्यम से उपन्यास के अँधेरे अस्तित्वगत परिदृश्य में मानवीय जुड़ाव की एक संभावना उत्पन्न होती है. इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है नवजात शिशु के संदर्भ में उत्पन्न होने वाली तीव्र करुणा. यह करुणा महज़ भावनात्मक विस्तार नहीं है. यह ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य में एक नैतिक आयाम की ओर संकेत करती है. जहाँ मनुष्य अपनी मृत्यु, शारीरिक पीड़ा और अकेलेपन में घिरा हुआ है, वहाँ किसी दूसरे—विशेषकर एक मासूम और अनजान अस्तित्व— के लिए करुणा का जन्म लेना मनुष्य के भीतर मौजूद एक मूलभूत मानवीय संभावना को जीवित करता है. इस प्रकार यहाँ प्रेम मृत्यु का निषेध नहीं करता, बल्कि मृत्यु के बोध को एक मानवीय अर्थ प्रदान करता है.
प्रोफ़ेसर ख़ालिद जावेद के कला-साहित्य पर एक महत्त्वपूर्ण आपत्ति उनकी शैली को लेकर भी की जाती है. कुछ आलोचकों का मानना है कि उनकी अधिकांश रचनाओं में शैली की एकरूपता दिखाई देती है. उनके अनुसार “मौत की किताब” में जो शैली और अभिव्यक्ति दिखाई देती है, वही उनकी अन्य रचनाओं में भी किसी न किसी रूप में बनी रहती है; मानो प्रत्येक नई कृति में शैलीगत स्तर पर कोई बुनियादी परिवर्तन या नई दिशा सामने नहीं आती.
किसी लेखक से यह अपेक्षा करना कि वह अपनी प्रत्येक नई पुस्तक में अपनी शैली बदल दे, पहली दृष्टि में सृजनात्मक विविधता की इच्छा प्रतीत हो सकती है, लेकिन इस अपेक्षा में एक बुनियादी भ्रांति छिपी हुई है. शैली केवल अभिव्यक्ति की पद्धति नहीं है. शैली लेखक की देखने की शक्ति है. वह जिस तरह दुनिया को महसूस करता है, जिस तरह वस्तुओं को व्यवस्थित करता है, जिस तरह वाक्य बनाता है, जिस तरह मौन और विराम का इस्तेमाल करता है, जिस तरह रूपक निर्मित करता है और जिस तरह मानवीय चेतना की गति को भाषा में रूपांतरित करता है— इन सबका समुच्चय शैली बनता है. इसीलिए बड़े लेखक की शैली उसकी सृजनात्मक पहचान का मूलभूत हिस्सा होती है.
काम्यू को काम्यू बनाने में केवल निरर्थकता का विषय शामिल नहीं है, बल्कि उनकी गद्य-भाषा की विशिष्ट सादगी, ठंडापन और वैचारिक संयम भी शामिल हैं. प्रूस्त को प्रूस्त बनाने में केवल स्मृति का विषय नहीं, बल्कि उनका वाक्य, समय का प्रवाह और चेतना की जटिल संरचना भी शामिल है. उसी प्रकार ख़ालिद जावेद की पहचान केवल मृत्यु, शरीर या भूख के विषयों से नहीं बनती, बल्कि उनकी आंतरिक लय, रूपकीय सघनता, प्रतीकात्मक वातावरण, शारीरिक बारीकियों और चेतना की विशिष्ट गति भी उस पहचान का हिस्सा हैं.
हालाँकि यह कहना भी गलत होगा कि ख़ालिद जावेद की शैली एक ही जगह स्थिर है. यहाँ ‘शैली की पहचान’ और ‘शैली का परिवर्तन’ के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर स्थापित करना होगा. बड़ा लेखक अपनी शैली को छोड़ता नहीं, बल्कि उसका विस्तार करता है. शैली की मूल आवाज़ बनी रहती है, लेकिन उस आवाज़ के भीतर नए अनुभव निरंतर प्रवेश करते रहते हैं. यही सृजनात्मक विकास है. ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है. उनके वाक्यों का विशिष्ट वातावरण, रूपकीय सघनता और अँधेरा कल्पनात्मक परिदृश्य अपनी पहचान बनाए रखते हैं, लेकिन इन तत्वों के पारस्परिक संबंध हर रचना में बदलते रहते हैं.
