| जावेद-नामा जदीद अशअर नज्मी |
उर्दू के प्रसिद्ध शायर इक़बाल ने जब फ़ारसी में अपना शाहकार ‘जावेद नामा’ मुकम्मल किया, तो फ़रमाया था कि इस रचनात्मक मशक़्क़त ने उन्हें ‘निचोड़’ कर रख दिया है. वह तो ख़ैर स्वर्गलोक’ का एक सफ़र था जहाँ मौलाना रूम की आत्मा मार्गदर्शन कर रही थी और शायर विभिन्न सितारों पर इतिहास की नामवर हस्तियों से संवाद कर रहा था. लेकिन जब मैंने खालिद जावेद के पाँच उपन्यासों के इस गहरे अध्ययन का आग़ाज़ किया जिसे मैंने “जावेद नामा जदीद” का शीर्षक दिया है, तो मुझे भी अहसास हुआ कि मैं वैचारिक रूप से ‘निचुड़’ गया हूँ. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इक़बाल का सफ़र आसमानों की तरफ़ था और मेरा सफ़र उन ‘ज़मीनी क़ब्रिस्तानों’ और ‘पश्चिमी स्क्रीनों’ की ओर है जहाँ वैश्विक साहित्य और सिनेमा के शाहकार दफ़्न हैं, और जिनकी रूहें अब खालिद जावेद के उपन्यासों में उर्दू गद्य का लिबास ओढ़कर भटकती नज़र आती हैं. यह लेख असल में उसी ‘स्वर्गलोकीय ड्रामे’ का वह पोस्टमार्टम है जिसकी सर्जरी के दौरान मुझे रूमी के बजाय नेटफ्लिक्स और बोर्खेस के भूतों से रास्ता पूछना पड़ा.
साहित्य की दुनिया में प्रसिद्धि का घेरा कभी-कभी इतना चमकदार हो जाता है कि वह देखने और समझने की शक्ति, दोनों के लिए परदा बन जाता है. उर्दू फिक्शन के वर्तमान परिदृश्य में ख़ालिद जावेद का नाम अब किसी परिचय का मोहताज नहीं रहा. वे एक ऐसी ‘मायावी प्रतिमा’ बनकर उभरे हैं, जिनके एक हाथ में जे.सी.बी (JCB) पुरस्कार है और दूसरे में उर्दू-हिंदी पाठकों और आलोचकों के अलावा कुछ वैश्विक समीक्षकों की सराहना. उर्दू का वह समाज, जो कल तक उनकी विशेष ‘सड़ांध भरी शैली’ पर नाक-भौं सिकोड़ रहा था, आज उनकी चौखट पर नतमस्तक है— सिर्फ इसलिए कि अब उनकी कला पर ‘अंग्रेजी मुहर’ लग चुकी है. लेकिन क्या यह शोहरत केवल उनकी अनोखी कल्पना का फल है, या इसके पीछे वैश्विक विचारों का वह ‘खामोश आयात-निर्यात’ काम कर रहा है जिस तक उर्दू-हिन्दी पाठक की पहुँच न के बराबर है?
सच्ची बात तो यह है कि मैं खुद ख़ालिद जावेद का प्रशंसक रहा हूँ. मैंने उनकी कला को उस समय ‘अय्यूब का ग्रंथ’ (Book of Job) की अर्थपूर्ण गहराइयों में तलाशा जब उर्दू दुनिया उन्हें ‘अश्लीलता’ का प्रतिनिधि समझकर नकार रही थी. मैं भी उनकी शैली पर दिल और जान से फिदा हुआ और अपनी त्रैमासिक पत्रिका ‘इसबात’ के द्वारा उन्हें उर्दू के साहित्य जगत में एक उपन्यासकार के तौर पर परिचित कराने का काम किया, मगर आज जब मैं उनकी पूरी रचनात्मक यात्रा का एक बार फिर से, और इस बार एक ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ पाठक की हैसियत से अध्ययन करता हूँ, तो मेरी मासूमियत एक खौफनाक हैरानी में बदल जाती है.
इसे मानव मस्तिष्क का चमत्कारिक तालमेल कहा जाए या कुछ और, कि जिस अनोखे और अनूठे विचार को नील गेमन (Neil Gaiman) ने लंदन में बैठकर अपनी ग्राफिक फैंटेसी का हिस्सा बनाया, ठीक वही विचार ख़ालिद जावेद ने ‘बरेली’ की मिट्टी में आलती-पालती मारकर ‘खोज’ लिया! यह कैसा रचनात्मक संयोग है कि जर्मन सिनेमा के वे जटिल सिद्धांत जो नेटफ्लिक्स की सीरीज़ ‘डार्क’ (Dark) में पूरी दुनिया को हैरान कर चुके थे, ख़ालिद जावेद की नई कृति में उर्दू गद्य का चोला पहनकर प्रकट हुए? मैं तो हैरानी से गूंगा हुआ जा रहा हूँ कि एमिल ज़ोला से लेकर रॉबर्टो बोलानो तक, और पोलान्स्की की फिल्मों से लेकर नेटफ्लिक्स की सीरीज़ तक—विश्व साहित्य के ये तमाम ‘खज़ाने’ आखिर ख़ालिद जावेद के अचेतन मन में इस कदर ज्यों के त्यों कैसे चले गए?
लेकिन आगे बढ़ने से पहले मैं यहाँ एक गलतफहमी दूर कर देना ज़रूरी समझता हूँ कि मेरा यह अध्ययन किसी पर ‘साहित्यिक चोरी’ (plagiarism) का आरोप नहीं लगाता, क्योंकि यह एक बहुत ही मामूली और असाहित्यिक शब्द है. ख़ालिद जावेद एक रचनाकार हैं, उनसे ऐसी अनैतिक हरकत होने की कल्पना भी मैं नहीं कर सकता. मैं क्या, किसी को भी उनके ‘रचनात्मक’ होने पर कोई संदेह नहीं हो सकता. लेकिन यह भी एक सच है कि साहित्यिक दुनिया में ‘चोरी’ या ‘Plagiarism’ शब्द का इस्तेमाल आमतौर पर एक बहुत ही सीमित और मशीनी अर्थ में किया जाता रहा है. हमारे पुराने आलोचकों के अनुसार चोरी सिर्फ वही है जहाँ शब्द, वाक्य या अनुच्छेद बिल्कुल वैसे ही उतार लिए जाएं.
मिसाल के तौर पर, बरसों पहले मेरे उपन्यास “उसने कहा था” पर यह आरोप लगा था कि मैंने उसमें शामिल एक अध्याय के दो पैराग्राफ हूबहू लीना हाशिर इरशाद की एक फेसबुक पोस्ट से चुरा लिए. मेरा उपन्यास लगभग दो सौ पन्नों का था, और मुझ पर आरोप था कि मैंने दो पैराग्राफ चुरा लिए? यानि मुझसे बड़ा कोई और मूर्ख नहीं होगा कि सैकड़ों पन्ने लिखने के बाद मुझसे दो पैराग्राफ न लिखे गए और मैंने उन्हें चोरी करके हासिल किया. और इतना ही क्यों, 67 किताबें और लाखों शब्द लिखने के बाद मुझे इंतजार सिर्फ लीना इरशाद के दो पैराग्राफों का था कि वे कब लिखती हैं और कब मैं उन पर हाथ साफ करता हूँ. खैर, इस अपवाद को छोड़िए, यहाँ मेरा सवाल यह है कि क्या साहित्य सिर्फ लफ़्फ़ाज़ी का नाम है? क्या किसी रचना की ‘आत्मा’, उसका ‘वैचारिक ढांचा’ और उसका ‘मूल दर्शन’ उसकी संपत्ति नहीं होते? सच तो यह है कि शब्दों की चोरी तो कोई नया और अनाड़ी लेखक कर सकता है, लेकिन एक ‘बुद्धिमान रचनाकार’ कभी शब्दों की चोरी नहीं करता, वह ‘विचारों’ (Ideas) की तस्करी करता है. वह दूसरे के रचनात्मक महल का संगमरमर नहीं उखाड़ता, बल्कि उस पूरे महल का ‘आर्किटेक्चरल प्लान’ उड़ाकर उसे अपनी मिट्टी के गारे से खड़ा कर लेता है और फिर उसे अपनी ‘ओरिजिनैलिटी’ (मौलिकता) कहकर बेचता है.
पाश्चात्य आलोचना में इस प्रक्रिया को “Conceptual Plagiarism” (वैचारिक साहित्यिक चोरी) या “Architectural Appropriation” (वास्तुकला विनियोग) कहा जाता है. यहाँ पकड़ शब्दों पर नहीं बल्कि उस ‘क्रिएटिव डी.एन.ए.’ पर होती है जो किसी दूसरे की कल्पना से उधार लिया गया हो. इसकी एक प्रसिद्ध मिसाल उपन्यास “Life of Pi” के लेखक यान मार्टेल (Yann Martel) की है, जिन पर ब्राजीलियाई लेखक मुआसीर स्क्लेयर (Moacyr Scliar) के उपन्यास के मुख्य विचार (एक लड़का और एक चीता नाव में) को चुराने का आरोप लगा. मार्टेल ने शब्द नहीं चुराए थे, बल्कि उस ‘अनोखी स्थिति’ को चुराया था जो स्क्लेयर की रचना थी. इसी तरह डैन ब्राउन (Dan Brown) पर उनके उपन्यास “The Da Vinci Code” के बारे में यह आरोप लगा कि उन्होंने “The Holy Blood and the Holy Grail” के लेखकों के ऐतिहासिक और वैचारिक तर्कों को अपने फिक्शन का ढांचा बनाया. हालाँकि अदालत में यह मामला ‘शब्दों की समानता’ न होने के कारण खारिज हो गया, लेकिन वैश्विक साहित्यिक समुदाय में डैन ब्राउन की ‘रचनात्मक ईमानदारी’ हमेशा के लिए संदिग्ध हो गई.
ख़ालिद जावेद के मामले में मैं जिस ‘पोस्टमार्टम’ की शुरुआत कर रहा हूँ, वह इसी “वैचारिक आयात” की पहचान है. मेरा दावा यह बिल्कुल नहीं है कि उन्होंने किसी विदेशी उपन्यास का अनुवाद कर दिया है या शब्दों की चोरी की है, बल्कि मेरा सवाल यह है कि जब किसी उपन्यास की ‘मुख्य समय की अवधारणा’ (time concept), उसके ‘प्रमुख प्रतीक’ और उसका ‘मनोवैज्ञानिक पैटर्न’ किसी विश्वविख्यात रचना या नेटफ्लिक्स की सीरीज़ से पूरी तरह मिलते-जुलते हों, तो क्या उसे महज़ ‘संयोग’ कहकर अनदेखा किया जा सकता है?
टी.एस. इलियट ने कहा था कि “कच्चे कवि नक़ल करते हैं, परिपक्व कवि चोरी करते हैं; लेकिन वे चोरी किए हुए माल को कुछ बेहतर बना देते हैं या कम से कम उसे कुछ अलग ज़रूर कर देते हैं.” ख़ालिद जावेद के साथ समस्या यह है कि वे वैश्विक विचारों को ‘उर्दू की मिट्टी’ में लाते तो हैं, मगर उनके यहाँ वह ‘रचनात्मक परिवर्तन’ (Transformation) ग़ायब है जो एक अनुवादक और एक रचनाकार के बीच अंतर करता है. वे जिस तरह बोर्खेस के समय के भूल-भुलैया, नील गेमन की फैंटेसी और स्टीफन किंग की खौफनाक कहानियों को अपनी खास ‘घृणास्पद शैली’ में लपेटकर पेश करते हैं, वह असल में उस ‘होशियारी’ को छिपाने की एक कोशिश है जिसका मकसद उर्दू-हिन्दी पाठकों पर धाक जमाना है.
उत्तर-आधुनिकतावाद (Post-modernism) का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आप दूसरे के ‘रचनात्मक सार’ को अपना बनाकर पेश करें और स्रोत का नाम तक न लें. अंतर-पाठ्यता (Intertextuality) एक संवाद होता है, जबकि ख़ालिद जावेद के यहाँ यह एक ‘खामोश विलोपन’ (Silent Deletion) है जहाँ मूल रचनाकार का निशान मिटाने की सोची-समझी कोशिश की जाती है. मैं यहाँ खालिद जावेद पर पारंपरिक चोरी का आरोप बिल्कुल नहीं लगा रहा, बल्कि मैं उस ‘अनोखेपन’ का परदा फाश कर रहा हूँ जिसकी बुनियादें पाश्चात्य चिंतन से उधार लिए खंडहरों पर टिकी हैं.
आइए, अब बिना किसी लाग-लपेट के, श्रृद्धा के इन परदों को हटाते हैं और ख़ालिद जावेद के एक-एक उपन्यास की तुलना उन वैश्विक स्रोतों से करते हैं जहाँ से उनके विचारों की ‘आत्मा’ उधार ली गई है. यह सिर्फ एक तुलनात्मक अध्ययन नहीं है, बल्कि उर्दू फिक्शन की उस ‘नकली विद्वता’ का पोस्टमार्टम है जिसे पुरस्कारों की चमक-धमक ने ढक रखा है. हम एक-एक करके उनके पाँचों उपन्यासों को आलोचना की कसौटी पर रखेंगे और देखेंगे कि उनके रचनात्मक महल की ईंटें आखिर किस-किस वैश्विक इमारत से उखाड़ी गई हैं.

(1)
मौत की किताब
थॉमस बर्नहार्ड का ‘बरेली’ संस्करण
ख़ालिद जावेद के पहले उपन्यास “मौत की किताब” का अध्ययन करते समय पहला एहसास वैसा ही होता है जैसा किसी पुराने, जर्जर और बदबूदार तहख़ाने में कदम रखते हुए होता है. शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने इसकी तुलना “अय्यूब का ग्रंथ” (Book of Job) से की थी, जिस पर मेरी सादगी सिर्फ इतना ही कह सकती है कि फ़ारूक़ी साहब की दूरदर्शी नज़रों ने शायद इसमें वही ‘अय्यूब जैसा धैर्य’ तलाश कर लिया होगा, जिसकी ज़रूरत पाठक को इस भारी-भरकम और बेमतलब दोहराव को पढ़ने के लिए होती है.
अहमदाबाद में आर्किटेक्चर (वास्तुकला) की पढ़ाई और बरेली में दर्शनशास्त्र का शिक्षण— ये दो ऐसे संदर्भ हैं जो इस उपन्यास के ‘डीएनए’ (DNA) को समझने के लिए बुनियादी भूमिका निभाते हैं. ख़ालिद जावेद ने शब्दों से उपन्यास नहीं लिखा, बल्कि एक ऐसी इमारत खड़ी की है जिसमें कोई रोशनदान नहीं है, और जिसकी बुनियादें उर्दू की मिट्टी में नहीं बल्कि यूरोपीय दर्शन के क़ब्रिस्तानों में दफ़न हैं. चलिए, देखते हैं कि इस उपन्यास पर कौन-कौन से गोरे प्रेतों का कब्ज़ा है.
पहला प्रेत थॉमस बर्नहार्ड (Thomas Bernhard) का है.
ख़ालिद जावेद के इस उपन्यास का सबसे बड़ा ‘चमत्कार’ इसकी वह शैली है जिसमें पैराग्राफ खत्म होने का नाम नहीं लेते और ऊब एक लगातार दोहराव की शक्ल धार लेती है. मुझे तो इस पर हैरानी है कि ऑस्ट्रिया के महान उपन्यासकार थॉमस बर्नहार्ड ने कई दशकों पहले अपने उपन्यासों ‘Correction’ और ‘Extinction’ में ख़ालिद जावेद की इस विशेष शैली की नक़ल कैसे कर ली? लेकिन रुकिए, थॉमस बर्नहार्ड का एक और उपन्यास है: ‘Concrete’. बर्नहार्ड के उपन्यास ‘कंक्रीट’ और ख़ालिद जावेद की ‘मौत की किताब’ के बीच जो समानता है, वह महज़ कोई संयोग नहीं बल्कि एक ऐसी रचनात्मक और शैलीगत ‘नक़ल’ है जिसपर परदा डालना लगभग नामुमकिन है.
बर्नहार्ड के उपन्यास ‘कंक्रीट’ का कथावाचक (Rudolph) अपने घर ‘पाइस्कम’ (Peiskam) में क़ैद है. वह फ़ेलिक्स मेंडेलसन (Mendelssohn) पर एक विद्वतापूर्ण लेख लिखना चाहता है, मगर उसका घर, उसकी दीवारें और उसकी बहन की मौजूदगी उसके लिए एक ऐसी ‘जेल’ बन जाती है जहाँ वह मानसिक रूप से पंगु हो जाता है. ख़ालिद जावेद के यहाँ भी मकान सिर्फ ईंट-गारे का नाम नहीं है. जिस तरह बर्नहार्ड का पात्र कहता है कि “मैं इस घर से भागना चाहता हूँ मगर यह घर मुझमें धँसा हुआ है”, ठीक वैसी ही स्थिति ‘मौत की किताब’ के पात्र की भी है. वह अपने ही घर की दीवारों के भीतर एक ऐसी ‘अस्तित्ववादी घुटन’ महसूस करता है जो उसे लिखने या सोचने के बजाय सिर्फ ‘सड़ने’ पर मजबूर करती है.
‘कंक्रीट’ में कथावाचक की सारी समस्या ‘स्पेस’ (स्थान) की है. वह अपनी कुर्सी की जगह, मेज़ का कोण और खिड़की से आने वाली रोशनी तक को अपनी नाकामी का ज़िम्मेदार ठहराता है. चूँकि ख़ालिद जावेद अहमदाबाद से वास्तुकला की शिक्षा पा चुके हैं, उन्होंने बर्नहार्ड की इस ‘स्थानीय वितृष्णा’ (Spatial Disgust) को उठाया और उसे एक ऐसे अंधेरे नक़्शे में ढाल दिया जहाँ दीवारें पात्र को ‘घूरती’ हैं. बर्नहार्ड के यहाँ ‘कंक्रीट’ जड़ता और कठोरता का प्रतीक है, और ख़ालिद जावेद के यहाँ वह ‘मकान’ मौत की सख्ती का प्रतीक बनकर उभरता है.
