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Home » सलमान रुश्दी से ग्रांटा के संपादक थॉमस मीनी की बातचीत : अनुवाद : प्रभात रंजन

सलमान रुश्दी से ग्रांटा के संपादक थॉमस मीनी की बातचीत : अनुवाद : प्रभात रंजन

by arun dev
June 27, 2026
in बातचीत
Reading Time: 13 mins read
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सलमान रुश्दी से ग्रांटा के संपादक थॉमस मीनी की बातचीत : अनुवाद : प्रभात रंजन
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सलमान रुश्दी से ग्रांटा के संपादक थॉमस मीनी की बातचीत
हिंदी अनुवाद : प्रभात रंजन

 

सलमान रुश्दी उन प्रमुख आरंभिक लेखकों में रहे, जिन्होंने ग्रांटा  के लिए लिखा, उस समय जब यह पत्रिका कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के एक ही कमरे से प्रकाशित होती थी. उनका इस पत्रिका से लंबा संबंध रहा है, और उन्होंने इसके पन्नों पर कथा, रिपोर्ताज, कविता, संस्मरण और साहित्यिक निबंध लिखे हैं.

इस वसंत में ग्रांटा  के संपादक ने मैनहैटन स्थित उनके निवास पर जाकर उनसे मुलाक़ात की. उन्होंने लगभग एक घंटे तक पत्रिका से उनके संबंधों, भारतीय कथा-साहित्य की दिशा और भारतीय राजनीति से उनके टकरावों पर बातचीत की. उनकी बातचीत का एक हिस्सा संपादक के फ़ोन पर रिकॉर्ड किया गया था, जिसे स्पष्टता देने के लिए हल्का-सा संपादित किया गया है.

 

 

II संपादक II
ग्रांटा के पहले संपादक  बिल बुफ़र्ड एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं. वे ट्रेन में आपके उपन्यास मिडनाइट्स चिल्ड्रेन का शुरुआती गैली-प्रूफ़ पढ़ रहे थे और आपसे मिले बिना, आपको जाने बिना ही उस किताब के प्रेम में पड़ गए. फिर उन्होंने उसमें से एक अंश आपकी अनुमति के बिना इस पत्रिका में प्रकाशित कर दिया.

II सलमान रुश्दी II
ग्रांटा 3 में.

II संपादक II
जी, ग्रांटा 3 में.

II सलमान रुश्दी II
मुझे इसका पता एक पार्टी में चला. जोनाथन केप प्रकाशन हर साल क्रिसमस के आसपास अपने लेखकों के लिए एक बहुत भव्य पार्टी दिया करते थे. उन दिनों वह और भी भव्य होती थी, क्योंकि उसमें किसी पत्रकार को नहीं बुलाया जाता था- सिर्फ लेखकों को बुलाया जाता था. यह दिसंबर 1980 की बात है. मिडनाइट्स चिल्ड्रेन  तब तक प्रकाशित नहीं हुई थी- लेकिन शायद उसका गैली-प्रूफ़ तैयार हो चुका था. मैं उस समय नया-नया लेखक था, जोनाथन केप की उस पार्टी में पहुँचा हुआ, और चारों ओर डोरिस लेसिंग, जॉन फाउल्स जैसे लेखक भी मौजूद थे. समकालीन लेखकों में मार्टिन (एमिस) भी वहाँ थे- मैं उनसे वहीं मिला. जिनका भी नाम लीजिए सारे लेखक वहाँ थे.

II संपादक II
क्या वहीं आपकी मार्टिन एमिस से पहली मुलाक़ात हुई थी?

II सलमान रुश्दी II
हाँ. लेकिन तभी बिल बुफ़र्ड आ पहुँचे. मैं उनसे पहले कभी नहीं मिला था. उन्होंने कहा, ‘मेरे पास आपको दिखाने के लिए कुछ है.‘ वे मुझे वहाँ बिल्डिंग के सामने ले गए, जहाँ उन्होंने अपना ब्रीफ़केस रखा था, और उसमें से ग्रांटा 3 की एक प्रति निकाल ली. बोले, ‘देखिए, इसमें मिडनाइट्स चिल्ड्रेन का पहला अध्याय है.‘

मैंने पूछा, ‘यह यहाँ कैसे आ गया?’

तब उन्होंने बताया कि उन्होंने केप के प्रकाशक टॉम मैशलर से अनुमति ली थी, और मैशलर ने ‘ओके’ कह दिया था. लेकिन मुझे किसी ने कुछ नहीं बताया था.

II संपादक II
आपने कुछ साइन नहीं किया था?

II सलमान रुश्दी II
नहीं. मैंने कहा, ‘आप जानते हैं, पारिश्रमिक का सवाल भी उठता है.‘

II संपादक II
वह कर्ज़ हम यहीं और अभी चुका सकते हैं.

II सलमान रुश्दी II
मुझे लगता है, बाद में उन्होंने मुझे लगभग चालीस पाउंड दिए थे.

II संपादक II
ऐसा लगता है कि आपने इसे बहुत सहजता से लिया.

II सलमान रुश्दी II
खैर, जो हो चुका था, सो हो चुका था. और सच कहूँ तो ग्रांटा 3 बहुत दिलचस्प अंक था. वहीं से पत्रिका ने अपनी लय पकड़नी शुरू की. एंजेला कार्टर, रसेल होबन और न जाने कितने अच्छे लेखक उस अंक में प्रकाशित थे. संगति बहुत उत्कृष्ट थी.

