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Home » सतनाम का जंगलनामा : अशोक अग्रवाल

सतनाम का जंगलनामा : अशोक अग्रवाल

78 वर्षीय वरिष्ठ कथाकार अशोक अग्रवाल के संस्मरणों को पढ़ना अपने आप में एक विकट अनुभव है. एक पूरा कालखंड अपनी संवेदनाओं और यातनाओं के साथ जैसे जीवित हो उठता है. उनकी 2024 में प्रकाशित पुस्तक ‘संग-साथ’ ने इस विधा को एक तरह से पुनर्जीवित किया है. सतनाम की पुस्तक ‘जंगलनामा’ के बहाने बस्तर में संघर्षरत गुरिल्लाओं की जो अनकही दास्तान उन्होंने लिखी है, वह जहाँ विचलित करती है, वहीं विमोहित भी करती है. इसे पहली फुर्सत में, प्राथमिकता के साथ पढ़ा जाना चाहिए. प्रस्तुत है.

by arun dev
March 22, 2026
in संस्मरण
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सतनाम का जंगलनामा : अशोक अग्रवाल
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सतनाम का जंगलनामा
बस्तर के जंगलों में संघर्षरत गुरिल्लाओं की अनकही दास्तान


अशोक अग्रवाल

 

सतनाम और उनके सफ़रनामे से पहले, इस किताब के प्रस्तावना-लेखक, शिल्पकार और एक्टिविस्ट गोपाल नायडू के बारे में दो शब्द.

गोपाल नायडू से पहली मुलाकात वर्ष 1979 के किसी दिन, दिवंगत छायाकार मित्र अशोक माहेश्वरी के साथ, नागपुर की एक संकरी गली में बने उसके स्टूडियो में हुई थी. शिल्प-निर्माण के साथ-साथ उसे कविताएँ लिखने का भी जुनून था. गोपाल मुझसे लगभग चार वर्ष छोटा रहा होगा. वह छोटा-सा कमरा उसके शिल्पों से ठसाठस भरा था. शिल्पों को इधर-उधर सरकाते हुए उसने बैठने की थोड़ी-सी जगह बना दी.

गोपाल ने कुछ माह पहले प्रेम-विवाह किया था. वह एगमार्क संस्थान में स्टेनोग्राफर की नौकरी करता था. उसकी पत्नी माधुरी भारत सरकार के सांख्यिकी विभाग में कार्यरत थी. कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं, जो पहली ही मुलाकात में आपके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं. गोपाल नायडू मेरे जीवन में आया ऐसा ही एक अनोखा चरित्र था.

 दिल्ली की ललित कला अकादमी के त्रिनाले में प्रदर्शनी के लिए उसके एक शिल्प का चयन हुआ था. उस शिल्प को दिल्ली की ललित कला अकादमी तक पहुँचाने के उसके अनुभव कड़वे और कटु रहे थे. स्टेशन से उतरते ही एक सिपाही ने यह कहकर कि यह कोई पुरानी मूर्ति है और इसे ले जाना कानून का उल्लंघन है, उससे सौ रुपये का दंड वसूल लिया था. ऑटो वाले ने मंडी हाउस तक पहुँचाने के ‘एहसान’ के प्रतिदान में भी सौ रुपये झटक लिए थे.

प्रदर्शनी समाप्त हो चुकी थी, लेकिन शिल्प को वापस लाने के लिए दिल्ली जाने का वह कतई इच्छुक नहीं था. उसने ललित कला अकादमी के सचिव के नाम एक पत्र लिखा, जिसमें उसने मुझे उस शिल्प को प्राप्त करने के लिए अधिकृत किया था.

वह शिल्प सैंडस्टोन में निर्मित एक भूखी गर्भवती स्त्री का था, जो गर्दन झुकाए ज़मीन पर बैठी हुई है. उसके फूले हुए पेट के दोनों ओर बने गड्ढे उसकी भूखी कोख की ओर संकेत करते हैं. उस भारी-भरकम शिल्प का वज़न चालीस किलो से भी अधिक रहा होगा. वह शिल्प आज भी मेरे आँगन में लावारिस-सी हालत में रखा हुआ है और हर बार गोपाल नायडू की याद दिला जाता है.

गोपाल नायडू वामपंथी विचारधारा से प्रतिबद्ध और समर्पित कार्यकर्ता था. विवाह के दो वर्ष बाद उसने नौकरी छोड़ दी और देशभर में भ्रमण करता रहा. महाराष्ट्र के आदिवासी इलाकों में, झारखंड में और पंजाब के अन्दरूनी गाँवों में. पंजाब-प्रवास के दौरान ही वह सतनाम के संपर्क में आया.

भीमा कोरेगाँव के प्रदर्शन में उसने नागपुर से जाने वाले जत्थे का नेतृत्व किया था. मरणोपरांत भी उसके नाम दर्ज एफ.आई.आर. शायद आज भी नागपुर सेंट्रल थाने के अभिलेखों में अपनी उपस्थिति बनाए रखे हुए होगी. मुझे ऐसा ही विश्वास है.

वर्ष 2014 से 2018 के बीच गोपाल नायडू के साथ ऋषिकेश की ओर चार से अधिक यात्राएँ हुईं. कार्यक्रम की सूचना मिलते ही वह तत्काल नागपुर से हापुड़ चला आता. उसके यात्रा-वृत्तांत अनोखे होते थे और विभिन्न चरित्रों से स्पंदित रहते थे.

एक अविस्मरणीय पात्र, डॉक्टर विनायक के उल्लेख के मोह से मैं अपने को रोक नहीं पा रहा हूँ. डॉक्टर विनायक ने मेडिकल साइंस में सर्जरी की विशेषज्ञता प्राप्त की थी और मुंबई के एक बड़े अस्पताल में उच्च वेतन पर नियुक्त थे. उनकी पत्नी भी डॉक्टर थीं. किंतु अचानक उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के एक अंदरूनी आदिवासी गाँव में चले आए. वहाँ उन्होंने अपना एक छोटा-सा चिकित्सालय खोला और अनेक आदिवासी युवक-युवतियों को कंपाउंडर तथा नर्सिंग के काम के लिए तैयार किया.

गोपाल बताया करता था कि जब कभी डॉक्टर विनायक से पूछा जाता कि वह इतने उज्ज्वल भविष्य को अलविदा कहकर इस दूरदराज़ गाँव में क्यों चले आए हैं, तो उनका उत्तर होता, ‘यहाँ के आदिवासी जो महुए की “पहली धार” की मटकी मुझे प्रेम से भेंट करने लाते हैं, वह भला कहीं और कैसे मिल सकती है?’

उनकी पत्नी कुछ दिनों के लिए वहाँ आई, लेकिन वहाँ के जटिल जीवन को देखकर मुंबई वापस लौट गई. बाद के दिनों में दोनों का तलाक़ भी हो गया.

डॉक्टर विनायक की आकस्मिक मृत्यु के बाद गोपाल नायडू दक्षिण केरल के एक अंदरूनी गाँव में स्थित उनके घर पहुँचा. वहाँ उनके बूढ़े माता-पिता रहते थे, जो अपने बेटे की मृत्यु से अनभिज्ञ थे. गोपाल के द्वारा वहाँ बिताई गई उस रात की स्मृतियाँ हृदय-विदीर्ण कर देने वाली थीं.

मेरा आग्रह हमेशा गोपाल से रहता कि वह अपने आंदोलन के दिनों के बारे में लिखे. ऐसे अनुभव उसके सिवा कोई दूसरा नहीं लिख सकता था. उसका उत्तर हमेशा यही होता, ‘अशोक भाई, लिखना शुरू कर दिया है. पहला ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया है. बहुत जल्द आपको पढ़ने के लिए भेजता हूँ.’

लेकिन वह दिन कभी नहीं आया. 11 अक्टूबर 2024 को गोपाल नायडू का आकस्मिक निधन हो गया. वह पूरी तरह कर्मठ, स्वस्थ और सक्रिय था. नियति का यह खेल हमेशा ही अबूझ रहा है.

मेरा यह आलेख अपने उसी मित्र की स्मृति को समर्पित है. साथ ही वे अनेक अंतहीन रातें, तपती दोपहरियाँ, सूनी सड़कों पर चलते हुए दूर-दूर तक फैली पहाड़ियाँ और वृक्षों पर सुस्ताते परिंदे; सुबह-शाम गंगा-तट पर उमड़ती लहरों पर सफ़ेद तैरते बगुलों की कतार—और न जाने कितना कुछ, जो धुंधली परछाइयों की तरह अब भी हवा में तैरता हुआ-सा लगता है.

 

दो)

गोपाल नायडू ने सतनाम और उनके सफ़रनामे से मेरा पहला परिचय वर्ष 2015 के किसी दिन करवाया था. उसके बाद सतनाम से अक्सर फ़ोन पर लंबी-लंबी बातें होती रहतीं. उनका स्वर हमेशा जोशीला और दोस्ताना होता था. वे हर बार पटियाला आने का आमंत्रण देते और कहते कि जब भी उनका दिल्ली की ओर आना होगा, वे हापुड़ अवश्य आएँगे.

 किताब को नए आकार में छपा देखकर वह काफ़ी प्रसन्न थे. हर तीसरे-चौथे दिन उनका फ़ोन आ ही जाता. वह लंबी-लंबी बातें करने के शौकीन थे. मुझे तब तक बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि वह एकाकीपन का जीवन जी रहे हैं.