इतना ही नहीं, जो लोग बर्नहार्ड को पढ़ चुके हैं, वे मुझसे सहमत होंगे कि बर्नहार्ड की शैली की मुख्य विशेषता उसके वे लंबे पैराग्राफ हैं जो पन्नों दर पन्नों तक फैले होते हैं और जिनमें ऊब का एक निरंतर चक्र चलता है. ख़ालिद जावेद ने ‘मौत की किताब’ में ज्यों का त्यों यही ‘बर्नहार्डियन मोनोलॉग’ (Bernhardian Monologue) उर्दू में पेश किया है. जिसे कुछ लोग उनकी ‘सिग्नेचर स्टाइल’ कह रहे हैं, वह दरअसल बर्नहार्ड की उस मानसिक लय (Rhythm) की नक़ल है जहाँ पात्र अपनी ही सोच के दायरे में घूमता रहता है. बर्नहार्ड का ‘कंक्रीट’ एक ऐसा मानसिक ठहराव है जहाँ कोई क्रिया (Action) नहीं होती, सिर्फ ‘सोच की सड़ांध’ होती है. ख़ालिद जावेद ने इसी सड़ांध को ‘मौत की किताब’ की बुनियाद बनाया है.
अच्छा, बर्नहार्ड के इस उपन्यास की एक अहम बात रह गई. बर्नहार्ड का पात्र बीमार है, उसे साँस की तकलीफ़ है और वह मौत के खौफ़ और चाहत के बीच लटका हुआ है. उसका सारा दर्शन उसके ‘बीमार फेफड़ों’ से निकलता है. ख़ालिद जावेद के यहाँ भी ‘शरीर की सड़ांध’ और ‘बीमारी’ इसी तरह केंद्र में हैं. यह कोई आध्यात्मिक खोज नहीं है, बल्कि बर्नहार्ड की उस ‘नैदानिक शैली’ (Clinical Style) की गूँज है जहाँ मानव शरीर को गंदगी और पतन के एक कारखाने के रूप में दिखाया गया है.
संक्षेप में यह कि बर्नहार्ड ने ‘कंक्रीट’ में मकान को मानवीय मस्तिष्क का ‘क़ब्रिस्तान’ बनाया था, ख़ालिद जावेद ने ‘मौत की किताब’ में उस क़ब्रिस्तान पर ‘उर्दू का शिलालेख’ लगा दिया है. यह कोई रचनात्मक संयोग नहीं है, बल्कि उस ‘इमारत’ पर कब्ज़ा है जिसका नक़्शा किसी और ने तैयार किया था.
लेकिन बर्नहार्ड ही एकमात्र व्यक्ति नहीं है जो “मौत की किताब” के प्रेरणास्रोत का श्रेय ले ले, अभी कुछ और लोग भी कतार में खड़े नज़र आ रहे हैं. उदाहरण के लिए, इस उपन्यास का मुख्य पात्र जिस तरह अपने शरीर, अपने अस्तित्व और वस्तुओं की भौतिक वास्तविकता से घृणा महसूस करता है, वह हमें ज्यां-पॉल सार्त्र की ‘मतली’ (Nausea) की याद दिलाता है, जिसे ‘मेटाफिजिकल वोमिट’ (तत्त्वमीमांसीय वमन) भी कहा जा सकता है. सार्त्र का पात्र ‘एंटोनी रोक्वेंटिन’ जब एक पेड़ की जड़ को देखकर अस्तित्व के बोझ से मतली महसूस करता है, तो ख़ालिद जावेद के पात्र को भी अपने वजूद से वैसी ही बदबू आने लगती है. अंतर सिर्फ इतना है कि सार्त्र ने इसे ‘अस्तित्ववाद’ का नाम दिया, और ख़ालिद जावेद ने इसे ‘सड़ांध के सौंदर्यशास्त्र’ में ढालकर उर्दू पाठक को यह यकीन दिला दिया कि यह उनका निजी ‘अस्तित्ववादी सदमा’ है. हालाँकि इसे हम अब भी ‘साहित्यिक चोरी’ नहीं कहेंगे, परंतु साहित्य के विद्वान शायद इसे ‘वैचारिक आयात’ ज़रूर करार दे दें.
लेकिन अभी इस चित्रशाला में कई और तस्वीरें मौजूद हैं. अगली तस्वीर को आप ‘आर्किटेक्चर ऑफ़ क्लॉस्ट्रोफ़ोबिया’ (Architecture of Claustrophobia) कह सकते हैं. जैसा कि मैंने ऊपर बताया, ख़ालिद जावेद ने अपनी वास्तुकला की शिक्षा का इस्तेमाल इस उपन्यास में एक होनहार छात्र की तरह बखूबी किया है. इस उपन्यास में मकान, कमरे और दीवारें जिस तरह पात्र को निगलती हैं, वे न केवल थॉमस बर्नहार्ड के उपन्यास “कंक्रीट” से आश्चर्यजनक रूप से मिलती हैं, बल्कि जर्मन अभिव्यक्तिवादी सिनेमा (German Expressionist Cinema), विशेष रूप से फिल्म ‘The Cabinet of Dr. Caligari’ के दृश्यों के समान भी हैं.
जिस तरह उस फिल्म में टेढ़ी-मेढ़ी दीवारें और विचित्र कोण मानव मस्तिष्क की टूट-फूट को दिखाते हैं, ख़ालिद जावेद ने भी इस उपन्यास में मकान को एक ‘ज़िंदा प्रेतात्मा’ के रूप में पेश किया है. यह एक वास्तुकार का वह नक़्शा है जिसे उसने शब्दों के ज़रिए एक ऐसी जेल बनाने के लिए इस्तेमाल किया है जिसका डिज़ाइन वैश्विक फिक्शन के ‘हॉरर हाउसेस’ से उधार लिया गया है.
जैसाकि मैं ऊपर बता चुका हूँ, फ़ारूक़ी साहब ने “मौत की किताब” की तुलना “अय्यूब का ग्रंथ” से करके इसे एक धार्मिक और आध्यात्मिक पवित्रता देने की कोशिश की. लेकिन अगर ग़ौर से देखा जाए तो ख़ालिद जावेद ने हज़रत अय्यूब के सब्र और उनकी आज़माइश के ‘ढांचे’ को लेकर उसमें सैमुअल बैकेट (Samuel Beckett) की अर्थहीनता (Absurdism) भर दी है. बाइबिल और क़ुरआन में हज़रत अय्यूब की कहानी ईश्वर पर अटूट विश्वास और परीक्षा की है, मगर ख़ालिद जावेद के यहाँ यह ‘परीक्षा’ तो है मगर ‘ईश्वर’ ग़ायब है. यह बैकेट के नाटकों की तरह एक ऐसी ‘इंतज़ार की स्थिति’ है जहाँ मौत ही आखिरी समाधान है, मगर वह भी दोहराव के बोझ तले दबी हुई है.
लेकिन रुकिए, अभी तो ख़ालिद जावेद का एक आखिरी ‘मास्टर स्ट्रोक’ बाकी है. हमारे यहाँ कोई व्यक्ति “अस्तित्ववादी उपन्यास” लिख रहा हो और उस पर फ्रांज़ काफ्का का साया न हो, ऐसा लगभग असंभव है. पात्र का अपने सामाजिक और पारिवारिक स्तर से कट जाना और एक ऐसी बेगानागी (Alienation) का शिकार होना जहाँ वह खुद को एक ‘कीड़े’ या ‘विष्ठा’ से ज़्यादा कुछ न समझे, काफ्का के उपन्यास ‘The Metamorphosis’ का वह आधुनिक और प्रसिद्धतम प्रतिरूप है जिसे ख़ालिद जावेद ने भी बड़ी ‘महारत’ से दर्शन के चोले में छिपाया है.
काफ्का के यहाँ ‘खौफ़’ एक व्यवस्था (System) से पैदा होता है, जबकि ख़ालिद जावेद के यहाँ यह खौफ़ ‘शरीर की गंदगी’ से पैदा होता है. लेकिन उन्होंने ‘रचनात्मक ईमानदारी’ का ध्यान रखते हुए काफ्का के अस्तित्ववादी डर को उठाकर उसे भौतिक सड़ांध के साथ नत्थी कर दिया है; अब इससे ज़्यादा ‘मौलिक’ भला और क्या हो सकता था?
संक्षेप में यह कि “मौत की किताब” उर्दू साहित्य की वह पहली महान कृति है जो वास्तव में विश्व साहित्य के विभिन्न ‘अंगों’ को जोड़कर बनाया गया एक ‘फ्रेंकेंस्टीन’ है. ख़ालिद जावेद ने दर्शन पढ़ाने के दौरान जो पुरालेख (archives) जमा किए थे, यह उपन्यास उनका एक ऐसा कोलाज (collage) है जिसपर उनकी विशेष शैली की रंगसाज़ी इतनी गहरी है कि पाठक मूल नक़्शा नहीं देख पाता.
मुझे तो अब इस बात पर यकीन होता जा रहा है कि ख़ालिद जावेद की अनोखी सोच असल में विश्व की कालजयी कृतियों का का वह ‘सारांश’ है जो उर्दू में सिर्फ इसलिए लोकप्रिय हुआ क्योंकि हमारे यहाँ के आलोचकों ने अभी ‘थॉमस बर्नहार्ड’ या ‘एमिल ज़ोला’ को उस नज़र से नहीं पढ़ा था जिस नज़र से ख़ालिद जावेद ने उन्हें ‘हज़म’ किया.

(2)
नेमत ख़ाना
पेरिस के मांस बाज़ार की तस्करी
ख़ालिद जावेद का दूसरा उपन्यास “नेमत ख़ाना”—या यूँ कहिए कि जेसीबी (JCB) पुरस्कार की वह ‘सोने की चिड़िया’ जिसने उर्दू फिक्शन को रातों-रात ‘अंग्रेज़ीदाँ’ तबक़े का चहेता बना दिया—दरअसल एक ऐसा बोझिल लेखन है जिसे पुरस्कार की चमक-दमक ने ‘महान कृति’ बना दिया. हमें उन उर्दू आलोचकों और समीक्षकों की ‘धैर्यपूर्ण मासूमियत’ पर रहम आता है जिन्होंने बरसों इस उपन्यास को ‘रद्दी’ समझकर एक तरफ़ डाले रखा, और जैसे ही बारां फ़ारूक़ी के ‘अंग्रेज़ी चोले’ ने इसे ढका, सब के सब ‘उत्कृष्ट रुचि’ की वापसी का शिकार हो गए.
लेकिन जब हम इस ‘नेमत ख़ाने’ (भोजन कक्ष/रसोई) के दरवाज़े खोलते हैं और इसकी तुलना विश्व साहित्य के ‘रसोईघरों’ से करते हैं, तो वे तथ्य सामने आते हैं जो इस उपन्यास के ‘अमर व्यंजनों’ के बासी होने का प्रमाण उन लोगों को दे देते हैं जिन्होंने वैश्विक फिक्शन का अध्ययन किया है. अभी कुछ दिनों पहले तक मेरा नाम भी ऐसे ही “मासूमों” में होता था, लेकिन जब नए सिरे से ख़ालिद के इस उपन्यास को पढ़ना शुरू किया, तो पश्चिम से आने वाली हवाओं ने मेरे नथुनों को फड़फड़ाना शुरू कर दिया.
आइए, इस ‘जेसीबी प्राप्त’ रसोईघर के कोने-कोने की छानबीन करते हैं कि यहाँ कितने तिलचट्टे रेंग रहे हैं.
हवा का सबसे पहला झोंका फ़्रांस से एक पुरानी भूख की ‘खुशबू’ अपने साथ लाया. अब इसे रचनात्मक संयोग कहा जाए या ‘आध्यात्मिक डकैती’, कि फ़्रांस के महान यथार्थवादी लेखक एमिल ज़ोला ने 1873 में जब अपना उपन्यास “द बेली ऑफ़ पेरिस” (The Belly of Paris) लिखा, तो क्या उन्हें पता था कि डेढ़ सौ साल बाद भारत के एक प्रोफ़ेसर साहब उसके पूरे ‘दृश्य-चित्रण’ को अपने घर के ‘नेमत ख़ाने’ में स्थानांतरित कर देंगे?
ज़ोला के यहाँ भोजन, मांस, पनीर और सब्ज़ियों की जो ‘पाशविक और विस्तृत सूचियाँ’ हैं जो इंसान के भीतर उबकाई पैदा करती हैं, ख़ालिद जावेद के यहाँ वे ज्यों की त्यों मौजूद हैं. ज़ोला ने पेरिस के खाद्य बाज़ार को एक ‘सड़ते हुए अस्तित्व’ के रूप में दिखाया था; ख़ालिद साहब ने वही ‘वितृष्णा’ रसोई के बर्तनों और सालन (करी) के रेशों में भर दी. ज़ोला की शैली ‘ग्रोटेस्क रियलिज्म’ (विकृत यथार्थवाद) थी; ख़ालिद जावेद ने इसे उर्दू के सांचे में अपनी रचनात्मक निपुणता से ढालकर इसे ‘अस्तित्ववादी पीड़ा’ का नाम दे दिया. लेकिन इसी पर संतोष क्यों किया जाए, ख़ालिद जावेद व्यापक अध्ययन करने वाले लेखक हैं, उनसे भला विश्व साहित्य का वह पूरा खज़ाना कैसे छिपा रह सकता था जो ‘भोजन’ पर आधारित है.
याद आया, उर्दू के जाने-माने और अनुभवी कथाकार तारिक़ छतारी साहब ने “नेमत ख़ाना” पर एक लेख लिखा था. यह लेख ‘ग़ालिब इंस्टीट्यूट’, नई दिल्ली के एक सेमिनार में पढ़ा गया था, जो बाद में त्रैमासिक पत्रिका ‘इसबात’ में भी प्रकाशित हुआ. तारिक़ साहब का यह विश्लेषण हालाँकि संतुलित था, लेकिन इसमें कुछ ऐसे पैराग्राफ भी शामिल हैं जो हमें “नेमत ख़ाना” के कुछ असली स्रोतों की ओर ध्यान दिलाने पर मजबूर करते हैं. हम उस उद्धरण को यहाँ ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं:
“इस उपन्यास में रसोईघर को केंद्रीय स्थान प्राप्त है और इसे एक स्टेज के रूप में इस्तेमाल किया गया है. अधिकांश घटनाएँ रसोईघर में ही घटित हुई हैं और रसोईघर की तमाम वस्तुएँ उपन्यास में कहीं उपमा, कहीं रूपक तो कहीं दृष्टांत के रूप में इस्तेमाल हुई हैं. इस तरह का उदाहरण उर्दू में किसी दूसरे लेखक के यहाँ नहीं मिलता, अलबत्ता अंग्रेज़ी में 1960 के आसपास आरनल्ड वेस्कर (Arnold Wesker), जॉन ऑसबर्न (John Osborne) और शीलाग डेलाने (Shelagh Delaney) आदि ने Kitchen sink movement of social realism in art के तहत कुछ नाटक मंचित किए थे, जिनका पूरा सेट-अप किचन में ही तैयार किया जाता था. इनमें कुछ नाटक जैसे “Chicken Soup with Barley”, “Look Back in Anger” और “A Taste of Honey” बहुत प्रसिद्ध हुए. इसके बाद कला, थिएटर, उपन्यास, फ़िल्म और टेलीविज़न नाटकों में इस शैली को बहुत बढ़ावा मिला. दरअसल यह एक British cultural movement था. उर्दू में इस साहित्यिक आंदोलन का उदाहरण नहीं मिलता, इस सिलसिले में ख़ालिद जावेद को विशिष्टता (Distinction) प्राप्त है.”
तारिक़ साहब ने जिस शालीनता और ‘सावधानी’ से काम लिया है, वह उनकी शराफ़त और मर्यादा है, मगर एक पारखी पाठक के लिए उनके ये ‘इशारे’ किसी आरोप-पत्र (Charge sheet) से कम नहीं हैं. इसे ‘विशिष्टता’ कहना तारिक़ साहब की दरियादिली है, वरना यह तो साफ़-साफ़ उस ‘किचन सिंक ड्रामा मूवमेंट’ की नक़ल है जिसे अंग्रेज़ी साहित्य दशकों पहले हज़म कर चुका है.
यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि आरनल्ड वेस्कर और जॉन ऑसबर्न ने 1950 और 60 के दशक में ‘किचन सिंक ड्रामा’ की बुनियाद रखी थी. आरनल्ड वेस्कर का विश्व-प्रसिद्ध नाटक “The Kitchen” (1957) उठाकर देख लीजिए. उस पूरे नाटक का परिवेश एक रेस्तरां की रसोई है जहाँ गर्मी, शोर, मांस की गंध और बर्तनों की खटपट के बीच मानवीय प्रवृत्तियाँ एक-दूसरे का खून पीने पर उतारू हो जाती हैं. ख़ालिद जावेद ने ‘नेमत ख़ाना’ में बिल्कुल वैसी ही उमस और वैसी ही घुटन पैदा की है.
वेस्कर के यहाँ रसोईघर ‘वर्गीय संघर्ष’ (Class struggle) का प्रतीक था, ख़ालिद जावेद ने इसे ‘अस्तित्ववादी सड़ांध’ का नाम देकर उर्दू वालों को यह प्रभाव दिया कि यह उनकी अपनी खोज है. यह विशिष्टता नहीं बल्कि एक ऐसी ‘तकनीकी तस्करी’ है जिस पर कस्टम ड्यूटी तक अदा नहीं की गई. जॉन ऑसबर्न के “Look Back in Anger” की वह घरेलू नफ़रत और छोटी-छोटी चीज़ों पर एक-दूसरे को काटने की प्रक्रिया ‘नेमत ख़ाना’ की रूह में रची-बसी है.