मुझे याद है, जब मिडनाइट्स चिल्ड्रेन  प्रकाशित हुई, तब ग्रांटा कैम्ब्रिज में एक आर्ट गैलरी के ऊपर के कमरे से निकलती थी. बिल ने मुझे वहाँ रचना पाठ करने के लिए बुलाया. वह मेरे जीवन का पहला रचना-पाठ था.

बिल और मैं तुरंत ही अच्छी तरह घुल-मिल गए. मुझे थोड़ी-सी झुँझलाहट ज़रूर हुई थी, क्योंकि मुझे लगा था कि यह सब कुछ बकवास है- मैशलर ने कभी यह पुष्टि नहीं की थी कि उन्होंने बिल को अनुमति दी थी, और न ही कोई लिखित सहमति थी, जबकि होनी चाहिए थी. लेकिन मैंने सोचा, चलो, जो है सो है- अच्छी ही बात है.

II संपादक II
बुफ़र्ड उस दौर में अपने आपको एक तरह का ‘हसलर’ बताते हैं- यानी जो हर तरह से काम निकाल ले. लेकिन एक लघु पत्रिका के लिए क्या यही ज़रूरी नहीं होता?

II सलमान रुश्दी II
हाँ. जैसे-जैसे मैं उनको जानता गया… ग्रांटा 1 के लिए उन्होंने हर जीवित महान अमेरिकी लेखक को पत्र लिख दिया था- “मुझे आपसे कुछ अच्छा चाहिए.” आश्चर्य की बात है कि उनमें से काफ़ी लोगों ने सचमुच उसे सामग्री भेज भी दी.

 

 

 

II संपादक II
ऐसा लगता है कि 1980 के दशक में आपके लेखन को देखने के कई तरीके हैं. एक यह कि ‘वे बंबई से आए हैं’ और बैकग्राउंड में सआदत हसन मंटो हैं. दूसरा तरीका- बेहतर शब्द न होने के कारण- ‘विश्व साहित्य’ का है, जैसे ‘यह भारत का यह गाब्रियल गार्सिया मार्केस है.‘ और एक तीसरा दृष्टिकोण भी है, कि आप लंदन में एक पीढ़ी का हिस्सा थे, जिनके इयान मैकइवान और मार्टिन एमिस से घनिष्ठ संबंध थे. आज आप उस पीढ़ी को कैसे देखते हैं?

II सलमान रुश्दी II
ये सभी दृष्टिकोण सही हैं. जहाँ तक ‘पीढ़ी’ वाली बात है, उस समय हर कोई हमें एक पीढ़ी के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा था.

II संपादक II
जिनमें ग्रांटा भी पीछे नहीं था.

II सलमान रुश्दी II
मार्टिन एमिस, इयान मैकइवान, जूलियन (बार्न्स), इश (काज़ुओ इशिगुरो) और एंजेला- हममें से कुछ एक-दूसरे से बहुत अच्छे से घुलते-मिलते थे. कुछ एक-दूसरे को ठीक से जानते भी नहीं थे. और कुछ तो एक-दूसरे के काम को पसंद भी नहीं करते थे. मुझे लगता है, हममें से हर एक ने हमें ‘एक पीढ़ी’ कहे जाने के विचार का प्रतिरोध किया. और हमारा कोई साझा ‘प्रोजेक्ट’ भी तो नहीं था, है कि नहीं? हम सब एक-दूसरे से बहुत भिन्न थे.

II संपादक II
लेकिन कुछ समानताएँ तो थीं. उदाहरण के लिए, उस समय के हर उपन्यासकार- या आपसे पहले और बाद की पीढ़ी के- ऐतिहासिक प्रश्नों से उसी तरह नहीं जूझ रहे थे, जैसे आप जूझ रहे थे. जबकि आपकी ‘पीढ़ी’ में- आप भारत के विभाजन को संबोधित कर रहे हैं. मैकइवान का एक प्रारंभिक उपन्यास जर्मनी और द्वितीय विश्वयुद्ध के संदर्भ में है. एमिस ने शुरुआत में ऐसा कम किया, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने भी नाज़ियों और स्तालिन जैसे विषयों को उठाया. इशिगुरो भी अपने उपन्यासों की पृष्ठभूमि में इतिहास को इसी तरह बरतते हैं.

II सलमान रुश्दी II
मैं एक ऐसे देश से आया था जो अभी-अभी जन्मा था. और उस समय साम्राज्य का विषय बहुत मौजू था. मेरा अंग्रेज़ी पब्लिक-स्कूल का एक बहुत बुरा अनुभव भी रहा, और फिर एक बहुत अच्छा अनुभव विश्वविद्यालय का. इसलिए मैंने इंग्लैंड को कठिन तरीके से सीखा.

II संपादक II
क्या आपने कभी इशिगुरो से इस बारे में बात की है कि आप दोनों के पास एक तरह की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि- है? वे बहुत कम उम्र में निकल गए थे, लेकिन फिर भी अपने लेखन में वे बार-बार उस ओर लौटते हैं, अलग-अलग तरीकों से.

II सलमान रुश्दी II
मैं उनकी ओर से बोलना नहीं चाहता. मुझे लगता है कि ‘जापान’ का विषय अब उनके लिए पहले जितना उपस्थित नहीं है. उनकी बाद की बड़ी सफल कृतियाँ, जैसे नेवर लेट मी गो (2005), वास्तव में मूल-उद्गम के प्रश्न से आगे बढ़ चुकी हैं. मैं उस तरह से अलग नहीं हो पाया हूँ. मेरे लिए ऐसा केंद्रीय पात्र गढ़ना लगभग असंभव है, जो भारतीय मूल का न हो.

