| विचलन हमारे जीवन को संवारकर आगे बढ़ जाते हैं
खेल-खेल में बीता जीवन गिरीश कारनाड |
गिरीश कारनाड की संस्मरणात्मक आत्मकथा ‘खेल-खेल में बीता जीवन’ पढ़ने के पश्चात आवेश से भरकर मैंने इस बात को जानने की कोशिश की, कि क्या गिरीश कारनाड ने अपने विवाह, जहाँ ये संस्मरणात्मक आत्मकथा अपूर्ण रहकर समाप्त होती है, के बाद, अपनी नाक में आक्सीजन की नली लगाए हुए वर्ष 2018 में ‘मैं भी अर्बन नक्सल’ की तख्ती अपने गले में टांगकर विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया, तब तक के अपने जीवन के बारे में लिखा है. मगर अफसोस इस विषय में मुझे कुछ हासिल नहीं हो सका. होता तो शायद वह वर्ष 2019 में उनकी मृत्यु के पश्चात अब तक प्रमुखता से प्रकाशित हो चुका होता और उसका जिक्र इस किताब के अंत में दी जाने वाली विवरणिका में दर्ज होता. हो सकता है उन्होंने इसके बाद अपने बारे में लिखा ही न हो, वे लिखने के बारे में सोचते ही रह गये हों. ये भी संभव है उन्होंने लिखा हो और वह कहीं मौजूद हो और आगे हमारे सामने आये और यह भी कि वह कहीं दबा-छुपा हो और उसके बारे में अब तक किसी को पता न हो और वह कभी सामने न आ पाये और यूं ही गुमा-छुपा रहकर नष्ट हो जाये. मगर यह हम पाठकों का गिरीश कारनाड जैसी शानदार शख्सियत के गरिमामय जीवन के दूसरे हिस्से को जानने से वंचित रह जाने जैसा होगा. जिसकी प्रतीक्षित-पीड़ा हमेशा शेष रहेगी.
मगर उनके जीवन के इस हिस्से को पढ़कर यह भी सच है कि जो भी गिरीश कारनाड के वैभवपूर्ण और प्रभावी जीवन के इस संस्मरणात्मक आत्मकथ्य ‘खेल-खेल में बीता जीवन’ को पढ़कर पूरा करेगा उसके भीतर ठीक वहीं से गिरीश कारनाड के शेष सृजनात्मक-सक्रिय जीवन को जानने की बेचैनी पैदा हो जायेगी. क्योंकि इस संस्मरणात्मक आत्मकथ्य की खूबी यह भी है कि वह अपने पाठक की मानसिकता का इस हद तक शिकार कर बैठता है कि वह इसे पढ़ते हुए खुद को गिरीश कारनाड के इर्दगिर्द पाता है. कहीं-कहीं वह मानसिक स्तर पर स्वयं को कारनाड की तरह भी देखने और कारनाड की तरह व्यवहार करने लगता. गिरीश के साथ उसकी भी यात्रा सिरसी से धारवाड़ मुम्बई, लंदन, बंगलोर मद्रास, दिल्ली, पुणे तक चलती-लौटती है. कारण यह कि ये एक सुखद और मन को गहरी राहत देने और मनुष्य में गहरा और घना विश्वास भरने वाला संस्मरणात्मक आत्मकथ्य है. जिसे कतई संघर्ष शून्य नहीं कहा जा सकता. मगर इसमें उसकी पहचान व्यवहारिक और बौद्धिक संघर्ष के तौर होती है. जिसे हम बदलकर ऐसी सृजन क्षमता में तब्दील होते देखते हैं जो गिका (गिरीश कारनाड) को सदैव सक्रिय बनाये रखती है.
बचपन से ही किसी बाहरी दृश्य अथवा भीतरी पारिवारिक घटनाक्रम को परखने की उनकी दृष्टि को विकसित होते हुए देखना हमें आह्लादित करता है और किशोरावस्था तक आते-आते हमें उनकी और पुख्ता होती जाती कला-साहित्यपेक्षी रुचि स्पष्ट होती मिलती जाती है.
