कापालिक, बौद्ध और मध्यकाल के चार नाटक
चंद्रभूषण
घर-परिवार, धन-संपत्ति, जात-धरम सब कुछ से मुक्त होकर और भी बड़ी मुक्ति के रास्ते पर चल पड़ा व्यक्ति हजार साल तक भारत में बौद्ध भिक्षु ही हुआ करता था. फिर ईसा की 7वीं सदी से भारत में ऐसे ही कुछ और लोग दिखाई पड़ने लगे. इनका रूप भयंकर था लेकिन समाज में असर इतना ज्यादा था कि बौद्धों में भी एक धारा इनके जैसी ही दिखने लगी.
ये कापालिक थे. एक हाथ में भिक्षापात्र की जगह खोपड़ी, दूसरे में खट्वांग, जो पहले खटिया का गोड़ा हुआ करता था, फिर कुछ वैसी ही सोटे जैसी चीज होने लगा. उनका उदय शैव धर्म के पाशुपत पंथ से हुआ था मगर पाशुपत साधक का ब्राह्मण होना जरूरी था. कापालिक इस शर्त से मुक्त था और वह जात-पात को नहीं मानता था.
भारतीय इतिहास में दो-ढाई सदियाँ ऐसी गुजरी हैं, जब समाज के स्तर पर बौद्ध, शैव और कापालिक सिद्धों के बीच कोई फर्क नहीं समझा जाता था. सिद्ध भी ऐसा फर्क दिखाने के कायल नहीं थे और अपनी साधना पद्धति में उन्होंने स्त्री दैवत्व को, यूं कहें कि शाक्त पंथ को भी समाहित कर लिया था. हालांकि सतह के नीचे इन धाराओं में अंतर था और उस दौर के बड़े रचनाकार इसको अच्छी तरह समझते भी थे. यह दौर बीता तो देश के बाकी धर्म शक्लें बदल कर बचे रह गए मगर बुद्ध का धर्म भारत से अदृश्य हो गया. इसके खंडहर अंग्रेजों ने खोजे, लेकिन 600 साल बाद.
यह विलोप क्यों हुआ, इसे समझने की कोशिश मैंने कई रास्तों से की है और फिलहाल 7वीं से 12वीं सदी के बीच रचे गए साहित्य में सिद्धों-तांत्रिकों के वर्णन को समझने की पगडंडी पकड़े चल रहा हूँ. इस काम के लिए चार लोकप्रिय नाट्य ग्रंथों के नाम एक सांस में गिनाए जा सकते हैं-
7वीं सदी में पल्लव राजा महेंद्रवर्मन का लिखा ‘मत्तविलास प्रहसन’,
8वीं सदी में भवभूति का ‘मालतीमाधव’,
10वीं में राजशेखर का ‘कर्पूरमंजरी’ और
11वीं में कृष्ण मिश्र का ‘प्रबोध चंद्रोदय’.
पाँचवाँ ग्रंथ, 11वीं सदी में सोमदेव विरचित ‘कथासरित्सागर’ 5वीं सदी में गुणाढ्य की पैशाची भाषा की रचना ‘बड्डकहा’ (बृहत्कथा) का संस्कृत पुनर्लेख है, सो इसकी बातें पूरे युग के कोष्ठक जैसी हैं.
अभी इन्हीं में से एक पर बातचीत के बहाने मुद्दे की तह तक जाने का मौका मिला है तो उम्मीद करता हूँ कि अभी की वैचारिक उलझनों पर भी कुछ विचार हो सकेगा. सबसे अच्छी बात यह कि यह ग्रंथ सामान्य हिंदी पाठक की पहुंच में है, कोई भी इसे पढ़ सकता है. कोशिश अनसुलझे सवालों का हल खोजने की है तो मध्यकालीन इतिहास और हिंदी के आदिकाल की पढ़ाई करने वाले मित्रों से खास तवज्जोह चाहता हूँ.
कवि राजशेखर के प्राकृत भाषा में लिखे गए नाटक ‘कर्पूरमंजरी’ का भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा इसी शीर्षक से हिंदी नाट्य रूपांतर ‘गद्यकोश’ साइट पर उपलब्ध है. इसको पढ़ने का अपना मजा है, साथ ही भारतेंदु की कहन में उतरने के लिए भी इसे पढ़ा जाना चाहिए.
मेरी बातचीत यहाँ काफी कुछ भारतेंदु के रूपांतर पर ही टिकी होगी, लेकिन जब-तब मूल प्राकृत में भी मुझे लौटना पड़ेगा. यह भाषा मुझे नहीं आती सो टीकाओं पर और कहीं-कहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर भी निर्भर होना पड़ा है. ईसा की दसवीं सदी के पूर्वार्ध में हुए कन्नौज के राजकवि राजशेखर की पहचान मुख्यतः एक संस्कृत आचार्य की रही है. अधूरे रूप में ही प्राप्त हो सके उनके महाग्रंथ ‘काव्यमीमांसा’ (रचना समय- 880 ई. से 920 ई. के बीच) की भाषा संस्कृत है और इसकी ख्याति कवियों को रचना संबंधी और राजाओं को कवि तथा कविता संबंधी सलाह देने के लिए रही है. लेकिन राजशेखर का खानदान महाराष्ट्री प्राकृत के विख्यात कवियों का था.
उस परंपरा में अपनी जगह सुनिश्चित करने और चारुधान/चहमान (चौहान) कुल की अपनी पत्नी अवंतिसुंदरी को खुश करने के लिए भी नाटक के प्रवेश में बाकायदा उनका नाम लेते हुए, उनका एहसान जताते हुए राजशेखर ने ‘कर्पूरमंजरी’ लिखा था.