II संपादक II
फिर भी, 1980 के दशक के उस शुरुआती क्षण में ऐसा लगता है कि आप अपने बचपन के खोए हुए भारत के प्रति एक तरह का प्रेम व्यक्त कर रहे हैं, या उसे अपनी स्मृति में पुनर्सृजित करने की कोशिश कर रहे हैं.

II सलमान रुश्दी II
जब मैंने मिडनाइट्स चिल्ड्रेन  लिखना शुरू किया- जो कि  1970 के दशक के मध्य की बात है- तब मुझे भारत छोड़े काफ़ी समय हो चुका था. और मेरे माता-पिता- कुछ निराशाजनक ढंग से- पाकिस्तान चले गए थे, जिसकी ओर मेरा कोई आकर्षण नहीं था. इसलिए मुझे यह चिंता सताने लगी थी कि मैं अपने मूल स्थान से संपर्क खो दूँगा, उससे दूर हो जाऊँगा. तब मैंने निश्चय किया कि मुझे एक ऐसी पुस्तक लिखनी चाहिए, जो उस खोई हुई भूमि को अपने लिए वापस पा सके. मैं हमेशा मिडनाइट्स चिल्ड्रेन को अपनी उस भूमि को पुनः प्राप्त करने वाली पुस्तक के रूप में देखता रहा हूँ.

II संपादक II
आपने ग्रांटा 11 (1984) में राज और उसकी प्रस्तुतियों पर एक मज़ेदार लेख लिखा था- मेरा ख़याल है, वही साल था जब पॉल स्कॉट के राज क्वार्टेट (1966–75) का टेलीविज़न रूपांतरण हुआ था. उस लेख से एक बात स्पष्ट होती है कि आप एक बड़ी इंडस्ट्री के सामने थे- जो ई. एम. फ़ॉर्स्टर से लेकर स्कॉट तक, फिर टीवी और पॉप संस्कृति तक फैला हुआ था. आपको एक बहुत बड़े पैमाने पर काम कर रही परंपरा से मुकाबला करना था.

II सलमान रुश्दी II
जब मैंने मिडनाइट्स चिल्ड्रेन पूरा किया, तो मुझे वास्तव में यक़ीन नहीं था कि कोई उसे प्रकाशित करना चाहेगा. वह बहुत लंबा था, एक अजीब-सी अंग्रेज़ी में लिखा गया था, उसमें लगभग कोई श्वेत पात्र नहीं था, और वह भारत के ब्रिटिश अनुभव के बारे में नहीं थी- जबकि लगभग सब कुछ उसी के बारे में हुआ करता था. बेशक ए पैसेज टू इंडिया (1924) थी, फिर हीट एंड डस्ट (1975) जैसी किताबें थीं- उसी तरह की रचनाएँ. उस पुस्तक को लिखना एक बड़ा जोखिम था, और खैर, लगता है कि वह जोखिम सफल रहा.

II संपादक II
मेरी पीढ़ी के लोग अक्सर भूल जाते हैं कि मिडनाइट्स चिल्ड्रेन का टकराव भारतीय राज्य से बहुत पहले हो चुका था- आयातुल्लाह ख़ुमैनी द्वारा द सैटेनिक वर्सेज़ (1988) पर फ़तवा जारी किए जाने से भी पहले.

 

IIसलमान रुश्दी II
इंदिरा गांधी ने मुझ पर मुक़दमा किया था. एक वाक्य को लेकर मुक़दमा हुआ, जिसमें मैंने उनके और संजय गांधी के संबंध के बारे में लिखा था. उन्हें यह पसंद नहीं आया, क्योंकि मैंने कहा था कि संजय अपने पिता की असमय मृत्यु के लिए उन्हें- उनके अलगाव के कारण- ज़िम्मेदार मानते थे. यह कहानी भारत में काफ़ी प्रसिद्ध थी; कई बार प्रकाशित हो चुकी थी. लेकिन उन्होंने उसी आधार पर मुझ पर मुक़दमा करने का फ़ैसला किया.

समस्या यह थी कि वह मुक़दमा तीन व्यक्तियों के बारे में था- जिनमें से दो मर चुके थे, और तीसरा मैं था जिस पर मुक़दमा कर रही थीं.

II संपादक II
उसका नतीजा क्या हुआ?

II सलमान रुश्दी II
उनकी हत्या हो गई. मृत व्यक्ति के लिए मानहानि का मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता. अंततः वह मुक़दमा बहुत आक्रामक नहीं था. वे बस इतना चाहती थीं कि हम वह वाक्य हटा दें- यहाँ तक कि पहले से छपी हुई प्रतियाँ वापस लेने की भी माँग नहीं थी. मैंने कहा था, ‘देखिए, अगर सचमुच हटाना पड़े, तो वह कोई बहुत महत्वपूर्ण वाक्य नहीं है, हम उसे निकाल देंगे- लेकिन फिर पुस्तक का पुनर्मुद्रण करना होगा.‘ पर तभी उनकी हत्या हो गई. बस.

II संपादक II
एक निर्णायक परिणाम. लेकिन उस मुक़दमे ने आपको दबाव में तो डाला ही होगा.

