पीर घनेरी
(लीलाधर मंडलोई की आपबीती – ‘जब से आँख खुली है’)
अनूप सेठी
लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा ‘जब से आँख खुली है’ से पहले मधु कांकरिया की ‘ढाका डायरी’ पढ़ी थी. यह डायरी हमारे पड़ोसी मुल्क की हाल की राजनीतिक सामाजिक दुर्दशा का लगभग आँखों देखा हाल है; बेचैनी भरा. पुस्तक पढ़ने के बाद बनी इस बेचैन मन: स्थिति के बाद लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा के दो पन्ने पढ़ने पर ही मानो ठंडा पानी सर पर पड़ गया.
पहला प्रसंग उनके अपने शिशु रूप का है. जाहिर है यह स्मृति बहन-भाई और माँ-पिता के जरिए बनी होगी. गुदड़ियों से बने झूले के ऊपर माँ की साड़ी लटका दी जाती और उसमें माँ की कुछ चूड़ियां बांध दी जातीं. हिलने पर चूड़ियों के खनकने से और साड़ी से माँ की उपस्थिति का आभास शिशु को हो जाता. इसी के आगोश में आने पर शिशु लीलाधर की रुलाई बंद होती थी. अन्यथा वह माँ के घर से बाहर जाने पर बहुत रोता था. यह जुगाड़ बहुत मौलिक, मार्मिक और प्यार भरा है.
लीलाधर मंडलोई के संसार में माँ, पिता, दो भाई और एक बहन हैं. बाद में एक छोटा भाई और एक बहन भी शामिल होते हैं. छोटे भाई को सामान्य जीवन नहीं मिला और ज्यादा भी नहीं मिला. यह कचोट लीलाधर के मन में है. बचपन के दोस्त भी लीलाधर के जीवन में हैं. जीवन कठिन और बीहड़ है, इतना कि आप सोच भी नहीं सकते. दुख और पीड़ा और अभाव भी उन्होंने मस्ती में जिए. जीवन के साथ यह संलग्नता गजब है. पुस्तक में कुल पैंसठ प्रसंग है. प्रसंग दर प्रसंग एक पूरा संसार खुलता चला जाता है. हालांकि ये प्रसंग बचपन से लेकर भोपाल में कॉलेज की पढ़ाई खत्म करने तक ही हैं. कॉलेज के और भोपाल के प्रसंग भी ज्यादा नहीं हैं. अधिकतर खदान के आसपास का बचपन का जीवन ही यहाँ है. कोयले की खदान में मजदूर परिवार का जीवन.
ये वर्णन पाठक को रुलाते हैं, ताकत देते हैं, दृष्टि देते हैं, जीवन प्रेम से भर देते हैं. मानव मन की भीतरी परतों को खोलने से लेकर प्रकृति से प्रेम और सहजीवन की गाथाएं गाते चलते हैं.
कुछ साल पहले कवि शरद कोकास के ब्लॉग पर लीलाधर मंडलोई का एक छायाचित्र देखा था, जिसमें वह किसी घर के बरामदे में उकड़ूं यानी पैरों के भार बैठे हैं; उस मुद्रा में जिसे मल आसन कहते हैं. शहरी लोगों के लिए इस तरह पैरों पर बैठना आसान नहीं. मैं बचपन में इस तरह आसानी से बैठ लेता था. प्रायः बच्चे या जिनके कूल्हे के जोड़ लचीले हों वे, इस तरह बैठ लेते हैं. अभ्यास न रहने की वजह से ये जोड़ कड़े पड़ जाते हैं. मेरे लिए अब इस तरह बैठना संभव नहीं रहा है. वह चित्र देखकर मैं बहुत प्रभावित हुआ था कि मंडलोई जी इस तरह बैठ लेते हैं. क्योंकि तब मैं उन्हें आकाशवाणी के अपने वरिष्ठ अधिकारी के रूप में जानता था, जो बाद में दूरदर्शन के महानिदेशक भी बने. जब मैं उनके संपर्क में आया था, तब भी वे आकाशवाणी में शायद सहायक निदेशक के पद पर पहुंच गए थे. मैं कार्यक्रम निष्पादक था. एक उच्च अधिकारी इस तरह बैठ लेता है मेरे लिए यह खुशी और हैरानी की बात थी.
