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समालोचन

Home » कैफ़ी हाशमी की लम्बी कहानी चाबी

कैफ़ी हाशमी की लम्बी कहानी चाबी

by arun dev
April 20, 2026
in कथा
Reading Time: 13 mins read
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कैफ़ी हाशमी की लम्बी कहानी चाबी
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कैफ़ी हाशमी की लम्बी कहानी चाबी

 

“हमारे समय का अभिशाप कई प्रेम-संबंधों का होना नहीं है बल्कि कई सारे लोन का होना है. यह आपको अंदर तक तोड़ देता है.”

 

तुम्हारे मन में ये पंक्तियाँ घूम रही थीं और अपने नोकदार किनारों से तुम्हारे सिर को कुरेदने लगीं कि तभी तुम्हारा ध्यान भटका और मस्जिद में तक़रीर के रूप में गूँजने वाली इमाम साहब की बातें तुम्हें सुनाई पड़ने लगीं –

“ए ईमानवालों, उस दिन से डरो जिस दिन तुम्हारी रूह तुम्हारे बदन से निकाली जाएगी. मुलुक-उल-मौत फ़रिश्ता इस काम को अंजाम देगा. तुम्हें दफ़नाने के बाद जब तुम्हारे अपने क़ब्रिस्तान से लौट जाएँगे तब बरजख़ में मुनकर और नकीर अपने दाँतों से तुम्हारी कब्र की मिट्टी खोदेंगे और तुमसे तीन सवाल करेंगे. उनके चेहरे पर ऐसा ख़ौफ़ज़दा मंज़र पसरा होगा कि उनके सामने वही मज़बूती से खड़ा हो पाएगा जो ईमान वाला होगा. जिसने अपनी ज़िंदगी अल्लाह की इबादत के नाम की होगी. मुनकर और नकीर पूछेंगें, तेरा रब कौन है? तेरा दीन क्या है? तेरा पैगंबर कौन है? उन दोनों फ़रिश्तों के सवालों का जवाब वही अल्लाह का बंदा दे पाएगा जिसका ईमान सच्चा होगा. वो नेक रूह जो अल्लाह को प्यारी होगी उसकी ज़बान से ख़ुद-ब-ख़ुद सही जवाब निकल पड़ेंगें. वह चीख-चीख कर कहेगा, मेरा रब अल्लाह है. मेरा दीन इस्लाम है और मेरे पैगंबर मोहम्मद सल्ललाहोलिहेवसल्लम हैं.”

यह तक़रीर सुन कर तुम्हारे दाएँ हाथ की उँगलियाँ तुम्हारी जींस की दाईं जेब के ऊपर उभरी आकृति को टटोलने लगी. वह सिर्फ़ एक चाबी है. तुम्हारे फ्लैट की चाबी. वह काली जींस के मोटे कपड़े पर अपनी संरचना को पुख्ता ढंग से उभारे हुए तुम्हें अपने होने का अहसास करा रही थी. उस धातु के घुमावदार किनारे से तुम्हारी जींस की सतह तनकर चिकनी हो गई थी.

तुम अपनी सफ़ से उठ खड़े हुए और शुरू हो चुके खुतबे को बीच में ही छोड़कर मस्जिद से बाहर निकल आए. खुतबे को सुन रही और सुनने का अभिनय कर रही आँखें तुम्हें हिकारत और हैरानी से घूर रही थीं लेकिन तुम चाबी के उभार पर अपनी उँगलियाँ मज़बूती से गड़ाए, मस्जिद से इस फुर्ती से बाहर निकले, जितनी फुर्ती से लोग अपने साथ बीते अच्छे वक़्त को भूल जाते हैं.

तुम बीच सड़क पर खड़े होकर, अपनी जेब से चाबी निकाल, एकटकी लगाए चाबी को देख रहे हो. तुम्हारे पीछे एक महिंद्रा थार खड़ी हो गई जो तुम्हें हॉर्न बजाकर हटने का इशारा कर रही है. घुटने तक गिर रही अपनी लंबी दाढ़ी को मुट्ठी में थामें एक बुज़ुर्ग तुम्हारे कंधे पर हाथ रखकर कहता है, “जनाब, अब एहतिहातन सड़क पर नमाज़ नहीं होती है. अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो यहाँ से हट जाइए.” संगमरमर जितना सफेदपोश दिख रहे उस बुज़ुर्ग के अंदर से आ रही इत्र की ख़ुशबू भी तुम्हारा ध्यान अपनी ओर खींच नहीं पाई. “अंदर चलिए.” कहकर वह बुज़ुर्ग आगे बढ़ गया. तुम्हारे पीछे खड़ी थार से लगातार आ रही हॉर्न की आवाज़ आस-पास से गुज़र रहे नमाज़ियों को तंग करने लगी है.

रास्ता संकरा है और थार के दोनों तरफ़ पटरी पर दुकान लगा कर टोपी, इत्र और इस्लामी तालीम से जुड़ी अरबी-उर्दू ज़बान की किताबें बेचने वाले दुकानदार, नमाज़ के बाद होने वाली खरीदारी के ख्याल में गुम हैं. बिना मूँछों वाला एक भारी-भरकम आदमी, जो अपनी काँख में जानमाज़ दबाए मस्जिद में घुसने की तैयारी कर रहा है अचानक से भीड़ को तितर-बितर करता हुआ धमकता है और तुम्हारी तरफ़ देखकर चिल्ला उठता है, “हराम के पिल्ले! रस्ता खाली कर. वरना यहीं गाड़ दूँगा.“ उसकी आवाज़ तुम्हारे कानों तक जाने से पहले ही थार के हॉर्न से आ रही आवाज़ में घुल गई है. वह चाहे तो इसी क्षण तुम्हारे गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर सकता है. लेकिन उसने अपने ज़बान गंदी करके दमख़म के साथ एक गाली अपने मुँह से निकाली और मस्जिद के दरवाज़े की तरफ़ बढ़ गया क्योंकि उसे नमाज़ छूट जाने का डर है.

तुम अपने आगे और पीछे गाड़ियों का जाम लगा चुके हो. राहगीर और नमाज़ी तुम्हें देखकर चिल्ला रहे हैं. कई साल हिजरत में काटने के बाद जब एक आशिक़ का निकाह उसकी माशूका से हो जाए और वह पहली रात बिस्तर पर बैठकर, अपनी मोहब्बत को प्यार से देख रहा हो, तुम चाबी को उतना ही मग्न होकर देख रहे हो. इस क्षण तुम अपने आस-पास तैर रहे यथार्थ से इस तरह कट चुके हो कि तुम्हारे दिमाग़ में चल रही खुमारी ही तुम्हें सच लग रही है. तुम चहक कर कहते हो, “यह एक चाबी है जो ऐसी खोई की फिर मिली नहीं और ऐसी मिली कि फिर कभी खो न सकी.” अपने मुँह से निकले इस वाक्य पर ध्यान दो. वाक्यों में आने वाले विरोधाभास तुम्हें सुनने में कितने अच्छे लगते हैं! लेकिन जब जीवन के विरोधाभासों से तुम्हारा सामना होता है तब तुम आलंकारिक शब्दों के रूमान से बाहर निकल कर एक सीधा और सरल जीवन जीने की कामना करने लगते हो.

मस्जिद की घड़ी में काँटे डेढ़ बजा चुके हैं और जुमे की नमाज़ अदा करने के लिए जमात खड़ी हो चुकी है. थार में बैठे दोनों हट्टे-कट्टे मुस्टंडे अपनी गाड़ी की डिग्गी से हॉकी स्टिक निकाल लाते हैं और तुम्हारे सिर, पीठ और घुटने पर इतनी तेज़ चोट करते हैं कि तुम लड़खड़ा कर गिर जाते हो ठीक उसी समय सजदे में बैठे नमाज़ी दूसरी रकात के लिए खड़े होते हैं.

तुम गिर चुके हो, तुम्हारी आँखें बंद हैं और तुम्हारी बंद आँखों के सामने छह साल पुराने वे दिन चल रहे हैं जब तुम एक आईटी कंपनी में सॉफ्टवेर डेवलपर के तौर पर काम करते थे.

 

By Gabriel Sanchez, Lavando (Washing), 2025

2

ऑफिस से कुछ दूरी पर दिल्ली के जसोला विहार इलाके में तुम फ्लैट में रहते हो. यह पीछे बसे शाहीन बाग़ और बटला हाउस की तुलना में एक खूबसूरत सोसाइटी है. खुले-खुले घर, पार्किंग स्पेस, साफ़-सुथरी सड़क, हर इमारत के सामने एक पार्क जिसमें सागौन और अशोक के पेड़ एक क़तार में हैं.

अपनी आधी तनख़्वाह होम लोन की किश्त में चुकाते हुए तुम बीते तीन साल से इस फ्लैट में रह रहे हो और हर साल तुमने अनुभव किया है कि सितंबर के महीने में सागौन और अशोक के पेड़ से निकलने वाली गीली खुशबू से भारी हो चुकी हवा तुम्हारी बालकनी में तैरती रहती है.

सितंबर का ज़िक्र इसलिए क्योंकि आज सितंबर की आम-सी शाम है जब तुम्हारे जन्मदिन की पूर्व संध्या पर तुम उस दिन से भी ज़्यादा अकेला महसूस कर रहे हो जितना तुमने अपनी ऑफिस की पिछली न्यू ईयर पार्टी पर महसूस किया था. तुमने ऑफिस के सारे काम आज वक़्त से पहले ही निबटा लिए हैं. लैपटॉप की डिस्प्ले स्क्रीन गिराने के बाद अब तुम बिलकुल ख़ाली हो चुके हो. तुम्हारे पास करने के लिए कुछ नहीं है. कुछ देर तुमने फ़ेसबुक चलाया, फिर लिंक्डइन और अब इंस्टा रील्स स्क्रॉल करते-करते थक गए हो. तुम चाहते हो कि कोई सच में यहाँ हो जो तुमसे बात कर सके. तुम्हें सुने.

तुम अपने आई फ़ोन, जिसकी नौ किश्त अभी बची हुई है, के ऐप स्टोर पर Buddy टाइप करते हो. सबसे पहले जो विकल्प पॉप-अप होता है वह है – BuddyAtDoor. तुम ऐप में अपना खाता बनाते हो, ज़रूरी जानकारी फीड करते हो, और आज रात के लिए 9 बजे का स्लॉट बुक करते हो.

अब ऐप की तरफ़ से दो लोग तुमसे बात करने आएँगें; दिल से दिल की बातें; जिससे तुम्हारा अकेलापन कुछ कम हो सकेगा. भुगतान हो जाने के बाद जिन दो लोगों की जानकारी स्क्रीन पर फ़्लैश हो रही है उनका प्रोफाइल नाम ‘जिगरी’ और ‘मित्तर’ है.

तुम्हारा बैंक अकाउंट होम लोन, कार लोन के साथ-साथ फ़ोन की किश्त और क्रेडिट कार्ड के बिल पूरी तरह चुकाने से पहले ही, महीने की 17 तारीख़ को खाली हो चुका है लेकिन तुम उन दोनों से बात करने के लिए इतना ख़ुश हो कि उन्हें कहीं से भी कमतर अनुभव नहीं कराना चाहते. तुम उनके लिए बेहतर से बेहतर मेहमाननवाज़ी की मिसाल पेश करना चाहते हो इसलिए तुमने एक इंस्टेंट पर्सनल लोन देने वाले ऐप से दस हज़ार रुपए लोन पर ले लिए हैं. तुम दोनों की फ़ूड प्रेफ़्रेंस ऐप पर चेक करते हो. यह तसल्ली हो जाने के बाद कि दोनों मटन खाते हैं, तुम बाज़ार से जाकर मटन लाते हो.

वे जब तक आएँ तब तक रात के सवा नौ बज चुके हैं. तुम पके हुए चावल और गोश्त की तीन तहें लगाने के बाद, चावलों के बीच लंबे-लंबे गड्ढे बना कर, घी और हल्का केसरी रंग, पतीली के नीचे बैठे आख़िरी चावल तक पहुँचा चुके हो. तुमने पतीली के ढक्कन के ऊपर भारी-भरकम कूकर रखा ताकि बिरयानी अच्छे से दम हो सके. चूल्हा जलाया और पंद्रह मिनट पूरा होने का इंतज़ार करते हुए जिगरी और मित्तर से बातें करने लगे.

जिगरी और मित्तर, तुम्हारी ही तरह बिरयानी के दीवाने निकले.

तुमने मित्तर से उसका वास्तविक नाम जानाना चाहा लेकिन उसने ऐप के प्राइवेसी नियमों का हवाला देते हुए बताने से मना कर दिया. उसने पानी पीने के बाद अपने हाथ में पकड़े गिलास को मेज़ पर रखा और गले की खिचखिच दूर करते हुए बोला, “ब्रो, मैं तुम्हें अपना नाम तो नहीं बता सकता, यह ऐप की पॉलिसी के ख़िलाफ़ है लेकिन मैं तुम्हें अपने बारे में दिल खोल के बता सकता हूँ. आख़िर इसीलिए तो हम यहाँ आए हैं, तुमसे बात करने के लिए. मैं न भाई, एक कंटेंट क्रिएटर हूँ, और आज अपने इंस्टा पेज पर लाइव आने वाला था लेकिन ‘बडी ऐट डोर’ ऐप पर तुम्हारी बुकिंग शो हुई तो मैंने लाइव आने का प्लान कैंसिल कर दिया.”

उसकी बातों से तुम्हें अंदाज़ा हुआ कि वह अपने इंस्टा पेज के प्रदर्शन से बहुत खुश नहीं है. वह कॉर्पोरेट में, पिछले एक साल से हर दिन, आठ घंटे, मिड लेवल की जॉब को देने के बाद ‘टेक एक्सपर्ट’ के नाम से सोशल मीडिया पर पेज चला रहा है. लेकिन हाई क्वालिटी रील्स और वीडियो बनाने के बावजूद उसके पेज की व्यूअरशिप और सब्सक्राइब्रों की संख्या में कोई खास इज़ाफ़ा नहीं हो रहा है. उसने तुम्हें अपना इंस्टा पेज दिखाते हुए कहा, “यार! कई बार इंस्टाग्राम का पेड एडवर्टाइजमेंट प्लान ले चुका हूँ लेकिन इंस्टा चाहता है कि हर रील्स पर पैसें खर्च करूँ तभी टारगेटेड ऑडियंस तक वीडियो पहुँचेगी. अब इस चक्कर में लोन देने वाले ऐप से पैसा उठा चुका हूँ. घर में वाइफ़ है, पापा जी हैं, मम्मी हैं, दो बच्चे भी हैं. उनकी पढ़ाई, घर के खर्चे और यह ईएमआई –  बॉस, नौकरी से तो यह सब हो नहीं पाता बस इसीलिए ‘बडी ऐट डोर’ जैसे ऐप में पार्ट टाइम काम भी कर लेता हूँ.”

तुमने सोफे पर बैठे हुए अपने कूल्हे पीछे खिसकाकर जिगरी की तरफ़ अपना शरीर घुमाया. जिगरी से बातें करते हुए तुमने अनुभव किया कि वह उस तरह का व्यक्ति है जो बातें करने के दौरान अपना ध्यान सामने वाले के पूरे चेहरे पर रखने के बजाए सिर्फ़ होंठों पर रखता है. तुम्हें लगा कि शायद ऐसा इसलिए है क्योंकि वह हॉलीवुड फ़िल्में सबटाइटल के साथ देखता है. उसने अपने जेब से एसे लाइट का पैकेट निकाला, डिब्बी खोली और सिगरेट निकाल कर अपना सिर हिलाते हुए तुमसे अनुमति माँगी.

“हाँ-हाँ भाई पी सकते हो. अपना ही घर समझो यार.” तुमने हँसते हुए जिगरी के निवेदन को स्वीकार किया. फिर तुम्हें लगा कि एक कमी रह गई है, “एक मिन रुको!” कहकर तुम उठे और किचन से जाकर एक सफेद रंग का कॉफ़ी मग उठा लाए, “यह रहा तुम्हारा ऐश ट्रे.”

जिगरी ने तुम्हारी इन सौहार्दपूर्ण भंगिमाओं को महत्व न देते हुए छत पर लटक रहे पंखें की तरफ़ देखा और तर्ज़नियों के बीच दबी सिगरेट से अपने बाएँ कान में खुजली करते हुए कहा, “मैंने दस साल मीडिया में काम किया है. मीडिया की डिग्री है मेरे पास. बहुत गंदगी थी वहाँ तो एक दिन रिज़ाइन दे दिया. अब बस लिखने-पढ़ने का काम करता हूँ. शादी-वादी नहीं की. एक गर्ल फ्रेंड है. तुम लोगों की तरह रोज़ दो घंटा ट्रैवल करके दिल्ली से गुड़गाँव जाती है, कॉर्पोरेट मज़दूरी करने. कॉर्पोरेट दुनिया को तो जानते ही हो, पूरे हफ़्ते गधे की तरह काम करते रहने के बाद सप्ताहांत तुम लोगों के लिए बड़ी ख़ुशी लेकर आता है. आज आने वाली थी मिलने. मेर फ्लैट पर. लेकिन तभी तुम्हारी बुकिंग….”

तुम्हें याद आया कि बिरयानी को दम करने के लिए गैस पर रखे हुए पंद्रह मिनट से ज़्यादा हो गए हैं. तुम जिगरी की बातें पूरी सुने बिना ही फुर्ती से उठे और किचन की तरफ़ भागे.

बिरयानी खाने के दौरान मित्तर ने बकरे की चाप को अपने दाँतों के बीच फँसा कर गोश्त छीला और चबाते हुए कहने लगा, “तुम दोनों को यह बात सुन कर हैरानी होगी कि एक अच्छी उम्र तक मैं नॉन-वेज सिर्फ़ इसलिए नहीं खाता था क्योंकि मैं डरता था कि हड्डी मेरे गले में फँस जाएगी.” उसने चाप को अपने होंठों के बीच रखकर, हड्डी में लिपटे गोश्त को अपने मुँह के भीतर खींच लिया और फिर हड्डी को बाईं से दाईं दिशा की तरफ़ अपने होंठों के बीच इस तरह गुज़ारा जैस कोई सधा हुआ कलाकार माउथ ऑर्गन बजा रहा हो. फिर उसने हड्डी को बाउल (हड्डी रखने के लिए रखे) में इस अदा से फेंका जैसे कोई बास्केटबॉल प्लेयर दूरी, ऊँचाई और गति की गणना कर चुकने के बाद सही निशाना लगाता है.

जिगरी और तुम दोनों बिरयानी के लुकमे मुँह में रखते हुए मित्तर की बातें सुन रहे हो.

इस बार जिगरी ने बिरयानी की अपनी प्लेट में दही और लालमिर्च से बने रायते को फैलाया और कहा, “डर हम सभी को लगता है. मुझे भी. लेकिन मेरा डर अलग तरह का है. मैं दिखने में स्मार्ट हूँ. रिलेशनशिप बहुत आसानी से बन जाते हैं लेकिन ख़ुद को अभी तक शादी के लिए तैयार नहीं कर पाया क्योंकि मुझे डर है कि मेरी शादी नहीं चलेगी.”

मित्तर को बिरयानी खाते हुए बहुत गर्मी लग रही है. उसने अपने माथे पर उभर आई पसीने की बूँदें अपनी बाईं हथेली को उलटा करके पोछी फिर उसी हथेली से अपनी बह रही नाक को साफ़ किया और जिगरी की तरफ़ देखकर पूछने लगा, “क्यों भाई? क्यों नहीं चलेगी आपकी शादी?”