बहुत दिनों तक जब उनका कोई फ़ोन नहीं आया, तो मैंने गोपाल नायडू से उनके बारे में पूछा. उसने आश्चर्य से कहा—‘अशोक भाई, आपको पता नहीं! सतनाम अब हमारे बीच नहीं रहे. 29 अप्रैल 2016 को उन्होंने पंखे से लटककर अपनी जान दे दी.’

मैं हतप्रभ रह गया. एक समर्पित और जुझारू कामरेड से ऐसे आत्मघाती क़दम की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. शोक-संतप्त स्वर में गोपाल ने बताया, ‘सतनाम पिछले कुछ महीनों से अवसाद में थे. उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर चली गई थी. सतनाम जिस कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे, उसी के एक वरिष्ठ कामरेड से उनका लगाव हो गया था. उनकी इकलौती बेटी विवाहोपरांत दूसरे शहर में रहने लगी थी. शायद यह अकेलापन उनसे सहा नहीं गया. उस समय उनकी आयु के 63 वर्ष भी पूरे नहीं हुए थे.’

मनुष्य के मानस के अन्तस की पहेली अबूझ है! इसे बड़े से बड़ा मनोचिकित्सक भी हल करने में नाकामयाब है.

 

तीन)

Satnam

‘सतनाम’ उनका लेखक-नाम था; उनका असली नाम गुरमीत सिंह था. लगभग चार दशकों तक वे राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर बेबाक आलेख लिखते रहे. चेतावनियों और धमकियों के बीच भी उनका लेखन निर्भीकता से जारी रहा. अपने विद्यार्थी काल में ही उन्होंने हावर्ड फ्रास्ट के महान उपन्यास ‘आदि- विद्रोही’ का पंजाबी भाषा में अनुवाद कर लिया था.

पहली बार 2004 में जब यह किताब पंजाबी में ‘जंगलनामा—बस्तर दे जंगलां विच’ शीर्षक से प्रकाशित हुई, तो जैसे खलबली मच गई. सतनाम के साथ ‘जंगलनामा’ शब्द मानो उनके उपनाम की तरह नत्थी हो गया. वर्ष 2006 में इसका हिंदी अनुवाद महेन्दर ने किया. Penguin Books India ने इसे अंग्रेज़ी में प्रकाशित किया. देश की लगभग सत्रह भाषाओं में इसका अनुवाद प्रकाशित हो चुका है. महेन्दर द्वारा किए गए अनुवाद का संशोधित और परिष्कृत रूप ‘जंगलनामा’ शीर्षक से वर्ष 2015 में संभावना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ.

‘जंगलनामा’ का यह प्रस्तुतीकरण इसी संस्करण के आधार पर किया गया है.

 

 

चार)

‘जंगलनामा’ से तआरूफ़ कराते हुए सतनाम लिखते हैं.

“यह कोई खोज-पुस्तक नहीं है, न ही किसी कल्पना से उपजी आधी हक़ीक़त और आधा अफ़साना बयान करने वाली कोई साहित्यिक कृति. यह बस्तर के जंगलों में क्रियाशील कम्युनिस्ट गुरिल्लों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी की एक तस्वीर है और वहाँ के कबायली लोगों के जीवन-हालात का विवरण भी, जिसे मैंने अपनी जंगल-यात्रा के दौरान देखा. पाठक इसे किसी डायरी के पन्ने कह सकते हैं या सफ़रनामे का नाम दे सकते हैं.”

“इसके पात्र हाड़-मांस के बने जीते-जागते इंसान हैं, जो अपने सपनों को हक़ीक़त में ढालना चाहते हैं. हुकूमत की ओर से बाग़ी और पाबंदीशुदा करार दिए गए ये पात्र नए युग और नई ज़िंदगी को साकार होते देखना चाहते हैं. इतिहास उनके लिए क्या समेटे हुए है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा; लेकिन इतिहास को वे किस दिशा में मोड़ना चाहते हैं, इसकी व्याख्या उनकी ही ज़ुबान से यहाँ पेश की गई है. अपने अकीदों के लिए जान की बाज़ी लगाने को तैयार ये लोग किस तरह का जीवन जी रहे हैं, इसका अंदाज़ा पाठक इस किताब को पढ़कर आसानी से लगा सकेंगे.”

 

जंगल तक का सफ़र 

वह पहला दिन, जब सतनाम जंगल में दाख़िल हुए, दरअसल दिन नहीं, रात थी. आधी रात के समय वह मार्ग-निर्देशक आया, जिसके साथ उन्हें जंगल में प्रवेश करना था. पक्की सड़क के किनारे से वे नीचे कच्चे रास्ते पर उतर गए. एक पगडंडी पर झाड़ियों के पीछे से एक आकृति उभरी. उसने बारी-बारी से दोनों से हाथ मिलाया.

फिर उन्होंने एक कतार में चलना शुरू किया. चारों तरफ़ अँधेरा और चुप्पी पसरी हुई थी. उन्हें सिर्फ़ एक ही बात का एहसास था कि वे पत्थरों और पेड़ों के जंगल से गुज़र रहे हैं और अँधेरा उन्हें दूर तक देखने नहीं देगा. रात को जंगल शायद इसीलिए खामोश होता है कि जानवर और पंछी आराम कर सकें.

सुबह होने से पहले मार्ग-निर्देशक उन्हें घनी झाड़ियों के पीछे ले गया और बोला—‘एक घंटा सोएँगे और सूरज उगने से पहले ही चल पड़ेंगे.’ धीरे-धीरे फूटती रोशनी में सतनाम ने उसे पहली बार गौर से देखा—लगभग 22–23 वर्ष का हल्के भूरे रंग का जवान; चेहरे पर सुबह जैसी ठंडी मुस्कान, गालों पर हल्की-सी लाली, आँखों में दोस्ताना नज़र और व्यक्तित्व में संजीदगी का एहसास.

उसका नाम वासु था. रात के अँधेरे में भी वह जंगल के रास्तों को बारीकी से पहचान सकता था. वह खाने-पीने का कुछ सामान भी साथ लाया था. तीन दिन तक लगातार चलने के बाद उन्हें धान के खेत के मचान पर एक आदमी खड़ा दिखाई दिया. वासु ने बताया कि वह हमें अच्छी तरह जानता है. उसे मालूम है कि हम यहाँ से गुज़रते हैं, लेकिन वह किसी को बताएगा नहीं.

अगले दिन शाम के समय वे अपने गुरिल्ला क्षेत्र में पहुँच गए. झोपड़ियों के बीच से गुज़रते हुए वे एक घर के आँगन में पहुँचे, जहाँ कुछ आदिवासी नौजवान बैठकर पढ़ रहे थे. हर किसी ने फ़ौजी वर्दी पहन रखी थी और उनके हाथों में कोई किताब, कॉपी या स्लेट थी. अपनी बंदूकें उन्होंने एक ओर लकड़ी के बने स्टैंड पर टिका रखी थीं. दो नौजवान मुस्तैदी से पहरे पर तैनात थे.

भोजन तैयार था. चावल और मछली. वे सभी मछली को साबुत चबा रहे थे और आनंद ले रहे थे. खाने के बाद चाय पी गई. ये आदिवासी सीधे-साधे, निश्छल, निर्मल लोग हैं और सभ्य समाज की पेचीदगियों से निरपेक्ष जीवन बसर करते हैं. कपड़े भी लगभग ढाई ही पहनते हैं या पहनते ही नहीं. नंगेपन, शर्म तथा बेशर्मी संबंधी सभ्य समाज के झमेले से अभी दूर हैं.

 अँधेरा होने पर आगे के सफ़र की तैयारी शुरू हो गई. तीन नए नौजवान उनके साथ और जुड़ गए. तीनों हथियारबंद थे. रात भर और अगले पूरे दिन, थोड़े-थोड़े समय के आराम के अंतराल पर, वे नदियों, नालों और छोटे-बड़े पहाड़ों को पार करते हुए ऐसी जगह पहुँचे जहाँ दूर-दूर तक जंगल का विस्तार था.

यहाँ से पिछली टीम वापस लौट गई और नई टीम ने उनका चार्ज संभाल लिया. कुछ देर आराम करने के बाद उनका सफ़र फिर प्रारंभ हो गया.

एक पहाड़ की तलहटी पर पहुँचकर कमांडर ने कहा कि हम अपनी मंज़िल पर पहुँच चुके हैं, अब सिर्फ़ खेमे तक पहुँचना शेष है. पहाड़ियों के बीच बसे इस खेमे में रोशनी के छोटे-छोटे टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे. उनका स्वागत लगभग तीस गुरिल्ला जवानों ने किया.

‘लाल सलाम’ शब्द भारत की लगभग हर भाषा का हिस्सा बन चुका है; इसके लिए किसी दूसरी भाषा को जानना ज़रूरी नहीं. पूरे खेमे के अधिकांश लोग गोंड आदिवासी थे—कुछ तेलुगू, कुछ बंगाली और कुछ उत्तर भारत की हिंदी पट्टी से आए हुए.

कुछ देर बाद एक सीटी बजी और पाँच मिनट के भीतर बत्तियाँ बुझा दी गईं. सारा खेमा अँधेरे की गोद में सिमट गया.

     

गुरिल्ला कैम्प में

सुबह की शुरुआत रोल कॉल से होती है. सभी एक कतार में अपने हथियारों के साथ उपस्थित होते हैं. जंगल-पानी से लौटने वालों का कुछ देर इंतज़ार किया जाता है. यदि कोई वापस नहीं लौटता, तो उसकी तलाश में खोजी दस्ता भेज दिया जाता है. जंगल में गुम हो जाने का ख़तरा हमेशा बना रहता है.

