| कविराज ___________________________ संजय कुंदन |
उनके क़रीबी मित्र उन्हें कविराज कहते थे. उनके कुछ शिष्य भी यही कहकर पुकारते थे, पर उनके सामने नहीं. वह हिंदी के स्टार कवि थे. दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर. एक समय उनकी कविताओं ने धूम मचा दी थी. शोषित-पीड़ित आदमी के संघर्ष को जो भाषा उन्होंने दी थी, उसमें ग़ज़ब की ताज़गी थी. एक से एक फड़कते हुए बिबों से उन्होंने सबको चमत्कृत कर दिया था. हिंदी का साहित्य समाज लहालोट हुआ था उन पर.
उनकी पहली कविता एक साधारण-सी पत्रिका में छपी थी. जिस क़स्बे में वह रहते थे, वहीं से निकलने वाली एक लघु पत्रिका में, जिसकी छपाई भी बेहद ख़राब थी. संयोग से एक बड़े आलोचक की नज़र उस पर पड़ गई. उन्होंने अपने एक लेख में उसकी चर्चा कर दी. बस क्या था, कविराज की माँग बढ़ गई. सभी पत्रिकाओं में धड़ाधड़ छपने लगे. उस वरिष्ठ आलोचक ने युवाओं को दिया जाने वाला पुरस्कार उन्हें दे दिया. हंगामा मच गया था. एक अनाम जगह के कवि को यह पुरस्कार मिला! कविराज पुरस्कार लेने दिल्ली आए, तो स्वाभाविक था कि आलोचक महोदय से मिलते. आलोचक महोदय ने पूछा कि क्या करते हो, तो बताया कि एम.ए. में पढ़ते हैं. आलोचक महोदय ने कहा कि एम.ए. करके दिल्ली आ जाओ. पीएच.डी. करवा देंगे.
कविराज किसी तरह दिल्ली आए, जैसे-तैसे रहने की व्यवस्था की, पीएच.डी. पूरी की, और आलोचक महोदय की कृपा से एक कॉलेज में लग गए. फिर क्या था…कविता और जीवन दोनों की फ़सलें लहलहाईं. एक वरिष्ठ प्राध्यापक की बेटी से टाँका भिड़ गया. शादी हुई और कवि-पत्नी भी एक कॉलेज में लग गईं. इधर चार कविता संग्रह, दो उपन्यास, एक आलोचना पुस्तक, उधर दिल्ली के एक समृद्ध इलाक़े में फ्लैट, एक बड़ी कार, बैंक बैलेंस, महँगे इंश्योरेंस, एफडी वगैरह. कविराज ज्यों-ज्यों वरिष्ठ हुए त्यों-त्यों नियंता बनते गए. पहले छोटे नियंता, फिर मझोले नियंता, फिर बड़े नियंता.
उनके गुडबुक में आने की शुरुआत होती थी, उनकी कविताओं पर किसी पत्रिका में लेख लिखने से. थोड़ा और क़रीब आने के लिए कविराज को अपना गाइड बनाना होता था; नौकरी पाने के लिए उन पर किताब लिखनी होती थी. इस तरह उन पर दसियों किताबें लिखी जा चुकी थीं. उनके चेलों की एक फ़ौज खड़ी हो गई थी.
वह ख़ुद अनेक नामी-गिरामी सरकारी, अर्ध सरकारी, निजी-पारिवारिक पुरस्कार हासिल कर चुके थे और ऐसे अनेक पुरस्कारों की निर्णायक समिति के सदस्य थे. कई पत्रिकाओं के सलाहकार मंडल में थे. अनेक कवयित्रियों के मेन्टॉर थे. उनमें से कुछ के साथ उनके अंतरंग संबंध की अफ़वाहें उड़ती रहती थीं. कई बार कविराज ख़ुद उन्हें हवा देते थे.
वह आए दिन किसी न किसी समारोह में आमंत्रित रहते, कभी रायपुर जा रहे हैं, कभी बनारस, कभी लखनऊ तो कभी पटना. अपने विश्वविद्यालीय काम से भी कहीं जाते तो वहाँ उनका एकल काव्यपाठ हो जाता या सम्मान समारोह. हर शहर में उनके कुछ वरिष्ठ चेले थे. उनकी कोई किताब आते ही वे उस शहर में किताब पर चर्चा आयोजित करवा देते. इस तरह एक किताब पर एक साथ दस शहरों में चर्चा आयोजित हो जाती. लगता कि देश की एक बड़ी घटना है यह.
कविराज का ऐसा आतंक-सा हो गया था कि कोई उनके बारे में नकारात्मक टिप्पणी करता ही नहीं था. अगर किसी को उनकी कविता पसंद नहीं आती थी, तो इतने रहस्यमय ढंग से लिखता और भाषा की ऐसी जलेबी बना देता कि किसी के लिए समझना मुश्किल रहता था कि इसमें कहा क्या गया है. कई लोग तो कविता पढ़े बिना ही ‘वाह’, ‘बहुत बढ़िया’, ‘शानदार’ जैसी प्रतिक्रिया दे मारते थे. आख़िर कविराज ने लिखा है, तो इसमें कोई बात तो होगी ही.
लेकिन पिछले दिनों कविराज को एक ऐसी प्रतिक्रिया मिली, जिसने उनके सुखमय काव्य-जीवन के गुब्बारे में पिन चुभो दिया.
एक वेबसाइट पर उनकी कुछ नई कविताएँ प्रकाशित हुई थीं. तमाम तरह की नवनीतमय प्रतिक्रियाओं के बीच एक अलग तरह की प्रतिक्रिया थी-
‘अब ये अपने को दोहराए जा रहे हैं. चालीस साल पहले इन्होंने ज़रूर कुछ अच्छी कविताएँ लिखी थीं.’
कविराज चौंके. नीचे देखा. नाम लिखा था- अजानंद. यह कैसा नाम है? क्या सचमुच इस नाम का कोई आदमी है या यह किसी का छद्म नाम है? ज़रूर किसी कवि की बदमाशी है यह, उन्हीं की पीढ़ी के किसी कवि की. ईर्ष्या करते हैं उनसे. सीधे नहीं बोल सकते तो छद्म नाम से लिख रहे हैं.…कोई छात्र भी हो सकता है. लेकिन कोई विद्यार्थी ऐसा क्यों करेगा? विद्यार्थियों के तो चहेते हैं कविराज. हो सकता है कोई असंतुष्ट छात्र हो. उसकी कोई अपेक्षा पूरी न हुई हो. अब हर किसी के गाइड वह बन नहीं सकते. हर किसी को नौकरी भी नहीं दिला सकते. हर किसी को पुरस्कार नहीं दिला सकते…. फिर कौन हो सकता है?
अपने को दोहराए जा रहे हैं– इस वाक्य को उन्होंने फिर से पढ़ा. अपनी कविताओं को भी फिर से पढ़ा. दोबारा और तिबारा. ये कविताएँ पहले जैसी तो नहीं ही थीं. वह ख़ुद भी बहुत संतुष्ट नहीं थे. उन्होंने कई बार कोशिश की कि फिर वैसी ही कविताएँ लिखें, जैसी पहले लिखा करते थे. लेकिन अब बन नहीं पाती.
