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Home » कैफ़ी की ‘चाबी’ : ओमा शर्मा

कैफ़ी की ‘चाबी’ : ओमा शर्मा

by arun dev
April 24, 2026
in आलेख
Reading Time: 3 mins read
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कैफ़ी की ‘चाबी’ : ओमा शर्मा
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कैफ़ी की ‘चाबी’
ओमा शर्मा

 

समकालीन राजनीति की तरह हिंदी साहित्य में भी असहमति का स्पेस काफ़ी सिकुड़ चुका है. उसे सही निगाह से कदाचित ही देखा जाता है. उसके मर्म की तह में जाने से पहले ही उसे व्यक्ति की निजी कुंठाओं या उसके अतीत के किन्हीं नाकर्दा गुनाहों के साथ नत्थी कर दिया जाता है. दूसरी तरफ अतिरंजित प्रशंसाओं के समूह सोशल मीडिया पर दिन-रात कार्यरत दिखते हैं. यदि कोई इन अतिवादी प्रशंसाओं के वृंदगान से बचकर अपनी समझ से कोई सच्ची और खरी बात रखना चाहे, तो वह संकोच से घिर जाता है, क्योंकि वहाँ उसे निजी कुंठा के किसी खाने में डाल दिए जाने का डर रहता है. इसलिए अधिकांश लोग ‘एक चुप्पी सौ सुख’ का सहारा लेते हैं. आखिर और भी ग़म हैं ज़माने में! वैसे भी समीक्षा और आलोचना अलग क्षेत्र हैं, जिनसे रचनाकार अमूमन दूरी रखते हैं. लेकिन यह भी है कि कुछ लोग ऐसे हैं जो असहमति रखते हैं और ज़रूरी लगने पर उसे जाहिर भी करते हैं. अभिव्यक्ति की सहज सामान्य भूमिका साहस का कार्य हो उठती है.

इस लेख का संदर्भ ‘समालोचन’ पर प्रकाशित युवा कथाकार कैफ़ी हाशमी की कहानी ‘चाबी’ है, जिस पर पिछले दिनों खूब बढ़-चढ़कर चर्चा हुई. किसी कहानी पर चर्चा होना- खासकर जब कहानीकार युवा हो- मुझे अतिरिक्त खुशी देता है, क्योंकि यह न सिर्फ मेरी प्रिय विधा को पुख़्ता करता है, बल्कि इस नितांत गैर-अदबी माहौल में हिंदी साहित्य के प्रति आश्वस्त भी करता है.

 

 

कहानी

कैफ़ी की यह कहानी अपने समाज के जिस धार्मिक मिथ को लेकर चलती है, वह दिलचस्प है. उसकी बुनियाद में सवाल हैं, जिनके जवाब देने होंगे. कहानी लंबी है, लेकिन भाषा में रवानी है. उसमें लेखक की क्षमताएँ बार-बार जाहिर होती हैं. अपने आस-पास और समय पर उसकी निगाह तथा वातावरण रचने की उसकी क्षमता खूब उभरकर आई है. हालांकि एक वक्त- खासकर अंत में – यह लगता है कि कहानी जिस कथा-तत्व को लेकर चल रही थी, उसके आसपास डंठल कुछ ज़्यादा इकट्ठा हो गया है. मसलन, दो डंठल तो वे दो किस्से ही हैं, जो खासे आरोपित लगते हैं.

सवाल उठता है कि इस कहानी की किस तरह से आज़माइश हो? क्या यह महत्वपूर्ण कहानी है? यदि है तो कैसे? यह हमारे समय, समाज या मनुष्यता के किन प्रश्नों को संबोधित करती है? क्या यह आधुनिकता की आंधी में फँसे मनुष्य के किसी ऐसे आयाम को उकेरती है, जो अभी तक या उस तरह से नहीं उकेरा गया है?