सुबह के समय रसोईघर में जमघट लगा रहता है. रसोईघर का आँगन ही लंगर है. पारस्परिक वार्तालाप भी प्रायः इसी समय होता है. वे बस इतना ही जानते हैं कि पुलिस और ठेकेदार मिलकर जंगल को लूटते हैं और सरकार का हाथ उनकी पीठ पर है.

उनका सीधा-सादा तर्क होता है—जंगल हमारा है या नहीं? जंगल द्वारा उपलब्ध वस्तुओं को वे सीधे-सादे तरीक़े से हासिल करना चाहते हैं—इस पार या उस पार.

दोपहर के भोजन के बाद सतनाम खेमे का चक्कर लगाने निकलते हैं. एक बांग्ला-भाषी युवक उनके साथ है. वह उन्हें बताता है कि गुरिल्ला जीवन एक अनुशासनबद्ध जीवन है और इसी अनुशासन के माध्यम से वे अपने आप को वश में रखना सीखते हैं.

वह आगे बताता है कि बैलाडीला की लोहे की खदानें दुनिया भर में मशहूर हैं. बस्तर के इसी लोहे की बदौलत जापान अपने कारखाने चलाता है, लेकिन इन खदानों में बस्तर के आदिवासी काम नहीं करते; उनसे सिर्फ़ गड्ढे खोदने या भार ढोने का काम लिया जाता है.

जब वे दूसरी चौकी पर पहुँचते हैं, तो एक शब्द सुनाई देता है, जिसका प्रत्युत्तर दूसरे शब्द से देना होता है. तीर-तुक्के की यहाँ कोई गुंजाइश नहीं. गलत शब्द मुँह से निकलते ही तड़ाक से कोई गोली सीधे सीने में आ लगेगी और हर कोई अपनी-अपनी पोज़ीशन संभाल लेगा.

खेमे में वापस लौटते-लौटते रात हो गई थी. किसी ने रेडियो का स्विच चला दिया. बीबीसी शुरू हो गया. साम्राज्यवादी देश का रेडियो स्टेशन होने के बावजूद गुरिल्ले इसकी ख़बरों पर अधिक विश्वास करते हैं. ट्रांजिस्टर उनके जीवन का एक ऐसा ज़रूरी हिस्सा है, जो उन्हें बाहर की दुनिया से जोड़े रखता है.

‘जल, जंगल और ज़मीन हमारा है’—यह नारा उनकी हक़ीक़त और उनके जीवन दोनों को प्रतिबिंबित करता है.

बस्तर के जंगलों में जगह-जगह आग जलती रहती है. आग जंगल की ज़िंदगी का एक स्वाभाविक हिस्सा है. दुश्मन यदि आग के पीछे-पीछे भटकने लगे, तो कहीं नहीं पहुँच पाएगा—क्योंकि आग तो चारों ओर है. गुरिल्ले कहाँ हैं और कहाँ नहीं, यह आग की लपटें नहीं बता सकतीं.

मुश्किल सिर्फ़ उस समय होती है, जब कोई व्यक्ति अकेला संतरी की ड्यूटी पर होता है. जंगल की भयानक ख़ामोशी उसके चारों ओर फैली होती है, जो उसके भीतर तक पहुँच जाती है. यह जंग के किसी अस्पष्ट इंतज़ार जैसा है. सपनों की दुनिया में खो जाने से बचने के लिए वह अपने ही विरुद्ध संघर्ष करता है.

 सतनाम का मार्ग-निर्देशक कोसा आदिवासियों के खान-पान के बारे में विस्तार से बताते हुए कहता है. ‘जब कंद-मूल भी अनुपलब्ध होने लगते हैं, तो वे लाल कीड़ों की सब्ज़ी बनाते हैं. आदिवासी उनके बिलों में पानी डालते हैं. ढेर सारे कीड़े बिलों से बाहर आने लगते हैं, जिन्हें पकड़कर वे पत्तों में बाँधकर एक गठरी बना लेते हैं. फिर उन्हें सिल पर पीसकर चटनी बना लेते हैं और फ्राई करके भून लेते हैं. नमक-मिर्च डालो और एक लज़ीज़ चीज़ तैयार हो जाती है.

इसी नमक, मिर्च और हल्दी की ज़रूरत ने ठेकेदारों और व्यापारियों का आदिवासियों पर शासन स्थापित कर दिया है.’

गाना और नाचना सभी को आता है. आदिवासियों के सभी गीत सामूहिक होते हैं; वे उन्हें मिलकर गाते हैं. नमक वह पहली चीज़ है, जिसे लोग खरीदते हैं. चीनी, गुड़ और शहद उनकी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं हैं.

कोसा ने बताया कि पुलिस उनके मुर्गे खा जाती है. गुरिल्ला दस्तों की उपस्थिति से बस्तर के जंगल इन लुटेरों से काफ़ी हद तक आज़ाद हो गए हैं. कई दिनों तक जब ये दिखाई नहीं देते, तो लोग चिंतित हो उठते हैं.

श्रीकांत नाम का एक व्यक्ति बताता है कि दुनिया समझती है कि आप ठहर गए हैं. बाहरी दुनिया यहाँ निरंतर हो रहे मुठभेड़ों (एनकाउंटरों) के बारे में ही परिचित होती है. उसे यक़ीन है कि एक दिन देशभर के पैमाने पर वे एक राजनीतिक ताक़त बनकर उभरेंगे.

यह नए किस्म के लोग हैं, जिनमें लड़कियाँ भी बड़ी संख्या में शामिल हैं. उन्होंने आदिवासियों में एक नई ताक़त भर दी है. ‘मुर्गाखोर’ पुलिस के साथ उन्होंने मुकाबला करना सीख लिया है.

 

 

पाँच)

पवन नाम का एक डॉक्टर भी इनमें शामिल है. अपनी दवाइयों का बैग वह कभी अपने से अलग नहीं करता. मलेरिया जंगल में रहने वालों की सबसे बड़ी बीमारी है. आयरन की कमी लगभग हर लड़की की समस्या है. पवन इससे निपटने के लिए दवाइयों का एक बड़ा ज़ख़ीरा हमेशा अपने पास रखता है.

उसने फ़ौजी वर्दी ज़रूर पहन रखी है, लेकिन कभी बंदूक नहीं उठाता. वह गुरिल्लों के साथ हमेशा नहीं रहता. कुछ दिन वहाँ रहकर वापस लौट जाता है. शहर में दो-तीन महीने गुज़ारने के बाद दवाइयों के ज़खीरे के साथ फिर यहीं चला आता है.

ऐतू और पवन एक ही तरह की मिट्टी के इंसान हैं. वे एक तलाश में हैं—एक ऐसे सपने की तलाश, जिसे वे साकार होते देखना चाहते हैं. तभी पवन के विद्यार्थी आ जाते हैं, जिन्हें वह गिनतियाँ सिखाना शुरू करता है.

उन आदिवासियों की समझ में धीरे-धीरे आने लगा है कि संख्याओं की दुनिया भी एक अलग ही दुनिया है. उनके एक-एक पेड़ का मूल्य कितना अधिक है, जिसे बाहर की दुनिया मुफ़्त में लूटकर ले जाती है. पवन उन्हें सिखाता है कि अपने इलाकों में लेन-देन किस प्रकार करें. पवन चला जाएगा तो उसकी जगह कोई और संभाल लेगा. स्कूल उनके रोज़मर्रा के काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

 

 

छह)

बारिश उनके लिए मुसीबत भी लाती है और ख़ुशी भी. बारिश के बाद पूरा जंगल मानो मस्ती में झूमता और गाता है. नदियाँ और नाले पानी से भर जाते हैं, जो उनकी प्यास बुझाते हैं.

बारिश से धुली एक चट्टान पर बैठा कोसा सतनाम से कहता है कि लोहा उनके लिए दरांती, कुल्हाड़ी, चाकू और बंदूक की नाल के अलावा और कुछ नहीं है. उसने सुन रखा है कि रेलगाड़ी, कारें और हज़ारों दूसरी चीज़ें लोहे से बनती हैं, मगर कैसे—यह वह नहीं जानता.

उसने यह भी सुना है कि बैलाडीला की मीलों तक फैली खदानें लोहे के पहाड़ उगलती हैं. वह यह भी जानता है कि यहाँ की मिट्टी में लोहा घुला हुआ है. उसे बस इस बात की हैरानी होती है कि वह दरांती के फाल जैसा क्यों नहीं है!

ऐतू बताता है कि उत्तरी बस्तर के माड़ के इलाके में हीरे भी मौजूद हैं. वहाँ हीरों की खुदाई में लगे ठेकेदार और उनके साथ जुड़े गुंडा-गैंग आदिवासी आदमी-औरतों को अपने अधीन रखते हैं. ऐसा ही जशपुर की नदियों से सोना और हीरे निकालने वाले आदिवासियों के साथ भी होता है.

उन्हें हीरों के बदले बस एक मुट्ठी चावल देकर विदा कर दिया जाता है. हीरे खोदकर भी आदिवासी भूखे के भूखे रहते हैं. गुरिल्लों ने इन ठेकेदारों को भगा दिया है. उनका मानना है कि बहुमूल्य धातुओं को जहाँ रहना चाहिए, वहीं रहने देना चाहिए. गुरिल्लों ने इन आदिवासी मज़दूरों को खेती करना सिखाया है.

ऐतू बताता है कि आदिवासी जल्दी किसी चीज़ को नहीं सीखते. सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा को तोड़ने से पहले वे कई बार सोचते हैं. यहाँ अदरक नहीं, लहसुन नहीं, हल्दी नहीं, प्याज़ नहीं—मेथी, धनिया, पालक कुछ भी नहीं.