हालाँकि कविता लिखना उनके लिए बहुत आसान हो गया था. जब चाहते थे, लिख मारते थे. लेकिन उन्हें पढ़ कर लगता कि इसमें नमक कुछ कम रह गया है. ऐसा कविराज को लगता था, यह बात किसी और ने नहीं कही थी. उनकी कविताएँ छपते ही चर्चा का विषय बन जाती थीं. वह यह सोचकर निश्चिंत हो जाते थे कि जब सब कह रहे हैं तो अच्छी ही होगी. अरे, जब खाने वाले को रुच ही रहा है, तो रसोइया क्यों परेशान हो. लेकिन अब एक उंगली तो उठ ही गई. कौन है यह अजानंद?
कोई भी हो. क्या फ़र्क़ पड़ता है. पचास प्रशंसाओं में एक नकारात्मक प्रतिक्रिया से क्या ही हो जाएगा. किसी ने नोटिस भी नहीं लिया होगा. प्रतिक्रिया देने वाले का मोबाइल नंबर तो नहीं था लेकिन ईमेल पता चल सकता था. पर ईमेल से किसी को कैसे पकड़ा जाए. ईमेल भी तो फ़र्ज़ी बनाया जा सकता है. क्या वेबसाइट के संचालक से पूछा जाए? नहीं, इससे वह जान जाएगा कि कविराज परेशान हो गए हैं.
छोड़ो हटाओ इसको….. लेकिन वह उसे हटा नहीं पा रहे थे. एक दिन उन्होंने अपने एक प्रिय शिष्य कवि से पूछ ही लिया,
‘यह बताओ, क्या तुम्हें लगता है कि मैं अपनी कविताओं में ख़ुद को दोहरा रहा हूँ?’
‘नहीं भाई साहब. मुझे तो उल्टा लगता है. आपकी कविताओं में इधर एक नई ज़मीन उभरती दिखाई दे रही है. आपकी भाषा में एक नया मोड़ आ गया है.’
प्रिय शिष्य कवि ने जवाब दिया.
यह सुनकर कविराज आश्वस्त हुए. उन्हें लगा अजानंद की प्रतिक्रिया को बेकार ही इतना तवज्जोह दे रहे हैं. एकाध महीना बीत जाने के बाद एक दिन अचानक एक पत्रिका में उनके सामने टन्न से वही नाम बजा- अजानंद. अजानंद की कविताएँ छपी हुई थीं. वह एक साँस में पढ़ गए. एकदम खिच्चा भाषा. अनोखे बिंब. आज के समय को इस मुहावरे में भी कहा जा सकता है, एक साधारण आदमी के भीतर के हाहाकार का बयान इस तरह भी हो सकता है, यक़ीन नहीं हो रहा था.
तो यह अजानंद कवि है! दम तो है इसमें. अजानंद किसी का छद्म नाम नहीं हो सकता. लग नहीं रहा कि यह कविराज की पीढ़ी के किसी कवि की भाषा है. तो क्या यह कोई नया कवि है? किसी नए कवि की यह हिम्मत कि कविराज के बारे में कह दे कि वह अपने को दोहरा रहे हैं. किसी और युवा ने तो ऐसा नहीं कहा.
कविराज ने फिर से अजानंद की कविताएँ पढ़ीं. उन्हें लगा कि ये कविताएँ एक झलक में तो प्रभावित करती हैं, पर इसमें गहराई नहीं है. ये रेटॉरिक हैं. और रेटॉरिक से कविताएँ नहीं बनतीं. वो बेकार में प्रभावित हो गए थे. उन्होंने तुरंत अपने प्रिय शिष्य कवि को फोन लगाया,
‘तुमने अजानंद की कविताएँ पढ़ीं क्या? कोई नया नाम है शायद.’
उनके शिष्य ने कविताएँ नहीं पढ़ी थीं. लेकिन उसने कहा कि वह अभी अपने मोहल्ले के मैगजीन स्टॉल से पत्रिका ख़रीदकर लाएगा और आधे घंटे के भीतर कविताएँ पढ़कर अपनी राय देगा.
कविराज ने आधे घंटे का वक़्त एक और पत्रिका में समकालीन कविता पर प्रकाशित एक लेख के उन अंशों को पढ़ने में बिताया, जिनमें उनकी चर्चा थी. ऐसा वह तीसरी बार कर रहे थे. मोबाइल बजते ही उन्होंने पत्रिका पटकी और कहा, ‘हाँ, बताओ.’
प्रिय शिष्य ने कहा,
‘उन कविताओं में कुछ नहीं है सर. भाषा का खेल है और कुछ नहीं.‘
यह सुनकर कविराज को राहत मिली.
‘वही तो मुझे भी लग रहा था.’
कविराज ने कहा और निश्चिंत हो गए. लेकिन वह अजानंद को मन से पूरी तरह निकाल नहीं पाए. अजानंद की भाषा उन्हें रह-रहकर परेशान कर रही थी. अगर कविराज वैसे बिंब लाए होते, तो निश्चय ही हंगामा मच गया होता. एक दिन उन्होंने अपनी डायरी निकाली और अपनी पुरानी कविताएँ पढ़नी शुरू कर दी, जिनकी एक समय ख़ूब चर्चा हुई थी. वह याद करने लगे कि इन कविताओं पर किसने क्या कहा था. अद्भुत दिन थे वे भी. वह बहुत मुश्किल से कविता लिखने के लिए समय निकाल पाते थे और लिखने बैठते तो एक के बाद एक शब्द अपने-आप आते रहते थे. जैसे कोई हाथ पकड़कर लिखवा रहा हो.
पर अब क्या हो गया है उन्हें? अब वो वाली बात क्यों नहीं आ रही कविताओं में? क्यों न कुछ दिन रुक जाएँ. कुछ समय के अंतराल से हो सकता है, कुछ हरियरी आए कविता में. लेकिन क्या करें, दबाव भी तो रहता है. किसी संपादक मित्र का फोन आ जाता था,
‘अरे भाई, आपके लिए ही अंक रुका हुआ है. कविता विशेषांक आपकी कविता के बग़ैर कैसे निकलेगा.’
कोई नई पत्रिका निकलने को होती, फटाक से फोन आ जाता, ‘आप सहयोग नहीं करेंगे तो कैसे होगा?’ कभी आकाशवाणी से तो कभी दूरदर्शन से बुलावा आता, ‘बहुत दिन हो गया. आप आए नहीं हमारे यहाँ.’
क्या करें कविराज! साहित्य-संसार में बने रहने के लिए लिखना पड़ता था. वह एक पैग बनाते और लैपटॉप खोलकर बैठ जाते. थोड़ा रस और भुने हुए काजू मुँह में जाते ही कविता बाहर आ जाती और धड़ाक से संपादक को इमेल या वाट्सऐप कर दी जाती. लेकिन नहीं…अब रुकना पड़ेगा. बदलना होगा.
कविराज को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि एक अनाम कवि ने उनका नशा तोड़ दिया है. उनका मन उखड़-उखड़ा रहने लगा. वह अपनी हाल की कविताओं को देखते और खीझ जाते थे, बल्कि जिस संग्रह पर उन्हें एक बड़ा पुरस्कार मिला था, वह उन्हें बेकार लगने लगा था. फिर कभी-कभी वह अपने आप को समझाते कि कविराज तुम क्यों परेशान हो. लोग तो तुमको महान कवि मान ही रहे हैं. दुल्हन वही जो पिया मन भाए, कवि वही जो आलोचक मन भाए. तुमको हर बड़ा आलोचक बड़ा कवि मान रहा है फिर तुम काहे दुखी हो. अब नोबेल से नीचे नहीं मानोगे क्या?