“मेरी गर्ल फ्रेंड अच्छा कमाती है. मॉडर्न तो है पर एक रुपए भी खर्च नहीं करना चाहती. इस मामले में उसकी सोच पुरानी है. हम किसी भी कैफ़े में जाते हैं तो सारा बिल मुझे ही पे करना होता है. आजकल कैफ़े में जाना, अच्छी फ़ोटोज़ लेना, उन्हें सोशल मीडिया पर पोस्ट करना, यू नो, एक स्टेटस सिंबल और रूटीन का हिस्सा है. उसे हर हफ़्ते शॉपिंग करनी होती है और वह चाहती है कि सारा खर्चा मैं उठाऊँ. मैं यह सब करता भी हूँ.” जिगरी ने लंबी साँस ली और अपने हलक में अटके निवाले को गटकने के लिए, पास में रखें गिलास को उठा कर, कोक का एक छोटा सिप लिया.

उसकी बातें रुक जाने पर मित्तर और तुम एकटकी लगाए जिगरी को देखने लगते हो. तुम दोनों ही चाहते हो कि वह शादी न करने का सही कारण बताए. जिगरी ने कुछ बताने के बजाए फिर से बिरयानी खानी शुरू कर दी तो मित्तर से रहा नहीं गया और पूछा बैठा, “ब्रो, जब आप सारे खर्चे उठा ही रहे हो, तो शादी भी कर लो.”

“शादी का मतलब है ख़र्चों का बढ़ना. इस बात पर हमारा झगड़ा होता रहता है. वह चाहती है मैं नौकरी करूँ. उसे एक स्टेबल लाइफ़ चाहिए जहाँ उसे आज़ादी तो खूब मिले लेकिन खर्चा मर्द उठाए. मैं नौकरी के लिए नहीं बना हूँ. अब भाई पढ़ने-लिखने से ज़िंदगी तो नहीं चल सकती तो कुछ सालों से शेयर मार्केट में इंवेस्ट कर रहा हूँ. शुरू मैं कमाया भी बहुत. फिर लोन ले लिया ताकि बड़ा अमाउंट इंवेस्ट कर सकूँ लेकिन तबसे लॉस में चल रहा हूँ. ये सारी बातें अभी उसे नहीं पता है. तुम्हें लगता है ऐसे इंसान की शादी चल सकेगी?” जिगरी ने सलाद की प्लेट में बचे चकुंदर के आख़िरी टुकड़े को उठाते हुए कहा.

खाना खाने के इस पूरे वक़्फ़े में तुम तीनों की बातें डर के इर्दगिर्द घूमती रहीं. सबने बिरयानी खत्म की. तुमने उठ कर सारी प्लेटें सिंक में डाली और दोनों को मीठे में शाही टुकड़ा परोसा जो तुम ख़ास शाहीन बाग जाकर लेकर आए हो.

मित्तर के सामने रखी कटोरी में तुमने जैसे ही उसके लिए शाही टुकड़ा परोसा उसने तुम्हारी तरफ़ देखते हुए पूछा, “डर बहुत बड़ी चीज़ है. क्या तुम्हें कभी डर नहीं लगा?”

तुम इस विषय पर बात करने के लिए सहज नहीं हो. तुम बात को घुमाने के उद्देश्य से अगर-मगर करने ही वाले हो कि एक बार फिर बीच में मित्तर टूट पड़ता है, “मुझे जब भी डर लगता है तो मैं सोने की कोशिश करता हूँ. इस तरह अगले दिन जब मैं उठता हूँ तो डर का नामोनिशान नहीं मिलता.”

मित्तर की इस बात पर जिगरी ने एक साहित्यिक और मनो-वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए कहा, “एक ख़ास उम्र तक आप काफ़्क़ा के तरीक़े से सोचते हैं और आपको लगता है कि आपकी सारी परेशानी एक नींद दूर कर सकती है. लेकिन एक ख़ास उम्र तक ही. उम्र के दूसरे पड़ाव पर आप महसूस करते हैं कि वह नींद नहीं मौत है जिसके पास आपकी सारी परेशानी ख़त्म करने की ताकत है. हर दिन नींद की आग़ोश में जाना अच्छा तो है लेकिन यह सिर्फ़ डर के क्रेंद्र में घूमता अंतहीन चक्र है.” उसने शाही टुकड़े का अंतिम भाग चम्मच से उठाया और तुम्हारी तरफ़ देखकर कहा. “बहुत हुआ. अब तुम्हें बताना होगा कि तुम किस चीज़ से डरते हो.”

“मैं नहीं जानता यह काफ़्का कौन है. मैंने तुम्हारी तरह बहुत किताबें नहीं पढ़ी हैं. लेकिन अगर तुम डर की बात कर रहे हो और मेरे डर के बारे में जानना चाहते हो तो तुम्हें सब्र के साथ दो कहानियाँ सुननी होंगी.” तुमने सामने सोफ़ा टेबल पर रखी पानी की बोतल के ढक्कन को बंद किया और फ़्रिज़ में बोतल को वापिस रखते हुए कहा, “मैं जो कहानी तुम्हें सुनाने जा रहा हूँ उसे सुन कर तुम्हारे होश उड़ सकते हैं इसलिए किसी अनोखी चीज़ को सुनने के लिए ख़ुद को तैयार कर लो.” तुम्हारी बातें सुनकर उन दोनों की आँखों में चमक आ गई. वे कहानी सुनने के लिए अपनी आँखों की पुतलियाँ चौड़ी कर तुम्हारी तरफ़ देख रहे थे.

तुमने क़िस्सा सुनाने वाले किस्सागो के अंदाज़ में बैठने के लिए, सोफ़े के सामने ख़ाली जगह में बिछे कालीन पर अपने दोनों पाँव घुटनों से मोड़कर अपने कूल्हों के नीचे दबा लिए और अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा करते हुए क़िस्सा कहना शुरू किया.

 

 

3

क़िस्सा-1 यह हिंदुस्तान की आज़ादी से पहले की बात है. अगर तुम लोग चीज़ों को सही संदर्भ में समझना चाहते हो तो साल 1912 मान लो. बिहार के एक पिछड़े गाँव में एक बच्चे का जन्म हुआ. ग़रीब घर के इस मुसलमान बच्चे का नाम अमानुल्लाह रखा गया. उसके वालिद साहब ने उसे एक मदरसे में हाफ़िज़-ए-कुरान बनने के लिए डाल दिया. उस दार-उल-उलूम मदरसे में बच्चे हॉस्टल में रहकर दीनी तालीम हासिल करते थे. अमानुल्लाह वहाँ रात-दिन मदरसे में रह कर कुरान-शरीफ़ को मुँह ज़बानी याद करने लगा. कुछ वक़्त के बाद उसका हाफ़िज़ा पूरा हो गया. उसके वालिद साहब चाहते थे कि वह आगे मुफ़्ती की पढ़ाई करे लेकिन अंग्रेज़ों ने मदरसे पर ताला जड़ दिया. उन्हें शक था कि इस मदरसे में अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ सोच रखने वाले लोग देश-विरोधी गतिविधियाँ कर रहे हैं.

गाँव वापिस लौट आने के बाद अमानुल्लाह खेतीबाड़ी करने लगा. खेत इतने नहीं थे कि अच्छे से गुज़र-बसर हो सके. वह आज का दौर नहीं था जब शादियाँ करने के लिए लड़कों को एक अच्छी नौकरी या कारोबार चाहिए होता है. तब शादियाँ घर-परिवार और खानदान की हैसियत देख कर हुआ करती थीं. तो अमानुल्लाह की भी शादी हो गई. तीन बेटियाँ हुईं. लेकिन अमानुल्लाह अपना घर छोड़ कर बाहर काम की तलाश में नहीं गया. एक दिन ऐसा भी आया जब घर में बच्चों के कपड़े ख़रीदने तक के पैसे नहीं थे. उस दिन अमानुल्लाह को अपनी बीवी के रूठे चेहरे को देखकर घर से निकलना पड़ा.

जब वह घर से निकला तब 1948 के जुलाई महीने में चारों तरफ़ बारिश का मंज़र था. यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि उस वक़्त पूरे देश में कोलाहल मचा हुआ था. अमानुल्लाह ही नहीं पूरे देश का भविष्य अस्थिर था. बिहार के लोग अभी भी पूर्वी पाकिस्तान जाने के लिए भरसक कोशिश कर रहे थे. उतनी ही संख्या में लोग वहाँ से आ रहे थे. अमानुल्लाह ने रास्ते में ढाका जाने का मन बनाया. उसने सोचा था कि अगर कुछ काम-धाम समझ आया तो परिवार को बाद में ढाका ले आएगा.

वह ट्रेन, बस और पैदल यात्रा करके कई मील की दूरी तय कर चुका था. कुछ जगह पर बाढ़ के पानी ने रेल की पटरियाँ और सड़कों को अदृश्य कर दिया तो अमानुल्लाह ने पैदल जाने की सोची.

कहाँ से पूर्वी पाकिस्तान शुरू होता है कहाँ हिंदुस्तान की दायरा खत्म होता है इसको लेकर कोई सीधी-साधी समझ किसी के पास नहीं थी. जितने लोगों से पूछो उतने ही जवाब मिलते थे. एक पल ऐसा आया जब वह रास्ता भटक कर एक घने जंगल में पहुँच गया. वह आधे निकले चाँद की रोशनी में चले जा रहा था. टॉर्च की बैटरी खत्म हो चुकी थी. वह अपने घर से इतने आवेश में निकला था कि उसे इतना भी ध्यान नहीं रहा कि अपने साथ अतिरिक्त बैटरी या लालटेन भी रख लेना चाहिए.

घने जंगल में कब रात होती है और कब दोपहर इसका ठीक-ठाक अनुमान लगाना मुश्किल होता है. लेकिन पेड़ से आने वाली मोर-मोरनी की कर्कश आवाज़ों से उसे अंदाज़ा हो रहा था कि रात घिरने वाली है. तभी झुरमुट के बीच उसे दूर से आती एक रोशनी दिखाई दी.

रोशनी की उस लौ ने अमानुल्लाह को बड़ा सहारा दिया. उसके कदमों में फुर्ती आ गई. वह रोशनी का पीछा करते-करते एक ऐसे ठिकाने पर पहुँचा जहाँ जंगल ख़त्म हो चुका था. अब सामने एक खुला मैदान नज़र आया और इस खुले मैदान के बीचों-बीच एक सराय थी. उस एक मंज़िला-इमारत की बनावट किसी मुग़लकालीन महल जैसी थी. जब अमानुल्लाह सराय में घुसा तब उसका सामना ऊँचे क़द के एक ख़ुशमिज़ाज आदमी से हुआ. उसके चेहरे का रंग ऐसा था कि सुबुक गुलाबी रंग देखकर आप उसे पठानी कहना पसंद करते लेकिन उसके चेहरे का आकार लंबा होने की बजाए अंडे की ज़र्दी जैसा गोल था. उसका चेहरा इस कदर झुर्रियों से भरा हुआ था कि उसके चेहरे पर एक इंच भी सपाट चमड़ी ढूँढने में अमानुल्लाह को परेशानी हो रही थी. कुर्सी का सहारा लेकर अमानुल्लाह ने अपनी रीढ़ की हड्डी को आराम पहुँचाया और सराय के मालिक से गुफ़्तगू शुरू की. यह जानकर उसे हैरानी हुई कि इस सराय में उसके सिवा और कोई भी दूसरा मुसाफ़िर नहीं ठहरा है.

अमानुल्लाह ने हाथ-मुँह धोकर कुछ देर आराम किया. सराय में काम करने वाले कारिंदों ने रात का खाना लगाया. खाना खा चुकने के बाद अमानुल्लाह से उसकी यात्रा का उद्देश्य पूछा गया, ‘काम की तलाश’ अमानुल्लाह ने अपने बाएँ गाल के पिछले हिस्से में पान दबाते हुए कहा, “अगर सब ठीक ठाक रहा तो ढाका जाकर पटाखों की फैक्ट्री में काम करने का इरादा है. वहाँ गाँव के कुछ लड़के काम करते हैं.”

सराय के मालिक ने अमानुल्लाह की बातें ध्यान से सुनी.

शाम की टहल लगाने के बाद जब अमानुल्लाह कारिंदों के दिखाए कमरे में पहुँचा तब सराय का मालिक वहाँ पहले से मौजूद था. उसके हाथ में धुली हुई सफ़ेद चादर थी. कमरे के ताक पर रखे लालटेन को उसने अपने लालटेन की आग से जलाया. बिस्तर पर चादर बिछाई. तकिया ठीक किया. ऐसा लग रहा था कि जो चादर वह अमानुल्लाह के लिए लाया है उसमें मोगरे की ख़ुशबू वाला इत्र छिड़का गया है.

अमानुल्लाह चौखट पर खड़ा-खड़ा इस मेहमाननवाज़ी को अपनी आँखों से देख रहा था. मच्छरदानी लगाने के बाद सराय का मालिक अमानुल्लाह की तरफ़ घूमा और पोशीदगी से अमानुल्लाह के कान में आकर कहने लगा जैसे कोई रहस्य की बात बता रहा हो, “आपसे एक इल्तिजा है, इस सराय से आगे आप मत जाइएगा. आगे जो गाँव है उसमें रहने वाले लोग इंसान का गोश्त खाते हैं.” उसकी बातें सुनकर अमानुल्लाह का मुँह एक सपाट जज़्बात में जड़ हो गया. उसकी नाक अंदर धँस गई और आँख बाहर निकल आईं जैसे कि पूरा चेहरे में कहीं भी कोई उभार और गड्ढा न हो. वह न ‘अच्छा’ कह पाया न ही हैरानी ज़ाहिर करते हुए ‘क्या?’ पूछ पाया.

उसके चेहरे की हवाइयाँ उड़ी देखकर सराय के मालिक ने कहा, ‘आपको यहाँ कोई खतरा नहीं है. लेकिन बस, आगे मत जाइएगा.’

सराय के मालिक के जाने के बाद अमानुल्लाह ने लेटने के लिए अपनी आँखें बंद की. लेकिन उसे नींद नहीं आई. रात भर बुरे ख्याल उसके दिमाग़ में दौड़ते रहे. उसे बार-बार लग रहा था जैसे कोई उसके कमरे की तरफ़ धीमे कदमों से चला आ रहा हो और अगर उसने अपनी पलकें गिराईं तो वह अनजान कदमों की आहट किसी भी पल उसे जिबाह कर देगी. उसने सोचा कि अगर इस सराय के आगे बसे गाँव के लोग आदमखोर हैं तो यह भी तो हो सकता है कि यह सराय का मालिक ख़ुद भी आदमखोर हो. उस वक़्त उसके ज़ेहन में यह ख्याल बिल्कुल भी नहीं आया कि यह आदमी झूठ भी तो बोल सकता है. बस उसे यही लग रहा था कि अगले पल कोई अचानक से दरवाज़े में से एक जिन्न की तरह नमूदार होगा और उसे बकरे की तरह हलाल कर देगा. और फिर वो हलाल करने की ज़हमत भी क्यों उठाएगा ? वह सीधा एक झटके में उसे ख़त्म क्यों नहीं करेगा?

अमानुल्लाह उठ कर बैठ गया और कमरे में चहलक़दमी करने लगा. सीने में धड़कते इकलौते दिल ने उसे पूरी रात सोने नहीं दिया. वह हिम्मत और डर के बीच तड़पता रहा. उसके माथे पर पसीने की बूँदें बारिश में खपरैल से टपक रहे पानी की तरह लगातार उसके नाक और गाल पर ढुलक रही थीं. उस रात उसने जितनी बार चारों कुल और आयतल कुर्सी पढ़ी होगी शायद अपनी ज़िंदगी में उतनी बार कभी न पढ़ी हो.

उसने पौ फटने या मुर्गे की बाँग का इंतज़ार नहीं किया. ठीक चार बजे, बिना किसी के हलचल के, वह चोरी-छिपे उस सराय से निकल गया. वह जिस दिशा से आया था वापस उसी दिशा में आगे बढ़ता रहा. चार घंटे लगातार चलने के बाद जब उसकी अंतरात्मा ने यह गवाही दी कि वह अब उस सराय और गाँव से मीलों दूर आ चुका है. तब उसने एक पेड़ के नीचे बिछौना बिछाया, लंबी साँस ली और आँखें बंद करके सो गया.

वह गहरी नींद में था लेकिन उसे ऐसा लगा कि उसके बदन के दो हिस्से हो गए हैं. उसके सामने फ़रिश्ता मुलुक-अल-मौत खड़ा है. “चलने का वक्त हो गया है.” फ़रिश्ते ने कहा.

जिस साल अमानुल्लाह की मौत हुई वह छत्तीस साल का था.

 

 

 

4

क़िस्सा-2 उसी साल उसके घर एक बेटे का जन्म हुआ है जिसका नाम रखा गया सनाउल्लाह. सनाउल्लाह को भी वही क़िस्मत मिली जो उसके पिता अमानुल्लाह को मिली थी. सनाउल्लाह के बूढ़े दादा-दादी एक पिता की कमी पूरी करते हुए उसे पालने लगे. वह भी उसी मदरसे में गया जहाँ उसके वालिद ने हाफ़िज़ बनने के लिए तालीम ली थी. सनाउल्लाह के दादा एक बार फिर चाहते थे कि उनका पोता मुफ़्ती बने लेकिन हाफिज़ा पूरा होने के बाद जब सनाउल्लाह की दस्तारबंदी हुई, उसके कुछ दिन बाद दादा गुज़र गए.

यह आज़ाद हिंदुस्तान था और ग़रीबी अपने चरम पर थी. घर चलाने और मुफ़्ती की पढ़ाई करने के लिए पैसों की ज़रूरत थी. सनाउल्लाह ने पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी. गाँव के कुछ लड़कों का हाथ थामा और दिल्ली आ गया. कुछ समय छोटा-मोटा काम करने के बाद उसकी ईमानदारी और काम करने की चुस्ती देखते हुए कनॉट प्लेस में चमड़े के कारोबारी सरदार जी ने उसे अपने यहाँ मुलाज़िम रख लिया. सही समय पर शादी हुई. यह वह समय था जब बिहार जैसे ग़रीब राज्यों से लोग अपने बीवी-बच्चें लेकर शहर रहने लगे थे. सनाउल्लाह ने भी अपना घर-बार चचाज़ाद भाइयों की देख-रेख में छोड़ कर अपनी अहलिया को दिल्ली ले आना बेहतर समझा.

1984 का दिन और अक्तूबर महीने की आख़िरी शाम.

उन सालों में ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज जैसे शिगूफ़े कम थे. अब दिसंबर आ जाने पर भी लोगों के ऊनी कपड़े ट्रंक से बाहर नहीं निकलते हैं जबकि उस ज़माने में नवंबर करीब आते ही सुबह-शाम सर्द हो जाते थे. सनाउल्लाह ने अपने कुर्ते-पजामे के ऊपर पतले ऊन से बनी बंडी पहन रखी थी. दोपहर तक दुकान पर गहमा-गहमी रही. सनाउल्लाह उम्मीद से ज़्यादा पर्स और बेल्ट बेच चुका था लेकिन तभी एकाएक रेडियो पर यह खबर चली कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके अंगरक्षकों द्वारा कर दी गई है उस समय सनाउल्लाह ठंड महसूस होने की वजह से अपनी बंडी के बटनों को बंद कर रहा था. खबर सुनने के बाद सनाउल्लाह और सरदार जी दोनों सन्न रह गए. यह इस तरह की खबर नहीं थी जिस नज़रअंदाज़ किया जा सके. सरदार जी ने सिल्वर क्रोम के किनारों वाले गोल बटन को घुमा कर रेडियो बंद कर दिया और कहा, “ये नी ओना चाइये था पुत्तर! ग़ल्त हुआ. ग़ल्त हुआ.” ऐसा कहकर सरदार जी ने चाबी घुमाकर गल्ले को बंद किया और दुकान से बाहर आकर सड़क से थोड़ी ऊपर उठी हुईं सीढ़ियाँ उतरने लगे. सीढ़ियाँ उतरते उनके कदमों के साथ यह आवाज़ गूँज रही थी. “चल दुकान बढ़ा दे! कुछ ठीक नी लग रा.”

