| के.एन. पणिक्कर की याद में इतिहासकार के सरोकार शुभनीत कौशिक |
आधुनिक भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार के.एन. पणिक्कर (1936-2026) का 9 मार्च 2026 को नब्बे वर्ष की आयु में निधन हो गया. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़ में प्राध्यापक रहे प्रो. पणिक्कर पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे. इतिहास के अनगिनत छात्रों से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों तक ने भी उनकी कृतियों से भारतीय इतिहास के बारे में कितना कुछ जाना और सीखा.
अधिकांश छात्रों की तरह ही के.एन. पणिक्कर के कृतित्व से मेरा पहला परिचय प्रो. बिपन चंद्र, आदित्य मुखर्जी, मृदुला मुखर्जी और सुचेता महाजन द्वारा लिखी गई इतिहास की चर्चित पाठ्यपुस्तक ‘इंडियाज़ स्ट्रगल फ़ॉर इंडिपेंडेस’ से हुआ था. इस पाठ्यपुस्तक में सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास से जुड़े अधिकांश अध्याय प्रो. पणिक्कर ने ही लिखे थे.
सत्तर के दशक के आरम्भ में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक नियुक्त होने से पूर्व उन्होंने साठ के दशक में राजस्थान यूनिवर्सिटी, दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में अध्यापन कार्य किया. वे श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे. साथ ही, वे केरल इतिहास अनुसंधान परिषद के निदेशक और केरल उच्च शिक्षा परिषद के उपाध्यक्ष भी रहे.
राजनीतिक इतिहास से कृषक विद्रोहों तक
के.एन. पणिक्कर ने राजस्थान यूनिवर्सिटी से पी-एच.डी. की, जहाँ इतिहासकार डॉ. वी.पी.एस. रघुवंशी उनके शोध-निर्देशक रहे. उनका शोध-ग्रंथ ‘ब्रिटिश डिप्लोमेसी इन नॉर्थ इंडिया’ शीर्षक से वर्ष 1968 में प्रकाशित हुआ, जिसमें उन्होंने उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में दिल्ली रेज़िडेंसी का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया था. यह पुस्तक उन्होंने अपने शिक्षक वी॰पी॰एस॰ रघुवंशी को ही समर्पित की थी, जिनकी वर्ष 1965 में असमय मृत्यु हो गई थी.
उक्त किताब में के.एन. पणिक्कर ने उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा दिल्ली पर अधिकार किए जाने के बाद उत्तर भारत की विभिन्न देसी रियासतों में तैनात किए गए रेज़िडेंट और राजनीतिक एजेंटों द्वारा हिंदुस्तान में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार और उसके सुदृढ़ीकरण में निभाई गई भूमिका की गहन पड़ताल की थी. उनके अनुसार, ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा रियासतों में तैनात इन कूटनीतिक प्रतिनिधियों ने सरकार की नीतियों के क्रियान्वयन से लेकर देसी रियासतों के बारे में आवश्यक गोपनीय सूचनाएँ जुटाने तक में कंपनी की मदद की. उनके माध्यम से ही कंपनी देसी रियासतों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने में सफल हो सकी और वहाँ अपने राजनीतिक-आर्थिक हितों की रक्षा कर सकी. उनका यह अध्ययन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो उठता है क्योंकि इससे ईस्ट इंडिया कंपनी की निर्णय-संबंधी प्रक्रिया के बारे में अंतर्दृष्टि तो मिलती ही थी. साथ ही, यह अध्ययन उत्तर भारत के तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम को समझने के लिए भी ज़रूरी था.