इसलिए “इक्कीस एक सौ बाईस” को “मौत की किताब” की पुनरावृत्ति कहना उतना ही अपर्याप्त होगा, जितना किसी चित्रकार की नई पेंटिंग को केवल इसलिए ख़ारिज कर देना कि उसमें पिछली पेंटिंग जैसे रंग मौजूद हैं. असली प्रश्न यह है कि उन रंगों से इस बार कौन-सी नई दुनिया निर्मित की गई है.
ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य पर चर्चा करते हुए विश्व साहित्य की परंपरा के साथ उनके संबंध को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. उनकी रचनाओं में काम्यू, काफ़्का, लौतरेआमों या दूसरे पश्चिमी लेखकों की कुछ वैचारिक और शैलीगत प्रतिध्वनियाँ महसूस की जा सकती हैं, लेकिन प्रभाव, समानता और अनुकरण को एक ही चीज़ मान लेना आलोचनात्मक स्तर पर उचित नहीं है. हर बड़ा लेखक किसी न किसी परंपरा के साथ संवाद करता है. साहित्य में पूर्ण मौलिकता की अवधारणा भी शायद एक मिथक है. मौलिकता वास्तव में पूर्ववर्ती परंपरा के साथ एक नए संबंध से उत्पन्न होती है.
ख़ालिद जावेद भी वैश्विक आधुनिकता, अस्तित्ववाद और पश्चिमी कथा-साहित्य की कुछ परंपराओं के साथ संवाद करते हैं, लेकिन उनकी सृजनात्मक दुनिया अपनी सांस्कृतिक भूमि से कटी हुई नहीं है. उनके यहाँ भारतीय उपमहाद्वीप की धार्मिक संवेदना, सांस्कृतिक स्मृति, सामाजिक संरचना, शरीर के संबंध में विशिष्ट सांस्कृतिक धारणाएँ, भूख, गरीबी, पाप, भय और मृत्यु के अनुभव मिलकर ऐसा वातावरण निर्मित करते हैं, जो उन्हें केवल किसी पश्चिमी लेखक की हिंदी/उर्दू छाया बन जाने से रोकता है. यही कारण है कि ख़ालिद जावेद को पढ़ते हुए पश्चिमी साहित्यिक समानताओं को महसूस करना संभव है, लेकिन उन्हें पश्चिमी लेखकों की श्रेणी में रख देना उचित नहीं होगा.
ख़ालिद जावेद के कथा-साहित्य का फ़्रांसीसी दुनिया में पहुँचना भी इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना है. “मौत की किताब” का फ़्रांसीसी अनुवाद Le Livre de la Mort इस प्रश्न को और महत्त्वपूर्ण बना देता है कि ख़ालिद जावेद की सृजनात्मक पहचान किन तत्वों से निर्मित होती है. अनुवाद केवल भाषा का परिवर्तन नहीं है; यह किसी लेखक की सृजनात्मक संरचना को दूसरी भाषा में पुनः निर्मित करने की प्रक्रिया है. और ख़ालिद जावेद जैसे लेखक के मामले में यह काम इसलिए कठिन है कि उनकी गद्य-भाषा की प्रभावशीलता केवल अर्थ में नहीं, बल्कि वाक्य-संरचना, रूपक, ध्वन्यात्मक लय, विवरणों और सांस्कृतिक संदर्भों के पारस्परिक संबंध में भी निहित है.