गिका ने अपने इस आत्मकथ्य में माँ के बारे में जीवन के बारे में वाह्य संवेदना से लिखा है कि कैसे उन्हें पारिवारिक निर्वासन के चलते अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी. जिसके चलते वे अपने स्कूल की शिक्षिकाओं के पास जाकर विकल हुईं. वे विवाहित हुईं और पति की असमय मृत्यु के पश्चात वैधव्य उनके हिस्से में आया. मगर समाज की जड़ता भरी चुनौती का सामना करते हुए उन्होंने दूसरा विवाह किया और डाक्टर पति की सलाह पर प्राथमिक चिकित्सा शास्त्र में डिप्लोमा हासिल किया. हालाँकि वे बनना तो चिकित्सक ही चाहती थीं. उनका पहले पति से एक बेटा था और तीन बच्चे दो लड़के तथा एक लड़की दूसरे चिकित्सक पति से हुए. जिनमें गिरीश सबसे छोटे थे. धारवाड़ के परंपरागत सारस्वत समाज में पारिवारिक प्रतिष्ठा में वृद्धि करने वाला पसंद का घर लेने से लेकर नब्बे बरस की उम्र में ‘नर्मदा बचाओ’ आंदोलन के समर्थन में हाथों में तख्ती लेकर खड़ी दिखाई देने और तीन अनाथ बच्चियों को अपने और अपने परिजनों के परिवार का हिस्सा बना लेने, उन्हें सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक संरक्षण देने वाली अपनी माँ का जिक्र करते हुए गिका गर्व से भर उठते हैं.
मगर माँ को लेकर एक बात जो इस आत्मकथ्य में उभरकर आने से रह गई वह यह कि गिका ने माँ के साहसिक जीवन से कुछ प्रेरणा ग्रहण की ऐसा कोई भावप्रवाह उनके कथन में नजर नहीं आता. पिता के प्रभाव से भी वे दूर दिखाई देते हैं. संभवतया आर्थिक अभाव कम होने की वजह माँ का संघर्ष विचार और सामाजिक व्यवहार के स्तर पर ही रहा हो. जो कि रहा भी है. मगर उन्होंने उसे पिता के साथ मिलकर सहज बना लिया. अपने आत्मकथ्य के इसी हिस्से में वे अपने परिवार के सदस्यों मसलन बड़े भाई भालचंद्र, बसंत और बहन नीला की बात करते हैं. उन्होंने अपने परिवार के बारे में विस्तार से लिखा भी खूब है. भालचंद्र की शादी और उसकी पत्नी की सरनेम बदल लेने वाली चतुराई का जिक्र करते हैं. कुछ ठहरकर बारीकी से देखा जाये तो गिरीश कारनाड के सृजनात्मक व्यक्तित्व का निर्माण व्यक्तिगत स्तर पर घर से बाहर निकलकर समाज के बीच ही निर्मित होता नजर आता है. मगर यह भी सच है कि उनकी मनुष्य-दृष्टि परिवार में रहकर परिवार की सक्रियता देखते हुए ही बनना प्रारंभ होती है जिसके चलते वे आगे जाकर वे स्कूल और कालेज में शिक्षकों के बीच वैचारिक और तार्किक रूप से अधिक प्रकाशित दिखाई देते है. किसी विषय में स्कूल में शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच उनका बोला जाना आगे जाकर सबके बीच व्यवस्थित ढंग से आत्मविश्वास की तरह उनके काम आता है जिसका जिक्र वे आगे जाकर करते हैं.