सनाउल्लाह ने दुकान का शटर गिराया. चाबी सरदार जी के हाथों में थमाई. सरदार जी ने जिराफ़ की तरह तने हुए सप्तपर्णी के पेड़ के नीचे पहुँच कर अपना स्कूटर स्टार्ट करने के लिए लिवर पर अपने दाएँ पैर से किक मारना शुरू किया. सनाउल्लाह को खड़ा देख कर सरदार जी ने हाँफते हुए दूसरी बार लिवर पर किक मारते हुए कहा, “तू निकल जा पुत्तर! सकूटर मेरी तरा बुड्डी ओ गई ए, ओ जाएगी सटार्ट.” सनाउल्लाह ने हामी में सिर हिलाया और आश्रम जाने वाली बस पकड़ने के लिए आगे बढ़ गया. वह जैसे ही आउटर सर्किल के टी पॉइंट पर मुड़ने को हुआ उसे सरदार जी के चीखने की तेज़ आवाज़ आई. उसने डरते-डरते अपनी गर्दन धीमे से घुमाई. उसे दिखाई दिया कि स्कूटर की बैक सीट पर कमर के बल गिरे हुए सरदार जी के गले को कुछ लोगों ने धारदार चाकू से रेत दिया है. सरदार जी के गले से बहा गाढ़ा ख़ून सनाउल्लाह के चप्पल को भिगोने के लिए उसकी तरफ़ दौड़ रहा था लेकिन तभी सनाउल्लाह ने उस टी पॉइंट से ख़ुद को आगे कर लिया. और इस तरह सारा कोलाहल सनाउल्लाह के लिए एक ही क्षण में समाप्त हो गया.

बस स्टैंड पर लोग नहीं थे. बसों का नामों-निशान नहीं था. कुछ कार, स्कूटर और साइकिल नज़र आ रही थीं जिस पर लोग भागे चले जा रहे थे. सनाउल्लाह ने तुरंत निर्णय लिया और बस का इंतज़ार करने की जगह पैदल ही अपने घर की तरफ़ जाने लगा. सनाउल्लाह के मन में बस यही उधेड़बुन चल रही थी कि उसे तेज़ कदमों से चल कर अपने घर पहुँचना चाहिए जहाँ उसकी बीवी और एक महिने का बेटा इंतज़ार कर रहा है.

कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल को पार करते-करते वह समझ गया कि चारों तरफ़ अफरा-तफरी मचनी शुरू हो गई है. सनाउल्लाह ने देखा कि एक दूसरे सिख, जिनका टीवी का बड़ा शोरूम था, को उनकी पत्नी के साथ, दुकान से बाहर खींच लिया गया और पीटा जाने लगा. सनाउल्लाह के पास इतना समय नहीं था कि वह मदद करने के लिए सोच पाता. वह बस अपने बारे में सोच रहा था कि वह एक मुसलमान है और हाफ़िज़-ए-क़ुरआन होने की वजह से उसकी लंबी काली दाढ़ी है और बेशक उसने घुटनों के नीचे आना वाला कुर्ता और टखनों से ऊपर उठने वाला पायजामा पहन रखा है और सिर पर सरदारों वाली पगड़ी नहीं है लेकिन बलवाई इतनी समझदारी से सोचते तो क्या वे सच में बलवा करते?

मथुरा रोड पहुँचने तक सनाउल्लाह की साँसें फूलने लगी. उसके नाक-कान लाल हो चुके थे और नथुने तेज़ साँस लेने के कारण असाधारण ढंग से फूल और सिकुड़ रहे थे. सनाउल्लाह ने एक खाली खड़े ताँगें पर हाथ रखकर सहारा लिया. बिना घोड़े के खड़े उस ताँगें पर अपनी कमर चिपका कर उसने एक गहरी साँस खींची और अपनी बंडी के बटन खोलने लगा. तभी उसे सामने हल्ला काटती एक भीड़ नज़र आई. उन्होंने दो सरदारों को पकड़ रखा था. दोनों की शर्ट फटी हुई थी. चेहरा ठीक से नहीं दिख रहा था. ताँगें के पीछे छिपकर देख रहे सनाउल्लाह को लगा कि उन दोनों नेक बंदों के चेहरे लहूलुहान है लेकिन वह अपने इस अनुमान को लेकर निश्चित नहीं था. भीड़ ने पाँच मिनट से भी कम समय में दोनों सरदारों को ज़िंदा जला दिया. यह दृश्य देखकर सनाउल्लाह के हाथ-पैर काँपने लगे. वह बार-बार अपना थूक निगल रहा था लेकिन उसका गला थूक निगलने के अगले ही क्षण सुखने लग जाता. उसे बहुत तेज़ पानी की तलब महसूस हुई लेकिन आस-पास वहाँ पानी के लिए कोई भी प्याऊँ या नलका नहीं था. आजकल राहगीरों के लिए प्याऊँ रखने और सड़क किनारे नलका गाड़ने का चलन कम हो गया है लेकिन उस ज़माने में सड़को पर इन चीज़ों का होना सामान्य था. उसे ताँगें से चालीस कदम की दूरी पर पान का एक खोखा नज़र आया. खोखे पर नज़र पड़ते ही उसे अपने मालिक की बात याद आई. वे हमेशा कहते थे कि जो सरदार पगड़ी पहनता है वह कभी सिगरेट नहीं पीता.

एक अच्छा और सच्चा मुसलमान होने के नाते सनाउल्लाह ने भी कभी सिगरेट नहीं पी थी. अपने सामने दो सरदारों को ज़िंदा जलते देख सनाउल्लाह का हाल पागलों जैसा हो गया था. उसने ख़ुद को किसी तरह घसीटकर उस पान के खोखे तक पहुँचाया और हड़बड़ी में बंद हो रहे लकड़ी के पल्ले को मज़बूती से पकड़ लिया. दरवाज़ा बंद करने में पैदा हुए व्यवधान से दुकानदार झुँझला उठा. “क्या है?” उसने बिना देखे बेरुख़ी से पूछा.

सनाउल्लाह के हलक से आवाज़ नहीं निकल रही थी. उसने कहना चाहा. पर नहीं कह पाया.

“बोलो भाई. क्या चाहिए तुमको?”

सनाउल्लाह की पसलियाँ चल रही थीं. उसने इशारे से समझाना चाहा. उसने अपने दोनों हाथों का इस्तेमाल कर माचिस जलाने का इशारा किया. सनाउल्लाह के इशारे देख कर दुकानदार ने गुस्से में कहा, “जान प्यारी है तो चल भाग यहाँ से.” सनाउल्लाह ने इस बार मचीस जलाने का इशारा छोड़ कर सिगरेट पीने का अभिनय करते हुए दो उँगलियाँ अपने होंठ के पास ले जाकर धुआँ छोड़ने का इशारा किया.

‘यहाँ जान जा रही है और इसको सिगरेट की पड़ी है.’ पान का खोखा चलाने वाले उस आदमी ने लकड़ी का पल्ला बंद करते हुए माचिस की एक डिबिया और चार सिगरेट निकाल कर सनाउल्लाह की तरफ़ फेंक दिए. माचिस तो सनाउल्लाह ने हाथ में पकड़ ली लेकिन सिगरेट नीचे ज़मीन पर गिर गई. सनाउल्लाह जब तक सिगरेट उठा कर ऊपर उठा तब तक वह आदमी अपने पान के खोके के दोनों पल्लों पर ताला जड़ कर भाग निकला.

सनाउल्लाह ने सिगरेट जलाई और सिगरेट पीता हुआ तेज कदमों से ख़ुद को तब तक घसीटता रहा जब तक वह अपने घर पर नहीं पहुँच गया. सनाउल्लाह जैसे ही घर में घुसा उसकी अहलिया, जो बहुत देर से उसका इंतज़ार कर रही थी, ने किवाड़ लगा दिया. सनाउल्लाह ने बची हुई सिगरेट को फेंका और दीवार के सहारे बैठ कर लंबी साँस लेता रहा. इस बीच उसकी बीवी अपने दुपट्टे से उसके माथे के पसीने को पोछ रही थी.

होश आने पर सनाउल्लाह ने अपने नवजात बेटे के माथे को चूमा और पलंग पर लेट गया.

पलंग पर लेटने पर उसे ठीक वही एहसास हुआ जैसा उसके पिता अमानुल्लाह को हुआ था. सनाउल्लाह को लगा कि उसके बदन के दो हिस्से हो गए हैं. उसके सामने फ़रिश्ता मुलुक-अल-मौत खड़ा है. “चलने का वक्त हो गया है.” फ़रिश्ते ने कहा.

सनाउल्लाह की जब मौत हुई तब वह भी अपने पिता की तरह छत्तीस साल का था.

 

 

pinterest से आभार सहित

5

“डर क्या होता है वह कई बार इतना खतरनाक भी हो सकता है कि किसी की जान ले ले. मुझे लगता है तुम दोनों को इन दोनों क़िस्सों से समझ आ गया होगा.” ऐसा कहकर तुम पास रखी प्याली को उठा कर पानी पीने लगे.

“यह बहुत अजीब कहानी है.” मित्तर ने कहा. “मुझे समझ नहीं आया कि जब दोनों कहानियों में हैप्पी एंडिंग हो गई और दोनों ही अपने डर से जीत गए. तो फिर अमानुल्लाह और सनाउल्लाह की जान क्यों गई?”

“वो दोनों अपने डर से जीते नहीं थे बल्कि भागे थे. यह एक तरह का एस्कैपिज्म है.” जिगरी ने शांत लहजे में कहा, “असद! तुम्हारा पूरा नाम असदुल्लाह है, और वह छोटा बच्चा जिसे सनाउल्लाह ने चूमा था? वह तुम्हीं हो, असद? है न?” जिगरी ने तुम्हें देखते हुए इस अंदाज़ में कहा जैसे उसने कोई पहेली सुलझा ली हो. “तो तुम्हारा डर क्या है?” जब उसने तुमसे यह सवाल पूछा तब उसकी आँखें छोटी और पैनी होकर तुम्हें घूर रही थीं.

तुम अचानक से हुए इस हमले के लिए तैयार नहीं थे. तुमने थोड़ा समय लिया. इत्मीनान में आए और कहना शुरू किया, “तुम इस चाबी को देख सकते हो जो मेरी जेब में है.” तुम किस्सागो के अंदाज़ में बैठे होने के कारण अपनी सो चुकी टांगों को फैला लेते हो और अपनी जींस की जेब से चाबी निकाल कर दिखाते हो, “यह रही.”

दोनों तुम्हारे अँगूठे और तर्जनी के बीच नज़र आ रही चाबी पर एकाग्र हो जाते हैं जो तुम तीनों की आँखों की बिल्कुल सीध में चाँदी की तरह चमक रही है. तुम एक दार्शनिक की तरह चाबी दिखा रहे हो कि तभी मित्तर का फ़ोन बज उठता है. यह ज़ोमैटो के डिलीवरी बॉय का फ़ोन है. “भाई, आ रहा हूँ.” मित्तर ने फ़ोन का जवाब दिया.

“इस चाबी को छोड़ो. बारह बजने वाले हैं तुम्हारा बड्डे का केक आ गया. मैं नीचे से लेकर आता हूँ.” मित्तर ने कमल बनी तुम्हारी हथेली को अपने हाथ से झटका. तुम्हें यह सोचने का समय भी नहीं मिला कि क्या सच में तुम मित्तर के इतने आत्मीय हो चुके हो कि वह तुम्हारी हथेली झटक कर चाबी तुम्हारे हाथ से दूर छिटका सके.

तुम उछल कर चाबी गिरने की दिशा का अनुसरण करते हुए बालकनी की तरफ़ भागते हो. तुम्हारे पीछे-पीछे जिगरी भी आता है. तुम पहले गमलों के दायें-बायें, फिर आराम-कुर्सी के नीचे और फिर सबसे आख़िर में गमलों की मिट्टी के ऊपर बिखरे सूखे पत्तों को उठा कर चाबी ढूँढ़ने की कोशिश करते हो.

“गेट लॉक है. खुल नहीं रहा.” मित्तर जिगरी के पीछे आकर खड़ा होता हुआ कहता है. उस समय तुम बालकनी के एक कोने में पड़ी वाशिंग मशीन के नीचे हाथ घुसा कर चाबी ढूँढ रहे होते हो. चाबी मिलने के बाद, उसे हाथ में दबा कर तुम फुर्ती से खड़े हो जाते हो, “क्योंकि गेट बाहर से लॉक है.”

मित्तर बालकनी में आगे आ कर रेलिंग से झाँककर डिलीवरी बॉय को देखता है और अपनी हथेली से उसे रुकने का और ख़ुद नीचे आने का इशारा करते हुए तुमसे पूछता है “बाहर से लॉक है? पर क्यों?”

“क्योंकि पिछले कुछ दिनों से लोन रिकवरी एजेंट्स अपने गुंडों के साथ मुझे ढूँढते हुए हर रोज़ रात को यहाँ आते हैं. इस बराबर वाले फ्लैट में सचिन रहता है.” तुम अपनी बालकनी के साथ लगी दूसरी बालकनी की तरफ़ इशारा करते हो. “अमेरिकन एक्सप्रेस में असिस्टेंट मैनेजर है. फाइनेंस का बंदा है.”

“लेकिन इन सारी बातों का गेट लॉक होने से क्या मतलब है?” जिगरी ने सचिन की बालकनी की तरफ़ देखते हुए पूछा.

“तुमने ध्यान दिया होगा कि जब तुम लोग आए थे तब खाना परोसने से पहले मैं बालकनी की तरफ़ आया था. मैं दरअसल अपनी बालकनी फ़लाँग कर सचिन की बालकनी में गया था. उसके घर में घुसता हुआ उसके मैन गेट से बाहर निकला. उसके मैन गेट के सामने ही मेरा मैन गेट है. जब तुम मेरे घर आए थे तब ध्यान दिया होगा आमने-सामने दो फ्लैट हैं, दरअसल इस बिल्डिंग में एक फ्लोर पर दो फ्लैट हैं. तो इन शोर्ट, कहानी यह है कि मैं अपने फ्लैट को लॉक करके वापिस उसी रास्ते से अपनी बालकनी में लौट आया था.” तुमने ये बातें ऐसे बताईं जैसे किसी थ्रिलर फ़िल्म का प्लॉट बता रहे हो.

“हाँ, हमने उस वक़्त इतना ध्यान नहीं दिया होगा क्योंकि हम दोनों ही शायद…” मित्तर ने अपनी गर्दन उठा कर शून्य में देखते हुए थोड़ी देर सोचने का प्रयास किया फिर जल्दी से कहा जैसे उसे कुछ भुला हुआ याद आ गया हो, “शायद उस वक़्त अपनी-अपनी ईएमआई की बातें कर रहे थे.”

“इसी वजह से गेट बाहर से लॉक है और यह रही गेट की चाबी.“ खोई हुए चीज़ वापिस पा जाने के तात्कालिक सुख से भारी हुई आवाज़ में, तुम उठते हुए कहते हो, “हमें अब अंदर चलना चाहिए. लोन रिकवरी एजेंट्स अपने गुंडों के साथ कभी भी धावा बोल सकते हैं. फिफ्थ फ्लोर की ऊँचाई पर खड़ा आदमी भले ही नीचे से पहचान में न आता हो लेकिन मैं नहीं चाहता कि कोई बखेड़ा खड़ा हो.“

“लेकिन यह ज़ोमैटो बॉय जो नीचे खड़ा है. उससे हमें केक लेना होगा.” मित्तर ने कहा.

“कोई बात नहीं यार. मैं वैसे भी अपना बड्डे नहीं मनाता. क्या तुमने कभी किसी मर्द को देखा है जो ख़ुद से अपना बड्डे मनाता हो. ऑर्डर कैंसिल कर दो या फिर डिलीवरी बॉय को बोल दो कि वह केक ख़ुद रख ले.” तुम मित्तर के कंधे और जिगरी की कमर पर मित्रवत चेष्टा से हाथ रखते हुए दोनों को अंदर ले जाने की कोशिश करते हो.

मित्तर तुम्हारा हाथ झटक कर खड़ा हो जाता है, “नहीं यह मुमकिन नहीं है. आज तुम्हारा बड्डे है, यह तुमने ऐप को तभी बता दिया था जब तुमने ऐप पर अपना अकाउंट बनाया था. तुम आधे घंटे बाद छत्तीस साल के हो रहे हो. आज के पैकेज में यह केक भी शामिल है. तुम्हारे साथ केक कट करके हम दोनों को सेल्फी अपलोड करनी होगी वरना कंपनी हमारी परफॉरमेंस रेटिंग कम कर देगी जिससे हम नए और अच्छे क्लाइंट्स पाने के एल्गोरिद्म में पीछे छूट जाएँगे.”

“हमें यह केक तो लाना ही होगा और कट भी करना होगा.” जिगरी ने ऐसा कहकर अपने होंठ अंदर की तरफ़ भींच लिए और सिर हिलाने लगा.

“नहीं.” तुमने अपनी आवाज़ में वज़न लाते हुए कहा.

“तुम समझ नहीं रहे हो. मामला मेरी या तुम्हारी मर्ज़ी का है ही नहीं. ऐप के कुछ नियम हैं जो अपरिवर्तनीय और अनिवार्य हैं और सुरक्षा की दृष्टि से इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि हम इनके ख़िलाफ़ नहीं जा सकते. तुम्हें, मुझे, हम सबको ऐप के नियमों का पालन करना ही चाहिए.” मित्तर ने यह पंक्ति इतने धड़ल्ले से कही कि तुम्हें लगा उसने यह पंक्तियाँ कई जगहों पर कई बार इस्तेमाल की होंगीं.

“अगर मैं फिर भी न कहूँ तो.” तुमने अपनी आवाज़ तुलनात्मक रूप से मित्तर की आवाज़ से अधिक ऊँची और दृढ़ रखते हुए प्रतिवाद किया.

“ब्रो, एक बार मना करके तो देख.” मित्तर ने तैश में आकर चिल्लाते हुए कहा और अपनी हथेली को मुट्ठी में बदलने के लिए उँगलियों को भीतर तक मोड़ लिया.

उसे गुस्से में काँपता देख जिगरी ने मित्तर को एक नज़र देखा, फिर कहा, “शांत हो जा भाई, शांत हो जा. तेरे गुस्से की ज़रूरत नहीं पड़ेगी. समझदार क्लाइंट है.” जिगरी ने तुम्हारी तरफ़ देख कर अपने चेहरे को कड़ा किया और दाँत पीसते हुए आगे कहा, “और अगर पड़ी भी तो देख लेंगें.”

सफेद से लाल हो चुकी दोनों की आँखें देखकर तुम्हें डर लगा. तुमने बिना होंठ चलाए अपने मन में ख़ुद से कहा, “जिगरी के हाव-भाव में गुस्से से ज़्यादा पागलपन नज़र आ रहा है. वह हर एक बात जितनी सतर्कता, ठहराव, ज़रूरत के मुताबिक़ शांत, ज़रूरत के मुताबिक़ गुस्सा और फिर मौन के निश्चित अनुपात में बोल रहा है, आई एम श्योर, मित्तर से ज़्यादा ख़तरनाक जिगरी है. यह दोनों ही ऐप के वाहियात नियमों के प्रति इतने वफ़ादार हैं कि अगर मैंने ज़रा भी ना-नुकुर किया तो इस वक़्त मेरी जान भी ले सकते हैं.”