यदि अनुवाद इन तत्वों में से किसी मूलभूत तत्व को खो देता है, तो पाठ का बाहरी अर्थ भले ही दूसरी भाषा में पहुँच जाए, उसकी सृजनात्मक आत्मा प्रभावित हो सकती है. इसलिए ख़ालिद जावेद का फ़्रांसीसी अनुवाद केवल अंतरभाषिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि उनकी शैली की परीक्षा भी है. और यही परीक्षा इस बात को स्पष्ट करती है कि उनकी शैली उनके विषय से अलग कोई बाहरी परिधान नहीं है, बल्कि वह स्वयं उनके विषय के निर्माण में सहभागी है.
“मौत की किताब” की फ़्रांसीसी अनुवादक रोज़िन एलिस वीयुई इस बात को स्वीकार करती हैं कि ख़ालिद जावेद की शैली और वैचारिक आयामों को दूसरी भाषा में स्थानांतरित करना आसान नहीं है. अपनी भूमिका में उन्होंने उन तमाम भाषिक, सांस्कृतिक और शैलीगत जटिलताओं की ओर संकेत किया है, जिन्होंने अनुवाद की प्रक्रिया को कठिन बना दिया. वे लिखती हैं:
“मौत की किताब” का अनुवाद करना एक सुखद अनुभव होने के साथ-साथ मेरे लिए एक चुनौती भी रहा. ख़ालिद जावेद की गद्य-भाषा में एक विशिष्ट काव्यात्मक गुण है, जो मुख्यतः मौलिक बिंबों और रूपकों के माध्यम से निर्मित होता है. उन्हीं विचारों को फ़्रांसीसी में व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्द खोजने की कठिनाई के अतिरिक्त एक दूसरी, अधिक तकनीकी कठिनाई भी सामने आती है. मूल पाठ अत्यंत लंबे, बिना विराम-चिह्न वाले वाक्यों से बना है. इससे उत्पन्न प्रभाव उस कथावाचक के आंतरिक एकालाप के बिल्कुल अनुकूल है, जिसकी मानसिक अवस्था अस्थिर प्रतीत होती है. हालाँकि शीघ्र ही यह स्पष्ट हो गया कि फ़्रांसीसी में उसी वाक्य-विन्यास को ठीक उसी रूप में बनाए रखना संभव नहीं था. मैंने विराम-चिह्नों का प्रयोग किया, साथ ही जहाँ तक संभव हुआ, वाक्यों की लंबाई को बनाए रखने अथवा कम-से-कम कथन की लय और उसकी साँस को सुरक्षित रखने का प्रयास किया.”
इस उद्धरण से इतना तो स्पष्ट हो जाता है कि ख़ालिद जावेद की मौलिकता केवल विषयगत स्तर पर नहीं है, बल्कि उनकी वास्तविक पहचान विषय और शैली के उस जटिल सम्मिलन से निर्मित होती है, जहाँ दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं रहते. ख़ालिद जावेद के यहाँ मृत्यु, अकेलापन, शरीर, भय, पागलपन, यौनिकता, बीमारी, गंदगी या मानव अस्तित्व की निरर्थकता महज़ ‘विषय’ नहीं हैं, जिन्हें किसी दूसरी शैली के माध्यम से भी उसी तरह व्यक्त किया जा सके. ये सभी उनके विशिष्ट सृजनात्मक बोध में प्रवेश करके एक खास अभिव्यक्ति का रूप ग्रहण करते हैं.
इसीलिए उनके उपन्यासों को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि यहाँ विषय शैली में विलीन हो गया है और शैली विषय की आंतरिक तर्क-व्यवस्था का हिस्सा बन गई है. “मौत की किताब”, “नेमत ख़ाना”, “एक ख़ंजर पानी में”, “अरसलान और बहज़ाद” और फिर “इक्कीस एक सौ बाईस” में ख़ालिद जावेद के यहाँ मानव अस्तित्व के अँधेरे, विरोधाभासी और कभी-कभी असहनीय अनुभव जिस तरह भाषा में प्रकट होते हैं, वे किसी बाहरी साहित्यिक फ़ॉर्मूले का परिणाम नहीं, बल्कि उनके अपने विशिष्ट सृजनात्मक बोध की उपज हैं.