उनकी आत्मकथा को पढ़कर उनका इस तरह बैठ पा सकने का रहस्य खुल गया. उनके लिए कुछ भी असहज नहीं है. जिसने इतना कठिन जीवन जिया हो, वह किसी भी परिस्थिति में रह सकता है. उसका शरीर उसके वश में रह सकता है.

‘जब से आँख खुली है’ आत्मकथा को पढ़ते हुए लगा, हिमाचल के एक छोटे से गाँव में बीते मेरे बचपन में भी तो जीवन ऐसा ही था. पैरों में चप्पल है या नहीं फर्क नहीं पड़ता था. जंगल पार कर स्कूल जाना होता था. स्कूल में पेड़ के नीचे टाट-पट्टी पर बैठते थे. बाजार और शहर बहुत दूर था. घर में बिजली नहीं थी. पानी बावड़ी से भरकर लाया जाता था. सारा गांव शौच के लिए जंगल की तरफ जाता था. धीरे-धीरे समझ आया कि यह जीवन स्थितियां भले ही एक जैसी लग रही हों, लेकिन दोनों की जिंदगी में ज़मीन आसमान का अंतर है. इसमें समानता ढूंढ़ना मूर्खता है. जिस बचपन और जिस जीवन को मंडलोई जी याद कर रहे हैं, वह एक मजदूर बस्ती के बच्चे का जीवन है. वह भी कोयला खदान की मजदूर बस्ती का. यहाँ सब कुछ अस्थाई, अनिश्चित और तदर्थ है. रोज की मज़दूरी करोगे तो घर में चूल्हा जलेगा. घर के बड़ों को ही नहीं बाल बच्चों को भी पैसा कमाने की जुगत करनी होगी. मेरा बचपन तो इसके बिलकुल विपरीत था. हम अपने पक्के घर में थे. भोजन, कपड़े वगैरह की चिंता नहीं करनी पड़ती थी. बहुत समृद्धि नहीं थी पर अभाव भी नहीं था. यहाँ तो इस बालक के घर में न दीवारें थी न छत. बस किसी तरह वे झुपड़िया में रहते थे.
बेतरह परेशान कर देने वाले इन अभावों और असुविधाओं के बावजूद वे जीवन में सुख ढूंढ़ लेते थे. साथ में उन्हें जी तोड़ मेहनत करने की सीख मिल रही थी.
गजब बात यह है कि गरीबी और उससे जुड़ी तमाम दिक्कतों के बावजूद उस परिवार में सांस्कृतिक उजास थी. जीवन जीने की सुघड़ता थी. जो जैसा उपलब्ध है, उसमें से सौंदर्य और सुख का बिरवा उगा लेने का हुनर था. इस हुनर में मंडलोई जी की माँ की भूमिका सर्वोपरि है. न कुछ में से भी वे खाने, पहनने, ओढ़ने की चीजें बना लेने में और खुशी की लहर पैदा कर देने में माहिर थीं.
उनका परिवार एक विस्थापित परिवार था. उस दंपति ने अपने बूते पर गृहस्थी खड़ी की थी. पिछले जीवन यानी माँ के पीहर का सांस्कृतिक अवदान उनकी पूंजी थी. इस पूंजी को कोई छीन नहीं सकता था. बल्कि यह पूंजी उनके परिवार और संतति के लिए संजीवनी थी. वे चाहे थोड़े में गुजारा करने की जुगत हो, धीरे-धीरे गृहस्थी का सामान जोड़ने की दूर दृष्टि हो, लोरियों और लोकगीतों से मिल रही कला का संबल हो, कहावतों से दुनिया को समझने की अंतर्दृष्टि हो, जीवन में धंसी प्रकृति, वनस्पति की उपयोगिता की सीख हो. यह सब इन बच्चों को अपने माता-पिता से छतनार पेड़ की शीतल और जीवनदाई छाया की तरह मिलता रहा.