तारिक़ छतारी ने अपने उक्त लेख में ‘नेमत ख़ाना’ के एक अंश (पृष्ठ 43) का हवाला देते हुए, जिसमें लेखक ने “बंदर के मुर्दा पंजे” का ज़िक्र किया है, कहा है:
“यहाँ बंदर के मुर्दा पंजे का उल्लेख करके ख़ालिद जावेद ने बड़ी कुशलता के साथ डब्लू. डब्लू. जैकब्स (W.W. Jacobs) की कहानी “The Monkey’s Paw” के मुख्य विचार की ओर ध्यान दिलाया है कि समय को दोबारा खींचकर लाने के नतीजे में सिर्फ़ दहशत और पछतावा ही हासिल हो सकता है और कुछ नहीं.”
“The Monkey’s Paw” विश्व साहित्य की सबसे प्रसिद्ध डरावनी कहानियों में से एक है. जैकब्स की इस कहानी में ‘बंदर का पंजा’ एक ऐसी मनहूस चीज़ है जो इच्छाएँ तो पूरी करती है मगर उनका अंत खौफ़ और पछतावे पर होता है. ख़ालिद जावेद ने पृष्ठ 43 पर जिस ‘दहशत और पछतावे’ का ज़िक्र किया है, वह दरअसल जैकब्स की उसी कहानी का ‘वैचारिक अपहरण’ है. लेकिन इसमें ख़ालिद साहब ने यह ‘कलाकारी’ दिखाई है कि मूल पाठ (text) में ‘बंदर के मुर्दा पंजे’ का नाम लेकर पाठक को यह जताने की कोशिश की कि वे महज़ एक संदर्भ (Allusion) इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि हक़ीक़त में उन्होंने उस पूरी कहानी का ‘खौफ़ और दर्शन’ अपने उपन्यास की नींव बनाने के लिए उड़ा लिया है. यह वैसा ही है जैसे कोई किसी का बटुआ मार ले और फिर उसी के सामने उस बटुए के डिज़ाइन की तारीफ़ करने लगे.
चलिए, अब तारिक़ छतारी साहब की इस शिनाख्त के लिए उनका शुक्रिया अदा करते हुए आगे बढ़ते हैं कि आगे कुछ और ‘बदनसीब’ हमारा इंतज़ार कर रहे हैं.
1965 में प्रकाशित होने वाला हैरी क्रेसिंग का उपन्यास “द कुक” (The Cook) इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है. इस उपन्यास में एक रसोइया एक परिवार में प्रवेश करता है और धीरे-धीरे ‘भोजन के ज़हरीले दर्शन’ के ज़रिए उस खानदान की सहज प्रवृत्तियों, उनकी नैतिकता और उनके शरीर पर कब्ज़ा कर लेता है. “नेमत ख़ाना” का पूरा ढांचा—यानी रसोई का एक घर के सदस्यों को मनोवैज्ञानिक रूप से ‘विकृत’ कर देना—बिल्कुल इसी उपन्यास की वह नक़ल है जिसे ख़ालिद जावेद ने अपनी विशेष ‘घृणास्पद शैली’ में लपेटकर पेश किया है. लेकिन अभी रुकिए, क्लाइमेक्स बाकी है.
“नेमत ख़ाना” पढ़ते हुए बीच-बीच में ऐसा भी महसूस होता है जैसे हम पीटर ग्रीनवे की मशहूर फ़िल्म ‘The Cook, the Thief, His Wife & Her Lover’ की पटकथा पढ़ रहे हों. फ़िल्म में रंगों का इस्तेमाल (लाल, हरा और काला) और भोजन की मेज़ पर कामुकता, हिंसा और गंदगी का जो संगम है, ख़ालिद जावेद का पूरा उपन्यास उसी दृश्य-कथानक की ‘गद्य पैरोडी’ मालूम होता है. ऐसा लगता है कि ख़ालिद जावेद ने फ़िल्म के दृश्यों को शब्दों में ढाला और उर्दू पाठक को यह विश्वास दिला दिया कि यह उनके ‘अवचेतन की उपज’ है.
इस उपन्यास का एक ‘पोस्ट-क्लाइमेक्स’ भी है जिसका नाम है: माइकल टूर्नियर (Michel Tournier) और ‘मांस का मनोविज्ञान’. फ़्रांसीसी लेखक माइकल टूर्नियर के यहाँ मानव शरीर, भोजन और ‘उपभोग’ (Consumption) का जो घृणित रिश्ता मिलता है, ख़ालिद जावेद ने उससे भरपूर ‘लाभ’ उठाया है. टूर्नियर के यहाँ शरीर का ‘मांस’ बनना एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है; ख़ालिद जावेद ने इस दर्शन को उठाया और इसे ‘नेमत ख़ाने’ की हांडियों में डाल दिया. वास्तव में उनके यहाँ जो ‘लिजलिजापन’ और ‘दुर्गंध’ मिलती है और जिसे हम अपने अध्ययन के अभाव के कारण अनोखी शैली मानते आ रहे हैं, वह असल में यूरोपीय उत्तर-आधुनिकता का वह ‘कचरा’ है जिसे हमने ‘जेसीबी’ के सुनहरे काग़ज़ में लपेटकर ‘कालजयी रचना’ स्वीकार कर लिया है.
“नेमत ख़ाना” की सबसे बड़ी भाषाई कमी उसकी वह ‘सूची-निर्माण’ (listing) है जिसे उनके प्रशंसक ‘सूक्ष्म चित्रण’ कहते हैं. हालाँकि जब किसी लेखक के पास कल्पना की कमी होती है, तो वह ‘वस्तुओं’ की सूचियाँ बनाना शुरू कर देता है. “नेमत ख़ाना” में मसालों, बर्तनों और गंदगी की जो लंबी सूचियां हैं, वे दरअसल गुंटर ग्रास (Gunter Grass) के उपन्यास “द फ़्लाउंडर” (The Flounder) की उस तकनीक का ‘गैर-रचनात्मक’ उपयोग है जहाँ इतिहास को ‘रसोईघर की डायरी’ के ज़रिए बयान किया गया है. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि ग्रास के यहाँ एक ‘वैश्विक दृष्टि’ थी, और ख़ालिद साहब के यहाँ सिर्फ़ एक ‘निजी घुटन’.
संक्षेप में यह कि “नेमत ख़ाना” वास्तव में विश्व साहित्य की उन उत्कृष्ट कृतियों का एक ऐसा ‘उत्तर-आधुनिक सालन’ है जिसमें विचार एमिल ज़ोला के हैं, मनोविज्ञान हैरी क्रेसिंग का है, और दृश्य-प्रभाव पीटर ग्रीनवे के. ख़ालिद जावेद ने बस इसमें ‘उर्दू की मिट्टी का नमक’ कम और ‘बरेली के दर्शन का खड़ा मसाला’ ज़्यादा डाल दिया है.
मुझे तो अब इस बात पर हैरानी हो रही है कि जेसीबी की जूरी में क्या कोई ऐसा व्यक्ति नहीं था जिसने माइकल टूर्नियर या हैरी क्रेसिंग को पढ़ रखा हो? या शायद वे भी इससे इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने इसे एक ‘अछूता अनुभव’ समझ लिया.

(3)
एक ख़ंजर पानी में
पोलान्स्की की डूबती किश्ती और ख़ालिद जावेद की गोताख़ोरी
ख़ालिद जावेद का तीसरा उपन्यास “एक ख़ंजर पानी में”—जिसका शीर्षक सुनते ही ज़हन में पहला धमाका रोमन पोलान्स्की (Roman Polanski) की विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म “नाइफ़ इन द वॉटर” (Knife in the Water) का होता है. इस शीर्षक की समानता पर बरसों पहले पाकिस्तान के फ़ैसल इक़बाल ने अपनी समीक्षा में बड़ी शिद्दत से बात कही थी, जिसे सोशल मीडिया पर भी काफ़ी साझा किया गया था. इसे रचनात्मक चमत्कार न कहा जाए तो और क्या कहा जाए कि पोलान्स्की ने 1962 में जिस शीर्षक पर फ़िल्म बनाई, ख़ालिद जावेद की ‘मौलिक’ कल्पना ने दशकों बाद ठीक वही शीर्षक उर्दू फिक्शन के लिए ‘खोज’ लिया. क्या पता कि पोलान्स्की ने भविष्य में झाँककर ख़ालिद साहब के इस अनूठे शीर्षक पर ‘डाका’ डाल दिया हो?
लेकिन ख़ैर, मैं शीर्षक को इतना महत्त्व नहीं देता कि उससे किसी कलाकृति के स्तर को मापा जा सके. खुद मेरा पहला उपन्यास “उसने कहा था” भी हिंदी के प्रसिद्ध लेखक पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की काफ़ी पुरानी कहानी के शीर्षक के समान था, जो संभवतः 1915 में प्रकाशित हुई थी. मैं इससे वाक़िफ़ नहीं था और जबतक कुछ मित्रों के ज़रिए पता चला, तब तक चिड़िया खेत चुग चुकी थी, यानी मेरा उपन्यास प्रकाशित हो चुका था. अब मैंने उसके हिंदी अनुवाद का नाम बदलकर “मौत में नया क्या है” रख दिया है. शीर्षक की समानता पर उर्दू के नामी और कद्दावर आलोचक फुज़ेल जाफ़री साहब के एक आलोचनात्मक संग्रह “कमान और ज़ख़्म” पर भी कभी सवाल उठाया गया था कि यह एडमंड विल्सन की किताब “The Wound and the Bow” की साहित्यिक चोरी है, जबकि शीर्षक की इस समानता के बावजूद यह आरोप पूरी तरह ग़लत था. शीर्षक की समानता साहित्य में कभी कोई गंभीर मुद्दा नहीं रही, इसलिए ख़ालिद जावेद के इस उपन्यास के नाम की रोमन पोलान्स्की की फ़िल्म के नाम से समानता को मैं ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेता.
मेरे नज़दीक “एक ख़ंजर पानी में” इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि यहाँ ख़ालिद जावेद की ‘वास्तुकला की अंतर्दृष्टि’ (Architectural insight) और दार्शनिक गहराई मिलकर एक ऐसा दृश्य-पटल तैयार करती हैं, जो उर्दू के सीधे-सादे पाठक के लिए तो ‘आधुनिकता’ है, मगर विश्व सिनेमा और साहित्य के जानकारों के लिए एक ‘दोहराया गया सपना’.
शीर्षक की समानता से हटकर, पोलान्स्की की फ़िल्म ‘नाइफ़ इन द वॉटर’ एक ऐसी मनोवैज्ञानिक जंग है जो पानी के बीच एक नाव पर लड़ी जाती है. ख़ालिद जावेद के उपन्यास में हालाँकि नाव नहीं है, मगर वह ‘संवृतिभीति’ (Claustrophobia) और ‘पानी’ के एक प्रतीक के रूप में वही उपयोग है जो पोलान्स्की की विशेषता है. जिस तरह पोलान्स्की ने एक सीमित स्थान (Space) में मानवीय प्रवृत्तियों के टकराव को दिखाया, ख़ालिद जावेद ने अपने पात्र की आंतरिक दुनिया को उसी ‘सीमितता’ और ‘खौफ़’ के सांचे में ढाला है. ऐसा लगता है कि ख़ालिद साहब ने पोलान्स्की की फ़िल्म से वह ‘तनाव’ (Tension) उधार लिया और उसे अपनी विशेष ‘घृणास्पद शैली’ में रंगकर पेश कर दिया.
लेकिन ख़ालिद जावेद के उपन्यासों का पिछला पैटर्न हमें उकसाता है कि इस उपन्यास की और जाँच-पड़ताल की जाए. और जब हमने ऐसा किया, तो हमारा संदेह सही निकला. ख़ालिद जावेद चूँकि दर्शन और वास्तुकला के छात्र रहे हैं, इसलिए यह मानना मुश्किल है कि वे गैस्टन बैचेलार्ड (Gaston Bachelard) की प्रसिद्ध पुस्तक “Water and Dreams” (पानी और सपने) से अनजान हों.
बैचेलार्ड ने पानी को ‘मृत्यु, गहराई और अवचेतन’ के प्रतीक के रूप में पेश किया है. ख़ालिद जावेद के यहाँ पानी का जो चित्रण है—जहाँ पानी जीवन नहीं बल्कि एक ‘अंधेरी क़ब्र’ है—वह हूबहू बैचेलार्ड के उन दृश्य-प्रपंच (Phenomenological) संबंधी विचारों का गद्य-रूप है जिन्हें पश्चिमी साहित्य में दशकों पहले हज़म किया जा चुका है. क्या कमाल है कि बैचेलार्ड का दर्शन ख़ालिद साहब की कलम से ‘ख़ंजर’ बनकर निकला है.
रिज़वानुल हक़ ने ख़ालिद जावेद के नवीनतम उपन्यास “इक्कीस एक सौ बाईस” पर अपनी राय देते हुए कहा है कि अगर अल्बेयर कामू ज़िंदा होता तो ख़ालिद जावेद का हाथ चूम लेता. जानकारी के लिए बता दूँ कि कामू इससे पहले भी ख़ालिद जावेद का हाथ चूम चुका है, बल्कि चूमता रहा है. “एक ख़ंजर पानी में” का मुख्य पात्र जब किसी अपराध या हिंसा को अंजाम देता है, तो उसकी ठंडी बेरुखी और संवेदनहीनता हमें कामू के “द स्ट्रेंजर” (The Stranger) के पात्र ‘मर्सो’ (Meursault) की याद दिलाती है. हालाँकि कामू की शैली ‘क्लीनिकल’ और ‘भावशून्य’ थी, ख़ालिद जावेद ने उसी ‘सर्द-बयान’ (Cold Narrative) को उठाया और उसमें उर्दू की कुछ ‘ख़ालिद जावेदी’ लफ़्फ़ाज़ी शामिल करके उसे एक ‘अनोखी शैली’ बना दिया. हिंसा के बाद पात्र का यह सुकून, जैसे कुछ हुआ ही न हो, मर्सो के उस वाक्य की उर्दू नक़ल महसूस होता है कि “आज मेरी माँ मर गई, या शायद कल, मुझे नहीं मालूम.”
ख़ालिद जावेद के इस उपन्यास में अभी दो और चीज़ों का मिश्रण बाक़ी है, जिसमें आंद्रेई तारकोवस्की (Andrei Tarkovsky) की दृश्य-गूँज भी शामिल है. पानी, बारिश और गिरती दीवारों का जो चित्रण इस उपन्यास में है, वह रूसी निर्देशक तारकोवस्की की फ़िल्मों (विशेषकर Stalker और Nostalghia) के फ्रेमों से आश्चर्यजनक रूप से मिलता-जुलता है. तारकोवस्की के यहाँ पानी ‘समय और पतन’ का प्रतीक है. ख़ालिद जावेद ने इन दृश्यात्मक रूपकों (Visual metaphors) को आयात कर उन्हें अपने गद्य में इस तरह पिरोया है कि पाठक को लगता है यह सब उनके अपने ‘अवचेतन की उपज’ है. साहित्य के विद्वान शायद इसे संयोग नहीं मानेंगे, बल्कि इसे एक ऐसा ‘धोका’ कहेंगे जिस पर उर्दू आलोचकों ने इसलिए तालियाँ बजाईं क्योंकि उन्होंने तारकोवस्की के ‘ज़ोन’ (Zone) की कभी सैर नहीं की थी.
इस उपन्यास में आख़िरी खंजर जॉर्ज सिमेनॉन (Georges Simenon) ने उतारा है. “एक ख़ंजर पानी में” में सस्पेंस और अपराध की जो मनोवैज्ञानिक परतें हैं, वे फ़्रांसीसी लेखक जॉर्ज सिमेनॉन के ‘साइकोलॉजिकल थ्रिलर्स’ (Hard-boiled novels) की याद दिलाती हैं. सिमेनॉन के यहाँ अपराध से ज़्यादा महत्वपूर्ण वह ‘माहौल’ होता है जो अपराध को जन्म देता है. ख़ालिद जावेद ने भी इस उपन्यास में ‘अपराध’ को गौण रखा और उस ‘उमस भरे माहौल’ को प्राथमिकता दी, जो वैश्विक ‘नॉयर’ (Noir) साहित्य का पुराना औज़ार है. यह मौलिक फिक्शन नहीं बल्कि वैश्विक ‘डार्क थ्रिलर्स’ का एक ऐसा ‘कोलाज’ है जिस पर ‘दर्शन के प्रोफ़ेसर’ की मुहर लगी हुई है.
“एक ख़ंजर पानी में” वास्तव में एक ऐसा ‘सिनेमाई उपन्यास’ है जिसकी पटकथा पोलान्स्की और तारकोवस्की के बीच बँटी हुई है, और जिसकी आत्मा अल्बेयर कामू का हाथ चूमकर उससे उधार ली गई है. ख़ालिद जावेद ने अपनी ‘वास्तुकला की कुशलता’ का इस्तेमाल करते हुए इन तमाम वैश्विक स्रोतों को एक ऐसी इमारत में बंद कर दिया है जिसकी खिड़कियाँ तो खुली हैं, मगर उनसे आने वाली हवा उर्दू की नहीं बल्कि अनुवाद की हुई ‘पश्चिमी ऊब’ की है.

(4)
अर्सलान और बहज़ाद
नील गेमन के ‘बीज’ का रचनात्मक पुनर्जन्म
ख़ालिद जावेद का चौथा उपन्यास “अर्सलान और बहज़ाद”—मैं यहाँ सबसे पहले अपना अपराध स्वीकार कर लेता हूँ कि यह उपन्यास मुझे इतना ज़्यादा पसंद आया था कि इस पापी ने इस पर दो-दो समीक्षाएँ लिख डाली थीं. उस समय मेरे समीप यह उपन्यास उर्दू कथा-साहित्य में ‘अलौकिक चमत्कारों’ का वह शिखर था, जिसके सामने बुद्धि दंग और होश गुम हो गए थे. इस उपन्यास की मूल कल्पना ही इतनी ‘अनोखी’ है कि मैं पुकार उठा था कि ऐसा अनूठा विचार तो सिर्फ़ ख़ालिद जावेद के उपजाऊ मस्तिष्क से ही फूट सकता है. मगर ज़रा ठहरिए! जैसे ही मैं इस ‘सपनों के नगर’ से बाहर निकलकर वैश्विक फंतासी साहित्य (Global Fantasy Literature) और आधुनिक ग्राफ़िक विधा की सैर करने लगा, तो मेरी मासूम हैरानी एक ऐसी मुस्कुराहट में बदल गई जिसमें अपनी मूर्खता के साथ थोड़ी सी ‘रचनात्मक सहानुभूति’ भी शामिल थी.