वास्तव में किसी बड़े सृजनकर्ता से उसकी शैली छोड़ने की माँग केवल एक कलात्मक माँग नहीं होती; यह उसकी सृजनात्मक पहचान की बुनियादी संरचना को बदलने की माँग होती है. शैली केवल शब्दों के इस्तेमाल का तरीका नहीं, बल्कि दुनिया को देखने का एक विशिष्ट दृष्टिकोण है. हर बड़ा लेखक अपनी शैली के माध्यम से यथार्थ की एक नई व्यवस्था निर्मित करता है; वह केवल यह नहीं बताता कि दुनिया कैसी है, बल्कि यह भी निर्धारित करता है कि उसे किस प्रकार देखा, महसूस और समझा जाए.
ख़ालिद जावेद की भाषा भी इसी अर्थ में केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है, बल्कि उनकी वैचारिक और अस्तित्वगत अंतर्दृष्टि का हिस्सा है. उनके यहाँ भाषा की बेचैनी, विवरणों की सघनता, शारीरिक और संवेदनात्मक अनुभवों की तीव्रता, कभी-कभी भयावह दृश्य-रचना और जानबूझकर निर्मित घुटन—ये सब मिलकर उसी दुनिया का सौंदर्यशास्त्र निर्मित करते हैं जिसमें उनके पात्र साँस लेते हैं. यदि इस शैली को केवल बदलने के लिए कहा जाए, तो वास्तव में उनसे वह दृष्टिकोण छीनने का प्रयास होगा जिसके माध्यम से वे अपनी दुनिया की खोज करते हैं.
यहाँ एक बुनियादी प्रश्न भी उठता है : क्या सृजनकर्ता अपनी शैली का स्वामी होता है, या शैली स्वयं सृजनकर्ता को निर्मित करती है? बड़े लेखकों के मामले में शायद इन दोनों संभावनाओं को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता. एक अवस्था के बाद शैली केवल लेखक की इच्छा का उपकरण नहीं रह जाती, बल्कि उसके सृजनात्मक व्यक्तित्व की पहचान बन जाती है. इसलिए ख़ालिद जावेद से यह कहना कि वे अपनी शैली बदल लें, किसी चित्रकार से यह कहने के समान है कि वह दुनिया को अपनी आँखों से नहीं, बल्कि किसी दूसरे की आँखों से देखे. यदि वे ऐसा कर भी लें, तो संभव है कि एक नया पाठ अस्तित्व में आ जाए, लेकिन उस पाठ में वह ख़ालिद जावेद शेष न रहें, जिन्हें हम उनके उपन्यासों के माध्यम से पहचानते हैं.
ख़ालिद जावेद के मामले में इस बिंदु का महत्त्व इसलिए और बढ़ जाता है कि उनका उपन्यास अपने पाठक को केवल एक कहानी सुनाने के बजाय मानव अस्तित्व की उन परतों तक ले जाता है जहाँ सुंदरता और कुरूपता, जीवन और मृत्यु, आनंद और यातना, शरीर और आत्मा, चेतना और अवचेतन एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं. उनकी शैली की तीव्रता इसी जटिल अस्तित्वगत अनुभव का भाषिक रूप है. इसलिए उनके साहित्य से यह अपेक्षा करना कि वे अपनी शैली को किसी प्रचलित रुचि के अनुरूप ढाल दें, वास्तव में उस सृजनात्मक बेचैनी को समाप्त करने का प्रयास होगा जो उनके साहित्य को दूसरों से अलग करती है.
महान साहित्य का मूल्य हमेशा इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वह हमें कितना सुकून देता है; कई बार उसकी महानता इसी में होती है कि वह हमारे सुकून को भंग करता है और हमें ऐसी वास्तविकता के सामने खड़ा कर देता है, जिससे हम रोज़मर्रा के जीवन में आँखें चुराते रहते हैं.