कहा जा सकता है कि यह हमारे समकालीन महानगरीय औद्योगिक वातावरण के भीतर मनुष्य की जिजीविषा के कुछ पक्षों की ओर इंगित करती है, जिसे पर्याप्त लेखकीय कौशल से बुना गया है. एक युवा लेखक में कहानी रचने का ऐसा धैर्य काबिले-तारीफ़ है. लेकिन – और यह ‘लेकिन’ कहानी से कम महत्वपूर्ण नहीं- सवाल है कि इसका ‘मूल’ विषय क्या है? पहली ही पंक्ति जिसे कहानी की प्रस्तावना की तरह पढ़ा जा सकता है, संकेत देती है कि कहानी ‘लोन’, यानी कर्ज़ की गिरफ्त में फँसे एक आदमी की कहानी है.

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी कथा-इतर संदर्भ के रूप में रखे या देखे जाने से पहले कहानी पाठक के लिए चरित्रों, घटनाओं और उनके आपसी मेल का एक आंतरिक पाठ होती है. यानी कोई पात्र या घटना वहाँ जिस तरह से घटित होती है, वह कुतूहल के साथ-साथ निरंतर पाठकीय विवेक की आज़माइश पर चढ़ती है. विवेक से तात्पर्य यहाँ किसी गणितीय या यांत्रिक ‘लॉजिक’ से नहीं है, क्योंकि पात्र किसी भी तरह का रचा जा सकता है. कोई पात्र दीवाना, भयग्रस्त या अन्य असामान्यता लिए हो, तो पाठक उसे उसी रूप में स्वीकार कर लेता है, जबकि वहां ‘लॉजिक’ उस रूप में कार्यरत नहीं होता . इसलिए कहानी पर विचार करते हुए उसके ‘कहानी होने’- यानी वह जिन पात्रों, घटनाओं और संवादों के सहारे अपना रास्ता बनाती है, उसकी लय और कारणता (causation) – को परखना होता है.

कहानी पढ़ते हुए प्रमुखतः जो सूत्र हाथ लगता है, वह यह है कि इसका मुख्य पात्र असद बेतरह ‘डरा हुआ’ है- इसलिए कि वह लोन का डिफॉल्टर हो चुका है. लिए गए ‘लोन्स’ (लेखकीय शब्दावली) की कई देय किस्तें अदा न किए जाने पर रिकवरी एजेंट उसकी तलाश में हैं और किसी भी वक्त उसके घर पर धावा बोल सकते हैं. इस चक्कर में उसने अपना जॉब भी बदला है.

कोई कर्ज़ न चुका पाना बहुत मुमकिन घटना है. देश के इतने सारे किसान मामूली कृषि-लोन नहीं चुका पाते. ‘सवा सेर गेहूँ’ में सूद की गणना मूल लोन पर भारी पड़ गई थी. लेकिन पाठक जानना चाहेगा कि इसने ‘लोन्स’ की राशि का ऐसा क्या किया कि एक को चुकाने के लिए उसे दूसरा लोन लेना पड़ा, दूसरे को चुकाने के लिए तीसरा, और इस तरह वह तमाम ‘लोन्स’ की गुंजलक में फँस गया. एक सिक्योरिटी गार्ड या मज़दूर, जो महीने के बारह-पंद्रह हज़ार रुपए कमाता है, वह भी सस्ते फोन के सहारे दीन-दुनिया से अपना ताल्लुक कायम रख लेता है. तो इन सॉफ़्टवेयर इंजीनियर साहब ने ऐसा क्या किया कि ये लोन नहीं चुका पा रहे हैं? क्या परिवार में किसी को ऐसी गंभीर बीमारी थी, जिसके भारी-भरकम बिल उन्हें अदा करने पड़े? या किसी को किसी महंगे संस्थान या विदेश में शिक्षा दिलानी थी? अथवा किन्हीं निजी या सामाजिक सरोकारों के तहत उधार के रुपयों को कहीं लगाना पड़ा? कहानी में ऐसा कुछ उभरकर नहीं आता. जो पता चलता है, वह यह कि जनाब ‘आईफोन’ और ‘गाड़ी’ रखते हैं और किसी हाई-सोसाइटी में ‘फ्लैट’ ले रखा है, जिसमें वे अकेले रहते हैं.