II सलमान रुश्दी II
भारत के प्रधानमंत्री द्वारा मुक़दमा किया जाना अपने-आप में भयावह था. वकीलों के साथ मेरी कुछ बहुत अजीब बातचीतें हुईं. टॉम मैशलर, मैं, और वकील- हम बैठते थे. मुझे याद है, जोनाथन केप प्रकाशन ने एक बहुत भारी-भरकम वकील रखा था. मैंने उससे पूछा, ‘तो हमारी बचाव-रणनीति क्या है?’

उसने कहा, ‘देखिए, किसी पर मानहानि का दोष सिद्ध होने के लिए यह ज़रूरी है कि जिस व्यक्ति की मानहानि हुई हो, वह ‘अच्छे चरित्र’ का व्यक्ति हो. तो अगर आप मुझे यह समझा सकें कि भारत के प्रधानमंत्री अच्छे चरित्र के व्यक्ति नहीं हैं, तो आप बच सकते हैं.‘

मैंने कहा, ‘अच्छा, तो इसका मतलब है कि हम अंग्रेज़ी अदालत में आपातकाल की सुनवाई कर सकते हैं.‘

टॉम मैशलर का चेहरा एकदम पीला पड़ गया.

II संपादक II
आपातकाल की सुनवाई- वह तो सचमुच असाधारण होता.

II सलमान रुश्दी II
हाँ. हालाँकि, साफ़ है, वह एक बेहद जोखिम भरा रास्ता होता. और प्रकाशक निश्चित ही उस राह पर जाने के लिए उत्सुक नहीं थे. लेकिन मुझे यह विचार रोमांचक लगा था- कि ऐसे न्यायाधीश, जिन्हें इंदिरा गांधी प्रभावित न कर सकें, आपातकाल की ज्यादतियों की जाँच कर रहे हों.

II संपादक II
लेकिन इससे एक और बात सामने आती है, जिसके बारे में मैं जिज्ञासु हूँ- यह कि भारत के संदर्भ में आप जैसे स्थायी रूप से विपक्ष में रहे हैं.

II सलमान रुश्दी II
मैं हमेशा ग़लत तरफ़ ही रहा हूँ. द सैटेनिक वर्सेज़ पर प्रतिबंध लगाने वाले व्यक्ति राजीव गांधी थे.

II संपादक II
आयातुल्लाह खुमैनी के फ़तवे से पहले.

II सलमान रुश्दी II
हाँ, फ़तवे से पहले. क्योंकि उन्हें कुछ मुस्लिम सांसदों के विरोध का सामना करना पड़ा था- ब्लॉक-वोट की राजनीति. और जब शेम (1983) प्रकाशित हुई, तो ज़िया-उल-हक़ के कारण वह पाकिस्तान में प्रतिबंधित कर दी गई. मेरा मतलब है, अगर आप एक ऐसा उपन्यास लिखेंगे जो एक पाकिस्तानी तानाशाह पर व्यंग्य करता हो, और संयोग से उस समय सत्ता में एक पाकिस्तानी तानाशाह मौजूद हो…

 

 

II संपादक II
जब आप मिडनाइट्स चिल्ड्रेन से पहले और बाद के भारतीय लेखन को देखते हैं, तो ऐसा लगता है कि उस उपन्यास ने अपनी एक अलग विधा बना दी, और बहुत-से- शायद बहुत ज़्यादा- भारतीय लेखक उसके प्रभाव में आ गए. और यह सब केवल अंग्रेज़ी में था. 1997 में आपने भारतीय लेखन के एक संकलन मिररवर्क की भूमिका लिखी. उसमें आपने- जो आज और भी अधिक विवादास्पद प्रतीत होता है- यह कहा कि भारत की देशज भाषाएँ रोचक हो सकती हैं, उनमें कहानियाँ अवश्य हैं, पर वे मूलतः प्रांतीय ही रहेंगी; असली हलचल भारतीय अंग्रेज़ी लेखन में है. यदि मुझे ठीक याद है, तो उस संकलन में एकमात्र देशज लेखक मंटो थे.

II सलमान रुश्दी II
मुझे उस पर बहुत मुसीबत झेलनी पड़ी.

II संपादक II
लेकिन मान लें कि आप सही थे. तब से क्या बदला है? क्योंकि अब तो स्थिति लगभग उलटी दिखती है. दिल्ली या मुंबई के प्रकाशकों से बात कीजिए- सब कुछ अनुवाद को लेकर है. ‘प्रामाणिकता’ की एक तरह की होड़ लगी है. पुरस्कार समितियाँ भी मानो उसी के वशीभूत हैं.

II सलमान रुश्दी II
मुझे लगता है, तीन बातें हुई हैं. पहली यह कि भारत का प्रकाशन उद्योग अब कहीं अधिक स्थापित हो गया है. उसका पैमाना पहले से कहीं बड़ा है.

दूसरी बात, हाँ- अब अनुवाद होने लगे हैं. भारत में एक बड़ी समस्या हमेशा यह रही कि भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद नहीं होते थे. अगर आप बांग्ला में लिख रहे थे, तो आपको हिंदी में कोई नहीं पढ़ पाता था- यहाँ तक कि टैगोर के साथ भी यही स्थिति थी. जो अनुवाद पहले उपलब्ध थे, वे अक्सर बहुत अच्छे नहीं होते थे. अब यह स्थिति काफ़ी सुधर गई है. लोग अब पहले की तरह केवल अपनी-अपनी भाषाई सीमाओं में क़ैद नहीं हैं- वे सीमाएँ पार कर सकते हैं, लगभग उसी तरह जैसे अंग्रेज़ी भाषा सीमाएँ पार करती है.