आइए, “अर्सलान और बहज़ाद” की इस ‘सपनों वाली’ दुनिया की जड़ें वैश्विक कल्पना के रेगिस्तानों में तलाश करते हैं, जो मैंने ढूँढ निकाली हैं.
इस उपन्यास की पूरी इमारत जिस बुनियाद पर खड़ी है—यानी सपने में शारीरिक संबंध और उसके परिणाम के रूप में हक़ीक़त में गर्भ ठहरना—वह हूबहू नील गेमन (Neil Gaiman) के कालजयी ग्राफ़िक उपन्यास “द सैंडमैन” (The Sandman) का वह हस्ताक्षर है, जिसे वैश्विक स्तर पर 1990 के दशक में ही ‘क्लासिक’ माना जा चुका था.
गेमन के यहाँ ‘लायटा हॉल’ (Lyta Hall) सपनों की दुनिया में गर्भवती होती है, और सपनों का राजा (Morpheus) उसे बताता है कि यह बच्चा उसका अपना नहीं बल्कि ‘सपनों’ की संपत्ति है. ख़ालिद जावेद ने इसी विचार को उठाया और अर्सलान को एक ऐसी कानूनी लड़ाई में झोंक दिया जहाँ उसका ‘सपनों वाला अंश’ जॉर्जिया की एक लड़की की कोख में सच्चाई बनकर प्रकट होता है. क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि जो फंतासी लंदन के एक दिमाग़ ने सोची, वही फंतासी हूबहू दिल्ली के एक प्रोफ़ेसर साहब के अवचेतन में इस तरह उतरी कि बीच में कुछ भी फ़र्क नहीं रहा? यहाँ तक कि गेमन की रचना और ख़ालिद जावेद के उपन्यास के बीच समानता इस हद तक बढ़ जाती है कि सपने में मिलन से जन्मा लड़का दोनों ही मुख्य पात्रों की मौत का कारण भी बनता है. (नेटफ्लिक्स पर यह सीरीज़ के रूप में उपलब्ध है).
इतना ही नहीं, उपन्यास की शुरुआत में अर्सलान को अदालत से जो ‘समन’ मिलता है और जिस तरह उसे एक ऐसे कृत्य (या गर्भ) की सफ़ाई देनी पड़ती है जो उसने होश-ओ-हवास में कभी किया ही नहीं, वह हमें सीधे तौर पर काफ़्का के ‘जोसेफ़ के’ (Joseph K) की याद दिलाता है.
काफ़्का के यहाँ ‘पाप’ का एहसास स्पष्ट नहीं है, मगर ख़ालिद जावेद ने इसे ‘शारीरिक गंदगी’ और ‘सपनों वाले पागलपन’ के साथ जोड़कर एक ‘उर्दू रंग’ देने की कोशिश की है. अर्सलान का वकील से संवाद और अदालत की वह ऊब जिसमें तर्क दम तोड़ देते हैं, वास्तव में काफ़्का की उस विसंगति (Absurdity) का एक ऐसा ‘उर्दू चर्बा’ है जिसे ख़ालिद जावेद ने अपनी विशेष घृणास्पद शैली की रंगसाज़ी से छिपाने की कोशिश की है.
उपन्यास का अंतिम हिस्सा (क्लाइमेक्स) जहाँ अर्सलान का वह बेटा (जो सपने के रास्ते दुनिया में आया था) अपने पिता की मौत का कारण बनता है, वह विश्व साहित्य का सबसे पुराना मिथक है. पिता और पुत्र का यह टकराव यूनानी त्रासदियों (Greek Tragedies) से होता फ़िरदौसी के ‘शाहनामा’ तक एक ‘आदिप्रारूप’ (Archetype) की हैसियत रखता है. ख़ालिद जावेद ने इस पुराने ढांचे को नील गेमन की ‘आधुनिक फंतासी’ के साथ जोड़कर एक ऐसी ‘साहित्यिक खिचड़ी’ तैयार की है जिसका हर हिस्सा कहीं न कहीं से उधार लिया गया है. क्या हम अब भी इसे महज़ एक संयोग मानने की ग़लती करेंगे? जबकि यह एक ऐसी ‘वैचारिक पैबंदकारी’ है जहाँ पैबंद तो वैश्विक हैं मगर सुई ख़ालिद जावेद की अपनी है.
इस उपन्यास में जॉर्जिया (Georgia) की पृष्ठभूमि का चयन भी महज़ संयोग नहीं लगता. पूर्वी यूरोप का यह क्षेत्र विश्व सिनेमा (विशेषकर रहस्यमयी और डार्क फ़िल्मों) के लिए एक पसंदीदा स्थान रहा है. ख़ालिद जावेद के दृश्य-चित्रण में जो ‘ठंडापन’ और ‘अजनबीपन’ है, वह हमें जॉर्जियाई फ़िल्मकारों (जैसे तेंगिज़ अबुलाद्ज़े) की दृश्य-भाषा की याद दिलाता है. ऐसा महसूस होता है कि ख़ालिद साहब ने जॉर्जिया के नक़्शे को सिर्फ़ इसलिए चुना ताकि उनके ‘सपनों की तस्करी’ पर एक अंतर्राष्ट्रीय लिबास नज़र आ सके.
ख़ालिद जावेद के इस उपन्यास में भी वही ‘दोहराव’ वाला बयान है जो अब उनकी पहचान बन चुका है. अर्सलान की लंबी आत्म-कथाएँ, जहाँ वह अपने शरीर की गंध और वजूद के बोझ पर पन्ने काले करता है, वह सैमुअल बैकेट के उपन्यासों, जैसे ‘मैलॉय’ (Molloy) की उस ‘चेतना के प्रवाह’ (Stream of Consciousness) का भोंडा इस्तेमाल है जहाँ वाक्य दायरों में घूमते हैं. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि बैकेट के यहाँ यह दार्शनिक ज़रूरत थी, और ख़ालिद जावेद के यहाँ यह ‘पन्ने भरने’ का एक अभ्यास बन चुका है.
संक्षेप में यह कि “अर्सलान और बहज़ाद” वास्तव में एक ऐसा ‘उत्तर-आधुनिक कोलाज’ है जिसका सिर नील गेमन के पास है, धड़ काफ़्का के दफ़्तर में और पाँव यूनानी त्रासदियों की धूल में. ख़ालिद जावेद ने इन तमाम बिखरे अंगों को अपनी विशेष ‘घृणास्पद शैली’ के रेशमी धागों से सिलकर एक ऐसा ‘फ्रेंकेंस्टीन’ बनाया है जिसे उर्दू आलोचकों ने ‘नव-सृजन’ का खिताब दे दिया.
मुझे तो अब इस बात पर यकीन होता जा रहा है कि ख़ालिद जावेद का ‘रचनात्मक जादू’ वास्तव में उनकी ‘स्मृति की जादूगरी’ है. वे जिस विचार को हाथ लगाते हैं, पता चलता है कि वह पहले ही हॉलीवुड या यूरोपीय साहित्य के किसी संग्रहालय में सजा हुआ है.

(5)
इक्कीस एक सौ बाईस
नेटफ्लिक्स के कालचक्रों का देसी तमाशा
इस समय मेरे सामने ख़ालिद जावेद के ताज़ा उपन्यास “इक्कीस एक सौ बाईस” के पाकिस्तानी संस्करण की पीडीएफ मौजूद है. इस पर पिछले दिनों काफ़ी चर्चा हो चुकी है, लिहाज़ा उन बातों को दोहराने के बजाय मैं इस उपन्यास के उन स्रोतों की पड़ताल करूंगा जहाँ से इसके मुख्य विचार उधार लिए गए हैं.
ख़ालिद जावेद की रचनात्मक यात्रा का अध्ययन अब उस मुकाम पर पहुँच चुका है जहाँ मुझे यह तय करने में मुश्किल होती है कि मैं एक उर्दू उपन्यासकार को पढ़ रहा हूँ या किसी ऐसे ‘वैश्विक अनुवादक’ को जिसने पश्चिम के जटिल दर्शन और सिनेमाई अवधारणाओं को अपनी विशेष ‘घृणास्पद गद्य शैली’ का ऐसा लिबास पहना दिया है कि मूल पहचान ही मिट गई है. उनका नया उपन्यास “इक्कीस एक सौ बाईस” इसी सिलसिले की एक ऐसी कड़ी है जिसे अगर उर्दू फिक्शन का ‘महान चमत्कार’ कहा जा रहा है, तो इसकी वजह सिर्फ़ यह है कि हमारा औसत उर्दू पाठक अब तक नेटफ्लिक्स (Netflix) की जर्मन कृतियों और बोर्खेस (Borges) के समय संबंधी भूलभुलैया से उस तरह वाकिफ़ नहीं है जैसा कि लेखक महोदय हैं.
इस उपन्यास का शीर्षक ही हमें एक ऐसे ‘संख्यात्मक तिलिस्म’ की ओर ले जाता है जहाँ समय का पहिया अपनी जगह स्थिर होने के बजाय एक घेरे में घूम रहा है. लेकिन क्या यह ‘घेरा’ ख़ालिद जावेद की अपनी कल्पना की परकार (compass) ने खींचा है? जब हम इस उपन्यास की परतों को उलटते हैं, तो सबसे पहले जो ‘खुशबू’ (या उनकी शैली के अनुसार ‘सड़ांध’) हमारे नथुनों से टकराती है, वह जर्मन साइंस फिक्शन सीरीज़ ‘डार्क’ (Dark) की है. जिस तरह ‘डार्क’ में अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे के भीतर धँसे हुए हैं और पात्र अपने ही पूर्वजों या वंशजों से एक ऐसे समय के अंतराल में टकराते हैं जहाँ ‘अंत ही आरंभ है’, ठीक वही दर्शन इस उपन्यास की आत्मा है. ख़ालिद जावेद ने ‘विंडेन’ (Winden) के जंगलों को उठाकर उर्दू के विशेष सामाजिक परिवेश में इस तरह स्थानांतरित किया है कि पाठक को लगता है कि यह समय का टकराव शायद उनके अपने अवचेतन की कोई अनूठी खोज है. लेकिन रुकिए, हम इस ‘तिलिस्म-ए-होशरुबा’ की अब तक सिर्फ़ भूमिका ही बता रहे थे, फ़िल्म तो अब शुरू होती है.
“इक्कीस एक सौ बाईस” ज़ाहिर तौर पर एक अस्तित्ववादी त्रासदी और समय के उलझाव की कहानी लगता है, लेकिन गहराई में उतरें तो पता चलता है कि यह बरेली के एक कमरे में बैठकर तैयार किया गया वह ‘वैश्विक कोलाज’ है जिसके हिस्से नेटफ्लिक्स की सीरीज़, यूरोपीय दर्शन के क़ब्रिस्तानों और लातिनी अमेरिका की फंतासी से उधार लिए गए हैं. ख़ालिद साहब ने उर्दू के उस पाठक को, जो अब तक बोर्खेस के समय के भँवर और क्रिस्टोफर नोलन के ‘एन्ट्रॉपी’ (Entropy) वाले बयानों से अनजान है, यह विश्वास दिलाने की पूरी कोशिश की है कि ‘समय का चक्र’ (Circular Time) उनका अपना खोजा हुआ आध्यात्मिक सदमा है.
उपन्यास की नींव ही एक संख्यात्मक जादू पर है: 21/122. ये महज़ मकानों के नंबर नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा टाइम लूप (Loop) है जिसमें पात्र क़ैद हैं. पृष्ठ संख्या 37 पर ख़ालिद जावेद लिखते हैं:
“21/122. चुंगी दफ़्तर वालों ने अपने रिकॉर्ड के लिए इन दोनों मकानों के अलग-अलग नंबर ही रखे हैं जो अब मिलाकर एक मकान में बदल दिया गया है. महकमा-ए-डाक में भी यही पता रजिस्टर किया गया है.”
यह ‘दो मकानों का एक बन जाना’ और ‘नंबरों का गोरखधंधा’ वास्तव में बोर्खेस की कहानी “The Garden of Forking Paths” और मार्क ज़ेड डैनियलवस्की के मशहूर उपन्यास “House of Leaves” की उस तकनीक का उर्दू रूप है जहाँ इमारतें भौतिक वास्तविकता के बजाय ‘मानसिक अस्थिरता’ का नक़्शा बन जाती हैं. बोर्खेस के यहाँ समय एक ऐसी किताब है जिसके रास्ते एक-दूसरे में मिले हुए हैं, और ख़ालिद जावेद ने इसी दर्शन को उठाकर उर्दू की मिट्टी में ‘घृणास्पद शैली’ के साथ दफ़्न कर दिया है.
ख़ालिद जावेद का सबसे बड़ा ‘रचनात्मक हथियार’ वह ऊब और मतली है जिसे वे अस्तित्ववाद का नाम देते हैं. लेकिन इस उपन्यास में यह ऊब अब सार्त्र से आगे बढ़कर थॉमस बर्नहार्ड (Thomas Bernhard) के उस जुनूनी दोहराव तक जा पहुँची है जहाँ वाक्य खत्म होने का नाम नहीं लेते. उपन्यास के शुरुआती पन्नों से ही तपन, बदबू और शरीर की गंदगी का जो ज़िक्र शुरू होता है, वह सीधे तौर पर एमिल ज़ोला (Emile Zola) की प्रकृतिवादी (Naturalistic) शैली की भोंडी नक़ल महसूस होता है.
पृष्ठ संख्या 41 पर अस्पताल के दृश्य को देखिए:
“पूरे अस्पताल में रोशनी बहुत कम रखी गई है. सारा इलाज अंधेरे में हो रहा है और अस्पताल की लंबी घुमावदार अंधेरी गैलरियों में चलते-चलते वे भटक जाते हैं. मगर जहाँ वे भटकते हैं और जहाँ रोशनदानों की जालियों से आने वाली हवा एक जगह इकट्ठा होकर शोर करती है, दरअसल वहीं उनको जाना है.”
यह दृश्य चित्रण हमें फ़्रांज़ काफ़्का के उपन्यास “The Trial” के उन अनंत दफ़्तरों और गलियारों की याद दिलाता है जहाँ ‘जोसेफ़ के’ अपनी मुक्ति तलाशता फिरता है. ख़ालिद साहब ने काफ़्का के अस्तित्ववादी डर को उठाया और उसमें डेविड क्रोनबर्ग (David Cronenberg) के ‘बॉडी हॉरर’ (Body Horror) की गंदगी शामिल कर दी. क्रोनबर्ग की फ़िल्मों की तरह यहाँ भी शरीर सिर्फ़ मांस का लोथड़ा है जो सड़ रहा है, जल रहा है या कैंसर का शिकार है.
उपन्यास की मुख्य अवधारणा, जिसमें समय बार-बार दोहराया जाता है, वह फ्रेडरिक नीत्शे के विचार ‘अनंत दोहराव’ (Eternal Recurrence) का गद्य सारांश है. हालाँकि ख़ालिद साहब ने ईमानदारी का चोला ओढ़कर पृष्ठ संख्या 8 पर नीत्शे का हवाला दे दिया है, लेकिन यह महज़ हवाला नहीं बल्कि पूरे उपन्यास का ‘ढांचा’ ही नीत्शे के दर्शन की उधार ली हुई ईंटों पर खड़ा है. वे लिखते हैं:
“जब आप अंधेरे को घूरते हैं, तो अंधेरा भी आपको घूरता है.”
नीत्शे
सवाल यह उठता है कि क्या इस हवाले के बाद क्या लेखक को यह लाइसेंस मिल जाता है कि वह जर्मन सिनेमा की सीरीज़ “Dark” के पूरे प्लॉट को उर्दू में ‘रीसायकल’ कर दे? जिस तरह ‘डार्क’ में पात्र अपने ही अतीत और भविष्य से टकराते हैं और एक घेरे में क़ैद रहते हैं, ख़ालिद जावेद का पात्र भी इसी काल-कोठरी का बंदी है.
उपन्यास में एक पात्र है ‘तुग़रिल’ जो एक प्राइवेट जासूस है और जिसकी तुलना वनमानुष या गोरिल्ला से की गई है. पृष्ठ संख्या 159 पर उसका परिचय देखिए:
“वह बहुत दराज़-क़द (लम्बा) है. उसका चेहरा एक बड़े से उल्लू (Ape) से मिलता-जुलता है. उसके कान बहुत बड़े-बड़े हैं. इतने बड़े-बड़े कि उसकी गर्दन को छू रहे हैं.”
यह पात्र सीधे तौर पर एडगर एलन पो (Edgar Allan Poe) की कहानी “The Murders in the Rue Morgue” के उस ‘ओरंगुटान’ की याद दिलाता है जो इंसानी बस्ती में दरिंदगी का निशान बनकर उभरता है. इतना ही नहीं, तुग़रिल का यह अस्तित्ववादी रूप यूजीन ओ’नील (Eugene O’Neill) के नाटक “The Hairy Ape” की भी गूँज है जहाँ इंसान अपनी पाशविक प्रवृत्ति और सामाजिक ढांचे के बीच लटका हुआ है. ख़ालिद जावेद ने इन तमाम वैश्विक स्रोतों को हज़म करके एक ऐसा पात्र बनाया है जो उर्दू पाठक के लिए ‘अनोखा’ हो सकता है, मगर विश्व साहित्य के विद्यार्थी के लिए एक ‘दोहराया गया सपना’ है.
उपन्यास के एक और महत्वपूर्ण हिस्से, यानी ‘बर्न वार्ड’ (Burn Ward) और आग की अवधारणा को देखिए (पृष्ठ 42):
“आग लगी है डॉक्टर, आग. सारे बदन में आग लगी है. मैं जल गया, मैं जल रहा हूँ. मैं जल ही गया.”