के.एन. पणिक्कर ने उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में मालाबार में किसान विद्रोहों की परम्परा पर भी एक पुस्तक लिखी, जिसका शीर्षक है: ‘अगेन्स्ट लॉर्ड एंड स्टेट : रिलीजन एंड पीजेंट अपराइज़िंग्स इन मालाबार’. उल्लेखनीय है कि मालाबार में हुए मोपला किसानों के विद्रोह को प्रायः धार्मिक या आर्थिक नजरिए से विश्लेषित किया गया था. अपनी इस किताब में पणिक्कर ने यह दिखाया कि उन्नीसवीं-बीसवीं सदी में मालाबार में हुए इन विद्रोहों को सिर्फ धार्मिक या आर्थिक नजरिए से विश्लेषित करना उसकी ऐतिहासिक जटिलता को सीमित करके देखना होगा. उनके अनुसार विद्रोहियों की गतिविधियों का समूचा पैटर्न यह दर्शाता है कि वह जमींदार वर्ग और उसे संरक्षण प्रदान करने वाले औपनिवेशिक राज्य का विरोध कर रहे थे और इसमें धार्मिक और आर्थिक दोनों कारकों की अंतःक्रिया शामिल थी. धर्म और संस्कृति द्वारा तैयार की गई सामाजिक और विचारधारात्मक ज़मीन ने वह ऐतिहासिक आधार निर्मित किया जिस पर मोपला विद्रोह उठ खड़ा हुआ. धर्म ही मालाबार के हिंदू और मुस्लिम किसानों द्वारा एकसमान सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद अलग-अलग प्रतिक्रिया की वजह बना. मोपला विद्रोहियों के विद्रोह और उनकी गतिविधियों को दिशा देने में उलेमा, क़ाज़ी वर्ग की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण थी. पणिक्कर यह भी रेखांकित करते हैं कि मोपला विद्रोहियों की पूरी वैचारिकी इन्हीं धर्मगुरुओं की मान्यताओं और उनसे जुड़े विश्वासों, अफ़वाहों के इर्द-गिर्द रची गई थी.
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और भारत का सामाजिक इतिहास
भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद द्वारा अनेक खंडों में प्रकाशित की गई संदर्भ-ग्रंथमाला ‘टुवर्ड्स फ़्रीडम’ के वर्ष 1940 पर आधारित खंड का सम्पादन भी प्रो. पणिक्कर ने ही किया था.[1] ग़ौरतलब है कि यह पूरी परियोजना आजादी से ठीक पहले के एक दशक में भारतीय इतिहास के स्रोतों के संकलन पर आधारित थी. इसका उद्देश्य समकालीन स्रोतों के जरिए यह समझना था कि उस दौर में भारतीयों ने राष्ट्रीय आंदोलन को कैसे देखा-समझा और किस तरह उसमें अपनी भागीदारी की.
राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ सामाजिक इतिहास के क्षेत्र में भी उन्होंने अपना योगदान दिया. आधुनिक भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास पर केंद्रित उनकी विचारोत्तेजक किताब है ‘कल्चर, आइडियोलॉजी एंड हेजेमनी’. जिसमें उन्होंने इतिहासलेखन के विभिन्न दृष्टिकोणों और भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के तमाम पहलुओं को तो विश्लेषित किया ही है. उपनिवेशवादी चश्मे से किए गए इतिहासलेखन के संदर्भ में इतिहासकार के.एन. पणिक्कर इसी किताब में लिखते हैं कि ‘अतीत के प्रति जो उपनिवेशवादी लगाव था, वह “जानने” भर तक सीमित नहीं था, बल्कि यह अतीत को नए ढंग से रचने-गढ़ने का उपक्रम भी था.’[2] कहना न होगा कि साहित्य, समाज, संस्कृति के इतिहास को लेकर लिखे गए उनके लेख औपनिवेशिक भारत को उसकी समग्रता में समझने के लिए गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं.
इतिहास, उपन्यास और राजनीति
इतिहास का अध्ययन करते हुए साहित्य को बतौर स्रोत कैसे इस्तेमाल करना चाहिए, इसकी एक बानगी देखनी हो तो के.एन. पणिक्कर की पुस्तक ‘कल्चर, आइडियालॉजी एंड हेजेमनी’ में संकलित वह लेख देखना चाहिए, जो उन्होंने उन्नीसवीं सदी में लिखे गए शुरुआती मलयाली उपन्यासों में से एक ‘इंदुलेखा’ पर लिखा था.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के चार साल बाद वर्ष 1889 में मलयाली साहित्यकार ओ. चंदू मेनन ने ‘इंदुलेखा’ उपन्यास लिखा. चंदू मेनन उत्तरी मालाबार के एक नायर परिवार में जन्मे और अंग्रेजी शिक्षा पाने से पूर्व वे परंपरागत ढंग से संस्कृत की पढ़ाई भी कर चुके थे. 1864 में एक स्थानीय अदालत में क्लर्क के रूप में नियुक्त हुए चंदू मेनन तीन दशक से अधिक समय तक सरकारी नौकरी करते हुए कालीकट से सब-जज के रूप में सेवानिवृत हुए. उनका यह उपन्यास केरल में इस कदर लोकप्रिय हुआ कि 1971 तक आते-आते इस किताब के साठ से अधिक संस्करण प्रकाशित हुए. उनके इस उपन्यास को आम पाठकों के बीच व्यापक लोकप्रियता तो मिली ही, इस आलोचकों द्वारा भी उतना ही सराहा गया.
