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समालोचन

Home » संजय अलंग की नई कहानी कटकोना

संजय अलंग की नई कहानी कटकोना

by arun dev
April 27, 2026
in कथा
Reading Time: 10 mins read
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संजय अलंग की नई कहानी कटकोना
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कटकोना
संजय अलंग

वह मध्य प्रदेश का वह हिस्सा था, जिसे अब छत्तीसगढ़ कहते हैं. पर तब उसे छत्तीसगढ़ कहने की उतनी जल्दी नहीं थी, जितनी जल्दी वहाँ के जंगलों को पार करने की होती थी. वह 1970 के दशक के ठीक बीच का समय था. समय भी जैसे उन दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों में कहीं अटक गया था. सरगुजा जिला इतना बड़ा था कि उसमें कई सूरज एक साथ उगते और डूबते थे, और उसी का एक कोना था- कोरिया.

कोरिया के उस हिस्से में इतने नदी, नाले और पहाड़ थे कि वहाँ पहुंचना, खुद को कहीं खो देने जैसा था. लोग कहते थे कि वह दुर्गम है, पर पेड़ों के लिए वह सुगम था. उसी सुगमता के बीच, पटना के पास एक जगह थी- कटकोना.

कटकोना का नाम ऐसा था जैसे किसी ने सचमुच एक बड़े से जंगल का एक कोना सलीके से काट दिया हो. वह कटा हुआ कोना ही था. वहाँ एक कोयला खदान खुली. खदान खुलने से पहले वहाँ सन्नाटा खुला हुआ था. पहले वहाँ एनसीडीसी (NCDC) के लोग आते थे, फिर वे चले गए और उनकी जगह डब्लूसीएल (WCL) आ गया. बैकुण्ठपुर कोल एरिया की फाइलों में कटकोना एक नाम था, लेकिन असल में वह जमीन के भीतर दबे काले पत्थरों की एक नई खड़खड़ाहट थी.

वहाँ जब खदान की पहली मिट्टी खोदी गई, तो वह सिर्फ मिट्टी नहीं थी; वह एक पुराने समय का बाहर आना था और एक नए समय का भीतर जाना था. जंगल के बीच में खदान का होना ऐसा लगता था, जैसे हरे रंग के बीच में किसी ने स्याही की एक बड़ी बूंद टपका दी हो. वह बूंद धीरे-धीरे फैल रही थी, और उस कटकोना में रहने वाले लोग देख रहे थे कि कैसे जंगल की पगडंडियां अब ट्रकों के पहियों के निशान में बदल रही हैं.

नागपुर में इंटरव्यू हुआ. नागपुर एक बड़ा शहर था, जहाँ सड़कें खत्म होने से पहले दूसरी सड़कें शुरू हो जाती थीं. वहाँ के एक दफ्तर के कमरे में गुलशन कपूर का चयन हुआ. गुलशन कपूर पूरी तरह से शहरी लड़का था. इतना शहरी कि उसे लगता था कि दुनिया ईंटों, सीमेंट और बिजली के खंभों से ही बनी है. उसके जूतों को धूल की आदत नहीं थी, सिर्फ चमकने की आदत थी.

उसे बताया गया कि उसे ‘फोरमैन एग्जीक्यूटिव’ बनना है. यह एक पद था, जिसे सुनकर लगता था कि वह किसी मेज-कुर्सी पर बैठकर फाइलों को देखेगा. पर उसे जाना था- कटकोना.

गुलशन कपूर के मन में ‘कटकोना’ शब्द किसी ऐसी जगह की तरह कौंध रहा था, जो नक्शे पर शायद सबसे आखिरी बिंदु हो. उसके मन में ख्याल आने लगे. ख्याल भी ऐसे थे जो शहर की भीड़भाड़ से निकलकर सीधे घने सन्नाटे में गिर रहे थे. उसने सुना था कि वह इलाका दुर्गम है. दुर्गम यानी जहाँ रास्ता खुद रास्ता ढूँढता है. वहाँ नदी है, नाला है, पहाड़ है और इन सबके बीच एक खदान है.

वह सोचता – क्या खदान में भी शहर जैसी रोशनी होगी? या वहाँ का अंधेरा इतना घना होगा कि टॉर्च की रोशनी भी उसमें रास्ता भूल जाएगी? वह खुद को एक ऐसे जंगल में देख रहा था जहाँ पेड़ों के बीच से धूप कम, और कोयले की गंध ज्यादा आती होगी.

नागपुर की भीड़ और इंटरव्यू की घबराहट को पीछे छोड़कर गुलशन कपूर दुर्ग आया. दुर्ग उसका घर था, जहाँ घर की दीवारें उसे पहचानती थीं. घर पहुँचते ही उसने अपनी माँ को, जिन्हें वह ‘बेजी’ कहता था, अपने चयन की खबर सुनाई. बेजी कहना वैसा ही था जैसे किसी पुरानी और भरोसेमंद ठंडी छाँव को पुकारना. बेजी ने सुना कि बेटा अब बड़ा अफसर, फोरमैन एग्जीक्यूटिव हो गया है. उन्हें खुशी तो हुई, पर यह कटकोना नाम उन्हें किसी अनजानी और दूर की दुनिया जैसा लगा.

गुलशन ने अपना सामान बाँधा. शहर का सामान, जिसमें शहर की गंध थी. फिर वह दुर्ग स्टेशन पहुँचा.

दुर्ग से बिलासपुर की ट्रेन यात्रा, सिर्फ एक सफर नहीं थी; वह एक परिचित दुनिया से अपरिचित दुनिया की ओर सरकना था. 1970 के दशक का वह छत्तीसगढ़ खिड़की के बाहर से गुलशन की आँखों में धीरे-धीरे उतर रहा था. ट्रेन जब चलती, तो पटरी की आवाज़ के साथ बाहर के धान के खेत भी साथ-साथ चलते लगते. बीच-बीच में छोटे-छोटे स्टेशन आते, जहाँ लोग अपनी पोटलियों के साथ इस तरह बैठे होते जैसे वे स्टेशन का ही हिस्सा हों.

खिड़की के बाहर देखते हुए गुलशन को लगा कि छत्तीसगढ़ सिर्फ जमीन नहीं, एक बहुत बड़ा धीरज है. कहीं दुबले-पतले लोग बैलों के साथ खेतों में थे, तो कहीं मीलों तक सिवाय सरई (सखुआ या साल) के पेड़ों के और कुछ नहीं था. बिलासपुर आते-आते आसमान का रंग और गहरा हरा होने लगा था. जंगल अब छिटपुट नहीं थे, वे अब एक दीवार की तरह खड़े होने लगे थे.

गुलशन कपूर, जो एक शहरी लड़का था, खिड़की से आती उस हवा को महसूस कर रहा था जिसमें अब नमी और पत्तों की गंध बढ़ने लगी थी. वह बिलासपुर स्टेशन पर उतरा. यहाँ से उसे और आगे जाना था- उस तरफ, जहाँ से नदियाँ निकलती थीं और जहाँ कोयला जमीन के नीचे अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था. उसके मन में बेजी का चेहरा और कटकोना का धुंधला सा नक्शा, दोनों साथ-साथ चल रहे थे.

बिलासपुर स्टेशन पर गहमागहमी थी, पर वह गहमागहमी भी धीमी थी. गुलशन कपूर ने ’34 अप’ बिलासपुर-इंदौर एक्सप्रेस पकड़ी. ट्रेन क्या थी, लोहे का एक लंबा और थका हुआ डिब्बा थी, जिसे अनूपपुर की ऊँचाइयों तक चढ़ना था. ट्रेन के भीतर की हवा में बीड़ी का धुआँ, भुने हुए चने की महक और मुसाफिरों की मिली-जुली देह की गंध थी. लोग एक-दूसरे से सटकर बैठे थे, जैसे वे सब एक ही बड़े परिवार के हिस्से हों जो बस एक स्टेशन के लिए बिछड़ गए थे.

ट्रेन की लयबद्ध खट-खट के बीच गुलशन की आँखें खिड़की के बाहर अटक गईं, जहाँ शाम का धुंधलका पेड़ों को धुंधला कर रहा था. उस धुंधलके में उसे अचानक विभाजन का वह दौर याद आने लगा, जिसे उसने खुद तो नहीं जिया था, पर जो ‘बेजी’ और पिताजी की बातों में हमेशा जीवित रहता था.

उसे याद आया कि कैसे बेजी बताती थीं कि एक दिन अचानक उनका अपना घर, अपना नहीं रहा था. एक रात में सब कुछ पराया हो गया था. जैसे यह ट्रेन चल रही है, वैसे ही वे लोग भी चले थे – बिना यह जाने कि पटरी कहाँ खत्म होगी. वह मार्मिकता गुलशन के भीतर एक मरोड़ की तरह उठी. उसके पूर्वज भी तो एक देश से निकलकर दूसरे कोने में जा बसे थे. बरबस उसे कटकोना नाम याद आ गया. आज वह भी दुर्ग के शहर छोड़कर एक अनजान जंगल की ओर जा रहा था. विस्थापन शायद उनके खून की नियति थी – कभी सरहद के पार, तो कभी रोजी-रोटी के लिए जंगलों के पार.

सामने बैठे एक बुजुर्ग मुसाफिर ने, जिनके चेहरे की झुर्रियों में छत्तीसगढ़ का पूरा भूगोल सिमटा था, गुलशन को गौर से देखा और पूछा – “बेटा, कहाँ तक जाना है?”

गुलशन ने धीरे से कहा- “अनूपपुर उतरूँगा, फिर कटकोना.”

“ओह, खदान में जा रहे हो? वहाँ सुना है नई खदान खुल रही है.” बुजुर्ग ने एक गहरी साँस ली, “खदान आदमी को निगलती नहीं है बेटा, बस उसे थोड़ा सा बदल देती है. शहर से आए हो, वहाँ की चमक यहाँ के कोयले में ढूँढना मत. यहाँ तो बस काली मिट्टी का भरोसा है.”

गुलशन मुसकुराया, पर उसके मन में बेजी का वह चेहरा घूमता रहा जब वे विभाजन की बातें करते हुए चुप हो जाती थीं. ट्रेन अंधेरे को चीरते हुए अनूपपुर की ओर बढ़ रही थी. बाहर जंगल और घना हो गया था, और भीतर यादें.

अनूपपुर का स्टेशन एक ऐसी जगह थी जहाँ पहुँचकर लगता था कि समय की रफ्तार थोड़ी और धीमी हो गई है. गुलशन कपूर 34 अप से उतरा, तो उसे पता चला कि अनूपपुर-विश्रामपुर पैसेंजर के लिए अभी एक लंबा इंतज़ार बाकी है. यह इंतज़ार ऐसा था, जिसे न जेब की घड़ी से मापा जा सकता था, न मन की घबराहट से.

स्टेशन पर खड़ी एक पुरानी बेंच पर उसने अपना ट्रंक रखा. ट्रंक नया था और बेंच बहुत पुरानी, जैसे दो अलग-अलग समय एक-दूसरे के बगल में बैठे हों. भूख अब ख्याल से निकलकर पेट तक आ गई थी. स्टेशन के पास ही एक छोटा सा ढाबा नुमा होटल था, जहाँ धुएँ और मसाले की गंध ने उसका स्वागत किया.