पूरी कहानी लगभग एक शाम-रात में घटित होती है, जिसमें आप बर्थडे के दिन अकेलापन महसूस करने पर एक ‘ऐप’ से (एक नया लोन लेकर) दो अजनबियों को अकेलापन दूर करने के लिए ‘ऑर्डर’ कर लेते हैं. पिछले दिनों एक फिल्म आई थी- ‘मैटीरियलिस्ट’ – जिसमें पश्चिम में आत्मीय संबंधों के बिखराव को भरने के लिए मध्यस्थता के बाज़ार और उसकी दुनिया को दिखाया गया है. दिनों तक किसी को ताकने, झाँकने और किसी तरह दिल की बात कहने के जो दो लफ़्ज़ डरते-झिझकते परोसे जाते थे, अब उसे आउट-सोर्स कर दिया गया है. अब बाजार यह काम करने लगा है. आप अपनी अपेक्षाएं बताएं. ‘चाबी’ में कथाकार ने दर्शाया है कि यह दौर ऐसा है, जब व्यक्ति अकेलापन दूर करने के लिए भी बाज़ार पर आश्रित हो चला है, और बाज़ार उस कमी को पूरा करने के लिए दूसरी चीज़ों की तरह तैयार और आतुर भी है – धंधे की बात! लेकिन कहानी में पात्र के अकेलेपन की बात खुलकर नहीं आई है. ‘लोन’ का आतंक उसे जकड़े हुए है. ‘ऐप’, यानी भाड़े के ‘दोस्तों’ के साथ भी वह इधर-उधर की करता रह जाता है, क्योंकि उस पर रिकवरी एजेंट का भय छाया हुआ है हालांकि पता नहीं किस शराफ़त के चलते उसने एक शाम के उन दो अजनबियों की खुशी के लिए एक फौरी लोन अपने खाते में उसी समय ले डाला है.

यदि ऐसा है तो दूसरा प्रश्न उभरता है: यदि रिकवरी एजेंट का इतना ही डर है, तो वह लगातार एक के बाद एक कर्ज़ क्यों लेता रहा है? यदि इस पात्र को हम अपनी संवेदनाओं का हिस्सा बनाते हैं- जैसा अधिकांश टिप्पणी-लेखकों ने किया है- तो क्या यह उस लोभ-लालच और उपभोक्तावाद को पोषित करना और सही ठहराना नहीं है, जिसके तहत हम आँख मूँदकर (impulsive तौर पर) बिना अपनी हैसियत देखे कर्ज़ लेते रहते हैं और जब उन्हें चुकाने की बारी आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है? कम-से-कम कहानी की तरफ़ से तो इसका समुचित औचित्य (justification) पाठक को नहीं मिलता. मसलन, पाठक सवाल कर सकता है कि जो व्यक्ति किस्तों में डेढ़ लाख का आईफोन खरीदता है, वह तीस हज़ार में उन्हीं फ़ंक्शनैलिटीज़ वाला ‘विवो’ या दूसरा फोन क्यों नहीं ले सकता था? क्या वह ‘स्टेटस’ का मारा हुआ है, या सामिया हुसैन की फ़रमाइशों का, या कुछ और?