लेकिन यह अजानंद तो जैसे उनके पीछे ही पड़ गया था. हुआ यह कि एक दिन संसद में चर्चा के दौरान विपक्षी दल के एक सांसद ने अजानंद की एक कविता पढ़ दी. कविता मज़दूरों के ऊपर थी. नोएडा के मज़दूरों ने हड़ताल कर दी थी. संसद में विपक्ष ने सरकार को इस पर घेर लिया. इसी क्रम में मज़दूरों की हालत पर चर्चा करते हुए सांसद महोदय, जो प्रोफेसर भी थे, ने अजानंद की कविता सुनाई. और अगले ही दिन छात्रों के एक संगठन ने मज़दूरों के पक्ष में एक मार्च निकाला, जिसमें एक प्लेकार्ड पर अजानंद की कविता की पंक्तियाँ लिखी थीं. यह सब फेसबुक पर देखकर कविराज को झटका लगा. कभी उन्होंने भी सोचा था कि उनकी कविताएँ नारा बनेंगी. भीड़ उसे दोहराएगी. आज अगर उनकी कोई पंक्ति इस तरह तख्तियों पर होती, तो वह धन्य-धन्य हो रहे होते.
लेकिन एक ऐसा कवि छा गया था, जिसे कोई नहीं जानता था, जो फेसबुक इंस्टाग्राम और एक्स आदि पर भी नहीं था. लेकिन उसकी कविताएँ सोशल मीडिया पर दनदना रही थी. फेसबुक पर कई लोगों ने अजानंद की कविता लगा रखी थी. साहित्य ही नहीं, समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति के लोगों ने भी.
कौन है यह अजानंद?
क्या करता है? युवा है या बुज़ुर्ग? कहाँ का है?
कविराज को भी उसकी कविता लगानी पड़ी. कैसे नहीं लगाते. काफ़ी दबाव हो गया था. उनकी पीढ़ी के कवि महिपाल जी ने भी उसकी कविता लगा रखी थी. ऐसा कैसे हो सकता था कि आप मज़दूरों के आंदोलन का समर्थन करें और अजानंद की कविता न लगाएँ. वैसे मज़दूरों पर कविता तो कविराज ने भी लिखी थी, पर उनकी कोई चर्चा नहीं हुई.
कौन है यह अजानंद?
अगर वह युवा है, तो कभी न कभी तो आएगा ही उनके पास. ऐसा कौन युवा कवि है, जो कविराज के पास न आया हो. युवाओं के मेसेज से उनका इनबॉक्स भरा रहता था. आख़िर उनके पास युवाओं के तीन-तीन पुरस्कार थे. दो नामी प्रकाशक उनके चेले थे. कविराज युवा कवियों के फ्रेंड फिलॉसफर गाइड के रूप में प्रसिद्ध थे. बाहर से आने वाले युवा कवि सबसे पहले उन्हीं से मिलते थे. क्या यह सब अजानंद को पता नहीं होगा?
कहीं ऐसा तो नहीं कि अजानंद महिपाल कैंप का है? हो सकता है, महिपाल के कहने पर ही उसने कविराज पर टिप्पणी की हो. अब है तो है. क्या किया जाए? बेवकूफ़ है अजानंद, महिपाल उसे क्या दिलवा देगा?

दो)
कविराज अजानंद को भूलने की कोशिश कर रहे थे. पर अब एक अजीब बात होने लगी. जब भी कविराज कविता लिखने बैठते, उनके सामने अजानंद की कविताएँ आ खड़ी होतीं. फिर वह रुक जाते.
मुश्किल यह थी कि वह चाहकर भी यह सब किसी को बता नहीं सकते थे. लेकिन उनका चेहरा बता देता था कि कोई काँटा फँसा हुआ है. लोग समझते कि वह किसी महान रचना की प्रसव पीड़ा से ग्रस्त हैं.
‘सर आप कोई महाकाव्य तो नहीं लिख रहे?’ एक दिन प्रिय शिष्य कवि ने पूछा. वह कुछ नहीं बोले. बस मुसकुरा कर रह गए. प्रिय शिष्य कवि ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाल दी
‘जल्दी ही हिंदी को एक नया महाकाव्य मिलने वाला है. सोचिए, जब आज के समय का एक श्रेष्ठ कवि समकालीन भाषा में कोई महाकाव्य रचेगा तो वह कैसा होगा. निश्चय ही हिंदी साहित्य में एक नया क्षितिज उभरता हुआ दिखेगा.’
यह देखते ही भड़क गए कविराज. उन्होंने प्रिय शिष्य कवि की क्लास ले ली और तुरंत पोस्ट हटवाई, हालाँकि तब तक इस पर पाँच सौ लाइक आ चुके थे. कई युवा कवियों ने इसे शेयर किया था.
कौन है यह अजानंद?
इस अज्ञातकुलशील कवि ने कविराज के जीवन में हलचल मचा दी थी. वो उसे भूलना चाहते थे लेकिन भूल नहीं पा रहे थे. अब उनका काव्य लेखन पूरी तरह ठप पड़ गया था. एक अजीब-सी हताशा उनके भीतर घर करती जा रही थी. किसी चीज़ में मन नहीं लग रहा था. उन्होंने गोष्ठियों में भी जाना कम कर दिया था. कोई उनकी तारीफ़ करता तो लगता कि उनके जले पर नमक छिड़क रहा है. उन्हें अब यह पक्का यकीन हो गया था कि लोग उनके मुँह पर झूठी तारीफ़ करते हैं और पीठ पीछे निंदा करते हैं. उन्हें ज़रूर ख़राब कवि कहते होंगे. एक दिन उन्होंने प्रिय शिष्य कवि को घर बुलाकर ख़ूब शराब पिलाई और पूछा,
‘सच सच बताओ. लोग मेरे बारे में क्या बात करते हैं? मतलब मेरी कविता के बारे में?’
प्रिय शिष्य कवि इतना पी चुका था कि वह
‘भाई साहब भाई साहब बात यह कि आपकी कविता….’
कहता-कहता लुढ़क गया और फिर उसने उल्टियाँ शुरू कर दी. कविराज को जी में आया कि मार जूता के इसका पिछवाड़ा लाल कर दें. पर उन्होंने संयम रखा. कविराज की पत्नी ने अल्टीमेटम दे दिया कि आज के बाद यह आदमी घर में नहीं घुसेगा, अगर घुसा तो वह कविराज को तलाक दे देगी.
अपने बारे में जानने की कविराज की साध अधूरी रह गई. कई बार अजीब-अजीब ख़याल आने लगते. सोचते कि एक दिन भेस बदलकर किसी गोष्ठी में जाएँ और लोगों के सामने अपनी ही बुराई करें और फिर देखें कि सामने वाला क्या कहता है. उन्हें अब तक मिली सारी प्रशंसा तुच्छ और नकली लगने लगी थी. उन्हें सिर्फ़ साहित्यिक लोगों की प्रशंसा नहीं चाहिए थी, उनका सपना था कि साधारण लोग उनकी चर्चा करें. ऐसे लोग जो साहित्य नहीं पढ़ते, जिन्होंने साहित्य के नाम पर सिर्फ़ प्रेमचंद का नाम सुन रखा है या ज़्यादा से ज़्यादा दिनकर का. इस कमबख़्त अजानंद को अनेक छात्र जान रहे थे. मज़दूर जान रहे थे. संसद में उसका नाम गूँजा तो राजनेता भी जान गए कि अजानंद नाम का कोई कवि है.