वहाँ उसने खाना माँगा. पीली दाल, जिसमें हल्दी का रंग चटख था, और ताजी रोटियाँ, जिन पर कोयले की आंच के काले निशान बने थे – जैसे वे रोटियाँ भी इसी कोयला क्षेत्र की पहचान दे रही हों. खाते हुए उसने पास बैठे एक व्यक्ति से पूछा – “यह पैसेंजर ट्रेन कब तक आएगी?”

उस व्यक्ति ने, जिसकी कमीज पर कोयले की महीन धूल जमी थी, बड़े इत्मीनान से कहा- “बाबूजी, पैसेंजर का कोई वक्त नहीं होता, उसका बस एक आना होता है. आ गई तो समझो वक्त हो गया. आप यहाँ नए आए हो?”

गुलशन ने बताया- “कटकोना जाना है, डब्लूसीएल (WCL) में भर्ती हुआ हूँ.”

यह सुनते ही वहाँ बैठे दो-तीन और लोग उसकी ओर देखने लगे. एक ने चाय का गिलास रखते हुए कहा – “साहब हो फिर तो! पर कटकोना में साहब और मज़दूर, दोनों का चेहरा शाम तक एक जैसा ही काला हो जाता है. वहाँ की खदान नई है, अभी तो मिट्टी और पत्थर अपनी जगह छोड़ रहे हैं. डब्लूसीएल वाले अब इसे संभाल रहे हैं, पहले तो सब राम-भरोसे था.”

गुलशन को लगा कि ये लोग खदान को किसी मशीन की तरह नहीं, बल्कि किसी जिद्दी जानवर की तरह देख रहे हैं जिसे वश में करना है. खाना खाकर वह वापस प्लेटफॉर्म पर लौट आया.

उसे अपने पिता की याद आई. वे भी ऐसे ही किसी स्टेशन पर कभी अपना सब कुछ छोड़कर खड़े हुए होंगे. बस फर्क इतना था कि उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ था और जाने का ठिकाना नहीं था. गुलशन के पास जाने के लिए कटकोना तो है.

वह पैसेंजर ट्रेन के इंतज़ार में था, जो उसे उस दुर्गम जंगल के भीतर ले जाने वाली थी जहाँ कोयला ही सच था और बाकी सब सिर्फ परछाइयाँ.

अनूपपुर-विश्रामपुर पैसेंजर आ गई. यह ट्रेन नहीं थी, एक छोटा सा चलता-फिरता कस्बा था. गुलशन कपूर उसमें सवार हुआ. लोहे का भाप इंजन आगे लगा था, जो किसी भारी भरकम जानवर की तरह लंबी और गर्म सांसें छोड़ रहा था.

ट्रेन ने चलना शुरू किया और जल्द ही कोरिया के पहाड़ उसे अपनी गोद में लेने लगे. पहाड़ इतने ऊँचे और पास थे कि लगता था ट्रेन उनके भीतर से नहीं, बल्कि पहाड़ खुद ट्रेन के भीतर से गुजर रहे हैं.

जब ट्रेन दर्रीटोला रुकी, तो वहाँ का दृश्य एक ठहराव जैसा था. भाप इंजन को प्यास लगी थी. ऊपर एक बड़ा सा काला हौज था, जिससे मोटे पाइप के जरिए इंजन में पानी भरा जाने लगा. भाप और पानी के मिलन से सफेद बादलों का एक छोटा सा शहर स्टेशन पर ही बस गया.

गुलशन ने खिड़की से बाहर सिर निकाला. वहाँ खड़ी एक ग्रामीण महिला से, जो सिर पर लकड़ियों का गट्ठर लिए थी, उसने पूछा – “यह पानी भरने में कितनी देर लगेगी?”

महिला ने सहजता से जवाब दिया- “जितनी देर में प्यास बुझ जाए बाबू. इंजन भी तो जीव ही है, इतना पहाड़ चढ़ेगा तो थकेगा ही.”

ट्रेन आगे बढ़ी. अब सामने हसदो नदी थी. नदी का पानी पत्थरों से टकराकर सफेद झाग बना रहा था. हसदो को पार करते समय ट्रेन की आवाज़ बदल गई – एक गूंजने वाली घर्र-घर्र की आवाज़. फिर आया जमदुआरी घाट. यम के नाम के अनुरूप ही यह घाट लग रहा था. यहाँ पहाड़ और घने जंगल इतने करीब आ गए कि पेड़ों की टहनियां डिब्बे की खिड़की को छूने लगीं, जैसे वे गुलशन का स्वागत कर रही हों या उसे वापस जाने को कह रही हों. खिड़की के बाहर हरियाली इतनी सघन थी कि दिन में भी शाम का भ्रम होता था. हसदो अरण्य की जादुई हरियाली में गुलशन डूब गया.

साथ बैठा एक सहयात्री, जो संभवतः बैकुण्ठपुर का ही रहने वाला था, बोला– “साहब, यह जमदुआरी घाट है. यहाँ की हवा में अब कोयले की महक मिलने लगी है. समझो, आप कोरिया की रूह में घुस रहे हो. वह रूह जो अब कोयले की गर्द से काली होने लगी है. पेड़ और जंगल को कोयले के लिए नजर ही लग गई है.”

आखिरकार, बैकुण्ठपुर रोड स्टेशन आया. वह चरचा कालरी से लगा हुआ था. चरचा को कालरी बनने और बसने के बाद यह नया नाम मिला था. पहले उसका नाम गायमाड़ा था. गाय जैसा पहाड़.

ट्रेन रुकते ही एक अजीब सा सन्नाटा था. स्टेशन छोटा था, पर उसके पीछे खड़े ऊँचे साल के वृक्ष उसे भव्य बना रहे थे.

बैकुण्ठपुर रोड स्टेशन पर कुली नहीं था, पर वहाँ सन्नाटा बहुत था. गुलशन कपूर के पास एक भारी ट्रंक था. सूटकेस होता तो शायद वह हाथ से लटक जाता, पर ट्रंक को तो पकड़ा जाता है. वह लोहे का था, स्लेटी रंग का, जिस पर पेंट की एक ठंडी चमक थी. उस ट्रंक के भीतर गुलशन का पूरा शहर बंद था- उसकी इस्त्री की हुई कमीजें, माँ की दी हुई कुछ चीजें और एक नया भविष्य. कुली न होने से ट्रंक और भी भारी लगने लगा, जैसे उसमें सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि दुर्ग की यादें भी भर दी गई हों.

उसने स्टेशन मास्टर से पूछा – “कटकोना यहाँ से कितनी दूर है?”

मास्टर साहब ने चश्मा ठीक करते हुए कहा – “दूर है बाबू, पर यहाँ फासले किलोमीटर से नहीं, रास्तों की ऊबड़-खाबड़ से तय होते हैं. कटकोना तो अभी-अभी खुला है, समझो नया-नया जनम हुआ है उसका.”

गुलशन कपूर ने गहरी सांस ली. हवा में नमी थी और एक अनजानी सी उम्मीद. वह बैकुण्ठपुर रोड पर खड़ा था, पर उसका मन उस कटे हुए कोने की ओर दौड़ रहा था.

उसने खुद ही ट्रंक का एक हैंडल पकड़ा और उसे घसीटते हुए स्टेशन के बाहर लाया. वहाँ एक जीप खड़ी थी. जीप क्या थी, लोहे का एक ऐसा ढांचा थी जिसे देखकर लगता था कि वह सिर्फ अपनी जिद्द की वजह से चल रही है. गुलशन ने बड़ी मुश्किल से अपना ट्रंक जीप के पीछे लादा. ट्रंक जब जीप के लोहे से टकराया, तो एक ऐसी आवाज़ हुई जैसे दो पुराने परिचित आपस में टकराए हों. इसी जीप से वह बैकुण्ठपुर पहुंचा.

बैकुण्ठपुर से वह परिवहन निगम की बस में चढ़ा. बस की छत पर ट्रंक चढ़ा दिया गया. गेज नदी के पुल से गुजरते हुए गुलशन ने खिड़की से बाहर देखा. नदी का पानी पत्थरों से टकराकर सफेद हो रहा था. उसे लगा, ऊपर छत पर रखा उसका ट्रंक भी बस के साथ-साथ नदी की उस हवा को महसूस कर रहा होगा.

पटना पहुँचकर दुनिया और छोटी हो गई. वहाँ से आगे जाने वाली कोई बस नहीं थी. रास्ता था, पर सवारी नहीं. तभी उसे कोयला ढोने वाला एक डम्पर दिखा.

ड्राइवर ने कहा – “बैठ जाओ बाबू, केबिन में जगह है.”

ट्रंक को डम्पर के पीछे, उस डाले पर रख दिया गया जहाँ कोयला लदा होता था. अब वह सलेटी ट्रंक उस विशाल काली मशीन का हिस्सा बन गया था. गुलशन केबिन में ऊँचाई पर बैठा था. सामने अत्यधिक घना जंगल था. पहाड़ इतने ऊँचे थे कि डम्पर का इंजन जब चढ़ाई चढ़ता, तो उसकी गूँज पूरे जंगल में फ़ैल जाती. पेड़ों की टहनियां केबिन के कांच को छू-छूकर निकल जातीं.

गुलशन को लगा कि इस घने जंगल में वह और उसका ट्रंक दो अजनबी हैं. ट्रंक के भीतर की चीजें चुप थीं, और केबिन के भीतर गुलशन. उसे याद आया कि बेजी ने ट्रंक की चाबी को एक काले धागे में बांधकर उसके गले में लटकाया था. वह धागा अब उसे सीने पर महसूस हो रहा था. वह कटा हुआ कोना यानी कटकोना अब बस आने ही वाला था, जहाँ इस लोहे के ट्रंक को खुलना था और एक नए जीवन को बाहर आना था.

डम्पर रुका, तो लगा कि दुनिया का शोर अचानक खत्म हो गया है. चालक ने कहा –  “साहब, कटकोना आ गया.”

गुलशन कपूर नीचे उतरा. वहाँ सिवाय कटी हुई पहाड़ियों और उखड़ी हुई मिट्टी के कुछ न था. डम्पर के पीछे से उसका लोहे का स्लेटी ट्रंक नीचे उतार दिया गया. जब ट्रंक जमीन पर रखा गया, तो उसकी आवाज़ उस सन्नाटे में बहुत दूर तक गई. यह 1974 का समय था. समय इतना धीमा था कि लगता था वह रुक गया है, पर खदान की खुदाई उसे जबरन आगे धकेल रही थी.

वहाँ क्वार्टर के नाम पर कच्ची ईंटों और टीन की छत वाला एक कमरा था. ट्रंक को वहाँ तक ले जाना एक युद्ध जैसा था. पगडंडी नाम की कोई चीज़ नहीं थी, बस पत्थर थे और झाड़ियाँ. वह भारी ट्रंक गुलशन के शहरी हाथों को काट रहा था. वह उसे घसीटता, तो लोहे की पत्थर से रगड़ खाने की आवाज़ आती.