यह आग सिर्फ़ भौतिक नहीं है, बल्कि यह अल्बेयर कामू के ‘नरक’ और ज्यां-पॉल सार्त्र के नाटक “No Exit” (Huis Clos) की उस स्थिति का उर्दू संस्करण है जहाँ ‘दूसरे लोग नरक हैं’. ख़ालिद जावेद के यहाँ भी पात्रों का एक-दूसरे से टकराव और समय की पीड़ा वास्तव में सार्त्र के उसी कमरे का विस्तार है जिसका कोई दरवाज़ा नहीं है. सार्त्र के यहाँ यह एक दार्शनिक ज़रूरत थी, मगर ख़ालिद साहब के यहाँ यह ‘पन्ने भरने का एक अभ्यास’ बन गई है जिसमें वे अपनी खास ‘घृणास्पद शैली’ का तड़का लगाते रहते हैं.
ख़ालिद जावेद के प्रशंसक शायद यह कहकर उनका बचाव करें कि उत्तर-आधुनिकतावाद में ‘कुछ भी मौलिक नहीं होता’, लेकिन यहाँ मामला मौलिकता का नहीं बल्कि उस ‘रचनात्मक ईमानदारी’ का है जो एक रचनाकार को अनुवादक से अलग करती है. इस उपन्यास की परतों में जो तस्करी छिपी है, वह इतनी गहरी है कि इसे ‘रचनात्मक छूट’ कहना साहित्य की ‘लूट’ होगी.
इस उपन्यास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और क्रूर रूपक ‘सफ़ेद भालू’ (White Bear) है. पृष्ठ संख्या 83 पर एक अजीबोगरीब नज़ारा देखिए:
“बचपन का उसका खिलौना, वह चाबी वाला सफ़ेद भालू. आओ मेरे दोस्त! उसने बर्फ़ानी भालू से कहा. भालू ने जवाब दिया कि अभी यहाँ आग नहीं आई है. और यह कहकर वह एक बर्फ़ की चट्टान पर चढ़कर ग़ायब हो गया.”
वाह! क्या कमाल की ‘खोज’ है. लेकिन क्या ख़ालिद साहब को नहीं पता कि ब्रिटिश सीरीज़ ‘ब्लैक मिरर’ (Black Mirror) की सबसे मशहूर कड़ी का शीर्षक ही “White Bear” है? वहाँ भी अपराध, सज़ा और एक अनंत समय चक्र (Loop) की वही कल्पना है जहाँ अपराधी को बार-बार उसी पीड़ा से गुज़ारा जाता है और दर्शक तालियाँ बजाते हैं. ख़ालिद जावेद ने ‘ब्लैक मिरर’ के इस तकनीकी डरावने सपने को उठाया और इसे ‘बचपन के खिलौने’ का मुखौटा पहनाकर उर्दू के समय चक्र में फ़िट कर दिया. यह संयोग नहीं है साहब, यह उस ‘उत्तर-आधुनिक दृश्य-कथानक’ की गद्य-लूट है जिस तक उर्दू के आम आलोचक की पहुँच दुर्भाग्यवश अभी संभव नहीं हो पाई है.
बात यहीं खत्म नहीं होती. ख़ालिद साहब के ‘वैश्विक आयात-निर्यात’ का एक और बड़ा प्रमाण उनका वह फ़ुटनोट है जो पृष्ठ संख्या 232 पर मौजूद है. वे लिखते हैं:
“यह शब्द (The Green Mile) स्टीफ़न किंग (Stephen King) ने अपने उपन्यास में इस्तेमाल किया है.”
यहाँ वे बड़ी चतुराई से एक शब्द को स्वीकार करके पूरे ‘विचार’ को अपना साबित करना चाहते हैं. स्टीफ़न किंग का उपन्यास “द ग्रीन माइल” सिर्फ़ एक शब्द नहीं है, बल्कि वह ‘मृत्यु के गलियारे’ की उस मनोविज्ञान का सार है जहाँ मासूमियत और पाप के बीच की रेखा मिट जाती है. ख़ालिद जावेद ने किंग की इस महान कृति से वह ‘मृत्युदंड की ऊब’ उधार ली और उसे अपने विशेष ‘घृणास्पद अस्पताल’ के माहौल में इस तरह पिरोया कि पाठक स्टीफ़न किंग को भूलकर ख़ालिद जावेद के जादू में खो जाए. यह स्वीकारोक्ति दरअसल उस ‘आयात’ को छिपाने की एक नाकाम कोशिश है जो पूरे उपन्यास के ढांचे में समा चुकी है.
आइए अब इस उपन्यास के आध्यात्मिक स्रोतों की तरफ़ चलते हैं. पृष्ठ संख्या 198 पर वे सीधे तौर पर प्रोमेथियस (Prometheus) का हवाला देते हैं:
“मेरा नाम प्रोमेथियस है. मैं देवलोक से आग चुराकर ले जा रहा हूँ. तुम आग चोर हो? हाँ, मैं आग चोर हूँ. मैं रोज़ आग चुराता हूँ और इंसानों की दुनिया में खामोशी के साथ रख आता हूँ.”
ख़ालिद जावेद ने यूनानी मिथकों के इस महान त्रासदी को उठाया और इसे अल्बेयर कामू के ‘द मिथ ऑफ़ सिसिफ़स’ (The Myth of Sisyphus) के साथ जोड़ दिया. कामू ने व्यर्थता (Absurdity) का जो दर्शन दिया था, ख़ालिद जावेद ने उसे ‘आग की चोरी’ और ‘समय चक्र’ के ज़रिए उर्दू में रीसायकल किया है. प्रोमेथियस का जिगर गिद्ध नोचते हैं, और ख़ालिद जावेद के पात्र की ‘आत्मा’ को उनकी अपनी विशेष शैली नोच रही है. यह कोई रचनात्मक संयोग नहीं बल्कि पश्चिमी अस्तित्ववाद के क़ब्रिस्तानों से निकाली गई वे हड्डियाँ हैं जिन पर उर्दू गद्य का मांस चढ़ाने की कोशिश की गई है.
उपन्यास में ‘समय’ का जो विचार दिया गया है, जहाँ अतीत और भविष्य एक-दूसरे को काटते हैं, वह सीधे तौर पर क्रिस्टोफर नोलन की फ़िल्म ‘टिनेट’ (Tenet) और ‘इंटरस्टेलर’ की समय संबंधी उलझनों का गद्य मिश्रण है. पृष्ठ संख्या 164 पर देखिए:
“वक्त गुज़र रहा है, मगर यह टुकड़ा, यह अंधेरा नहीं गुज़र रहा है. वह इस अंधेरे में क़ैद है, वह उससे बाहर नहीं आ सकता. हालाँकि वक्त गुज़र रहा है, ज़माना बीत रहा है. न हवा है न बारिश, न बादल है न कोई रंग.”
यह ‘समय से बाहर का समय’ (Time outside of Time) वास्तव में बोर्खेस के उस ‘अनंत क्षण’ (The Aleph) की नक़ल है जिसे बोर्खेस ने दशकों पहले कलात्मक पूर्णता के साथ बयान कर दिया था. ख़ालिद जावेद ने बोर्खेस के इस ब्रह्मांडीय विज़न को एक ‘अस्पताल के वार्ड’ और ‘गंदे नाले’ की गंदगी में क़ैद करके इसे ‘विकृत यथार्थवाद’ (Grotesque Realism) का नाम दे दिया. यह एक ऐसी ‘वैचारिक तस्करी’ है (चोरी नहीं कहूँगा क्योंकि इससे उनके कुछ मित्रों और शिष्यों की भावनाओं को ठेस पहुँचने का डर है) जिस पर उर्दू के प्रतिष्ठित आलोचक इसलिए सिर धुन रहे हैं क्योंकि उन्होंने बोर्खेस के ‘समय चक्रों’ की कभी सैर नहीं की है.
ख़ालिद जावेद की एक और ‘कुशलता’ उनकी सूची-लेखन है, जिसे उनके प्रशंसक ‘सूक्ष्म चित्रण’ (detail-oriented writing) कहते-कहते थकते नहीं (देखिए पृष्ठ 59, जहाँ वे ग्रहों, सितारों और सौर मंडल की सूचियाँ गिनाते हैं). यह तकनीक वास्तव में अम्बर्टो इको (Umberto Eco) के उपन्यासों, विशेष रूप से “The Name of the Rose” की उस शैलीगत पुनरावृत्ति का भोंडा उपयोग है जहाँ ‘विद्वता’ का रोब जमाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है. ख़ालिद साहब के यहाँ यह सूची-निर्माण उनकी अपनी कल्पना की कमी को छिपाने का एक तरीका है, जहाँ वे भारी शब्दों के पीछे अपने ‘रचनात्मक बंजरपन’ को छिपाते हैं.
संक्षेप में यह कि, “इक्कीस एक सौ बाईस” उर्दू साहित्य की वह कृति है जिसकी जड़ें स्टीफ़न किंग के ‘ग्रीन माइल’ में हैं, जिसका दम ‘ब्लैक मिरर’ के सफ़ेद भालू में घुट रहा है, और जिसकी आत्मा प्रोमेथियस के अधूरे दुख से उधार ली गई है. ख़ालिद जावेद ने इन तमाम वैश्विक टुकड़ों को अपनी विशेष ‘घृणास्पद शैली की हाँडी’ में डालकर एक ऐसा ‘उत्तर-आधुनिक सालन’ तैयार किया है जिसकी खुशबू तो विदेशी है, मगर बदबू उर्दू गद्य की अपनी है.
उनके प्रशंसकों के लिए यह ‘संयोग’ या ‘लाभ’ हो सकता है, लेकिन एक जानकार पाठक के लिए यह उर्दू फिक्शन की उस ‘नकली अमरता’ का वो जनाज़ा है जिसे जेसीबी और अन्य पुरस्कारों के सुनहरे ताबूत में बंद करके निकाला जा रहा है.
ख़ालिद जावेद के पाँच उपन्यासों की बिसात पलटने के बाद अब वक़्त आ गया है कि इस ‘रचनात्मक मूर्ति’ के पैर देखे जाएं, जो मिट्टी के नहीं बल्कि पश्चिम से उधार लिए गए ‘संगमरमर के चर्बों’ से बने हैं. उनके घोर प्रशंसकों का यह दावा कि उनकी शैली ‘अनोखी’ है और यह उनकी ‘सिग्नेचर ट्यून’ है, वास्तव में इस सच्चाई से आँखें चुराना है कि यह शैली उनकी अपनी रचनात्मक सहजता का फल नहीं बल्कि वैश्विक शैलियों का एक ऐसा ‘मिश्रण’ है जिसे बड़ी होशियारी से उर्दू के सांचे में ढाला गया है.
जिसे प्रशंसक ‘शैली’ कह रहे हैं, मैं उसे एक ऐसी ‘रचनात्मक ज़ंजीर’ समझता हूँ जिसने ख़ालिद जावेद को एक ही जगह स्थिर कर दिया है. एक महान लेखक, जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ, साहसी (Adventurer) होता है. वह हर नई कृति के साथ एक नया संसार खोजता है और अपनी ही बनाई मूर्तियों को तोड़ता है. लेकिन ख़ालिद जावेद के यहाँ मामला इसके उलट है. उनके पाँचों उपन्यास एक ही ‘दुर्गंध भरी सुरंग’ की यात्रा महसूस होते हैं जहाँ हर मोड़ पर वही ‘बदबू’, वही ‘गंदगी’ और वही ‘मौत’ का अर्थहीन शोर सुनाई देता है. यह शैली नहीं है, यह एक शैलीगत बांझपन है जिस पर ‘अनोखा’ का लेबल चिपका दिया गया है.
उनके प्रशंसकों का यह कहना कि उन्होंने ‘मौत के कई शेड्स’ (रंगों) को उभारा है, अकादमिक स्तर पर एक बेमानी बात है. मौत के दोहराव से मौत की समझ नहीं बढ़ती, बल्कि वह एक ‘मेटाफिजिकल लफ़्फ़ाज़ी’ बनकर रह जाती है. ख़ालिद जावेद के यहाँ मौत का कोई नया रंग नहीं है, बल्कि वही पुराना थॉमस बर्नहार्ड का ‘निराशा का सिलसिला’ और सैमुअल बैकेट की ‘अर्थहीनता’ है जिसे वे अपने हर उपन्यास में रीसायकल करते हैं. जिस तरह बर्नहार्ड के यहाँ वाक्य खत्म नहीं होते और ऊब एक निरंतर घेरे में घूमती है, ख़ालिद जावेद ने ठीक वही भाषाई औज़ार इस्तेमाल किया है. यह उनकी ‘सिग्नेचर ट्यून’ नहीं, बल्कि बर्नहार्ड और बैकेट का ‘उर्दू अनुवाद’ है जिस पर उन्होंने अपनी मुहर लगा दी है.
क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि उनके प्रशंसक जिसे ‘मौलिकता’ कहते हैं, वह वास्तव में एमिल ज़ोला के प्रकृतिवाद और ज्यां-पॉल सार्त्र की ‘मतली’ (Nausea) का वह सार है जिसे पश्चिमी साहित्य दशकों पहले हज़म करके थूक चुका है? ख़ालिद जावेद ने इन तमाम बिखरे अंगों को उठाया, उनमें थोड़ा सा ‘बरेली का दार्शनिक चूर्ण’ मिलाया और उर्दू पाठक को यह विश्वास दिला दिया कि यह उनका ‘निजी अस्तित्ववादी कष्ट’ है. क्या इसी को ख़ालिद जावेद के प्रशंसक “अनोखी शैली” कह रहे हैं?
हकीकत तो यह है कि ख़ालिद जावेद उर्दू फिक्शन के वह ‘फ्रेंकेंस्टीन’ हैं जिनके रचनात्मक महल की एक ईंट काफ़्का के दफ़्तर से आई है, तो दूसरी नील गेमन के सपनों से; जिसका एक झरोखा रोमन पोलान्स्की के पानी में खुलता है तो दूसरा स्टीफ़न किंग की मौत के गलियारे में. ख़ालिद जावेद का अपना हिस्सा सिर्फ़ वह ‘घृणास्पद गद्य’ है जो इन तमाम वैश्विक उत्कृष्ट कृतियों को जोड़ने के लिए गोंद का काम करता है.
उर्दू और हिंदी का वह समाज जो पुरस्कारों की चमक से प्रभावित होकर जिस लेखक के सामने झुका हुआ है, वह वास्तव में विश्व साहित्य के क़ब्रिस्तानों से हड्डियाँ चुनकर एक ‘नकली अमरता’ का ढांचा खड़ा करने वाला एक ऐसा कलाकार है जिसकी याददाश्त उसकी कल्पना से ज़्यादा मज़बूत है.
अंत में बस इतना कि शायर इक़बाल का ‘जावेद नामा’ अपने बेटे के नाम संदेश और एक महान ‘एशियाई डिवाइन कॉमेडी’ पर ख़त्म हुआ था. मेरा यह “जावेद नामा जदीद” भी एक तरह का ‘तमाशा’ ही साबित हुआ, जहाँ शोहरत के सातवें आसमान पर बैठे एक लेखक की ‘नकली अमरता’ का बुत चकनाचूर होकर ज़मीन पर आ गिरा है. इक़बाल के जावेद ने तो शायद अपने बाप की नसीहतें मान ली होंगी, लेकिन इस ‘जावेद’ के उन अंधभक्तों का क्या कीजिए जिनके क़रीब वैचारिक डकैती और शैलीगत दोहराव ही ‘मौलिकता’ का दूसरा नाम है. उनका वह ‘सिग्नेचर टोन’ असल में उन होमोफ़ोबिक (Homophobic) और पक्षपाती चीख़ों में दब गया है जो वैज्ञानिक बहस का जवाब गालियों से देने के आदी हैं. मेरा यह हिसाब-किताब किसी द्वेष का नतीजा नहीं, बल्कि उस ‘साहित्यिक ईमानदारी’ का तक़ाज़ा था जिसे मैंने शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की चौखट से सीखा है.
मैं खालिद जावेद का अब भी उतना ही अच्छा दोस्त हूँ जितना हेमिंग्वे का दोस्त शेरवुड एंडरसन (Sherwood Anderson) था, जिसने दोस्ती का हक़ भी निभाया और वक़्त पड़ने पर अपने चहेते लेखक की कला की ‘पैरोडी’ लिखकर उसे उसका असली चेहरा भी दिखा दिया.