और तीसरी बात यह है कि अंग्रेज़ी में लेखन अब अनेक रूपों में फैल गया है; वह सिर्फ साहित्यिक उपन्यासों तक सीमित नहीं रहा. अब पल्प फ़िक्शन है, रोमांटिक फ़िक्शन है, इरॉटिक फ़िक्शन है- यानी प्रकाशन का परिदृश्य कहीं अधिक व्यापक हो गया है, जो एक स्वस्थ संकेत है.

मुझे लगता है, आज भारत में लिखना शुरू करने वाले युवा लेखक शायद वैसा महसूस न करें जैसा मैंने किया था- कि मैं वहाँ से शुरुआत ही नहीं कर सकता, क्योंकि वहाँ कोई साहित्यिक संसार ही नहीं था. अब वहाँ एक जीवंत साहित्यिक दुनिया मौजूद है.

II संपादक II
तो क्या आपको लगता है कि आज कोलकाता में बांग्ला में लिखने वाले लेखक के पास, मान लीजिए, गुजराती में अनूदित होने की बेहतर संभावना है?

II सलमान रुश्दी II
वही तो अब भी समस्या है- क्षेत्रीय भाषाओं के बीच अनुवाद. और अंग्रेज़ी से भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी. लेकिन यह हो रहा है. आप जानते हैं, बहुत समय तक मेरी कोई भी रचना हिंदी में प्रकाशित नहीं हुई थी. लेकिन अब मैं कई भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होता हूँ- मलयालम, हिंदी, बांग्ला, मराठी आदि. इसलिए यह सब एक बहुत स्वस्थ विकास है.

मुझे लगता है कि मिडनाइट्स चिल्ड्रेन  ने सचमुच कुछ ऐसा किया, जिसे आप दरवाज़ा लात मारकर खोल देना कह सकते हैं. उसने भारतीय अंग्रेज़ी लेखकों को यह विश्वास दिया कि उनकी आवाज़ सुनी जा सकती है, कि उन्हें पश्चिमी लेखन की नकल करने की ज़रूरत नहीं है. वे अपनी स्वयं की आवाज़ खोज सकते हैं.

II संपादक II
तो आपका मतलब है कि भले ही वह अंग्रेज़ी में लिखी गई थी, फिर भी उसने ऐसे कई दरवाज़े खोल दिए जिनकी कड़ी हमें आज यहाँ तक ले आई है- जहाँ कोई लेखक भारतीय देशज भाषा में लिखकर भी अंतरराष्ट्रीय पाठक-वर्ग पा सकता है? आपने अपनी भूमिका में यह भी कहा था कि सिनेमा की कहानी बिल्कुल अलग थी- माध्यम के कारण. एक निर्देशक जैसे सत्यजीत रे अपनी ही शर्तों पर, अपनी ही भाषा में, एक विराट हस्ती बन सकते थे.

II सलमान रुश्दी II
लेकिन भारत में उनके साथ अच्छा बर्ताव नहीं हुआ. बॉलीवुड के लोगों को वे पसंद नहीं थे. पश्चिमी दर्शकों के लिए भारत की ‘नकारात्मक छवियाँ’ प्रस्तुत करने के आरोप में कई बड़े सितारों ने उनकी आलोचना की.  भारत की सबसे बड़ी फ़िल्म स्टार में से एक नरगिस दत्त जो ‘मदर इंडिया’(1957) की नायिका थीं, ने भी उन पर हमला किया. उन्होंने कहा, ‘वे भारत की सकारात्मक उपलब्धियों- जैसे बाँधों के निर्माण- पर फ़िल्में क्यों नहीं बनाते?’

II संपादक II
बाँधों पर सत्यजीत रे की फ़िल्म- मैं तो वह देखना चाहूँगा.

II सलमान रुश्दी II
जब सत्यजीत रे ने अपने जीवन में एक बार हिंदी बाज़ार में प्रवेश करने की कोशिश की- अपनी फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी(1977) के साथ, जो हिंदी में और हिंदी फ़िल्म सितारों को लेकर बनाई गई थी- तो बंबई फ़िल्म उद्योग ने उसके वितरण को रोकने की भरपूर कोशिश की. और कुछ हद तक सफल भी रहे. हालाँकि यह फ़िल्म उनके दर्शक-वर्ग को व्यापक बनाने के लिए बनाई गई थी, लेकिन उसे लगभग ऐसा करने से रोक ही दिया गया था.

II संपादक II
ऐसा लगता है कि देशज भाषाओं को विडंबनापूर्ण ढंग से मोदी युग में कुछ लाभ भी मिला है- क्योंकि जितना दिल्ली हिंदी के प्रसार का समर्थन करती है, उतना ही अन्य राज्यों में स्थानीय भाषाएँ संगठित रूप से उसका प्रतिवाद करती हैं.

II सलमान रुश्दी II
और इससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में जगह भी ज़्यादा मिल रही है. हाल ही में इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार दो ऐसी भारतीय कृतियों को मिला है जो मूलतः अंग्रेज़ी में नहीं थीं—Tomb of Sand (गीतांजलि श्री; हिंदी से अंग्रेज़ी अनुवाद: डेज़ी रॉकवेल, 2021) और Heart Lamp (बानू मुश्ताक; कन्नड़ से अंग्रेज़ी अनुवाद: दीपा भास्‍थी, 2025).

ऐसी बात 1980 के दशक की शुरुआत में बिल्कुल असंभव थी.

