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Home » जब जवाहरलाल नेहरू ने संभाली इलाहाबाद की कमान : शुभनीत कौशिक

जब जवाहरलाल नेहरू ने संभाली इलाहाबाद की कमान : शुभनीत कौशिक

by arun dev
May 27, 2026
in समाज
Reading Time: 13 mins read
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जब जवाहरलाल नेहरू ने संभाली इलाहाबाद की कमान : शुभनीत कौशिक

यह चित्र AI की सहायता से तैयार किया गया है.

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जवाहरलाल नेहरू : इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष

शुभनीत कौशिक

 

आज़ादी की लड़ाई में भागीदारी करते हुए राष्ट्रवादी नेतृत्व ने नगरपालिकाओं से लेकर विधान सभाओं और केंद्रीय विधायिका में भी सक्रिय भागीदारी की. विधायिका-नगरपालिका में  भागीदारी के इन अवसरों को राष्ट्रीय नेतृत्व ने अपने राष्ट्रवादी सरोकारों से समझौता किए बिना राज्य-प्रशासन और शासन में सीधे हस्तक्षेप के लिए ज़रूरी क़दम के रूप में देखा. राष्ट्रीय नेतृत्व ने स्थानीय, प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासन के कामों में इस भागीदारी को आम जनता से सीधे जुड़ने और शासन-प्रशासन की भूमिकाओं में प्रशिक्षित होने के लिए भी ज़रूरी समझा था.

बीसवीं सदी के तीसरे दशक के आरम्भ में जवाहरलाल नेहरू ने भी प्रशासन से जुड़ी एक ऐसी ही ज़िम्मेदारी को सँभाला, जब वे अप्रैल 1923 में इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष बने. तब केवल 34 बरस के नेहरू के लिए सार्वजनिक जीवन में प्रशासनिक दायित्व संभालने का यह पहला ही अवसर था. इस पद पर रहते हुए उन्होंने अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन किया और इलाहाबाद के लोगों की सुविधाओं का समुचित ख्याल रखने की पूरी कोशिश की. उल्लेखनीय है कि नेहरू उस वक़्त युक्त प्रांत (यू.पी.) की प्रांतीय कांग्रेस समिति के भी अध्यक्ष थे.

 

 

युक्त प्रांत की नगरपालिकाओं में कांग्रेस और इलाहाबाद

प्रांतीय कांग्रेस समिति के अध्यक्ष की हैसियत से अप्रैल 1923 में ही जवाहरलाल नेहरू ने एक नोटिस युक्त प्रांत के सभी जिलों, शहरों और तहसील कांग्रेस समितियों तथा प्रांतीय कांग्रेस समिति के सदस्यों के लिए जारी की थी, जिसमें उन्होंने नगरपालिका के कामों में कांग्रेस के सदस्यों की भागीदारी के संदर्भ में अपने विचार बड़े स्पष्ट ढंग से रखे थे.[i] नेहरू ने लिखा कि प्रांतीय कांग्रेस समिति के निर्देश के मुताबिक़ युक्त प्रांत में नगरपालिकाओं पर कांग्रेस के प्रभावी नियंत्रण के लिए जगह-जगह उम्मीदवार खड़े किए गए और तय किया गया था कि कांग्रेस-ख़िलाफ़त नीति और कार्यक्रम के अनुरूप ही उनका संचालन किया जाएगा. नेहरू ने स्पष्ट किया कि ‘नगरपालिकाओं में जाने के पीछे हमारा मक़सद का यह है कि इससे राष्ट्रीय संघर्ष में हमें मदद मिले. हम नगरपालिका के कामों में अवरोध नहीं खड़े करना चाहते बल्कि हम यह चाहते हैं कि हमारे शहरों और वहाँ के आम लोगों के हित में नगरपालिकाएं पूरी ईमानदारी से अपनी क्षमता भर काम करें और कांग्रेस- ख़िलाफ़त प्रोग्राम के हिसाब से नीतियां बनाईं और अमल में लाई जाएँ.’

जहाँ-जहाँ नगरपालिकाओं में कांग्रेस के सदस्य चुने गए थे, उनसे नेहरू ने नगरपालिकाओं में कांग्रेस की मौजूदगी और नगरपालिकाओं की स्थिति के संदर्भ में रिपोर्ट मांगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस के हरेक सदस्य का पहला लक्ष्य स्वराज के लिए संघर्ष करना और कांग्रेस को मजबूत करना है. और उन्हें तब तक नहीं रुकना है, जब तक कि वे स्वराज का लक्ष्य हासिल न कर लें. इस नोटिस में यह भी कहा गया कि अगर नगरपालिका बोर्ड में कांग्रेस के सदस्यों की मौजूदगी किसी भी तरह से कांग्रेस के काम में आड़े आएगी तो उचित यही होगा कि वे बोर्ड को छोड़ दें और कांग्रेस के कामों पर ही अपना पूरा ध्यान लगाएँ.

ग़ौरतलब है कि इस समय यूपी प्रांतीय कांग्रेस समिति के सचिव चौधरी खलीक़ुज्जमाँ लखनऊ नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए थे और कांग्रेस समिति के महासचिव पंडित हरकरण नाथ मिश्रा उसके उपाध्यक्ष बने थे. वहीं नेहरू स्वयं इलाहाबाद बोर्ड के अध्यक्ष बने थे. उनसे पूर्व पुरुषोत्तमदास टंडन इलाहाबाद बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके थे.[ii] किंतु 1923 में पुरुषोत्तमदास टंडन द्वारा पुनः अध्यक्ष बनने से अनिच्छा जताने के बाद नेहरू इलाहाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष बने थे.[iii] नेहरू ने साफ किया कि नगरपालिका की जिम्मेदारी और प्रांतीय कांग्रेस समिति के सचिव पद पर काम करने में अगर कोई अड़चन आती है तो वह नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने में नहीं हिचकेंगे.