गिका ने बताया है कि वे प्रारंभ में कवि ही होना चाहते थे. विश्वविद्यालय के स्तर पर अच्छी अंग्रेजी आने लगने की वजह से वे अंग्रेजी साहित्य के बड़े कवियों की कविताओं से परिचित थे. मगर वहाँ कुछ शिक्षकों ने उनका परिचय अंग्रेजी भाषा के अन्य कवियों के साथ-साथ अंग्रेजी में कविता की आलोचना की कुछ प्रमुख किताबों से कराया. कुछ से वे पूर्व से परिचित थे. अंग्रेजी कविता और उसकी आलोचना के संबंध में गिका की समझ आपको हैरत में डाल सकती है. धारवाड़ में कन्नड़ भाषा के अंग्रेजी जानने वाले और अंग्रेजी साहित्य से परिचित प्रमुख लेखकों और प्रकाशकों से उनकी मुलाकात का सिलसिला नियमित रहा. इस क्रम में मनोहर ग्रंथालय का जिक्र आता है. गिका का अधिकांश लेखन भी कन्नड़ में ही रहा. जिस पर बाद में तब के प्रमुख नाट्य निर्देशक सत्यदेव दुबे के साथ एक घटे एक प्रसंग का एक रोचक किस्सा उन्होंने इस आत्मकथ्य में शामिल किया है. जिसे इसे पढ़ते हुए आप जानेंगे.
इस संस्मरणात्मक आत्मकथ्य को पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति गिका के सृजनात्मक जीवनकाल से इस वजह से ईर्ष्या कर सकता है कि गिका को जीवन के प्रारंभ में ही वे सफलताएं मिलना प्रारंभ हो गईं जिनके चलते कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र-विशेष में शिखर चूम लेने की ख्वाहिश पाल सकता है. मगर संतोष यह कि गिका ने पूरे आत्मकथ्य में अपनी कोई इच्छा जिसे वे पूरी करना चाहते हों प्रकट नहीं की. प्रारंभ में वे कवि थे मगर नाटकों के लेखक हो गये. रंगकर्मी हो गये सिने अभिनेता हो गये. संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष और फिल्म एवं टेलीविजन ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट पुणे के निदेशक हो गये. गिका के जीवन और सृजन की जलधार सदा बहती रही. कभी सूखी नहीं. धारवाड़ से अध्ययन हेतु मुंबई पहुंचने पर भाई के साथ फ्लैट में किरायेदारों के साथ फंस-धसकर रहते हुए पढ़ने के दौरान ही उन्हें शानदार और कुछ-कुछ साक्षात्कार के मजेदार ढंग से स्कॉलरशिप मिली और जिसे हासिल कर पढ़ाई हेतु वे आक्सफर्ड विश्वविद्यालय लंदन जा पहुंचे. मुम्बई से लंदन पहुंचने तक पानी के जहाज के सफर और कॉलेज परिसर तक पहुंचने का जो दिल को गुदगुदाने वाला किस्सा है उसे आप पढ़कर जान सकते हैं. उनके परिवार के सदस्यों का यह भारतीय भय भी आपको विनोद से भर सकता है कि कहीं गिका वहाँ से किसी गोरी मेम को ब्याह कर साथ न ले आये.
गिका के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान के जीवन को वैचारिक, व्यवहारिक और व्यक्तिगत रूप से उनके सबसे शानदार जीवनकाल की तरह देखा और स्वीकार किया जा सकता है. उस पर लार टपकाई जा सकती है. पहले ऑक्सफोर्ड में जूनियर कामन रूम के अध्यक्ष उसके बाद ऑक्सफोर्ड सोसाइटी के अध्यक्ष रहने के दौरान उनका आत्मविश्वास, हासिल और समझ देखते ही बनती है. वे वहाँ कहीं भी दीन-हीन, कृपापात्र और कृतज्ञ भारतीय की तरह नजर नहीं आते. गिका का आत्मविश्वास तो पूरे आत्मकथ्य में अनुकरणीय है. ऑक्सफोर्ड यूनियन के अध्यक्ष बनने वाले तो वे दूसरे एशियाई थे उनसे पहले पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री रहीं बेनजीर भुट्टो ऑक्सफर्ड सोसाइटी की अध्यक्ष रहीं. यूनियन में ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली आधारित तीव्रतम राजनैतिक बहसो में यूनियन की वैचारिक और तार्किक भागीदारी यूनियन की युवा बौद्धिकता को विश्वसनीयता प्रदान करने के असाधारण उपक्रम की तरह सामने आती है. जिसमें कुछ प्रमुख राजनैतिक हस्तियों की भागीदारी बनी रहती. मगर कमाल की उसमें ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे विंस्टन चर्चिल का बेटा शराब में धुत होकर पहुंचा तो गीका को जिसके प्रति असम्मान प्रकट करते हुए उसे बाहर करना पड़ा. गीका हमें ब्रिटिश समाज की कमजोर श्रेणी के लिए लेबर पार्टी के ‘ग्रामर स्कूल’ और ‘विद्यार्थी वेतन’ के विषय में बताकर आत्मसंतोष से भी भरने का काम करते हैं.