मंडलोई को अपने परिवार और मित्रों ने तो सिखाया ही, वहाँ के परिवेश ने भी उनकी मूल्य चेतना और दृष्टि का निर्माण किया. इसमें जंगल, वनस्पति, पशु, पक्षियों की भी भूमिका है. घर और बाहर के जीवन के अनुभवों से गुजरते हुए उनकी सौंदर्य चेतना भी जागृत हुई. उन्होंने दुख-तकलीफ और मेहनत के बीच रहते हुए सुंदर को पहचानना सीखा. उनके अलग-अलग कथा-प्रसंगों में रंगों, आकारों, ध्वनियों को पहचानने और उसके आस्वाद की कथाएं मिलती हैं. यह सब अधिकतर उन्हें प्रकृति से मिला. घर के पास जंगल था, खेत थे, पहाड़ था, नदी थी, और इस सब में प्रकृति अपनी सुरम्यता और बीहड़ता तथा विस्तीरणता और संपूर्णता में विद्यमान थी. मंडलोई की कलाओं की कक्षाएं इसी खुले प्रकृति-प्रांगण में लगीं. जिस तरह वे स्कूली शिक्षा में अव्वल आए, उसी तरह सौंदर्य संपन्न आस्वादक के रूप में भी वे प्रवीण हुए. ऐसा लगता है कि पीड़ा और प्रेम के इस मणिकांचन रसायन ने उनके साहित्यकार, कवि, कलाकार को गढ़ा है.
मंडलोई का परिवार प्रवासी मजदूरों की तरह झोपड़ी या झुपड़िया में रहने को मजबूर था. किन परिस्थितियों और विवशताओं के कारण वह अपना वतन और अपनी धरती और अपने लोगों को छोड़कर आया होगा, यह हमें पता नहीं चलता. यही दिखता है कि कोयले की खदान में उन लोगों ने अपना जीवन झोंक दिया.
इस विस्थापन या उखड़ेपन के बीच मंडलोई के माता-पिता का अतीत का ज्ञान, अनुभव और स्मृति इस परिवार को एक सांस्कृतिक जमीन मुहैया कराती है. हमें सहज ही यह गलतफहमी हो जा सकती है कि अगर कोई परिवार दिहाड़ीदार है, कच्चे अस्थाई घर में रहता है, आसपास कोई नाते-रिश्तेदार या बिरादरी नहीं है, तो वह सांस्कृतिक और सभ्याचार संबंधी मूल्यों की दृष्टि से भी विपन्न होगा. पर इस परिवार के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं था. पिता की भाषा और उनके मुहावरों कहावतों से उनकी जड़ों का अंदाज लग जाता है. और माता ने इस बीहड़ और उजाड़ जगह में जिस कौशल, धीरज और दूर दृष्टि से जीवन के बिरवे को रोपा और परिवार की बगिया को हरा-भरा, कठोर-कर्मठ और संजीव-सुंदर बनाया, वह उनकी स्मृति, परवरिश के बिना संभव ही नहीं था. ऐसा लगता है कि माता के परिवार ने अपनी बेटी को जीने के कुछ अनिवार्य सूत्र सहज ही सिखा दिए थे. वे दोनों ही अपने अतीत का न बखान करते हैं न गुणगान करते हैं. निरे वर्तमान के बोझ से दबे हुए प्रतीत होते हैं. पर इस बोझ को ढोने की सामर्थ्य वे अपने अतीत से पाते हैं.
आत्मकथा के इस खंड में मंडलोई ने अपने माता-पिता के अतीत के बारे में रोशनी नहीं डाली है. पर हमें ऐसे जुझारू दम्पति के बचपन को जानने की इच्छा होती है. एक ही प्रसंग मेरे ध्यान में आता है, जब बारिश होती है और माता भाग कर खेत में जा खड़ी होती हैं, भीगती रहती हैं. और वे अपने बचपन में पहुंच जाती हैं कि किस तरह वे बारिश में मिट्टी की सोंधी खुशबू में रम जाया करती थीं. पता नहीं किस वजह से यह प्यारी जोड़ी अपने घर से बिछुड़ जाती है और विंध्य की पहाड़ियों में पहाड़ खोदू कोयला खदानों के शिकंजे में फंस जाती है. और यह दुश्चक्र ऐसा है कि एक बार कोई व्यक्ति इस खोह में कदम धर दे तो फिर बाहर का रास्ता मिलना आसान नहीं है.
लीलाधर मंडलोई को पता नहीं कितनी मेहनत करनी पड़ी होगी कि वे उस चंगुल से छूटे. खुद पढ़-लिखकर जीवन की नई इबारत लिखी और अपने परिजनों को भी वहाँ से उबारा.