तभी झाड़ियों के पीछे से एक अधेड़ व्यक्ति निकला. उसके शरीर का रंग मिट्टी जैसा था और आँखें ऐसी, जैसे उन्होंने सदियों से इस जंगल को देखा हो. उसका नाम था भुक्खल. भुक्खल ने बिना कुछ कहे ट्रंक का एक कोना पकड़ लिया. गुलशन के हाथ का बोझ अचानक आधा हो गया.

“साहब, यहाँ अकेले नहीं चलते,” भुक्खल ने अपनी देहाती बोली में कहा.

गुलशन ने हाँफते हुए पूछा, “यहाँ चाय कहाँ मिलेगी?”

भुक्खल हँसा. उसकी हँसी में हसदो आरण्य की हरियाली थी.

“बाबूजी, यहाँ अभी आदमी ही नहीं पहुँचे, चाय कहाँ से आएगी? यहाँ पानी है, जो हसदो, रेण जैसी नदियों से आता है, और धुआँ है जो इंजन से निकलता है. चाय पीनी है, तो शाम तक का इंतज़ार करो, जब कोई मजदूर अपनी पोटली खोलेगा.”

1974 का वह कटकोना दरअसल एक घाव जैसा था, जिसे पहाड़ के सीने पर कुरेदा जा रहा था. हसदो आरण्य का वह हिस्सा इतना घना था कि सूरज की रोशनी जमीन तक पहुँचने के लिए तरसती थी. भुक्खल ने बताया कि रात को यहाँ आदमी बाहर नहीं निकलता. यहाँ भालू घूमते हैं, जो महुए की गंध पर आते हैं, और साँप इतने कि वे कभी-कभी ट्रंक के नीचे ही सोए मिलते हैं.

गुलशन ने अपने क्वार्टर की टीन वाली छत को देखा. दूर पहाड़ को काटा जा रहा था. वह नई खदान की खुदाई थी. मिट्टी के ढेर लग रहे थे और पेड़ गिर रहे थे. उसे लगा कि वह किसी ऐसी जगह आ गया है जहाँ जीवन को रोज सुबह फिर से शुरू करना पड़ता है. वहाँ न कोई शहर की आवाज़ थी, न कोई दुकान. बस भुक्खल   था, जंगल था और पहाड़ की खुदाई से उठता हुआ वह धूल भरा सन्नाटा.

गुलशन ने ट्रंक खोला. उसके भीतर की साफ़ कमीजें इस धूल भरे माहौल में बड़ी पराई सी लग रही थीं. उसे समझ आया कि कटकोना में फोरमैन होना सिवाय एक पद के, असल में एक कठिन अकेलेपन की शुरुआत थी.

अगली सुबह जब गुलशन कपूर जगा, तो उसे अहसास हुआ कि नींद और थकान के बीच जंगल की हवा ने उसका स्पर्श किया है. आज उसकी जॉइनिंग थी. वह दफ्तर पहुँचा, जो ईंटों का एक ऐसा कमरा था जिसे देखकर लगता था कि वह बस अभी-अभी खड़ा हुआ है. वहाँ उसे जुगड़ू माइन का प्रभार दिया गया.

जुगड़ू माइन—यह कोई नाम नहीं था, बल्कि जमीन के भीतर छिपे तीन सीमों (Coal Seams) का एक रहस्य था.

उसे समझाया गया कि यहाँ कोयले की तीन परतें हैं, जो एक-दूसरे के ऊपर-नीचे इस तरह बिछी हैं जैसे किसी ने बहुत पुरानी किताबें एक के ऊपर एक रख दी हों. उसे विशेष रूप से ‘3 नंबर माइन’ का पूरा चार्ज सौंपा गया. 3 नंबर माइन यानी वह गहराई, जहाँ सूरज की आखिरी किरण तो क्या हवा भी जाने से डरती थी.

गुलशन को खदान के गियर पहनाए गए. यह एक अलग तरह का श्रृंगार था. पहले उसने भारी गम बूट्स पहने, जो पैरों को जमीन की नमी और नुकीले पत्थरों से बचाने के लिए थे. फिर सिर पर एक कड़ा हेलमेट रखा गया, जिसके सामने एक छोटी सी कैप-लैंप लगी थी. उस लैंप की बैटरी को कमर के बेल्ट से बांधा गया. जब उसने लाइट जलाई, तो अँधेरे कमरे में एक सीधी लकीर सी खिंच गई. अब वह शहरी गुलशन नहीं, बल्कि खदान का एक हिस्सा लग रहा था.

वह खदान के मुहाने पर पहुँचा. यह जमीन के भीतर जाने वाला एक ऐसा रास्ता था, जहाँ हवा भी भारी होकर ठहर जाती थी. खदान के भीतर कदम रखते ही तापमान बदल गया. बाहर गर्मी थी, पर अंदर एक अजीब सी ठंडी और गीली गंध थी- मिट्टी और कोयले की मिली-जुली गंध.

अंडरग्राउंड माइन का संसार बिल्कुल अलग था. ऊपर पहाड़ का वजन था और नीचे गुलशन का छोटा सा वजूद. चारों तरफ भारी-भरकम खंभे (Props) लगे थे, जो छत को संभाले हुए थे, जैसे वे आसमान को गिरने से रोक रहे हों. कहीं-कहीं से पानी की बूंदें टपक रही थीं – टप-टप. यह खदान की अपनी धड़कन थी.

गुलशन ने देखा कि वहाँ मज़दूर और मशीनें एक लय में थे. पिक-कुल्हाड़ी के चलने की आवाज़ और टबों के खड़खड़ाने का शोर. उसने पहली बार फेस को देखा, जहाँ कोयला काटा जा रहा था. वहाँ धूल का एक बारीक गुबार था, जो कैप-लैंप की रोशनी में नाचता हुआ दिखाई देता था.

मज़दूर उसे गौर से देख रहे थे. एक मज़दूर ने अपनी कुदाल रोककर कहा – “साहब, यहाँ पहाड़ बहुत जिद्दी है, पर कोयला नरम है. आप बस इस छत पर नज़र रखना, यह कभी-कभी बातें करती है.”

गुलशन को समझ आया कि मशीनों और मज़दूरों के बीच तालमेल बिठाना सिर्फ ऑर्डर देना नहीं है, बल्कि उस अँधेरे में सबके साथ एक ही हवा में सांस लेना है. वह उस 3 नंबर माइन के गहरे सन्नाटे और शोर के बीच खड़ा था.

यह उसका पहला दिन था, जहाँ उसने सीखा कि धरती के नीचे समय घड़ी से नहीं, बल्कि कोयले के टबों के भरने से तय होता है.

pinterest से आभार सहित

दिन बीता नहीं, बल्कि शरीर पर से होकर गुजरा. तीन शिफ्टों का रोटेशन ऐसा था कि सूरज कब उगा और चाँद कब ढला, इसका पता घड़ी से नहीं बल्कि ड्यूटी के बदलती आवाज़ों से चलता था. गुलशन कपूर की कमर ने जवाब दे दिया था. उसे लगता था कि उसकी कमर कोई हड्डी का ढांचा नहीं, बल्कि कोयले की एक दरकती हुई सीम है जिसे सीधा खड़ा रखना अब उसके बस में नहीं. नींद आँखों के कोनों में बालू की तरह किरकिराती रहती, पर पूरी कभी न होती.

उस दिन 3 नंबर माइन के भीतर हवा कुछ ज्यादा ही भारी थी. गुलशन ‘फेस’ के करीब खड़ा था, जहाँ ड्रिलिंग हो रही थी. अचानक, एक अजीब सी चट-चट की आवाज़ हुई. यह आवाज़ मशीनों की नहीं थी. यह पहाड़ के भीतर से आने वाली एक बारीक चीख थी.

मज़दूर अपनी धुन में थे, पर गुलशन के कान खड़े हो गए. उसने अपने कैप-लैंप की रोशनी ऊपर छत पर डाली. वहाँ लगे लकड़ी के प्रॉप (खंभे) थोड़े तिरछे हो रहे थे. रूफ फॉल का वह पहला संकेत था – पहाड़ अपना वजन नीचे की खाली जगह पर डाल रहा था.

“सब बाहर निकलो. अभी!”- गुलशन की आवाज़ उस गहरी सुरंग में गूँजी. उसकी आवाज़ में वह नरमी नहीं थी, बल्कि एक कमांडर की सख्ती थी. मज़दूर झिझके, पर गुलशन ने चिल्लाकर उन्हें पीछे धकेला. जैसे ही आखिरी मज़दूर सुरक्षित गैलरी में पहुँचा, एक भयानक गर्जना हुई- ‘धड़ाम!’

जहाँ अभी मज़दूर खड़े थे, वहाँ टन भर मलबा और बड़े-बड़े पत्थर गिर चुके थे. धूल का ऐसा गुबार उठा कि कैप-लैंप की रोशनी भी अंधी हो गई. सन्नाटा छा गया. मज़दूरों ने गुलशन को देखा. उनकी आँखों में मौत को छूकर लौटने की चमक थी.

एक मज़दूर ने कांपते हाथों से गुलशन का कंधा छुआ- “साहब, आज आपने हमें पहाड़ का निवाला बनने से बचा लिया.”

शाम को जब वह वापस अपने क्वार्टर लौटा, तो शरीर की थकान अब डर और जिम्मेदारी के अहसास में बदल चुकी थी. रात घनी हो गई थी. हसदो आरण्य का वह सन्नाटा अब बोलने लगा था. क्वार्टर की टीन की छत पर गिरे सूखे पत्तों की आवाज़ भी किसी भालू के चलने जैसी लगती थी.

बाहर जंगल में किसी जंगली जानवर की लंबी कूं कूं गूँजी. कभी झाड़ियों के टूटने की आवाज़ आती, तो कभी दूर कहीं लकड़बग्घे के हंसने जैसी ध्वनि. अंधेरा इतना ठोस था कि हाथ बढ़ाओ तो लगे कि उसे छुआ जा सकता है. उस अकेले कमरे में, एक छोटी सी ढिबरी की रोशनी में, गुलशन अपनी कमर पकड़कर बैठ गया.

वहाँ न कोई बात करने वाला था, न कोई सुनने वाला. बस एक लोहे का ट्रंक था और उसकी खामोशी. उसने सोचा, दुर्ग की सड़कों पर टहलने वाला वह लड़का आज इस दुर्गम कोने में पहाड़ से लड़कर आया है.

उसने अपनी आँखें मूँद लीं, पर कान अब भी बाहर जंगल की सरसराहट और भीतर पहाड़ की उस चटचटाने को सुन रहे थे.

क्या यह चटचटाना केवल पहाड़ के अंदर था?