नगरपालिका के काम को नेहरू ने स्वराज की तैयारी और उसके प्रशिक्षण के लिए ज़रूरी संघर्ष और रचनात्मक कार्यक्रम से जोड़ कर देखा. नगरपालिका अध्यक्ष के रूप में नेहरू द्वारा अधिकारियों से किए गए पत्राचार, नगरपालिका बोर्ड की बैठकों में उनके द्वारा प्रस्तुत की गई तिमाही और सालाना रिपोर्टें नेहरू की प्रशासनिक क्षमता और उनके विजन का भी परिचय देती हैं.

अप्रैल 1923 में ही इलाहाबाद के कलेक्टर नॉक्स को लिखे एक खत में नेहरू ने बेहिचक लिखा कि मैं एक विशेष नीति और समझ के साथ ही नगरपालिका बोर्ड में आया हूँ और उसी नीति को आगे बढ़ाऊंगा तथा इलाहाबाद और इलाहाबाद के लोगों के हित में काम करूंगा.[iv] कलेक्टर को लिखे उसे खत में नेहरू ने पुनः यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस की नीति और उसके सिद्धांतों में अगर नगरपालिका बोर्ड का काम अगर आड़े आएगा तो वह इस्तीफा देने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे. साथ ही, उन्होंने यह बात भी जाहिर कर दी कि वे राजनीति और नगरपालिका के इन दो कामों को अलग-अलग खाँचे में बाँटकर कर नहीं रख सकते.

नगरपालिका बोर्ड का अध्यक्ष बनने के बाद नेहरू को रोजाना नौकरी और दूसरी सुविधाओं को हासिल करने के लिए मिलने वाली सिफारिशों का भी सामना करना पड़ता था. इस संदर्भ में उन्होंने लिखा कि

‘मैं इस सिफारिशी संस्कृति से आजिज़ आ चुका हूँ और मुझे लगता है कि नौकरी या ऐसे दूसरे कामों के लिए सिफारिश करने पर सख़्ती से रोक लगाई जानी चाहिए और ऐसे उम्मीदवारों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए.’[v]

साथ ही नेहरू ने बोर्ड के सभी विभागों के प्रमुखों से अपने-अपने विभाग की पूरी जिम्मेदारी लेने और अपने दायित्वों का सम्यक निर्वहन करने के लिए भी कहा.

 

 

 

नगरपालिका के चुनाव, निर्वाचन संबंधी सुधार और नगरपालिका का संचालन

दिलचस्प है कि नगरपालिका की चुनाव-पद्धति में सुधार को लेकर भी बोर्ड के सामने नेहरू ने तब अपने विचार रखे थे. इनमें चुनाव संबंधी सुधारो को लेकर लिखा उनका वह नोट अत्यंत महत्त्वपूर्ण है जिसमें उन्होंने एक ही वार्ड में एक से अधिक सीटों की व्यवस्था को खत्म करने की बात कही थी.[vi] साथ ही, चुनाव में हर प्रत्याशी के लिए अलग बैलेट बॉक्स हो या हर प्रत्याशी को एक चुनाव-चिह्न आवंटित किया जाए, इस मसले पर भी नेहरू ने देश-दुनिया के उदाहरण का ज़िक्र करते हुए हर प्रत्याशी को चुनाव-चिह्न आवंटित करने की बात कही. दिलचस्प है कि अपने उसी नोट में नेहरू समानुपातिक प्रतिनिधित्व की भी चर्चा करते हैं. मगर उस व्यवस्था को अमल में लाने के लिए वह साक्षरता के स्तर को और बेहतर करने को पूर्व-शर्त मानते हैं. उस नोट में वे अमेरिका में होने वाले चुनाव और वहाँ पर पोलिंग बूथ की व्यवस्था का भी उल्लेख करते हैं. बूथवार खड़े होने वाले प्रत्याशियों की संख्या को सीमित रखने के लिए नेहरू ने 50 रुपए की जमानत राशि निर्धारित करने की बात भी कही और यह जोड़ा कि जो भी प्रत्याशी एक निश्चित संख्या में मत हासिल न कर सके, उनकी जमानत ज़ब्त कर ली जाए.

जून 1923 में इलाहाबाद नगरपालिका द्वारा अप्रैल-मई 1923 में किए गए कामों की रिपोर्ट नेहरू ने बोर्ड के सामने प्रस्तुत की. बतौर अध्यक्ष उनके द्वारा पेश की गई यह पहली रिपोर्ट थी. इस रिपोर्ट में उन्होंने नगरपालिका की विभिन्न स्थायी समितियों के कामों, उनकी बैठकों की समीक्षा पेश की.[vii] निश्चित अंतराल पर बैठकों के न होने या उनमें सदस्यों की अनुपस्थिति की वजह से गणपूर्ति (कोरम) न हो पाने को लेकर भी नेहरू ने अपनी चिंता जाहिर की. विशेष रूप से जन-स्वास्थ्य, लोक निर्माण समिति, नज़ूल समिति और शहर सुधार समिति की बैठकों की चर्चा नेहरू ने की थी और समितियों से उनकी बैठकों को नियमित आयोजित करने तथा स्थायी समिति के सभी सदस्यों को बैठकों में हिस्सा लेने का भी अनुरोध नेहरू ने किया.

Jawaharlal Nehru

 

औपनिवेशिक नगरपालिका के राष्ट्रवादी तेवर

नगरपालिकाओं द्वारा नेताओं के सम्मान में स्वागत-समारोह के आयोजन के सवाल को लेकर भी नेहरू ने अपने विचार रखे. दरअसल 1923 में युक्त प्रांत की सरकार ने नगरपालिकाओं और जिला बोर्डों को सूचित किया कि वे केवल गवर्नर-जनरल और गवर्नरों का ही स्वागत सम्मान कर सकते हैं. इससे पूर्व इलाहाबाद बोर्ड ने देशबंधु चितरंजन दास और हकीम अजमल खान का स्वागत किया था. नेहरू ने सरकार की इस नोटिस को लेकर आपत्ति जताई और कहा कि अभी तक नगरपालिकाएं सरकारी अधिकारियों और ऊँचे प्रशासनिक पदों पर बैठे हुए लोगों की खुशामद में स्वागत भाषण और आयोजन करती आ रही थीं. तब तक तो उन पर होने वाले खर्च को लेकर सरकार ने कोई चिंता नहीं जताई थी. लेकिन जैसे ही देशबंधु चितरंजन दास और हकीम अजमल खान जैसे देशभक्तों को सम्मान दिया गया, वह युक्त प्रांत की सरकार को नागवार गुजरा.[viii]