मेरे लिए इस पुस्तक को पढ़ना आसान नहीं था. बार-बार मैं अपने बचपन में चला जाता था और खुद को समझाता था कि भाई तेरे जीवन से इस जीवन का कोई साम्य नहीं है. उन अनुभवों को उसी रूप में देखो और महसूस करो. और मैं ठिठक जाता.
अनेक अवसर ऐसे आए जब किसी प्रसंग विशेष को पढ़कर रुकना पड़ जाता था. सतत पढ़ना संभव नहीं होता. जीवन की सघनता तो उसके पीछे है ही, मंडलोई जी का उन अनुभवों को भाषा में बदलना, उनकी सच्चाई, उनकी कोमलता, सांद्रता, संगीत, रंग, चित्रात्मकता- ये सब ठहरने पर मजबूर कर देते हैं कि जो पढ़ा उसे भीतर जज्ब होने दो, उसमें रमे रहो. यह पुस्तक हमारे भीतर कुछ रासायनिक प्रक्रिया कर देती है. शायद लिखे हुए को अनुभव करना यही होता होगा.
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| अनूप सेठी (10 जून, 1958) के दो कविता संग्रह ‘चौबारे पर एकालाप’ और ‘जगत में मेला’, अनुवाद की पुस्तक ‘नोम चॉम्स्की सत्ता के सामने’ दो मूल और एक अनूदित नाटक प्रकाशित हैं. कुछ रचनाओं के मराठी और पंजाबी में अनुवाद भी हुए हैं. मुंबई में रहते हैं. anupsethi@gmail.com |




“ जब से आँख खुली है”
लीलाधर मंडलोई जी की आत्मकथा पर वरिष्ठ कवि अनूप सेठी जी की समीक्षा से शुरू हुई आज १७ अप्रेल की सुबह अपनी खिड़की के बाहर शहर की कभी न रुकने वाली गति के बीच अपने एकांत में यह समीक्षा पढ़ी ।जैसे अनूप जी अपने बचपन की ओर लौटे वैसे मैं भी अपने बचपन की ओर लौटा पर फिर इस समीक्षा के भूगोल में कभी हिमाचल तो कभी मध्यप्रदेश में ठहरा रहा ।शरद कोकस के कैमरे से ली गई मंडलोई जी की तस्वीर जिसने वे अपने पैरों पर ही बैठे हैं उकडू। पैरों में चप्पल है सामने एक लंबा सफ़र तय कर चुकी परिपक्व साइकिल है ।यह दृश्य मंडलोई जी के आत्मविश्वास का प्रखर संकेत है। इसमें अभाव का रोना नहीं बल्कि संभावनाओं से चहलकदमी करना दिखता है।आज की झेंजी पीढ़ी इस तरह के बचपन की कल्पना भी नहीं कर सकती कि बीना बिजली के भी एक समूची पीढ़ी ने अपना जीवन जिया है।
जल्द ही यह आत्मकथा पढ़ने का मन है ।
लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा पर अनूप सेठी जी ने बहुत डूब कर गहरी सलंग्नता के साथ अपनी टिप्पणी लिखी है। व्यक्तित्व के कुछ आधारभूत तत्व परिवेश और परिस्थितियों से किस तरह आकार पाते हैं इसका एक आस्वाद परक विश्लेषण इस छोटी सी टिप्पणी में खूब उभर कर आया है। धरती ,प्रकृति ,परिवेश , कौटुंबिक संबंध,श्रम , आजीविका संघर्ष और राग के बीच जीवन का मर्म कहां एक रहस्य की तरह छिपा रहता है यह मंडलोई की इस आत्मकथा में शब्द शब्द में व्याप्त है । अनूप जी ने इसे बहुत बढ़िया तरीके से इसे रेखांकित किया है। कितना महत्वपूर्ण है यह सब की प्रतीति कि जीवन के अकथनीय संघर्ष, अभावों और वेदना के बीच भी प्रेम और कोमलता का लालित्य किसी बहुआयामी सच को निर्मित करता है और उसी में किसी निरंतरता का आंतरिक संसार बसा रहता है। अनूप सेठी की संवेदनशील दृष्टि ने इस पुस्तक से एक आत्मीय रिश्ता बनाया है। पुस्तक लेखक और टिप्पणी लेखक दोनों बधाई के पात्र हैं।
लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा पर इतनी गहराई से की गई चर्चा दिल को डुलाने वाली है। इस चर्चा को पढ़ने पर बचपन के कीच सने पांवों और बरसात में भीगते और जून की तपती धरती पर नंगे पांवों स्कूल जाने वाले दिन स्मरण हो आते हैं । चर्चा को पढ़ते हुए मंडलोई जी के संघर्षों भरी आत्मकथा को पढ़ने के लिए मन तड़प उठता है। ऐसी जीवन की दुर्दशा तो बहुतों की होगी परन्तु उनका संघर्षों से जूझ कर एक मुकाम को हासिल करने के जज़वे को सलाम है।
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सबसे पहले ध्यान इसी बात ने खींचा कि छिंदवाड़ा और दमुआ, यहाँ मेरा अक्सर आना-जाना होता है , मेरे मायके का इलाक़ा है। उनका उल्लेख आते ही यह संसार एकदम अपरिचित न रहकर भीतर कहीं जाना-पहचाना लगने लगता है। जैसे वर्णित जीवन की धूल, गंध और खुरदुरी बनावट पहले भी छुई हुई हो।
अनूप सेठी ने इसे लिखते हुए केवल घटनाओं का पुनर्पाठ नहीं किया, बल्कि संवेदनाओं की उन परतों को भी छुआ है जहाँ पाठक ठिठकता है। पर साथ ही वे कुछ जगहों पर जान-बूझकर विराम भी रखते हैं, मानो सब कुछ कह देना उनकी मंशा न हो। यह आंशिक उद्घाटन और सूक्ष्म गोपन ही उनकी टिप्पणी को एक अतिरिक्त विश्वसनीयता और गरिमा देता है। पाठक के भीतर पुस्तक को स्वयं पढ़कर उस अनकहे को खोज लेने की उत्सुकता जगाता है।
इस आत्मकथा से दो- तीन बातें पुनर्प्रमाणित होती हैं। पहली, सच में बहुत शक्ति है। मंडलोई जी ने निहायत सच बयान किया है। दूसरी, कि बचपन व्यक्तित्व की निर्मित का काफी- कुछ तय कर देता है। तीसरी, स्मृतियाँ आपके लिए किस कदर उत्प्रेरक हो सकती हैं। .. यहाँ इतना ही. . वैसे मैं ने भी इस आत्मकथा पर लिखा है।
अनूप सेठी जी ने बहुत सहज भाव से पुस्तक पर विस्तार से लिखा है। मंडलोई जी की यह आत्मकथा इन दिनों पढ़ी जा रही है लोग उसमें आज के लीलाधर मंडलोई को ढूंढ रहे हैं और महसूस कर रहे हैं कि मनुष्य किस तरह से संघर्ष करते हुए ही आगे बढ़ता है। अनूप जी ने यह बात सही कही है कि पुस्तक को पढ़ते हुए हम स्वयं अपने अतीत में खो जाते हैं, हम अपने जीवन से तुलना करते हैं यह भी एक सहज मानवीय स्वभाव है। अनूप जी ने जब मुझसे यह फोटोग्राफ मांगा था तो मुझे नहीं पता था कि वे इसका क्या उपयोग करने वाले हैं। 13 –14 वर्ष पूर्व मंडलोई जी जब भिलाई आए थे उस समय मैं उनके साथ भटकता रहता था (वैसे यह सिलसिला कॉलेज के समय से लेकर अब तक चल रहा है) उस समय साइकिल चलाते हुए वन एक जगह ठहर कर उकड़ू बैठ गए तब मैंने मोबाइल से उनकी यह तस्वीर ले ली। और भी बहुत सारी तस्वीरें हैं उनकी मेरे पास। अनूप जी ने बहुत अच्छा उपयोग इस तस्वीर का किया इसके लिए उनका धन्यवाद – शरद कोकास
इस किताब के कुछ संस्मरण पढ़े थे। एक महत्वपूर्ण और पठनीय रोचक किताब की अनूप सेठी जी ने बड़ी ही मार्मिक और सुंदर समीक्षा की है। जो सोचने के लिए मजबूर करती है। मेरा बचपन भी यहां मुंबई के उपनगर असल्फा में पत्थर की खदानों और उनसे निकले पत्थरों को पीसते क्रेशरों के बीच गुजरा है। खदान मजदूरों के जीवन को निकट से देखा है। मंडलोई जी की जीवन यात्रा अतुल्य और अनुकरणीय है। यह उनके साहित्य में भी झलकता है।