मगर अब उन्होंने इनमें से कुछ को उगाना शुरू कर दिया है. आदिवासी एक बार इन्हें उगाना और संभालना सीख जाएँ, तो उनकी कमी नहीं रहेगी.

खेमे के उठने में चौबीस घंटे रह गए थे. ख़ानाबदोश क़बीलों की तरह गुरिल्ले भी अपनी जगह बदलते रहते हैं. गतिशील रहना उनके लिए मजबूरी भी है और अपनी सुरक्षा के लिए अनिवार्यता भी.

जो टुकड़ी आगे जाएगी, वह वापस लौटेगी भी या नहीं—यह वे नहीं जानते. इसलिए वे पूरी आत्मीयता से मिलते भी हैं और बिछुड़ते भी हैं.

खेमे का आख़िरी दिन था. सुबह रोल कॉल के समय पाँच नाम पुकारे गए, जिनके साथ सतनाम को आगे की यात्रा पर जाना था. इनमें श्रीकांत नाम का एक युवक भी था, जिसे यक़ीन था कि एक दिन उनकी दुनिया में परिवर्तन आएगा.

वह ख़ुद को और अपने साथियों को ऐसे बीज मानता है, जिन्हें कल बड़े होकर एक विशाल वृक्ष में बदलना है. ऐसे हैं ये लोग, ऐसे हैं उनके सपने और ऐसी है उनकी ज़िंदगी.

 

भ्रमण 

अपने ही क़दमों की आहट के अलावा कुछ सुनाई नहीं देता. सतनाम जिस टुकड़ी के सदस्य थे, वह छह लोगों की थी, जिसकी कमान एक लड़की के हाथ में थी. सभी एक कतार में चल रहे थे. डेढ़ घंटे लगातार चलने के बाद कमांडर ने कहा—‘अब कुछ देर आराम कर लो. एक घंटे का सफ़र और तय करना है.’

उनकी यात्रा फिर शुरू होती है. रात में घने जंगल में रुकना होता है. चौकसी संबंधी कोई भूल नहीं बरती जा सकती. चलते-चलते थकान हो गई है. चारों तरफ कब्रिस्तान जैसी चुप्पी है. आग के पास रात काटने वाला आदमी गुरिल्ला बन जाता है.

सुबह के समय कुछ दूरी चलने के बाद गुरिल्ला टुकड़ी एक नदी के पास पहुँचती है. उनमें से कोई एक पास ही काम कर रहे दो आदिवासियों को आवाज़ देता है. एक आदिवासी उनके पास चला आता है. वह सबको सलाम करता है और सभी उसे. कुछ देर बाद वह गाँव की ओर लौट जाता है.

कुछ समय बाद गाँव के कुछ लोग पतीलों और पानी से भरी गागरों के साथ पहुँचते हैं. इसी तरह सफ़र जारी रहता है. दोपहर के समय वे कुछ देर आराम करते हैं और रात का बचा हुआ भोजन खाते हैं.

चलते-चलते तीन दिन व्यतीत हो चुके हैं. मुँह ढके एक व्यक्ति आता हुआ दिखाई देता है. उसके एक हाथ में कमान है और दूसरे में तीर. वह एक दिशा की ओर इशारा करता है, जिस ओर उन्हें जाना है, और स्वयं जंगल में गुम हो जाता है. उसकी बताई दिशा की ओर उनकी टुकड़ी चल पड़ती है.

कुछ मिनट के इंतज़ार के बाद दो व्यक्ति उनकी ओर आते दिखाई देते हैं. सतनाम उस महिला कमांडर से पूछते हैं—‘क्या हम किसी दस्ते से मिल रहे हैं?’ वह मुस्कुराते हुए ‘हाँ’ में उत्तर देती है.

सतनाम समझ जाते हैं कि गुरिल्लों का आगमन भी रहस्यमय है—एक मिलता है तो दूसरा किसी और दिशा में चला जाता है.

 

 

सात)

यह नया ग्रुप अलग तरह का है. यह उनका सांस्कृतिक ग्रुप है. कुल चौदह लोगों की टुकड़ी में चार लड़कियाँ हैं—गुरिल्ला सांस्कृतिक ग्रुप, उत्साह और जोश से भरपूर. वे जानते हैं कि सरकार चाहे तो उन्हें कभी भी मार सकती है. पहले भी अपने उद्देश्य को समर्पित कई कलाकार मारे जा चुके हैं.

वे जनता के घरों में खाना खाते हैं, उनसे ही अपनी ज़रूरतें पूरी करते हैं और उन्हीं के बीच रहते हैं. ये कलाकार संगीत, नाटक और लोकनृत्य के सहारे लोगों को मानवीय अधिकारों के प्रति जागरूक करते हैं. उनके भीतर अमानवीय ज़िंदगी के विरुद्ध प्रतिरोध की भावना जगाते हैं.

इन गीतों को कौन मार सकता है? ये गीत एक गूँज हैं—सर्वव्यापक और अनंत. ये जंगल के हर पेड़, हर झाड़ी, हर पत्ते से निकलते हैं. ये हवा में हैं, नदियों की कलकल में हैं, धरती के हर टुकड़े में हैं. इन्हें भला कौन मार सकता है?

देर रात तक आग के इर्द-गिर्द गीत गाए जाते रहे. गाँवों से आए लड़के-लड़कियाँ और दूसरे सभी लोग अपने-अपने गमछे ओढ़कर आग के पास सो गए.

 

 

आठ)

चावल, ताड़ी का रस और मछली—इन तीनों का योग है बस्तर का आदिवासी. ताड़ी आज की ताज़ा निकली हो तो वह मीठा रस होती है, कल की हो तो हल्की शराब बन जाती है और परसों तक एक बेकार चीज़ में बदलकर फेंक दी जाती है.

टीम को यहाँ डेरा डाले तीन दिन बीत चुके हैं. आज दोपहर तक वे नए ठिकाने पर पहुँच जाएँगे. इस नए ठिकाने की रसोई का चार्ज रजनी के पास है—19–20 साल की एक आदिवासी लड़की. रजनी दो साल से इस टीम का हिस्सा है.

रजनी जानती है कि बाहरी लोगों द्वारा उसके जंगल की संपदा को लूटा जा रहा है. वह जंगल पर आदिवासियों के हक़ की लड़ाई का हिस्सा बनना चाहती है, जिसके लिए वह अपनी जान तक की बाज़ी लगाने को तैयार है.

इसी जज़्बे की बदौलत बीस साल की रजनी कई सौ साल पुराने किसी बरगद के पेड़ की तरह दिखाई देती है—एक ऐसी लड़की, जिसने हज़ारों साल को अपने बीस सालों में समेट लिया है.

ये आदिवासी गायों का दूध नहीं पीते. वे मानते हैं कि उस पर बछड़ों का अधिकार है. मुर्गियों के अंडे भी नहीं खाते, क्योंकि अंडे चूजों को जन्म देते हैं. औरतें भी अपने बच्चों को कई साल तक दूध पिलाती हैं.

ये आदिवासी अपने आसपास की प्रकृति को उसी रूप में बने रहने देना चाहते हैं, जैसी कि वह है. गुरिल्ले इस बात को अच्छी तरह समझते हैं. वे उन्हें सबसे पहले जल, जंगल और ज़मीन पर उनका हक़ स्थापित करने का शिक्षण देना अपना पहला दायित्व मानते हैं.

सारा का सारा गाँव एक साथ इकट्ठा होकर नृत्य करता है. बीमार पड़ा आदमी भी उठकर उसमें शामिल हो जाता है. बस्तर में मलेरिया समुद्र की तरह ठाठें मारता है. यहाँ वही डॉक्टर आ पाता है, जो गुरिल्लों की विचारधारा के प्रति समर्पित है.

इनके आगमन के बाद आदिवासियों ने ताड़ी से गुड़ बनाना सीखा है. यहाँ एक पवन की उपस्थिति का अर्थ है—सैकड़ों मरीज़ों का एक ही समय इलाज़.

राजू नाम का युवक सतनाम को एक तालाब के किनारे ले आता है, जिसके ऊपर लगभग आठ व नीचे से सोलह फुट चौड़ा बांध बना था. जंगल के बीच यह एक अजूबा है. आदिवासियों ने गुरिल्लों की मदद से इसका निर्माण खुद किया है. इसमें उन्होंने मछली पालन शुरू किया है. इतना विशाल तालाब कि आसपास के  अनेक गाँवों के लिए मछलियां उपलब्ध होंगी. इस तालाब में पहली बार बीज डाला गया है. राजू बताता है कि आदिवासियों को इनका पालन सीखने में समय लगेगा. राजू वहाँ के आदिवासियों को पानी के महत्व के बारे में समझाता और सिखाता है कि पानी को व्यर्थ होने से कैसे बचाया जाए!

 

 

नौ)

अगला पड़ाव आदिवासियों का एक बड़ा गाँव था. चंदन पूरी तरह थक चुका था, लेकिन वह जानता है कि कमांडर कभी थकता नहीं. खाना बनाने की जिम्मेदारी हर कोई खुशी से निभाता है.

रात होते ही नृत्य प्रारंभ हो गए. एक के बाद दूसरा नृत्य, गीत, पैरों की ताल, हंसी की झंकार और सुरों का मेला. बीचोंबीच जल रही आग रोशनी का काम करती है. यह परिकथा की तरह किसी दूसरी दुनिया में ले जाता है. इन सबके बावजूद घनै जंगल में पहरेदार तैनात हैं. किसी दूसरे गाँव में ये उत्सव में शरीक होंगे और पहरेदार की जगह दूसरे व्यक्ति आ जाएंगे.