इसलिए ख़ालिद जावेद की सृजनात्मक पहचान को उनके विषय और शैली में बाँटकर देखना शायद बुनियादी रूप से ही गलत होगा. उनके यहाँ विषय शैली बन जाता है और शैली विषय का अर्थ-विस्तार. यही वह बिंदु है जहाँ उनकी मौलिकता केवल लेखन-पद्धति नहीं रह जाती, बल्कि एक पूर्ण सृजनात्मक दृष्टिकोण, एक विशिष्ट सौंदर्यबोध और एक अनूठे अस्तित्वगत विवेक में बदल जाती है. अतः ख़ालिद जावेद से अपनी शैली बदलने की माँग वास्तव में उनसे अपनी पहचान बदलने की माँग है; और किसी बड़े सृजनकर्ता से उसकी पहचान छीनकर उससे सृजनात्मक महानता की अपेक्षा करना एक बुनियादी साहित्यिक भ्रांति है.
“इक्कीस एक सौ बाईस” को किसी भी स्तर पर सृजनात्मक जड़ता का प्रतीक मानना मेरे विचार में उपन्यास के आंतरिक विकास की उपेक्षा करने के समान है. ख़ालिद जावेद ने अपने मूल विषयों के भीतर अपनी विशिष्ट शैली में नए अस्तित्वगत, सौंदर्यात्मक और वैचारिक आयाम निर्मित किए हैं. यही प्रत्येक बड़े कथा-लेखक की पहचान होती है. महान लेखक अपने विषय नहीं बदलते; वे अपने विषयों की अर्थवत्ता को निरंतर गहरा करते रहते हैं. ख़ालिद जावेद का नवीन उपन्यास इसी सृजनात्मक विकास का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है.
वास्तव में किसी लेखक की समस्त पुस्तकें एक ही महान पुस्तक के अलग-अलग अध्यायों की तरह होती हैं. यह बात जितनी मार्सेल प्रूस्त के लिए सही है, उतनी ही प्रोफ़ेसर ख़ालिद जावेद और अन्य महान सृजनकर्ताओं के लिए भी. इसलिए ख़ालिद जावेद के नवीन उपन्यास के बारे में यह प्रश्न करना उचित नहीं कि क्या इस बार भी ख़ालिद जावेद ने वही सब कुछ लिखा है जो वे पहले लिख चुके हैं? इसके बजाय प्रश्न यह होना चाहिए कि “मौत की पाँचवीं किताब” में वे कितनी नई अँधेरी दिशाएँ, कितनी नई रोशनियाँ और कितने नए अर्थ खोजने में सफल हुए हैं?
यह प्रश्न हमें पुनरावृत्ति के निर्णय से निकालकर सृजन की प्रक्रिया तक ले जाता है. और शायद ख़ालिद जावेद को समझने का सही रास्ता भी यही है.
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एम-70E, अबुल फ़ज़ल एन्क्लेव, जामिया नगर, |

मुहम्मद रैहान उर्दू, हिंदी और फ़्रांसीसी साहित्य के अध्येता, अनुवादक एवं शोधकर्ता हैं. उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पीएच.डी. की है. उनके शोध का विषय फ़्रांसीसी साहित्य के उर्दू अनुवाद से संबंधित रहा है. वे पेरिस स्थित इनाल्को में उर्दू का अध्यापन कर चुके हैं. उनके प्रमुख अकादमिक रुचि-क्षेत्रों में अनुवाद-अध्ययन, तुलनात्मक साहित्य तथा अंतर्सांस्कृतिक साहित्यिक संवाद शामिल हैं. वर्तमान में वे स्वतंत्र अनुवादक के रूप में कार्यरत हैं तथा साहित्यिक अनुवाद और शोध के क्षेत्र में सक्रिय हैं.


समृद्ध आलेख जो बार बार पढ़े जाने की माँग करता है और पाठक को रचना की ओर ले जाता है.बधाई अरुण देव जी और मोहम्मद रैहान जी को.