अपने मस्तिष्क में गुणा-भाग करने के बाद, अपने भीतर पनप रहे डर को छिपाते हुए, तुम बुझे हुए मन से कहते हो, “ठीक है, मैं केक लेकर आता हूँ.” वे दोनों चुपचाप खड़े होकर तुम्हें बालकनी लाँघकर सचिन की बालकनी में कूदते हुए देखते हैं. तुम सचिन के फ्लैट में घुसने के लिए दरवाज़े की कुंडी तक हाथ ले जाते हो. इससे पहले की तुम कुंडी बजाते, तुम्हारे हाथ से लगने वाले बल से दरवाज़ा अंदर की तरफ़ थोड़ा-सा खुल जाता है. तुम बिना कुंडी खटखटाए दरवाज़े को आहिस्ता से खोल कर सचिन के फ्लैट में घुसते हो. यह उसका बेडरूम है. वह नहाने जा रहा है. सचिन ने तोलिया अपने कंधे पर रखते हुए पूछा, “इज़ एवरीथिंग फ़ाइन?”

तुम उसकी तरफ़ देखे बिना कहते हो, “हाँ एक डिलीवरी आई है वो ले लूँ. फिर बताता हूँ.”

तुम दरवाज़े से निकलने वाले हो कि तभी तुम पीछे मुड़ते हो और पूछ बैठते हो, “नहाने? वह भी इस वक़्त?”

 “आज से रात डेढ़ से सुबह नौ वाली शिफ्ट स्टार्ट हो गई है.” सचिन बाथरूम का दरवाज़ा बंद करते हुए जवाब देता है. उसने शावर खोल लिया और तुम्हें पानी गिरने की आवाज़ आने लगी है. वह अपना मुँह बाथरूम के दरवाज़े से आधा बाहर निकाल कर कहता है, “एक घंटे में कंपनी की कैब पिक करने वाली है.“ तुम बिना सुने आगे बढ़ गए.

तुम उसके ड्राइंग रूम से निकल कर मेन गेट पर आए. आहिस्ता से गेट खोला और किसी को कॉरिडोर में न पाकर लिफ़्ट से नीचे उतरने लगे.

बाहर डिलीवरी बॉय तुम्हें देखते ही चिल्ला उठा, “खड़े-खड़े पंद्रह मिनट हो गए. अगर दस सेकंड और नहीं आते तो केक मैं खा जाता है.” तुम केक हाथ में लेकर जल्दबाज़ी में बोले, “हाँ-हाँ चल बकवास मत कर. रेटिंग चाहिए या नहीं?” तुम जब वापिस लिफ़्ट की तरफ़ जा रहे थे तब तुमने उस डिलीवरी बॉय को बड़बड़ाते हुए सुना, “लीचड़ लोग रहते हैं यहाँ. थैंक्स तो दूर की बात रेटिंग कम करने की धमकी और दे रहा है.” तुम उसे डपटने के लिए वापिस मुड़े तब तक वह अपनी बाइक सेल्फ स्टार्ट कर आगे बढ़ गया.

ऊपर पहुँचने पर तुमने सचिन के फ्लैट को पार करते हुए उसकी बालकनी से अपनी बालकनी फ़लाँगी  और अँधेरे को चीरते हुए अपने बेडरूम में आ गए. तुमने देखा की मित्तर बीन बैग पर बैठा हुआ अपने शरीर के भार से बीन बैग को दबा-दबा कर उसकी कोमलता का निरीक्षण कर रहा है. तुमने केक को स्टडी टेबल पर रखने के लिए अपने लैपटॉप को सरकाते हुए बिना किसी उत्साह के कहा, “यह लो, आ गया तुम लोगों का केक.”

मित्तर ने तुम्हारी उपस्थिति पाकर बीन बैग पर उछलना बंद कर दिया. जिगरी ने अपने फ़ोन पर इंस्टा की रील्स स्क्रॉल करना बंद करते हुए तुम्हारी तरफ़ देखकर मुस्कुराकर कहा, “बारह बजने में तीन मिनट बाक़ी हैं.”

मोमबत्ती लगाने के बाद ठीक बारह बजे दोनों ने तुमसे केक कटवाया. तुम्हारे बार-बार मना करने के बाद भी तुम्हारे मुँह पर मित्तर ने ज़बरदस्ती केक लगाया. जिगरी तुरंत अपना फ़ोन निकाल कर तीन सेल्फी क्लिक करता है. तीनों ही सेल्फी में कभी केक तो कभी तुम ठीक से नहीं आ रहे हो. वह फिर से कोशिश करता है और चौथी सेल्फी लेने के बाद जिगरी के मुँह से निकल पड़ता है ‘परफेक्ट’ और वह तुरंत एक कोने में जाकर अपने ऐप पर फोटो अपलोड करने लगता है. वह फोटो अपलोड करते हुए मित्तर को केक खाता देख चेतावनी देता है, ‘मेरा पोरशन छोड़ कर खा मित्तर. तू पहले भी कई बार क्लाइंट के घर पर ऐसा कर चुका है.” मित्तर केक का टुकड़ा मुँह में ठूँस कर कहता है, ‘बहुत टेस्टी है यार! बिरयानी! शाही टुकड़ा और अब केक! इतना मज़ा तो कभी नहीं आया.”

तुम उनकी बातें सुनकर ड्रेसिंग टेबल के आईने में ख़ुद को निहारने लगते हो. केक लगे मुँह को पहचानने की नाकाम कोशिशों के बीच तुम अपने फ़ोन पर बज़ रहे वाट्सऐप मैसेज चेक करते हो. दो सहकर्मी, एक स्कूल का दोस्त, दो कॉलेज के दोस्त और तीन पूर्व प्रेमिकाओं की जन्मदिन की शुभकामनाएँ तुम्हारे फ़ोन के वाट्सऐप पर फ़्लैश हो रही हैं लेकिन तुम चाहते हो कि तुम्हारे ऑफिस को आठ महीने पहले जॉइन करने वाली सामिया हुसैन का संदेश आए. लेकिन उसका कोई भी मैसेज ऊपर फ़्लैश नहीं हो रहा है.

जिगरी मित्तर के पास आकर उसकी प्लेट छीनता है और केक खाने लगता है. मित्तर उसे देखकर दाँत दिखाने लगता है जो केक से पूरी तरह सना हुआ है.

तुम वाट्सऐप पर सामिया का इनबॉक्स खोलते हो. वह ऑनलाइन शो हो रही है. आख़िरी मैसेज तुम्हारा है जब तुमने उसे कहा था – फाइल रिसीव्ड. तुम्हारे फाइल रिसीव्ड के मैसेज पर उसने एक थंब इंप्रेशन दिया था. बस. एक थंब इंप्रेशन. तीन दिन पुराने इस मैसेज के बाद कोई और संदेश नहीं.

 

 

 

6

तुम्हें अब चीज़ें ज़्यादा लगने लगी है. तुमने आज की शाम के लिए सिर्फ़ दो साथी बुक किए थे ताकि तुम कुछ बातें उनसे कर सको. तुम्हारे होंठ, जो वर्क फ्रॉम होम करते हुए, एक फ्लैट में सुबह से शाम बंद रहते हुए, बिना बात किए, पूरे-पूरे दिन एक-दूसरे से चिपके रहते हैं उनमें हरकत पैदा करने के लिए तुमने चाहा था कि कोई तुम्हारे घर आए ताकि तुम्हारा जन्मदिन थोड़ा कम बेरंग हो सके. लेकिन इस ऐप सेवा की कुछ औपचारिकताएँ अब तुम्हें बेहूदी लग रही हैं और तुम्हारे भीतर खीज पैदा कर रही हैं.

तुमने अपने फ़ोन पर समय चेक करने के बजाए दीवार पर टँग रही घड़ी की तरफ़ देखा. बारह बज के बीस मिनट. “तुम लोगों को अब निकलना चाहिए. आज के लिए इतना काफ़ी है. तुम लोगों ने मेरे साथ वक़्त बिताया. बातें की. केक कटवाया. मैं बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूँ.” तुमने अपनी जींस की दोनों जेबों में हाथ घुसाया और दोनों की तरफ़ देखते हुए कहा, “तो…ठीक है…गुड नाइट.”

वे दोनों इस तरह गुड नाइट कहकर बाहर जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे. दोनों ने केक खाते हुए एक साथ कहा, “लेकिन बुकिंग एक बजे तक की है असद. अभी तो चालीस मिनट बाक़ी हैं.”

“पर मैं थका हुआ महसूस कर रहा हूँ. नींद आने लगी है!”

इस अभिव्यंजना के साथ कि तुम चाहते हो, वे दोनों चले जाएँ तुम कमरे के दरवाज़े पर ख़ुद को तिरछा करते हुए खड़े हो गए. दोनों ही कमरे से बाहर निकल आए और अपने जूते पहनने लगे. जिगरी ने अपने फीते बाँधते हुए कहा, “मुझे लगता है तुम डर रहे हो असद.”

मित्तर ने जूते पहन चुकने के बाद खड़े होते हुए पूछा, “किस बात से?”

“असद डर रहा है कि कहीं लोन रिकवरी एजेंट अपने गुंडों के साथ धावा न बोल दे और घर में ख़ुद को लॉक करके ख़ुद को बचाए रखने की चालबाज़ी सबको पता न चल जाए.”

तुम चुप रहे. वे दोनों गेट की तरफ़ जाने लगे तो तुमने उन्हें रोक दिया. “यहाँ से नहीं. बालकनी के रास्ते से.”

जिगरी और मित्तर तुम्हारे साथ बालकनी में आ गए. मित्तर ने बालकनी को फाँदना शुरू किया. उसका एक पैर सचिन की बालकनी में और एक तुम्हारी बालकनी में था. तभी जिगरी उबल पड़ा. “नहीं, इस तरह तो तुम अपने डर से कभी नहीं जीत पाओगे. तुम यह चाबी मुझे दो, मैं सचिन के फ्लैट से जाकर दरवाज़ा खोलता हूँ और तुम लोन रिकवरी एजेंट्स और उनके गुंडों का सामना करो.”

“क्या बकवास कर रहे हो!” तुम पीड़ा में लिपटी एक यातनामयी हँसी हँसते हो और अगले ही पल गंभीर होकर कहते हो, “नामुमकिन.”

जिगरी ने ‘बडी ऐट डोर’ ऐप खोल कर तुम्हें दिखाया और ऐप के फीचर्स पढ़ कर सुनाने लगा, “हमारा ऐप सिर्फ़ बात करने के लिए साथी ही उपलब्ध नहीं कराता बल्कि हमारा ऐप अपने ग्राहकों के व्यक्तित्व को सर्वाधिक क्षमता के साथ उपयोग करना भी सिखाता है.” अंत में उसने अपने फ़ोन की स्क्रीन लाइट बंद करते हुए फ़ोन को जेब में रखा और कहा, “हम हैं यहाँ. कुछ नहीं होगा. डरो मत. लाओ चाबी दो.”

“मैं क्या करूँ, बालकनी में उतरूँ या वापिस आऊँ?” मित्तर ने जिगरी से पूछा.

“तुम नीचे उतर कर वापिस आओ. इस ऐप में मैं तुम्हारा सीनियर हूँ. तुम्हें मेरे ऑर्डर फॉलो करने होंगें.” जिगरी ने मित्तर की शर्ट पकड़ कर खींचते हुए कहा.

मित्तर वापस तुम्हारी बालकनी में उतरा और नितंबों से नीचे जा रही जींस की पैंट को ऊपर खींच कर बोला. “ठीक है बॉस. उतर गया.”

“यार!” तुम चिल्ला पड़ते हो. “तुम लोग क्या कर रहे हो. लोन रिकवरी एजेंट और उनके गुंडों के आने का यही टाइम है.”

“नहीं असद! तुम्हें हिम्मत दिखानी होगी. और तुम हमसे यह उम्मीद क्यों कर रहे हो कि हम चोरों की तरह बालकनी फाँद कर जाएँ.” जिगरी ने अधिकार से लबरेज़ कड़क आवाज़ में पूछा.

“देख भाई,  अगर ऐसा है कि तुम लोग बालकनी फाँदना नहीं चाहते, तो कोई बात नहीं, मैं ख़ुद जाकर गेट खोल देता हूँ.” तुमने समर्पण करते हुए कहा.

“नहीं.” इस बार मित्तर ने अपने चेहरे पर अचानक से प्रकट हुई रहस्यमयी ऊर्जा का प्रयोग करते हुए तुम्हारे कान में कहा, “तुम्हें अपने डर को हराना होगा.”

“लेकिन ईएमआई तुम दोनों की भी हैं. तुम लोग मेरी ही तरह ख़ुद इस जंजाल में फँसे हुए हो.” तुम बालकनी में रखी आराम कुर्सी पर बैठते हुए कहते हो.

“हाँ, हम…” जिगरी ने कुछ सेकंड का विराम लिया जैसे वह जवाब देने के लिए सही तर्क तलाश रहा हो, “हम भी फँसे हैं लेकिन हमारे पीछे अभी तक लोन रिकवरी एजेंट्स और उनके गुंडे नहीं है जो रात-बिरात हमारे घर पर धावा बोलने आ जाते हों.” जिगरी ने तुम्हारी आराम कुर्सी के पीछे खड़े होकर तुम्हारे दोनों कंधों पर हाथ रखते हुए कहा.

तुम कुर्सी से उठ खड़े होते हो. घूमते हुए जिगरी की तरफ़ अपना मुँह कर लेते हो. “मुझे लगता है कि तुम दोनों अब ज़्यादा कर रहे हो. क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम लोगों को कम रेटिंग दूँ?”

“देख यार, हम दोनों ही इस तरह के पच्चतर ऐप में कोई न कोई काम करते हैं. एक ऐप में रेटिंग कम देने से हमारा कोई नुक़सान नहीं होने वाला. तू ऐप में कंप्लेन करेगा. कस्टमर केयर पर बैठा तेरे जैसा ही गांडू जो अपनी ईएमआई कैसे भरे यह सोच कर पागल हुआ जा रहा होगा तुझे अच्छी इंग्लिश में सांत्वना देगा कि हम स्ट्रिक्ट एक्शन लेंगें. कठोर कार्यवाही होगी सर! पर होगा कुछ नहीं. न ऐप मेरी आईडी ब्लॉक करेगा न तेरी. उन्हें तेरे जैसे चमन चुतिया चाहिए और मुझे जैसे डेडिकेटेड वर्कर.” मित्तर के इस तरह अपशब्दों का प्रयोग करना तुम्हें खटका लेकिन तुम कुछ कह नहीं पाए. यह दृश्य तुम्हारे लिया इतना अप्रत्याशित और संभावनाओं से परे है कि तुम्हारा अंतर्मन अभी तक चीज़ों को समझने और सुलझाने के लिए अपनी पूरी क्षमता के साथ संघर्ष ही कर रहा है.

तुम्हारी तरफ़ से कोई हलचल न पाकर मित्तर तुम्हारे आगे घूमा “छह साल से इस दुनिया को देख रहा हूँ, ब्रो!” कहकर आराम कुर्सी पर बैठ गया.

तुम अपनी जेब से सिगरेट और लाइटर निकालते हो और सिगरेट जला कर पीना शुरू करते हो. दो कश लेने के बाद जिगरी को अपनी सिगरेट थमा कर बालकनी की रेलिंग पकड़ करे नीचे देखने लगते हो. आधे चाँद की रोशनी में नीचे खड़ी काले रंग की क्रेटा अपने किनारों पर बहुत तेज़ चमक रही है.

तुमने ख़ुद को शांत किया और एक बार फिर मित्तर और जिगरी को पूरी तवानाई से समझाने की कोशिश की. “तुम दोनों समझ नहीं रहे हो. अमानुल्लाह की जब मौत हुई वह उसी दिन छत्तीस साल का हुआ था. उसके बेटे सनाउल्लाह की जब मौत हुई तब वह भी छत्तीस साल का था. और आज मेरा जन्मदिन मनाने के बाद तुम ख़ुद देख सकते हो मेरा चेहरा कितना बूढ़ा हो गया है. मैं भी छत्तीस साल का हो चुका हूँ. बाल उड़ने लगे हैं.” तुमने माथे तक आ रहे अपने बालों को ऊपर उठा कर पीछे खिसक रही हेयर लाइन दिखाई, “मैं आज तक नहीं समझ पाया कि मेरे दादा और मेरे वालिद की मौत की असल वजह क्या थी? मुलुक-उल-मौत जब उन्हें अपने साथ ले गया तब वह क्या चाहता था? मैं बस ऐसा कोई भी कारण नहीं छोड़ना चाहता जिससे मुलुक-उल-मौत फ़रिश्ता मुझ तक पहुँचे.”

“भाई तेरी इतनी फट क्यों रही है? क्या उखाड़ लेंगें वो गुंडे? अगर तू बोले तो आज तेरे साथ रुक जाएँ हम? आन दे. देख लेंगें.” मित्तर ने अपने शर्ट के दोनों बाजुओं को कोहनी तक मोड़ते हुए कहा.

इस बार तुम नीचे खड़ी क्रेटा को देखना छोड़ कर जिगरी और मित्तर की तरफ़ पलटे और फ़रियादी आवाज़ में कहना शुरू किया, “मैं अपने ऑफिस की जूनियर सामिया हुसैन से प्यार करता हूँ, वह बिजनौर की है, मैंने उसके साथ बच्चे भी प्लान कर लिए हैं. इसलिए मैं नहीं चाहता कि मुलुक-उल-मौत मुझे अपने साथ ले जाने के लिए मेरे माथे पर आयतें पढ़ कर फूँक मारे.”

जिगरी तुम्हारी पकड़ाई सिगरेट पी रहा है और मित्तर तुम्हारे चेहरे को एकाग्रता से देखते हुए तुम्हारी बातें समझने की कोशिश कर रहा है. तुमने दोनों की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया न पाकर वो खूबसूरत लाइनें याद कीं जो तुमने कल इंस्टाग्राम के किसी पोस्ट पर पढ़ी थीं, “मैंने ख़ुद को इस लायक बनाने के लिए खूब मेहनत की कि मैं कम दूध वाली चाय के प्याले से कॉफ़ी तक आ पाऊँ. मैंने मेहनत की. कॉफी तक आया भी. लेकिन अब ये अमीर लोग माचा टी पीने लगे हैं.” फिर अपने कामों को उचित ठहराते हुए तुमने एक लंबा भाषण दिया. “मेरे पास अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए लोन लेने का ही रास्ता बचा था. छोटे-बड़े ऐप. लोन देने के लिए लार टपकाते हुए. बिना किसी डॉक्युमेंटेशन के इंस्टेंट लोन. ईएमआई पर फ़ोन, कार, घर सबकुछ. मैं एक लोन को चुकाने के लिए दूसरी कंपनी से लोन लेता रहा. एक क्रेडिट कार्ड का बिल भरने के लिए दूसरे क्रेडिट कार्ड से भुगतान करता रहा. तुम दोनों भी इसी ट्रैप का हिस्सा हो, जिसका मैं. ये बात तुम भी जानते हो. सिर्फ़ इसलिए क्योंकि मैंने कुछ ईएमआई मिस कर दीं तुम लोगों ने मुझे तुच्छ बना दिया और ख़ुद को महान. पर हम तीनों एक ही हैं. आज नहीं तो कल तुम दोनों भी उसी जगह पर खड़ा होगे जहाँ आज मैं खड़ा हूँ.”

“पर आज हम तुम्हारी जगह पर नहीं है ब्रो.” मित्तर ने तुम्हारे हाथ को अपने हाथ में भर कर कहा.