कौन है यह अजानंद?
आख़िर क्या पढ़ता है? क्या उसने दुनिया भर के कवियों को पढ़ा है? आख़िर उसने ऐसी कविता कैसे संभव की? उसकी भाषा कैसे बनी? ये सवाल कविराज को परेशान करते थे. लेकिन इनके जवाब तो बस अजानंद ही दे सकता था. और अगर अजानंद इसी तरह लिखता रह गया तो वह साहित्याकाश का सूर्य बनकर उभरेगा और कविराज जैसे लोग तो उडगन भी नहीं रह पाएँगे.
यह कुछ-कुछ अंदरूनी चोट जैसा था. वह समझ नहीं पा रहे थे कि इससे कैसे उबरा जाए. वह अभी तक महिपाल को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते थे. लेकिन उनके हिसाब से महिपाल उनके सामने टिक नहीं पा रहा था. लेकिन अब अजानंद उन्हें कड़ी चुनौती दे सकता था.
वह सोशल मीडिया पर अजानंद को खोजते थे, पर वह कहीं नहीं था. उसकी कविताएँ थीं, पर वो ख़ुद कहीं नहीं था. दूसरे लोग उसकी कविताएँ लगाते थे. उसकी कविताएँ लगाने वाले लोगों से कविराज पूछते तो वह बताता कि उसे कविताएँ फलाँ के वॉल से मिली है और फलाँ को ढिकाने के वॉल से वह कविता मिली होती थी.
कविराज पत्रिकाओं, वेबसाइट, ब्लॉग आदि पर कविताएँ देखते रहते थे. एक दिन उन्हें अहसास हुआ कि अजानंद की दस कविताएँ ही इधर-उधर घूम रही हैं. यानी अजानंद ने नई कविताएँ नहीं लिखीं. मतलब साफ़ है कि झोंक में आकर उसने लिख मारी लेकिन उसमें इतना दम नहीं कि वह लिखता रहे. जोश में लिख दिया है. आगे लिखेगा, यह ज़रूरी थोड़े ही है. यह सोचकर कविराज को थोड़ा संतोष हुआ. और अजानंद नामक बीमारी से उबरने में थोड़ी मदद भी मिली. कविराज अपने काम-धाम में मन लगाने लगे. उन्होंने तय किया कि अब साहित्य से कुछ दिन दूर रहना ही ठीक है.

तीन)
कुछ समय बाद जब वह एक लघु पत्रिका के पन्ने पलट रहे थे तो एक जगह उनकी नज़र ठिठकी. अजानंद की कविताएँ छपी थीं. ये नई कविताएँ थीं. उन दस कविताओं से अलग. मतलब वह लिख रहा है. इन नई कविताओं ने उनके भीतर एक हलचल-सी पैदा की, जिसे उन्होंने दबाने की कोशिश की, लेकिन दबा नहीं पाए. उन्होंने पत्रिका के संपादक का नंबर मिला दिया.
‘हाँ सर प्रणाम.‘ संपादक ने कहा.
‘अरे भाई, आपने जो अजानंद को छापा है, वो कौन है?’
‘मुझे जानकारी नहीं है.’
‘उसने ख़ुद आपको कविताएँ भेजी थीं?’
‘नहीं सर. मजदूर मोर्चा के एक साथी हैं, उन्होंने भेजी थीं. मैं अजानंद के बारे में ज़्यादा नहीं जानता. लेकिन वो कवि बहुत अच्छे हैं.’
‘तो एक दिन आप मज़दूर मोर्चा के साथी से बात करके पता कीजिए न.’
‘कोई काम था क्या सर? …अच्छा, युवा पुरस्कार के लिए पूछ रहे होंगे. है न? मैं बताता हूँ आपको.’
युवा पुरस्कार….. अजानंद को…. नहीं नहीं वह उसे क्यों देंगे पुरस्कार. कितने प्रतिभावान युवा कवि लाइन में लगे हैं. उनको देंगे कि इस अजानंद को. कोई ज़रूरी तो नहीं कि वो युवा ही हो.
क़रीब एक हफ़्ते बाद उस लघु पत्रिका के संपादक ने फोन किया,
‘सर आप पूछ रहे थे न कवि अजानंद के बारे में. वो खोड़ा कॉलोनी में रहते हैं. यंग एज के ही हैं. नोएडा में कोई काम करते हैं. मैं आपको उनका नंबर और पता भेज रहा हूँ.’
कविराज के मोबाइल पर मेसेज की घंटी बजते ही लगा जैसे अजानंद सामने आ खड़ा हुआ हो. वह सोचने लगे, क्या ज़रूरत थी कि उसके बारे में पूछने की? वो संपादक कहीं यह बात फैला न दे कि कविराज अजानंद के बारे में पूछ रहे थे. क्या ज़रूरत थी इसे इतना महत्व देने की. इतनी गंभीरता से क्यों लिया जाए इसे?

चार)
उन दिनों कविराज एक लिटरेचर फेस्टिवल की तैयारी में लगे हुए थे. यह एक बहुभाषी आयोजन था. हिंदी से उनके अलावा बस एक कवयित्री जा रही थीं. बाकी दूसरी भाषाओं के कवि थे. कविराज सोच रहे थे कि ऐसी कविताएँ पढ़ें जिससे उनका सिक्का जम जाए. उनके पास नई कविताएँ नहीं थीं. वह बार-बार कवि सम्मेलनों में पुरानी कविताएँ ही पढ़ रहे थे. यह उनके काव्य विकास पर एक प्रश्न चिह्न था. वह सोच रहे थे कि इस बार कुछ नया लेकर जाएँ.
उन्होंने फैब इंडिया से लेटेस्ट डिजाइन का कुर्ता ख़रीद लिया था. चश्मा का फ्रेम भी नया लिया. लेकिन असली चीज़ ही तैयार नहीं थी- कविताएँ. रात में खाना खाकर लिखने बैठते लेकिन बात बनती नहीं. लिख भी लेते तो लगता अरे, ये सब तो वो पहले ही लिख चुके हैं. फिर वही दोहराव. उनके कानों में अजानंद के शब्द गूँजते-
‘आजकल दोहरा रहे हैं.’
जब वो अपनी शुरुआती कविताओं के बारे में सोचते तो उन्हें अपने पुराने दिन याद आते. वो क़स्बाई ज़िंदगी…. पिता सरकारी कार्यालय में दफ़्तरी का काम करते थे. तीन बहनें थीं, कविराज की. उनकी शादी को लेकर पिता पाई-पाई जोड़ रहे थे. दो बहनों की शादी तो किसी तरह हो गई. जब तीसरी का वक़्त आया तो पिता ने पहले कविराज की शादी करने का फ़ैसला किया. उनका कहना था कि कविराज को जो दहेज मिलेगा उसी से वे तीसरी बेटी की शादी करेंगे.
कविराज पास के एक शहर के डिग्री कॉलेज में पढ़ते थे. रोज़ साइकिल से बीस किलोमीटर पढ़ने जाते थे. पिता की माँग को स्वीकार कैसे कर सकते थे. उनके अपने सपने थे. वो बहुत कुछ करना चाहते थे. लेकिन पिता और माँ की कातरता देख परेशान थे. आख़िर उन्होंने बड़ी मुश्किल से माँ-बाप को मनाया. कविराज ने कहा कि वह ख़ुद अभी शादी नहीं कर सकते. लेकिन बहन की शादी के लिए पैसे का इंतज़ाम तो कर ही सकते हैं.