माला ‘पहिरने’ का समय
थोड़ा कन्फ्यूजन नाटक की भाषा को लेकर हो सकता है. कुछ विद्वान इसे महाराष्ट्री-प्राकृत तो कुछ शौरसेनी-प्राकृत कहते आए हैं. कारण यह कि इसमें दोनों की विशिष्टताएँ मौजूद हैं. एक संयोग भी इस नाटक से जुड़ा है कि कवि और उसका संरक्षक, दोनों दो-तीन पीढ़ी पहले महाराष्ट्री-प्राकृत के इलाके (मौजूदा गुजरात-महाराष्ट्र) से आए थे, लेकिन दोनों का हाली मुकाम कन्नौज था, जो उनके साझा समय में हिंदी-उर्दू, राजस्थानी और पंजाबी की मूलभाषा शौरसेनी-प्राकृत का गढ़ हुआ करता था. यह भी संभव है कि उनका समय कभी दो अलग भाषाएँ रहीं महाराष्ट्री और शौरसेनी के मिलकर एक हो जाने का हो. खुद राजशेखर ने एक आदर्श राजसभा में जिन चार भाषाओं के कवियों को बिठाने का विधान राजाओं के लिए किया है- आसन के उत्तर में संस्कृत, पूरब में प्राकृत, पश्चिम में अपभ्रंश, और दक्षिण में पैशाची के कवि. उसमें प्राकृत का शौरसेनी-महाराष्ट्री विभाजन नहीं दिखता. (स्रोत- ‘काव्यमीमांसा’)
भारतेंदु के बारे में भी एक बात यहाँ शुरू में ही कह देना जरूरी है कि उन्होंने संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला समेत कई भाषाओं से नाटक उठाकर उनका हिंदी रूपांतर किया है, लेकिन इस तरह का उनका हर रचनात्मक प्रयास मंच पर खेलने के लिए ही होता था. ऐसे में नाटक अपने पूरेपन में हिंदी का हो जाता था, लेकिन हम इसमें अनुवाद की शुद्धता, यानी पाठ के हर हिस्से में अर्थ का सटीक संचरण देखने का प्रयास करें तो निराशा ही हमारे हाथ लगेगी. मंचन से इतर कारणों से किसी को देखना जरूरी लगे तो उसे ‘कर्पूरमंजरी’ का स्वतंत्र अनुवाद देखना चाहिए.
मेरा ध्यान यह नाटक इसलिए खींचता रहा है कि लड़ाइयों से भरे मध्यकाल के अत्यंत जटिल माहौल से उपजी इस रचना में बड़ी विरल किस्म की सरलता है. एक सीधी-सादी कहानी, जिसको भैरवानंद नाम का एक जादूगर टाइप आदमी अकेले दम पर अपने अद्भुत चमत्कारों से नाटकीय बना देता है. अभी सीधे प्लॉट में घुसते हैं. वसंतोत्सव के करीब का माहौल है. राजा-रानी और उनके दो चट्टे-बट्टे (विदूषक और विचक्षणी) आपस में हंसी-ठिठोली कर रहे हैं.
‘राजा- प्यारी, तुम्हें बसंत के आने की बधाई है. देखो, अब पान बहुत नहीं खाया जाता, न सिर में तेल देकर कसके चोटी गूंथी जाती है. वैसे ही चोली भी कस के नहीं बांधी जाती, न केसर का तिलक दिया जा सकता है. उसी से प्रगट है कि बसंत ने अपने बल से सरदी को अब जीत लिया.
रानी- महाराज! आपको भी बधाई है. देखिए, कामी जन चंदन लगाने और फूलों की माला पहिरने लगे. और दोहर पाएँते रक्खी रहती है, तौ भी अब ओढ़ने की नौबत नहीं आती.’
(पहनने की क्रिया गांवों में आज भी ‘पहिरना’ ही बनी हुई है. दोहर यानी कंबल से पतली, फिर भी मोटी ऊनी चादर, और पांयता का मतलब पलंग या चारपाई का पैताना. ‘तौ’ हमारा ‘तो’ ही है, जो कभी-कभी ‘तब’ बन जाता है.)
रचना और हकीकत
राजा का नाम यहाँ चंद्रपाल है, जो कन्नौज को राजधानी बनाकर राज कर रहे किसी गुर्जर-प्रतिहार सम्राट का नाटकीय प्रतिबिंब है. ध्यान रहे, राजशेखर इसी प्रतापी राजवंश के राजकवि थे और इस भूमिका में अपनी सेवाएँ उन्होंने आगे-पीछे आए इस वंश के तीन प्रतिनिधियों को प्रदान की थीं. खैर, कर्पूरमंजरी नाटक में नाटकीयता कम हो या ज्यादा, यथार्थ में एक नाटकीय बात इसके साथ यह जुड़ी है कि प्रतिहार वंश के पिता-पुत्र सम्राटों महेंद्रपाल और महिपाल के बीच ही उनका राजवंश आसमान पर उड़ते-उड़ते अचानक जमीन से आ लगने की ओर बढ़ गया. नाटक अगर महेंद्रपाल के समय में लिखा गया हो फिर तो निश्चिंतता समझ में आती है, लेकिन अगर यह बाद में, यानी भोज द्वितीय या महिपाल के समय में लिखा गया हो तो इसकी सहजता खुद में एक चमत्कार ही कही जाएगी.
कन्नौज पर कब्जे को लेकर कर्नाटक के राष्ट्रकूट वंश, बंगाल के पालवंश और गुजरात-राजस्थान के गुर्जर-प्रतिहार वंश के बीच त्रिकोणीय लड़ाइयाँ 900 ई. तक, यानी ईसा की दसवीं सदी शुरू होने तक लगभग डेढ़ सौ साल चल चुकी थीं. इस नगरी पर अधिकार जमाते ही प्रतिहार वंश इस सर्वनाशी युद्ध का विजेता माना जाने लगा था. उस समय इस वंश का राज पश्चिम में ब्यास नदी (पंजाब) से लेकर पूरब में कलिंग (ओडिशा) तक और उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में चेर देश (केरल) तक फैला हुआ था. लेकिन महेंद्रपाल के बाद सन 910 ई. में कन्नौज की गद्दी भोज द्वितीय के हाथ लगी, जिसका तख्तापलट तीन साल के अंदर ही उसके सौतेले भाई महिपाल ने कर दिया.
फिर महिपाल की सत्ता के तीसरे साल, यानी 916 ई. में राष्ट्रकूट राजा इंद्र तृतीय के हमले में नर्मदा से दक्षिण के सारे इलाके हमेशा के लिए और कुछ समय के लिए तो कन्नौज भी प्रतिहारों के हाथ से निकल गया. बाद में हालात जैसे-तैसे संभले, लेकिन इस लड़ाई में प्रतिहारों का ऐसा हाल देख उनके उत्तरी सामंत एक-एक करके उनकी पकड़ से बाहर जाने लगे. मालवा के परमार, बुंदेलखंड के चंदेल, महाकोशल के कलचुरी, दिल्ली-हरियाणा के तोमर और शाकंभरी (अजमेर) के चौहान. बाद में इन सभी राजवंशों का प्रताप इतना फैला कि गुर्जर-प्रतिहार वंश की हैसियत इनके सामने कुछ भी नहीं रह गई. कवि राजशेखर गिरावट के दौर में भी महिपाल को आर्यावर्त का एकछत्र सम्राट कहते रहे, लेकिन कर्पूरमंजरी जैसा हंसता-खेलता सुखांत नाटक इस उथल-पुथल के बीच तो वे नहीं लिख सकते थे.