‘इक्कीस एक सौ बाइस’ : एक आलोचनात्मक समीक्षा
समालोचन पर प्रकाशित ‘इक्कीस एक सौ बाइस’ शीर्षक लेख समकालीन अनुभव, मृत्यु-बोध और भाषिक प्रयोगधर्मिता को केन्द्र में रखकर लिखा गया प्रतीत होता है। लेखक ने एक गंभीर विषय को वैचारिक तीव्रता के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, किन्तु रचना की भाषा, शीर्षक-चयन, हिन्दी व्याकरण, वर्तनी, अनुवादगत स्वाभाविकता तथा शैलीगत संतुलन के स्तर पर अनेक प्रश्न उभरते हैं। प्रस्तुत समीक्षा इन्हीं पक्षों का आलोचनात्मक परीक्षण करती है।
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1. शीर्षक-चयन : अर्थगर्भिता या अस्पष्टता?
‘इक्कीस एक सौ बाइस’ शीर्षक प्रथम दृष्टि में जिज्ञासा उत्पन्न करता है, परन्तु उसकी सांकेतिकता पाठक के लिए सहज रूप से खुलती नहीं। शीर्षक में संख्यात्मक संरचना होने के कारण पाठक किसी सांख्यिकीय, ऐतिहासिक या सांकेतिक अर्थ की अपेक्षा करता है, किन्तु लेख का भाव-जगत उससे प्रत्यक्ष सम्बन्ध स्थापित नहीं कर पाता। साहित्य में रहस्यमय शीर्षक स्वीकार्य हैं, परन्तु उनकी आन्तरिक अर्थ-संरचना पाठकीय अनुभव को दिशा देनी चाहिए। यहाँ शीर्षक और विषय-वस्तु के बीच अपेक्षित सेतु कमजोर प्रतीत होता है, जिसके कारण शीर्षक आकर्षक होते हुए भी पर्याप्त संप्रेषणीय नहीं बन पाता।
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2. हिन्दी व्याकरण की समस्याएँ
लेख में वाक्य-विन्यास कई स्थानों पर अनावश्यक रूप से जटिल हो जाता है। उपवाक्यों की अधिकता, क्रिया-रूपों की असंगति और लिंग-वचन के प्रयोग में ढील पाठकीय प्रवाह को बाधित करती है। कुछ वाक्य विचार के स्तर पर तो प्रभावशाली हैं, किन्तु व्याकरणिक कसावट के अभाव में उनका प्रभाव कम हो जाता है। हिन्दी गद्य की शक्ति उसकी स्पष्टता और लय में निहित होती है; जब वाक्य अत्यधिक बोझिल हो जाते हैं, तो वैचारिक तीक्ष्णता भी धुंधली पड़ने लगती है।
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3. वर्तनी और शब्द-प्रयोग
रचना में कुछ स्थानों पर वर्तनी सम्बन्धी असंगतियाँ दिखाई देती हैं। हिन्दी वर्तनी की एकरूपता—विशेषतः तत्सम शब्दों, संयुक्ताक्षरों तथा अनुस्वार/अनुनासिक के प्रयोग में—साहित्यिक लेखन की विश्वसनीयता बढ़ाती है। जब एक ही प्रकार के शब्द अलग-अलग रूपों में प्रयुक्त होते हैं, तो पाठक का ध्यान विषय से हटकर भाषा की त्रुटियों पर केन्द्रित होने लगता है। साथ ही, कुछ शब्द चयनित संदर्भ में अनावश्यक रूप से दुरूह लगते हैं, जिससे अभिव्यक्ति की स्वाभाविकता प्रभावित होती है।
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4. चर (Variables) और प्रतीकों की अधिकता
लेख में अमूर्त संकेतों, संख्याओं, प्रतीकों अथवा वैचारिक चर-रूपों का प्रयोग अपेक्षाकृत अधिक है। यह शैली बौद्धिकता का आभास अवश्य देती है, परन्तु अत्यधिक अमूर्तन पाठक को भावानुभूति से दूर कर सकता है। साहित्यिक पाठ में प्रतीक तभी प्रभावी होते हैं जब वे अनुभव को गहन बनाएं; यदि वे अर्थ को लगातार टालते रहें, तो पाठ संप्रेषणीयता खोने लगता है। यहाँ कई स्थानों पर प्रतीकात्मकता अर्थ-विस्तार के बजाय अर्थ-अस्पष्टता उत्पन्न करती प्रतीत होती है।