 

 

II संपादक II आप और वी एस नायपॉल- दोनों ही कथा और गैर-कथा में भारतीय अनुभव के व्याख्याकार रहे हैं. लेकिन विशेषकर इतिहास-बोध के स्तर पर आप दोनों एक-दूसरे से काफ़ी दूर दिखाई देते हैं.

II सलमान रुश्दी II
जब मैं विक्ट्री सिटी(2023) लिख रहा था, तो जिन बातों के विरुद्ध लिख रहा था, उनमें एक वी एक नायपॉल द्वारा विजयनगर साम्राज्य का चित्रण भी था- जहाँ वे मूलतः इसे इस सूत्र में बाँध देते हैं: ‘मुसलमान बुरे; हिंदू अच्छे’. उनके यहाँ मुस्लिम सेनाओं द्वारा विजयनगर का विनाश एक आहत सभ्यता का रूपक बन जाता है.

जबकि यदि आप उस काल के इतिहास को देखें, तो स्थिति ऐसी नहीं थी. वास्तव में मुस्लिम सल्तनतों और विजयनगर साम्राज्य के बीच संबंध कहीं अधिक अंतर्संबद्ध थे. आपसी विवाह हो रहे थे. विजयनगर की सेना में मुस्लिम सेनापति थे तो गोलकुंडा की सेनाओं में हिंदू सेनापति भी थे. मामला धर्म का नहीं था. वह सत्ता का प्रश्न था- क्षेत्रीय प्रभुत्व और नियंत्रण का प्रश्न.

हिंदुत्व के लोग भी विजयनगर को एक रूपक की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं. और मुझे लगा कि इस प्रवृत्ति को उलटना ज़रूरी है. हर कोई भारत के इतिहास को फिर से लिखने में लगा है- और अक्सर उसे इस तरह लिखना चाहता है कि उसमें मुस्लिम योगदान को कमतर दिखाया जाए और गैर-मुस्लिम योगदान को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाए.

नायपॉल के बारे में एक अजीब बात यह थी कि जब वे पहली बार भारत आए- जब भारत राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से कहीं बेहतर स्थिति में था- उन्हें वह बिल्कुल पसंद नहीं आया. और जैसे-जैसे भारत अधिक ‘हिंदू’ होता गया, वे उसके साथ अधिक सहमत होते गए.

II संपादक II
इंडिया: अ मिलियन म्यूटिनीज़ नाउ (1990) में तो ऐसा लगता है कि वे त्रिनिदाद में अपने बचपन के हिंदू धर्म- एक तरह के प्रोटेस्टेंटीकृत, मूलतावादी रूप- से फिर जुड़ रहे हैं.

II सलमान रुश्दी II
विदिया और मैं- बहुत कम बातों पर सहमत होते थे. हम एक-दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते भी नहीं थे; शायद पाँच-छह बार ही मिले होंगे. लेकिन यह भी एक अजीब बात है- मैं राजनीतिक रूप से लगभग हर बात पर उनसे असहमत था, फिर भी मुझे उन्हें पढ़ना अच्छा लगता है.

 

 

II संपादक II
आपकी लेखकीय यात्रा में जो ‘ग्रांटा-शैली’ की रिपोर्ताज कही जा सकती है, उसका सबसे गहरा उदाहरण आपकी निकारागुआ पर लिखी किताब The Jaguar Smile (1987) है.

II सलमान रुश्दी II
हाँ, वह 1986 की बात है. मैं द सैटेनिक वर्सेज़ लिख रहा था और बीच में अटक गया था. उस किताब में कुछ ऐसी समस्याएँ थीं, जिनसे मैं समझ नहीं पा रहा था कि कैसे निपटूँ. तभी मुझे (सांदिनीस्ता एसोसिएशन ऑफ़ कल्चरल वर्कर्स की ओर से) मानागुआ जाने का निमंत्रण मिला. मैंने सोचा, अपने ही दिमाग़ में उलझे रहने से बेहतर है कि बाहर निकलूँ और उन लोगों को देखूँ जिनकी समस्याएँ सचमुच ठोस और वास्तविक हैं. इस तरह वह किताब बीच में आ गई. मुझे उसे लिखना पड़ा, और फिर वापस द सैटेनिक वर्सेज़  पर लौटना पड़ा. वह मेरे द्वारा किया गया एकमात्र सचमुच व्यापक और कठोर पत्रकारिता-कार्य है.

II संपादक II
आपको वह बहुत तेज़ी से लिखनी पड़ी होगी.

II सलमान रुश्दी II
बहुत तेज़, बहुत तेज़. क्योंकि मुझे लगा- आप जानते हैं, वहाँ युद्ध चल रहा है. और अगर उस पर लिखना है, तो अभी लिखना होगा. और सच कहूँ तो, नॉप्फ़ में मेरे संपादक सॉनी मेहता अद्भुत थे- उन्होंने कहा, “ठीक है, हम इसे तुरंत प्रकाशित करेंगे.” निकारागुआ से लौटने के कुछ ही महीनों बाद वह किताब आ गई. उसका एक हिस्सा ग्रांटा में भी छपा- वह अध्याय, ‘प्रेम के अंडे खाने’ वाला.