“तुम ख़ुद देखो, मैं अमानुल्लाह और सनाउल्लाह की तरह अपने डर से भाग नहीं रहा हूँ. बल्कि मैं यहीं हूँ. अपने डर के साथ. सचिन की बालकनी के ज़रिए मैं दुनिया के सामने बेइज्ज़त होने से बचा हुआ हूँ. ये लोन वाले मेरे पिछले सारे ऑफ़िस को जानते थे वहाँ जाकर ये मेरे बारे में अनाप-शनाप बकते थे. कभी लीगल एक्शन लेने की चेतावनी तो कभी बाउंसरों से पिटवाने की धमकी. मैं थक चुका था. मैंने अच्छा वर्कप्लेस होने के बाद भी कंपनी स्विच की. नया ऑफिस, नए दोस्त; जहाँ मेरी ईएमआई के बारे में, मेरे लोन और क्रेडिट कार्ड डिफ़ॉल्टर होने के बारे में कोई नहीं जानता. ये लोग और इनके गुंडे अब बस मेरे इस घर का पता जानते है. इसलिए मैंने और सचिन ने यह रास्ता चुना. यह हम दोनों की आपसी सहूलियत है. लोन उस पर भी है. मैंने कहा न क्रेडिट्स के चक्कर में मेरी तरह हर कोई है. तुम्हें पता है वह मुझे अपनी बालकनी के ज़रिए दुनिया से जुड़े रहने का मौक़ा क्यों देता है क्योंकि उसे भी अंदेशा है कि कभी न कभी यह हाल उसका भी होगा.” इतना कहने के बाद तुम्हारा गला भर्रा गया और तुमने दो बार ‘अहमहम’ करते हुए अपने गले की खिच-खिच दूर करने की कोशिश की.

तुम्हारे इतने लंबे जवाब पर मित्तर की आँखें डबडबा आईं. उसने जिगरी की तरफ़ देखकर पलकें झपका कर नर्म पड़ने का इशारा किया. जिगरी के हाथ में जल रही सिगरेट ख़त्म हो चुकी थी उसने सिगरेट नीचे फेंकी और पैरों से मसलने के बाद कहा, “तुम्हें लगता है कि तुम लोन रिकवरी एजेंट के गुंडों और मुलुक-उल-मौत दोनों से बच रहे हो. लेकिन यह भी वही एस्केप है जिसे तुम्हारे दादा और बाप ने चुना था.”

तुम्हारे हाथों और माथें पर दिखाई पड़ रहीं नसें गुस्से में और उभर आईं और ऐसा लगा जैसे हाथों में हरा ख़ून दौड़ने लगा है, तुम लगभग चीख उठे, “तुम्हें लगता है कि वह एक तरह का एस्केप था. अपने डर से भाग रहे थे दोनों. हाँ, अपने डर से भाग रहे थे दोनों. अगर वह डर से नहीं भागते, तो क्या करते? वह सराय का मालिक और वे सिखों को मारने निकले दंगाई उन दोनों को छोड़ देते? मुझे नहीं लगता कि ऐसा होता. किस्से-कहानियों में ऐसा होता होगा. असल ज़िंदगी में नहीं मेरे भाई. वे दोनों अगर जाबांज़ होते तो भी जान से जाते और डरपोक निकलने पर भी उन्हें मौत ही मिली. तुम्हें पता है आगे क्या हुआ था?” तुम यह बातें करते हुए इतना आवेग में आ गए कि अपनी उँगली जिगरी के सीने पर चुभोने लगे, “फ़रिश्ता मुलु-उल-मौत ने उन दोनों की रूह निकाली, दोनों दफ़नाए गए, लेकिन कब्र में मुनकर और नकीर ने उनसे वे तीन सवाल करने से मना कर दिया जो हर मुसलमान से किए जाने हैं. वे दोनों ऐसे इंसान का चेहरा तक नहीं देखना चाहते थे जिसने अल्लाह पर भरोसा करने की जगह अपनी कमज़ोरियों को जीतने दिया.”

तुम बार-बार जिगरी के सीने पर उँगली चुभो कर बात कर रहे थे जिसकी प्रतिक्रिया में जिगरी ने तुम्हें धकेलते हुए कहा “यह कुफ़्र है और तुम काफ़िर की तरह बातें कर रहे हो. मुनकर और नकीर ने क्या किया या क्या नहीं किया. तुम इन बातों पर इतने पुख्ता ढंग से नहीं बोल सकते. क़ुरआन में एक जगह कहा गया है, शायद सुरह-अल-अंबिया में;

“हर शख्स एक न एक दिन मौत का ज़ायक़ा चखने वाला है और हम तुम्हें मुसीबत व आराम के दिनों में इम्तिहान की ग़रज़ से आज़माते हैं और आख़िकार तुम सब हमारी ही तरफ लौटाए जाओगे.”

तुम जिगरी के मुँह से क़ुरआन की आयतें सुन कर भौचक्के रह जाते हो, “तो, तुम मुसलमान हो.”

“हाँ मुझे कुछ तो होना ही था. ज़ाहिर है मैं जिगरी पैदा नहीं हुआ. लेकिन मुझे शक है कि तुम ईमान से भटक रहे हो और ईमान से भटकने वालों के साथ क्या किया जाना चाहिए, यह तुम अच्छे से जानते हो.” ऐसा कहकर जिगरी ने कींचियों से भुरभुरी हो चुकी आँखें तुम्हारी जेब पर गड़ाई और तुम्हारी जेब से चाबी निकाल कर बालकनी के बाहर फेंक दी. इससे पहले की तुम कुछ समझ पाते तुमने किसी कार के ऊपर चाबी गिरने की हल्की आवाज़ सुनी. सेकंड के तीसवें हिस्से में नीचे खड़ी सफ़ेद कार की हेडलाइट और टेललाइट जलने के साथ कार का सायरन बज उठा. नीचे छाई सारी खामोशी, रोशनी और आवाज़ से टकराकर, एक झटके में शोर-शराबे में बदल गई.

तुमने बराबर में खड़े मित्तर को किनारे पर धकेला और रेलिंग के सहारे नीचे देखने लगा. ज़ाहिर है इतनी ऊँचाई से अँधेरे में तुम्हें चाबी नहीं दिखाई देनी है. तुम अब पूरी तरह अपना होश खो बैठे हो. तुम्हारा दिल अब बहुत तेज धड़कने लगा है. तुमने मित्तर को एक बार फिर रास्ते से हटाया और ख़ुद सचिन की बालकनी में कूद गए. मित्तर ने तुम्हें देखकर अपना चेहरा खुरदुरा बनाए रखा और जम्हाई लेते हुए कहा, “मुझे अब नींद आने लगी है. तुम चाबी ढूँढ लो तो बता देना.” वह वहीं बिछी चटाई पर पसर गया.

तुमने पलटकर जिगरी का चेहरा देखा, उसकी आँखें अब लाल नहीं हैं. उसके चेहरे की सख़्त हड्डियाँ मांसपेशियों के साथ घुल कर नर्म पड़ गई हैं. वह तुम्हें देखकर न मुसकुरा रहा है न ही कोई रोष दिखा रहा है.

 

 

pinterest से आभार सहित

7

तुम दोनों को उनके हाल पर छोड़कर सचिन के घर में घुसते हो. सचिन का मास्टर बेडरूम, फिर किचन, फिर ड्राइंग रूम पार करते हो. तुम्हें सचिन अपनी पीठ पर बैग टांगें नज़र आता है. वह तैयार है. वह तुम्हारी आवाज़ सुन कर पीछे पलट कर देखता है. “सोए नहीं अभी तक? कल लोन वसूलने वाले भाई लोग इसी वक़्त आए थे. मैंने कल तो किसी तरह उन्हें टरका दिया था लेकिन आज अगर वो फिर आते हैं तो मैं भी नहीं रहूँगा.” उसका फ़ोन वाइब्रेट हो उठता है. वह अपने फ़ोन में देखकर कहता है, “कैब आ गई. तुम्हें नीचे जाना है क्या?” हाँ, नीचे जाना है एक फ्रेंड आ रहा है. उसे रिसीव करना है.” तुम झूठ बोलते हो. तुम नहीं चाहते कि अभी मित्तर और जिगरी ने जो बखेड़ा खड़ा किया है वह उससे परेशान हो. वह पहले ही तुम्हारे लिए बहुत कुछ कर चुका है.

“ठीक है.” ऐसा कहकर वह अखरोट की लकड़ी से बना वुडन डोर खोलता है. तुम उसके एक तरफ़ किनारे से गुज़रते हुए पीछे खड़े हो जाते हो. वह पहले लकड़ी का दरवाज़ा, फिर लोहे का गेट बंद करता है और कुंडी में पहले से लगे ताले को खोल कर उसके छेद में चाबी घुमाता है. ताले को खींच कर निश्चित हो जाने के बाद कि लॉक ठीक से लग गया है वह तुम्हारी तरफ़ मुड़ता है. “मैं कल सुबह दस बजे ऑफिस से घर आऊँगा. पहले तो मैंने सोचा था कि तुम्हारे उठने से पहले ही घर पहुँच जाऊँगा तो तुम्हें बाहर जाने की तब तक ज़रूरत नहीं पड़ेगी. तुम्हारा और मेरा घर बाहर से लॉक होने की वजह से तुम ज़्यादा सेफ़ रहते. लेकिन अब जब तुम मेरे साथ बाहर आ ही गए हो. तो यह चाबी तुम्हीं रख लेना और अपने दोस्त के साथ मेरे ही फ्लैट से एंट्री लेना.” उसने लिफ़्ट के अंदर पैर रखते हुए कहा.

तुम दोनों लिफ़्ट में आ गए. उसने ग्राउंड फ्लोर के बटन को अपनी उंगली से दबाया, “वैसे मुझे लगता है तुमने अपनी समस्या बहुत बढ़ा ली है. देख यार! लोन मेरे पास भी है. इस फ्लैट की ईएमआई अभी दस साल और भरनी है. मैं भी तेरी तरह महीने के अंत तक आते-आते मैगी से काम चलाता हूँ लेकिन मैंने तेरी तरह सौ क्रेडिट कार्ड नहीं पाल रखें.” सचिन ने अपनी शर्ट की सलवटें ठीक करने के लिए शर्ट खींचते हुए कहा.

“मैं मानता हूँ कि मैं एक क्रेडिट कार्ड से पैसे लेता हूँ और दूसरे की ईएमआई चुकाता हूँ. फिर तीसरा फिर चौथा. लेकिन मेरे पास तेरी तरह पुश्तैनी जायदाद नहीं है. मेरा बाप तेरे बाप की तरह सरकारी मुलाज़िम नहीं था. तेरे बाप को जो पेंशन आ रही है वो मेरे घर में किसी के पास नहीं है. मेरा बाप तो तभी इस दुनिया से गुज़र गया था जब मैंने चलना भी नहीं सीखा था.” तुम इससे पहले कि यह सब उससे कह पाते लिफ़्ट का दरवाज़ा खुला और तुम दोनों गैलरी से बाहर निकल आए.

सामने सचिन के ऑफिस की कैब खड़ी है. यह इनोवा है. कैब में ड्राइवर के अलावा एक लड़का आगे बैठा है और दो लड़कियाँ बीच की सीट पर बैठी हैं. तीनों अपने फ़ोन में घुसे हुए इंस्टा स्क्रॉल कर रहे हैं. सचिन अपने बैग को पीठ से उतार का हाथ में ले लेता है और बीच का दरवाज़ा खोलने के बाद सीट को आधा मोड़कर आगे कर देता है ताकि पीछे वाली सीट पर बैठ सके. वह तुम्हें बाय कहता है. कैब तुम्हारी आँखों से ओझल हो जाती है. तुम्हें तुरंत याद आता है कि वह तुम्हें चाबी देना तो भूल ही गया. तुम फ़ोन बाहर निकालने के लिए हाथ जींस की जेब में घुसाते हो ताकि उसे फ़ोन करके बता सको. कैब अभी ज़्यादा दूर नहीं गई होगी, मुड़कर तुरंत वापस आ जाएगी और सचिन कैब में बैठा-बैठा ही अपने फ्लैट की चाबी तुम्हारे हाथों पर रख देगा. लेकिन तुम्हारा फ़ोन तुम्हारे पास नहीं है. वह ऊपर चार्जिंग पॉइंट में लगा है.

तुम ‘शिट’ बोल कर ऊपर देखते हो. पाँचवीं मज़िल की तुम्हारी बालकनी पर जिगरी रेलिंग के सहारे खड़ा तुम्हें देख रहा है लेकिन तुम्हें मित्तर कहीं नज़र नहीं आता. शायद वह बालकनी पर बिछी चटाई पर सो गया है.

तुम्हारे पास अब एक ही चारा है कि तुम अपनी चाबी ढूँढो, अपने फ्लैट का दरवाज़ा खोलो, दोनों चिरकुटों को लात मार कर बाहर निकालो और सो जाओ. अगर लोन रिकवरी एजेंट के गुंडे धावा बोलते हैं तो देखा जाएगा.

तुमने ध्यान दिया कि चाबी गिरने के बाद जिस सफ़ेद कार की हेडलाइट और टेललाइट जली थी वह टाटा की टियागो है.  तुमने कार के चारों तरफ़ ज़मीन पर नज़र दौड़ाई पर तुम्हें चाबी नज़र नहीं आई. तुमने नीचे झुक कर कार के नीचे झाँका, वहाँ अँधेरे की वजह से तुम्हें कुछ नज़र नहीं आया. तुम सोचते हो कि काश फ़ोन पास होता तो फ़ोन की टोर्च से कार के नीचे आराम से ढूँढा जा सकता है.

अब एक ही रास्ता बचा है तुम कार के नीचे लेट कर घुसोगे. तुमने कार के नीचे लोट लगाई और अपने घुटने, कोहनी और चप्पल सरकाकर नीचे पहुँच गए. तुमने कार के आगे वाले पहियों की तरफ़ से हाथों से ज़मीन पर टटोलना शुरू किया. पहले तुम्हारा हाथ ज़मीन पर उग आईं छोटी-छोटी घासों से टकराया फिर लकड़ी का छोटा टुकड़ा, कुछ कंकड़, बियर की कैन और फिर एक बड़ा पत्थर. तुम जितना हिस्सा छू-छूकर टटोल चुके थे उतना ही अपने शरीर को पीछे घसीट रहे थे ताकि हाथ से ढूँढने के लिए और खाली जगह बनती रहे. तुम पिछले पहियों तक आ गए लेकिन तुम्हें अभी तक चाबी नहीं मिली.

तुम्हारा बी-टेक किया हुआ दिमाग़ कह रहा है कि चाबी अगर कार की छत पर फ़िफ़्थ फ्लोर से गिरती है तो उसे कार की छत से टकरा कर उछलना चाहिए और कार के पहिए के पास ही गिरना चाहिए. लेकिन नीचे चाबी न मिलने पर तुम कार की छत पर भी हाथ फिरा कर ढूँढ़ने लगते हो. यह करते हुए तुम सोचते हो कि चाबी के साथ गुच्छा लगा होने की वजह से शायद इतना विपरीत बल लगा ही नहीं होगा कि चाबी उछलकर नीचे गिरे.

तुम अब कार के पीछे हो. कई दिनों से एक ही जगह पर खड़ी रह जाने के कारण कार के बैक विंडो पर धूल जमी हुई है जिस पर किसी किशोर या वयस्क ने अपनी उँगलियों से अंग्रेज़ी में फ़क यू लिख रखा है और बराबर में महिला के स्तन जैसा दिख रहा चित्र बना रखा है.

इस कार से एक मीटर के अंतराल पर काली क्रेटा कार खड़ी है जिसका मुँह आगे की दिशा में है. इस कार की बैक विंडो पर हनुमान जी का कैरिकेचर है, कैरिकेचर में हनुमान जी को बहुत गुस्से में चित्रित किया गया है. तुम अब क्रेटा के नीचे घुसते हो और पहली वाली कार की तरह अपनी हथेलियों से टटोल-टटोल कर चाबी ढूँढते हो.

तुम्हें किसी के चलने की आहट आ रही है. तुम्हें डर है कि कहीं लोन रिकवरी एजेंट और उसके गुंडे न आ गए हों. तुम साँस रोक कर नीचे लेटे हो. तुमने गौर किया कि तुम्हारे दिल की धड़कन तेज़ हो गई है. जब तक उन कदमों की आवाज़ तुम्हारे ऊपर खड़ी कार के बराबर से गुज़र नहीं जातीं तुमने किसी अनहोनी की आशंका से अपनी आँखें बंद करके रखी हुई हैं. कुछ सेकेंडों में  मन ही मन गिनने के बाद अब तुम अपनी आँखें खोल लेते हो. तुमने पाया कि कदमों की आहट स्ट्रीट लाइट से बन रही परछाई के साथ आगे बढ़ चुकी है.

तुम अपना चेहरा थोड़ा-सा बाहर निकाल कर देखने की कोशिश करते हो. वह सामने पार्क में हर रोज़ आने वाला बूढ़ा आदमी है जिसने पिछले हफ़्ते तुम्हें पार्क में जॉगिंग करता देखकर तुमसे सोशल मीडिया के बारे में राय जाननी चाही थी. तुमने जॉगिंग करना छोड़ बूढ़े आदमी के साथ चल रहे लेब्राडोर कुत्ते की तरफ़ देखते हुए कहा,

“सोशल मीडिया ने सबको एक्सपोज़ कर दिया है सर. यह इस बात का सबूत है कि हमारे देश में कितनी ग़रीबी है और लोग अपनी ग़रीबी से कितना फेड-अप हो चुके हैं. कोई अपने बाप को नचवा रहा है कोई अपनी बीवी के साथ गंदे-गंदे जोक्स पर रील बना रहा है. औरतें जानती है कि कैमरा का एंगल उनके किन अंगों पर कैसे फोकस करे कि ज़्यादा व्यूज़ आएँ. कोई कीचड़ खा रहा है. कोई चम्मच से दीवार खोद रहा है. यह सब किस लिए. क्योंकि सब वायरल होना चाहते हैं. चाहते हैं कि बस कैसे भी फेम मिल जाए. कॉलैब करें और पैसा आने लगे.”

तुम्हारी बातें सुनकर वह बूढ़ा आदमी संतुष्ट नहीं हुआ और अपने पालतू कुत्ते की गले से बंधे चैन को कस के पकड़ कर कहना लगा, “नो-नो, रियल प्रॉब्लम इज़ नोट पॉवर्टी, रियल प्रॉब्लम्स आर पॉपुलेशन और रिजर्वेशन माय फ्रेंड. तुम आजकल की जनरेशन समझती नहीं है लेकिन एक बार यूनिफोर्म सिविल कोड आ गया न फिर कंट्री देखो कैसे बुलेट ट्रेन की तरह भागेगी.”

इतनी रात को उसे अपने फ्लैट में जाने के बजाए किसी दूसरे फ्लैट में जाता देख तुम हैरान हो उठते हो. तुम्हें वह एक दकियानूसी लेकिन शरीफ़ आदमी लगा था. लेकिन यह सब सोचने का अभी तुम्हारे पास समय नहीं है. इस कार के नीचे भी चाबी न मिलने पर तुम बाहर निकल आते हो.

तुम थककर जामुन के पेड़ के नीचे बने सीमेंटे के बेंच पर बैठ गए. तुम्हें लग रहा है कि अगर तुम यहाँ बैठते हो तो ये एक फ़ायदे का सौदा है क्योंकि इस बहाने तुम दूर से ही लोन रिकवरी एजेंट्स और उनके गुंडों को आता देख सकोगे और इस तरह तुम्हारे पास भागने के लिए या छिपने के लिए पर्याप्त समय होगा.

तुम्हें धीरे-धीरे ठंड महसूस होने लगी है लेकिन ठंड से ज़्यादा तुम पर डर हावी होने लगा है. बार-बार तुम्हारे मन में मौत के ख्याल आने लगे हैं, “क्या मरना इतना खौफ़नाक होता है?” तुमने गौर किया कि तुम्हारे माथे पर पसीने की बूँदें उभर आई हैं. तुमने हाथ से पसीने को पोछा और अपनी एंज़ाइटी को क़ाबू में करने की कोशिश करने लगी. तुम्हारे पेट में अब मरोड़ उठने लगी है जो ऊपर उठते हुए दिल के ऊपर की पसलियों में दर्द पैदा कर रही हैं. तुम अपनी दायीं पसलियों के ऊपर चिपकी हुई खाल को मुट्ठी में भींचते हुए सोचते हो, “कहीं, यही अंत तो नहीं?”