एक और विरोधाभास यह है: जिस पड़ोसी सचिन के साथ फ्लैट की चाबी रखने का अधिकार या सुविधा किरदार को मुहैया है, वह उसके साथ कुछ लम्हे नहीं बिता सकता? ऐसा क्यों – इसका कोई संदर्भ सामने नहीं आता. लेखक ने सीधे दो किराये के ‘दोस्त’ उसके अकेलेपन को भरने के लिए भेज दिए, और इसी से, प्रशंसकों के मुताबिक समकालीन यथार्थ पर उसकी पकड़ पर चार-चाँद लग गए! लेखक भूल गया कि यह ज़माना ‘डिजिटल अरेस्ट’ और बढ़ते हुए अपराधों का भी है. यह विचित्र है कि समकालीन ‘डरों’ को विषय बनाने वाली इस कहानी में पात्र बिना किसी डर या शंका के अपने अकेलेपन को अनजान व्यक्तियों के हवाले कर देता है. उसके जेहन में दूसरे महानगरीय डर जरा नहीं कौंधते.

कहानी के कुछ अन्य मामूली संदर्भ भी पाठकीय कौतूहल को संतुष्ट नहीं करते. मसलन, यह कौन सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, जो ‘ज़ोमैटो-स्विगी’ के दौर में मुस्टंडों को तो ऐप से मँगवाता है, लेकिन मटन लेने के लिए खुद बाज़ार में भटकता है? और किस बहुमंज़िला इमारत में एक ही मंज़िल के आमने-सामने के दो मकान ऐसे होते हैं, जिनकी बालकनियाँ इस तरह जुड़ी हों कि कोई आसानी से एक-दूसरे के घर में घुस जाए? क्या इसी सहूलियत के लिए उसने हाई-सोसाइटी में बसने भारी-भरकम होम-लोन लिया था? कहना यही है कि यदि लेखक अपने समय के यथार्थ की बात कर रहा है, तो इस तरह की चूकें कहानी के तत्वों को पाठक की नज़र में संदिग्ध और कमज़ोर ही करती हैं.

इस लिहाज़ से कहानी उस चरित्र की अति-उपभोक्तावादी वृत्ति और किसी अमूर्त बिखराव को संबोधित है जिसके चलते वह अंधाधुंध कर्ज़ लिए जा रहा है. उसका कोई निजी या सामाजिक सरोकार या औचित्य कम से कम कहानी से निकलता नहीं लगता है, जिसकी बुनियाद पर पाठक उसे किसी सामयिक-चेतना या चिंता से सम्बद्ध करके देख सकें. ऐसे में कहानी उस विमर्श के लिए कैसे महत्वपूर्ण होगी, जिसने आधुनिकता के संदर्भों में- मशीनीकरण और वैश्विक पूँजी-आधिपत्य के चलते- मनुष्य से उसका सामान्य विवेक और बुनियादी नैतिकता छीन डाली है? पात्र का डर और अकेलापन जब कहानी से सुस्पष्ट रूप में रिसकर-उभरकर आता ही नहीं, तो वह किस प्रकार पाठकीय सहानुभूति का हकदार है- भले ही उसे कितनी ही अच्छी भाषा में और धैर्य से रचा गया हो? क्या ही अच्छा होता कि लेखक अपने संकल्पित पात्र के कर्ज़ लेने की ज़रूरत और सॉफ़्टवेयर की दुनिया के जंजाल या समांतर रूप से बुनता, घर-बाहर की दुनिया के टूटते-बनते समीकरणों के बीच उसकी ऊब, उदासी और सामिया हुसैन की उपस्थिति खुलती. तब पाठक लेखक से प्रश्न कम उसकी संगत के लिए अधिक उत्सुक होता. बेशक यह कहानी की आलोचना का इलाका नहीं है; मगर यह आलोचना के प्रश्नों का पार्श्व या प्रतिपक्ष तो है ही.