सांस्कृतिक टोली का यह कमांडर दस साल की उम्र में ही वारंगल शहर से जंगल में चला आया था. डेढ़ साल से बस्तर के जंगलों में है, जहाँ उसने नया मंच शुरू किया है. तीर- कमान का जंगी नाच,  मिलेशिया का डांस. ओझाओं का नाच. लोक नृत्य शांत हैं. उनके विषय फूल चुनना, फल तोड़ना, धान काटना जैसे उनके रोजमर्रा के जीवन से जुड़े हैं. नृत्य के बाद थककर आनंद में डूब जाना.

जब से गुरिल्ला आए हैं, वे उनके लिए बहुत सारी वस्तुएं लाए हैं. लड़कियां साड़ी ब्लाउज पहनने लगी हैं, जबकि अधिकांश औरतें अभी भी एक गमछे  से अपने कंधे ढकती हैं और दूसरे को कमर के नीचे लपेट लेती हैं. लड़कियां युगों पुराने रिवाजों को तेजी से तोड़ती दिखाई देती हैं. गुरिल्ला सेना का आधा हिस्सा लड़कियों का है, जो फ़ौजी वर्दी में रहती हैं और कंधे पर बंदूक उठाये गाँव-गाँव घूमती नज़र आती हैं.

 

 

दस)

हर आदिवासी गाँव अलग-अलग जगह पर बसी झोंपड़ियां का समूह है. हर घर में एक या दो पतीले, एक दो थालियां, एक लकड़ी की कलछुल, एक दो गिलास, एक लोटा, एक गगरी, एक हाँडी और एक दो कटोरिया हैं. इससे अधिक बर्तन कुछ के ही पास होते हैं. धान कूटने के लिए ओखली हर घर के भीतर बनाई जाती है. कुल्हाड़ी, बड़ी दरांती ,तेल निकालने के लिए पत्थर की सिल हर घर का हिस्सा है.  धनुष और तीर भी. लगभग हर घर के आंगन में मुर्गीखाना होता है, जिसमें पांच- छह मुर्गी- मुर्गियां होती हैं. एक बाड़ा बकरियों के लिए बनाया जाता है.

ज़मीन हर आदिवासी के पास है. निश्चित जगह पर वे खेती करते हैं. किसी को भी आम किसान से अधिक ज़मीन रखने का अधिकार नहीं है. गैर आदिवासी लोगों को  वहाँ बसने की मनाही है. जब हाट बाजार लगता है तो गुरिल्ले वहाँ इस बात की निगरानी रखते हैं कि बाहर से आए व्यापारी उन आदिवासियों को लूट न सकें. देश के अधिसंख्यक इलाकों में आदिवासियों का भूख से मरना एक मामूली घटना है, लेकिन बस्तर में इन गुरिल्लों के आने की बाद ऐसी घटनाओं में भारी कमी आई है.

 

 

ग्यारह)

यह गाँव इन्कलाब का गढ़ माना जाता है. नारंग सबका भाई भी है और बाबा भी. विकास की इस नई किस्म की शुरुआत से वह बाग-बाग है. लोग पहली बार नई किस्म की सब्जियां चखेंगे तो नारंग स्वाद से भर जाएगा. इनके बीज उपलब्ध कराना और उन्हें उगाना उसी ने इन्हें सिखाया है. बस्तर के हाट बाज़ार में सब्जियां नहीं बिकतीं. सूखी मिर्च, हल्दी की गांठें,प्याज, अदरक और लहसुन की गांठें ही कभी-कभी पहुंचती हैं. नारंग अब इन सभी सब्जियों को उगाना उन्हें सिखा रहा है. सिंचाई की समस्या का भी उसने हल कर लिया है. नदियों- तालों की भरमार के बावजूद पानी के लिए ढलान बनाना जोख़िम का काम है. पथरीली धरती से पानी के लिए राह बनाना. नारंग तालाब के पानी को सामूहिक खेतों तक ले जाने के लिए कमर कस के खड़ा है. कई जगहों पर उसने सफलता भी पाई है. पूरे गाँव की मेहनत से यह संभव हो पाया है.

सरकार द्वारा पहाड़ी कोरबा जैसे प्राचीन भारतीय कबीलों को ‘सभ्यता’ के  दायरे में लाने की आपराधिक साजिशें रची जा रही हैं .टूरिज्म यानी जुर्म, वेश्यावृत्ति व अमीरों की अय्याशी के अड्डे स्थापित करने के लिए आदिवासियों की शांत जिंदगी में खलल डालने को वह विकास व रोजगार पैदा करने का नाम देते हैं. दिल्ली का नाम उनके लिए सरकार से जुड़ा हुआ है. सरकार का मतलब उनके लिए ठेकेदार, पुलिस, दमन, उजड़ना और बेबसी.

आदिवासियों ने जो बांध- तालाब बनाए हैं, वे सामूहिक श्रम के पहले महत्वपूर्ण प्रतीक हैं.उनका निर्माण उस उभर रही ताकत के फलस्वरुप संभव हुआ है, जिसके कई नुमाइंदे इन खेमों में शरीक हैं. जबकि प्रशासन का पूरा ढांचा इनके प्रतिरोध में खड़ा है.

 

 

बारह)

आदिवासियों को स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध नहीं कराना सरकार के लिए किसी अपराध से कम नहीं है. जंगल दवाइयाँ तैयार करने वाली बूटियों का भंडार है, पर उनसे निर्मित होने वाली दवाइयाँ उन तक नहीं पहुँचतीं. दवा कंपनियाँ अपने उत्पादों के लिए बाज़ार ढूँढ़ती हैं, लेकिन अनिवार्य होने के बावजूद वे यहाँ के निवासियों के लिए अनुपलब्ध रहती हैं.

 जब सतनाम टुकड़ी के साथ दूसरे गाँव पहुँचते हैं, तो गाँव के बाहर कोई भी नज़र नहीं आता. दो लोगों को गाँव का जायज़ा लेने के लिए भेजा जाता है. कुछ देर बाद उनके साथ गाँव के दो व्यक्ति आते हैं. उन्होंने एक काँवड़ उठाई हुई है, जिसमें पानी से भरे पतीले लटके हुए हैं.

दोनों ने ताड़ी पी रखी है. उन्होंने ‘बीजा पांडुम’ का जश्न मनाया है—‘बीजा पांडुम’, यानी खुशी का त्योहार. आज के दिन हर कोई पीता है. यह इस बात का संकेत है कि अब फसल कट चुकी है और नया साल शुरू हो गया है.

कुछ महीने बीतेंगे और इन्हें फिर से व्यापारियों से चावल खरीदने पड़ेंगे. हर साल यही होता है. सारी उम्र इसी तरह बीत जाती है.

नारंग ने गाँव के निवासियों की शानदार कथा सुनाई. जब यहाँ बांध बनाया गया तो आसपास के दस गाँवों के लोग इस श्रम में शामिल हुए थे. बांध तीन गाँवों का साझा है. जब सरकार को पता चला कि लोग अपनी हिम्मत से बांध बना रहे हैं तो अधिकारी आ गए. उन्होंने 50 लाख की पेशकश की, पर लोगों ने ठुकरा दिया. लोगों में गुस्सा था,क्योंकि सरकार ने पहले एक बांध गिरा दिया था. सरकार का कहना था कि बांध का निर्माण गुरिल्लों के कहने पर किया गया था. उसके बाद से कभी किसी अधिकारी को गाँव वालों ने गाँव में घुसने नहीं दिया.

बांध का निर्माण आदिवासियों ने ढाई साल के अंदर 230 दिनों की कड़ी मेहनत द्वारा किया था. इसमें हर घर का योगदान था. इसमें अब मछली पैदा होगी तो सभी के लिए. तालाबों और पोखरों को ठेके पर देकर कमाई करने वाली यह सरकार भला कैसे चाहेगी कि कहीं साधन अपने आप उत्पन्न हों और उसे और ठेकेदारों को साझेदारी से बाहर कर दिया जाए.

नारंग अपने मस्तिष्क की डायरी में बहुत कुछ दर्ज़ करता रहता है. उसने कई गाँवों में फलों के बाग लगवाए हैं. आम, अमरूद और नींबू के. ऐसे झुंड एक अलग ही आकर्षण का केंद्र हैं. यह छोटी-छोटी तब्दीलियां भविष्य में भारी परिवर्तन का संकेत हैं.

रेला बिना आदिवासी गीत की कल्पना लगभग असंभव है. रेला खूबसूरती, खुशी, तरंग, व वजूद का दूसरा नाम है. दरअसल रेला खूबसूरत बसंती फूलों वाले विशाल अमलतास का फल है, जिसकी खूबसूरती का आदिवासी जीवन और संस्कृति के साथ गहरा संबंध है. महुआ के वृक्ष का हर हिस्सा उनके काम आता है. यही अमलतास खूबसूरती, खुलेपन और खिले मन का प्रतीक है.रेला की खबर सुनते ही हर आदिवासी का ध्यान उस ओर खिंच जाता है. हाथ अपना काम करते-करते रुक जाते हैं और पैर थिरकने लगते हैं. यह ज़िंदगी की अनंन्तता का गीत है. यह जीवन देने वाली वर्षा के स्वागत का गीत है. वे गाते जाएंगे, भीगते जाएंगे और नाचते जाएंगे.