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अशअर नज्मी उर्दू के सुपरिचित लेखक हैं. 2021 में प्रकाशित उनके उपन्यास उसने कहा था को उर्दू का पहला पोस्ट्माडर्न नॉवेल माना जाता है. उनके दो अन्य उपन्यास शून्य की तौहीन और काँग्रेस हाउस का हिन्दी अनुवाद ‘सेतु प्रकाशन’ और ‘राजपाल एण्ड संस’ छाप चुके हैं. इसके अतिरिक्त दो उर्दू लघुकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. पिछले दो दशकों तक भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री से जुड़े रहे, जहां उन्होंने कई टीवी धारावाहिक लिखे. 2008 से उर्दू साहित्यिक पत्रिका ‘इसबात’ के संपादक पद पर कार्यरत हैं. वो मुंबई में रहते हैं. asharnajmi2020@gmail.com |




अशअर नज़्मी की मौजूदा आलोचना की भाषा में ही निजी खुन्नस—या यूँ कहें कि व्यक्तिगत टकराव—का तत्व काफ़ी स्पष्ट दिखाई देता है। फिर भी, यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरी आलोचना सिर्फ़ खुन्नस पर आधारित है।
यह पूरा मामला इससे कहीं अधिक जटिल है। इसकी बारीकियाँ वह बेहतर समझ सकता है जिसकी नज़र उर्दू साहित्य, उसकी आलोचना और उसकी भीतरी राजनीति पर हो।
निःसंदेह यह एक वास्तविक आलोचनात्मक उपक्रम है, परंतु इसके ऊपर व्यक्तिगत संघर्ष ने अभियोगात्मक लहज़े की एक मोटी परत चढ़ा दी है। नज़्मी के इस आलोचनात्मक लेख की भाषा खटकती है; और इसलिए भी खटकती है क्योंकि वे बार-बार अपने पुराने संबंधों का हिसाब पेश करते हैं:
> “मैं उनका समर्थक था…” | “मैंने उनका क़द ऊँचा किया…” | “मैंने उनके लिए लिखा…” | “दस वर्षों की मुरव्वत…” | “अब पर्दा तार-तार हो गया…” | “अब मैं पोस्टमॉर्टम करूँगा…”
>
यह विशुद्ध साहित्यिक आलोचना (pure literary criticism) की भाषा नहीं है, बल्कि विश्वासघात (betrayal) और क्षोभ की भाषा है।
ऐसा लगता है मानो आलोचक केवल यह नहीं कह रहा कि “मैंने ख़ालिद जावेद को नए सिरे से पढ़ा और मेरी राय बदल गई”, बल्कि उसके भीतर यह भाव भी है कि “जिस व्यक्ति को मैंने बनाया/समर्थन दिया, उसने मेरे साथ वैसा व्यवहार नहीं किया जैसी मुझे अपेक्षा थी; इसलिए अब मैं दिखाऊँगा कि वह वास्तव में क्या है।”
अशअर नज़्मी ने ख़ालिद जावेद की आलोचना में पर्याप्त विद्वत्ता का परिचय दिया है, लेकिन वे अपने व्यक्तिगत विवाद को अपनी आलोचना से बाहर नहीं रख पाए। कई जगह यह निजी कलह आलोचना में इस कदर पैठी हुई है कि दोनों को अलग करके देखना बहुत कठिन हो जाता है।
ऐसे में उनकी मौजूदा आलोचना को “निष्पक्ष साहित्यिक फ़ैसला” नहीं, बल्कि “विद्वत्तापूर्ण सामग्री से निर्मित अभियोग-पत्र” पढ़ना अधिक समीचीन होगा।
कुल मिलाकर, यह आलोचना निजी खुन्नस से उपजे अभियोगात्मक रुख़ (prosecutorial stance), वास्तविक विद्वत्ता, टूटे हुए मोह की प्रतिक्रिया और साहित्यिक प्रतिद्वंद्विता का एक दिलचस्प मिश्रण है।
अशअर नज़्मी बनाम ख़ालिद जावेद का यह पूरा मामला उर्दू आलोचना की किसी नई विकृति से ज़्यादा उसकी पुरानी परंपरा का विस्तार लगता है। यह ढाँचा पुराना है: पहले किसी को बड़ा रचनाकार मानना, उसके साहित्य की पैरवी करना, उसके साहित्यिक घेरे में शामिल होना; और संबंध बिगड़ते ही उसी रचना-संसार को नए चश्मे से पढ़ना, पुरानी प्रशंसा को उलट देना और फिर कमज़ोरियों को पूरी आक्रामकता के साथ उजागर करना।
साहित्यिक आलोचना के क्रम में “मैंने अपना मत बदला है” और “अब मैं साबित करूँगा कि तुम्हारी असलियत क्या है” के बीच का यह अंतर न केवल आलोचना की साख, बल्कि आलोचक की निष्पक्षता को भी संदिग्ध बना देता है।
गौहर हयात साहब,
आपकी इस बारीक नज़र के लिए शुक्रिया। आपने आलोचक की ‘मनःस्थिति’ और ‘निजी संबंधों’ का जो मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है, वह अपनी जगह दिलचस्प हो सकता है, लेकिन साहित्य की अदालत में फ़ैसला अंततः ‘साक्ष्यों’ (evidences) और ‘तर्कों’ की बुनियाद पर होता है।
चलिए, इस बहस से निजी खुन्नस और व्यक्तिगत टकराव के तत्वों को थोड़ी देर के लिए निकाल देते हैं। इस विस्तृत लेख में ख़ालिद जावेद के उपन्यासों का थॉमस बर्नहार्ड, रोमन पोलान्स्की, नील गेमन, नेटफ्लिक्स की सीरीज़ ‘डार्क’, एमिल ज़ोला और बोर्खेस जैसे वैश्विक म़ाखज़ों (sources) के साथ जो तुलनात्मक अध्ययन किया गया है, उस पर आपकी क्या राय है? क्या आप इन तकनीकी और वैचारिक साक्ष्यों को खारिज करने के लिए कोई ठोस साहित्यिक दलील रखते हैं?
इधर-उधर की बातों के बजाय मैं इन ‘मूल मुद्दों’ पर आपकी विद्वत्तापूर्ण प्रतिक्रिया जानने के लिए बेहद बेचैन हूँ।
उर्दू में कुछ दिनों से एक नई परंपरा पनप रही है। साहित्यिक आलोचना को “दुश्मनी” या “खुन्नस” के रूप में देखा जाने लगा है।साहित्य में तर्क और साक्ष्यों का जवाब तर्क और साक्ष्य होते हैं। विक्टिम कार्ड या चरित्र हनन से आलोचनात्मक पाठ पर हमला करना बताता है कि विरोधी के पास असली मुद्दे के जवाब में कहने को कुछ नहीं है। लेकिन विश्व साहित्य की इतनी सारी किताबें पढ़ना, फिल्में और वेबसेरीज़ देखना, और फिर उनको हजम करके उनका विश्लेषण करने में सब्र और मेहनत दोनों लगती हैं, मुझे नहीं लगता कि कोई मेरा जवाब देने के लिए इतनी तकलीफ़ उठाएगा।
ताज्जुब की बात तो यह है कि किसी एक जगह भी *चोरी* को सिद्ध नहीं किया गया है। और इस आलोचक विशेष ने इतने कम समय मे पश्चिमी साहित्य और सिनेमा का ऐसा गहन अध्ययन कैसे कर लिया, यह भी भी समझ में नहीं आया। किसी एक जगह भी नकल का कोई प्रमाण नहीं। उस alchemy की तरफ़ इशारा भर है जिसके बिना किसी महान रचना की कल्पना करना कठिन है।
लम्बे अन्तहीन वाक्यों का शिल्प कॉपी नहीं किया जा सकता। जिसके पास लम्बे वाक्यों को लिखने का फ़न नहीं है वह इस शैली की नकल कर ही नहीं सकता।
क्या Jon Fosse James Joyce की नकल कर सकते हैं?
मेरा पहला सवाल नज़्मी साहब के अध्ययन की विपुलता को लेकर है। दूसरा सवाल यह है कि मसलन ऑब्जेक्ट्स की डिटेल्ड लिस्टिंग में कोई किसी की नकल भला कैसे कर सकता है? मितली के कॉपीराइट क्या केवल Sartre के पास हैं? ख़ालिद जावेद की *सडांध* पर जो मास्टरी है, उसका संधान क्या किसी के प्रभाव मात्र से इस पैमाने पर किया जा सकता था?
आपकी विद्वत्तापूर्ण टिप्पणी और इस ‘विमर्श’ में शामिल होने के लिए आभार। आपने ‘शिल्प’ और ‘अध्ययन की विपुलता’ को लेकर जो सवाल उठाए हैं, वे पहली नज़र में वाजिब लगते हैं, लेकिन गहरे साहित्यिक विश्लेषण की कसौटी पर वे ‘बौद्धिक बचाव’ (Intellectual Defense) की श्रेणी में आते हैं।
आपके संशयों पर अब मैं कुछ तार्किक तथ्य पेश करने की कोशिश करता हूँ :
किसी लेखक या आलोचक की दशकों की साधना और 67 प्रकाशित पुस्तकों के वैचारिक भंडार को ‘कम समय’ के चश्मे से देखना थोड़ा विस्मित करता है। अध्ययन कोई ‘ओवरनाइट’ प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक ‘सतत चेतना’ (continuous consciousness) है। जब हम किसी संरचना (Structure) को देखते हैं, तो हमारी स्मृति के ‘डेटा बैंक’ में मौजूद वैश्विक प्रतिरूप (blueprints) स्वयं सक्रिय हो जाते हैं। यह अध्ययन की ‘विपुलता’ ही है जिसने खालिद जावेद की ‘खामोश तस्करी’ की शिनाख्त की है।
बेशक, लंबे और अंतहीन वाक्यों को लिखने के लिए ‘फ़न’ चाहिए, लेकिन सवाल वाक्यों की लंबाई का नहीं, बल्कि उन वाक्यों के पीछे काम कर रहे ‘मनोवैज्ञानिक आर्किटेक्चर’ (Psychological Architecture) का है। थॉमस बर्नहार्ड ने ‘मिश्रित वाक्यों’ और ‘ऊब के दोहराव’ (Iterative Boredom) का जो विशिष्ट प्रारूप गढ़ा था, खालिद जावेद ने ठीक उसी ‘मानसिक लय’ को उर्दू में स्थानांतरित किया है। इसे ‘अल्केमी’ (Alchemy) कहना तब सही होता जब यह प्रारूप खालिद जावेद की अपनी मिट्टी से पैदा होता। यहाँ तो पूरा ‘ढाँचा’ ही आयातित है। शिल्प की नकल करना भी ‘कॉन्सेप्चुअल प्लैजरिज़्म’ ही कहलाता है।
जॉन फॉसे जब जॉयस से प्रभावित होते हैं, तो वे अपनी जड़ों (Norwegian context) और जॉयस के बीच के ‘तनाव’ को स्वीकार करते हैं। महानता ‘प्रभाव’ स्वीकार करने में है, उसे ‘स्व-निर्मित चमत्कार’ बनाकर पेश करने में नहीं। खालिद जावेद का मसला यह है कि वे बर्नहार्ड, ज़ोला और नील गेमन की ‘रूह’ को कब्ज़ाते तो हैं, मगर नाम लेने पर जानबूझकर अनजान बनना का परदा तान लेते हैं।
‘मतली’ (Nausea) पर सार्त्र का कोई कानूनी कॉपीराइट नहीं है, लेकिन सार्त्र ने अस्तित्ववादी घृणा को ‘वस्तुओं’ (objects) के माध्यम से जिस ‘तकनीकी क्रम’ (Technical Sequence) में पिरोया था, वह उनका ‘बौद्धिक आविष्कार’ था। एमिल ज़ोला की ‘लिस्टिंग’ तकनीक (Kitchen sink realism) और गंटर ग्रास का विवरणवाद, खालिद जावेद के यहाँ महज़ प्रभाव नहीं बल्कि ‘सांस्थानिक चोरी’ (Institutional Theft) है। जब आप एक ही लेखक के पाँचों उपन्यासों में अलग-अलग वैश्विक शाहकारों के ‘ब्लूप्रिंट’ हूबहू पाते हैं, तो उसे ‘संयोग’ या ‘अल्केमी’ कहना खुद को धोखा देने जैसा है।
सड़ांध और वितृष्णा (Grotesque Realism) पर खालिद जावेद की जो ‘मास्टरी’ आपको दिख रही है, वह वास्तव में यूरोपीय Post-modernism का वह ‘मवाद’ है जिसे उन्होंने उर्दू पाठक के लिए ‘स्वाद’ बना दिया है। यदि किसी ने एमिल ज़ोला और थॉमस बर्नहार्ड को उनकी मूल संवेदना के साथ पढ़ा हो, तो उसे खालिद जावेद की ‘मास्टरी’ के पीछे छिपा ‘अनुवादक’ साफ़ नज़र आ जाएगा।
अंततः, साहित्य की अदालत में ‘चोरी’ सिर्फ शब्दों की नहीं होती, ‘विचारों के शिल्प’ और ‘कल्पना के प्रारूप’ की भी होती है। खालिद जावेद ने जिस ‘आर्किटेक्चरल प्लान’ पर अपना महल खड़ा किया है, उसके नक्शे दूसरे देशों के संग्रहालयों में सजे हुए हैं।
आशा है कि ‘समग्र अध्ययन’ (Close Reading) के बाद आपको इन ‘साक्ष्यों’ की गूँज सुनाई देगी।
“आलोचकों की किसी बात पर जरा ध्यान नहीं देना चाहिए, उनके लिए कभी कोई स्मारक नहीं बना ”
जीन सिबेलियस का यह कथन हालांकि आलोचना के प्रति परहेज बरतने या बदगुमान होने के लिए पर्याप्त आधार है लेकिन समालोचन पर प्रकाशित अशअर नज़मी के ‘जावेदनामा’ के विस्तृत अध्ययन- आलेख पर जिस तरह हमारे लेखक टूट कर पड़े हैं, वह आलोचना के न्यूनतम दायरे का ही मामला नहीं लगता है क्योंकि यदि लेखक को कुछ या अपने जाने जैसा भी लिखने की छूट है तो क्या आलोचक को उसे अपनी तरह से आजमाइश की छूट नहीं होगी? हमारे कई भागीदार हिन्दीभाषी विमर्शकर्ताओ के मुताबिक तो: कतई नहीं । उनके लिए तो मामला सिर्फ निजी कटुता और खुंदक की बाइनरी का ही है। बगैर यह जाने कि उर्दू अदब के दो आला अदीबों के बीच वस्तुतः क्या कुछ रहा होगा?
सवाल यह है कि मामला यदि निजी कटुता और खुंदक का भी है तो क्या इससे उस विस्तृत अध्ययन- आलोचकीय निगाह से निकले तर्कों को तिलांजलि दे देनी चाहिए ? क्या हम उस आलोचना की अवहेलना कर सकते हैं जो कोई सुदूर पूर्व के विश्व साहित्य से लेकर आधुनिक ओटीटी प्लेटफॉर्म तक होने वाली कलात्मक गतिविधियों से खोज- खंगाल कर ला रहा है? जबकि वह खुद उसी दुनिया का एक समाद्रत लेखक है। तो क्या उसके पीछे एक महज खुन्नस ही कार्यरत होगी? फिर उस खुन्नस के प्रतिपक्ष का क्या जो अभी तक खालिद जावेद को ‘ न भूतो न भविष्यति’ जैसा सिर चढ़ाने में मगन घूम रहा था? बात अशअर नजमी या खालिद जावेद साहब को कमतर या बढ़ा-चढ़ाकर रखने की है ही नहीं; यह दो अदीबों की अपनी लेखकीय आजादी का मामला है। एक ने ले ली जिसे कुछ लोगों ने गले लगा लिया। अब दूसरा उससे अलग आजमाइश कर रहा है और ऐसा करते हुए वह बाकायदा अपने पत्ते खोल रहा है, अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा है और उन किताबों-फिल्मों के उद्धरणों में जा रहा है, तो क्या यह उसका आलोचकीय दायरा नहीं है? यहां उसकी नीयत पर प्रश्न दागने का क्या मतलब है? बल्कि दाद देनी चाहिए उस आलोचक की जो इस शब्दावली और इतनी भाषिक सघनता के बावजूद अपनी गरिमा बनाए हुए है। हिंदी में कोई इस तरह का असहमति पत्र मेरे जेहन में तो नहीं आया दिखता है।
अलावा इसके, यह कैसी बात हुई कि खालिद जावेद जब हिंदी के घोर औसत लेखकों की किताबों की अनुशंसाएं कर रहे थे( जो कि उनका हक था )तब कोई उनसे यह सवाल नहीं करता था कि यह आप क्या – क्यों कर रहे हैं? उर्दू अदब में जो कद है (या जिसकी छाया अभी तक आई थी) वह बहुत जल्द यहां किसी काम का नहीं रह जाएगा क्योंकि जब पाठक आपकी अनुशंसित हिंदी किताबें पढ़ेंगे तब वे उस लेखक को नहीं, आपका गला पकड़ेंगे! मैं सोचता हूं कि यहां गलती जावेद साहब की न होकर उन हिंदी लेखकों की ही अधिक रही होगी जो एक ठीक ठाक भर लेखक को अदब का खुदा बनाने पर लगे रहे या फिर उनकी किंचित प्रसिद्धि पर सवार होना चाह रहे थे।
मुझे ज्यादा रहम अलबत्ता उन लोगों पर आया जो ‘समालोचन’ को कोसने लगे हैं क्योंकि यह आलेख वहां प्रकाशित हुआ! यही है आपकी उदारता जो अदब सिखाता है! यही है किसी लोकतांत्रिक मंच पर आपकी आस्था! किसी सच्ची या बड़ी पत्रिका में तमाम तरह की रचनाओं की गुंजाइश रहनी चाहिए और उस तरह की रचनाएं तो खास तौर पर जो अध्ययन के नए इलाकों में पाठक को ले जाती हैं। उर्दू अदब का मेरे देखा यह खास अनुभव है कि वह अतिशयोक्तियों में खेलती है। यही इसकी तासीर है। मैंने जब खालिद जावेद का शम्सुर रहमान फारुकी पर लिखा संस्मरण पढ़ा तो मुझे अफसोस ही हुआ कि ये लोग क्या करते हैं? किसी ने सर्दी के दिनों में मेहमान के लिए बाथरूम का हीटर चला दिया तो वह खुदा हो गया! इस लेख को पढ़ते हुए पहली बार मुझे लगा कि उर्दू आलोचना में ऐसे गोशे भी हैं जहां किसी रचना या रचनाकार को जमीन पर खड़े होकर, उसे खुदा बनाए बगैर, उसकी आंखों में आंखें डालकर, उसके रचे पर प्रश्न किए जा सकते हैं। आप प्रश्नों की धार और तार्किकता को पकड़िए, लेखक की नीयत -जिसे आप बदनियत कहते हैं – उसको कूड़े में डालें।
मुझे तो यह लेख उर्दू अदब के एक महत्वपूर्ण लेखक को फिर से पढ़े जाने की तरफ ही प्रेरित करता है जिसके लिए अशअर नजमी और समालोचन दोनों धन्यवाद के पात्र होंगे।
बेशक़ तक़लीद एक फर्सुदा अमल है। लिहाज़ा तक़लीद से परहेज़ ज़रूरी है, और इस से भी ज़्यादा ज़रूरी है बिना ग़ौर और फ़िक्र एक अच्छी तनक़ीद को निजी खुन्नस का खिताब अता करना। बहर हाल, नक़्क़ाद की तमाम बातें इस पैराग्राफ में आकर सिमट गई हैं।
“उत्तर-आधुनिकतावाद में ‘कुछ भी मौलिक नहीं होता’, लेकिन यहाँ मामला मौलिकता का नहीं बल्कि उस ‘रचनात्मक ईमानदारी’ का है जो एक रचनाकार को अनुवादक से अलग करती है. इस उपन्यास की परतों में जो तस्करी छिपी है, वह इतनी गहरी है कि इसे ‘रचनात्मक छूट’ कहना साहित्य की ‘लूट’ होगी.”