 

 

 

2)

बेजी को चिट्ठी लिखनी थी, पर चिट्ठी लिखने के लिए सिवाय मन के पास और कहीं कागज़ नहीं था. कटकोना में अभी डाकघर नहीं पहुँचा था, वहाँ सिर्फ कोयला पहुँचने के रास्ते बने थे. गुलशन ने अपने उस स्लेटी ट्रंक को खंगाला. उसके सबसे नीचे एक पुराना हिसाब का रजिस्टर मिला, जिसका एक पन्ना आधा कोरा था. उसने उसे सलीके से फाड़ा – जैसे कोई बहुत कीमती कपड़ा फाड़ रहा हो.

कलम की स्याही कम थी, तो उसने उसमें दो बूंद पानी डाला. उसने लिखा – “बेजी, यहाँ पहाड़ बहुत ऊँचे हैं और सन्नाटा बहुत गहरा. मैं ठीक हूँ.”

उसने यह नहीं लिखा कि पहाड़ गिरते भी हैं और कमर टूटती भी है. उसने यह भी नहीं लिखा कि यहाँ रात को भालू पहरा देते हैं. चिट्ठी को भेजने का कोई डिब्बा नहीं था, तो उसने उसे उस डम्पर ड्राइवर को दिया जो पटना जा रहा था.

“इसे डाकखाने में डाल देना भाई”- गुलशन ने कहा. ड्राइवर ने चिट्ठी ऐसे ली जैसे वह कोई सरकारी दस्तावेज़ हो.

अगले दिन जब वह खदान पहुँचा, तो हवा बदली हुई थी. 3 नंबर माइन के मुहाने पर खड़ी भीड़ उसे देखकर चुप हो गई, फिर एक धीमी बुदबुदाहट शुरू हुई. कल की उस चट-चट वाली आवाज़ और गुलशन की फुर्ती ने उसे रातों-रात ‘साहब’ से ‘रक्षक’ बना दिया था. मज़दूरों के लिए वह अब रायपुर का कोई पढ़ा-लिखा लड़का नहीं था, बल्कि वह आदमी था जिसने पहाड़ की भाषा समझ ली थी.

दोपहर में उसे उसकी पहली सैलरी मिली. नोटों की खुमारी नहीं थी, बल्कि वे पसीने और कोयले की गंध से बसे हुए कुछ कागज़ थे. उस पहली तनख्वाह को हाथ में लेकर गुलशन को लगा कि उसने सिवाय पैसे के, इस जंगल का थोड़ा सा हिस्सा भी खरीद लिया है.

शाम को वह मज़दूरों की बस्ती की तरफ निकल गया. वहाँ महुए के पेड़ के नीचे आग जल रही थी. मज़दूरों ने उसे देखा तो बैठने के लिए एक फटी हुई बोरी बिछा दी. एक मज़दूर ने अपनी सूखी रोटी का टुकड़ा तोड़कर उसकी ओर बढ़ाया.

“साहब, यह खदान का नमक है, चख लीजिए.” – सोम साय ने कहा.

गुलशन ने वह रोटी ली. वह सख्त थी, पर उसमें उस मिट्टी का स्वाद था जिससे वह रोज लड़ता था. वहाँ बैठकर उसने सुना कि सुक्खू की बेटी बीमार है और चेतराम का घर पिछले साल हाथी ने तोड़ दिया था. उसे अहसास हुआ कि इन लोगों का दुख पहाड़ से भी भारी है, पर वे उसे कोयले की तरह चुपचाप ढोते हैं.

स्थानीय समुदाय के साथ वह जुड़ने लगा था. जंगल अब उसे डराता नहीं था, बल्कि एक पुराने दोस्त की तरह घेर लेता था. उसे समझ आया कि कटकोना में रहने के लिए सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि एक बड़ा दिल चाहिए था, जिसमें पहाड़, मज़दूर और बेजी की यादें – सब एक साथ समा सकें. वह रात जब वह लौटा, तो उसकी कमर का दर्द कम नहीं था, पर मन में एक अजीब सी संतुष्टि थी. वह अब कटकोना का हो चुका था.

मज़दूरों के बीच ‘चामठ पहाड़’ की एक पुरानी और रहस्यमयी कथा चलती थी.

सुक्खू ने एक शाम आग के पास बैठकर बताया – “साहब, वह जो सामने चामठ दिख रहा है न, उसके पेट में इतनी दौलत भरी है कि अगर उसे खोद लिया जाए, तो पूरे हिंदुस्तान का दो महीने का खर्चा अकेले वह पहाड़ उठा सकता है.”

तभी बच्चू ने आगे बताया – “कहते हैं वहाँ हीरा है, और सोने की ऐसी चमक है जो आँखों को अंधा कर दे. पर चामठ सिर्फ देता नहीं, वह छीनता भी है. जो भी उस घनघोर जंगल के भीतर गया, वह कभी लौटकर नहीं आया. लोग कहते हैं वे गुम हो जाते हैं या पहाड़ उन्हें अपना हिस्सा बना लेता है.”

चामठ पहाड़ कटकोना की खदान के ठीक सामने खड़ा था, पर वह खदान जैसा नहीं था. खदान वह थी जिसे इंसान ने खोदकर कुरेद दिया था, पर चामठ वह था जिसे छूने की हिम्मत अभी किसी ने नहीं की थी. मज़दूरों के बीच चामठ का नाम किसी देवता या किसी पुराने जादू की तरह लिया जाता था.

गुलशन कपूर, जो शहर की तार्किक पढ़ाई पढ़कर आया था, चामठ को देखता तो उसे वह सिर्फ एक सघन वनस्पति और पत्थरों का ढेर लगता. पर सुक्खू की आँखों में एक अजीब सा खौफ था. उसने बताया कि चामठ के भीतर जाना आसान है, पर लौटना असंभव. वहाँ का जंगल इतना घनघोर है कि पेड़ एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खड़े हैं, सूरज की रोशनी वहाँ पैर रखने से डरती है. जो गया, वह या तो रास्ता भूलकर खुद पहाड़ बन गया या चामठ ने उसे अपने भीतर ही कहीं समा लिया.

गुलशन ने सुना था कि 1970 के उन सालों में कई सर्वे दल वहाँ गए, पर चामठ ने अपनी दौलत का राज नहीं खोला.

बादल जब चामठ के माथे पर बैठते, तो वह दृश्य बड़ा मनोहर लगता. सफेद रुई जैसे बादल और गहरा हरा पहाड़. पर उस मनोहरता के पीछे एक चेतावनी थी. मज़दूर कहते थे कि पहाड़ तभी अच्छा लगता है जब उसे दूर से देखा जाए. पास जाने पर वह अपनी खामोशी से आदमी को डराने लगता है.

कभी-कभी रात को जब खदान की मशीनें शांत होतीं, तो चामठ की ओर से एक भारी सन्नाटा बहकर आता था.

गुलशन को लगता कि वह पहाड़ उसे देख रहा है. गुलशन भी उस धुंध भरे पहाड़ को देखता, तो उसे लगता कि वह पहाड़ उसे बुला रहा हो.

वह सोचता – क्या सचमुच उस मिट्टी के नीचे इतना कुछ दबा है जो पूरे देश का पेट भर सके? पर फिर उसे याद आता कि जिस खदान में वह काम कर रहा है, वहाँ कोयला निकालने में ही पसीने और खून की गंध बस जाती है, तो उस चामठ के हीरे निकालने की कीमत क्या होगी?

बरसात आई, तो कटकोना का जंगल और भी घना और गहरा हो गया. बादलों ने पहाड़ों को इस तरह घेर लिया जैसे वे उन्हें छिपाना चाहते हों. जब बादल छंटते, तो पहाड़ धुले हुए और इतने साफ़ दिखते कि लगता उन्हें छूने के लिए बस हाथ बढ़ाने की देर है. पर उस सुंदरता के पीछे एक डरावनी गूँज थी.

असल चुनौती तो 3 नंबर माइन में थी. बरसात का पानी खदान के भीतर रिसने लगा था. ‘टप-टप’ की आवाज़ अब झर-झर में बदल गई थी. कीचड़ इतना कि गम-बूट भी उसमें धँस जाते. कोयला अब गीला और भारी था, और हवा में ऐसी सीलन थी जो फेफड़ों में जम जाती थी. डम्परों के पहिये कीचड़ में फंस जाते, और हसदो नदी का जलस्तर बढ़ने से रास्ता कटने का डर बना रहता.

उसी बारिश के बीच, एक दिन डम्पर ड्राइवर ने उसे एक लिफाफा थमाया. वह बेजी की चिट्ठी थी. कागज़ थोड़ा सीला हुआ था, और स्याही कहीं-कहीं फैल गई थी, जैसे बेजी के शब्द रो पड़े हों.

बेजी ने लिखा था – “बेटा गुलशन, तेरी चिट्ठी मिली. तूने लिखा कि तू ठीक है, पर माँ का मन जानता है कि तू कहाँ है. सुना है वहाँ बहुत बड़े जंगल हैं. तू अपना ख्याल रखना. रात को अकेले बाहर मत निकलना. तेरे पिता कहते हैं कि तू अब बड़ा अफसर है, पर मेरे लिए तू वही छोटा लड़का है जिसके ट्रंक की चाबी आज भी मेरे पास की एक दुआ में बंधी है. जल्दी घर आना.”

उस चिट्ठी को पढ़कर गुलशन का गला भर आया. बाहर घनघोर बारिश हो रही थी और चामठ पहाड़ बादलों में छिप गया था. उसे लगा कि वह अपनी बेजी से मीलों दूर, एक ऐसे ‘कटे हुए कोने’ में खड़ा है जहाँ हीरा मिले न मिले, पर इंसान अपनी जड़ों को ज़रूर याद करता है.

उस रात उसे नींद नहीं आई. उसने अपनी खिड़की से बाहर देखा—बादल थोड़े छंटे थे और चाँद की हल्की रोशनी में चामठ पहाड़ एक सोए हुए दैत्य की तरह लग रहा था. उसे लगा कि असली दौलत उस पहाड़ के भीतर का हीरा नहीं, बल्कि बेजी की वह चिट्ठी है जो उसे इस दुर्गम जंगल में भी अकेला महसूस नहीं होने दे रही थी.

वक्त के साथ कटकोना का नक्शा बदलने लगा. 1974 की वह ठहरी हुई धूल अब मशीनों के शोर में उड़ने लगी थी. अब कोयला सिर्फ कुदालों से नहीं टूटता था, बल्कि मशीनों के लोहे के दांत उसे पहाड़ के सीने से खुरच देते थे. उत्पादन बढ़ने लगा. जहाँ पहले सन्नाटा था, वहाँ अब ट्रकों की कतारें थीं.

एक दिन पाथारखेड़ा से स्क्रैपर (Scraper) आए. वे मशीनें नहीं थीं, लोहे के विशाल और भूखे जबड़े थे, जिन्हें खास तौर पर मिट्टी और पत्थर की परतों को छीलने के लिए बुलाया गया था. पाथारखेड़ा की खदानों से चलकर जब ये स्क्रैपर कटकोना की धूल भरी सड़कों पर उतरे, तो मज़दूर उन्हें इस तरह देख रहे थे जैसे कोई परग्रही जीव आ गया हो.