 

 

तेरह)

ऐसे ही एक समारोह में उनकी भेंट मासे नाम की एक लड़की से होती है. मासे अपने गाँव की औरतों की नेता है और सभी उसे सम्मान देते हैं. राजू भी डेढ़ साल की मेहनत के बाद सांस्कृतिक टोली का हिस्सा बना है. राजू मंच की पढ़ाई में तीसरी जमात पास कर पहुंच गया है. यह नया नेतृत्व है जो धीरे-धीरे आकार ले रहा है.

इस सांस्कृतिक टोली का सबसे बड़ा ध्यान उनकी पढ़ाई लिखाई की ओर है. लिखने वालों ने पतली-पतली टहनियां तोड़ कर अपनी लिखने की कलम बना ली है. सबसे ज़्यादा पढ़े लिखों ने पेंसिलों से अक्षर बनाए. जो बिल्कुल ही कुछ भी नहीं जानते थे, उन्होंने बैनरों के किनारे पकड़ लिए. ये सभी अपने काम में उत्साह से लगे हुए थे. इन गौंड लड़कों- लड़कियों के बाप- दादाओं ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनकी आने वाली पीढ़ियां फूल और कंदमूल चुनते- चुनते एक दिन रंगों और ब्रुशों से अपनी जिंदगी को बयां करने लगेंगी. उनकी संतति कंदमूल और सांपों को हाथों से पकड़ते- पकड़ते लेखन- कला के एक विशाल स्कूल के विद्यार्थी बन जायेंगे.

 

 

चौदह)

तीसरे दिन सतनाम की आगे की यात्रा प्रारंभ होती है. इस बार उनके साथ नए साथी हैं. उनके नाम हैं लच्चक्का, बसंती और कन्नन्ना. उन्हें विदा करते हुए चंदन कहता है, ‘नया इलाका, नए लोग. जंगल में यही तरीका है. चलते रहो, चलते रहो यह जंग है– लंबी दीर्घकालीन जंग.’

बसंती खिले फूल की तरह मुस्कुराती है. यह दस्ते की नई लड़ाकू लड़की है. वर्दी में भी वह गुरिल्ला नहीं, कंद मूल और फूल चुनने वाली लड़की लगती है. हर किसी ने गर्मजोशी से अलविदा कहा. ‘फिर मिलेंगे’, किसी ने नहीं कहा. दोबारा मिलना होगा भी या नहीं, निश्चित नहीं. ऐसा अनुभव होता है जैसे आखिरी बार हाथ मिलाए जा रहे हों.

तीन दिन और तीन रात यह टुकड़ी लगातार चलती रही. रुकते और पड़ाव करते रहे. हमेशा की तरह सोने की जगह तलाशी जाती और उसी तरह निगरानी के लिए कोई पहरेदार नियुक्त किया जाता. लच्चक्का हमेशा चुप्प दिखाई देती है. घने गुप्प अंधेरे में उसकी आंखें बिल्ली की तरह चमकती दिखाई देती हैं. उसके साथी बताते हैं कि पहरेदारी के लिए वह सबसे उपयुक्त है. कड़े परिश्रम के बावजूद वह कभी अपने को थका महसूस नहीं करती.

सतनाम उससे बातचीत करते हैं तो वह बताती है कि मां-बाप ने उसकी मर्जी के ख़िलाफ़ लड़के के घरवालों से शराब मंज़ूर करने के साथ उसका विवाह तय कर दिया. उसी समय वह घर से भाग कर दस्ते में शरीक हो गई. लच्चक्का को घर की ज़िंदगी से कहीं अधिक आसान अपनी यह ज़िंदगी लगती है. नई जिंदगी के बारे में वह सिर्फ़ इतना जानती है कि उसमें हर कोई आजाद, पढ़ा-लिखा और सुखी होगा. उसने भी दस्ते में शरीक होने के बाद लिखना-पढ़ना सीख लिया है.

कन्नन्ना जब कभी छह महीने या साल भर अपने गाँव के पास से गुज़रता है तो किसी गाँव वाले से अपनी पत्नी का हाल-चाल पूछ लेता है. बच्चों की उससे कोई चिंता नहीं है. वह दूसरे आदिवासियों की तरह वन उपज एकत्रित करते हैं और धान उगाते हैं. मछलियां पकड़ते हैं और शिकार खेलकर अपना जीवन आनंद से गुज़ारते हैं. एक आदमी ने लच्चक्का को रोका और बताया कि गाँव में एक छोटी लड़की आग में झुलस गई है. लच्चक्का तुरंत उसके साथ लड़की के घर पहुंची और उसके बारे में चिंतित हो उठी.’मैं इसे मरने नहीं दूंगी. कितनी प्यारी बच्ची है! मैं डॉक्टर को यहीं लेकर आऊंगी.’

उस रात लच्चक्का सोई या नहीं, कोई नहीं बता सकता. अगले दिन उसने महिला संघ की औरतों को उस बच्ची की देखभाल करने की जिम्मेदारी सौंपी और दस्ते के रवाना होने से पहले समय पर आ गई.

 

 

पंद्रह)

नया इलाका नए लोग. दसरू चौबीस साल का नवयुवक था. दोस्तों के बीच संपर्क बनाने के लिए अक्सर ही सफ़र पर निकला रहता है. उसका निशान अचूक है. कमांडर राजेश ने यहाँ की कमान संभाली हुई है. वह तेलुगूभाषी है और कुशल संगठनकर्ता भी. राजेश ने सतनाम को बहुत सी जानकारियां दीं. उसने बताया कि आदिवासियों के पारस्परिक वाद विवाद, विकास कार्य, पुलिस दमन और नए लड़ाकों की भर्ती जैसे जरूरी काम हैं, जो कठिन श्रम की मांग करते हैं.

एक दिन सुबह-सुबह कोई व्यक्ति खबर लेकर आया कि मासे नाम की एक छोटी सी लड़की मर गई है. यह वही छोटी लड़की थी, जिसका इलाज़ लच्चक्का कराना चाहती थी. राजेश बोला,’ जब इस बात का पता लच्चक्का को लगेगा तो वह बेहद दुखी हो जाएगी.’

 

 

सोलह)

अगले पड़ाव पर उन्होंने एक स्कूल देखा. दीवार पर एक नक्शा टंगा हुआ था और साथ ही एक तख्ती भी. उस तख्ती पर उन विद्यार्थियों के नाम लिखे थे, जो कक्षा में उपस्थित हुए थे.

गाँव के पटेल ने बताया कि स्कूल के गुरुजी महीने में मुश्किल से एक-दो दिन ही आते हैं. अधिकतर मास्टर अपने शहरों या गाँवों में ही रहते हैं. उन्हें हर महीने तनख़्वाह दे दी जाती है. सरकार को इससे अधिक कोई मतलब नहीं.

कमांडर राजेश ने बताया कि वे इन स्कूलों का प्रबंध अपने हाथ में ले लेंगे. कोई नौजवान आदिवासी पढ़ाने की जिम्मेदारी ले लेगा तो उसके लिए गुजारे लायक तनख्वाह की व्यवस्था करेंगे. गुरिल्लों द्वारा चलाए जाने स्कूल कई जगह पर स्थापित हो चुके हैं, जहाँ बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दी जाती है और उनके बीच भाईचारे को विकसित किया जाता है. राजेश ने उनकी बीमारियों और अनेक समस्याओं से उन्हें मुक्ति दिलाने में सहायता की है.

राजेश कहता है, ‘यहाँ आने में फिर दो महीने बीत जाएंगे और हर चीज इसी  तरह उलझी हुई मिलेगी. लगातार संपर्क बनाए रखने का हम रास्ता नहीं निकाल पा रहे. ऐसे व्यक्ति चाहिए, जो तिनके से स्कूल खड़ा कर लें. दवा से अभी मलेरिया ही रोक लें तो यह भी बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी.’

लच्चक्का को जब से मासे की मृत्यु की सूचना मिली थी, तभी से वह उदास थी. बहुत देर तक बुत बनी बैठी रही. धीरे-धीरे वह सामान्य हुई और अपने उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित करने लगी. कन्नन्ना ने कहा कि बस्तर में मौत बच्चों को जल्दी दबोच लेती है, जब कोई मरता है तो जंगल खामोश हो जाता है. एक किलकारी कम हो जाती है और उदासी छा जाती है.

लच्चक्का के चेहरे पर सुबह की ताजगी आ चुकी थी. उसकी जगमगाती आंखे उसके स्याह काले रंग में और भी खूबसूरत दिखाई देने लगीं.

उस दिन तीन घंटे के सफ़र के बाद जहाँ वे पहुंचे वहाँ दूसरे दस्ते के लोग उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. वहीं एक कमांडर लड़की एक माह के अंतराल बाद मिली. सतनाम उससे उससे करीमनगर की उन सात लड़कियों के बारे में जानना चाहते थे जिनको पुलिस ने नदी पर नहाने जाते समय पकड़ कर मार दिया था. पुलिस ने उनके ग्रुप को घेर लिया. बलात्कार किया, स्तन काट दिए, गुप्तांगों में मिर्ची डाली और अंत में गोली मार दी. कमांडर लड़की ने सिर्फ़ यही कहा कि वे सभी लड़कियां उन्हीं जैसी थीं, जिनसे वे इन दिनों जंगल में मिल चुके हैं. हर लड़की एक जैसी होती है. लच्चक्का,मासे और बसंती की तरह. दस्तों में लड़कियों की बड़ी संख्या इस बात का सबूत है कि आधे आसमान की लड़ाई ने एक बड़ी करवट ली है.