कुछ देर तुमने ख़ुद को बेंच पर लिटा लिया. तुम्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे तुम्हारा वज़न एकाएक शून्य हो गया है और तुम अब कभी भी लुढ़क कर गिर जाओगे. तुम्हारी खुली आँखों के आगे अंधेरा छा गया है और घड़ी की टिक-टिक तुम्हारे कानों में सुनाई देने लगी है.

यह तकलीफ़देह एहसास आधे घंटे तक रहा. उसके बाद तुम धीरे-धीरे अपने डर को कमज़ोर करने लगे.

तुम अपनी आँखें खोलते-बंद करते हुए, बंद करते-खोलते हुए, कभी इधर देखते हुए तो कभी उधर देखते हुए, एक घंटा गुज़ार चुके हो. लेकिन अब तुम इस खेल से भी बोर हो गए हो. तुम्हें नहीं पता कि रात का कितना समय बीत चुका है. अब तुम्हें नींद आने लगी है. ख़ुद को नींद से बचाने के लिए तुम चहल-कदमी करना शुरू करते हो.

तुमने टाटा टियागो के दरवाज़े पर टेक लगाया, अपना सीधा पैर मोड़ा और कार के ड्राइवर दरवाज़े पर टिका लिया. तुम्हारी चप्पल के सोल से कार के सफ़ेद दरवाज़े पर मिट्टी और धूल के निशान बन गए हैं पर तुम्हें इस बात की परवाह नहीं. तुम सिर ऊपर उठाते हो और अपनी बालकनी की तरफ़ देखने लगते हो. जिगरी और मित्तर ने बालकनी के अलावा, नीचे से ऊपर दिखाई देने वाले कमरे और किचन की लाइट भी बंद कर ली है. शायद उन्हें नींद आ गई होगी.

तुमने अपना पैर कार के दरवाज़े से हटाया और धूल से बने चप्पल के निशान को देखने लगे. तुम्हारे मन में यह ख्याल चलने लगा है कि तुम्हें इस तरह डरना नहीं चाहिए. जिगरी ठीक कह रहा था. अगर वे आते हैं तो तुम्हें उनका सामना करना होगा. सामना लेकिन कैसे? हो सकता है वे आते ही सीधा मार-पीट पर उतर आएँ. अगर वे लात या घूसों से तुम पर वार करेंगे तो तुम्हारे पास भी उसका जवाब देने के लिए बंदोबस्त होना चाहिए. तुमने अपने आस-पास नज़र दौड़ाई. पार्क की दीवार के किनारों पर कई ईंटें रखी हुई हैं लेकिन तुम्हें कोई ऐसा हथियार चाहिए जिसे हाथ में पकड़ कर वार किया जा सके.

तुम हथियार ढूँढने के लिए पार्क का चक्कर लगाते हो. तुम्हें वहाँ एक डंडा और लोहे का गला हुआ पाइप मिलता है. तुम डंडे को बायें हाथ में पकड़ने के बाद दायें हाथ से पाइप उठाते हो जिसकी जंग लगी लाल रंग की परत से तुम्हारी हथेली में सरसराहट होने लगती है. “इनसे काम चल सकता है”, तुमने ख़ुद से कहा.

डंडे और लोहे की रॉड को सीमेंट की बेंच के नीचे रखने के बाद तुमने सोचा कि तुरंत हिंसा पर उतर जाना ठीक नहीं होगा. पहले तुम्हें बात-चीत का सहारा लेना चाहिए. आख़िर बातचीत करने से अतीत में बड़े से बड़े युद्ध टले हैं. तुमने अपने भीतर मौजूद सारी इच्छाशक्ति को इस बात पर केंद्रित कर लिया कि तुम्हें पहले बात-चीत करनी होगी. बात-चीत से अगर वे मान गए, तो ठीक, वरना तुम मौक़ा देखकर तुरंत नीचे रखें डंडे और पाइप से सबको पैरों पर मारने लग जाओगे. तुम्हें याद है, तुम्हारे एक सहकर्मी ने कहा था कभी भी दुश्मन के सीने और सिर पर वार नहीं करना चाहिए. वहाँ चोट लग जाने पर हमारे ख़िलाफ़ एक गंभीर और मज़बूत मुक़दमा बन सकता है. नीचे कितना भी मार लो फिर बाद में होने वाले क़ानूनी समझौते में हमलावर बच सकता है.

तुम अब आलती-पालती मार के बेंच पर बैठ गए. रात के चौथा पहर शुरू होने पर तुम्हारे शरीर को यह महसूस हुआ कि अब तुम्हें थोड़ी टेक लगाने की ज़रूरत है. तुमने बेंच के बैक सपोर्ट पर अपने कंधे और सिर को टिका कर आराम करने की कोशिश की. कब तुम्हारी आँख लग गई, तुम्हें याद नहीं.

अगली सुबह जब तुम्हारी आँख खुली तब उस बूढ़े आदमी का लेब्राडोर कुत्ता तुम्हारे पैर को जीभ से चाट रहा था. तुम्हारी आँखें एड़ी पर महसूस हुए गीले एहसास से खुल गईं. तुमने डपट कर कुत्ते को ख़ुद से अलग किया. उसके गले में बंधी चेन लटक कर ज़मीन पर बिखरी हुई थी. तुम अपने पैर को ध्यान से देखने लगे कि कहीं इसने तुम्हें काट तो नहीं लिया है. लेकिन कहीं कोई खरोंच या दाँत गड़ने के निशान न देखकर तुम निश्चिंत होकर उठने लगे. तुमने कमर सीधी करते हुए थोड़ी-सी स्ट्रेचिंग की. इस दौरान रात भर की घटनाएँ तुम्हारे ज़ेहन में एक फ़िल्म की तरह घूमने लगीं. तो आखिरकर लोन रिकवरी एजेंट्स और उनके गुंडे कल रात नहीं आए. तुमने मन ही मन ख़ुद से कहा और एक गहरी साँस ली.

तुमने ध्यान दिया कि पार्क में सुबह-सुबह एक्सरसाइज़ और जॉगिंग करने वालों की भीड़ इकट्ठा हो गई है. तुमने अख़बार फेंकने के लिए बंडल बना रहे नौजवान का ‘गुड मॉर्निंग’ कहते हुए अभिवादन किया और लिफ़्ट की तरफ़ जाने के लिए गैलरी में घुस गए. तुम गैलरी में अदृश्य होने ही वाले थे कि एक कोमल आवाज़ ने तुम्हारा ध्यान खींचा. वह एक छोटी बच्ची थी. उसके हाथ में चाबी थी जिसे तुम बीती रात पागलों की तरह ढूँढ रहे थे. “अंकल! यह चाबी बेंच पर थी. जहाँ आप बैठे हुए थे अभी.” दो चुटिया पीछे की तरफ़ बाँधे और आगे के बालों को रोकने के लिए सूरजमुखी के छोटे-छोटे प्लास्टिक के फूल से बने हेयर-बैंड लगाए उस बच्ची ने तुम्हें चाबी दिखाते हुए कहा.

तुमने एक नज़र बच्ची को देखा, उसने स्कूल ड्रेस पहन रखी है और कंधे पर बस्ता टाँग रखा है. तुम असमंजस में पड़े उसे देखते रहे, “क्या आपको नहीं चाहिए?” उसने मासूमियत से तुमसे पूछा. तुम्हारे गले में आवाज़ नहीं थी. वह निकालने से पहले ही कहीं बैठ चुकी थी.

उस बच्ची से चाबी लेकर तुम ऊपर पहुँचे और लॉक खोल कर अपने ही दरवाज़े से फ्लैट में घुसे. तुमने फ्लैट में सारे कोने छाने लेकिन जिगरी और मित्तर दोनों ही वहाँ नहीं थे.

 

 

8

आज इस घटना को छह साल बीत चुके हैं. तुमने अगले दिन उस बच्ची के बारे में पड़ोस में पता किया था वैसे कोई बच्ची वहाँ नहीं रहती. उसने जिस तरह की स्कूल ड्रेस पहनी थी उस तरह की स्कूल ड्रेस भी आसपास के किसी स्कूल में नहीं मिली. तुम्हें नहीं पता वह लड़की कौन थी. तुम यह भी नहीं जानते कि इतना ढूँढने के बाद भी तुम्हें चाबी क्यों नहीं मिली जबकि उस बच्ची की बात पर यकीन करें तो चाबी पूरी रात वहीं रखी हुई थी, उसी सीमेंट के बेंच पर जिस पर एक ही रात में तुम सैंकड़ो बार बैठे, उठे, लेटे और सोए. और जब तुम्हारा और सचिन का फ्लैट बाहर से लॉक था तो जिगरी और मित्तर रातों-रात कहाँ गायब हो गए. कई बार तुम्हारे मन में यह ख्याल आता है कि वह बच्ची फ़रिश्ता मुलुक-अल-मौत थी; जिगरी और मित्तर हो न हो मुनकर और नकीर थे.

आज छह साल बाद सिर्फ़ होम लोन को छोड़कर तुमने अपने पुराने सारे लोन चुका दिए हैं. तुमने अपने खर्चो को दिल्ली में मौजूद साफ़ हवा जितना सीमित कर लिया है और सारे क्रेडिट कार्ड बंद करवा लिए हैं. पिछले छह महीनों से तुम्हारे पास नौकरी नहीं है क्योंकि तुम्हारी कंपनी में मास ले ऑफ़ हुआ है. तुम नई नौकरी ढूँढ रहे हो. लेकिन मार्केट में उसी पैकेज पर नौकरी पाना आसान नहीं है. तुम्हारे होम लोन की छह ईएमआई का भुगतान नहीं हुआ है. सातवीं ईएमआई की तारीख परसो है. तुम फिर से अपने फ्लैट की चाबी पर निर्भर हो गए हो.

मस्जिद में तक़रीर सुनने के बाद तुम चाबी की छुअन पाकर अपने जज़्बात पर क़ाबू नहीं रख पाए और खुतबे को बीच में छोड़कर बाहर निकल आए. तुम चाबी को देखकर अपने भावी जीवन के बारे में सोच रहे हो. सफेदपोश दिख रहा बुज़ुर्ग और काँख में जानमाज़ दबाए बिना मूँछों वाला भारी-भरकम आदमी, तुम्हारे बराबर से कब गुज़रे तुम्हें अंदाज़ा नहीं. अगले ही क्षण तुम पर हमला हुआ और तुम गिर गए. तुमने अपनी अधखुली आँखों से उन्हें देखने की कोशिश की जिन्होंने तुम पर हमला किया है. वे दोनों जिगरी और मित्तर हैं या फिर मुनकर और नकीर. वे तुमसे सवाल पूछने के लिए खड़े हैं. लेकिन इससे पहले तुम्हें मरना होगा. तुम आख़िरी बार अपनी आँखें बंद कर लेते हो ताकि मुलुक-उल-मौत बिना किसी रुकावट के तुम्हारी रूह निकाल सके. मुलुक-उल-मौत इस बार उस बच्ची के रूप में आएगा या नहीं तुम नहीं जानते. तुम जानते हो तो सिर्फ़ अपने डर को. तुम्हारी उँगलियाँ खुरदरी सड़क पर चाबी तलाश रही हैं.

 

 

कैफ़ी हाशमी
15 नवम्बर, 1994 (दिल्ली)

पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ तथा अनुवाद प्रकाशित.
‘शिया बटर’ कहानी संग्रह राजकमल से प्रकाशित.

ई-मेल : hashmikaifi@gmail.com

Tags: 20262026 कथाकैफ़ी हाशमीमहानगर की कहानियाँ
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Comments 34

  1. चंदन पांडेय says:
    1 month ago

    बहुत अच्छी कहानी है। कैफ़ी ने अपना अंदाज़ गढ़ लिया है।

    Reply
  2. कृष्ण समिद्ध says:
    4 weeks ago

    प्राथमिक पाठकीय टिप्पणी के तौर पर दो बातें स्पष्ट रूप से दिखती हैं।

    पहली बात, कैफ़ी हाशमी की यह कहानी कथा या यथार्थ की नहीं लेखक की शिल्प की है। कैफ़ी की ‘चाबी’ को यदि उसके शिल्प और रुप के भीतर उतरकर पढ़ा जाए, तो यह साफ़ दिखाई देता है कि यह कहानी एक सुनियोजित रचना है, जिसमें लेखक अपने शिल्प के द्वारा यथार्थवाद को तोड़ती है, विघटित करती है और अंततः नष्ट भी कर देती है।

    कहानी की शुरुआत पूरी तरह यथार्थवादी है, जिसमें मस्जिद, सड़क, भीड़, लोन, फ्लैट, नौकरी आदि सब कुछ एक ठोस सामाजिक यथार्थ रचता है। मगर धीरे-धीरे‘चाबी’ में भी जीवन धीरे-धीरे गौण हो जाता है, और उसका अनुभव या यूँ कहें कि अनुभव का विचार प्रमुख हो जाता है। इस क्रम में कहानी जीवन को नहीं दिखाती, बल्कि जीवन के अनुभव को विचित्र बना देती है।

    असद ,अमानुल्लाह और सनाउल्लाह की कहानियाँ को ही लें। यह संरचना त्रिस्तरीय है और ये इतिहास, भूगोल और सामाजिक संदर्भों में पहली नज़र में यथार्थवादी लगती हैं। मगर यह केवल फ्लैशबैक नहीं, बल्कि मिथकीय पुनरावृत्ति है। उनका अंत एक ही उम्र, एक ही मृत्यु और एक ही अनुभव उन्हें मिथकीय और लगभग अलौकिक बना देता है। यहाँ यथार्थ टूटता है और पैटर्न जन्म लेता है।

    दूसरी बात पहली बात से ही निकली है कि इसलिए कहानी का शिल्प एक खास बिंदु पर आकर यथार्थ से एब्सर्ड में बदल जाता है। यह सब मिलकर एक ऐसा संसार रचते हैं जहाँ तर्क है, पर अर्थ नहीं। कथा यथार्थ से कटकर यथार्थ के अनर्थ को ही कहती है। इसलिए कैफ़ी हाशमी से अभी औऱ अच्छी कहानी पढ़ने को मिलेगी।

    Reply
  3. फहीम अहमद says:
    4 weeks ago

    कैफ़ी ने दो साल बाद नई कहानी लिखी है। और जिस अहद को लिया था कि इस कहानी में अपना नया वर्ज़न लाना है, वो तकरीबन आया है। बातें इस कहानी में बहुत नई हैं लेकिन दो बातें खास हैं। एक, कहानी का अधिकतर हिस्सा ‘सेकंड पर्सन’ में है। दूसरी खास बात कि कैफ़ी ने खुद के लिखने के अंदाज़ को तोड़ा है। जिन्होंने भी कैफ़ी की ‘शिया बटर’ संग्रह की कहानियां पढ़ी हैं, उन्हें यह कहानी एक अलहदा कहानीकार से रू-ब-रू कराएगी।

    Reply
  4. निधि अग्रवाल says:
    4 weeks ago

    लंबी कहानी में कसाव को साधे रखना बड़ी सफलता है। तीन पीढ़ियों में फैला भय, अनिश्चितता, असहायता का तनाव पाठक को जकड़ता है। बधाई Kaifi Hashmi .

    Reply
  5. रोहिणी अग्रवाल says:
    4 weeks ago

    बेहद शानदार और बेचैन कर देने वाली कहानी।

    दरअसल आज के बदलते समय में कहानी के आलोचनात्मक मानदंड भी बदल जाने चाहिएं। वही कहानी “अच्छी कहानी” कही जाए जो सुकून को नहीं, बेचैनी को हवा देती हो।
    बेचैनियाँ वे नहीं, जो अखबारों की रपटों, मॉल के रंगीन मुखौटों या कमरे की खिड़की से देखी गईं पर्यटननुमा बेचैनियों का अक्स हों।
    बेचैनियाँ वे जो भीतर-भीतर साँस के साथ पैबस्त होती चलती हैं। हड्डियों में, पसलियों में, कोशिकाओं में – जहाँ भी जगह मिले, घर बनाती चलती हैं। जानती हैं, बाहरी चकाचौंध की दीवानी आँखे अंधेरों को टटोलने कभी नहीं आयेंगी।

    लेकिन निरापद अंधेरे ही तो अंडरवर्ल्ड माफिया बनाते हैं।
    व्यक्ति के कम्पर्ट ज़ोन से उपजे निजी अंधेरे!
    संस्कृति के नाम पर व्यवस्था के सामूहिक अंधेरे!
    सत्ता के सहभागिता में बुने अदृश्य अंधेरे।

    कहानी “चाबी” सीधे सत्ता से टकराती है। टकराव की भनक तक न देकर। सिर्फ तनाव को रचती है। तनाव की स्याही से नहीं, किस्सागोई की दिलचस्प लिखावट से। वहाँ हर बार भोक्ता किरदार बदलते हैं, पर कर्त्ता चरित्र वही रहते हैं – दंभ, वर्चस्व, हिंसा, नफरत और लोभ से लपलपाती जिह्वाएँ। आप इनकी शिनाख्त करने के लिए अपने देश-काल में उतर जाते हैं।
    ओह! आजादी की लड़ाई, विभाजन की त्रासदी और आम आदमी का विस्थापन। जड़ों से उखड़े हुए लोग!
    या सिख-संहार! निष्कवच अल्पसंख्यक! नफरत की आड़ में अपनी ही वहशियत का जश्न मनाता संभ्रांत आभिजात्य वर्ग!
    और फिर हिंसा को भोग से जीतने की क़वायद में समाज की हर साँस को बंधुआ बनाती नवऔपनिवेशिक ताकतें!