औद्योगिकी-यांत्रिकी के युग में मनुष्य की बुनियादी वृत्तियाँ-प्रवृत्तियाँ- उसका आचरण, चिंताएँ, उसकी प्रेम-आकांक्षा, उसके जुड़ाव, संघर्ष और अस्तित्व पर पड़ने वाली चोटें – पहले भी रचनात्मक लेखन का हिस्सा बनती रही हैं. चैप्लिन की फ़िल्म ‘मॉडर्न टाइम्स’ सभी को याद होगी. यहाँ मैं जर्मन लेखक हाइनरिक ब्योल की एक कहानी ‘एक्शन विल बी टेकन’ का ज़िक्र करना चाहूँगा, जो अपनी समयगत चिंताओं को कलात्मक ढंग से कथा में विन्यस्त स्थितियों के माध्यम से सृजित करती है. इस कहानी से कहानी-कला-कला एक जरूरी तत्व- कथानक की सघनता- को भी पता चलता है जिसकी ‘चाबी’ में कमी खलती है. कहना होगा कि हम सभी कहानीकार आजीवन इस मोर्चे पर आत्म-युद्ध रहते हैं.

कुछ वरिष्ठ और समकालीन लेखकों की अतिरंजित, वायवीय और कथा-इतर प्रशंसाएं- जो कथा-निसृत न हो- उस लेखक और रचना दोनों के साथ अन्याय ही अधिक करती हैं.

बाकी, जैसा हेलमेट के विज्ञापन की लाइन है – “फ़ैसला आपका, क्योंकि सिर है आपका.”

 

कैफ़ी हाशमी की लम्बी कहानी चाबी यहाँ पढ़ें 

 

ओमा शर्मा
११ जनवरी १९६३ बुलन्दशहर (उ.प्र.)

एम. ए., एम. फिल (अर्थशास्त्र) भविष्यदृष्टा’, ‘कारोबार’ और ‘दुश्मन मेमना’ कहानी संग्रह तथा स्टीफ़न स्वाइग की आत्मकथा और उनकी कहानियों के हिन्दी अनुवाद आदि प्रकाशित. विजय वर्मा, इफको सम्मान, रमाकांत स्मृति कथा सम्मान, स्पंदन कथा सम्मान, शिवकुमार मिश्र स्मृति सम्मान आदि से सम्मानित.

मुंबई में रहते हैं.
omasharma40@gmail.com

Tags: 2026ओमा शर्माकैफ़ी की ‘चाबी’कैफ़ी हाशमीचाबी
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Comments 9

  1. प्रवीण says:
    4 weeks ago

    “यह कौन सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है, जो ‘ज़ोमैटो-स्विगी’ के दौर में मुस्टंडों को तो ऐप से मँगवाता है, लेकिन मटन लेने के लिए खुद बाज़ार में भटकता है?” ओमा शर्मा का यह कथन अपने आप में अनुभवहीनता का प्रमाण है। जो लोग मटन खाने_खिलाने के शौकिन होते हैं वह खुद ही मटन खरीदते हैं। आलोचना को भी अनुभव की दृष्टि चाहिए होती है।

    Reply
  2. फहीम says:
    4 weeks ago

    इस पूरी समीक्षा में अधिकतर हिस्सा किरदार के इतने ज़्यादा लॉन लेने और उसे खर्च करने के पीछे खर्च हुआ है। कई साथियों को इसी एक बात से सबसे ज़्यादा दिक्कत भी हुई है। क्या ऐसे इंसान हमारे आस पास मौजूद नहीं हैं जो अपनी लाइफस्टाइल को केवल बेहतर बनाने के लिए पैसा उधार लेते हैं? और उन्हें समझ में आते नहीं देखा है जब वे इस चक्र में फंस चुके होते हैं? मैंने तो ऐसे कई लोग देखे हैं। बात केवल अनुभव की है। और अगर किरदार के इतने पैसे खर्च करने का ब्यौरा कहानी में नहीं दिया है तो पाठक के लिए किरदार को खुद से समझने का अवसर है। क्या ज़रूरी है कि हरेक बात कहानी में खोल कर बताई जाए। अगर बताई जाएगी तो मेरे हिसाब से पाठक को कमतर समझने की भूल होगी।