 

 

सत्रह)

जंगल की अकूत प्राकृतिक संपदा में इन आदिवासियों के लिए वही वस्तुएं उपयोगी हैं, जो उनके जीवन के काम आती हैं.शेष सभी वस्तुएं जिन्हें बाहरी व्यापारी खरीद कर ले जाते हैं उनके लिए बेकार हैं. आंवले के मुकाबले बांस की कोपलें उनके लिए ज्यादा उपयोगी हैं, जिनसे वह सब्जी बना सकते हैं. हरड़ और बहेड़ा की वहाँ बहुतायत है, लेकिन उनके उपयोग से वह अनभिज्ञ हैं. चावलों की अनेक किस्में होने के बावजूद भूख वहाँ की सबसे बड़ी मुसीबत है.

सुषमा नाम की गुरिल्ला लड़की उन्हें गुड़, अंडे, मूंगफली और आयरन की गोलियां खाने के लिए लगातार प्रेरित करती है. यह सभी खाना उनके लिए कितना जरूरी है, इसके बारे में पूरी तन्यता से समझाती है. फोड़े की चीरफाड़ करने वाला नश्तर और आदमी की गर्दन उड़ाने वाली तलवार हमेशा उसके पास रहती है.

 

 

अठारह)

पानी के एक सोते के पास वे एकत्रित हुए. जब कभी गुरिल्ले अपना डेरा यहाँ जमाते हैं तो जानवर अपना रास्ता बदल देते हैं. पहले पहाड़ पर जब पुलिस का डेरा होता था, तो ताड़ी- महुआ की शराब और उनकी अश्लील  हरकतों से वहाँ के स्थानीय निवासी परेशान हो जाते थे. गुरिल्लाओं के लिए स्थानीय लोगों के सहयोग से उनको वहाँ से भगाना कोई मुश्किल कार्य नहीं था. पुलिस चौकी रात्रि में फूंक दी गईं. पुलिसवाले भाग खड़े हुए.अब औरतें बिना किसी भय के पहाड़ों के आर- पार अकेले भी जा सकती हैं.

 

 

उन्नीस)

आंध्र से आए एक नौजवान को स्थानीय लोगों ने पुलिस का मुखबिर समझ दस्ते के हवाले कर दिया. दरअसल वह घर वालों से लड़कर आया था और दल में शामिल होने के लिए वहाँ पहुंच गया. अच्छी बात तो यह हुई कि आदिवासियों ने उसको पकड़ कर दस्ते के हवाले कर दिया. पिछला समय होता तो वे उसे अजनबी को काटकर जंगल में फेंक देते. पिछले कुछ सालों में इन इलाकों में नरबलि की एक भी घटना नहीं घटी. आदिवासियों को इस चेतना तक पहुंचाने में उन्हें कई बरस लग गए.

बीमारियां गुरिल्ला जीवन का अटूट हिस्सा हैं. गुरिल्ला फाइटर भी है और डॉक्टर भी. स्थानीय लोगों के साथ अंतरंगता का एक बड़ा कारण उनका बीमार व्यक्तियों का इलाज करना भी है. हर गुरिल्ला कम या ज़्यादा उनकी बीमारियों का उपचार करना जानता है.

अगली सुबह सतनाम जया नाम की लड़की से करीमनगर की लड़कियों के  माध्यम से उसके विचारों को जानने के लिए उससे वार्तालाप प्रारंभ करते हैं. जया आंध्र की रहने वाली है. ‘बस इतना ही कि पुलिस ने उसको पकड़ लिया और मार दिया.’ यह कहकर वह चुप्प हो जाती है. परिवार के बारे में उदासीनता से सिर्फ़ इतना कहती है,’ वह अपने बाप से नफ़रत करती है. मैं जंगल में इसलिए हूं कि पितृसत्ता मेरी दुश्मन है. इसकी क्रूरता को मेरी मां, मेरी भाभी और मैंने झेला है.’ कुछ देर बाद उसने शॉटगन उठाई, अलविदा कहा और संतरी पोस्ट की ओर चली गई.

 

 

बीस)

अगले दिन कूच का निर्देश आ गया. सभी व्यक्तियों को दो हिस्सों में बांट दिया गया. सतनाम वाली टुकड़ी में पांच लोग थे.दोनों अलग-अलग रास्तों पर निकल गए. दो घंटे के सफ़र के बाद दो व्यक्ति और अलग कर दिए गए. राजेश ने बताया कि इससे सारे बस्तर के दलों के बीच ताल-मेल बना रहता है. अगली सुबह उसने दो लोगों को अलग दिशा में भेज दिया. छोटे ग्रुप दलों की संचार- लाइन का काम करते हैं. सभी ने ‘फिर मिलेंगे’ कहा या एक मीठी मुस्कुराहट एक दूसरे को भेंट में दी.

गुरिल्ला ज़िंदगी में कहीं कोई ठहराव नहीं, हमेशा गति बनी रहती है. सुबह एक नदी का पानी तो शाम दूसरी नदी का. कभी-कभी सालों बीत जाते हैं उन पुरानी परडंडियों पर फिर से आने में, जहाँ वे अभी भी उनके क़दमों की पदचाप पहचानती हैं. जैसे वे पगडंडियां उनकी प्रतीक्षा कर रही हैं. इस चिंता से भरी कि वे कहीं जंगल में गुम न हो गए हों. जब वे लंबे समय तक नहीं आते तो गाँव वाले भी चिंतित हो उठते हैं. वे जानते हैं कि यदि गुरिल्ले नहीं आएंगे तो पुलिस आएगी. पुलिस के आने का अर्थ वह अच्छी तरह समझते हैं.

 

 

इक्कीस)

मिलीशिया के दस्ते लगभग हर गाँव में मौजूद हैं. सतनाम की टुकड़ी जिस गाँव में ठहरी है वहाँ सोमन्ना नाम का एक युवक जल्दी से जल्दी कुछ और दस्तों का निर्माण करना चाहता है. कोसा और उसके कुछ मित्र सूअर का शिकार करके लाए थे इसलिए शाम का शानदार भोजन तैयार हो गया.

सुबह गाँव की समस्याओं पर सामुहिक विचार विमर्श हुआ. सभी की बातें बहुत ध्यान से सुनी गईं और उनकी समस्याओं के समाधान का रास्ता भी खोजा गया. अब कूच का समय हो चुका था.

उनका सफ़र फिर से प्रारंभ हुआ. उस रात वह कई गाँवों के खेतों से गुज़रे. एक टुकड़ी सूचना लेकर आई थी कि पुलिस का दल थोड़े ही फांसले पर जंगल में से गुज़र रहा है. पुलिस अपनी गश्त पर वापस लौट रही है. जीपों का इस्तेमाल पुलिस ने बंद कर दिया था. कभी-कभी भारी तादाद में एक पुलिस स्टेशन से दूसरे तक मार्च करते हैं.सोमन्ना इस गश्त को भी बंद करवाना चाहता है. इस गश्त ने उनके सूचना तंत्र पर उंगली रख दी है. सतनाम को सोमन्ना अभी तक मिले सभी साथियों में सबसे अधिक गतिशील लगा. उसका कहना था कि उसके स्वभाव में रुक जाना शामिल ही नहीं है. वह बस्तर की नदियों की तरह गतिशील है.

अलविदाई

बस्तर के जंगलों में विचरते हुए सतनाम को दो माह व्यतीत हो चुके थे. अब उनके विदा लेने का समय आ गया था. सतनाम ने पाया कि एक आदिवासी लड़की जो एक पड़ाव पहले से उनके काफिले को अगले पड़ाव तक पहुंचाने के लिए निकली थी, वह वापस नहीं लौटी है. आम परंपरा वापिस लौट जाने की है.

उस नंगे पैरों वाली शांत और गंभीर लड़की से सतनाम ने पहली और आखिरी बार बात की. अपनी किट, पेंसिल और एक कॉपी उसके हवाले कर सभी को सलाम कहा, हाथ मिलाए और जंगल की यादों को समेटे हुए पास के एक कस्बे से रेलगाड़ी द्वारा वापसी के सफर पर चल पड़े.

 

 

बाईस)

सतनाम को यह वृत्तांत लिखे पूरे तेईस साल बीत चुके हैं, लेकिन आज भी बस्तर के आदिवासियों के मूल जीवन में कुछ बाहरी बदलाव के अलावा कोई परिवर्तन नहीं आया है. सतनाम के अतिरिक्त आदिवासी जीवन से गहरे सरोकार रखने वाले और यहीं के क्षेत्र के लिए समर्पित उच्च प्रशासनिक पद पर रहे डॉक्टर ब्रह्मदेव शर्मा, प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक रामशरण जोशी, अरुंधति रॉय की बहुचर्चित किताब ‘वॉकिंग विथ दि कामरेड्स’ के अलावा लोक बाबू और अनेक महत्वपूर्ण लेखकों की किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. कुछ फ़िल्में भी निर्मित हुई हैं.

इनके बीच काम करने वाले अनेक समर्पित कार्यकर्ताओं को मारा जा चुका है. शंकरगुहा नियोगी की नृशंस हत्या शराब माफियाओं द्वारा कर दी गई. डॉक्टर विनायक सेन को लंबे समय तक हिरासत में रहते हुए मानसिक यंत्रणाएं दी गईं. यह एक असमाप्त लंबी श्रृंखला है. सोरा सोनी के साथ हुए बर्बर शारीरिक और मानसिक यंत्रणा के दाग़ अभी तक धूमिल नहीं हुए हैं.