    हम बाइनरी में जीने के आदी बना दिए गए हैं।
    हिंसा यानी सामाजिक अस्थिरता!
    भोग यानी समृद्ध शांति का प्रसार!
    बाइनरी भावना, भय और लोभ को सींचती है। हम चेतना को किसी लॉकर में रख भावना, भय और लोभ की लतर पर सुगंधहीन नाइन-ओ-क्लॉक फूल की तरह खिल जाते हैं। घड़ी के भीतर बंद।

    मैं फिलहाल कथालोचक की तरह कहानी का विश्लेषण नहीं करना चाहती। न ही इसकी शैल्पिक ताजगी और सघन सांकेतिकता की सराहना। सिर्फ उसकी तनी हुई खुरदरी डोरों के साथ समय के तलघर में उतर जाना चाहती हूँ जहाँ डर की पोटलियों में लिपटे सदियों पुरानी पीढ़ियों के सपने और भी कांप जाते हैं जब देखते हैं कि जिंदगी से बेदख़ल कर दी गई नई पीढ़ी सशरीर वहां धकेल दी गई है।

    अपने सैल में बंद होकर तमाम रंगीनियों को खरीदने का जुगाड़ जीना नहीं है।
    अपने को भूले रखना भी जीना नहीं है।
    जीना अपने स्व के साथ व्यवस्था के स्व और सत्ता के चरित्र की मनोवैज्ञानिक बारीकियों को जानना है।

    लेकिन कहानी यह सब नहीं कहती।
    पर कहानी महज शब्द-रचना तो नहीं। वहां अर्थ-व्यंजनाओं की रूहें भटकती हैं। आपको बतौर पाठक उनके पास जाना है। संवाद के सहारे संवेदना के आलोक को सहेजना है और फिर साथ-साथ अंधेरों में उतरना है।

    आज की नई/ अच्छी कहानी चित्रकार-लेखक के पेंटिंग ब्रश से निकली सांस है। डिकोड किए बिना वह आपकी सांस नहीं बनती।
    यह समय उपभोक्ता साहित्य का नहीं। सहसर्जक पाठक-लेखक की जुगलबंदी का समय है क्योंकि हॉराइजन पर लामबंद हम सब समय के कैदी भी हैं और योद्धा भी।

    यह जरूर कहूँगी कि कहानी “चाबी” साहित्यिक अभिरुचियों में मानीखेज बदलाव लाने का प्रस्थान बिंदु है। न भावुक प्रलाप, न बाइनरी का व्यर्थ उत्पात, न मॉर्निंग वॉक सा सतही अभ्यास। सिर्फ भीतर उतर कर अंधेरों को पहचानने की निडरता!
    और गहरा संकेत कि चाबी तो हमारे पास ही है। डर की भीर और प्रतिरोध की भी।

    कहानी की सांकेतिकता को और भी तीखा करने के लिए अरुण जी ने जिन तस्वीरों का चयन किया है, वह रचनात्मक जुगलबंदी की अद्भुत मिसाल है।
    समालोचन को बहुत बधाई।
    समालोचन गंभीर साहित्य को पोषित करने वाला मंच बना रहे, कामना है।

    Reply
  6. उदय प्रकाश says:
    4 weeks ago

    बहुत ही अच्छी (यह अपर्याप्त शब्द है) कहानी। इससे आगे जाना, जो अपने समय को लिख रहा हो, किसी भी कहानीकार के सामने एक मुश्किल चुनौती है। ऐसा लिखकर शायद मैं कहानी की उत्कृष्टता को कुछ कम कर रहा होऊँ। 5 स्टार्स में 4.999995 स्टार्स मेरी तरफ़ से।

    Reply
  7. SANJAY KUNDAN says:
    4 weeks ago

    यह कहानी नव पूँजीवाद का क्रिटीक रचती है। भूमंडलीकरण-उदारीकरण और उसके साथ संचार क्रांति ने हमारे जीवन को तेज़ी से बदला है। इसने कुछ सुविधाएं तो जुटाई हैं, पर इंसान को अकेला और असहाय बना दिया है। लेकिन यह कहानी अपना दायरा बढ़ाती हुई सभ्यता विमर्श की ओर बढ़ती है। हमारी सत्ता-संरचनाओं की टकराहट और उसके स्वार्थ ने आम आदमी के सामने कितनी मु्श्किलें खड़ी की हैं, यह कहानी इस ओर भी इशारा करती है। चाहे देश विभाजन हो या सिख विरोधी नरसंहार, उसके लिए राजनीतिक, मज़हबी और साम्राज्यवादी लिप्सा ही ज़िम्मेदार रही है। और इस कारण एक बेहतर और सबके लिए सुकूनदेह दुनिया का स्वप्न दूर होता चला गया है। एक अनदेखे-अनजाने भय का साया एक व्यक्ति ही नहीं पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है। क़ैफी हाशमी को बधाई।
    संजय कुंदन

    Reply
  8. Savita says:
    4 weeks ago

    शेक्सपियर के नाटक मैकबेथ में चुडैलो की देवी हेकेट कहती है सिक्योरिटी इज मोर्टल्स चीफेस्ट एनिमी।
    पूरी कहानी में यही दुश्मन खेलता है। बहुत बारीकी से बुनी हुई ये कहानी आज के डर के नर्व तक जा पहुंचती है। एक चाभी के साथ मान अपमान और टूटन गुंथा हुआ हैं। इस फ़्रेगिल आधुनिक मानव की विडम्बना को बहुत अच्छे से लिखा है।

    Reply
  9. Mahesh Kumar says:
    4 weeks ago

    इस कहानी को dystopian समाज के चित्रण की तरह देखा जा सकता है। यथार्थ और कल्पना एकदूसरे में घुलमिलकर छिन्न भिन्न हो चुके मनुष्य और समाज का बेहद विकृत तस्वीर पेश कर रही है।

    Reply
  10. Santosh Dixit says:
    4 weeks ago

    कैफ़ी के पास एक जबरदस्त बीनाई है। वह समय को उसकी त्रियात्मकता में देखते और पाठकों को महसूस कराते हैं। ‘नकीरैन’के मिथ का ईस्तेमाल जबरदस्त है। ग़ालिब का एक शे’र याद आ गया-
    जाहिर है कि है कि घबरा के ना भागेंगे नकिरैन
    हां,मुंह से मगर बाद-ए-दोशीन की बू आये
    ग़ालिब के खिल्ली उड़ाने वाले भाव के विपरीत यहां तिल-तिल कर बेमौत मरने वालों के भय को बहुत करीब से दरपेश किया गया है। भाषा भी नुकीली और पारदर्शी।बहुत बधाई कैफी !

    Reply
  11. अच्युतानंद मिश्र says:
    4 weeks ago

    शानदार कहानी: अपने पूरे कसाव और रचाव में यह कहानी उस रूप को दिखाती है जो है, मगर दिखाई नहीं देता या दिखता है तो भय के बाहर। इस कहानी की शक्ति उसके विवरणों में है और ये विवरण कहीं भी अति नाटकीय नहीं होते हैं। यह कहानी जीवन के बहाव को समझने के लिए बरनौली के प्रमेय की तरह का सिद्धांत रचती है, जहाँअंतस और बाह्य मिलकर एक समग्र सत्य रचते हैं और बहाव के दबाव में वह अंतर -बाह्य का यह विभाजन टूट जाता है। यह कहानी वस्तुतः मनुष्य के विखंडित होते जाने की कहानी है और वह विखंडित होता मनुष्य, मानवीय सत्य से परे, तकनीक (ऐप) के सत्य में ढलता जाता है। यह संवेदना के टेक्नोलॉजिकल रेशनैलिटी में बदलते जाने की कहानी है—इस कहानी का खुला अंत मनुष्य का भविष्य है। भय की नई दुनिया है जो जाहिर भी है और ओझल भी। यह सत्य के उत्तर-सत्य में, आधुनिकता के उत्तर-आधुुनिकता में रूपांतरित होते जाने की कहानी है। इसे भविष्य में इस तरह भी पढ़ा जाएगा कि ऐप की नागरिकता में शामिल तीन आदमी से दिखते लोगों की कथा… इस नए मिजाज की कहानी लिखने के लिए कैफ़ी हाशमी को बहुत-बहुत बधाई।

    Reply
  12. nazish ansari says:
    4 weeks ago

    रात के सवा एक बजे हैं. बिकुल अभी कहानी पढ़कर ख़त्म की है. लम्बाई देखकर एक दफा घबराहट हुई थी. लेकिन रचाव और तनाव इतना सुन्दर है कि पढ़ते ही चले गए. शुरू से अंत तक बना हुआ डर का ताना-बाना लम्बी कहानी होने के बावजूद वहां से फोकस हटने ही नहीं देता. तीन दशक तक फैलाव, कहानी कहने के लिए मैं या वो के बजे ‘तुम’ का इस्तेमाल और detailing, खासकर वर्तमान की.. सब कुछ बेहद उम्दा !! कैफ़ी को एक सधी कहानी कहने के लिए मुबारकबाद !!

    Reply
  13. पायल भारद्वाज says:
    4 weeks ago

    बहुत वक़्त बाद एक अच्छी कहानी पढ़ी जिसने शुरू से अंत तक पकड़े रखा… दृश्य, संवाद, डिटेलिंग सब कमाल… साथ ही कितने ही समकालीन मुद्दों को बहुत ही नाज़ुक और सटीक तरीके से चिह्नित किया गया है… बहुत शुक्रिया समालोचन का इसे पढ़वाने के लिए
    कैफ़ी हाशमी को बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ

    Reply
  14. Mohd Raza Husain says:
    4 weeks ago

    हम ने इस कहानी को पढ़ना चाहा, पैराग्राफ नम्बर 6 से आगे नहीं बढ़ पाए। इस पैराग्राफ की 8 वीं लाइन में लिखा है, तुम्हारे दिमाग में चल रही खुमारी। हम ये समझने में असमर्थ हैं कि कैफियत मुजस्सम कैसे हो सकती है। क्या लेखक ने कहानी लिखने से पहले ये नहीं देखा कि “खुमारी” एक कैफियत है, एहसास है, जो इंसान के ऊपर तारी होता है, दिमाग में चलता नहीं है। हम ये समझने नहीं पाए कि क्या खुमारी के पैर लगे हैं, जिस के बारे में सोच कर रावी मरक़ज़ी किरदार के मुतल्लिक कहता है तुम्हारे दिमाग में चल रही खुमारी।
    इस से ज़्यादा हम अपने ज़हन को सउबत नहीं दे सकते। लिहाज़ा इस तहरीर को आगे नहीं पढ़ सकते। पढ़ने के लिए ज़बान का दुरुस्त होना लाज़िम है।

    Reply
    • Anonymous says:
      4 weeks ago

      ज़बान-ओ-बयान का किरदार ही देखना था तो इतनी दूर जाने की ज़रूरत ही क्या थी-
      पंक्तियों की नोकदार लाईन, फ़रिश्ता मुलुक-उल-मौत या बरजख़ में मुनकर और नकीर अपने दाँतों से तुम्हारी क़ब्र की मिट्टी खोदेंगे, तक ही रुक जाना था-
      आगे का मामला तो और ज़्यादा संगीन है।

      Reply
    • Anonymous says:
      4 weeks ago

      Yahi haal hua hamaara bhi!

      Reply
  15. Akhilesh singh says:
    4 weeks ago

    कैफ़ी हाशमी की लल्लनटॉप वाली कहानी पढ़ी थी। इसके बाद आज सुबह पढ़ी। इस बीच वह ख़ासे चर्चित हुए। अपनी कला में उनकी यह कहानी उदय प्रकाश स्कूल से निकली है। यह कहकर मैं उन्हें छोटा नहीं कर रहा हूँ। उदय प्रकाश इस समय कथा-साहित्य के निकष हैं। कैफ़ी अब स्थापित हो चुके हैं, उनके समकालीनों को कथा-कला के स्तर पर उनसे संवादरत रहना चाहिए।

    Reply
  16. जया जादवानी says:
    4 weeks ago

    कितनी बढ़िया कहानी लिखी है कैफ़ी ने …. एक सेकेण्ड को भी राहत की सांस नहीं लेने दी इसने. शुरू किया तो पूरा करके छोड़ा. किनती सारी चीज़े किस सहजता से कहानी का हिस्सा बनती चलीं गईं. इन सब पर अलग से सोचना तो आसान है पर इसे एक कहानी में इतने रचाव और कसाव से बुनना. कमाल है. अरसे बाद इतनी बेहतरीन कहानी पढ़ी है. ज़्यादा डिटेल में नहीं जाऊँगी, सबने तो लिखा ही है, मैं भी कुछ ऐसा ही कहती पर बहुत कुछ जो महसूस होता है, वह कहने से बहुत परे चला जाता है. कहकर मैं कुछ भी बांधूंगी नहीं. बस इतना ही कहना है कि मैं सचमुच हैरत और ख़ुशी से भरी हुई हूँ. जियो प्यारे. कहानी लिखने वालों को भी बता दिया कि कहानी लिखते कैसे हैं?

    Reply
  17. अमिता शीरीं says:
    4 weeks ago

    बेहतरीन कहानी! कह नहीं सकते कि कथ्य शिल्प पर हावी है या शिल्प कथ्य पर! तीन पीढ़ियों तक पसरा ख़ौफ़ कब आकर कलेजे में घर कर लेता है कि दम घुटने लगता है! एकमात्र चैन है अंत में आई वह नन्ही लड़की को सूरजमुखी का हेयर बैंड पहने है!
    इस कहानी को क्या नाम दिया जाएगा, समाज को आगे ले जाने वाली मशाल? शायद नहीं! समाज के सामने रखा आईना! किश्तों पर जीवन जीता आज का इंसान जीवन से कट जाता है शायद!

    Reply
  18. पवन करण says:
    4 weeks ago

    शानदार कहानी है। वर्तमान में चलती और ‘कहां से कहां तक’
    को अपने में शामिल करती जाती। बांग्लादेश सिख विरोधी दंगे क्रेडिट कार्ड और ईएमआई। कथा-कहन की ये ऐसी युवादृष्टि है जो चुनौति देती और स्वीकारती है। चाबी…..एक नव-प्राचीन व्यंजना है…देखो।

    कैफी को शुभकामनाएं।

    Reply
  19. नंदकिशोर says:
    4 weeks ago

    कहानी लंबी है लेकिन बांधे रखती है।कहानी के अंत तक पहुंचे बिना आप कहानी छोड़ नहीं पाते।
    लेखक का यह एक अलग ही अंदाज है। उम्मीद है या जवान लेखक इसी प्रकार के अन्य अनेक अंदाजों में उभरता हुआ बूढ़ा होगा।
    भविष्य के लिए शुभकामनाएं।

    Reply
  20. Shampa Shah says:
    4 weeks ago

    लंबे अरसे बाद ऐसी ज़िंदा कहानी पढ़ी जो आपके उसे पढ़ने के दौरान ही जैसे घटित हो रही है! बल्कि, आपकी मांस-मज्जा पर घटित हो रही है! कहानी पर बहुत कुछ कहा जा चुका है और उसमें से कुछ भी कहानी से आगे का भी नहीं है और कहानी जितना स्वयं को प्रकाशित करती है उससे और प्रकाशित भी नहीं करता!
    इतनी मुकम्मल कहानी लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई ☘️☘️☘️
    यह कहानी की कितनी बड़ी जीत है कि वह “डर “ जो तीन पीढ़ियों से मौत का सिपाही बन आ रहा है, उससे यूँ इस कहानी के माध्यम से रू-ब-रू हो मन से निकले –“ मज़ा आ गया!” ☘️

    Reply
  21. Mridula Garg says:
    4 weeks ago

    कैफ़ी हाशमी की चाभी कहानी पर

    चाभी कहानी में जो डर का चौतरफ़ा जाल बुना गया है, उसने मेरे ज़हन के इस सत्य को और नुकीली धार दी कि आज हमारे मुल्क में डर जीवन का पर्याय बन चुका है। हर इंसान डरा हुआ है। व्यवस्था का अन्याय, दुष्कर्म, नफ़रत, मज़हबी-जातीय हिंसा, यौन उत्पीड़न, सबने मिल कर ऐसा माहौल बना दिया है कि जब कुछ लोग उसके खिलाफ़ बोलने का साहस दिखलाते हैं तो अधिकांश का डर बढ़ता है, घटता नहीं। व्यवस्था मुखालफ़त करने वालों से हिंसा करके, पहले से ज्यादा दहशत फैलाने में कामयाब हो जाती है।
    आज, इंसान के बजाय ऐप्स में सिमटे जीवन की अमानवीयता का तो, यह कहानी मार्मिक विश्लेषण करती ही है, यह भी रेखांकित करती है कि गैरबराबरी और निर्बल पर सबल के शोषण से उत्पन्न दहशत, कई पीढ़ियों से चली आ रही है। तीन पीढ़ी और आजादी मिलने से पहले का गांव हो या उसके बाद का शहर या आज का यंत्रीकृत समाज; हर हाल कमज़ोर के हिस्से दहशत ही आती है।

    जितना आप कर्ज़ लेते हैं, उतना आपकी ग़रीबी बढ़ती है। जब दो बीघे ज़मीन के बल पर मुश्किल से मिलता था, तब भी आखिर मुफ़लिस बन कर रह जाते थे। और आज, जब ऐप्स और बैंक खुद आ कर सहजता से कर्ज़ देते हैं तो उतनी ही सहजता से बढ़ता है दमन, डर और कर्ज़ लेने की बेबसी, जिसका स्रोत डर है और अंत, मौत। असल में डर ही मौत है।
    प्रकृति पर प्रहार कुछ दबंग करते हैं और प्रतिशोध वह सबसे लेती हैं। हम और दहशतज़दा हो जाते हैं कि प्रकृति को बचाना हमारे वश का नहीं।

    युद्ध की चपेट में आता सारा विश्व एक आतातायी से त्रस्त है और हमारे प्रमुख उससे हाथ मिला रहे हैं। हम डर-डर कर जी रहे हैं कि जानते हैं, मौत डर का ही पर्याय है।

    तकनीक पर बात करें तो कहानी का अंत पहले ही बतला दिया गया था। फिर भी बड्डी एप के दो अमानुष “दोस्तों” के माध्यम से तनाव और उत्सुकता बनाए रखने के लिए कैफ़ी हाशमी दाद के हकदार हैं।

    मृदुला गर्ग

    Reply
  22. Alka Saraogi says:
    4 weeks ago

    मृत्यु का आदिम भय और कई पीढ़ियों के यथार्थ से जुड़ा भय अंततः आज की जीवनशैली में अनुस्यूत भय तक आता है : क्रेडिट कार्ड-ईएमआई-लोन उगाहने के लिए भेजे गए बाउंसर और एप के ज़रिए किसी से संवाद के लिए तरसता इंसान। चाबी के इर्दगिर्द बुनी दास्तानगोई हमें आनेवाले समय के भय से रूबरू कराती है। चाबी हाथ में है भी नहीं भी। मिथक -इतिहास से गुजरकर आया आधुनिक भय सिहरा देता है।

    Reply
  23. सत्यम श्रीवास्तव says:
    4 weeks ago

    एक भरी-पूरी मुकम्मल कहानी। पूरे माहौल में आसन्न तनाव की तमाम परतें खोलती और उधेड़ती कहानी। मुल्क के तकसीम होने, 1984 के दंगे जैसे ही त्रासद आवारा पूंजी के खतरे हैं जिसमें एक अदद इंसान हर वक़्त भय में जीने के लिए अभिशप्त है। हर पीढ़ी के लिए एक त्रासदी मुंह बाए खड़ी है। जिन आदमखोर इन्सानों का ज़िक्र पहली पीढ़ी के लिए आया वह दूसरी पीढ़ी ने अपनी आँखों से देख लिए और तीसरी पीढ़ी ने ऐसे आदमखोर बनाने वाली व्यवस्था को देख लिया और फौत हो गया। हर पीढ़ी में वही लोग आदमखोर बनते गए जो कभी जाने-पहचाने रहे होंगे। सबसे नयी पीढ़ी के साथ तो वही आदमखोर बन गए जो इस पूंजीवाद के टूल्स के रूप में उसके दोस्त बनकर (भाड़े पर ही सही) उसका बर्थ डे मना रहे थे।
    कमाल, किया है कैफी ने। बहुत बहुत शुक्रिया, इस जटिल और बेहद निर्मम हकीकत को परत दर परत खोलकर इतना सुघड़ रचने के लिए।

    Reply
  24. कुसुम लता पांडेय says:
    4 weeks ago

    इतना खूंखार और इंसान को एकाकी करता समय कि एप्प के माध्यम से इंसान से संवाद…।बस और ट्रेन में गांव, जिला क्षेत्र और रिश्तेदारी तलाश लेने वालों के आगे की पीढ़ी ऐसे रूखे और अमानवीय समय की ओर जा रही है।सिहरन होती है। हर कही हर जगह बेशुमार आदमी…। लाइनें पीछे छोड़ता समय,कहानी में बाकी सब तो लेखक का कौशल और शिल्प को साधने का हुनर है। समालोचन और कैफी दोनों को बधाई

    Reply
  25. हर्षवर्धन गुप्ता says:
    4 weeks ago

    कहानी पहले पाठ में ज़रूर असर डालती है, मगर ज़रा ठहर कर देखने पर इसकी बनावट में कई दरारें साफ नज़र आती हैं। तब यह इकतरफा, अतार्किक, बनावटी जान पड़ने लगती है।

    उदय प्रकाश और रोहिणी अग्रवाल के कमेन्ट (अन्य भी) आलोचना या विवेचना नहीं, महज़ उच्छ्वास हैं। यह कहानी को overhype करने का सोशल मीडिया गेम है । बिना किसी ठोस विवेचना के, भारी-भरकम लफ़्ज़ों में किसी रचना को महत्त्वपूर्ण घोषित कर देना न सिर्फ़ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि पाठकों और नए लेखकों को भ्रमित भी करता है। ऐसी लफ़्फ़ाज़ी न पाठक को विवेकसम्पन्न बनाती है, न लेखक के विकास में कोई योगदान देती है।

    कहानी में कथानायक असद खुद को एक ‘पीड़ित’ की तरह पेश करता है, शहीद की मुद्रा में। जैसे वह सिस्टम का शिकार है जिसका पीछा मौत के फरिश्ते कर रहे हैं। लेकिन सारी भाषाई चतुरता और ब्यौरों की भरमार के बावजूद यह तथ्य छुपता नहीं कि उसकी मुसीबतें उसकी अपनी ही बनाई हुई हैं। वह एक गरीब परिवार से आया है जिसका पिता उसके बहुत बचपन में ही गुज़र गया था। वह आर्थिक रूप से काफी कमजोर है। ऐसे में वह, बिना अपनी अदायगी की क्षमता देखे, अपनी आर्थिक क्षमता से बाहर का घर, कार, महँगा फ़ोन क्यों चाहता है – और वह भी अभी, तुरंत? सब कुछ आज ही पाने की हड़बड़ी क्यों ? वह सादा, मितव्ययी जीवन जीकर धीरे-धीरे अपने को आर्थिक रूप से सुदृढ़ क्यों नहीं बनाता?