गुलशन कपूर के कंधों पर अब एक नई जिम्मेदारी थी- इस ‘स्क्रैपर टेक्नोलॉजी’ को खदान के उस हिस्से में उतारना, जहाँ अब तक सिर्फ गैंती और कुदालों की हुकूमत थी. स्क्रैपर का काम था पहाड़ की ऊपरी सतह को परत-दर-परत खुरच देना. जब उसका भारी ब्लेड जमीन में धंसता और इंजन दहाड़ता, तो चामठ पहाड़ की कंदराओं तक उसकी गूँज जाती. मिट्टी ऐसे उखड़ती जैसे किसी पुराने घाव की पपड़ी उतारी जा रही हो.

उत्पादन में अचानक एक उछाल आया. जहाँ पहले टोकरियों और छोटे टबों में कोयला सिमटता था, अब वहाँ स्क्रैपर के विशाल पेट में पहाड़ का हिस्सा समा रहा था.

एक दोपहर, जब स्क्रैपर अपनी पूरी ताकत से पहाड़ को छील रहा था, गुलशन पास ही खड़ा था. उसने देखा कि तकनीक ने समय को कितना छोटा कर दिया है. जो काम सौ मज़दूर एक महीने में करते, यह मशीन उसे चंद घंटों में कर डालती. पर इस रफ़्तार के बीच एक बेचैनी भी थी.

सुक्खू ने पास आकर धीरे से कहा – “साहब, यह मशीन तो पहाड़ की खाल उतार रही है. इतनी जल्दी तो कुदरत भी नया पत्ता नहीं निकालती, जितनी जल्दी यह मिट्टी निकाल रही है.”

गुलशन खामोश रहा. उसे ‘3 नंबर माइन’ के टार्गेट पूरे करने थे. डब्लूसीएल (WCL) के दफ्तर से आने वाली फाइलें अब आंकड़ों की मांग कर रही थीं.

स्क्रैपर के आने से कटकोना की खदान का पेट बड़ा हो गया था. अब वहाँ सन्नाटा नहीं, बल्कि मशीनी लोहे की एक निरंतर घिर्र-घिर्र थी.

मिट्टी के ऊँचे-ऊँचे टीले बनने लगे- जिन्हें ओवरबर्डन कहा जाता था. ये टीले असली पहाड़ों से भी ऊँचे होने लगे थे, पर इनमें न कोई पेड़ था, न कोई चिड़िया. ये बस तकनीक की छोड़ी हुई राख और धूल के निशान थे. गुलशन ने महसूस किया कि स्क्रैपर ने उत्पादन तो बढ़ा दिया, पर उस कटे हुए कोने की रूह को काट ही दिया.

शाम को जब मशीनें थमतीं, तो उनकी गर्मी हवा में देर तक बनी रहती. गुलशन अपने हाथों को देखता – वे अब शहरी नहीं रहे थे, उन पर स्क्रैपर के ग्रीस और कोयले की ऐसी परत चढ़ गई थी जो सादे पानी से नहीं छूटती थी. वह तकनीक का हिस्सा बन चुका था, और तकनीक कटकोना का.

एक शाम गुलशन कपूर अपने क्वार्टर के बाहर खड़ा था. अब वहाँ बिजली के खंभे गड़ गए थे. बल्ब की पीली रोशनी ने उस घने अंधेरे को बीच से चीर दिया था, जिसे पहले सिर्फ जुगनू या ढिबरी की लौ पहचानती थी.

पक्की सड़क भी बन रही थी. वह सड़क जो पटना से कटकोना को जोड़ रही थी, पर साथ ही जंगल को दो हिस्सों में काट रही थी.

सुक्खू रजवाडे पास ही बैठा था. वह अब पहले से ज्यादा चुप रहने लगा था. उसने जलते हुए बल्ब को देखा और फिर चामठ पहाड़ की ओर मुड़ा.

“साहब, बिजली तो आ गई, पर अब रात को परिंदे डरे हुए लगते हैं.” सुक्खू ने अपनी भारी आवाज़ में कहा. “सड़क बन गई है, तो बाहर के लोग आ रहे हैं, पर जंगल के पेड़ रोज कम हो रहे हैं. पहाड़ को मशीनें ऐसे खा रही हैं जैसे कोई भूखा जानवर हो.”

गुलशन ने गौर किया कि स्थानीय समुदाय के चेहरों पर अब वह पहले जैसी निश्चिंतता नहीं थी. पहले पहाड़ उनका रक्षक था, अब वह उनका लक्ष्य (Target) बन गया था. जंगल के बीच से जब बुलडोजर गुजरता, तो साल के पुराने दरख्त ऐसे गिरते जैसे कोई बहुत पुराना रिश्ता टूट रहा हो. पहाड़ जो कल तक एक रहस्य था, अब मलबे के ढेर में तब्दील हो रहा था.

“साहब, हीरा तो नहीं मिला चामठ का, पर उसकी रूह ज़रूर कांप रही होगी.” – सुक्खू ने एक लंबी सांस ली.

फिर भुक्खल ने कहा – “अब तो सुन रहे हैं कि आगे खुलने वाली खदानों में सुरंग खोदने की अण्डर ग्राउण्ड माइनिंग की पद्धति भी बंद कर पूरा का पूरा जंगल या पहाड़ खोद कर कोयला बाहर निकालने की ओपन कास्ट माइनिंग की पद्धति लाई जा रही है.”

गुलशन को भी एक अजीब सी बेचैनी महसूस होती थी. उसने देखा कि मज़दूरों के पास अब कुछ पैसे ज्यादा थे, पर उनकी आँखों में वह जंगल वाला सुकून कम हो गया था. बिजली की रोशनी में भालू अब बस्तियों की तरफ कम आते थे, पर इंसानों का शोर बढ़ गया था. विकास आ रहा था, और उसके पैरों तले दूब कुचली जा रही थी.

वहाँ अब चाय की एक छोटी दुकान खुल गई थी, जहाँ कैसी भी खबरें देर से पहुँचती थीं, पर खदान के टार्गेट की खबरें सबसे पहले आती थीं.

गुलशन ने महसूस किया कि कटकोना अब वह ‘कटा हुआ कोना’ नहीं रहा, वह अब मुख्यधारा का एक हिस्सा बन रहा था. पर इस हिस्से बनने की कीमत वह जंगल और वे पहाड़ चुका रहे थे, जो सदियों से खामोश खड़े थे.

उस रात जब गुलशन अपने कमरे में बैठा, तो बिजली के बल्ब की रोशनी उसे थोड़ी पराई सी लगी. उसे याद आया कि जब वह पहली बार डम्पर पर बैठकर आया था, तब जंगल उसे डरा रहा था, पर अब वह जंगल खुद डरा हुआ लग रहा था.

pinterest से आभार सहित

कटकोना अब एक नाम से बढ़कर एक घाव बन चुका था. पाथारखेड़ा से आए स्क्रैपरों ने पहाड़ की पीठ को इतना छील दिया था कि वह अब अपनी जड़ों से अलग दिखने लगा था. उत्पादन बढ़ गया था, बिजली के बल्बों ने रातों को दिन जैसा बना दिया था, पर उस कृत्रिम उजाले में जंगल का अंधेरा और भी डरावना लगने लगा था.

गुलशन कपूर ने अपना वह स्लेटी ट्रंक एक बार फिर बंद किया. इस बार उसमें सिर्फ कपड़े नहीं थे, बल्कि कोयले की वह बारीक धूल भी थी जो उसकी देह और आत्मा के भीतर तक धँस गई थी. वह छुट्टी पर घर जा रहा था, पर उसे पता था कि जब वह लौटेगा, तो पहाड़ का एक और हिस्सा मलबे में तब्दील हो चुका होगा.

उसने मुड़कर हसदो आरण्य की ओर देखा. वह विशाल वन प्रदेश, जो सदियों से एक फेफड़े की तरह सांस ले रहा था, अब टुकड़ों में बंट रहा था. उसे अहसास हुआ कि जिसे वे विकास कह रहे थे, वह दरअसल एक बड़े विध्वंस की तैयारी थी. विकास की सड़कों पर चलकर जो मशीनें आ रही थीं, वे सिर्फ कोयला निकालने नहीं, बल्कि हसदो की रूह को कुरेदने आ रही थीं.

1974 का वह दौर तो सिर्फ एक शुरुआत थी. भविष्य के गर्भ में हसदो के उन हज़ारों पेड़ों का कटना और हाथियों के बेघर होकर गलियों में भटकना पहले से ही लिखा जा चुका था.

चामठ पहाड़ की वह अकूत दौलत जिसे हिंदुस्तान का खर्चा चलाना था, दरअसल उस हरियाली की कीमत पर निकलनी थी जिसे कोई दोबारा नहीं उगा सकता था.

गुलशन डम्पर के केबिन में बैठा तो उसे लगा कि वह सिर्फ एक कर्मचारी नहीं, बल्कि उस मशीनी सभ्यता का एक छोटा सा पेच है, जो अपनी ही जमीन को निगलने के लिए बनाई गई है.

बाहर धूल उड़ रही थी. वह धूल जो कभी जंगल की मिट्टी थी, अब प्रोडक्शन बन चुकी थी.

छत्तीसगढ़ का वह कटा हुआ कोना– कटकोना-  धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था, इतना बड़ा कि एक दिन वह पूरे हसदो को अपने भीतर समा लेने वाला था.

पीछे चामठ पहाड़ बादलों में छिप गया था, जैसे वह आने वाले उस समय को नहीं देखना चाहता था, जहाँ उजाले बहुत होंगे, पर सांस लेने के लिए हवा और छिपने के लिए जंगल नहीं बचेगा.

संजय अलंग छत्तीसगढ़ कैडर के सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं.
उनके हिंदी में तीन कविता-संग्रह, एक उपन्यास तथा इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक शोध-पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.
उन्हें सूत्र सम्मान, श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, दिनकर पुरस्कार, साहित्य रत्न सम्मान और सरस्वती सम्मान आदि से सम्मानित किया गया है

सम्पर्क:
75, एश्वर्य रेसीडेंसी, रायपुर, छत्तीसगढ़, पिनकोड – 492006;

Tags: 20262026 कथाकटकोनासंजय अलंग
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Comments 29

  1. PIYUSH KUMAR says:
    3 weeks ago

    यह कहानी अतीत में जाकर हमें वह दिखाती है, जो हमारा वर्तमान है. भौतिक विकास के लिए संसाधनों के दोहन का आरंभ और उसके दुष्परिणामों की चिंता यह कहानी बखूबी पेश कर सकी है. कहन का यह ढंग अनूठा है. पिछले दिनों इसी तरह रतन कुमार सांभरिया की कहानी ‘मुखबिर’ पड़ी थी ‘बया’ में.