 

 

II संपादक II
इस ग्रांटा अंक के लिए, जो भारत पर है, मैं 1980 और 1990 के दशक का भारतीय साहित्य पढ़ रहा था. वहाँ विक्रम सेठ जैसे लेखक हैं, जिन्हें आज पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो वे आपके प्रत्युत्तर में, या कम-से-कम आपके जवाब में लिख रहे हों. ए सूटेबल बॉय (1993) कुछ ऐसा प्रतीत होता है- ‘आइए, बिल्कुल उल्टी दिशा में जाएँ, पूरी ताक़त से यथार्थवाद की ओर.‘ वह एक धैर्यपूर्ण, स्नेहपूर्ण और बारीक विवरणों से भरा चित्रण है- उस कुछ हद तक साधारण, प्रांतीय, उत्तर भारतीय मध्यवर्ग का.

II सलमान रुश्दी II
हाँ, वह सचमुच विपरीत दिशा में जाना था- लेकिन शायद वही अच्छी बात थी.

II संपादक II
विक्रम सेठ की The Golden Gate समय के साथ और भी बेहतर लगने लगती है. वह कितनी मोहक और असामान्य कृति है.

II सलमान रुश्दी II
यूजीन वनिगिन के छंद-विधान का इस्तेमाल करना…

II संपादक II
वह तो सचमुच विलक्षण और अद्भुत है.

II सलमान रुश्दी II
मैंने उसे बहुत समय से फिर नहीं देखा है, लेकिन मुझे याद है कि वह मुझे सचमुच बहुत पसंद आई थी. और लद्दाख पर उनकी किताब From Heaven Lake भी मुझे अच्छी लगती है.

और अब देखिए- आज की स्थिति में तो वहाँ फिर युद्ध की आशंका मंडरा रही है.

II संपादक II
उँगलियाँ फिर से ट्रिगर पर हैं.

II सलमान रुश्दी II
अभी हाल में पहलगाम में एक आतंकवादी हमला हुआ- कश्मीर का वह सुंदर पहाड़ी गाँव. बचपन में हम छुट्टियाँ मनाने कश्मीर जाया करते थे, इसलिए मैंने अपनी ज़िंदगी का काफ़ी हिस्सा वहाँ बिताया है.

पहलगाम के ठीक बाहर एक पर्वतीय घास का मैदान है- ऊँचाई पर बसा हुआ वह अद्भुत, मनोहारी मैदान, जिसे बैसरन कहते हैं. वहीं वे पर्यटक थे; वहीं जिहादियों ने आकर उन्हें मार डाला.

मैं बचपन में उसी मैदान में खेला करता था- और अब वह जगह ऐसी बन गई है जहाँ लोगों की हत्या कर दी जाती है.

II संपादक II
आप आख़िरी बार कश्मीर कब गए थे?

II सलमान रुश्दी II
बहुत समय हो गया—शायद 1980 के दशक में. अब, दुर्भाग्य से, इस्लामी कट्टरपंथ वगैरह के कारण वहाँ जाना मेरे लिए ठीक नहीं होगा.

II संपादक II
आपको तो एक बॉडीगार्ड की ज़रूरत पड़ेगी, है न?

II सलमान रुश्दी II
कश्मीर में भारतीय सेना का व्यवहार वैसे ही बहुत ख़राब माना जाता है; मैं उस तरह की सुरक्षा-व्यवस्था नहीं चाहता. लेकिन अगर मैं वह नहीं चाहता, तो दूसरी ओर लोग भी बुरा व्यवहार करते हैं. मेरा परिवार कश्मीरी है. यह सचमुच एक क्षति है- एक निजी और गहरी क्षति.

(Granta 173: India, Autumn 2025 से आभार के साथ अनूदित )

 

प्रभात रंजन
(जन्म 3 नवम्बर, 1970,  सीतामढ़ी, बिहार)


तीन कहानी संग्रह और एक उपन्यास ‘कोठागोई तथा ‘हिंदी मीडियम टाइट’ पुस्तक प्रकाशित. अंग्रेज़ी से हिन्दी में 25 से अधिक पुस्तकों का अनुवाद. ‘सहारा समय कथा सम्मान’, ‘प्रेमचंद कथा सम्मान’, ‘कृष्ण बलदेव फेलोशिप’, ‘द्वारका प्रसाद अग्रवाल उदीयमान लेखक पुरस्कार’ से सम्मानित.
जानकीपुल नामक प्रसिद्ध वेबसाइट के  संपादक हैं.
prabhatranja@gmail.com

 

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Comments 8

  1. RAMA SHANKER SINGH says:
    2 weeks ago

    आज सुबह सबसे पहले यही काम किया. सलमान रुश्दी मेरे प्रिय लेखक हैं. उनका फ़िक्शन और नॉन-फ़िक्शन दोनों कमाल का है. वे आश्चर्यजनक रूप से सच लिखते हैं और उसमें मानव-मन की कई सारी परतें उघाड़ देते हैं. इस प्रक्रिया में रुश्दी ऐतिहासिक परिघटनाओं का साथ निबाहते हैं.
    उनका यह इंटरव्यू उनके कथा साहित्य की बुनावट पर ज्यादा केंद्रित है लेकिन उसमें, बीच-बीच में, हमारे साहित्यिक एवं राजनीतिक समय पर दिलचस्प टिप्पणियाँ हैं. इस सबको उपलब्ध कराने के लिए प्रभात रंजन जी का धन्यवाद.

    Reply
  2. Jitendra Jeetu says:
    2 weeks ago

    जानकारीप्रद। शुभकामनाएं!