    महंगे app के charges का पेमेंट कर अजनबी ‘दोस्तों’ के साथ बिरयानी पार्टियां भी उसे करनी हैं। लेकिन बैंक अपने लोन की किस्त मांगे तो उसे आततायी बताना है ।

    “मेरे पास अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए लोन लेने का ही रास्ता बचा था।“ वह कहता है। और ‘जरूरतें’ देखें – क्षमता से बाहर का, ईएमआई में आधी तनख्वाह खा लेने वाला ‘घर’, ‘कार’ और ‘आईफोन’। बहुत खूब।

    ऐसी ‘जरूरतों’ के लिए क्षमता से परे जाकर धड़ाधड़ लोन लेना, फिर उन्हें चुकाने में नाकाम रहने पर खुद को ‘सिस्टम का शिकार’ बताना क्या सहानुभूति का हकदार है ? आप जान-बूझकर आर्थिक गैर-जिम्मेदारी करें तो किस हद तक हमदर्दी के हक़दार हैं? यह तो छोटे पैमाने पर वही मानसिकता है, जिसे हम बड़े आर्थिक अपराधों में कोसते हैं। तात्विक रूप से आप (कथानायक) और नीरव मोदी/विजय माल्या में क्या फर्क है जिसकी आलोचना करने में आप सबसे आगे रहते हैं। क्यों आपके रवैये से आपको भी एक ‘छोटा नीरव मोदी’ न माना जाए? आप जिस तरह बैंक से छिपते फिरते हैं उससे तो लगता है कि आपके लिए संभव होता तो आप भी लोन हड़पकर कहीं विदेश भाग जाते।

    कहानी में बैंकों के रिकवरी एजेंट्स गुंडों के साथ आते हैं। कुछ प्राइवेट बैंक्स (सरकारी नहीं, जिनसे आप जैसे लोग नफरत करते हैं) सचमुच ऐसा करते हैं। यह गैरकानूनी और आपराधिक है। इस बारे में RBI ने साफ़ गाइडलाइन्स बना रखी हैं – कॉल और विज़िट का वक़्त तय है, बदतमीज़ी और धमकी पूरी तरह मना है, और शिकायत के बाकायदा रास्ते मौजूद हैं। एजेंट केवल सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे के बीच कॉल या विज़िट कर सकते हैं। शोक, आपातकाल, या परिवार में शादी जैसे संवेदनशील समय पर वे संपर्क नहीं कर सकते। किसी भी प्रकार की गाली-गलौज, शारीरिक बल, या धमकी सख्त वर्जित है। वे किसी तीसरे व्यक्ति (जैसे पड़ोसी, रिश्तेदार या नियोक्ता) को आपके लोन डिफॉल्ट के बारे में नहीं बता सकते। बैंक को रिकवरी एजेंट नियुक्त करने से पहले 30 दिनों का लिखित नोटिस देना होता है ताकि वह बकाया चुकाने या समाधान ढूंढने की कोशिश कर सके। एजेंट द्वारा उत्पीड़न किया जाता है, तो उधारकर्ता बैंक के नोडल अधिकारी या सीधे RBI लोकपाल (Ombudsman) के पास शिकायत दर्ज करा सकता है। बैंक अपने रिकवरी एजेंटों के हर व्यवहार के लिए जिम्मेदार हैं। यदि एजेंट नियमों का उल्लंघन करता है, तो बैंक पर भारी जुर्माना या बैन लगाया जा सकता है। ये नियम और उपाय गूगल पर तत्काल जाने जा सकते हैं। हर समय कम्प्यूटर के सामने रहने वाला एक पढ़ा-लिखा शख्स इन सबको पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दे – यह कहानी को अविश्वसनीय बनाता है। जहाँ कई व्यावहारिक और क़ानूनी रास्ते मौजूद हैं, कहानी उन्हें जानबूझकर गायब कर देती है – ताकि एक ऐसा माहौल बने जहाँ हर तरफ़ बस डर और बेबसी दिखे । यह यथार्थ नहीं, उसका नाटकीय सरलीकरण है।

    ज्ञातव्य है कि रिकवरी agents (यहाँ गुंडों या बाहुबलियों की बात नहीं की जा रही, जो स्पष्टत: आपराधिक है ) की जॉब एक software programmer की कॉर्पोरेट जॉब से कहीं ज्यादा मुश्किल होती है । उन पर जो जिम्मेदारियाँ और तनाव होते हैं, वे तो और भी भयानक हैं। कोई उनके पॉइंट ऑफ व्यू से कहानी लिखे तो यह कहानी ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। चलिये, मान लिया कि इस मामले में वे RBI नियमों के विरुद्ध रात को वसूली के लिए आए होंगे – तो भी कथानायक का अपना व्यवहार क्या है? वह फोन नहीं उठाता, घर से गायब रहता है, किस्त नहीं चुकाता और बैंक जाकर संवाद भी नहीं करता। ऐसे में बैंक क्या करे? धमकाना या शारीरिक बल निंदनीय और गैर-कानूनी है, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि बैंक किस्त की वसूली ही न करें। शायद आपकी परिभाषा के अनुसार लोन वापस मांगना ही ‘जुल्म’ और ‘अन्याय’ है। आप चाहते हैं कि आप धड़ाधड़ लोन लेते रहें और बैंक लोन देकर भूल जाएँ। यह तो वित्तीय ढांचे की बुनियाद के ही खिलाफ है। ऐसे में बैंकों का ढांचा और वित्तीय संरचना चार दिन भी टिकेगी? बैंक जमाकर्ताओं के धन से लोन देते हैं, जिनमें अधिकतर गरीब मजदूर, किसान, मध्यवर्गीय नौकरीपेशा ही होते हैं । आप बैंक से छिप सकते हैं लेकिन बैंक अपने depositors से नहीं छिप सकता। उनकी मांग पर उनकी धनराशि उसे तत्काल चुकानी ही होती है। अगर सभी लोन लेने वाले आपकी तरह लोन हड़प जाएँ तो पूरा आर्थिक तंत्र चरमरा जाएगा। लाखों गरीब और मध्यवर्गीय जमाकर्ताओं की धनराशि डूबेगी और व्यापक हाहाकार मचेगा। यह आपको स्वीकार होगा और क्या यह नैतिक होगा ?

    संजय कुन्दन लिखते हैं कि कहानी नव-उदारवाद की आलोचना करती है। क्या थोड़ा सेल्फ-क्रिटिसिज़्म भी नहीं करना चाहिए? आप एक चमकदार हड़बड़ी भरी उपभोक्तावादी जीवन शैली के शिकार हैं, इसके लिए एक के बाद एक लोन लेते हैं और उन्हें हड़प जाना चाहते हैं। कहानी में कोई संकेत नहीं है कि आपको अपने उपभोक्तावादी लालच का कोई अफसोस या पछतावा है। न इसका कोई संकेत है कि लोन वापसी का आपके पास कोई ठोस प्लान है। दूसरे शब्दों में आप चाहते हैं कि आपकी चमकदार और फ़ैशनेबल जीवन शैली का खर्चा बैंक के गरीब depositors उठाएँ।

    आश्चर्य है कि इस कदर सतही, एकतरफा कहानी को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। एक लेखक यथार्थ को सिर्फ ऊपरी सतह पर नहीं, समग्रता में और गहराई तक देखता है। कथानायक के पिता और दादा को 1948 और 1984 में जिन डरों का सामना रहा, वह वास्तविक है। लेकिन उनकी कथानायक के डर से कैसे तुलना की जा सकती है? वहाँ भय बाहरी, ऐतिहासिक और वास्तविक है; यहाँ डर उसकी अपनी जल्दबाज़ी और लालच का नतीजा है। इसके अलावा, इन किस्सों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है। कथानायक न तो इन घटनाओं का प्रत्यक्ष साक्षी था, न उसके पास ऐसा कोई जरिया था जिससे वह इतनी बारीकी से ये विवरण (दादा का घर से बहुत दूर एक सराय में रुकना, सराय मालिक से बातचीत, उनकी अकेली मृत्यु, सरदार जी से पिता का वार्तालाप आदि) जान सके। ये बातें उसकी स्मृति का हिस्सा कैसे बनीं? इससे लगता है कि ये प्रसंग सिर्फ सहानुभूति अर्जित करने के लिए गढ़े गए हैं।

    कहानी में यथार्थ का जो मिथकीय ढाँचा खड़ा किया गया है (तीन पीढ़ियाँ, एक ही उम्र, डर का सिलसिला) यह यथार्थ को सिर्फ एक प्रतीकात्मक खेल बना देता है। पाठक सोचता है, यह ज़िंदगी है या एक गढ़ा हुआ पैटर्न? कहानी में अनावश्यक विवरणों की भरमार है, लेकिन कुछ ज़रूरी बातें सुविधानुसार गायब कर दी गई हैं। यह साफ नहीं बताया जाता कि अंत में (अकस्मात, घात लगाकर) हमला किसने किया। वे बैंक के agents तो नहीं हो सकते क्योंकि उसने होम लोन के अलावा शेष सभी लोन चुका दिये हैं और होम लोन में बैंक के पास घर security के रूप में मोर्टगेज़ रहता है। संकेत है कि नमाज और खुतबे के प्रति अनादर दिखाने के कारण रूढ़िवादी मुस्लिमों ने उस पर हमला किया है। मगर यह एक अलग विषय है जिसके इस कहानी में घालमेल का कोई औचित्य नहीं दिखता।

    कहानी का विषय अहम है, लेकिन उसका ट्रीटमेंट इतना सतही, एकतरफा और नाटकीय है कि कहानी एकदम कृत्रिम जान पड़ती है।

    Reply
  26. ममता पंडित says:
    4 weeks ago

    कमाल की कहानी.. ज़रूर पढ़िए…
    रात को सोने से पहले यह कहानी पढ़ी और असर यह हुआ कि नींद उचट गई। किसी भी कृति की असली सफलता यही है कि वो आपको बेचैन कर दे। इतनी लंबी कहानी, लेकिन पकड़ इतनी मजबूत कि पता ही नहीं चलता। इतिहास से लेकर आज के हालातों का वास्तविक चित्रण, किरदारों की परतें और अंत तक बनी हुई जिज्ञासा इसे अलग बनाते हैं। कमाल का प्रवाह, गाड़ी के नीचे चाबी ढूंढने वाला दृश्य किसी फिल्म की पटकथा की तरह लगता है.. बहुत बारीकी से लिखा हुआ..
    और अंत के बारे में मैं क्या कहूं, आप चाहें तो पहली बार खोई चाबी मिलने को ही कहानी का अंत मान सकते हैं, अगर आपको सुखद अंत पसंद है तो, लेकिन वास्तविक कहानी तो उसके बाद की ही है.. हम सब भाग रहे हैं अपने किसी डर से, यह जानते हुए कि भागना बचना नहीं होता.. आठ साल कॉर्पोरेट में नौकरी की है, इसलिए ये घटनाएं नई नहीं लगतीं और EMI के जाल से तो आज के दौर में शायद ही कोई बच पाया है.. अपने आस-पास की ही कहानी लगती है।
    इस कहानी पर चर्चा होनी चाहिए…

    Reply
  27. Pallavi says:
    4 weeks ago

    कहानी तीन पीढ़ियों के डर की कहानी है। विभाजन, ग़रीबी, भुखमरी से शुरू होकर ले ऑफ, लोन, क्रेडिट कार्ड्स, रील कल्चर जैसी समसामयिक विसंगतियों को व्यक्त करती इस कहानी ने हम सबके भीतर भी एक बेचैनी पैदा की है। लेखक समाज के जिस स्याह पक्ष को दिखाना चाहते हैं वो पाठक को जस का तस दिखाई पड़ा। “चाभी का खोना और एक अज्ञात बच्ची द्वारा रहस्मयी स्थितियों में मिलना” द्वारा यह कहानी अपने लेखकीय कौशल और शिल्प में खरी उतरती है। उम्दा कहानी के लिए कैफ़ी को बहुत बधाई

    Reply
  28. आदित्य शुक्ला says:
    4 weeks ago

    वाह! एक शानदार कहानी। मिथक, इतिहास, यथार्थ और आज के जटिल सचों को एक कहानी में ढालने का अलहदा अंदाज़ है – आसान भी नहीं है। बहुत तबीयत से इस कहानी को लिखा गया है। इतने बड़े वितान की कथा को एक कहानी के साँचे में बिठा लेना कहानीकार की सफलता है। लगभग मुकम्मल। कैफ़ी की भाषा भी आकर्षक है – ना तो पांडित्यपूर्ण और ना ही सपाट – एक नयापन भी है जो उनके कथा-कहन के अनोखे अंदाज़ से उपजता है।

    Reply
  29. डॉ. भूपेंद्र बिष्ट says:
    4 weeks ago

    ‘चाबी’ में घटनाओं का जो क्रम है, कथानक है, वह मुझे लगा कहानीकार का कथ्य बिल्कुल नहीं है। यदि होता तो अंत तक पाठक के मन में एक खौफ बना रहता। लेकिन यहां पढ़ने वाले को विषय या कि स्थितियों को लेकर एक बोझिलता लगती है। वह कथा के दूसरे परिच्छेद से ही इस घुटन से छुटकारा पा लेना चाहता है। इसमें कहानीकार के कहन या आख्यान बुनने के सलीके ने भी मदद की है।
    अमानुल्लाह > सनाउल्लाह > असदुल्लाह का अपना अपना स्पैन हो या ढाका की परिस्थितियां, फिर दिल्ली के सिख दंगे वाला माहौल और इधर ईएमआई तथा लोन रिकवरी की फ़िक्र — यह सभी बातें किस्सागोई के धागों में पिरोई हुई अंतर्कथाएं नहीं बन सकी, अपितु एस्केपिज़्म का ब्यौरा भर बन कर रह गई।

    तब भी कहानी लंबे कलेवर के बावजूद, हमें बांधे रखती है तो यह उसके रचाव और बनाव की खासियत ही कही जाएगी। दीर्घा के शेड का पोएटिक डिपिक्शन देखें :
    सितम्बर के महीने में सागौन और अशोक के पेड़ से निकलने वाली गीली खुशबू से भारी हो चुकी हवा तुम्हारी बालकनी में तैरती रहती है।
    इसी तरह जीवन जैसा होता जा रहा है, उसको जस का तस बता देने, रख देने के लिए जिस सन्नद्धता भरे हौसले की आवश्यकता पड़ती है, वह यहां है, उसका प्रमाण :
    कार के बैक विंडो पर धूल जमी है, जिस पर किसी किशोर या वयस्क ने अपने उंगलियों से फ़क यू लिख रखा है और बराबर में महिला के …. जैसा दिख रहा चित्र बना रखा है।
    किरदार को जीवंत करने के लिए, उसका साक्षात् चित्रण : उसका चेहरा इस कदर झुर्रियों से भरा हुआ था कि उसके चेहरे पर एक इंच भी सपाट चमड़ी ढूंढने में अमानुल्लाह को परेशानी हो रही थी।
    समय की कैफियत बताने का अंदाज भी इतना परफैक्ट कि वक्त की सांस सुनाई दे जाए : यह वह समय था जब बिहार जैसे गरीब राज्यों के लोग अपने बीबी बच्चों को लेकर शहर रहने लगे थे।

    किसी Buddy एप का सहारा ले जिगरी और मित्तर को असद अपनी निजता में शामिल कर लेता है, उनके लिए बिरयानी बनाता है, इतना ही नहीं उनके आगे अपनी जिंदगी की रवानी का खुलासा भी करते जाता है। माना कि यह जीवन से भागना नहीं है। फिर भी हुआ तो यह सब वायवीय ही, न ! कथा में ऐसा वितान निश्चित ही इंसानी खुशबू, हाथों की ऊष्मा, मानवीय आवाज़ और आंखों की रोशनी के बग़ैर ही होगा। इसीलिए Gen Z की पीढ़ी जीस्त की खुरदुरी लेकिन दिलकश जमीन से कहीं दूर बसती जा रही है। ‘चाबी’ में भी असदुल्लाह अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ रहा बल्कि मसले से छुप रहा है। युवा कैफ़ी ने उसकी कहानी दर्ज़ करने के लिए जो फ्रेम लिया, उसमें यह कथा-कला अधिकतर हिस्सों में कमोवेश अमूर्त भी होती गई है।

    कहानी में कहानीपन आखिर में मिलता है, जब पार्क में सुबह सुबह स्कूली ड्रेस पहनी लड़की कहती है — अंकल यह चाबी बैंच पर थी। दो चुटिया पीछे की तरफ बांधे और आगे बालों को रोकने के लिए प्लास्टिक के सूरजमुखी के क्लिप फूल लगाए। मग़र अगले दिन असद पता करता है तो मालूम पड़ता है कि वह स्कूली ड्रेस यहां आसपास किसी स्कूल की नहीं और वैसी बच्ची भी यहां कोई नहीं रहती। जिगरी और मित्तर भी शायद मुकर और नकीर थे।
    वाह क्या बात है “मुलुक-उल-मौत” !

    Reply
  30. Niranjan Shrotriya says:
    4 weeks ago

    सिंपली मार्वलस ! यह बहस बेकार है कि यह कहानी किस स्कूल या जादुई यथार्थवाद की किस दिशा-धारा से निकली है। मेरी ओर से फुल मार्क्स। गणित में सही जवाब पर अंक नहीं काटे जाते। यह उस तरह का चमत्कृत करने वाला ग़ल्प नहीं जैसा कि कुछ टिप्पणियों में दिखाई दिया। यह गणित है। वर्तमान का गणित। दरअसल हमें ही कहानी पढ़ने की तमीज़ और विकसित करना होगी। यहाँ EMI के असह्य बोझ के रूप में तमाम पूंजीवादी/आर्थिक भयों को उभारा गया है एक शानदार शिल्प में। इतनी लम्बी कहानी को एक साँस में पढ़वा लेना कोई हँसी – ठट्ठा नहीं बाबू! बधाई।

    Reply
  31. डॉ अविचल गौतम says:
    4 weeks ago

    बहुत ही मार्मिक कहानी है…अंत तक एक जाने पहचाने किन्तु अस्पृश्य यथार्थ को हमारे संवेदनों तक लाने वाली बेजोड़ कहानी…बहुत बधाई भाई कैफ़ी..!!

    Reply
  32. Manoj Pandey says:
    4 weeks ago

    एक भयावह थ्रिलर, जिसमें हमारा पूरा समय दिख और बोल रहा है।

    Reply

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