नेहरू ने स्पष्ट किया किया कि नगरपालिका बोर्ड के हर सदस्य को इस सवाल पर सोचना होगा और नगरपालिका बोर्ड के अधिकारों की रक्षा और सरकार द्वारा किए जाने वाले ऐसे किसी भी अवांछित हस्तक्षेप को रोकने के लिए अपनी आवाज उठानी होगी. इसी तरह जब वाइसराय लॉर्ड रीडिंग के स्वागत समारोह की बात उठी, तो नेहरू ने अक्टूबर 1923 में बोर्ड को दिए अपने संदेश में दोटूक कहा कि वाइसराय का स्वागत करना शर्म की बात होगी. लॉर्ड रीडिंग के वाइसराय रहते हुए पंजाब में ख़ासकर सिखों पर और देश भर में आम लोगों पर किए गए अत्याचार और दमन की याद दिलाते हुए नेहरू ने कहा कि वाइसराय रीडिंग, जिसने देश और देश के लोगों को इतने कष्ट दिए हैं, का स्वागत करना किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकता. वहीं बाद में, नेहरू के अध्यक्ष रहते हुए ही इलाहाबाद बोर्ड ने मौलाना शौकत अली जैसे राष्ट्रवादियों का स्वागत किया था.

नेहरू ने कहा कि कांग्रेस द्वारा नगरपालिका का प्रशासन राष्ट्रवादी धारा के अनुरूप ही होगा और जहाँ तक संभव हो सके कांग्रेस के राष्ट्र-निर्माण के कार्यक्रम में सहयोग देना उसकी प्राथमिकता होगी. बोर्ड के कर्मचारियों के लिए खद्दर के कपड़े के इस्तेमाल पर जोर देना, कार्यवाहियों में हिंदुस्तानी की हिमायत कुछ ऐसे काम थे, जो बोर्ड ने इस दरमियान किए थे. इसी तरह लोकमान्य तिलक की पुण्यतिथि (1 अगस्त) तथा गांधी जी को सजा दिए जाने की तारीख (18 मार्च) को बोर्ड द्वारा अवकाश सूची में शामिल किया गया. वहीं ‘साम्राज्य दिवस’ (24 मई – रानी विक्टोरिया का जन्मदिन) को नेहरू के कार्यकाल में इलाहाबाद बोर्ड की अवकाश सूची से हटाया गया. इसी तरह मौलाना शौकत अली के स्वागत में बोर्ड द्वारा कार्यक्रम रखा गया तथा फरवरी 1924 में महात्मा गांधी की रिहाई के अवसर पर भी बोर्ड द्वारा समारोह आयोजित किया गया.

नेहरू के कार्यकाल के दौरान इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड के राष्ट्रवादी तेवर को लेकर कमिश्नर की असहजता उस ख़त से जाहिर होती है, जो उसने ‘साम्राज्य दिवस’ को अवकाश सूची से हटाए जाने और शौकत अली के स्वागत और महात्मा गांधी की रिहाई पर आयोजित समारोह को लेकर लिखा था. अपने जवाबी ख़त में नेहरू ने स्पष्ट कर दिया था कि वे किसी भी सूरत में साम्राज्य दिवस को अवकाश सूची में शामिल करने के लिए तैयार नहीं हैं और राष्ट्रवादी नेताओं का स्वागत-सम्मान बोर्ड द्वारा आगे भी किया जाता रहेगा. युक्त प्रांत के विभिन्न नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्षों को लिखे एक पत्र में भी उन्होंने नगरपालिका के कर्मचारियों के लिए खद्दर के कपड़े पहनने का प्रावधान करने का सुझाव दिया था.[ix]

कहना न होगा कि नगरपालिका को सरकार के अवांछित हस्तक्षेप और प्रभाव से मुक्त रखने पर नेहरू का पूरा ज़ोर रहा.

 

 

नगरपालिका, वित्तीय सुधार और करों का मुद्दा

इलाहाबाद आने वाले यात्रियों पर रेलवे द्वारा लगाए जाने वाले कर के संदर्भ में भी इलाहाबाद डिवीजन के कमिश्नर से नेहरू ने इस दौरान पत्राचार किया. नेहरू ने कमिश्नर को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि इलाहाबाद नगरपालिका अवध एंड रुहेलखंड रेलवे, ईस्ट इंडियन रेलवे और बंगाल नॉर्थ-वेस्टर्न रेलवे द्वारा प्रस्तावित करों को अपनी सहमति देती है.[x] नेहरू ने यात्री कर से होने वाली आमदनी का उपयोग शहर की सफाई, जन-सुविधाओं और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने और यात्रियों की सुविधा बढ़ाने तथा शहर में जलापूर्ति की सुविधा को बेहतर करने के लिए कहा. इसी क्रम में, दारागंज में नलकूप की व्यवस्था करने और तीर्थयात्रियों के इलाज के लिए मेडिकल ऑफिसर नियुक्त करने की बात भी नेहरू ने कही.

नगरपालिका द्वारा लगाए जाने वाले करों के सवाल को लेकर नेहरू ने बोर्ड के सामने कई बार अपनी राय रखी थी. इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड द्वारा इलाहाबाद के कमिश्नर को भेजी गई वार्षिक रिपोर्ट और वर्ष 1923-24 के लिए बजट के अनुमान को लेकर कमिश्नर के साथ हुए नेहरू के पत्राचार का विवरण भी हमें नगरपालिका बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किए गए उनके नोट में मिलता है.