    पर्यावरण विमर्श के अंतर्गत कहानियों को अधिक होना चाहिए, जिसे यह कहानी पूरा करती है. कहानी अपने वास्तविक धरातल पर है इसलिए विश्वसनीयता का पक्ष सशक्त है. घटनाओं और दृश्यों का सूक्ष्म चित्रण और उनके लिए दी गई उपमाएं प्रभावी हैं. हालांकि कहीं कहीं यह सायास लाया गया प्रतीत होता है. छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से सरगुजा पर तुलनात्मक रूप से कम कहानी कही गई है. कहानीकार संजय अलंग क्योंकि स्थानीय हैं, इसलिए अनुभूति की प्रमाणिकता बेहतर आई है. कहानी का पहला किस्सा पाठक को रोमांच और उत्सुकता की ओर ले जाता है. अभी की युवा पीढ़ी संभव है, इसे बहुत कठिन माने पर उस समय लोगों ने इस भौतिक विकास के लिए ऐसी बहुत सी चुनौतियों का सामना किया है. आज के सुविधाभोगी जीवन की बुनियाद में कितने कष्ट छुपे हैं, यह लोग नहीं जानते या जानना नहीं चाहते हैं. यह कहानी इस बात को भी जाहिर करती है. लेखक ने प्रशासनिक अधिकारी होने के बावजूद इस जटिल भौगोलिक दृश्य और वहां के जीवन को कुशलतापूर्वक अनुभव किया और चित्रित किया है, यह महत्वपूर्ण है. मुझे लगता है कि स्थानीय लोगों पर इस पड़े भौतिक विकास के दुष्प्रेभाव का चित्र संकेत के बजाय थोड़ा विस्तृत खींचा जा सकता था. हालांकि आगे लिखी जाने वाली कहानियों में इसकी पर्याप्त गुंजाईश है.

    शांत प्रकृति, भौतिक विकास के प्रयास और उसके दुष्परिणामों को यह कहानी सशक्त रूप में पेश कर पाती है. दुर्भाग्य से इंसान ने कुछ नहीं सीखा और आज विकास के नाम पर वनों की अंधा धुंध कटाई चल रही है. मनुष्य के लिए तकलीफ झेलने के अलावा कुछ नहीं बचा है.
    जरूरी और अच्छी कहानी के लिए लेखक को इसके लिए बधाई.

    Reply
  2. अनवर सुहैल says:
    3 weeks ago

    संजय अलंग की कहानी कटकोना एक ऐसी कहानी है जो संजय अलंग की तमाम रचनाओं पर भारी पड़ती है। ऐसा लगता है संजय अलंग को इस कहानी ने अभिव्यक्त होने के लिए बहुत सताया होगा। सरगुजा छत्तीसगढ़ की कटकोना खदान सिर्फ किसी पिछड़े स्थल का औद्योगिक दोहन नहीं है बल्कि यह पृथ्वी पर लगातार होते कमर्शियल दोहन की एक पटकथा है। संजय अलंग ने अंडर ग्राउंड कोल माइनिंग की बहुत सी बारीकियों को भी सम्मुख रखा है। समालोचन को इस कथा के लिए धन्यवाद।

    Reply
  3. Anonymous says:
    3 weeks ago

    विषय, भाषा और तकनीक तीनों लिहाज़ से कहानी मज़बूत है। ऐसी कहानी विरले दिखती है। पहला पाठ आपको मुतास्सिर करता है। कहानी की गहराई को दरयाफ़्त करने के लिए आप को एक पाठ से आगे जाना पड़ता है। ज़ाहिर है कहानी किस विषय पर है, हमें शुरू में ही मालूम हो जाता है लेकिन इस विषय को बरतने का अंदाज़ देखने के लिए हम आगे जाते हैं और वही इस कहानी का जादू है। कहानी हमेशा अपने कहने के अंदाज़ से ही बड़ी होती है अपने विषय से नहीं।

    Reply
  4. Satish Kumar Gupta says:
    3 weeks ago

    “कटकोना” पढ़कर मन अत्यंत प्रभावित हुआ। एक ओर विज्ञान और गणित की तार्किक गहराई और दूसरी ओर कला व साहित्य की संवेदनशीलता—आपके व्यक्तित्व का यह अनूठा संगम इस लेख में स्पष्ट झलकता है।
    जिस बारीकी से आपने विज्ञान द्वारा होने वाले विकास और उसके पीछे छिपे विनाश के द्वंद्व को चित्रित किया है, वह आपकी दूरगामी प्रशासनिक दृष्टि और एक लेखक के कोमल हृदय के सामंजस्य को दर्शाता है। विकास की अंधी दौड़ में खोती जा रही मानवीय संवेदनाओं पर आपकी यह टिप्पणी न केवल विचारणीय है, बल्कि आज के समय की बड़ी ज़रूरत है।
    ऐसे सारगर्भित चिंतन के लिए आपको बहुत-बहुत साधुवाद।”
    सतीश कुमार गुप्ता
    उप महाप्रबंधक(खनन)/आई. एस.ओ. मुख्यालय, एसईसीएल बिलासपुर

    Reply
  5. Vishwasi ekka says:
    3 weeks ago

    ‘कटकोना’ बहुत अच्छी समसामयिक कहानी है। इसमें कहानीकार संजय अलंग जी ने मानवीय संवेदनाओं के साथ निरंतर काटे जा रहे जंगल के प्रति चिंता व्यक्त की है। यह बेहद जरूरी और समय की मांग है, साथ ही यह लेखकीय दायित्व भी है। वन संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने आज पूरी दुनिया के समक्ष विकट स्थिति निर्मित कर दी है। सरगुजा जो कभी नितांत शांति और सुकून का क्षेत्र था उथल- पुथल और अशांत हो चुका है। निरंतर बढ़ते तापमान के कारण मनुष्य और पशु-पक्षियों का जीवन खतरे में है, ऐसे विपरीत समय में यह कहानी पाठकों को सोचने पर विवश कर रही है कि जीवन जरूरी है या कि विनाशकारी विकास।
    कहानी की भाषा और कथ्य बहुत प्रभावशाली है।

    Reply
  6. रजनी गुप्त says:
    3 weeks ago

    अच्छी कहानी👍 इतनी गहराई से रची बुनी गई है। उत्कृष्ट लेखन हेतु बधाई।

    Reply
  7. Umesh Charpe says:
    3 weeks ago

    बेहतरीन कहानी….

    Reply
  8. आयशा आरफ़ीन says:
    3 weeks ago

    कहानी का विषय, भाषा की रचनात्मकता और ‘जल-जंगल-ज़मीन’ के विवरण ने ख़ासा प्रभावित किया।

    Reply
  9. शरद कोकास says:
    3 weeks ago

    संजय अलंग मूलतः एक संवेदनशील कवि हैं इसलिए उनकी यह कहानी भी कहीं कहीं कविता की तरह लगती है । कहानी का नायक 1974 के दुर्ग शहर का एक युवा है । आज से पचास साल पहले दुर्ग शहर भी एक बड़े गाँव की तरह ही था इसलिए इस युवा के भीतर वैसा शहरी बोध नहीं है जैसा आज के शहरी युवा के भीतर होता है । संजय जी ने इस सूक्ष्म बिन्दु को बहुत ईमानदारी के साथ रेखांकित किया है । आज से पचास वर्ष पूर्व जिस तरह से मशीनीकरण की शुरुआत हुई थी और आनेवाले खतरों से मजदूर वर्ग आशंकित हो रहा था यह इस कहानी का मूल कथ्य है जिसे संजय अलंग ने बहुत काम शब्दों मे विस्तार दिया है । एक युवा का नौकरी के लिए घर से बाहर निकलना और अपने से पूर्व की पीढ़ी से अलग कुछ कर दिखाने की चाहत रखना यह उस दौर के हर युवा का स्वप्न था । विभाजन की त्रासदी , नए भारत का स्वप्न , जैसे विषयों को भी कहानी मे थोड़ा सा स्थान मिला है । लेकिन कहानी का अंत थोड़ा जल्दबाजी मे किया गया प्रतीत होता है । आनेवाले भविष्य के संकट को थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था यद्यपि कहानी समय सापेक्ष है इसलिए ऐसी अपेक्षा करना जरूरी भी नहीं है । बहरहाल एक अच्छी कहानी के लिए संजय जी को बधाई ।

    Reply
  10. ओमा शर्मा says:
    3 weeks ago

    यह कहानी हमारे या कहीं के भी विकास के प्रोपेगेंडा पर जरूरी आत्मीय टिप्पणी है। चित्रण शानदार है। पर्यावरण को लेकर विश्वसनीय कहानी। शुरुआती भाग कुछ संपादित किया जा सकता था।

    Reply
  11. रमेश अनुपम says:
    3 weeks ago

    ’कटखोना’ कहानी एक साथ बहुत सारे सवालों और खतरों की ओर इंगित करती है। इस कहानी में मनुष्य और प्रकृति के अंतर्संबंधों को बहुत बारीकी के साथ चित्रित किया गया है। प्रकृति के बेतहाशा दोहन और विकास की अंधाधुंध दौड़ पर उंगली रखते हुए मनुष्य और प्रकृति के संरक्षण के मुद्दे को लेखक एक साथ उठाते हुए दिखाई देते हैं। दरअसल यह एक बड़े फलक की ही कहानी नहीं है वरन यह हिंदी कहानी की फलक को भी बड़ी करने वाली एक बड़ी कहानी है । इस कहानी की अंतर्वस्तु ही नहीं अपितु इस कहानी की शिल्प और भाषा भी कमाल की है। लेखक के ऑब्जर्वेशन को यह भाषा जिस काव्यात्मकता के साथ इस कहानी में रचती हैं, एक विरल फैंटसी को जिस तरह शब्दों में गूंथती है , वह किसी साधारण लेखक के वश की बात नहीं है । हिंदी की इस अविस्मरणीय कहानी के लिए ’समालोचन’ और संजय अलंग दोनों को ढेर सारी बधाई दी जानी चाहिए । बधाई ! बधाई ! बधाई

    Reply
  12. डॉ उर्वशी says:
    3 weeks ago

    आपकी कहानी कटकोना पढ़ते हुए बार-बार यह लगा कि आप केवल एक कथा नहीं लिख रहे, बल्कि समय, भूगोल और मनुष्य की नियति के बीच एक गहरा संवाद रच रहे हैं। आपने जिस काव्यात्मक संवेदना से एक खदान, एक जंगल और एक साधारण युवक के भीतर घटते परिवर्तन को पकड़ा है, वह सचमुच पाठक को भीतर तक छूता है—जैसे हम गुलशन के साथ-साथ उस अँधेरे में उतरते हैं जहाँ सिर्फ कोयला नहीं, बल्कि मनुष्य की थकान, भय और धीरे-धीरे बदलती आत्मा भी जमा है। खास तौर पर विकास और विनाश के द्वंद्व को आपने जिस सूक्ष्मता से रचा है, वह प्रभावी है; हालांकि कुछ जगहों पर लगता है कि यह त्रासदी और भी ठहरकर, और विस्तार पाकर, पाठक को अधिक देर तक भीतर रोके रख सकती थी। फिर भी, आपकी भाषा की लय और दृश्यात्मकता कहानी को सिर्फ पढ़ा नहीं जाने देती, उसे अनुभव में बदल देती है—और शायद यही वह बिंदु है जहाँ आपकी कथा अपनी सबसे बड़ी ताकत हासिल करती है।

    Reply
  13. कुमार अम्बुज says:
    3 weeks ago

    उत्प्रेक्षाओं, उपमाओं, स्मृतियों, निरीक्षणों और रूपकों ने संवेदनशीलता के साथ कहानी की भाषा और कथ्य को कविता और संगीत के क़रीब रख दिया है। लेकिन साध्य को ओझल नहीं होने दिया। संजय अलंग जी को बधाई। और आगे के लिए अपेक्षाएँ भी संलग्न।

    Reply
  14. पवन करण says:
    3 weeks ago

    साहब, यह मशीन तो पहाड़ की खाल उतार रही है. इतनी जल्दी तो कुदरत भी नया पत्ता नहीं निकालती, जितनी जल्दी यह मिट्टी निकाल रही है.”….