    Reply
  3. YOGESH SHARMA says:
    2 weeks ago

    बढ़िया

    Reply
  4. रोहिणी अग्रवाल says:
    2 weeks ago

    सलमान रुश्दी को पढ़ना भारतीय राजनीतिक-सांस्कृतिक विरासत की भीतरी परतों में उतरना है।
    यह यात्रा वे किसी एक विचारधारा के साथ नहीं करते, बल्कि अपने शरीर को ढीला छोड़ देते हैं। फिर विश्लेषणात्मक विवेक को कस कर पकड़ते हैं तो भारतीयता की जड़ें मिट्टी में गहरे उतरते-उतरते समकलीन वैश्विक संस्कृति से संवाद करने लगती हैं। वैचारिक उदारता और पूर्वाग्रहरहित मानसिकता उन्हें वाइब्रेंट बनाती है। एक किस्म की बेखौफ ढीठ ईमानदारी देती है कि समय के पार देखना जितना जरूरी है, उतना ही अनिवार्य है मनुष्य के आर-पार देखना।
    मनुष्य भी तो समय, समाज और सत्ता की तरह सामाजिक-राजनीतिक कंस्ट्रक्ट है न! हत्या के असफल प्रयास के बाद जब वे “द नाइफ” नाम से मेमायर लिखते हैं, तब आत्म और अनात्म, वैयक्तिक और वैश्विक के बीच वैचारिक आवाजाही करते हुए बेहद तरल, बेहद सघन गद्य रचते हैं।
    प्रस्तुत इंटरव्यू एक छोटी सी खिड़की है, पर भारतीयता के सत्व पर गहरी टिप्पणी कर जाती है।
    पढ़ते हुए लगा ही नहीं कि अनुवाद पढ़ रही हूं। प्रभात रंजन मूल लय को अनुवाद में उतारने वाले शिल्पी ही नहीं, रचनाओं के चयन में भी सजग हैं। मार्खेज़ के इंटरव्यू पर आधारित लेख का अनुवाद भी स्तरीय रहा।
    समालोचन का शुक्रिया। कालजयी रचनाएँ समय की नब्ज पर उंगली रखने की तमीज़ देती हैं।

    Reply
  5. पवन करण says:
    2 weeks ago

    अच्छी और सहज बातचीत है। लेखक होने का कोई अहंकार नहीं है।

    Reply
  6. Shivmurti Kathakar says:
    2 weeks ago

    पूरा पढ़ा.बहुत अच्छा अनुवाद किया है आपने.मूल पाठ का आस्वाद देने वाला.बहुत बहुत धन्यवाद.

    Reply
  7. Rajendra JOSHI says:
    2 weeks ago

    सलमान रुश्दी का यह इंटरव्यू पढ़कर मन में एक तरह की स्पष्टता और ठहराव सा आता है। वे साहित्य को किसी एक लेखक की निजी जीत या अकेले की मेहनत की तरह नहीं देखते, बल्कि उसे एक जीवित, साझा और लगातार बनती हुई प्रक्रिया की तरह समझते हैं। Granta से अपने शुरुआती दिनों की यादें इस बात को और गहरा कर देती हैं कि बड़े साहित्यिक बदलाव अक्सर बहुत साधारण जगहों से शुरू होते हैं—एक छोटा-सा कमरा, कुछ संपादक, और नए लेखन के लिए जगह देने का साहस।

    उनकी बातों से यह महसूस होता है कि लेखन उनके लिए सिर्फ खुद को व्यक्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि एक बड़ी साहित्यिक दुनिया में शामिल होने और उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी है। वे बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि लेखक अकेला नहीं होता—उसके साथ संपादक, अनुवादक और प्रकाशक भी उसी रचना की यात्रा में बराबर के साथी हैं। यह सोच साहित्य को व्यक्तिगत उपलब्धि से निकालकर एक साझा प्रयास बना देती है।

    भारतीय साहित्य को लेकर उनका दृष्टिकोण उम्मीद जगाने वाला है। वे इसे किसी एक भाषा या एक परंपरा तक सीमित नहीं करते। उनके अनुसार यह कई भाषाओं, अनुभवों और परंपराओं के बीच चलने वाला संवाद है। इस नजरिए से साहित्य एक बंद दायरे की चीज नहीं रह जाती, बल्कि एक खुली, बहती हुई दुनिया बन जाती है, जहाँ हर भाषा अपनी जगह पाती है।

    पूरा इंटरव्यू यह एहसास कराता है कि रुश्दी के लिए साहित्य सिर्फ किताबों का संसार नहीं है, बल्कि रिश्तों, संवादों और साझी कोशिशों का एक बड़ा नेटवर्क है। लेखक यहाँ केंद्र में जरूर है, लेकिन वह अकेला नहीं चलता—उसके साथ पूरा एक तंत्र चलता है, जो लेखन को जीवित रखता है।

    इस पूरे पाठ को पढ़ने के बाद जो भावना बचती है, वह यह है कि साहित्य अपने सबसे अच्छे रूप में एक सामूहिक यात्रा है—जहाँ हर आवाज़ किसी न किसी दूसरी आवाज़ से जुड़ी होती है, और वहीं से असली अर्थ पैदा होता है।

    प्रभात रंजन जी को इतने सहज और सटीक अनुवाद के लिए और अरुण देव जी को इसे समालोचन में जगह देने के लिए दिल से धन्यवाद।

    Reply
  8. सुनील सक्सेना says:
    2 weeks ago

    वाकई लात मारकर दरवाजा खोलना जरूरी है. हमारे आसपास कितना कुछ है लिखने के लिए. उम्दा अनुवाद. बधाई प्रभात जी

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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