कमिश्नर ने अपने उस पत्र में नगरपालिका की वित्तीय स्थिति को लेकर चिंता जताई थी. ग़ौरतलब है कि उस समय तक इलाहाबाद बोर्ड ने सरकार से 6 लाख रुपए का ऋण ले रखा था, जिसकी वार्षिक किस्तों को चुकाने में नगरपालिका को कठिनाई पेश आ रही थी. इस संदर्भ में नेहरू ने बोर्ड के संसाधनों और उसकी देनदारी का सटीक विवरण तैयार करने पर जोर दिया.[xi] उन्होंने राजस्व बढ़ाने और व्यय को कम करने को लेकर बोर्ड के वरिष्ठ अनुभवी सदस्यों से भी सुझाव मांगे. जहाँ तक राजस्व की बात थी, नेहरू चुंगी कर, मकान कर, जल कर को एक सीमा से अधिक बढ़ाने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने कहा कि यह दरें पहले ही इतनी अधिक हैं कि अब उनमें और बढ़ोतरी करना जनता के बीच नगरपालिका को अलोकप्रिय बनाने वाला कदम साबित होगा. नेहरू ने कहा कि यह भी देखने में आता है कि विदेशी वस्तुएं तो प्रायः चुंगी से बच जाती हैं, जबकि भारतीय वस्तुओं पर यह चुंगी अदा करनी ही पड़ती है. जबकि होना इसके उलट चाहिए यानी भारतीय वस्तुओं और व्यापार को संरक्षण मिलना चाहिए और विदेशी वस्तुओं पर अधिक चुंगी ली जानी चाहिए.

नगरपालिका के कर्मचारियों को सक्षम बनाने और तकनीकी दक्षता वाले विशेषज्ञों को नगरपालिका के कामों से जोड़ने का सुझाव नेहरू ने दिया. इस संदर्भ में उन्होंने अमेरिका के सभी महानगरों में नगर प्रबंधक (‘सिटी मैनेजर’) की नियुक्ति की प्रक्रिया से भी सीख लेने की बात कही. नेहरू ने कहा कि यह विशेषज्ञ जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के अंतर्गत काम करेंगे. जिसमें अंतिम निर्णय निश्चय ही निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों में होगा. जलापूर्ति और अपशिष्ट जल के निस्तारण को लेकर भी नेहरू ने अपने सुझाव दिए. कमिश्नर द्वारा खाद्य पदार्थों में मिलावट का सवाल उठाए जाने को लेकर भी नेहरू ने अपनी चिंता प्रकट की और स्वास्थ्य विभाग से इस संदर्भ में ध्यान देने के लिए कहा. इसी क्रम में, नेहरू ने नवजात मृत्यु दर को लेकर कमिश्नर की चिंता को भी बोर्ड के साथ साझा किया.

21 सितंबर 1923 को नेहरू नाभा रियासत में गिरफ्तार हुए. नाभा जेल में रहते हुए भी उन्होंने इलाहाबाद बोर्ड के अधिशासी अधिकारी ब्रजमोहन व्यास को पत्र लिखकर नगरपालिका के कामों का जायज़ा लिया और इलाहाबाद की प्रगति के संदर्भ में अपने विचार रखे.[xii] एक ऐसे ही पत्र में नेहरू ने लिखा कि नगरपालिका के इस काम से जहाँ पहले उनकी अरुचि थी, वहीं अब इस काम को वे पसंद करने लगे हैं. उन्होंने लिखा कि ‘मुझे लगता है कि यह बोर्ड के हाथों में है कि वह इलाहाबाद के लोगों का जीवन कुछ अधिक सहनीय और कुछ कम कष्टकारी बना सके. यह निश्चित ही बेहतर एक काम है.’[xiii] नेहरू ने उस खत में ब्रजमोहन व्यास और बोर्ड के सहायक सचिव प्रेमकिशन तामिनी का भी शुक्रिया अदा किया. ग़ौरतलब है कि नाभा रियासत में उनकी गिरफ्तारी के दौरान नगरपालिका के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ज़हूर अहमद और कनिष्ठ उपाध्यक्ष एन.के. मुखर्जी ने बोर्ड की जिम्मेदारियां संभाली थी. नाभा से रिहाई के बाद टायफाइड से पीड़ित हो जाने के कारण नेहरू नगरपालिका की गतिविधियों में अपनी सक्रिय भागीदारी कर पाने में कुछ समय के लिए असमर्थ रहे.

वर्ष 1923-24 की वार्षिक रिपोर्ट में नेहरू ने नगरपालिका बोर्ड के लिए हुए चुनाव और उसके पश्चात के एक साल की अवधि में नगरपालिका बोर्ड द्वारा किए गए कामों का पूरा विवरण दिया.[xiv] इस एक साल में इलाहाबाद बोर्ड ने पाक्षिक रूप से ‘इलाहाबाद म्युनिसिपल गैजेट’ का भी प्रकाशन किया. युक्त प्रांत में नगरपालिकाओं कपड़ों पर द्वारा चुंगी कर लगाए जाने का भी नेहरू ने विरोध किया और कहा कि इससे कुटीर उद्योगों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है और अधिक उचित होगा कि इसे पूरी तरह खत्म कर दिया जाए. इस संदर्भ में नेहरू ने अप्रैल 1925 में युक्त प्रांत के विभिन्न नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्षों को भी एक पत्र लिखा था.

 

 

 

राष्ट्रीय शिक्षा, भाषा के सवाल और इलाहाबाद बोर्ड

जून से लेकर अगस्त 1923 तक नगरपालिका के कामों की रिपोर्ट बोर्ड के सामने पेश करते हुए नेहरू ने शिक्षा समिति के कामों की सराहना की थी. इनमें राष्ट्रीय शिक्षा की धारणा अनुरूप पाठ्यचर्या तैयार करना, स्कूलों में छात्रों के लिए स्काउट समूह शुरू करना और अनिवार्य शिक्षा की योजना का मसौदा तैयार करना शामिल था. नेहरू ने शिक्षकों के वेतन को लेकर भी अपनी चिंता प्रकट की, जो उस समय मात्र 14 रुपए मासिक था. इस दौरान शिक्षा समिति ने नगरपालिका के स्कूलों में अल्लामा इकबाल के प्रसिद्ध गीत ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ को भी स्कूली पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाया.[xv]