    Reply
  3. ललन चतुर्वेदी says:
    4 weeks ago

    विश्वसनीयता मूल तत्व है,उसके बाद अन्य चीजें .
    अंतिम पंक्ति-कहानियाँ ऐसे ही बनती हैं.
    (टंकण भूल-सुधार )

    Reply
  4. Dr. Umesh Charpe says:
    4 weeks ago

    ओमा शर्मा जी की दृष्टि सूक्ष्म हैं, वे “चाबी ” कहानी की जिस बारिकी से पड़ताल करते हैं,उस पर विचार करने की जरूरत है.

    Reply
  5. आदित्य शुक्ला says:
    4 weeks ago

    आपका यह लेख पढ़कर कहीं-कहीं कुछ बातें ठीक जान पड़ती हैं लेकिन समग्रता में कोई ‘काउंटर-रीडिंग’ नहीं प्रस्तुत करतीं. इस समीक्षा का लोन के हिस्से पर केंद्रित होना कहानी के अन्य पक्षों की अनदेखी करना है. वर्तमान के सवालों के साथ ही यह कहानी मिथकों और इतिहास से भी गुत्थमगुत्थ है. वर्तमान के हिस्से में कहानी में बेहतरी की कुछ संभावनाएँ अवश्य हैं – लेकिन अगर लेखक इस कहानी में लोन के सूत्रों को खोलने में लग जाता तो वह अपने मूल मुद्दे से भटक जाता. जैसा कि ऊपर फहीम ने लिखा है इस तरह के लोन आज के समय का सच हैं. हाँ बेशक इसके पीछे सामाजिक-आर्थिक कारण भी हैं जो इस कहानी के कथानक का हिस्सा नहीं हैं. लेखक यह मानकर चल रहा होगा कि ऐसे यथार्थ की जानकारी पाठक को होगी. कहानी के सभी सूत्रों को खोल देना भी नहीं चाहिए – इससे तो कहानी एकदम सपाट हो जाएगी. यह कोई रिपोर्ट तो है नहीं. बीबीसी ने इन लोन ऐप्स पर एक रिपोर्ट की थी, उसे देखा जा सकता है. इन लोन ऐप्स ने बहुत से लोगों का जीवन तबाह किया है – ये अचानक से कोविड के बाद कुकुरमुत्तों की तरह प्ले स्टोर पर दिखाई देने लगे हैं. कोर्ट ने भी नागरिकों को सलाह दिया है कि ऐसे ऐप्स से लोन ना लें. इनके रिकवरी एजेंट वाकई गुंडे होते हैं. मेरी एक पड़ोसी उनसे बचने के लिए हमारे यहाँ आया करती थीं. डेब्ट ट्रैप आज के समय का सच है. यह कहानी डेब्ट ट्रैप की ओर इशारा करती है उस पर विस्तार से बात नहीं करती. तो यह कोई कमी नहीं हुई. आप देखेंगे कि उस घटना के छह साल बाद असद डेब्ट ट्रैप से निकल चुका है लेकिन फिर भी उसे मारपीट झेलनी पड़ती है. कहानी का अंत आज के यथार्थ को वृहत्तर प्रसंग देता है. कुल मिलाकर मेरा मानना है कि कहानी के आख़िरी कुछ हिस्से थोड़े और बेहतर हो सकते हैं. यह भी सच है कि रचनाओं को हमें हाइपरबोल में नहीं देखना चाहिए. फिर भी यह एक बहुत तबीयत से लिखी कहानी है. इस कहानी को पढ़कर आप हिंदी कहानी के भविष्य के प्रति संतुष्ट हो सकते हैं. आज का युवा लेखक अपने समय और उस समय की विसंगतियों पर नज़र बनाये हुए है और उसे एक बेहतर तरीके से पेश करने की दिशा में श्रम कर रहा है.