फिर शुरू हुआ उनका कड़ा संघर्ष. उन्होंने कई ट्यूशन शुरू किए. फिर कोलकाता से आई एक सर्वे कंपनी का काम पकड़ लिया. घर-घर घूमकर पता करना था कि कौन किस कंपनी की चाय पीता है. तो सुबह पाँच बजे उठते. नहा-धोकर तैयार होते और घर-घर घूमकर सर्वे करते. उसी बीच में एक-दो ट्यूशन भी पढ़ा लेते. फिर कॉलेज जाते. कॉलेज से लौटते, फिर ट्यूशन. मुश्किल से चार-पाँच घंटे सोते थे.
उस कठिन दौर में उन्होंने वे सारी कविताएँ लिखी थीं, जिन्होंने उन्हें चर्चित कर दिया था. वैसी भाषा कैसे अर्जित की उन्होंने? क्या कठिनाइयों में ही वैसी भाषा संभव होती है? भागदौड़ में, तरह-तरह के लोगों से संवाद करते हुए? धक्के खाते हुए? अवसाद में डूबते-उतराते हुए? जिंदगी की तल्ख़ सचाइयों से टकराते हुए?
अब उनका जीवन क्या रह गया है! घर, विश्वविद्यालय, आईआईसी, मंडी हाउस या विभिन्न शहरों के सेमिनार हॉल. एसी गाड़ी, होटल, एयरपोर्ट, हिल स्टेशन, विदेशों के टूरिस्ट स्पॉट– इनसे बाहर कहाँ निकल पाते हैं वह. प्रोफेसर, रजिस्ट्रार, वीसी, अफ़सर, पत्रकार, नेता – इन्हीं सब से संवाद होता रहता है. रोबोट की तरह नमस्कार करना, खिखिया कर हँसना, फूलमालाएँ पहनकर शॉल ओढ़कर फोटो खिंचवाना, सेल्फी लेना, दीप प्रज्वलित करना, आशीर्वाद देना, उपकृत होना और उपकृत करना-यही सब रह गया जीवन में.
नहीं, नहीं उन्हें इन सबसे बाहर निकलना होगा. उनकी भाषा सील गई है, उस पर फफूँद उग आए हैं. उसे खुली हवा चाहिए, धूल और धूप चाहिए, एक संघर्षशील आदमी के पसीने की गँध चाहिए. लेकिन ये सब कहाँ मिलेगा? कहाँ जाएँ वे? अपने शहर लौट नहीं सकते. ज़िंदगी भर किराये के मकान में रहे उनके माँ-बाप. उन दोनों की मौत के बाद क्या बचा! बहनें ब्याह कर अलग-अलग शहरों में चली गई. एकाध बार सोचा था कि ऐसे ही किसी गाँव में जाकर रहें कुछ दिन. पर ज्यों ही छुट्टी मिलती थी, पत्नी और बच्चे कहीं घूमने का कार्यक्रम बना चुके होते थे.
लेकिन कुछ करना होगा. अपने इस घेरे को तोड़ना होगा. कैसे तोड़ें लेकिन? कई लेखकों के बारे में उन्होंने पढ़ा था कि वे मछुआरों के साथ जाकर रहे या झुग्गी झोपड़ी के बगल में किराए पर एक कमरा ले लिया. लेकिन यह सब अब संभव नहीं था. एक तो छुट्टी मिलना ही आसान नहीं रह गया था. यूनिवर्सिटी के पचास तरह के काम रहते थे. ऊपर से बच्चों की फरमाइशें.
बेकार ही शादी की, नौकरी की. रहते निराला जी की तरह फक्कड़. ट्यूशन तो पढ़ा ही सकते थे. कुछ और छोटा-मोटा काम कर सकते थे. ये सारा जंजाल क्यों ले लिया माथे पर.
तभी इस अंधेरे में उम्मीद की किरण दिखी-खोड़ा कॉलोनी. ग़ाज़ियाबाद ज़िले की अवैध-अव्यवस्थित कॉलोनी. मेहनतकश लोगों की रिहाइश. महानगर में नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त प्रवासियों का ठिकाना. खोड़ा कॉलोनी का नाम आते ही दिल्ली और नोएडा के संभ्रांत लोगों के सामने तंग गलियों, बजबजाती नालियों का दृश्य आँखों के सामने तैर जाता और उनका ज़ायक़ा बिगड़ जाता. लेकिन कविराज की कल्पना में वह कॉलोनी एक खेत की तरह दृश्यमान हुई, जहाँ शब्दों की फ़सल लहलहा रही थी. संघर्षशील जनता के खून-पसीने से सींचा गया था वह खेत.
हाँ, अजानंद के ज़रिए वह फिर से दुख-तकलीफ़, शोषण, संघर्ष को फिर से देख सकते हैं, महसूस कर सकते हैं, वह सब कुछ जो उनसे पीछे छूट गया है. उनकी कविता को इस नई ख़ुराक की ज़रूरत है.
रविवार की एक शाम उनकी गाड़ी निकल पड़ी खोड़ा कॉलोनी की ओर. घर में बताया कि ज़रूरी काम से जा रहे हैं. वह पहली बार खोड़ा जा रहे थे. गूगल मैप में खोड़ा कॉलोनी डाल लिया था. दिल्ली की सीमा पार कर वह ग़ाज़ियाबाद की सीमा में चले आए. वह जिस सड़क से गुज़र रहे थे उसके एक हाथ पर ग़ाज़ियाबाद ज़िले की नई बसी कॉलोनियाँ थीं, तो दूसरे हाथ पर गौतम बुद्ध नगर यानी नोएडा के सेक्टर. चौड़ी सड़कें और गगनचुंबी इमारतें उनका स्वागत कर रही थीं. दोनों तरफ़ कॉरपोरेट सेक्टर के दफ़्तर थे और उनमें काम करने वालों इंजीनियरों, मैनेजरों, तकनीशियनों की रिहाइश. यह इलाक़ा बड़े-बड़े बिल्डरों का क्रीड़ांगन था. नवधनाढ्य अब इसी इलाक़े में आकर बस रहे थे क्योंकि दिल्ली में बेहद कम गुंजाइश रह गई थी.
उत्तर भारत के अनेक शहरों के राजनेता और नौकरशाह से लेकर डॉक्टर-इंजीनियर तक, ने निवेश के लिए इन इलाक़ों में फ्लैट ख़रीद रखे थे, जिनमें से ज़्यादातर पर ताले लटक रहे थे. कपड़ों, गाड़ियों के बड़े-बड़े शोरूम, बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर, अंतरराष्ट्रीय फूड ज्वाइंट्स, पब और कैफ़े यहाँ चमचमा रहे थे. ओला और उबर की कारें और बाइक इधर से उधर दौड़ती रहती थीं. सूर्योदय होते ही असंख्य डिलीवरी ब्वॉय अपनी मोटरसाइकिल पर बड़े-बड़े थैले लादे फ्लैटों में सामान की डिलीवरी शुरू कर देते. और उसी के साथ खाने की डिलीवरी भी शुरू हो जाती. अब इन नई सोसाइटियों के घरों में खाना कम ही बनता था. सब कुछ बाहर से आता था. इन्हीं इलाक़ों को दिखाकर प्रदेश सरकार अपनी पीठ थपथपाती और कहती कि राज्य का कितना विकास किया है उसने.