हम उम्मीद करते हैं कि नक़्क़ाद बाक़ी टिप्पणियों की तरह इस टिप्पणी को भी एक मर्तबा देख लें, क्योंकि मतन से अलग, आलोचना की ज़बान के मुतल्लिक कुछ कहना हम ज़रूरी समझते हैं। यानी, आलोचना में लगभग हर उपन्यास की तनक़ीद के दौरान उर्दू के मासूम पाठक को खूब ताने दिए गए हैं। और इस की अदम वाक़ीफियत का रोना रोया गया है।लगभग हर उपन्यास को कोलाज भी कहा गया है।
इन बातों की निशान दही करने का मकसद सिर्फ इतना है कि तनक़ीद पूरी होने तक दोहराव बन जाती है। अल्फ़ाज़ के इंतेखाब में थोड़ी रद्द ओ बदल इस आलोचना को पढ़ने में मजेदार बना सकती थी। बहर हाल हर इंसान का अपना उस्लूब होता है।
अशअर नज़्मी का ख़ालिद के उपन्यासों पर लिखा सुदीर्घ लेख उबाऊ सही, पढ़ने लायक है। उन्होंने जिस शिद्दत से ख़ालिद के उपन्यासों को दुनिया भर की किताबों और फ़िल्मों में अनुकूलित (appropriate) करने की कोशिश की है, उससे अशअर साहब की मंशा के बावजूद यही पता चल रहा है कि ख़ालिद की सर्जनशीलता के स्रोत कितने विविध और व्यापक हैं, वे कितने समयों और देशों में फैले हैं। यह लेख दरअसल निन्दा के आवरण में ढँकी ख़ालिद के उपन्यासों की प्रशंसा है। पैनॉक्स ने इसीलिए कहीं लिखा था: Content betrays itself] यही अशअर साहब के लेख के साथ हुआ है। उनकी निन्दा के बीच से ख़ालिद के उपन्यासों की प्रशंसा झाँक रही है। वे निन्दा लिखने बैठे थे और प्रशंसा लिख गये। पाठक को चाहिए कि वह निन्दा के छिलके को उतारकर इस लेख में विस्तार से लिखी ख़ालिद के उपन्यासों की प्रशंसात्मक व्याख्या को पढ़े। यह सब लिखने की जगह अगर अशअर साहब सीधे-सीधे ख़ालिद के उपन्यासों की तारीफ़ लिख देते, (वे अपने बावजूद यही कहीं भीतर चाहते भी रहे होंगे) तो वे अपनी कमतरी को उद्घाटित करने से बच जाते।
आपकी इस विलक्षण ‘वक्रोक्ति’ और सर्जरी की मेज़ पर पड़े नग्न साक्ष्यों को खालिद भाई के पक्ष में ‘वरदान’ बना देने की कला के लिए आभार। आपने ‘निंदा के छिलके’ उतारकर जिस ‘प्रशंसा’ को ढूंढ निकाला है, वह आपकी उस ‘आलोचनात्मक उदारता’ का प्रमाण है जहाँ चोरी का माल बरामद होने पर भी आप ‘जेबकतरे’ की पसंद (Taste) की प्रशंसा करना जानते हैं।
आपने बिल्कुल सही पहचाना, इस लेख में वाक़ई ‘प्रशंसा’ छिपी है—मगर वह प्रशंसा नील गेमन, थॉमस बर्नहार्ड और ‘डार्क’ के उन अछूते ‘आर्किटेक्चरल ब्लूप्रिंट्स’ की है, जिन्हें खालिद भाई ने इतनी शिद्दत और खामोशी से अपना लिया कि आपने उसे उनकी ‘सर्जनशीलता की विविधता’ समझ लिया। अगर दूसरे के द्वारा गढ़ी गई ‘सांस्थानिक जटिलताओं’ को बिना पावती (Acknowledgment) के अपनी मिट्टी में खपाना ‘व्यापकता’ है, तो फिर मौलिकता और तस्करी के बीच का अंतर तो आपके शब्दों में ही विलीन हो गया। ऐसा बचाव आप जैसा कलाकार ही कर सकता था।
रही बात मेरी ‘कमतरी’ के उद्घाटन की, तो साहब! इसमें कोई संदेह ही नहीं कि मैं खालिद जावेद साहब की तरह मंझा हुआ ‘तस्कर’ नहीं हूँ जिनके संरक्षण के लिए आप जैसा कस्टम अधिकारी मौजूद हो।
रही बात मेरी ‘कमतरी’ और लेख के ‘उबाऊ’ होने की, तो साहब! मुझे प्रसन्नता है कि उबाऊ चीज़ों को भी ‘पढ़ने लायक’ समझने की जो दुर्लभ कला आपने विकसित की है, वह निश्चित रूप से ख़ालिद भाई के बोझिल और उबाऊ उपन्यासों को निरंतर पढ़ने के उस ‘कठिन रियाज़’ का ही सुमधुर परिणाम होगी, जिससे आप वर्षों से गुज़र रहे हैं।
इस आर्टिकल के सामने आने पर पहले हल्की सुगबुगाहट, फिर कुछ हो हल्ला और अब ख़ेमे बंदी देखने को मिल रही है। मैं उस तक़रीर और जिरह में नहीं जा रहा। लेकिन इतना ज़रूर कहूंगा कि अशअर नज़्मी ने यहां ख़ालिद जावेद की रचनाओं पर ज्यादा नहीं कहा है, बल्कि वे ढूंढ कर लाए हैं कि उनकी कौन कथा दुनिया की किस जुबां के गल्प पर मबनी है ! यह सब रचना और आलोचना की द्वन्द्वात्मकता तथा रचना और रचनाकार की ईमानदारी के अलग अलग लाइटहाउस के बीच पसरे कुंहासे के बीच खेल करने जैसा है। नहीं तो नज़्मी को ये नहीं कहना पड़ता — मैं उनका समर्थक था / मैने उनके लिए लिखा. …. आदि, इत्यादि।
महाआख्यानों के मूल्यांकन के समय एक्जामिनर को अभिव्यक्ति के संकट तथा रचनाकार के बाह्य संघर्ष को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए, साथ ही रचना के बुनियादी सरोकार पर ज्यादा रोशनी डालनी चाहिए — ऐसे फ्रेम में रखकर ही यदि किताब को कसा जाएगा तो हम उस मार से बच सकते है जो टर्लिंग ने कहा था :
“अगर फ्रायड का कहना था कि हम सब बीमार हैं तो मेरा कहना है कि हम सब ग़ैर-मेयारी हैं। हमारी क्या मजाल कि हम किसी अच्छी किताब को रद्द करें, दरअसल वो तो अच्छी किताब ही होती है जो हमें रद्द करती है।”
आपकी इस दार्शनिक जिरह और ‘कुहासे’ को साफ़ करने की कोशिश के लिए आभार। आपने रचनाकार के ‘बाह्य संघर्ष’ और ‘अभिव्यक्ति के संकट’ की ढाल बनाकर ख़ालिद जावेद की ‘वैचारिक तस्करी’ को जो सुरक्षा कवच प्रदान किया है, वह अकादमिक स्तर पर तो आकर्षक लग सकता है, लेकिन साहित्यिक ईमानदारी की कसौटी पर बेहद कमज़ोर है।
साहब! जिसे आप ‘ढूँढ कर लाना’ कह रहे हैं, वह दरअसल उस ‘चोरी की शिनाख्त’ है जिसे ‘महानता’ के लेबल तले दबा दिया गया था। क्या ‘अभिव्यक्ति का संकट’ किसी लेखक को यह नैतिक अधिकार देता है कि वह नील गेमन या थॉमस बर्नहार्ड के ‘आर्किटेक्चरल ब्लूप्रिंट’ को चुपचाप अपनी कोख में पाल ले? मैंने अपने पिछले संबंधों का ज़िक्र ‘मुरव्वत’ के लिए नहीं, बल्कि उस ‘प्रायश्चित’ (Atonement) के तौर पर किया है जो एक सजग आलोचक को तब करना पड़ता है जब उसे पता चले कि जिसे वह ‘शाहकार’ समझ रहा था, वह महज़ एक ‘चालाक तस्करी’ का परिणाम था।
रही बात ट्रिलिंग के उस उद्धरण की, तो महोदय— अच्छी और महान किताब हमें तब रद्द करती है जब वह ‘असली’ (Authentic) हो। जो कृति खुद दूसरों की रचनात्मक जागीर पर डकैती डालकर खड़ी की गई हो, वह किसी स्वतंत्र आलोचक को रद्द नहीं कर सकती, बल्कि साक्ष्यों की धूप में खुद अपना ही ‘जुआ’ (Gamble) हार जाती है।
साहित्य के बुनियादी सरोकार ‘ईमानदारी’ से शुरू होते हैं, और जहाँ ईमानदारी ही आयातित हो, वहाँ आलोचना का नश्तर चलना अनिवार्य हो जाता है।
जयकारों के बीच एक हरकारा ग़लत हांक लगा गया। ये समीक्षा जावेद के लिखे की ओर और भी खींचेगी, जिन्होंने नहीं पढ़ा है, वे भी उन्हें पढ़ेंगे, इस अर्थ में यह लेख सार्थक हुआ। यह जान कर ख़ुशी हुई कि उर्दू-जगत भी हिंदी-जगत का ही हम-क़दम निकला। मां के घर के जैसे फ़ितने मौसी के घर में भी हैं।
समालोचन का काम है, भिन्न दृष्टियों को सामने लाना और दृष्टि-भंग को भी। पत्रिका को निशाना न बनाकर लेख पर केंद्रित रहा जाए तो बेहतर होगा।
अतिरिक्त, अतृप्त और अतिरेकी भाव से कृतार्थ, अर्थात् और हितार्थ के कोने-कोने छानता यह लेख मेरे लिए शार्क-फिन सूप जैसा है, जिसे मैंने कभी नहीं पिया।
समालोचन पर प्रकाशित ख़ालिद जावेद के उपन्यासों पर अशअर नज़्मी के आलेख में कुछ अतिरंजनाओं और पूर्वग्रहों के होने की बात स्वीकार की जा सकती है, मगर नज़्मी साहब का यह लेख विश्व की विभिन्न औपन्यासिक कृतियों और फ़िल्मों के विशद अध्ययन पर आधारित एक शानदार आलोचनात्मक आलेख है। कल रात इसे पढ़कर मैं विस्मित रह गया कि ऐसे भी लिखा जा सकता है!
दिलचस्प यह है कि उपन्यास-आलोचना पर ऐसा अनूठा आलेख उर्दू अदब के तनक़ीदी इदारे से आया है। मैं इस आलेख को कम-से-कम चार दफ़े पढ़ूँगा।
याद आता है कि आलेख में जिस जर्मन Dark सीरीज़ का ज़िक्र आया है, उसे मैंने कोरोना-काल में बड़े धैर्य से, धीरे-धीरे देखा था।
और जिन्हें ऐसा लगता है कि यह मज़मून निजी खुन्नस, ईर्ष्या इत्यादि के अतिरिक्त कुछ भी सामने नहीं लाता, वे ख़ालिद जावेद के उपन्यासों के बचाव में इससे बेहतर आलेख लेकर सामने आ सकते हैं और नज़्मी साहब की स्थापनाओं को ख़ारिज कर सकते हैं।
अशअर नज़्मी के लेख को पढ़ कर पता चला कि आस्तित्विक पीड़ा-घुटन; चेतना संपन्न मनुष्य का अपने भीतर के पशु से साक्षात्कार (उसकी ख़ून -पसीने-कफ़-पित्त-वात युक्त देह ); वह जो जीवनदायी है (भोजन) उसी के विष में बदल जाने आदि जैसे कई मूलभूत अहसास और कठिनाइयाँ जो किसी साहित्यिक कृति की बुनियाद रचते हैं, उनका एक मुश्त ठेका पश्चिमी देशों के पास है. गोया कि ‘हिंदी-उर्दू की मिट्टी’ और तिस पर ‘बरेली’ में बैठ कर लिखते हुए कोई इन एहसासों तक पहुँच ही नहीं सकता.
नज़्मी जी ने कई नामवर पश्चिमी उपन्यासकारों-फ़िल्मकारों को ख़ालिद जावेद के उपन्यासों के लिखे जाने का श्रेय दिया है. जावेद साहब ने अपने अनेक इंटरव्यूज़ में इससे लंबी और बेहतर सूची मुहैया की है जिन्हें वे बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावी मानते हैं और इनमें उर्दू-हिंदी के कई हस्ताक्षर भी शामिल हैं. इसके अलावा नज़्मी जी ने वास्तुशास्त्र, दर्शनशास्त्र, नेटफ़्लिक्स पर उपलब्ध विश्व सिनेमा को भी ख़ालिद जावेद के उपन्यासों के लिए ज़िम्मेदार माना है. इससे कौन इंकार कर सकता है कि ये तमाम मसाले न होते, दुनिया भर का साहित्य न होता तो ख़ालिद जी के उपन्यासों का स्वाद वह न होता जो वह है. अब यही कहने को शेष रह जाता है कि —
“ डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता?”
एक अच्छा उपन्यास लिखने का फ़ॉर्मूला यदि इतना ही आसान होता तो ये तमाम मसाले आज सभी के लिए उपलब्ध हैं. एक असल साहित्यिक कृति के लिखे जाने की प्रक्रिया, नज़्मी जी के अनुसार ख़ालिद जावेद द्वारा अपनाए गए नुस्ख़े से कई गुना जटिल और गूढ़ होती है. एक लेखक के असल होने का ‘ दूध का दूध और पानी का पानी ‘ कोई आलोचक करे, उसके बहुत पहले उसकी ‘भाषा’ स्वयं कर देती है.
ख़ालिद जी के उपन्यासों को चूँकि नज़्मी जी ने उपन्यास के बाहर के मानदंडों से जाँचने की ही कोशिश की है लिहाज़ा वे उनके असली मर्म, जैसे –अपराध और अपराधबोध की रासायनिक प्रक्रिया तक पहुँच ही नहीं पाए हैं. लेकिन उस पर विस्तार से बात करना यहाँ संभव और वांछित नहीं है.
फ़िलहाल इतना ही कि उन्हें कोई पुरस्कार मिले या न मिले ख़ालिद जावेद उर्दू-भारतीय-दक्षिण एशिया-विश्व साहित्य का वह चमकता सितारा हैं, जिससे आने वाला साहित्य प्रेरित होता रहेगा–हम मानें या न मानें☘️☘️☘️
शंपा शाह
पहली बात तो यह कि अशअर नज़मी की ख़ालिद जावेद पर लिखी आलोचना का दुस्साहस हिंदी की कथा आलोचना में ख़त्म हो चुका है। पूरे वातावरण में संतुलनवाद का ऐसा धुआँ भरा है कि कहानियाँ और उनकी कथित आलोचनाएँ किसी भी प्रश्नाकुलता से विरहित है और सर्वानुमति के किसी व्यापक हलफनामे जैसी दिखती है। एक व्यापक कायरता और छद्म पारस्परिकता ने कथा साहित्य को बेरंग, सतही , एकायामी और बेनूर कर दिया है। इसमें इग्नोर करने का तड़का भी डाला हुआ है। वह द्वन्द्व और दुविधाओं का जीवंत अखाड़ा होने की बजाय कारपोरेटीय तरीके से महत्वाकांक्षा निर्माण की ढहती कार्यशाला बनकर रह गई है। अशअर के उत्ताप और मूर्तिध्वंस की ज़रूरत हिंदी की कथा आलोचना को है।
जो दूसरी बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह कि इस लेख और उसके बाद प्रतिक्रियाओं से यह लगा कि हिंदी और उर्दू के बीच जिस दीवार और फेंस का एक छद्म बनाया जाता रहा है , वह कितना बेमानी और भ्रामक है। अश अर अपनी बात बखूबी समझा लेते हैँ । ख़ालिद जावेद इसी रास्ते हिंदी में आए और अपना रुतबा कायम किया। अशअर उस रुआब की अकड़ का कॉलर पकड़ते हैँ । उनके अध्ययन, मेधा और बेफिक्री को सलाम ।
तीसरी बातः खालिद जावेद के उन्नयन में जिस जेसीबी पुरस्कार की भूमिका का ज़िक्र किया गया, उस जेसीबी ने कितने ही लोगों के घर गिराये जिनमें मुसलमानों को सबसे ज्यादा टारगेट किया गया। उन्हीं में हमारे इलाहाबाद के प्रोफेसर फ़ातमी का घर भी था। एक अंतःकरण वाले ने यह क्यों नहीं सोचा कि इस ईनाम को इंकार भी किया जा सकता है। बाद में तमाम लेखकों ने इस पुरस्कार के विरोध में अपनी आवाज़ उठाई और यह पुरस्कार बंद कर दिया गया। तो जो लेखक और पाठक इस पुरस्कार से आतंकित हुए उन्हें भी अपने विस्मय का विखंडन करना चाहिए था कि कौन है जो पुरस्कार दे रहा है केवल यह देखने के अलावा कि यह मिल किसे रहा है। तब शायद औचक होने की नर्वस स्नायविकता में थोड़ा लचीलापन आ पाता और परिप्रेक्ष्य निर्माण हो पाता ।
आखिरी बिंदु : अशअर की आलोचना में यह तफ़सील से जिरह की गई कि कौन सी अवधारणा कहाँ से आ रही है लेकिन उनका ज़ोर इस पर बेहद कम था कि ख़ालिद़ एक पिटे हुए मनुष्य विरोधी दर्शन को अपनी कहानियों में गूँथ रहे हँ जो सामाजिकता और मानवीय पारस्परिकता को संदेह और वितृष्णा से देखता है। हिंदी कहानी में सामान्य तौर पर इसको बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है । यह क्षयिष्णु सेल्फ एबनिगेशन उद्यम और प्रयोगों से बनी सभ्यताओं की सामाजिक प्रक्रिया की अनदेखी करता है और इसलिए मनुष्य होने के वैभव को नष्ट करता है । सभ्यताएं सड़ रही हैँ तो उन्हें रूपवान् बनाने की जिम्मेदारी भी मनुष्यों की है । जावेद में अंतर्वस्तु है ही नहीं : उनके पास ऊब और उचाट और मतली और विचलन की पिटी हुई शैलीकारिता है । उसमें सार्त्र का रिवोल्यूशनरी एकाकीपन भी नहीं है। लेकिन इस तरह के अंधकार के वृत्तांत हृदयग्राही, मरोड़कारी, आलोड़नकारी, सम्मोहक और आभ्यंतरीय लग सकते हैं। इसीलिए खालिद जावेद के स्थापत्यकार का काम लिंग्विस्टिक स्ट्रक्चर बनाना है जिसमें आत्मा न रहती हो । तो खालिद पात्र नहीं , प्रेतों का निर्माण करते हैं जो लड़खड़ा रहे हैं, भटक रहे हैं और कथा विरुद्ध होते चले जा रहे हैं। अंततः वह कथाहीनता के स्तम्भन और स्तब्धता में गुम होने लगते है। वे उर्दू की किस्सा – कहानी की पात्र संकुल बड़ी परंपरा को रुग्ण एकाकीपन के तहखानों के हवाले कर देते हैं। तो अशजर ने जो कहा उसके बाद उन्हें ख़ालिद जावेद की दार्शनिक परिणतियों की मानवीय लेजिटिमेसी पर भी बात करनी थी । लेकिन मुझे संदेह है कि इसकी पड़ताल के टूल्स उनके पास हैं – वह खुद भी तो उत्तर आधुनिकता के काटे हैं।
अब तक की तमाम टिप्पणियों में आप ( जो कोई भी हैं) की टिप्पणी मेरे नज़दीक एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी है। कई बातें (जिन को आम तौर से नज़र अंदाज कर दिया गया या सिरे से इन पर गोर ही न किया गया) को आप ने केंद्र में लाने की कोशिश की है। लिहाज़ा आप की सराहना लाज़िम हो जाती है। शुक्रिया।
पिछले कुछ दिनों से ख़ालिद जावेद साहब के उपन्यासों के सन्दर्भ में अशअर नज्मी के लेख पर चल रही इस बहस को मैंने बहुत ग़ौर से पढ़ा। यह बेहद दिलचस्प और किसी हद तक अफ़सोसनाक भी है कि ख़ालिद जावेद की अफ़सानवी क़ायनात में ज़लज़ला लाने का ख़्वाब सजाकर निकले अशअर नज्मी की ‘बदनीयती’ का पर्दा लगभग हर संजीदा पाठक और लेखक ने चाक कर दिया है। चार पाँच दशकों की जोड़-तोड़ और ख़ेमेबाज़ी से उन्होंने अपनी ‘साख’ का जो छप्पर ताना था, वह महज़ चार पाँच दिनों में इस तरह ज़मींदोज़ होगा, इसकी उम्मीद भी कम ही लोगों ने की होगी। कम-अज़-कम मुझे तो नहीं थी।
साहित्य में Intertextuality और ‘प्रभाव’ कोई नई बात नहीं है, लेकिन अशअर नज्मी ने जिस ‘रचनात्मक और बौद्धिक ईमानदारी’ का झंडा बुलंद किया है, वह मुझे एक बुनियादी सवाल उठाने पर मजबूर कर रहा है। क्या किसी लेखक या आलोचक की ‘बौद्धिक ईमानदारी’ को उसकी अपनी नैतिकता और व्यक्तिगत व्यवहार से अलग करके देखा जा सकता है?