ऑक्सफोर्ड में अध्ययन के चलते उनकी भारतीय एवं ब्रिटिश तथा यूरोपियन विद्यार्थियों के साथ मित्रता चमकदार रही. यहाँ उन्हें स्त्री के प्रेम और उसकी देह में डूबने के यादगार अवसर मिले. पेरिस की यात्रा में हेलेन बर्ट के साथ उनका शारीरिक समागम यादगार रहा मगर हेलन की इस रिश्ते की गंभीरता ने उन्हें जिम्मेदार भी बनाया. एक अन्य रिश्ते में भी उनके साथ यही हुआ. मगर समय के साथ वे अपनी दिशा तय करते गये. मित्र की अपने रिश्ते में आहत पत्नी को वे प्यार ही नहीं बल्कि उससे ये वादा भी कर बैठे कि यदि उसका तलाक हो गया तो वे उससे विवाह कर लेंगे. मगर उनके भारत आने के बाद उस जोड़े के बीच संबंध सुधर गये. वे माता-पिता बन गये जिसकी सूचना उन्होंने भारत में गिका को भेजी. कुछ आसान दैहिक रिश्तों में वे आगे नहीं बढ़े.
उन्होंने ऑक्सफोर्ड में अध्ययन के दौरान अपने बहकने की संभावना पर समझदारी से नियंत्रण बनाये रखा. उन्होंने लिखा भी है कि वे कभी किसी वेश्या के पास नहीं गये. मगर ब्रिटिश पबों जिनकी वे सामाजिक वैचारिक सांस्कृतिक समागम के प्रतीकों के रूप में भारी प्रशंसा करते हैं कि उन्होंने नियमित खाक छानी. विद्यार्थियों द्वारा आयोजित होने वाली पार्टियों के जिनमें लोकतत्व और लोकप्रतीक शामिल होते हैं में वे शामिल होते रहे और उन्हीं में से एक पार्टी में उन्होंने एक लड़की से पूछकर अपने जीवन का पहला चुंबन लिया. मगर बाहर रहकर उसके काम-अराजक होने की कल्पना किये जाने वाला युवा ब्रिटिश विद्यार्थी समाज कितना स्वयं संयमित और असंयमित है वे इस विषय में भी बारीकी से लिखते हैं. पार्टियों के चरम पर बिखर जाने वाला अंधेरा संयम बनाये रखता है. देह के वाह्य खेल अलग हैं और भीतर के अलग.
ऑक्सफोर्ड में पढ़ने के बीच उनका लेखन और उसका प्रकाशन प्रारंभ होता है. उनकी भारतीय प्राचीन साहित्य और मिथकों के प्रति विवेचनात्मक और आलोचनात्मक दृष्टि का प्रारंभिक विकास धारवाड़ और मुम्बई में हुए गंभीर विमर्श में हो चुका था. गिका का लिखना और प्रकाशित होना जल्दी ही प्रारंभ हुआ. जिसका परिणाम भविष्य में हमें उनके नाटकों ययाति, तुगलक, हयवदन नागमंडल और अन्य में देखने को मिला. आगे चलकर जिनका प्रकाशन और मंचन अन्य भारतीय भाषाओं के साथ-साथ भारत से बाहर हुआ. जिन्होंने गिका को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलवाई. पुस्तक के आखिर में दी गई सूची पढ़कर हम गिका के लेखन और प्रकाशन और उन्हें फिल्मों पर मिले महत्वपूर्ण सम्मान-पुरस्कार के विषय में जान सकते है.