आगे बढ़ने से पहले बैतालिक के गायन के रूप में भारतेंदु हरिश्चंद्र के छंद सौष्ठव का आनंद लें-
जै पूरब दिसि कामिनी कंतI
चंपावति नगरी सुख समंत II
खेलत जीत्यौ जिन राढ़ देसI
मोहत अनंग लखि जासु भेस II
क्रीड़ामृग जाको सारदूलI
तन बरन कांति मनु हेमफूल II
सब अंग मनोहर महाराजI
यह सुखद होइ रितुराज साज II
बाकी छंद आसानी से समझ में आ जाएगा, बस ‘राढ़ देस’ के बारे में यहाँ कुछ कहना जरूरी है. बंगाल में उत्तर का हिस्सा ‘गौड़’, दक्षिण का ‘राढ़’, पूरब का ‘वारींद्र’ और समुद्रतटीय इलाका लंबे समय तक ‘समताट’ कहलाता था. गौड़ क्षेत्र को अपना गढ़ बनाकर पूरब दिशा पर राज करने वाला पालवंश त्रिपक्षीय युद्ध के दौरान राष्ट्रकूटों के हाथों एक बार और गुर्जर-प्रतिहार वंश के हाथों तीन बार परास्त हुआ. मगध क्षेत्र इनकी आपसी मारकाट में कभी इधर तो कभी उधर होता रहता था. लेकिन प्रतिहारों ने कभी राढ़ इलाके पर कब्जा करके वहाँ शासन किया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता. गीत में काल्पनिक राजा के जरिये शायद उनकी इस इच्छा को व्यक्त किया गया है और नाटक के हीरो को चंपावती नगरी से राज करने वाला, बाघ से मृग की तरह खेलने वाला पूरब दिशा का स्वामी कहा गया है.
सट्टक और ‘अद्भुत रस’
नाटक में चल रहे बसंतोत्सव वाले हंसी-मजाक, गीत-गौनही के बीच राजद्वार पर हल्ला मचता है और रचना में बात-बात पर अद्भुत रस का प्रवेश करा देने वाले कापालिक तांत्रिक भैरवानंद का प्रवेश होता है. आते ही यह आदमी औघड़ों जैसी अपनी बक-झक और उसमें मौजूद अपनी विकट मांगों से सबको हतप्रभ कर देता है-
‘जंत्र न मंत्र न ज्ञान न ध्यान न जोग न भोग. केवल गुरु का प्रसाद, पीने को मदिरा औ खाने को मांस. सोने को स्त्री मसान का बास. लाख-लाख दासी सब कड़े-कड़े अंग, सेवा में हाजिर रहें पीएँ मद्य भंग. भिच्छा का भोजन औ चमड़े का बिछौना, लंका-पलंका सातो द्वीप नवो खंड गौना. ब्रह्मा विष्णु महेश पीर पैगंबर जोगी जती सती. बीर महाबीर हनूमान रावन महिरावन आकाश पाताल. जहाँ बांधूं तहाँ रहे जो कहूँ सो करे. मेरी भक्ति गुरु की शक्ति. फुरो मंत्र ईश्वरोवाच. दोहाई पशुपतनाथ की दोहाई कामाक्षा की दोहाई गोरखनाथ की.’
ध्यान रहे, यह भारतेंदु हरिश्चंद्र का लिखा हुआ संवाद है, राजशेखर का नहीं. ‘पैगंबर’ शब्द तो छोड़ ही दें, गोरखनाथ का जिक्र भी राजशेखर के डेढ़ सौ साल बाद तक नहीं मिलता. खैर, दरबार में सन्नाटा खिंच जाने पर खोपड़ी और हड्डियों से सजा यह तांत्रिक अपनी उपयोगिता जताने के लिए राजा को एक और अटपट छंद से संबोधित करता है-
सूरज बांधूं चंदर बांधूं बांधूं अगिन पतालI
सेस समुंदर इंदर बांधूं औ बांधूं जमकालI
जच्छ रच्छ देवन की कन्या बल से लाऊं बांधI
राजा इंदर का राज डोलाऊं तो मैं सच्चा साधI
नहीं तो जोगड़ा, और क्याI
राजा को अभी तुरंत समझ में आ जाता है कि यह आदमी अगर शुद्ध बकवास नहीं कर रहा तो अपने काम का हो सकता है. रानी के सामने ही वह विदूषक से कहता है कि कोई सुंदर लड़की याद पड़ रही हो तो बताओ. विदूषक को कभी विदर्भ में दिखाई पड़ी एक सुंदर कन्या याद आती है और उसके यह कहते ही भैरवानंद अगड़म-बगड़म मंत्र बोलकर नहाती हुई हालत में उस लड़की को खींचकर वहाँ हाजिर कर देता है. जैसे-तैसे अपना शरीर छुपाने की कोशिश कर रही लड़की समझ भी नहीं पा रही कि उसके साथ हुआ क्या है. लेकिन राजा उसे देखकर मुग्ध है और कुल-वंश-स्थान बताने पर रानी उसको पहचान लेती है कि वह तो उसकी अपनी मौसेरी बहन कर्पूरमंजरी है.
आगे कोई बड़ा दुख, कोई बड़ी उठापटक नाटक में नहीं है. रानी लड़की को पंद्रह दिन अपने यहाँ रखकर उसका आतिथ्य करना चाहती है और भैरवानंद से कहती है कि इसके बाद अपने योगबल से उसे उसके घर पहुंचा दें. लेकिन सट्टक के दूसरे अंक में ही केवड़े के पत्ते पर कर्पूरमंजरी का महकता हुआ प्रेमपत्र राजा चंद्रपाल के पास पहुंच जाता है-
‘जिमि कपूर के हंस सों हंसी धोखा खाय
तिमि हम तुमसों नेह करि रहे हाय पछिताय.’
राजा कर्पूरमंजरी पर पहली नजर से ही मुग्ध हैं, फिर भी गलकर बताशा होते हुए पूछते हैं कि वसंत के मौसम में केवड़ा कहाँ से आया? पत्र लाने वाली विचक्षणा जवाब देती है कि भैरवानंद जी ने एक लाठी को केवड़े का पेड़ बना दिया, उसी के पत्तों से रानी ने हिंडोलनर्तनी चतुर्थी की पूजा की और दो पत्ते कर्पूरमंजरी को दिए, जिसमें एक उसने मंगला गौरी को चढ़ा दिया और दूसरे पर कस्तूरी के रंग से छंद लिखकर यह पुड़िया बनाकर आपको भेजी है.