पणिक्कर बताते हैं कि ‘इंदुलेखा’ के जरिए चंदू मेनन ने मलयाली बौद्धिक वर्ग के बीच एक नया साहित्यिक आस्वाद पैदा करने और उसके जरिए सांस्कृतिक आस्वाद रचने की भी अनूठी कोशिश की. उनका उद्देश्य मलयालम में अंग्रेजी ढंग का एक उपन्यास लिखना था और अंग्रेजी से अनभिज्ञ मलयाली पाठकों में उपन्यास की विधा के प्रति आकर्षण भी पैदा करना था.
उल्लेखनीय है कि एक प्रेम कथा होने के साथ ही ‘इंदुलेखा’ उन्नीसवीं सदी के मालाबार की बदलती हुई सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों को रेखांकित करती है. निरंतरता और बदलाव, परंपरा और आधुनिकता के बीच घटित हो रहे संघर्ष और प्रभुत्व की लड़ाई को भी यह उपन्यास रेखांकित करता है. ‘इंदुलेखा’ जैसी स्त्री पात्र के जरिए जहाँ चंदू मेनन ने नायर समाज में महिलाओं की अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति को रेखांकित किया, वहीं उन्होंने नायर और नंबूदरी समाज के टकरावों और ख़ुद मलयाली समाज के भीतर जड़ जमाई हुई पितृसत्तात्मक धारणाओं और सामाजिक रूढ़ियों को भी इंगित किया.
इसी क्रम में उनका यह उपन्यास ‘क्षेत्र’ को ‘राष्ट्र’ से भी जोड़ता है और राष्ट्रीय चेतना की निर्मिति का प्रतीक बन जाता है. तत्कालीन भारतीय समाज में तर्कवादियों और रूढ़िवादियों, आस्तिक-नास्तिक, यथास्थितिवादी और परिवर्तनकामी विचारधाराओं के बीच जो अंतस्संघर्ष चल रहा था, उस पूरी जटिलता को भी चंदू मेनन इस उपन्यास में बारीकी से शामिल कर लेते हैं. पणिक्कर के अनुसार, चंदू मेनन के लिए धर्म और धार्मिक विश्वास की आलोचना परंपरा का सिरे-से नकार नहीं थी, बल्कि यह उनके लिए परंपरा और आधुनिकता की प्रासंगिकता की पड़ताल और उनकी तुलना का जरूरी हिस्सा थी.
इस उपन्यास के जरिए चंदू मेनन अपने पाठक वर्ग को उन तमाम मुद्दों पर एक सशक्त राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेश भी दे रहे थे, जिनका सामना भारतीय समाज उस समय कर रहा था. इस उपन्यास में बौद्धिक वर्ग के राजनीतिक-सांस्कृतिक अनुभवों को तो दर्शाया ही गया है. साथ ही उनके अंतर्विरोधों, अनिश्चितताओं और संशयों को भी लक्षित किया गया है. पणिक्कर के अनुसार, ये सभी बातें मिलकर ही ‘इंदुलेखा’ को एक क्लासिक कृति बनाती थीं.
चिकित्सा का सामाजिक इतिहास
दक्षिण भारत की देशज चिकित्सा पद्धतियों और उनके पुनरुद्धार से जुड़े इतिहास के बारे में लिखते हुए के.एन. पणिक्कर ने चिकित्सा के सामाजिक इतिहास को भी विश्लेषित किया. उल्लेखनीय है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के आरंभ से ही देशज चिकित्सा पद्धतियों और उनके पुनरुद्धार की दिशा में निरंतर प्रयास हो रहे थे. बंगाल में गंगाधर राय और गंगा प्रसाद सेन, महाराष्ट्र में शंकर शास्त्री पदे, मद्रास में गोपालाचारी, केरल में पी.एस. वैरियर जैसे वैद्य व विशेषज्ञ आयुर्वेद को पुनर्जीवन देने के काम में लगे हुए थे.
औपनिवेशिक केरल में देशज चिकित्सा पद्धति के पुनरुद्धार से जुड़े आंदोलन, जिसका नेतृत्व कोट्टक्कल के पी.एस. वैरियर कर रहे थे, का अध्ययन करते हुए इतिहासकार के.एन. पणिक्कर ने ऐसे आंदोलनों के संदर्भ में तीन महत्त्वपूर्ण बातें रेखांकित की हैं, जो उत्तर भारत के संदर्भ में भी लागू होती हैं :
पहला, ये आंदोलन देशज चिकित्सा पद्धति और देशज ज्ञान के पुनरुद्धार, उसे सुव्यवस्थित करने और उसके प्रसार से जुड़े थे.