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5. मृत्यु-विषय का चयन : संवेदनशीलता बनाम प्रभावोत्पादन
मृत्यु साहित्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण और शाश्वत विषय है। समस्या विषय के चयन में नहीं, बल्कि उसके निर्वाह में है। लेख में मृत्यु को दार्शनिक और अस्तित्वगत संकट के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, किन्तु कुछ अंशों में भावात्मक गहराई की अपेक्षा वैचारिक प्रभावोत्पादन अधिक दिखाई देता है। मृत्यु पर लेखन में अनुभव की आन्तरिकता, मानवीय करुणा और आत्मिक संवाद आवश्यक होते हैं; यदि भाषा अत्यधिक बौद्धिक हो जाए, तो संवेदना की ऊष्मा कम हो जाती है।
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6. अनुवादगत प्रभाव और लक्ष्य-भाषा की स्वाभाविकता
लेख की भाषा कई स्थानों पर ऐसी प्रतीत होती है मानो किसी अन्य भाषा की संरचना का प्रभाव उसमें उपस्थित हो। वाक्य-क्रम, विशेषणों की स्थिति, अवधारणात्मक पदबंध और कुछ मुहावरे हिन्दी की स्वाभाविक अभिव्यक्ति से भिन्न लगते हैं। अनुवाद का मूल सिद्धान्त है कि लक्ष्य-भाषा में पाठ ‘अनूदित’ नहीं, ‘मूल’ जैसा लगे। यहाँ कई वाक्य अर्थ तो पहुँचा देते हैं, परन्तु वे सहज हिन्दी गद्य की लय नहीं प्राप्त कर पाते। इससे पाठक को भाषिक कृत्रिमता का अनुभव होता है।
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7. शैली और पठनीयता
लेख की शैली विचारप्रधान है, परन्तु सम्पादन के स्तर पर संक्षिप्तता और अनुच्छेद-विन्यास की आवश्यकता अनुभव होती है। लंबे अनुच्छेद, घनी अवधारणाएँ और सीमित विराम पाठकीय थकान उत्पन्न करते हैं। यदि लेखक जटिल विचारों को छोटे, संतुलित अनुच्छेदों में विभाजित करते, तो लेख अधिक प्रभावशाली और पठनीय बन सकता था।
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8. सकारात्मक पक्ष
आलोचनात्मक दृष्टि के साथ यह स्वीकार करना आवश्यक है कि लेखक में वैचारिक बेचैनी, प्रयोगधर्मिता और गंभीर विषयों पर सोचने का साहस उपस्थित है। मृत्यु, समय और अस्तित्व जैसे प्रश्नों को केन्द्र में लाना साहित्यिक संवेदनशीलता का संकेत है। रचना में कई बिम्ब और विचार पाठक को ठहरकर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। यही गुण इसे चर्चा योग्य बनाते हैं।
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निष्कर्ष
‘इक्कीस एक सौ बाइस’ एक महत्वाकांक्षी वैचारिक रचना है जो मृत्यु और अस्तित्व के प्रश्नों को सांकेतिक भाषा में व्यक्त करना चाहती है। किन्तु शीर्षक की अस्पष्टता, हिन्दी व्याकरण और वर्तनी की असंगतियाँ, प्रतीकों की अधिकता, अनुवादगत कृत्रिमता तथा शैलीगत बोझिलता इसके साहित्यिक प्रभाव को सीमित करती हैं। यदि भाषा को अधिक स्वाभाविक, व्याकरणिक रूप से सुसंगत और सम्पादित रूप में प्रस्तुत किया जाए, तो यही रचना कहीं अधिक प्रभावी, संवेदनात्मक और दीर्घकालिक पाठकीय प्रभाव उत्पन्न कर सकती है। आलोचना का उद्देश्य रचना को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उसकी सम्भावनाओं को अधिक परिपक्व रूप में देखने का आग्रह करना है।