नाटक के दूसरे और तीसरे अंक में राजा लंपटों की तरह रानी से छिपाकर कर्पूरमंजरी को ताड़ता रहता है, श्रृंगारिक कविताएँ कहता-सुनता है और अपने अमले का इस्तेमाल करके एक सुरंग के जरिये उससे मिलते रहने की व्यवस्था करता है. तीसरे अंक के अंत में रानी को दोनों पर शक होता है और वह सुरंग के साथ-साथ रनिवास से निकलने के हर रास्ते पर पहरा बिठा देती है. चौथे अंक में भैरवानंद रानी को बताते हैं कि राजा का विवाह अगर चामुंडा की मूर्ति के सामने लाट देश की राजकुमारी घनसारमंजरी से करा दिया जाए तो उनके चक्रवर्ती होने का आगम बनेगा.
इस तरह रानी खुद राजा के एक और विवाह के लिए आगे आती है और कर्पूरमंजरी को विवाह-स्थल से दूर ही रखने का प्रयास करती है लेकिन अंततः घनसारमंजरी की जगह कर्पूरमंजरी को ही बैठी पाती है. इस तरह शादी में रानी की मर्जी शामिल भी है और नहीं भी है. उसे ईर्ष्या की ज्वाला में जलते हुए कहीं नहीं दिखाया गया है. बल्कि इस विवाह से वह प्रसन्न ही है, क्योंकि इससे राजा के लिए चक्रवर्ती बनने का रास्ता साफ होगा. अंत से पहले एक खास चीज, भैरवानंद की चामुंडा-वंदना, जिसमें नाटक का समय दिखता है-
‘कल्पांत महाश्मशान रूपी क्रीड़ा मंदिर में ब्रह्मा की खोपड़ी रूपी कटोरे में राक्षसों का उष्ण रुधिर रूपी मद्यपान करने वाली कराली काली को नमस्कार है.’
अभी के नाटकप्रेमियों को लगेगा कि यह तो कोई नाटक नहीं हुआ. लेकिन चुस्त संवादों के चलते पढ़ने में यह भोंडा नहीं लगता और हल्की-फुल्की कॉमेडी के रूप में शायद मंच से भी लोगों को अच्छा ही लगा होगा. इस मध्यकालीन प्रदर्शन-कला का स्वरूप छोटे प्रहसन का ही है और इसके लिए नाटक के बजाय ‘सट्टक’ शब्द इस्तेमाल होता रहा है. आकार बड़ा न होने के कारण नाटकीयता की स्थितियाँ नहीं बनने पाती. ऐसे में सट्टक की छवि चमत्कारों से पैदा होने वाले ‘अद्भुत रस’ से जुड़ती है. बतौर चरित्र भैरवानंद चाहे जैसा भी हो, इस सट्टक की धुरी स्वभावतः वही है.
सिद्धों की कविता से मिलान
भारतेंदु का नाटक पढ़ते हुए मुझे लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्नीसवीं सदी के हिंदी मंच के मुताबिक बनाने के लिए कहीं उन्होंने ‘कर्पूरमंजरी’ का अतिसरलीकरण तो नहीं कर दिया है. गीतों के रूप में कहीं-कहीं उन्होंने रीतिकालीन कवियों देव और घनानंद का और एकाध जगह अपने समकालीन कवि पद्माकर के छंद भी इस्तेमाल किए हैं. इससे एक बात तो तय है कि रूपांतर में मूल रचना के अधिकाधिक करीब जाने का उनका आग्रह नहीं है.
इस रचना के प्राकृत छंद देखते हुए यह तो लगा कि दरबारों के लिए लिखी गई इन चीजों में वजन ज्यादा है और इनसे तुलना करने पर भारतेंदु के यहाँ ज्यादा नहीं लेकिन तुलना की दृष्टि से देखने पर जहाँ-तहाँ कुछ हल्कापन भी दिखता है. जैसे, नायिका कर्पूरमंजरी का के एक विरह-गीत का एक अंश देखें-
अइ मण! किं धावसि अण्णं
जइ सव्वं पि तुह पिअमए होइ?
पावसजलधाराओ
जं जं वड्ढंति तं तं जले डुब्बइ.
एवमेव पिअविरहो
सुक्खस्स वि मूलमूलं छिण्णइ॥
इस प्राकृत पद का हिंदी रूपांतर कुछ ऐसा बनेगा-
‘ओ मेरे मन, तू कहीं और क्यों भाग रहा है,
जब हर स्थान पहले से ही प्रिय से भरा हुआ है?
वर्षा की जलधाराएँ जैसे-जैसे बढ़ रही हैं
हर बढ़ने वाली चीज वैसे-वैसे डूबती जा रही है.
ठीक उसी तरह मेरे प्रिय का विरह भी
मेरे सारे सुखों को जड़-मूल से काट दे रहा है..’
निरंतरता में इसी मिजाज का एक और प्राकृत छंद देखें-
जइ पिअमिलणं होहिइ
ता सव्वो वि विरहो मिठ्ठो होहिइ.
जइ अंधअरो वि सिहरइ
ता दीवअलोअस्स किं ण मोलं?
दुःखं पि सुहं पइ
पच्छा जइ मिलणरसस्स फलमइ॥
इस छंद का हिंदीकरण कुछ ऐसा बनता है-
प्रिय से मिलन हो जाए
तो विरह भी मीठा हो जाए।
अंधेरे में सिहरन हो रही हो
तो क्या ही मोल दीए की लौ का न दे डालें?
दुख भी सुख हो जाए
जो पीछे मिलन-रस वाला फल मिले।।
इन पदों के बिंब अधिक सघन हैं और हंसी-मजाक वाला नाटक भी इनके असर में दमदार हो जाता है. लेकिन इनका असल आनंद आप तभी ले सकते हैं, जब सिद्धों की कविता से आपका कुछ परिचय हो. ध्यान रहे, दसवीं सदी का पूर्वार्ध कम से कम भारत के पूर्वी हिस्से में सिद्धों के सघन प्रभाव का था. काठमांडू घाटी में आचार्य हरप्रसाद शास्त्री की कोशिशों से बीसवीं सदी के शुरुआती वर्षों में खोजी गई उपासना पुस्तक ‘चर्यापद’ आधुनिक विश्व को नवीं-दसवीं ईसवी सदी की सिद्ध कविता से पहला परिचय कराता है.
‘बौद्ध गान ओ दोहा’ शीर्षक से संपादित इन कविताओं की भाषा अपभ्रंश है जिसे शास्त्री जी ने प्राचीन बांग्ला कहा है.