उल्लेखनीय है कि शिक्षा समिति की अध्यक्षता श्रीमती उमा नेहरू कर रही थी.[xvi] इस समिति ने बालिका विद्यालयों में चरखा वितरित करने के साथ ही स्काउट से जुड़ी गतिविधियों और ड्रिल जैसी क़वायद को लड़के-लड़कियों दोनों के लिए अनिवार्य किया. समिति द्वारा स्कूलों में बच्चों के स्वास्थ्य और सफाई पर विशेष ध्यान रखने को भी तवज्जो दी गई.[xvii]

दिसंबर 1923 से लेकर फरवरी 1924 तक की रिपोर्ट में नेहरू ने शिक्षा समिति और दूसरी समितियों की प्रगति की समीक्षा प्रस्तुत की. शिक्षा के संदर्भ में उन्होंने सोवियत रूस के उदाहरण और वहाँ शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे प्रयोगों से भी सीख लेने की बात कही.[xviii] यह उदाहरण राष्ट्रीय नेतृत्व की विश्व-दृष्टि को भी दिखाता है. जिसमें पश्चिमी देशों समेत दुनिया भर के दूसरे देशों में भी शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में जो भी सकारात्मक प्रयोग हो रहे थे, उनसे सीख लेने की बात न केवल कही जा रही थी, बल्कि उस पर अमल किया जा रहा था.

वहीं भाषा के सवाल को लेकर भी नेहरू की अध्यक्षता में इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड ने अपनी कार्यवाही में हिंदुस्तानी के इस्तेमाल को लेकर प्रस्ताव पारित किया. इलाहाबाद के कमिश्नर को लिखे पत्र में नेहरू ने इस बाबत लिखा कि इलाहाबाद बोर्ड ने 16 जनवरी 1924 को पारित एक प्रस्ताव में बोर्ड के नियमों और उप-नियमों में ‘वर्नाकुलर’ शब्द की जगह हिंदुस्तानी का प्रयोग करने का निर्णय लिया. इसी संदर्भ में बोर्ड द्वारा सरकार से नगरपालिका अधिनियम और उससे जुड़े उप-नियमों में भी ‘वर्नाकुलर’ को हटाकर हिंदुस्तानी को रखने का आग्रह किया गया.[xix] हालाँकि विरोधाभासी हक़ीक़त यह थी कि इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद भी बोर्ड की अधिकांश कार्यवाही और उसके आधिकारिक पत्राचार की मुख्य भाषा अंग्रेज़ी ही बनी रही.

नेहरू ने यूपी सरकार द्वारा जुलाई 1924 में रामदास गौड़ द्वारा लिखी गई हिंदी की पाठ्यपुस्तकों को प्रतिबंधित करने की निंदा की. उल्लेखनीय है कि रामदास गौड़ की पुस्तकें राष्ट्रीय विद्यालयों में पाठ्यपुस्तक के रूप में इस्तेमाल की जा रही थीं. डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने रामदास गौड़ से इन पुस्तकों के सम्पादन का ज़िम्मा संभालने का आग्रह किया था. ये किताबें 1922 से ‘राष्ट्रीय शिक्षावली’ ग्रंथमाला के रूप में प्रकाशित होनी शुरू हुईं.[xx] जब कांग्रेस ने इसके विरुद्ध इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की तो कोर्ट ने भी सरकार के ही आदेश को सही ठहराते हुए इन पाठ्यपुस्तकों को ‘राजद्रोह’ की श्रेणी में रख दिया. जवाब में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सरकार के आदेश और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का मुखर विरोध किया.

 

 

शहर में वेश्यावृत्ति का सवाल

इलाहाबाद शहर में वेश्याओं की मौजूदगी और वेश्यावृत्ति का सवाल भी एक अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दा था, जिस पर बतौर अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने अपने विचार बोर्ड के सामने रखे थे. नेहरू के अध्यक्ष बनने से पूर्व भी 1919 से ही कुछ उप-नियम बनाकर इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड ने शहर में वेश्याओं की गतिविधियों को नियंत्रित करने की कोशिश की थी. इनमें आर.एन. बसु की अध्यक्षता में गठित उप-समिति द्वारा बनाए गए उप-नियमों का मसौदा भी शामिल था, जो शहर में वेश्यावृत्ति के नियंत्रण से जुड़ा हुआ था. किंतु 1921 में पुरुषोत्तम दास टंडन, जो तब इलाहाबाद बोर्ड के अध्यक्ष थे, की गिरफ्तारी के चलते यह उप-नियम लागू नहीं हो सका. जुलाई 1922 में इलाहाबाद बोर्ड द्वारा एक नई समिति गठित की गई थी, जिसके अध्यक्ष दामोदरदास थे. इस समिति ने भी वेश्यावृत्ति के नियंत्रण के लिए उप-नियम बनाने का सुझाव दिया.

वेश्यावृत्ति के नियंत्रण से जुड़े इस पूरे मुद्दे में शहर में वेश्याओं की गतिविधियों पर अंकुश लगाने, शहर के किसी खास इलाके तक वेश्याओं को सीमित करने और वेश्यावृति पर पूरी तरह रोक लगाने सरीखे सवाल शामिल थे. नेहरू ने नगरपालिका बोर्ड में दिए अपने वक्तव्य में कहा कि वेश्यावृत्ति पर पूरी तरह रोक लगाना शायद संभव नहीं होगा.[xxi] लेकिन इस सामाजिक बुराई पर नियंत्रण की कोशिश जरूर की जानी चाहिए. ऐसा करना समाज और शहर दोनों के लिए उचित होगा. उन्होंने पश्चिमी देशों में वेश्यावृत्ति के सवाल को लेकर बनाई गई प्रशासनिक नीतियों के भी उदाहरण दिए. नेहरू ने वेश्यावृत्ति के पीछे काम करने वाले आर्थिक और मानवीय वजहों को भी समझने की बात कही. उन्होंने कहा कि जब तक हम महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार नहीं करते, अनाथ और बेसहारा महिलाओं, विधवाओं की स्थिति में सकारात्मक बदलाव नहीं करते, तब तक यह उम्मीद करना कि कानून बना देने भर से वेश्यावृत्ति समाप्त हो जाएगी, बेमानी बात होगी. वेश्यावृत्ति के सवाल पर गहराई से सोचते हुए नेहरू ने लैंगिक बराबरी और सामाजिक जागृति पैदा करने पर भी जोर दिया. उन्होंने उन मर्दों को लेकर भी सवाल उठाए जो महिलाओं की बेबसी का लाभ उठाते हैं, उनका शोषण करते हैं और उन्हें अपने फ़ायदे के लिए वेश्यावृत्ति के धंधे में झोंक देते हैं.