दूसरे, वैद्यों/आयुर्वेदिक चिकित्सकों को प्रशिक्षण देने हेतु प्रशिक्षण संस्थाओं के निर्माण पर ज़ोर.
तीसरा, औषधियों के निर्माण और वितरण की प्रक्रिया पर ध्यान देना.[3]
भारतीय इतिहास कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में
वर्ष 2008 में के.एन. पणिक्कर केरल के कन्नूर में भारतीय इतिहासकारों की प्रतिनिधि संस्था भारतीय इतिहास कांग्रेस के 69वें वार्षिक अधिवेशन के अध्यक्ष बने. इससे लगभग तीन दशक पहले वर्ष 1975 में वे भारतीय इतिहास कांग्रेस के आधुनिक इतिहास संभाग की अध्यक्षता कर चुके थे. कन्नूर में दिए गए अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने भारतीय संदर्भ में इतिहासलेखन की चुनौतियों पर विस्तार से अपनी बात रखी.[4] उनका कहना था कि भारतीय संदर्भ में इतिहासलेखन इतिहास की धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक व्याख्याओं के बीच टकराव की जगह तो है ही. इसके साथ ही वह कई अन्य प्रवृत्तियों, विचारधाराओं जैसे उपनिवेशवाद और राष्ट्रवाद, उत्तर-आधुनिकता और मार्क्सवाद के बीच सतत चल रहे संघर्ष को भी दर्शाती है. परस्पर संघर्षरत ये विचारधाराएँ इतिहास के अनुशासन पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती हैं. वे अपने अध्यक्षीय भाषण में इन विचारधाराओं के वैचारिक टकराव की इस प्रक्रिया की गहराई से पड़ताल करते हैं. वे राष्ट्रवाद की अवधारणा, लोकतंत्र के भविष्य और धर्मनिरपेक्षता की नीति जैसे मुद्दों पर इतिहास की बदलती हुई व्याख्याओं को समझने के क्रम में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए इन विचारधाराओं के बीच अनवरत चलने वाले बौद्धिक संघर्ष को भी चिन्हित करते हैं.
राष्ट्र निर्माण में संस्कृति की भूमिका को विश्लेषित करते हुए वे आजादी से पूर्व भारत में हुए संस्कृति और राष्ट्र संबंधी चिंतन पर विचार करते हैं. इस क्रम में वे महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे विचारको से लेकर आनंद कुमारस्वामी और राधाकुमुद मुखर्जी जैसे विद्वानों तक के विचारों को विश्लेषित करते हैं. संस्कृति की परिभाषा करने के क्रम में वे मैथ्यू अर्नाल्ड और नॉर्बर्ट एलियास जैसे विचारकों का हवाला देते हैं, जिन्होंने विभिन्न समाजों के ऐतिहासिक विकासक्रम में संस्कृति की महत्ता को समझाया था.
साम्प्रदायिकता का सवाल
के.एन. पणिक्कर उन प्रमुख भारतीय इतिहासकारों में से रहे, जो देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता और धार्मिक असहिष्णुता को लेकर लगातार मुखर रहे. उन्होंने इतिहास की स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में मनगढ़ंत ढंग से इतिहास प्रस्तुत करने के पीछे काम करने वाली मनोवृत्ति को पहचानकर उसके ख़तरों से लोगों को अवगत कराया. समकालीन मुद्दों पर के.एन. पणिक्कर द्वारा किए गए ऐसे ही सामयिक हस्तक्षेपों की बानगी उनकी पुस्तक ‘हिस्ट्री एज ए साइट ऑफ़ स्ट्रगल’ में मिलती है, जो थ्री एस्सेज़ कलेक्टिव ने छापी है. उनके अनुसार भारतीय इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्याएं हिंदुस्तान के ऐतिहासिक अनुभव और समकालीन यथार्थ को दरकिनार करते हुए यह अनैतिहासिक दावा करती हैं कि हरेक धार्मिक समुदाय की एक ही समरूप संस्कृति होती है और यह भी कि हरेक समुदाय की संस्कृति अलग और एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न होती है. जाहिर है कि इस दावे का ऐतिहासिक सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है किंतु सांप्रदायिक संगठनों और दलों द्वारा ये दावे बार-बार दुहराए जाते हैं.