ऐसे कुछ पद देखें और उनकी लयात्मकता, बिंब विधान और छंदों के ढांचे की तुलना ऊपर के पदों से करें. सरहपा का यह पद लें और ऊपर ‘अइ मण किं धावसि अण्णं’ से तुलना करके देखें. अपने ही मन से बात करने का कितना मिलता-जुलता है. यह राजशेखर द्वारा अपने विभाजित (बौद्ध सिद्धों का निषेध करने वाले) समाज में विभाजन की अनदेखी करते हुए खुद से एक-दो पीढ़ी पहले हुए एक बड़े कवि का प्रभाव ग्रहण करने जैसा ही है, हालांकि सिद्धों की पहचान कवि की नहीं, अपना अनुभव साझा करने वाले गुरु की ही थी.
चित्त मा गह गह भावI
बाहिरि जोअइ अंतरे पाव॥
जो जाणइ सो मुचइ बंधI
अइ मूढ़! किं करसि अंध॥
(ओ मेरे मन, गहरे भाव को पकड़ और जो बाहर है उसे भीतर ही पा ले. जो जान जाता है वह अपने बंधन तोड़ लेता है. अरे मूर्ख, अंधों जैसा यह आचरण क्यों कर रहा है.)
और आगे आ रहा कान्हपा (कृष्णपाद) का यह छंद राजशेखर के अगले पद के विरह वर्णन के समतुल्य है, हालांकि यहाँ विरह का कोई बाहरी कारण नहीं है. वह भी नहीं, जिसे कभी बाद में मीरा ‘सूली ऊपर सेज पिया की’ कहती हैं. यह खुद से बिछड़ने की कोई कहानी है. कोई गहनतर समझ, जो गुरु की सहायता से ही हासिल हो सकती है-
विरहे जले तनु झुराइ I
मणु न जाणइ तत्त सार॥
गुरुवाक्य अमिअ पावइ I
तहि विरह जाइ अपार॥
(विरह के जल में शरीर सूखता जा रहा है. तत्व के बारे में मन कुछ भी नहीं जानता. गुरुवाक्य का अमृत मिले, तभी यह अपार विरह समाप्त हो सकेगा.)
तत्व के बारे में सरहपा की समझ देखें. ‘जो रस के बारे में जानता है वह रस हो जाता है, लेकिन जो रस का लोभ करता है वह रसहीन हो जाता है. मूर्ख रस प्राप्त करके जल जाता है, ज्ञानी इसे पाता है तो खुद में समो लेता है’-
जो रस जाणइ सो रस होइI
जो रस लोहइ सो रस खोइ॥
मूरख रस पावइ डहइI
पंडित रस पावइ सहइ॥
इसके करीब की दो पंक्तियाँ कर्पूरमंजरी के एक विरह गीत में भी आती हैं-
करपूरसमं पि सुअंधं
विरहग्गी जइ पावइ ता डहइ
(विरहाग्नि की सुगंध कपूर जैसी है, लेकिन जो भी इसे हासिल करता है वह जल जाता है.)
राजशेखर के समय में बौद्ध सिद्धों का प्रभाव मगध, बंगाल, नेपाल, ओडिशा और कुछ हद तक असम में ही बचा रह गया था. लेकिन तंत्र का प्रभाव इस समय भी पूरे देश में अपने चरम पर था. गुर्जर-प्रतिहार वंश का इलाका और समय, दोनों बौद्ध स्थलों की बर्बादी के हैं. इस वंश की आस्था शैव धर्म में थी लेकिन वैष्णव धर्म भी उसके प्रभाव क्षेत्र में चैन से फल-फूल रहा था. ‘कर्पूरमंजरी’ नाटक में इंजन जैसी भूमिका निभाने वाला भैरवानंद शैव-शाक्त कापालिक है. पूरे नाटक में उसकी तांत्रिक शक्ति का दबदबा दिखता है, लेकिन उसके प्रति आस्था जैसा यहाँ कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता. अंततः यह पूरा मामला लेनदेन का ही लगता है. हमको कुछ दो, बदले में हमसे कुछ पाओ. ऐसे चरित्र भारत की पूरी मध्यकालीन काव्य परंपरा में नजर आते हैं.
भैरवानंद की परंपरा
ऊपर शुरुआत में ही जिन ग्रंथों का जिक्र हमने किया है, उनमें कथासरित्सागर में तो तांत्रिक और सिद्ध भरे पड़े हैं. कमोबेश ऐसा ही हाल बाणभट्ट के उपन्यास ‘कादंबरी’ का भी है, हालांकि तांत्रिकों से ज्यादा जोर वहाँ ‘विद्याधरों’ का है. कापालिकों, पाशुपतों और सिद्धों को मुक्ति के आग्रही और परम नैतिक व्यक्ति के रूप में देखने का कोई आग्रह दोनों किताबों में नहीं है, लेकिन इन दोनों ग्रंथों के तांत्रिक चरित्र भैरवानंद की तरह राजाओं के यहाँ जाकर ‘मांस-मदिरा और कड़े-कड़े अंगों वाली दासियों’ की मांग भी नहीं करते. इसके उलट, राजा और समाज के अन्य शक्तिशाली लोग उनके डेरों पर जाकर कृपायाचना करते नजर हैं.
बौद्ध भिक्षुओं, कापालिकों और पाशुपत संन्यासियों के बारे में नकारात्मक चर्चा के लिए सबसे पहले जिस ग्रंथ का नाम लिया जाता है, वह है पल्लव राजा महेंद्रवर्मन का ‘मत्तविलास प्रहसन’.
ध्यान रहे, महेंद्रवर्मन कन्नौज नरेश हर्षवर्धन का समकालीन था. चालुक्य पुलकेशिन द्वितीय ने हर्षवर्धन और महेंद्रवर्मन, दोनों को हराया था. मत्तविलास प्रहसन की कहानी छोटी सी है लेकिन संवाद इतने चुटीले हैं कि चमत्कार से डराने वालों का खौफ इसको पढ़कर एक ही बार में चला जाता है. शराब के नशे में बुरी तरह धुत्त सत्यसोम नाम का एक कापालिक कांचीपुरम शहर के एक चौक पर आधे होश वाली अपनी संगिनी देवसोमा के साथ गदर काटे हुए है.
‘कपालभूषणं कृत्वा मद्य-मांस परायणः’-
(खोपड़ी को गहना बनाए हुए, मांस-मदिरा में महारतप्राप्त.)
उसे इतना याद है कि जिस खोपड़ी में भिक्षा मांगकर वह भोजन करता है और शराब पीता है, वह किसी ने चुरा ली है. संयोगवश उसकी भेंट एक बौद्ध भिक्षु नागसेन से हो जाती है, जिसे वह धर लेता है और शोर मचा देता है कि ‘इसी ने मेरा कपाल चुराकर अपने चीवर में छुपा रखा है’. जवाब में भिक्षु अपने श्रेष्ठ आचरण की दुहाई देता है, काफी बहस भी करता है, लेकिन उसका यह यत्न किसी काम नहीं आता. चोरी का इल्जाम उसपर लग चुका है और शहर में ऐसा कोई नहीं है जो उसके श्रेष्ठ चरित्र के दावे पर उसे छुड़ाने चला आए.