    Reply
  6. शचीन्द्र श्रीवास्तव says:
    3 weeks ago

    कहानी में mentioned है कि उसने महंगे फ्लैट, गाड़ी, आईफोन आदि के लिए कर्ज लिया है। जबकि उसकी क्षमता नहीं है। इसलिए वह कर्ज के जाल में फंस चुका है। अब banks से छिपता फिरता है। वह उपभोक्तावादी जीवन शैली का शिकार है। मगर न उसमें कोई अफसोस है, न कहानी में इसकी कोई आलोचना। तो यह बेलगाम उपभोक्तावाद को support करने वाली कहानी साबित होती है ।

    Reply
  7. Amita Sheereen says:
    3 weeks ago

    समीक्षा अच्छी है और उचित सवाल उठाती है. सही है, 90 के दशक के बाद बदलती भारत की परिस्थिति में युवा होता युवा वर्ग बहुत छिछला है, और लोन की संस्कृति में जीता है. उसका अकेलापन इस बाजारू व्यवस्था की देन है, पर यहीं मैं कहती हूँ कि लेखक का एक दायित्व होता है कि वह पाठकों को एक दिशा दे. मैंने अपनी टिप्पणी में लिखा भी था कि इस कहानी का एकमात्र चैन है सूरजमुखी का बंद पहने नन्ही बच्ची, जो उसे उसके फौरी कष्ट से निजात भी दिलाती है. लेकिन लेखक का प्रयास अच्छा है, उसके पास खुद कोई दिशा नहीं है शायद, इस लिए वैचारिक प्रतिबद्धता की ज़रूरत होती है शायद

    Reply
  8. अविनाश श्रेष्ठ Avinash Shrestha says:
    3 weeks ago

    कहानीकार उदय प्रकाश महोदय का भारीभरकम दाबा कहानी से पहले रखा जाना ही ‘चाबी’ पढ्ने का कारण बना मेरे लिए । पर उनके दाबे पर ‘चाबी’ पूरी तरह खरी उतरती हो ऐसा नहीं लगा मुझे। कहानी पढते हुये मुझे लग रहा था शायद मेरी पठन में ही कुछ कसर रह गया हो। पर ओमा शर्माजीका यह समालोचना पढने के बाद मुझे लग रहा है मेरी पठन में नहीं समस्या वास्तव में कहानी में है। वरिष्ठ कहानीकार-समालोचक ओमा शर्मा ने जितनी भी खामियाँ ईस कहानी में दर्शायी हैं वह मुझे भी बहूत हद तक सही लगा।

    वि. द्र :
    मैं हिन्दीभाषी नहीं हुँ पर साहित्य पठन से ताल्लुक रखता हूँ। मेरी ईस प्रतिक्रिया लेखन में भाषिक, हिज्जेगत – विशेष लिंग सम्बन्धी अनेक त्रुटियाँ होंगी। कृपया ईसे सहजता से लेंगे–मेरा विनम्र निवेदन आप से।।

    Reply
  9. birendra kumar shrivastava says:
    3 weeks ago

    संजय अलंग की कहानी कटकोना कोरिया और अंबिकापुर अंचल की यह ऐसी कहानी है जिसमें यह चंचल के 50 वर्षों का भूगोल और इतिहास झलकता है। कोयले के उत्खनन से लेकर जंगलों के कटने की चिंता और मशीनीकरण के कारण हसदेव अरण्य और हाथियों के आवागमन के रास्ते का अवरुद्ध होने की चिंता कहानी में उभर कर आई है जो लेखक की संवेदनाओं को प्रतिबिंबित करती है। चिंता का यह स्वर कहानी के माध्यम से वर्तमान में समाज और अंचल के निवासियों का सामूहिक स्वर भी है। मैं समालोचन परिवार एवं संजय अलंग जी को इस कहानी के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहूंगा।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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