इन्हीं के बीच एक बदनुमा दाग़ की तरह थी खोड़ा कॉलोनी. वहाँ से अकसर सीवर में किसी बच्चे के डूब जाने, सड़क पर जमे पानी में करंट आने से किसी के मरने, हैजा या पीलिया फैलने की ख़बरें आया करती थीं. उसे अपराधियों की शरणस्थली भी बताया जाता था. आए दिन पुलिस के छापा मारने और किसी कुख्यात गैंग के सदस्य या पाकिस्तानी जासूस के पकड़े जाने की बात भी मीडिया में बताई जाती थी.
कविराज को अचानक ख़याल आया कि अजानंद को अपने आने की सूचना दे देनी चाहिए. पता चला कि वह घर पर है ही नहीं, फिर उनका आना व्यर्थ हो जाएगा. उन्होंने गाड़ी रोकी और अजानंद को फोन मिलाया. हालाँकि उन्हें थोड़ा संकोच हो रहा था, पर क्या करते.
कविराज ने फोन मिलाकर जब अपना परिचय दिया तो क्षण भर के लिए एक सन्नाटा-सा छा गया. फिर उधर के साँसों के उतार-चढ़ाव से कविराज को महसूस हुआ कि अजानंद को शायद विश्वास नहीं हो रहा है. उन्होंने थोड़ा ज़ोर से कहा,
‘मैं इधर ही आया था तो सोचा आपसे मिलता चलूँ.’
‘हाँ-हाँ आइए न सर….’ लगा जैसे अजानंद ने एक-दो बार थूक घोंटते हुए कहा है.
‘आपका पता यही है न …महतो जी का मकान, गली नंबर 3, प्रभात विहार?’
‘हाँ सर, गली नंबर 3 के एकदम लास्ट में. थर्ड फ्लोर पर है. पूछ लीजिएगा, महतो जी का मकान.’
इस बार अजानंद की आवाज़ थोड़ी सामान्य लगी.
आवाज़ से लग रहा था कि यही कोई 27-28 साल उमर होगी.
अजानंद क्या करता होगा? छात्र तो नहीं होगा. हो सकता है, छोटा-मोटा कोई काम करता हो. यहाँ तो ज़्यादातर साहिबाबाद और नोएडा के कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूर रहते हैं. तो क्या वह भी मज़दूर होगा? कितना पढ़ा-लिखा है वह? एक मज़दूर की इतनी अच्छी भाषा! कहाँ से पढ़ाई की होगी उसने? हो सकता है उसके पिता मज़दूर हों, वह पढ़ रहा हो कहीं.
लेकिन वह अजानंद से क्या बात करेंगे?… वह उनसे नहीं खुला तो? उन्हें जुड़ना होगा उससे. दोस्त बनाना होगा उसे. तभी उसकी और उसके जैसे लोगों की ज़िंदगी के बारे में जान पाएँगे. यह एक प्रयोग होगा. इसके बारे में सोचकर कविराज थोड़ा रोमांचित हुए.
खोड़ा कॉलोनी के मुँह के पास आकर उन्होंने गाड़ी रोकी. अब इसके अंदर घुसना था. चौड़ी-चमचमाती हाईवे से एक खस्ताहाल सड़क पर उतरना था.
एक प्रवेश द्वार जैसा बना था जिस पर खोड़ा कॉलोनी लिखा था. ढेर सारे बैनर उससे लटक रहे थे. प्रवेश द्वार के दोनों तरफ़ ठेलों पर कहीं चाऊमीन तो कहीं जलेबियाँ बिक रही थीं. एक-दो चाय की भी टपरी थी, जहाँ लोग जमा थे. एक जगह एक इटालियन सैलून (जहाँ ईंटों पर बैठकर बाल बनवाए जाते थे) भी था.
ढेर सारे ई-रिक्शा खड़े थे. गाड़ी मोड़ते हुए कविराज घबराए कि कहीं कोई ई-रिक्शा उनकी गाड़ी से टकरा न जाए. उनकी गाड़ी नई थी और अभी तक उस पर कोई स्क्रैच नहीं लगा था. इसलिए उन्होंने काफ़ी सँभाल कर टर्न लिया और अंदर दाख़िल हुए. कुछ दूर सड़क ठीक थी, पर थोड़ी देर बाद ‘खरर-मरर’ की आवाज़ आने लगी. सड़क टूटी हुई थी. बीच-बीच में गड्ढा भी आ रहा था. गाड़ी अजीब ढंग से हिचकोले खाने लगी थी. रिक्शा, साइकिल, स्कूटर, ऑटो के रेले के साथ उन्हें धीरे-धीरे चलना पड़ रहा था. पैदल लोग भी इधर से उधर चल रहे थे. कोई साइकिल वाला अचानक सड़क पार करने लगता था.
मुख्य सड़क के हर थोड़ी दूर पर दोनों तरफ़ गलियाँ निकल रही थीं. फुटपाथ जैसी कोई चीज़ नहीं थी. सड़क और दुकानों के बीच की कुछ जगहों पर भी कुछ न कुछ बेचा जा रहा था. एक जगह लोहे के सामान बिक रहे थे- खुरपी, फावड़ा, चूल्हे, कड़ाही वग़ैरह. उससे थोड़ा आगे एक बड़ी सी टोकरी में मछलियाँ लिए एक औरत बैठी थी. एक बड़ा सा हंडा चढ़ाए रँगरेज बैठा था. एक कुर्सी टेबल लगाए घड़ीसाज काम कर रहा था.
सड़क के दोनों तरफ़ माचिस की डिब्बियों की तरह मकान थे. उनकी खिड़कियों से सटकर तारों का संजाल गया हुआ था. मोटे-पतले अनेक तरह के तार. तभी सड़क पर कहीं से एक सांड निकल आया और वह भी लोगों के साथ चलने लगा. लोग इधर-उधर भागे. कविराज ने गाड़ी रोक दी. थोड़ी देर बाद सांड किसी गली में घुस गया. कविराज ने एक दुकान वाले से पूछा कि प्रभात विहार किधर है. उसने ऊंगली के इशारे से बताया.
उस व्यक्ति की बताई दिशा में वह जिधर मुड़े उधर सड़क संकरी हो गई थी. अब इसमें उनकी बड़ी गाड़ी का घुसना मुश्किल था. अगर वह उसमें गाड़ी लेकर घुसे और दूसरी ओर से कोई गाड़ी आ गई तो समस्या खड़ी हो सकती थी. ऐसा नहीं भी हुआ और अगर आगे मोड़ने की जगह नहीं मिली, तो ख़ुद उनका लौटना मुश्किल हो सकता था. अब वह थोड़ा घबराए. लगा कि ग़लत निर्णय ले लिया. गाड़ी कहीं बाहर हाइवे पर लगा देनी चाहिए थी. उन्होंने गाड़ी रोकी तो पीछे से अचानक दो तीन स्कूटर वालों ने हॉर्न बजाना शुरू कर दिया. फिर उन्होंने किसी तरह उन्हें साइड दिया.
अब गाड़ी यहीं कहीं रोक देनी चाहिए. वह बाहर निकले और पंचर बना रहे एक नौजवान से पूछा कि क्या गाड़ी आगे जा सकती है? उसने पूछा,
‘आपको कहाँ जाना है?’
‘प्रभात विहार, गली नंबर तीन.’