थोड़ी देर में एक पाशुपत संन्यासी बभ्रुकल्प उधर से गुजरता है और वह दोनों के ही पंथों को बेकार बताते हुए उनका झगड़ा छुड़ाने का प्रयास करता है. जवाब में बौद्ध भिक्षु अपने मत का बचाव करता है लेकिन कापालिक पाशुपत पर ही बरस पड़ता है कि वह धूर्त है, उसका त्याग-तपस्या सिर्फ ढोंग है, हर तरह का लोभ उसे घेरे हुए है और उसे प्राप्त करने के लिए वह कुछ भी कर सकता है.
दर्शकों के सामने अपने-अपने पंथों की छीछालेदर करा चुकने के बाद तीनों का झगड़ा एक पागल के छुटाए छूटता है. कापालिक का खोया हुआ कपाल पागल के पास पड़ा है. उसको उसने एक कुतिया से छीना है, जिसके लिए खोपड़ी या कोई भी हड्डी चबाना सहज आकर्षण की बात होती है. कपाल लौटाने को लेकर पागल की सौदेबाजी भी दिलचस्प है.
एक कॉमिक कैरेक्टर के रूप में कापालिक सत्यसोम ही भैरवानंद बनकर राजशेखर के सट्टक में सीधे चला आया लगता है. फर्क सिर्फ एक है कि महेंद्रवर्मन के यहाँ राजाओं को अपने पीछे घुमाने वाली क्षमता उसमें नहीं है, जो तीन सौ वर्षों में उसे हासिल हो जाती है. इसका नुकसान उसे यह हुआ है कि जो थोड़ी-बहुत इज्जत राजाओं के यहाँ उसकी रही होगी, वह भी उसने गंवा दी. अगर आप पैसों के लिए काम करते हैं तो पैसे मिलते रहेंगे. अलग से कुछ चाहेंगे तो वह भी मिल जाएगा. लेकिन फिर आस्था वगैरह का दावा आपको छोड़ना पड़ेगा.
महेंद्रवर्मन ने यह नाटक अपने क्षेत्र में गृहत्यागी अध्यात्म को पतनशील और गृहस्थ या ‘स्मार्त’ शैव धर्म को स्वाभाविक सिद्ध करने की नजर से लिखा था, राजशेखर के यहाँ आस्था कोई मुद्दा ही नहीं है.
कापालिकों की हनक, उनका खौफ सबसे ज्यादा दिखाई पड़ता है आठवीं सदी में भवभूति के नाटक मालतीमाधव में, जहाँ कापालिक अघोरघंट से हर कोई डरता है. उसके दावे ही नहीं, उसकी हरकतें भी खतरनाक हैं और उसकी आस्था का स्वरूप ऐसा है कि किसी इंसान की बलि चढ़ा देना उसमें ठीक समझा जाता है. संस्कृत उपन्यासों और नाटकों में ऐसे तांत्रिक पहले भी दिखते रहे हैं और बुद्ध के इर्दगिर्द कहे-सुने जाने वाले किस्सों में अंगुलिमाल का चरित्र भी इससे ज्यादा दूर नहीं है. लेकिन कर्पूरमंजरी का भैरवानंद इस हद तक असामाजिक नहीं है. ऐसी मिसालें उसके लिए अपना जोर बनाए रखने का जरिया भर हो सकती हैं.
इस नाटक का किस्सा संक्षेप में बताना हो तो यह पद्मावती नाम के पूर्व-मध्यकालीन शहर में चलता है, जिसके अवशेष अभी ग्वालियर के पास पदम-पवाया नाम की जगह पर खोजे गए हैं. संभवतः भवभूति की पढ़ाई इसी शहर में हुई थी. किस्सा यह है कि विदर्भ का एक मंत्रीपुत्र माधव पढ़ने के लिए पद्मावती आता है और यहाँ की मंत्रीपुत्री मालती से प्रेम करने लगता है. पद्मावती के राजा ने मालती को अपने एक करीबी नंदन के लिए पसंद कर रखा है. मालती-माधव के प्रेम का विवाह तक पहुंचना लगभग असंभव है लेकिन माधव का मित्र मकरंद, जो नंदन की बहन से प्रेम करता है, इस काम में उनकी बड़ी सहायता करता है.
बड़ी बात यह कि इस नाटक में सारे भाव परिस्थितिजन्य हैं, दर्शकों को प्रसन्न रखने के लिए विदूषक जैसे किसी पात्र की व्यवस्था नहीं है. भयानक और वीभत्स रस भी इसमें आते हैं, जो संस्कृत नाटकों में कभी विरले ही दिखाई पड़ते हैं. एक मोड़ ऐसा आता है जब कापालिक अघोरघंट मालती का अपहरण कर लेता है और श्मशान में चामुंडा की मूर्ति के सामने उसकी बलि देने के बिल्कुल करीब पहुंच जाता है.
यहाँ कामंदकी नाम की बौद्ध भिक्षुणी (सौगत परिव्राजिका) की नाटक में बड़ी सकारात्मक भूमिका बनती है. उसका मध्यमार्ग सर्वस्व-त्याग और परहित के बीच संतुलन साधने में दिखाई पड़ता है. अपनी शिष्या सौदामिनी के प्रयासों से वह न केवल मालती को अघोरघंट के हाथों बलि होने से बचा लेती है, बल्कि बहुत ठंडे दिमाग से राजनीतिक दायरे में दखल देते हुए दोनों प्रेमी युगलों को विवाह की मंजिल तक ले जाती है.
इससे एक बात साफ हो जाती है कि बौद्धों में कान्हपा जैसे खुद को कापालिक घोषित करने वाले महासिद्ध भी हुए हैं, लेकिन कापालिक शब्द का अकेला अर्थ वही नहीं है जो अघोरघंट और बाद में भैरवानंद जैसे चरित्रों में दिखाई पड़ता है.
सृष्टि की शून्यता के रूप में कपाल धारण करना और ब्रह्मा का वध करने वाले भैरव के प्रतिनिधि के रूप में इसे लेकर घूमना एक ही चीज नहीं है. भवभूति इसे अच्छी तरह समझते हैं और अपने चर्चित नाटक में अघोरघंट और कामंदकी को दो छोरों के रूप में चित्रित करते हैं. लेकिन हमारे दौर के कई बड़े विद्वान इसे नहीं समझ पाते और बाद के बौद्धों को उनकी साधना के लिए कठघरे में ला देते हैं.