नब्बे के दशक में जब भारत में सांप्रदायिक राजनीति का तेज़ी से उभार हो रहा था, उस दौर में के.एन. पणिक्कर ने सांप्रदायिक राजनीति और उसके इतिहास को लेकर कई महत्त्वपूर्ण पुस्तकें संपादित की.[5] उनके अनुसार, भारत में सांप्रदायिकता की विचारधारा को इतिहास की मनगढ़ंत व्याख्याओं और पूर्व-निर्धारित निष्कर्षों को पुष्ट करने के लिए तथ्यों के मनमाने चुनाव से बल मिलता रहा है. सांप्रदायिक संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए भारतीय इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या की शुरुआत औपनिवेशिक काल से ही हो चुकी थी. ख़ुद अंग्रेजी राज ने भी सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा देने में अपना लाभ देखा और उन्हें शह दिया. दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद भी सांप्रदायिकता की यह प्रवृत्ति थमने की बजाय और बढ़ती ही रही. सांप्रदायिक आधार पर धार्मिक समुदायों को लामबंद करने के लिए सांप्रदायिक संगठनों और राजनीतिक दलों द्वारा इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्याओं का इस्तेमाल एक शक्तिशाली वैचारिक औज़ार के रूप में किस तरह किया गया, इसे भी पणिक्कर रेखांकित करते हैं. वे यह भी इंगित करते हैं कि समकालीन भारत में सांप्रदायिकता की विचारधारा ने अपने सामाजिक आधार का भी विस्तार किया है और अब वह मध्यवर्ग तक सीमित न रहकर विभिन्न सामाजिक वर्गों और जातियों तक में अपनी पैठ बना चुकी है.
अपने इन वैचारिक हस्तक्षेपों के साथ ही के.एन. पणिक्कर ने ‘सहमत’ जैसे संगठनों के साथ जुड़कर देश में भाईचारा, सहिष्णुता और सौहार्द को बढ़ाने की दिशा में भी लगातार प्रयास किए. उनके यह प्रयास उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक सरोकारों को दर्शाने के साथ ही धर्मनिरपेक्षता और भारत के सांविधानिक मूल्यों में उनके गहरी और अटूट आस्था की भी बानगी देते हैं. उन्हें नमन!
सन्दर्भ
[1] के.एन. पणिक्कर (संपा.), टुवर्ड्स फ़्रीडम : डॉक्युमेंट्स ऑन द मूवमेंट फ़ॉर इंडिपेंडेंस इन इंडिया (नई दिल्ली : ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1995).
[2] के.एन. पणिक्कर, कल्चर, आइडियालॉजी, हेजेमनी : इंटेलेक्चुअल्स एंड सोशल कांशसनेस इन कॉलोनियल इंडिया (नई दिल्ली : तूलिका, 1995), पृ. 108.
[3] वही, पृ. 161.
[4] के.एन. पणिक्कर, “कल्चर एज़ ए साइट ऑफ़ स्ट्रगल”, सोशल साइंटिस्ट, खंड 37, अंक 5/6 (मई-जून 2009), पृ. 21-37.
[5] के.एन. पणिक्कर (संपा.), कम्यूनलिज़्म इन इंडिया : हिस्ट्री, पॉलिटिक्स एंड कल्चर (नई दिल्ली : मनोहर, 1991); साथ ही देखें, के.एन. पणिक्कर (संपा.), द कंशर्न्ड इंडियंस गाइड टु कम्यूनलिज़्म (नई दिल्ली : वाईकिंग पेंग्विन, 1999).
युवा इतिहासकारों में उल्लेखनीय शुभनीत कौशिक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में इतिहास के शिक्षक हैं. जवाहरलाल नेहरू और उनके अवदान पर केंद्रित पुस्तक ‘नेहरू का भारत: राज्य, संस्कृति और राष्ट्र-निर्माण’ (संवाद प्रकाशन, 2024) का सह-सम्पादन किया है. पत्र पत्रिकाओं में हिंदी-अंग्रेजी में लेख आदि प्रकाशित हैं. ईमेल : kaushikshubhneet@gmail.com |




बहुत बढ़िया लिखा है सारगर्भित लेख
स्मृतिशेष के एन पणिक्कर के टिकाऊ योगदान को सार्थक और शानदार तरीके से रेखांकित करने वाला आलेख।
शुभनीत कौशिक को धन्यवाद।
केरल पर अपने शोधकार्य के सिलसिले में मैं पणिक्कर सर से मिला था।
बड़े मितभाषी विद्वान थे। नापतौल कर बोलते थे।
के एन पणिक्कर की रचनाओं, उनकी इतिहास -दृष्टि और सामाजिक सरोकार से परिचित कराने के लिए शुभनीति जी को बहुत बहुत आभार। पणिक्कर साहब का जाना प्रगतिशील इतिहास की भारी क्षति है। उन्हें शत शत नमन।