वेश्याओं के लिए शहर का कोई खास इलाका चिन्हित करने या उन्हें किसी खास इलाके में महदूद करने के सुझाव से नेहरू सहमत नहीं थे. इसे वे वेश्यावृत्ति रोकने का कोई कारगर उपाय नहीं मानते थे. मगर उन्होंने यह जरूर कहा कि शैक्षणिक संस्थानों, छात्रावासों, स्कूल-कॉलेज के आस-पास वेश्याओं की गतिविधियों पर कड़ाई से रोक लगाई जानी चाहिए और सार्वजनिक दायरे में भी वेश्यावृत्ति से जुड़ी गतिविधियों को प्रभावी ढंग से रोका जाना चाहिए. इसके साथ ही नेहरू ने सुझाव दिया कि नगरपालिका बोर्ड को महिलाओं के लिए अनाथालय बनाने और उनमें विधवा और बेसहारा महिलाओं के लिए आश्रय और उनके जीविकोपार्जन के लिए समुचित सुविधाओं का प्रबंध करना चाहिए.[xxii]

संक्रामक यौन रोगों के खतरों से भी लोगों को अवगत कराने की बात भी नेहरू ने कही. इस संदर्भ में उन्होंने कृष्णकांत मालवीय के प्रस्ताव का भी ज़िक्र किया. सम्मति की आयु (एज़ ऑफ़ कंसेंट) बढ़ाने तथा लड़कियों का शोषण करने वाले और उन्हें वेश्यावृत्ति में झोंकने वाले लोगों के लिए कड़े से कड़े दंड का प्रावधान करने पर भी नेहरू ने ज़ोर दिया.

Jawaharlal Nehru

 

 

इलाहाबाद में सड़कें, सफ़ाई और तीर्थयात्रियों के सवाल

नेहरू ने इलाहाबाद की सड़कों के खस्ताहाल को लेकर भी अपनी चिंता प्रकट की. अटाला, गंगागंज जैसे इलाकों की सड़कों को लेकर जहाँ उन्होंने अपनी चिंता जताई. वहीं जॉनसेनगंज और स्टेनली रोड जैसे इलाकों में बेतरतीब ढंग से बन रहे मकानों को लेकर भी नेहरू ने चिंता जाहिर की और कहा कि ऐसी जगहों पर योजनानुसार ही भवनों का निर्माण होना चाहिए. उन्होंने यह भी जोड़ा कि पहले से भीड़भाड़ वाले इलाकों में नए निर्माण के लिए बोर्ड को आवेदन माँगने चाहिए. इलाहाबाद के सिविल लाइंस इलाके में सुनियोजित निर्माण को लेकर तथा उस इलाके के बड़े आकार वाले भवनों और बंगलो पर कर लगाने का प्रस्ताव भी नेहरू ने रखा.

इलाहाबाद के तांगे/इक्कावालों की समस्या की ओर भी नेहरू ने बोर्ड का ध्यान खींचा. ग़ौरतलब है कि इलाहाबाद में जून 1923 से अगस्त 1923 के बीच पुलिस ने इक्कावालों के चौदह सौ से अधिक चालान काटे थे. नेहरू ने कहा कि नगरपालिका इस मामले में सीधे हस्तक्षेप भले ही न कर सके, लेकिन हमें ऐसी स्थितियां बनानी होंगी कि इक्कावालों के लिए काम करने का संतोषजनक माहौल तैयार हो सके. इक्कावालों द्वारा चौक के नजदीक स्टैंड बनाने की मांग को लेकर भी नेहरू ने बोर्ड का मत जानना चाहा. इस मांग को लेकर दिक़्क़त यह थी कि चौक के दुकानदारों ने इक्कावालों की माँग का विरोध किया था. उन दुकानदारों का तर्क था कि इससे उनकी दुकानदारी पर असर पड़ेगा. उनके पक्ष को भी नेहरू ने बोर्ड के सामने रखा.

जानसेनगंज में सीवर के निर्माण और शहर में फैले हुए कूड़े-कचरे के निस्तारण को लेकर भी नेहरू ने राय बोर्ड के सामने रखी. जलापूर्ति की समस्याओं और जल-प्रदूषण को लेकर मिलने वाली शिकायतों पर भी नेहरू ने नगरपालिका के सदस्यों का ध्यान खींचा. ग़ौरतलब है कि इलाहाबाद शहर में जल विभाग के लापरवाही भरे रवैये और जलापूर्ति के मसले को लेकर बीसवीं सदी के आरम्भ में ही समस्याएं उठनी शुरू हो गई थीं, जिनका ज़िक्र नेहरू के नोट्स और उनकी रपटों में मिलता है. जल विभाग के कामों की जांच के लिए गठित समिति की रिपोर्ट में इस विभाग की लापरवाही और इसके चलते आम लोगों को रोजमर्रा जीवन में होने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया गया था, इसे लेकर भी नेहरू ने अपनी चिंता जाहिर की.[xxiii]

जनवरी 1924 में आयोजित होने वाले कुंभ मेले और उसमें देश भर से आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधा और उनके स्वास्थ्य की देखभाल, जलापूर्ति की शुद्धता और जल विभाग के कामों को लेकर भी नेहरू ने अपनी बात कही. कुंभ मेले के संदर्भ में भी नेहरू ने इलाहाबाद बोर्ड के समक्ष अपनी बातें रखी थीं. हालांकि कुंभ मेले के प्रबंधन में म्युनिसिपल बोर्ड की कोई प्रत्यक्ष भागीदारी नहीं थी. मगर जिला प्रशासन के रवैये और कुंभ मेले में आने वाले तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के मुद्दे को लेकर नेहरू ने सवाल उठाए. संगम के पास स्नान करने पर ज़िला प्रशासन द्वारा बेवजह रोक लगाने और सीमित संख्या में भी तीर्थयात्रियों को संगम के निकट स्नान करने की अनुमति न देने से पैदा हुई अव्यवस्था की स्थिति को लेकर भी नेहरू ने चिंता जाहिर की.[xxiv]