बौद्धों और जैनों का खलनायकीकरण
इंसानी चरित्रों के रूप में नहीं बल्कि विचारों के रूप में एक बड़ा टकराव 11वीं सदी के उत्तरार्ध में लिखे गए कृष्ण मिश्र के नाटक ‘प्रबोधचंद्रोदय’ में दिखाई पड़ता है. यहाँ गृहत्यागी अध्यात्म और गृहस्थ धर्म का कोई मामला ही नहीं है, लिहाजा कापालिक या कोई बौद्ध चरित्र सीधे निशाने पर नहीं आते. यहाँ त्याग के क्रम में मुक्ति का दावा करने वाली हर विचारधारा को मिथ्या आडंबर की श्रेणी में लाकर उसे महामोह की सेना का अंग बना दिया गया है. प्रबोधचंद्रोदय नाटक का ढांचा विचित्र है और एकबारगी इसकी सफलता पर संदेह होता है. लेकिन हजार साल पुराने नाटक का अबतक बचा रह जाना खुद में इसकी शक्ति का प्रमाण है.
नाटककार कृष्ण मिश्र को बुंदेलखंड के चंदेल शासकों का राजकवि समझा जाता है. नाटक की प्रस्तावना में उन्होंने चंदेलों के मंत्री गोपाल की ही देखरेख में इसे लिखा गया बताया है, लेकिन मंदार नाम के तीर्थ के उल्लेख से इसके लेखन की जगह बिहार लगती है. उस दौर की सत्ताओं का भूगोल समझना बहुत कठिन है लेकिन मगध तक फैली गुर्जर-प्रतिहार वंश की कन्नौज-केंद्रित सत्ता महमूद गजनवी के हमले में तहस-नहस हो जाने के बाद शायद चंदेलों के ही हाथ लगी थी और वे खुद को भारत की नई धुरी की तरह देखने लगे थे.
प्रबोधचंद्रोदय नाटक में इंसानी प्रवृत्तियों को ही नाटक के चरित्रों जैसी शक्ल दे दी गई है. सदियाँ लगाकर खजुराहो जैसा कामकला विशारद शैव-स्थल खड़ा करने वाले चंदेलों के इस दरबारी लेखक की रचना में काम, लोभ, अहंकार जैसे भावों को नकारते हुए, बौद्ध-जैन नास्तिक दर्शनों, साथ में तर्क और संदेह पर टिके हर तरह के सोच-विचार को खारिज करते हुए वेदांत और विष्णुभक्ति की साझा शासक विचारधारा को स्थापित किया गया है. यूं कहें कि भारत से बौद्ध धर्म की विदाई का बौद्धिक खाका इसमें खींच दिया गया है.
नाटक की कथा कुछ इस तरह है कि स्वतंत्र सत्ताएँ कायम कर लेने वाले विवेक और महामोह नाम के दो राजकुमार एक ही राजा की संतान हैं. महामोह बहुत शक्तिशाली है और काम, रति, लोभ, हिंसा, अहंकार आदि अपने सहयोगियों के बल पर वह विवेक को कई बार पराजय और बिखराव की हद तक पहुंचा देता है. लेकिन विवेक को भी मति, करुणा, शांति, श्रद्धा, क्षमा, संतोष और वस्तुविचार आदि सहायकों की सेवाएँ प्राप्त हैं और वेदांत के सहयोग से लंबे संघर्ष के बाद वह ‘उपनिषद कुमारी’ का वरण करने में सफल हो जाता है.
बौद्धों के तर्क-वितर्क, उनका शून्यवाद, वेदों को न मानने की उनकी दृष्टि, साथ ही दूसरी श्रमण धारा जैन धर्म के नास्तिक दर्शन को भी इस नाटक में सिर्फ छद्म तर्कों का आडंबर बताया गया है. और तो और, सवाल खड़ा करने वाली समझ, संदेहवृत्ति को यहाँ कुलटा स्त्री की तरह चित्रित किया गया है. ये सभी यहाँ राजा महामोह के सेनानी हैं और इन्हें हराने में राजा विवेक को विष्णुभक्ति की सहायता प्राप्त होती है.
यह नाटक प्रतीकात्मक है और राजदरबारों से बाहर कोई विशेष लोकप्रियता भी इसे शायद ही हासिल हुई हो, लेकिन इसका यह संदेश स्पष्ट है कि ग्यारहवीं सदी के बीतते वर्षों में राजकाज के सर्वमान्य तरीके की तरह स्थापित हो रही आचार्य शंकर के वेदांत दर्शन और श्रीमद्भागवत की कथाओं से निकली विष्णुभक्ति की वैचारिक मुख्यधारा अपने अलावा आस्था और दृष्टि के बाकी सभी विकल्पों को विशुद्ध खलनायक की तरह चित्रित करती हुई उन्हें खत्म कर देने योग्य मानने लगी थी. ध्यान रहे, महमूद गजनवी की मृत्यु हुए इस समय तक छह या सात दशक बीत चुके थे और मोहम्मद गोरी के भारत पर हमले में अभी पूरी एक सदी बाकी थी.
सबसे बड़ी बात यह कि भारत में बौद्धों के अलग-थलग पड़ने और एक धारा के रूप में क्षीण होते-होते नष्ट हो जाने के लिए इधर के सौ वर्षों में जो वजहें बताई जाती रही हैं, आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर राहुल सांकृत्यायन और रामधारी सिंह दिनकर तक ने जो चार्जशीट उनके खिलाफ खोल रखी है- महायानी आचार्यों का सुख-संपदा वाला मठी जीवन, वज्रयानियों की महामुद्रा वाली पूजा पद्धति, बौद्ध कापालिकों और सिद्धों की पंच मकार पर आधारित साधना, मंत्र-तंत्र में फंस जाने के कारण उन सभी का चारित्रिक पतन आदि- इसका कोई जिक्र ही कृष्ण मिश्र के इस शुद्ध वैचारिक नाटक में नहीं है.
उनके आरोप बौद्धों की डेढ़ हजार साल से चली आ रही वैचारिक प्रस्थापनाओं पर ही केंद्रित हैं- वेदों को न मानना, शून्यवाद, तर्क-वितर्क….