कविराज ने कहा तो पंचर वाले नौजवान ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा, फिर बोला,
‘गाड़ी चली तो जाएगी, वैसे आप यहीं लगा दीजिए. थोड़ा बैक करके राइट ले लीजिए. एक मैदान आएगा, उसमें लगा दीजिए.’
कविराज जब मैदान में पहुँचे तो देखा कि एक ओर भैंसें बैठी थी और उनसे थोड़ा हटकर कुछ कुत्ते सोये हुए थे. कुछ लड़के ईंट का विकेट बनाकर क्रिकेट खेल रहे थे. मैदान के दूसरे कोने पर एक तंबू लगा हुआ था जिस पर लिखा था-हिमालय शक्ति दवाखाना. वहीं थोड़ी दूर पर एक दीवार से सटकर कुछ बड़े लड़के ताश खेल रहे थे. एक लड़का वहीं सिगरेट में कुछ भर रह रहा था-शायद गांजा. गाड़ी लगाकर कविराज ने इधर-उधर आशंका से देखा. वह आश्वस्त नहीं हो पा रहे थे कि यहाँ गाड़ी सुरक्षित रहेगी या नहीं. कहीं उन लड़कों ने शीशा वगैरह तोड़ दिया या हवा निकाल दी तो भारी झंझट खड़ा हो जाएगा.
‘अब क्या किया जा सकता है? जो होगा, देखा जाएगा.’
कविराज किसी तरह अपने को समझाते हुए बाहर निकले. फिर प्रभात विहार की तरफ बढ़े. वह मकानों को देख रहे थे. कई मकानों में पलस्तर भी नहीं था या उखड़ चुका था. उनकी दीवारों पर काई जमी हुई थी. सोच रहे थे यहाँ पता नहीं सूरज की रोशनी कितनी देर आती होगी. गलियों में बढ़ते हुए उन्हें लग रहा था जैसे किसी सुरंग में चल रहे हों.
फिर अचानक वह ठिठके. सामने मटमैला-हरा पानी जमा हुआ था. उन्होंने अनुमान लगाया घुटने से कम पानी नहीं होगा. अब बढ़ें तो कैसे. अगल-बगल के मकानों से ठीक सटी हुई नालियाँ स्लैब से ढकी हुई थीं. वह उन्हीं स्लैब पर चलते हुए दीवार पकड़कर आगे बढ़े, सोचा पानी में उतरने से बच जाएँगे. लेकिन तभी सामने एक विचित्र दृश्य दिखा. दो स्लैब की जगह खाली थी यानी दोनों स्लैब टूट गए होंगे या उन्हें हटाया गया होगा या किसी ने चुरा लिया होगा. नाली में मल की धारा बह रही थी. एक भभका उठा. लगा जैसे सारा खाया-पिया यहीं निकल जाएगा. तुरंत रूमाल निकाला और नाक पर रखा और आँख मूँदकर नीचे उतरे. फिर एक-दो क़दम पानी में चले. तभी लगा कि गाल पर कुछ चुभा हो. उन्होंने अपने गाल पर हल्की चपत लगाई तो एक बड़ा मच्छर ऊंगली पर चिपक गया. इतना लंबा मच्छर… बिल्कुल हेलीकॉप्टर जैसा. अरे यह तो बहुत ख़तरनाक होगा. बीमारी वाला मच्छर होगा. बाप रे…. इसने काट लिया है, अब पता नहीं क्या होगा?
वह रुआँसे हो गए. समझ में नहीं आ रहा था क्या करें. अभी तो पहली गली में ही हैं. दो गलियाँ अभी बाक़ी है. आगे न जाने क्या होगा.
तभी उनका मोबाइल बजा. वह थोड़ा पीछे हटे, एक स्लैब पर खड़े हुए और मोबाइल निकाला. महिपाल का फोन था. उनके हैलो कहते ही महिपाल ने कहा,
‘अरे भाई साहब कहाँ हैं?’
अब कविराज क्या बताएँ कि कहाँ हैं. उन्होंने थोड़ा झेंपते हुए कहा,
‘बस ऐसे ही कहीं.’
‘आ रहे हैं न?’
‘कहाँ?’
‘अरे भूल गए क्या आप? मैंने आपको कार्ड वाट्सऐप तो किया था.’
कविराज के कुछ क्षण चुप रहने पर महिपाल ने कहा,
‘हमारे नए प्लैट का गृह प्रवेश है आज. नोएडा सेक्टर-62 में. खाने पर आना है भाई. सारा हिंदी साहित्य जमा हो चुका है. आपका ही इंतज़ार हो रहा है. जल्दी आइए… मैं मैप भेज रहा हूँ.’
‘सॉरी सॉरी, अरे डेट को लेकर थोड़ा कन्फ्यूजन था. मैं आता हूँ, मैं आता हूँ.’
कविराज के भीतर एक फुरहरी आ गई. वह जैसे आए थे वैसे ही तेज़ी से लौटने लगे. गली से निकलकर लगभग दौड़ते हुए मैदान में पहुँचे. गाड़ी सुरक्षित थी. उन्होंने जल्दी से उसे स्टार्ट किया और चल पड़े. कुछ ही आगे गए होंगे कि उनका मोबाइल बजा. उन्हें लगा महिपाल ने फिर फोन किया है. उन्होंने देखा तो अजानंद का फोन था. अब इसे क्या कहें? फोन उठाने का कोई फ़ायदा नहीं. मोबाइल बजकर चुप हो गया.
सड़क पर भीड़ बढ़ गई थी. गाड़ी बहुत धीरे-धीरे चल पा रही थी. कविराज खीझ रहे थे. वह बार-बार और तेज़ हॉर्न बजा रहे थे. लोग उनकी गाड़ी को घूम-घूमकर देख रहे थे. उन्हें लग रहा था कि किसी तरह उड़ा कर ले चलें और नोएडा पहुँच जाएँ.
एक बार फिर अजानंद का फोन आया. इस बार कविराज ने हाथ बढ़ाकर फोन काट दिया.
अब उनकी गाड़ी हाईवे पर चढ़ चुकी थी.