    कहानी की शक्ल में निरंतर विस्तृत होता जाता पीड़ादायी सच । बेचैनी से भर देने वाली कथावस्तु। लगता है अब सब मरते जाने को अभिशप्त हैं ।

    पवन करण

    Reply
  15. Sangeeta Kumari says:
    3 weeks ago

    अति सुंदर रोचक रचना प्रकृति के मनोहर दृश्य के साथ विकास की एक कटु यात्रा
    लेखक जी को बहुत-बहुत हार्दिक बधाई सन 1970/ 74 की उन यादों को वर्तमान व भविष्य की पीढ़ी को बताने के लिए

    Reply
  16. आशुतोष दुबे says:
    3 weeks ago

    कविता की भाषा में लिखी हुई स्पर्शी कहानी जिसका कैनवास औपन्यासिक है। यह विभूतिभूषण बैनर्जी के ‘आरण्यक ‘ की याद भी दिलाती है। परिवेश बहुत गहनता और सूक्ष्मता से रचा गया है। कभी कभी पात्र अपनी तरह बातें करने के बजाए,आख्याता की ही भाषा और शैली में अपनी बात करते प्रतीत होते हैं। सुंदर कहानी के लिए संजय जी और समालोचन को धन्यवाद ।

    Reply
  17. कैफ़ी हाशमी says:
    3 weeks ago

    कहानी अच्छी है। विकास के भयावह परिणामों के अंधेरे कोने में नहीं ले जाती बल्कि उस प्रस्थान बिंदु का अनुभव कराती है जहाँ से तथाकथित विकास की एक निरंकुश दौड़ शुरू होनी है जिसके लिए प्रकृति और मनुष्य केवल एक उत्पाद भर है। विवरण बहुत तीक्ष्ण और सघन हैं। अपनी रवानी में कहानी बहा ले जाती है। लेकिन लेखक २०२६ के बजाए १९७० की कहानी क्यों कह रहे हैं? क्या २०२६ की कहानी कहने के अपने खतरे हैं इसलिए?

    Reply
  18. मनोज रुपड़ा says:
    3 weeks ago

    छत्तीसगढ़ के दुर्गम पीड़ित और दमनीय इलाकों को लम्बे समय से एक ऐसे कहानीकार की प्रतीक्षा थी, जो उसकी भीतर तहों तक जाकर उसके मर्म को दुनिया के सामने उजागर कर दे. आज आपकी कहानी ” कटकोना ” को पढ़कर यह लगा कि आपने घोर उपेक्षित और भयानक दोहन के शिकार उस इलाके की बरसों पुरानी मांग पूरी कर दी. ये एक ऐसी कहानी है, जो लेखक से उम्र भर का हिसाब मांगती है. आपने कहानी की मांग भी पूरी की है.
    जंगलों और पहाड़ों में छुपे खनीज भंडार अपने कवि – कथाकार को खुद चुनते हैं, जैसे झारखण्ड के बलात्कृत खनीज भंडारों ने अपने कथाकार हंसदा सोभेन्द्र शेखर और कवि राही डूमरचीर को चुन लिया था, ठीक उसी तरह छत्तीसगढ़ ने आपको चुना है . ये कहानी सिर्फ़ छत्तीसगढ़ के खुले घावों “”ओपन कास्ट माइनिंग ” की कहानी नहीं है. ये उन लाखों कटे हुए और भविष्य में काटे जाने वाले पेड़ों, की कहानी है.

    Reply
  19. Ramesh Kumar Ghai says:
    3 weeks ago

    कहानी अन्तर्मन को छू गई, मुझे लगा जैसे गुलशन कपूर को रचते समय संजय के ज़हन में मैं ही था।मैं दुर्ग से हूं और १९७४ जून में मैंने चर्चा कालरी में ज्वाइन किया फिर सितंबर ‘७४ में कटकोना कालरी अंडरग्राउंड माईन्स में पोस्टिंग हो गई जहां पहले दिन से ही सीम न०३ का इलेक्ट्रीकल एवं मेकेनिकल विभाग का शिफ्ट इंचार्ज की जिम्मेदारी मिली। फिर सितंबर ७४में प्रोमोशन के साथ बिश्रामपुर कोल हैंडलिंग प्लांट में पोस्टिंग मिली। मकसद यह कि मैंने १९७४ में वह सब देखा,झेला और महसूस किया है जिसे लेखक ने बयां किया है। कटकोना अंडरग्राउंड माईन्स है जहां १,३ और ५ये ३ कार्य शील सीम हैं, २ एवं ५ कार्य योग्य नहीं पाए गए थे।
    लेखक ने न सिर्फ उजड़ते हुए जंगल,बढ़ते मशीनीकरण से सरगुजा के शांत वातावरण में बाहरी दख़ल से होने वाले प्रभावों के प्रति अपने कवि हृदय में होने वाले दर्द को व्यक्त किया है बल्कि अन्य जगहों पर आज कल होने वाली ऐसी कार्ययोजनाओं के भावी परिणामों की तरफ भी इशारा किया है। पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदनशीलता अन्य रचनाओं में भी दिखाई देती है।
    कहानी रोचक है और कोयला खदानों में काम करने वाले कर्मचारियों एवं अधिकारियों के खून -पसीना बहा कर काम करने और देश को रौशन करने की ओर भी इंगित करती है।
    संजय अलंग की इस कहानी के माध्यम से कई संदेशे मिलते हैं। उन्हें और कहानी के प्रकाशक को ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।

    Reply
  20. नवल गोविंद . says:
    3 weeks ago

    कटकोना एक पात्र गुलशन कपूर की कहानी है । कोयला खनन में लगे भारीभरकम मशीनी दखल से जंगल के उजड़ने और स्थानीय लोगों पर पड़ते दबाव और स्वीकार को समुचित विस्तार नहीं मिला है ।

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  21. RAM KUMAR TIWARI says:
    3 weeks ago

    कटकोना कहानी हमें हमारे विचारों और सोच को सिर के बल खड़ी कर देती है।भूख ,स्वार्थ और सुविधाओं की हमारी अंतहीन चाह हमें अपराध बोध से वंचित उस नियति की ओर ले जा रही है, जहां हम असहाय और मजे में हैं।इस कहानी के पाठ में गांधी जी की जीवन और जगत दृष्टि की अनसुनी प्रति ध्वनि लगातार एक पुकार की तरह आती है और हमारी जीवन दृष्टि को उसके मूल में ही प्रश्नांकित करती है। लेकिन हमें न सुनाई देती है और न अपराध बोध जगाती है। प्रकृति पर विजय,उसका दोहन, तथाकथित विज्ञान और उसकी तकनीकी उपलब्धियां।खनन और उत्पादन को लाखों गुना बढ़ाने का उत्सव।इन सबके बीच हमें नहीं लगता है कि हमारे जीवन में एक अंतहीन फांक पैदा हो गई है,जो दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यह एक सभ्यता संकट है।इस सभ्यता संकट को कहानी में कहानी की शर्त पर अभिव्यक्त करने के लिए संजय अलंग को बधाई!

    Reply
  22. Seema Pandey says:
    3 weeks ago

    ‘कटकोना’ – विकास के द्वंद्व और संवेदनाओं की चीख को मन के द्वंद को दर्शाती कहानी है
    “कटकोना” केवल एक कहानी नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता के चेहरे पर लगा वह आईना है, जिसमें विकास की चमक और विनाश की स्याही दोनों एक साथ दिखाई देती हैं। लेखक ने जिस सूक्ष्मता से विज्ञान की तार्किक कठोरता और साहित्य की कोमल संवेदनाओं का सामंजस्य बिठाया है, वह विरल है।आदरणीय संजय अलंग सर को हार्दिक शुभकामनाएं

    Reply
  23. Seema Pandey says:
    3 weeks ago

    लेखक ने एक प्रशासनिक दृष्टि और एक दृष्टा (Visionary) की भूमिका निभाते हुए यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या हम विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति और अपनी जड़ों को तो नहीं खो रहे? जहाँ विज्ञान हमें प्रगति की नई ऊँचाइयाँ देता है, वहीं कहानी का संकेत उस ‘शून्य’ की ओर भी है जो इस भौतिकवादी प्रगति के पीछे छूटता जा रहा है। आदरणीय संजय अलंग सर को हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

    Reply
  24. बुद्धिलाल पाल says:
    3 weeks ago

    एक अच्छी महत्वपूर्ण कहानी से गुजरना हुआ।कहानी एक मील के पत्थर की तरह की है।याद रह जाने वाली है।लगभग को सही रूप में समेटे हुए एक अच्छी कहानी है।संजय अलंग जी इस कहानी के लिए बहुत प्रशंसा के पात्र हैं।उन्हें इस कहानी के लिए बहुत हार्दिक बधाई।

    Reply
  25. राम कुमार तिवारी says:
    3 weeks ago

    संजय अलंग की कहानी ‘कटकोना’ एक साभ्यतिक हस्तक्षेप की कहानी है। इसको पढ़ते हुए मुझे गांधी जी की जीवन और जगत दृष्टि की याद लगातार आती रही। प्रति ध्वनि में उनकी पुकार लगातार सुनाई देती रही है। तथाकथित विकास, शिक्षा और विज्ञान का तकनीकी में रुपांतरण का हिंसक रूप अनुभव होता रहा ।
    सुविधा, स्वार्थ और सत्ता में लिप्त आजके मनुष्य, समाज और दुनिया का विद्रुप यह कहानी अपने प्रति स्वर में रचती है। प्रश्न दर असल जीवन पद्धति का है।कवि कथाकार नवीन सागर अक्सर कहा करते थे कि- ‘जब तक मनुष्य जाति की चेतना सामुहिक रूप से अपराध बोध से नहीं घिरती है तब तक कुछ नहीं बदलने वाला है।’यह कहानी हमारे अंदर एक निषेधात्मक चेतना का निर्माण करती है। संजय अलंग को कहानी की शर्त पर रची इस कहानी के लिए बधाई!