इतने पाठों से गुजर चुकने के बाद मुझे उम्मीद है कि पल्लव राजा महेंद्रवर्मन के समय से लेकर चंदेलवंश के शासनकाल तक, यानी 7वीं सदी से 12वीं सदी ईसवी तक भारत में गृहत्यागी आस्थाओं की बदलती स्थिति का एक खाका पेश करने और शैव कापालिकों तथा बौद्ध साधकों की जनछवि के बीच फर्क स्थापित करने का काम मैं कुछ हद तक कर सका होऊंगा. ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ किताब को लेकर किए गए काम के दौरान मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि इस देश में बुद्ध के धर्म का क्षीण होना उसकी किसी आंतरिक आत्मगति का नहीं, समाज में आए कुछ बड़े आर्थिक बदलावों और राजनीतिक लड़ाइयों का नतीजा था.
पिछले सौ वर्षों में इस धर्म से लगाव रखने वाले बुद्धिजीवी जरा जल्दी में यह मान बैठे कि महायान और वज्रयान की कुछ खामियाँ इसका मुख्य कारण थीं. इन 500 वर्षों की बड़ी रचनाएँ ऐसा कुछ भी नहीं कहतीं.
| चंद्रभूषण (जन्म: 18 मई 1964)
‘तुम्हारा नाम क्या है तिब्बत’ (यात्रा-राजनय-इतिहास) और ‘पच्छूं का घर’ (संस्मरणात्मक उपन्यास) से पहले दो कविता संग्रह ‘इतनी रात गए’ और ‘आता रहूँगा तुम्हारे पास’ प्रकाशित. इक्कीसवीं सदी में विज्ञान का ढांचा निर्धारित करने वाली खोजों पर केंद्रित किताब ‘नई सदी में विज्ञान : भविष्य की खिड़कियाँ’, पर्यावरण चिंताओं को संबोधित किताब ‘कैसे जाएगा धरती का बुखार’, भारत से बौद्ध धर्म की विदाई से जुड़ी ऐतिहासिक जटिलताओं को लेकर ‘भारत से कैसे गया बुद्ध का धर्म’ आदि पुस्तकें प्रकाशित. patrakarcb@gmail.com |





इस लेख का आरंभ एक बड़े ऐतिहासिक निष्कर्ष के साथ होता है कि हजार वर्षों तक “बड़ी मुक्ति” के पथ पर चलने वाला व्यक्ति भारत में बौद्ध भिक्षु रहा और फिर 7वीं सदी से वैसी ही कुछ आकृतियाँ उभरती दिखीं. यह कथन आकर्षक है, पर इसके साथ कोई ठोस काल-सीमा, क्षेत्र-भेद और प्राथमिक स्रोत-आधार प्रस्तुत नहीं किया गया. परिणामस्वरूप आरंभिक फ्रेम एक समरूप भारत-समाज मानकर चलता है और इतिहास की बहु-केन्द्रित वास्तविकता से दूरी बनती जाती है.
कापालिकों के उपकरण-चिह्न, पाशुपत उद्गम और जाति-शर्तों की चर्चा में विवरण रोचक है, पर “पाशुपत साधक का ब्राह्मण होना जरूरी” जैसी बात पर पाठक प्रमाण की मांग करेगा. इसी तरह “दो-ढाई सदियाँ ऐसी गुजरीं जब समाज के स्तर पर बौद्ध, शैव और कापालिक सिद्धों में फर्क समझा ही नहीं जाता था” एक बहुत भारी दावा है. समाज के “स्तर” का संकेत मिलता है, पर समाज कौन सा, किस भूगोल में, किन अभिलेखों, यात्रावृत्तों, न्याय-ग्रंथों या दानपत्रों के सहारे यह निष्कर्ष बनता है, यह स्तर लेख में धुंधला रहता है.
लेख का केंद्रीय उद्देश्य “बुद्ध का धर्म भारत से अदृश्य” होने की प्रक्रिया समझना है, पर प्रमाण-परक ढाँचा बार-बार अनुमान और समांतर कथाओं पर टिकता है. “खंडहर अंग्रेजों ने खोजे” जैसी पंक्ति से एक औपनिवेशिक खोज का बोध बनता है, पर भारतीय परंपराओं, तिब्बती-सिंहली स्रोतों, नेपाल-काश्मीर के ग्रंथ-साक्ष्यों और स्थानीय स्मृति के बीच के संबंधों की छानबीन सीमित रहती है. इससे विलोप की व्याख्या एक रेखीय कथा बनती है, जबकि धार्मिक-सांस्कृतिक परिवर्तन बहु-कारक होते हैं.
‘कर्पूरमंजरी’ को आधार बनाकर सिद्धों-तांत्रिकों की जनछवि का अध्ययन दिलचस्प है, पर पद्धति में जोखिम है. भारतेंदु का रूपांतर मंच-उपयोग से संचालित है, यह स्वयं लेखक मानते हैं, फिर भी लेख का बड़ा हिस्सा उसी पाठ पर टिका रहता है. ऐसे में “पैगंबर”, “गोरखनाथ” जैसे प्रत्ययों को अनुवाद-काल की घुसपैठ बताकर अलग किया गया, पर फिर भी पाठ-विश्लेषण उसी मिश्रित पाठ से तर्क गढ़ता चलता है. यह स्थिति निष्कर्षों को अकादमिक कसौटी पर अस्थिर बनाती है.
राजशेखर, भवभूति, महेंद्रवर्मन और कृष्ण मिश्र के ग्रंथों से रेखाचित्र उभरता है, पर “बौद्धों और जैनों का खलनायकीकरण” जैसी स्थापना के साथ प्रतिपक्ष की ग्रंथ-परंपराओं, दार्शनिक प्रतिवादों और समकालीन इतिहास-लेखन का संतुलित संदर्भ अपेक्षित है. अंत में आर्थिक बदलावों और राजनीतिक लड़ाइयों को निर्णायक मानते हुए “आंतरिक आत्मगति” की बात खारिज की जाती है, पर उसी आर्थिक-राजनीतिक तर्क के ठोस संकेतक, आँकड़े और स्रोत-श्रृंखला सामने नहीं आते. नतीजतन लेख का वैचारिक प्रवाह तेज है, पर निष्कर्षों की प्रमाण-घनता अपेक्षित स्तर तक पहुँचती हुई दिखती नहीं।
दीर्घ कालिक शोध की पूर्वपीठिका तैयार करने के लिए यह लेख महत्वपूर्ण है। लेखक बौद्ध धर्म पर काफी काम कर चुके हैं और इस क्रम को आगे बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। लेखक सूत्र थमा रहे हैं, देखें कौन और कब पकड़ता है। भारत में कोई विश्वविद्यालय छात्र शायद इस श्रम साध्य काम पर समय लगाकर जवानी में भूखा रहना पसंद नहीं करेगा – फिर विषय भी गंभीर है और धर्मकोप राजकोप का खतरा भी है।
महत्वपूर्ण – रोचक शोध लेख ।