यह सवाल मैं इसलिए उठा रहा हूँ क्योंकि मुझे ख़ालिद जावेद साहब के उपन्यास ‘नेमत ख़ाना’ और ख़ुद अशअर नज्मी के उपन्यास ‘उसने कहा था’, दोनों का ही हिंदी अनुवाद करने का मौक़ा मिला। (यहाँ इस बात का ज़िक्र शायद ज़रूरी हो कि ‘उसने कहा था’ का अनुवाद मैंने ख़ालिद जावेद साहब के ही हुक्म पर किया था।) खैर, ‘उसने कहा था’ के अनुवाद और प्रकाशन के बाद प्रकाशक (रेख़्ता पब्लिकेशन) की प्रूफ़रीडिंग की कुछ ग़लतियों को लेकर अशअर नज्मी और रेख़्ता पब्लिकेशन के बीच एक विवाद पैदा हुआ था। मामला यहाँ तक पहुँचा कि अशअर नज्मी ने लीगल नोटिस भेजा और पब्लिशिंग राइट्स वापस ले लिए। इसके हर्जाने के तौर पर एक सेटलमेंट हुआ, जिसमें लेखक और अनुवादक दोनों के हक़ की रक़म तय हुई और वह रक़म रेख़्ता द्वारा अदा कर दी गई।
लेकिन अफ़सोस की बात यह रही कि अनुवादक के (यानी मेरे) हिस्से की जो रक़म तय हुई थी, वह भी अशअर नज्मी के खाते में ही गई और उन्होंने महीनों तक मुझे इस बात की भनक तक नहीं लगने दी कि सेटलमेंट की रक़म आ चुकी है। बाद में जब मुझे रेख़्ता के एक ज़िम्मेदार से इसका इल्म हुआ और मैंने अशअर नज्मी से इस बारे में बात की तो उनका जवाब बेहद हैरतअंगेज़ था। बड़ी बेतकल्लुफ़ी से कहने लगे कि ‘पैसे तो बहुत पहले ही आ गए थे, अब मेरे पास रखे थोड़ी हैं, वो तो ख़र्च हो गए।’
उन्होंने इस हक़तलफ़ी को जायज़ ठहराने के लिए यह बहाना भी पेश किया कि उन्होंने मुझसे अकाउंट नंबर माँगा था, जो मैंने नहीं दिया। दरअस्ल, मैंने महज़ यह कहकर बात टाली थी कि ‘सर, पहले रक़म आ तो जाने दीजिए।’ लेकिन हैरत की बात यह है कि रक़म आने के बाद उन्होंने पूरी तरह खामोशी इख़्तियार कर ली और मुझे बताना तक ज़रूरी नहीं समझा। और इंतेहा तो यह है कि जब मैंने अपने हक़ का तकाज़ा किया, तो उन्होंने बड़ी आसानी से यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि ‘क्या हमारा और आपका कोई लिखित एग्रीमेंट हुआ था?’
मुझे उस रक़म के न मिलने का बिल्कुल मलाल नहीं है। मलाल इस बात का है कि जो आलोचक आज विश्व साहित्य के पन्ने उलट-पुलट कर (हालांकि इतने कम समय में इसकी संभावना बहुत कम है) ‘वैचारिक चोरी’ और ‘साहित्यिक नैतिकता’ पर इतने सख़्त फ़तवे जारी कर रहा है, उसने एक अनुवादक के हक़ को खामोशी से डकार लेने में ज़रा भी ख़लिश महसूस नहीं की।
अगर अशअर नज्मी के इस लेख के बुनियादी तर्कों पर एक सरसरी नज़र भी डालें, तो यह साफ़ हो जाता है कि उन्होंने ‘प्रभाव’ और ‘चोरी’ के बीच के बारीक फ़र्क़ को जानबूझकर मिटाने की कोशिश की है। लेकिन शायद यह उम्मीद करना ही बेमानी है कि अशअर नज्मी जैसा शख्स अपनी आलोचना में किसी बड़े लेखक के रचनात्मक श्रम के साथ कोई इंसाफ़ करे।
इसलिए, मैं समझता हूं कि जब नीयत में खोट होता है तो भारी भरकम लफ़्ज़ों के सहारे बनाई गई इमारत इसी तरह ज़मींदोज़ होकर अपने स्वाभाविक अंत को पहुंचती है।
ख़ालिद जावेद पर सरक़े(साहित्यिक चोरी) का आरोप उर्दू के एक दूसरे कथाकार और संपादक अशअर नज्मी ने लगाया है। उनका आरोप पत्र ख़ालिद जावेद के सम्पूर्ण साहित्य को लेकर है। इस लेख का प्रकाशन उर्दू के साथ ही हिंदी में समालोचन पर हुआ है। मैंने भी दिलचस्पी से ये लेख पढ़ा लेकिन प्रभावित न हो सका। इसमें व्यक्तिगत खुन्नस अधिक दिखाई दी। ऐसा लगा आलोचक पहले से ही निर्णय पर पहुँच गया है बस तर्क गढ़ना बाक़ी है। यह आलोचना की ख़तरनाक उलटबाँसी है। इससे हिंदी के पाठक अवगत होंगे। ख़ैर, मैंने भी अपनी टिप्पणी कवि संपादक अरुण देव की पोस्ट पर कल लगाई थी। उसे यहाँ भी साझा कर देता हूँ ताकि दर्ज रहे।
उर्दू में बड़े शायरों-अदीबों पर चर्बा का इल्ज़ाम लगा कर ध्वस्त करने की कोशिश कोई नई चीज़ नहीं है। सबसे मशहूर आरोप तो ग़ालिब पर लगे हैं, और लगाया भी एक अच्छे शायर यगाना चंगेज़ी ने ही अपनी एक किताब ‘ग़ालिब शिकन’ लिख कर। लेकिन यगाना को कितने लोग याद करते हैं ? मैं भी इसीलिए याद कर रहा हूँ क्योंकि उन्होंने ‘ग़ालिब शिकन’ नामक किताब लिखी थी। इससे हटकर एक बात ये कहना चाहता हूँ कि अगर ख़ालिद साहब इन तमाम लेखकों से मुस्तफ़ीद हुए भी होंगे तो इससे क्या सिद्ध हो जाएगा ? घास आसमान में नहीं जमती ज़मीन पर ही जमती है। हर कामयाब लेखक के पीचे बहुत सारे लेखकों की परंपरा होती है, उनके कदमों के निशान होते हैं। अगर प्रेमचंद न होते तो ग़ुलाम अब्बास या अली अब्बास हुसैनी या सय्यद रफ़ीक़ हुसैन कैसे पैदा होते ? अगर मुहम्मद हुसैन आज़ाद, शिबली, अब्दुल हलीम शरर, पंडित रतन नाथ सरशार, मिर्ज़ा हादी रुसवा और गाँधी जी न होते तो प्रेमचंद कैसे पैदा होते ? मुझे लगता है नजमी साहब को टी एस ईलियट का मशहूर निबंध ‘परंपरा और निर्वैयक्तिक प्रतिभा’ को दोबारा पढ़ना चाहिए, मैं मानता हूँ उन्होंने एक दफा तो ज़रूर पढ़ा होगा। दूसरी बात ज़ोलां से जावेद साहब की तुलना हो सकती है लेकिन ये देखना होगा कि जावेद साहब के यहाँ कितना प्रकृतवादी यथार्थ आता है, ख़ालिद जावेद मूलतः अस्तित्ववादी और जादुई यथार्थबोध के लेखक हैं न कि नग्न यथार्थवादी ज़ोलां की तरह। अगर ये बात सच भी हो कि ख़ालिद जावेद ने प्रभाव ग्रहण किया है जिसे मानने में कोई आपत्ति ख़ालिद साहब को भी शायद ही हो तो इसमें कौन सी बड़ी बात है। ज़रूरी ये है कि इस प्रभाव से उन्होंने निर्मित क्या किया है। अगर दाग़ और उन्नीसवीं सदी का उर्दू नवजागरण न होते तो इक़बाल भी न होते और अगर वली, मीर और बेदिल न होते तो ग़ालिब कैसे होता ? ये व्यक्तिगत चपकलश का मामला अधिक लगता है। इसमें कोई तत्व नहीं है। अंतिम बात न मैं ख़ालिद जावेद का भक्त हूँ न कोई बहुत बड़ा प्रशंसक हाँ उन्हें अपने समय का एक ज़रूरी लेखक ज़रूर मानता हूँ, जो कि वे हैं। उन्होंने उर्दू में एक नए संसार का द्वार खोला है।
ख़ालिद जावेद जैसे प्रतिष्ठित लेखक के चारों तरफ़ बने साहित्यिक आभामंडल को चुनौती देने का साहस और इस बेबाकी से उन पर गंभीर सवाल उठाना अपने आप में एक मिसाल है। किसी लेखक को उसकी शोहरत की वजह से आलोचना से ऊपर नहीं होना चाहिए।
इस लेख में सबूतों और हवाले की सूची काफ़ी लंबी है, लेकिन समस्या यह है कि अम्बीगुइटी भी उतनी ही ज़्यादा है। नक्काद को यह बिल्कुल साफ़ करना चाहिए था कि उसका दावा क्या है और उस दावे के समर्थन में उसकी दलील क्या है। यहाँ यही चीज़ कुछ धुंधली रह गई है।
मिसाल के तौर पर अगर The Sandman से किसी ख़ास कथा-विचार या घटनाक्रम के उठाए जाने का आरोप है, तो दोनों रचनाओं के संबंधित अंश और उनके बीच समानता को सीधे सामने रख देना चाहिए था। इतने सारे हवाले दे देने के बाद यह ज़िम्मेदारी क़ारी पर डाल देना कि वह ख़ुद Sandman, Kafka, Beckett और दूसरी तमाम रचनाओं को पढ़कर तुलना करे, एक आम क़ारी के लिए मुमकिन नहीं है।
इसका एक दूसरा नुकसान भी है। अगर कोई इस लेख का जवाब देता है, तो आम क़ारईन के बीच भी तक़लीद का वही अमल शुरू हो जाएगा—कोई कहेगा, “यह सही है”, कोई कहेगा, “यह ग़लत है”, और दोनों अपने-अपने पसंदीदा पक्ष के साथ खड़े हो जाएँगे। फिर बहस कुछ लोगों के बीच चलती रहेगी; बाक़ी लोग या तो तमाशाई रहेंगे या ख़ेमेबंद।
बेहतर आलोचना वह होती है जो क़ारी को किसी ख़ेमे में खड़ा करने के बजाय उसे ख़ुद फैसला करने का सामान देती है।
इसलिए इस लेख की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका साहस है और सबसे बड़ी कमी उसकी अस्पष्टता। इल्ज़ाम गंभीर है, हवाले बहुत हैं; अब ज़रूरत सिर्फ़ इतनी थी कि दोनों के बीच का रिश्ता भी उतनी ही साफ़ भाषा में साबित किया जाता।
इस लेख में कितनी प्रमाणिकता है और कितनी अप्रमाणिकता यह तो मै अभी नही जानता हूँ क्योंकि मैने अभी तक न तो पाश्चात्य साहित्य को इतनी गहराई से पढ़ा है जितनी गहराई से इसमे व्याख्या की गयी है और न ही खालिद जावेद जी को । लेकिन इस लेख को पढ़ते हुए आचार्य रामचंद्र शुक्ल की एक पंक्ति मुझे बार बार याद आ रही थी – “वर्तमान लेखकों और कवियों के सम्बन्ध में कुछ लिखना अपने सिर एक बला मोल लेना ही समझ पड़ता था” आचार्य शुक्ल की यह पंक्ति तब जितनी सार्थक थी आज भी उतनी ही सार्थक है और भविष्य में भी इसकी सार्थकता निश्चिन्त ही बनी रहेगी । क्योंकि हर युग के अधिकतम लेखकों /कवियों की मनोवृत्ति रहती है कि उन्हें अपनी प्रशंशा तो अत्यधिक मीठी लगती है और आलोचना अत्यंत कड़वी, अब यदि आप एक आलोचक को अपनी प्रशंशा का अधिकार देते हैं तब आपको चाहिए कि आप उसे अपनी कड़वी आलोचना का भी उतना ही अधिकार दें , और अपनी कड़वी आलोचना को भी उतनी ही शालीनता के साथ ग्रहण करें जितनी शालीनता से आपने अपनी प्रशंशा ग्रहण की थी । और यदि आप किसी भी कारणवश आलोचक से असहमत हैं तो अपना एक शानदार उत्तर अपने लेखन के माध्यम से दीजिये न कि आरोप प्रत्यारोप से । अंत में अशअर नज़्मी जी के लिए इतना ही कहूंगा कि आपने एक अच्छा पोस्टमार्टम किया है ।
इस लेख में जितना भी अध्ययन-शोध-परिश्रम हो, यह ‘आलोचना’ नहीं है। इसलिए कि इसमें कोई विवेचना नहीं, सिर्फ ‘भंडाफोड़’ है। जनाब नज़्मी की रुचि सिर्फ इसमें है कि खालिद जावेद की किस रचना में किस दूसरी रचना की छाया, समानता या ‘उधार’ खोजा जा सकता है। मान लीजिए, जिन कृतियों और फिल्मों में आलेख ने सादृश्यताएँ खोजी हैं, वे सादृश्यताएँ वहाँ होती ही नहीं। ये रचनाएँ पूरी तरह मौलिक होतीं। तब क्या वे आलोचना से परे और निर्विवाद रूप से उत्कृष्ट कृतियाँ होतीं? यदि समानताओं, प्रभावों और कथित स्रोतों के पूरे प्रसंग को एक क्षण के लिए अलग रख दें, तो क्या अपने आप में इन कृतियों के भीतर आलोचना के लिए कुछ भी शेष नहीं बचता?
आलेख के मुताबिक इन रचनाओं की एकमात्र समस्या यही है कि उनमें अनेक विदेशी कृतियों से सादृश्य दिखाई देता है। पूरा मामला एक विचित्र द्वैत में सिमट जाता है – यदि ‘उधार’ सिद्ध हो गया, तो रचनाएँ खराब; यदि उधार सिद्ध नहीं हुआ, तो महान। साहित्यिक कृति की अपनी संरचना, मूल्यबोध, दर्शन, मनुष्य-दृष्टि और जीवन के बारे में उसका स्वतंत्र कथन या विवेचना कहाँ है? यही इस आलेख की सबसे बड़ी सीमा है।
अगर जनाब अशहर नज़्मी सचमुच ‘आलोचक’ हैं तो खालिद जावेद के novels में जो ‘evil’ या अशुभता या अंधकार है (irrespective of the fact कि वह अशुभता मौलिक है या उधार) उसकी पड़ताल और उसे उजागर करता हुआ एक अन्य आलेख लिखें।