    Reply
  26. श्री कुमार says:
    2 weeks ago

    कथ्य,भाषा और उपमाओं का नया संसार रच दिया है कहानीकार ने।कहानी की चाल सुखद और चमत्कृत करती है ।विषय नया नहीं है परन्तु आज के परिवेश में जरूरी और नये ढंग से परोसा गया है जो पाठक के इंद्रियों को जागृत करता है और करता रहेगा क्योंकि ऐसी कहानियां ज़ेहन में बस जातीं हैं।कहानी के संवाद और उसकी एक खामोशी भी उसका उजला पक्ष है।कहानी पढ़ते हुए जंगल और ओपन कास्ट माइनिंग के दृश्य ऐसे उभरते हैं जैसे कोई डॉक्यूमेंट्री चल रही हो ।ये कहानी का पात्रों के साथ सफर और लम्बा होने संभावना है।इस ढंग के साथ उपन्यास भी पाठकों को स्वीकार्य होगा।आदरणीय संजय अलंग जी को हार्दिक बधाई।साथ ही समालोचना को भी बधाई जिसने इतनी अच्छी कहानी पाठकों तक पहुंचाई ।

    Reply
  27. अनिल अनल हातु says:
    2 weeks ago

    इस कहानी को पढ़ते हुए दो उपन्यास मेरे जेहन में बजते रहे। वैसे भी कोयला खदानों और खनिकों पर बहुत कम लिखा गया है। जो दो उपन्यास अभी याद आ रहे हैं उनमे एक है एमिल ज़ोला का फ्रेंच उपन्यास “जर्मिनल” या “अंकुरण” और दूसरा संजीव का “सावधान नीचे आग है” । नारायण सिंह की कुछ कहानियों और उनके उपन्यास “ये धुआँ कहाँ से उठता है” में भी कोयला खदानों और खनिकों की पशुवत नारकीय जीवन के चित्र मिलते हैं, कुछ वैसे ही चित्र जैसे विन्सेंट वैनगोग द्वारा फ्रांस की बोरिनाज की खदानों में काम करने वाले “आलूखोरों ” (खनिकों) के बनाए गए थे। उपर्युक्त लेखकों ने खान मालिकों द्वारा खनिकों के शोषण और श्रमिकों के अमानवीय और नारकीय जीवन स्थितियों का वर्णन किया और उसे बेहतर बनाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के साथ साझीदारी दिखाई । किन्तु इनमें से किसी ने भूमिगत खदानों के भीतर उतर कर उसके अंधेरे कोने अंतरों , कोयले की सिम से कोयला को गैंती, कुदाल से काट कर टब में भरने और चाल धँसने के खतरों को न तो देखा था और न ही भोगा था इसलिए उसकी प्रामाणिक जानकारियाँ उनके विवरणों से अनुपस्थित हैं । मैं भी यह सब इतने विश्वास से बोल रहा हूँ क्योंकि मैं भी कटकोना की उस खदान में गया हूँ लेकिन तब वह खदान काफी mechanized हो गई थी, लेकिन खदान और आस पास के जंगल का वातावरण तब भी वही था जैसा अलंग जी ने लिखा है। कटकोना से अभी भी सेमी कोकिंग कॉल ग्रेड 2 का कोयला निकलता है जो भिलाई इस्पात संयंत्र में जाता है ।
    खदान के अंदर का जुगराफिया और मैनुअली कोयला काटने और लदाई , बोझाई की प्रामाणिक और यथार्थ तस्वीर एक तरफ जहां लीलाधर मंडलोई और संजय अलंग की कविताओं में दिख पड़ती है तो दूसरी तरफ संजय अलंग की इस कहानी में। भूमिगत खदानों में अंदर जाने और काम करने की विषम नारकीय और घनघोर असुरक्षित परिस्थितियों की यंत्रणा और संत्रास शब्दों में व्यक्त हो ही नहीं सकता , इसे बगैर खदान में उतरे आप समझ नहीं सकते हैं। यह यूं ही या अनायास नहीं है कि संजय अलंग ने इस कहानी में खदान के बाहर ,खनिकों के ज़िंदगी को जितना प्रामाणिक ढंग से लिखा है, उतना ही प्रामाणिक और सच्ची तस्वीर खदान के अंदर कार्यरत मजदूरों और खदान की छत तथा कोयले के सीम तथा उसके पूरे वातावरण को भी देखा और लिखा है , क्योंकि यह उनका फ़र्स्ट हैंड अनुभव था। उन्होने खदानों में उतरकर , काम करके देखा और लिखा है, किसी के द्वारा सुना सुनाया वर्णन नहीं है। इसीलिए यह कहानी पाठकों को इतना छूती है।
    दूसरी जो खासियत इस कहानी की है, वह तो अद्भुत है। एक कवि जब कहानी लिखता है तो उसकी भाषा काव्यात्मक होती ही है, यहाँ गद्य भी पद्य की शैली और उसका लालित्य लिए हुए है। इतना खूबसूरत स्निग्ध और लालित्य से परिपूर्ण गद्य मनोहारी है। वस्तुत: यह गद्य में लिखी हुई कविता है।मैं सोचता हूँ और हैरान रह जाता हूँ कि अलंग जी ने ऐसी भाषा कैसे लिख डाली। यही तभी संभव होता है जब आपकी भावनाएँ और संवेदना निष्कलुष और इन्नोसेंट हों। जब संवेदनाएँ निर्दोष और पावन होती हैं ,जब संवेदनाएँ बासी न पड़ी हों, बल्कि टटकी और ताज़ी हों ,तभी भाषा का यह रूप निखरता है।
    इस कहानी में लेखक की लोकेशन जहां खनिकों और खान मजदूरों के साथ है वहीं उसकी गेज़ कोयला कंपनी पर है।इस कहानी में लेखक विकास और विध्वंस कि विडंबनात्मक द्वंद्वात्मकता की गहरी और निरपेक्ष पड़ताल करता दिख पड़ता है। ऐसा भी नहीं है कि वह खदानों और कोयला प्रॉडक्शन का विरोधी है किन्तु इसके साथ साथ इस कोयले के प्रॉडक्शन से होने वाले विध्वंस कि भी आलोचनात्मक पड़ताल और निरीक्षण करता है। वह एक समंजस्य चाहता है कि कोयला भी निकले लेकिन हमारे वन, जंगल और पर्यावरण भी संरक्षित रहें।

    Reply
  28. देवेन्द्र says:
    2 weeks ago

    “कटकोना” वास्तव में छत्तीसगढ़ के मरने और धीरे धीरे विलुप्त होते जाने की एक मार्मिक कहानी है.. तीन चार साल पहले ज़ब मैं छततीसगढ़ से लौट रहा था तब हँसदैव के जंगल बुरी तरह काटे जाने की i ख़बरें आ रही थीं . प्रकृति की गोद में हम पैदा हुए थे, वह एक अलग सभ्यता थी विकास के इस नए दौर में हमारी दिनचर्या तकनीक की शरण में जा रही है..
    यह नये विकास की कहानी है.
    यह मनुष्य के भीतर से मनुष्यता के विस्थापन की भी कहानी है.
    यह मात्र एक कोने का कटना नहीं है बल्कि उस केंद्र के सत्यानाश की झांकी भर है जिसमें कभी जीवन का सोता फूटा था.

    Reply
  29. Bhaskar Choudhury says:
    7 days ago

    ​मेरी माँ, शुक्ला चौधुरी, कविताओं के साथ-साथ कहानियाँ भी लिखती थीं। सच कहूँ तो संजय अलंग जी की कहानी पढ़कर मुझे माँ की स्मृतियाँ हो आईं। माँ की कहानियों में जहाँ एक ओर काव्य का रसास्वादन होता था, वहीं दूसरी ओर माँ और बच्चे के प्रगाढ़ संबंधों की तरह ही प्रकृति और जंगल के साथ उनकी गहरी आत्मीयता झलकती थी। उनकी रचनाओं में पर्वत, पेड़, नदी, पक्षियों और समग्र आबोहवा को बचाने की गुहार होती थी। वे ये सारी बातें इतनी सादगी से कह जाती थीं कि हम (बाबा और मैं, जो उनके पहले पाठक थे) भावविभोर हो जाते थे।
    ​बहरहाल, अब संजय जी की कहानी पर आता हूँ। इसे पढ़कर ऐसा लगा जैसे बरसों से मुझे इसी तरह के किसी कथानक का इंतज़ार था। वैसे तो विकास के नाम पर जंगलों को मटियामेट करने और पहाड़ों को खोदकर खाई में बदल देने का सिलसिला सदियों से मंथर गति से चल रहा है, किंतु वर्तमान में इसकी रफ़्तार बुलेट ट्रेन की भाँति अत्यंत तीव्र हो गई है। सैकड़ों हाथों की जगह अब बड़े-बड़े जबड़ों वाली विशालकाय मशीनों ने ले ली है, जो रातों-रात जंगलों और पर्वतों को ज़मींदोज़ कर देती हैं। इसके साथ ही नाना प्रकार के परिंदे, सरीसृप, वन्यजीव और सदियों से वहाँ रह रहे आदिवासी भी बेघर हो जाते हैं।
    ​प्रश्न यह उठता है कि विकास की यह प्रक्रिया आख़िर किसके हित के लिए है? क्या हमारे जंगल, जो हमारी प्राणवायु के मुख्य स्रोत हैं, और हमारी नदियाँ, जीव-जंतु तथा पक्षी केवल कागज़ों और फ़िल्मों तक ही सिमट कर रह जाएंगे? क्या खदानों के निर्माण से धरती के मूल निवासी आदिवासियों और उनके बच्चों का जीवन वास्तव में बेहतर होता है? क्या मुख्यधारा से जुड़कर वे एक सम्मानजनक जीवन के अधिकारी बन पाते हैं? क्या उनकी प्रगति के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के पर्याप्त साधन उपलब्ध होते हैं? मुझे लगता है कि ये अत्यंत ज्वलंत मुद्दे हैं और यह कहानी सटीक रूप से इन प्रश्नों को उठाती है। लेखक इन विषयों को बड़े ही मार्मिक और यथार्थपरक अंदाज़ में तार्किक परिणति तक ले जाते हैं।
    ​इस कहानी से ऐसे अनेक दृष्टांत दिए जा सकते हैं, जिनसे वस्तुस्थिति की कठोरता और भयावहता को स्पष्ट महसूस किया जा सके। ये प्रसंग किसी भी संवेदनशील पाठक को झकझोरने के लिए पर्याप्त हैं। उदाहरण स्वरूप कहानी के अंत की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं:
    ​”बाहर धूल उड़ रही थी। वह धूल जो कभी जंगल की मिट्टी थी, अब प्रोडक्शन बन चुकी थी।”
    ​मुझे प्रतीत होता है कि पूरी कहानी का सार इन्हीं पंक्तियों में निहित है। यह उस भयावह भविष्य की ओर संकेत है कि यदि हम अब भी सचेत नहीं हुए, यदि सरकारें अपनी तंद्रा त्याग कर पूँजीपतियों के हितों के बजाय विकास की रफ़्तार को संयमित और संतुलित नहीं करतीं, तो आने वाली विनाशकारी आंधी के समक्ष अमीर, गरीब या मध्यम वर्ग—कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा।
    ​संजय अलंग जी को इस उद्वेलित करने वाली सशक्त कहानी के लिए हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

    भास्कर चौधुरी

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