बोर्ड की वित्तीय समिति की बैठक में हिस्सा लेते हुए नेहरू ने कर और राजस्व के संदर्भ में अपने विचार रखे. उन्होंने बोर्ड द्वारा ऐसे परिवार, जिनकी सालाना आय 24 रुपए या उससे कम थी, को मकान या जल कर देने से मुक्त रखने के फ़ैसले का स्वागत किया.[xxv] सड़कों के निर्माण और उनकी मरम्मत को लेकर भी नेहरू ने कमिश्नर को समय-समय पत्र लिखे. उस दिनों भी इलाहाबाद में सड़कों की देखभाल, उनकी मरम्मत, प्रकाश की समुचित व्यवस्था, उनकी साफ-सफाई का ध्यान रखना एक बड़ी चुनौती थी और यह नगरपालिका बोर्ड की जिम्मेदारी थी. किंतु इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए जरूरी संसाधनों से बोर्ड वंचित था. सड़कों की देखभाल के लिए बोर्ड को सरकार के द्वारा महज 27000 रुपए सालाना दिए जाते थे, जो इलाहाबाद में सड़कों के विस्तार और यातायात को देखते हुए नाकाफ़ी था.[xxvi]

जॉनसेनगंज, सिटी रोड, हीवेट रोड, कैनिंग रोड की स्थिति को लेकर भी नेहरू ने अपनी चिंता प्रकट की. ख़ासतौर पर इन सड़कों पर यातायात का दबाव बहुत अधिक था. वहीं खुल्दाबाद से दारागंज तक की सड़क के मरम्मत पर ध्यान देने पर भी नेहरू ने ज़ोर दिया. इस संदर्भ में नेहरू ने सरकार से तीन लाख रुपए के अनुदान की मांग. साथ ही, उन्होंने मोटर लारियों पर कर लगाने की भी बात कही.

नगरपालिका बोर्ड के वित्तीय संकट की स्थिति को लेकर नेहरू ने तीन कारणों का उल्लेख किया. पहला, बोर्ड के कर्मचारियों और उपरि-व्यय (ओवरहेड चार्जेज़) पर होने वाला अत्यधिक खर्च. दूसरा, बोर्ड द्वारा पूर्व में शुरू की गई योजनाओं का लाभदायक न होना. इनमें हरकोर्ट बटलर मार्केट की योजना भी शामिल थी, जिसमें बोर्ड को काफी नुकसान हुआ था. तीसरा, लखनऊ और कानपुर जैसे महानगरों की तुलना में इलाहाबाद बोर्ड को सरकार से बहुत कम आर्थिक सहायता अनुदान या ऋण के रूप में प्राप्त होती थी.[xxvii]

नेहरू का कहना था कि नगरपालिकाओं का काम शिक्षा, संस्कृति और मनोरंजन के अवसर उपलब्ध कराने के साथ-साथ किफ़ायती आवास, सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना भी है. नगरपालिका द्वारा लगाए जाने वाले करों के संदर्भ में नेहरू ने कहा कि और देशों की बनिस्बत हिंदुस्तान में नगरपालिका द्वारा लगाए जाने वाले कर अपेक्षाकृत कम ज़रूर हैं. लेकिन हिंदुस्तान के लोगों की गरीबी और तंगहाली को देखते हुए वह भी उन पर एक बड़े बोझ की तरह है. नेहरू ने इलाहाबाद के सिविल लाइंस जैसे समृद्ध इलाकों और घनी आबादी वाले पुराने इलाकों के बीच के अंतर को भी सामने रखा था. घनी आबादी वाले पुराने इलाकों में जहाँ बुनियादी सुविधाओं की कमी थी, वहीं सिविल लाइंस जैसे इलाके बेहद समृद्ध और हर तरह की सुविधाओं से युक्त थे.[xxviii]

ग्रामीण और शहरी इलाकों की तुलना करते हुए नेहरू ने कहा कि आज भी हिंदुस्तान में शहरों के मुकाबले गांव के लोग अधिक कर देते हैं और उसकी तुलना में उन्हें सुविधाएँ कम ही मिलती हैं. नेहरू ने नगरपालिका द्वारा लगाए जाने वाले करों में कुछ सुधार के सुझाव भी दिए. उन्होंने जमीन के विक्रय मूल्य के आधार पर कर लगाने, भवन निर्माण पर सीमित मात्रा में कर लगाने की बात कही. उनका सुझाव था कि इन दोनों करों को वर्तमान में वसूले जा रहे मकान कर से अधिक नहीं होना चाहिए.

नगरपालिका बोर्ड के कामों में लालफीताशाही के असर को कम करने पर नेहरू ने ज़ोर दिया. ख़ासकर ऐसे विषयों पर, जिनका समाधान बातचीत के जरिए तुरंत निकाला जा सकता हो, लंबे-लंबे नोट्स लिखने, बेवजह का पत्राचार करने और फ़ाइलें तैयार करने की आदत से बचने के लिए नेहरू ने बोर्ड के सदस्यों को कहा.[xxix]

इलाहाबाद शहर के इंप्रूवमेंट ट्रस्ट की कार्यप्रणाली की भी नेहरू ने आलोचना की और कहा कि ‘इलाहाबाद इंप्रूवमेंट ट्रस्ट अक्षमता और खर्चीलेपन का प्रतीक बन चुका है.’ उन्होंने इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के अध्यक्ष के पद को अवैतनिक बनाने का सुझाव दिया.[xxx] नेहरू ने इलाहाबाद नगरपालिका बोर्ड के सदस्यों को महात्मा गांधी द्वारा कलकत्ता महानगर निगम को दिए गए सुझाव की याद दिलाई. अपने सुझाव में गांधी ने कलकत्ता निगम के पदाधिकारियों से कहा था कि वे कलकत्ता के आम लोगों को साफ़ हवा, शुद्ध पानी, शुद्ध दूध और मुफ्त शिक्षा उपलब्ध कराने को वरीयता दें. यही उनका सबसे बड़ा काम होगा.[xxxi]