संजय कुंदन जन्म : 7 दिसम्बर, 1969
प्रकाशित कृतियाँ : कागज के प्रदेश में, चुप्पी का शोर, योजनाओं का शहर, तनी हुई रस्सी पर (कविता संग्रह), बॉस की पार्टी, श्यामलाल का अकेलापन (कहानी संग्रह), टूटने के बाद, तीन ताल (उपन्यास), पत्रों में सेजाँ (अनुवाद). आदि पुरस्कार : भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार, हेमन्त स्मृति सम्मान और विद्यापति पुरस्कार. |

जन्म : 7 दिसम्बर, 1969



कितने ही कवियों से मिलकर बना यह कविराज एक आईना है जिसमें कितने कविराज हुए अजानंद खुद को ढूंढ सकते है।..बढ़िया कहानी है…खूब।
संजय कुंदन की कहानी ‘कविराज’ समकालीन हिंदी साहित्य के अंतर्विरोधों, अकादमिक पाखंड और तथाकथित ‘जनपक्षधर’ रचनाकारों के वर्ग-चरित्र पर बेहद चुटीला और निर्मम व्यंग्य करती है। यह केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि हिंदी के उस साहित्यिक-अकादमिक इकोसिस्टम का आईना है जहाँ कविता शोषितों की लिखी जाती है, मगर उसकी मलाई संभ्रांत ड्राइंग-रूमों और सेमिनारों में छानी जाती है।
कहानी का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वह यात्रा है जहाँ कविराज अपनी मृतप्राय कविता के लिए ‘नई ख़ुराक’ तलाशने अपनी गाड़ी से खोड़ा कॉलोनी की ओर निकलते हैं। लेखक ने यहाँ भूगोल का शानदार द्वंद्व रचा है—एक तरफ चमचमाती सड़कें, गगनचुंबी इमारतें और मॉल, तो दूसरी तरफ बजबजाती नालियों, अवैध बस्तियों और अभावों से भरी ‘खोड़ा कॉलोनी’। कविराज के लिए जनता का दुख दरअसल एक ‘खेत’ है जहाँ से वे अपनी कविता के लिए शब्दों की फ़सल काटना चाहते हैं।
संजय कुंदन ने इस कहानी में किसी पात्र को खलनायक बनाने के बजाय उसके भीतर के संशय, अपराध-बोध और अंततः उसकी वर्गगत विवशता को जिस सहजता से दर्ज किया है, वह इसे पठनीय और विचारणीय बनाती है। भाषा में कोई भारी-भरकम लफ्फाजी नहीं है, लेकिन व्यंग्य इतना गहरा है कि हिंदी के कई ‘स्टार कवियों’ को इसमें अपना चेहरा साफ़ दिखाई दे सकता है। यह कहानी आज के दौर में रचना और रचनाकार के बीच बढ़ते नैतिक अंतराल का बहुत प्रामाणिक आख्यान है।
एक सांस में पढ़ गया। बहुत अच्छी कहानी।
हिंदी के तथाकथित बड़े कवियों की केमिस्ट्री, फिज़िक्स और मेथमेटिक्स को एक जगह उद्घाटित करती रोचक कहानी। अजानंदों को इस कहानी से सीखना चाहिए ताकि वे कविराज बनने से बच सकें।
अच्छी सधी हुई कहानी 🍃 डिटेलिंग काफ़ी रोचक 🍃 आह रे बिचारा कविराज 🍃
बहुत अच्छी और सार्थक कहानी। इस तरह की सहज मगर प्रासंगिक कहानी कोई तभी लिख सकता है, जब वह अपने समय के मर्म से,परिवेश के आरोह अवरोह से,धूल धूसरित होती जिंदगी की चोट से गहरे तक जुड़ा हो।संजय कुंदन जी को और समालोचन को इतनी अच्छी रचना प्रकाशित करने के लिए आभार।
कहानी धीरे-धीरे गति पकड़ती है। अनेक जगहों पर वर्णन प्रभावशाली है। अशमित महत्वाकांक्षा से प्रसूत दुविधा, संशय और बेचैनी इसे दिलचस्प बना देती है। जहाँ जीवन अनुभव हाथ से छूट रहे हैंं- उनके अभाव ने अजीब साँसत में डाल दिया है।
कमाल की कहानी है. मैंने देखा है ऐसे कई ‘कविराज’ को. जिसे देखो सब शिष्य बनाने को आतुर दिखाई देते हैं. कई तो ऐसे हैं जो ‘अजानंद’ के विरुद्ध अभियान भी चला देते हैं. अफ़वाह उड़ा देते हैं.
लेखक को बहुत बहुत बधाई साहित्य समाज के दोहरे चरित्र को उजागर करने के लिए.
अद्भुत
अच्छी कहानी लगी।
आम से खास और खास से आम होने की छटपटाहट लिए यह कहानी बहुत सुंदर बन पड़ी है।
छोटे से बड़ा होता साहित्यकार किस प्रकार सामान्य जीवन से दूर हो जाता है, उसके साहित्यिक तरकश से तीर कैसे ग़ायब हो जाते हैं और कैसे वह अपने पूर्व के कस्बाई जीवन को भूल कर अपने नथुनों पर रुमाल रखने लगता है, इन सबको बहुत सुंदर ढंग से पिरोया गया है।
कहानी पढ़ते हुए पाठक के तौर पर कविराज की तरह ‘अजानन्द’ को जानने की छटपटाहट ख़ुद भी बनी रहती है, कि आख़िर कौन है अजानंद?
साथ ही, एक वाक्य (अब ये अपने को दोहराए जा रहे हैं.) किसी व्यक्ति को कितना परेशान कर सकता है, यह भी इस कहानी ने बहुत अच्छे तरीके से व्यक्त किया है। आज की तमाम मनोवैज्ञानिक समस्याओं के बीच कविराज और उनकी अजानंद सम्बन्धी उलझन को रखकर इसे समझा जा सकता है।
शिल्प के भूल भुलैयों से निस्पृह रहते सचाई की खोज की सीधी राह पर चलती हुई कहानी। ऐसी कहानियों की यात्रा अधिक लंबी,सार्थक और रोमांचक हो सकती है। संजय कुंदन और समालोचन को बधाई।
वाह क्या ही अच्छी कहानी है। हिंदी की पावर-डायनेमिक्स, मठाधीश प्रथा और बनावटी चमक-दमक का अत्यंत सटीक और गहन चित्रण।
दरअसल यह व्यक्ति के प्रवृत्ति बन जाने की कहानी है। कामयाबी मिलते ही कवि से छवि बन जाने की प्रवृत्ति। एक ऐसी प्रवृत्ति जो कवि को जमीन से उखाड़क्रर किसी कोठी के गमले में सजा देती है। चेले, चाटुकार, लाभार्थी, यशाकांक्षी लोग गमले में खाद पानी डालते रहते हैं। छवि की दमक बढ़ती रहती है, लेकिन कवि को एक दिन अहसास हो ही जाता है कि वह कवि नहीं छवि बनकर रह गया है। एक गुमनाम युवा कवि उस छवि पर खरोंच मार सकता है। उसे समझ में आ जाता है कि कविता के स्रोत वह पीछे छोड़ आया है। उसकी तलाश में निकलता भी है, लेकिन वहां का रास्ता अत्यंत सँकरा है और उधर छवि पर खरोंच आने का खतरा भी है। सँकरी गली में कवि और छवि का द्वंद्व कुछ देर चलता है पर अंततः छवि को बच निकलने का अवसर मिल ही जाता है। कामयाबी का हाईवे मिलते ही कवि से छवि बन जामे की यह प्रवृत्ति हमारे साहित्य समाज में इतनी व्यापक और संक्रामक है कि कल किसी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर, किसी पत्रिका का संपादक, किसी सरकारी-गैरसरकारी संस्थान में अफसर बनते ही अजानंद भी कविराज बन जाएं तो ताज्जुब नहीं होगा। संजय कुंदन ने बहुत प्रभावी ढंग से सहज शिल्प में इस प्रवृत्ति को अनावृत किया है।
अब संजय कुन्दन जी अपने को दोहराए जा रहे हैं. बीस साल पहले इन्होंने ज़रूर कुछ अच्छी कहानियाँ लिखी थीं.
वाह, संजय जी! छा गए! कहानी कहीँ अटकती और अटकाती नहीं है। सबसे बड़ी बात कि ऐसी कहानियाँ आम तौर पर किसी चिह्नित किये जाने योग्य परिचित को लेकर होती हैं, लेकिन यहाँ साहित्यिक दुनिया का जानकार पाठक भी किसी व्यक्ति चिह्नित नहीं कर सकता। अच्छी कहानी के लिए मेरा साधुवाद लीजिए!
एक बार में पढ़ गई । के दोहरे मापदंड को उजागर करती कहानी के लिए संजय कुंदन आपको बधाई।