इस दौरान अनेक सरकारें आती-जाती रहीं. सत्ता पक्ष में राजनीतिक पार्टियों की अदला-बदली  होती रही, लेकिन बस्तर के आदिवासियों का शोषण आज भी बेख़ौफ़ जारी है. विदेशी कंपनियों के स्थान पर अदाणी समूह की ताकतवर कंपनियां आ गई हैं. विकास के नाम पर खनिजों का खनन और हज़ारों वृक्षों की कटाई सतत् जारी है. जहाँ ये खदाने हैं वहाँ के जंगल साफ कर दिये गए हैं.‘सलवा जुडूम’ के नाम पर हजारों निर्दोष आदिवासियों के नृशंस हत्याकांडों को अन्जाम दिया गया है. जब तक आदिवासियों के विरुद्ध यह शोषण जारी रहेगा, सतनाम की ‘जंगलनामा’ भी अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेगी.

 

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त की जा सकती है.

अशोक  अग्रवाल के संस्मरण यहाँ पढ़ें.

वरिष्ठ कथाकार अशोक अग्रवाल की सम्पूर्ण  कहानियों का संग्रह ‘आधी सदी का कोरस’ तथा ‘किसी वक्त किसी जगह’ शीर्षक  से यात्रा वृतांत‘ तथा संस्मरणों की पुस्तक  संग साथ’ संभावना प्रकाशन’ हापुड़ से प्रकाशित है.

मोब.-८२६५८७४१८6

Tags: 2026 संस्मरणअशोक अग्रवालजंगलनामा 2026सतनाम
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Comments 10

  1. Batrohi says:
    3 weeks ago

    यह संस्मरण तो बेहद जीवंत और आकर्षक है. धन्यवाद इसके लिए आपको भाई.

    Reply
  2. नरेश गोस्वामी says:
    3 weeks ago

    ‘जंगलनामा’ की यह प्रस्तुति एक बार फिर यह सिद्ध करती है कि किसी भी किताब को अपनी यात्रा में मौजूदा और पिछले समय के द्वंदों, अंतर्विरोधों व निरंतरताओं पर नज़र रखने वाली गहरी आंखों की ज़रूरत पड़ती है।
    शुरू में सतनाम की यह किताब अरूचिकर अनुवाद और अपर्याप्त चर्चा के कारण अलक्षित रह गई थी। अशोक जी की यह प्रस्तुति एक तरह से इस किताब का पुनराविष्कार करती है।
    आदिवासी जीवन के पुनर्निर्माण में गुरिल्लाओं के श्रम; राज्य की एजेंसियों द्वारा स्थानीय समाज के शोषण और अवमूल्यन; स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव तथा आर्थिक चुनौतियों के बीच उत्सव के प्रसंगों के साथ लेखक सतनाम और गोपाल नायडू जैसे व्यक्तित्वों की चर्चा से यह अवलोकन संस्मरण के स्तर पर पहुंच जाता है।

    Reply
  3. राजाराम भादू says:
    3 weeks ago

    अशोक जी ने सतनाम के जंगलनामा का सार तो जीवंत रूप में प्रस्तुत किया ही है, अपने संस्मरण और टिप्पणियों से इसकी महत्ता को स्थापित कर दिया है। इस प्रसंग में अशोक जी द्वारा प्रस्तुत डॉ॰ विनायक, गोपाल गोखले और सतनाम के शब्दचित्र यादगार हैं। अशोक जी तो यह लिखते ही , लेकिन अब जब केन्द्रीय सत्ता बस्तर विद्रोहियों के खात्मे की अंतिम घोषणा करने वाली है, समालोचन का इसे प्रकाशित करना साहसिक है। इसके लिए उन्हें सलाम !

    Reply
  4. जीतेश्वरी says:
    3 weeks ago

    अशोक जी का ‘जंगलनामा’ पर लिखा लेख एक सांस में पढ़ गई। सतनाम ने जिस तरह बस्तर के गुरिल्ला लड़ाकों के जीवन संघर्ष, उनके अधिकार की लड़ाई, बस्तर के जल, जंगल और जमीन को किसी भी कीमत बचाए रखने की हिम्मत सच में आदिवासियों के लिए वरदान जैसा ही है। आज वे न होते तो जो थोड़ी बहुत उन्हें सुविधा हासिल है उससे भी वे वंचित रहते।

    मैं स्वयं छत्तीसगढ़ से हूं। एक बार जब मैं दंतेवाड़ा गई थी तब वहां के हाट बाजार में मैंने देखा था कि किस तरह थोड़े से नमक के लिए अपनी बेशकीमती कन्द मूल देने को वे तैयार हो जाते हैं। आज भी बस्तर के अंदरूनी इलाकों में वहां के रहवासी नमक के लिए कई किलोमीटर की पैदल यात्रा कर अपने आस पास के जगहों पर पहुंचते हैं। उन्हें क्या चाहिए नमक और थोड़ी सी मिर्ची यही उनके जीवन का सबसे जरूरी पदार्थ है।

    अशोक जी की बारीक नजर और गंभीर समझ के चलते ‘जंगलनामा’ जब मैं पढ़ रही थी तब ऐसा लगा जैसे सतनाम की यात्रा उनके अकेली की यात्रा नहीं बल्कि उस यात्रा में बतौर सहयात्री मैं भी शामिल हो गई हूं। एक-एक दिन, और रात जैसे आंखों के सामने चल रहे चलचित्र जैसे दिखाई दे रहे थे। इसके अलावा इसे पढ़ते हुए मुझे अरुंधति राय की किताब ‘ अपार खुशी का घराना ‘ भी याद हो आई जिसमें मासे रेवती नाम की एक पात्र है जिसके साथ भी पुलिस वालों ने जबरदस्ती कर उसे लहूलुहान छोड़ दिया था।

    अशोक जी ने सचमुच अद्भुत लिखा है। साथ ही अपने मित्रों की याद को भी जिस तरह साझा किया है वह मित्रों के प्रति उनके प्रेम और उनकी संवेदना का भी परिचायक है।

    अरुण देव सर ‘ समालोचन ‘ के बरक्स जो काम कर रहे हैं वह इन दिनों हिन्दी साहित्य में दुर्लभ है। इस महत्वपूर्ण आलेख के लिए ‘समालोचन ‘ का आभार। अशोक जी को बहुत बधाई💐

    Reply
  5. Mavi Misha says:
    3 weeks ago

    गुरिल्लाओं की अनकही दास्तान, पढ़ने के बाद कितना कुछ कह जाती है, आदिवासी लोगों पर जुर्म , शोषण करना अब भी जारी है। और उनका हक़ का जो कुछ है वो तो पहले से ही छिना जा चुका। सुन्दर प्रस्तुति

    Reply
  6. प्रकाश चंद्रयान says:
    3 weeks ago

    रोचक, रोमांचक और रीयल

    Reply
  7. सवाई सिंह शेखावत says:
    3 weeks ago

    बस्तर के आदिवासियों के जीवन जीवंत दस्तावेज़ है यह संस्मरण।सतनाम जी ने अपना जीवन दाँव पर लगा कर इस गुरिल्ला क्षेत्र की जोख़िम भरी यात्रा की और उन्हें लिपिबद्ध किया।अशोक जी ने इसे जिस ओज और ऊर्जस्वी भाषा में प्रस्तुत किया है, वह इसके महात्यम को बढ़ा देता है।लेकिन सतनाम जी का दुखद अवसान पाठकों को एक गहरी उदासी में डुबो देता है।

    Reply
  8. स्वप्निल श्रीवास्तव says:
    3 weeks ago

    अशोक भाई अपने जीवन अनुभव को संस्मरण में
    व्यक्त करने का हुनर जानते हैँ. सतनाम की किताब जंगलनामा बहुत पहले पढ़ी थी. अब उसे फिर से पढ़ता हूं.

    Reply
  9. दीप्ति कुशवाह says:
    3 weeks ago

    शुरुआत की तो एक ही साँस में पढ़ती चली गई। प्रारंभ में ही गोपाल नायडू का उल्लेख आते ही स्मृतियाँ खुलने लगीं। नागपुर में बिताए बत्तीस वर्षों के दौरान उनसे कई मुलाकातें रहीं। सेंट्रल जेल रोड , पश्चिम नागपुर पर ही आतेजाते दिखाई दिया करते थे। एक साथ अच्छे कवि और सधे हुए चित्रकार। उनके साढ़ूभाई सी. के. नायडू। प्रखर पत्रकार, पहले इंडियन एक्सप्रेस, मुंबई में , फिर हिंदुस्तान टाइम्स, भोपाल में संपादन किया; संभवतः इन दिनों भोपाल में ही निवास है।

    सतनाम के “जंगलनामा” की चर्चा भी पहले दैनिक भास्कर कार्यालय में आने वाले मेहमानों से और प्रकाश दुबे से सुनती रही हूं। सो वह प्रसंग आते ही पाठ और स्मृति एक-दूसरे में घुलते चले गए।

    इस संस्मरण को पढ़ना जैसे अपने ही जीवन की परतों को फिर से छूना है ,एक आत्मीय, भीतर तक उतर जाने वाला अनुभव। नागपुर मेरा महबूब शहर। Ashok Agarwal जी को प्रणाम।

    Reply
  10. नवल शर्मा . says:
    2 weeks ago

    बस्तर को कैमरे से देखना , किसी यात्री की आंखिन देखी – लिखी को पढ़ते हुए महसूस करना एक पक्ष है और दूसरा पक्ष है बस्तर अपने से बाहर वालों को कैसे देखता – स्वीकारता है या रिजेक्ट कर देता है ……
    आदिवासी समाज और जीवन दर्शन को अभी तक के अध्ययन से उतना ही समझा जा सका है जितना चिकित्सा विज्ञान मानव शरीर को …..

    Reply

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