आख़िरकार जनवरी 1925 में नेहरू ने नगरपालिका बोर्ड के अध्यक्ष पद से अपना त्यागपत्र दे दिया. 28 जनवरी 1925 को नगरपालिका बोर्ड के सदस्यों को भेजे गए एक नोट में नेहरू ने लिखा कि

‘पिछले कुछ समय से बोर्ड के अध्यक्ष पद से मैं इस्तीफा देना चाह रहा था. इस बारे में मैंने कुछ सदस्यों से बातचीत भी की थी. इस फ़ैसले के पीछे कई कारण हैं. जिसमें सबसे बड़ी वजह यह है कि मैं इस महत्त्वपूर्ण पद के साथ न्याय नहीं कर पा रहा हूँ और अपना पूरा वक्त इस दे सकने में ख़ुद को असमर्थ पा रहा हूँ.’[xxxii]

इस तरह लगभग इक्कीस महीने तक इलाहाबाद नगरपालिका की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभालने के बाद नेहरू ने अपना इस्तीफा दिया.

जाहिर है कि इलाहाबाद नगरपालिका की ज़िम्मेदारी संभालते हुए नेहरू ने प्रशासनिक ज़िम्मेदारी का अपना पहला अनुभव हासिल किया था. इलाहाबाद शहर और वहाँ के लोगों को स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए वे तत्पर रहे. नेहरू ने इक्कीस महीने के अपने कार्यकाल में नगरपालिका को राष्ट्रवादी विचारों के अनुरूप संचालित करने की कोशिश की और सरकारी हस्तक्षेप को कम से कम रखने का प्रयास किया.

इलाहाबाद के घनी आबादी वाले इलाक़ों के विकास, कुंभ मेले में आने वाले यात्रियों की सुविधाओं का ख़्याल, शहर की सफ़ाई, कूड़े और अपशिष्ट जल का प्रबंधन, शहर में वेश्यावृत्ति का मसला– ये ऐसे बिंदु थे, जिन पर नेहरू ने नगरपालिका का अध्यक्ष रहते हुए ज़रूरी हस्तक्षेप किया. कर, राजस्व और व्यय जैसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक सवालों पर सोचते हुए नेहरू आर्थिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को अमली जामा पहनाते हुए भी नज़र आते हैं. इन ज्वलंत सवालों पर सोचते हुए उन्होंने देश-विदेश के उदाहरणों से भी सीख हासिल करने पर ज़ोर दिया. जो तब के राष्ट्रीय नेतृत्व के विजन और उनकी विश्व-दृष्टि की व्यापकता का भी प्रमाण है.

 

सन्दर्भ

[i] एस. गोपाल (संपा.), सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2 (नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू मेमोरियल फंड, 1975), पृ. 3-5.
[ii] देखें, लक्ष्मीनारायण सिंह, राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन (प्रयाग : हिंदी साहित्य सम्मेलन, 1982).
[iii] द लीडर, 6 अप्रैल 1923.
[iv] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ. 2.
[v] वही, पृ. 7-8.
[vi] वही, पृ. 9-11.
[vii] द लीडर, 16 जून 1923.
[viii] द लीडर, 29 जून 1923.
[ix] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ. 78.
[x] वही, पृ. 5-6.
[xi] वही, पृ. 21-26.
[xii] इलाहाबाद नगरपालिका में काम करने से जुड़े ब्रजमोहन व्यास के संस्मरणों के लिए देखें, ब्रजमोहन व्यास, मेरा कच्चा चिट्ठा (वाराणसी : विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2013).
[xiii] द लीडर, 6 अक्टूबर 1923.
[xiv] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ. 44-47.
[xv] वही, पृ. 26-30.
[xvi] शिक्षा और स्त्रियों से जुड़े मुद्दों पर उमा नेहरू के योगदान के लिए देखें, प्रज्ञा पाठक (संपा.), उमा नेहरू और स्त्रियों के अधिकार (नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 2020).
[xvii] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ. 35-37.
[xviii] वही, पृ. 41-43.
[xix] वही, पृ.40-41.
[xx] देखें, रामदास गौड़ (संपा.), पाँचवीं पोथी (कलकत्ता : हिन्दी पुस्तक एजेंसी, 1922 [1979 वि.सं]).
[xxi] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ.14-16.
[xxii] उल्लेखनीय है कि कथाकार प्रेमचंद भी वर्ष 1919 में छपे अपने उपन्यास ‘सेवा सदन’ में वेश्यावृत्ति के अभिशाप की चर्चा बनारस शहर के संदर्भ में कर चुके थे.
[xxiii] द लीडर, 30 अप्रैल 1923.
[xxiv] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ. 39-40.
[xxv] वही, पृ. 48-49.
[xxvi] वही, पृ. 49-52.
[xxvii] वही, पृ. 58.
[xxviii] द लीडर, 6 सितम्बर 1924.
[xxix] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ. 70.
[xxx] वही, पृ. 71-72.
[xxxi] द लीडर, 12 दिसंबर 1924.
[xxxii] सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ जवाहरलाल नेहरू, प्रथम सीरीज़, खंड 2, पृ. 77.

 

युवा इतिहासकारों में उल्लेखनीय शुभनीत कौशिक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में इतिहास के शिक्षक हैं. जवाहरलाल नेहरू और उनके अवदान पर केंद्रित पुस्तक ‘नेहरू का भारत: राज्य, संस्कृति और राष्ट्र-निर्माण’ (संवाद प्रकाशन, 2024) का सह-सम्पादन किया है. पत्र पत्रिकाओं में हिंदी-अंग्रेजी में लेख आदि प्रकाशित हैं.

ईमेल : kaushikshubhneet@gmail.com

 

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Comments 1

  1. पवन करण says:
    3 weeks ago

    शानदार। उल्लेखनीय।

    Reply

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