यूनीवर्सिटी की परीक्षा में गिरीश कारनाड को द्वितीय श्रेणी हासिल हुई. जिसके बारे में गिका बताते हैं कि ये एक तरह से अच्छा ही हुआ. यदि उनकी प्रथम श्रेणी आ गई होती तो वे वहीं प्रोफेसर होकर रह जाते और शिक्षा ही उनकी सक्रियता का क्षेत्र बनकर रह जाता. जब वे भारत लौटे तो मद्रास में ओयूपी (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस) की सहायक निदेशक की नौकरी जैसे उनका इंतजार रही थी. जिसमें रहने के दौरान उन्होंने व्यक्तिगत रुचि लेकर जो किताबें प्रकाशित कीं उनमें एक कवि ए. के. रामानुजन का कविता संग्रह था. पूर्व में जिसे ओयूपी प्रकाशित करने को तैयार नहीं था. बाद में जिसकी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनी और वह पुरस्कृत हुआ. खुद गिका की भी किताबें ओयूपी से प्रकाशित हुईं. गिका के ओयूपी प्रेस के अनुभव और संसाधन उनके आगे के सिने-जीवन में बहुत काम आये. ओयूपी से मिली कार से उन्होंने मद्रास से धारवाड़ बरास्ते बंगलोर कई शानदार और सृजनकारी यात्राएं कीं. धारवाड़ और बंगलोर में उन्होंने फिर से पुरानी पहचान विकसित की जो उन्हें अंततः प्रारंभ में कन्नड़ सिनेमा फिर हिंदी सिनेमा की तरफ ससम्मान खीचकर ले गई.
कन्नड़ सिनेमा में काम करने और विवाह करने के लिए उन्होंने अपूर्व धैर्य का परिचय दिया. हालाँकि इस बीच काम की लालसा ने उन्हें गहरे विचलन से भर दिया जिसकी वजह से उनकी बौद्धिकता और सृजनात्मकता भी प्रभावित होने लगी मगर इसे संयोग ही कहा जा सकता है या दैहिक पूर्ति की आवश्यकता की तीव्र आकांक्षा के दौरान उनकी अपने से अधिक उम्र की स्वयं का व्यवसाय करने वाली एक धनी स्त्री से दीर्घ प्रगाढ़ अंतरंगता निर्मित हो गई. मगर एक स्थिति में आकर वह ठहरी और फिर स्थायी रूप से थमकर खत्म हो गई.
वे बताते हैं कि पन्द्रह बरसों की प्रतीक्षा के बाद उन्होंने और चिकित्सक सरस्वती ने विवाह किया. ये विचलन जिसने उनकी सृजन क्षमता को निराशा से बाहर खींचकर चमक प्रदान इस बीच आया. गिका ने जिसका उल्लेख बेहद सम्मान और आदर के साथ किया है. विचलन हमारे जीवन को संवारने का भी काम करते है. हर बार उनका अनादर और आलोचना भी ठीक नहीं. उन्हें समझा भी जाना चाहिए.
संस्कार, वंशवृक्ष और काड़ू फिल्मों के निर्माण के दौरान के उनके संघर्ष जिन्हें गिका ने अपने इस आत्मकथात्मक संस्मरण में संघर्ष के तौर पर नहीं अनुभव के तौर पर लिखा है. वे गहरी संवेदनशीलता के साथ जानने लायक हैं. वे कला फिल्में जिन्हें समानान्तर सिनेमा कहा गया. जिन फिल्मों ने व्यावसायिक फिल्मों के समानांतर निर्मित होते अभिनय, निर्देशन और कथानक के स्तर पर उच्च मानदंड हासिल किये. जिसकी विश्वसनीयता और गंभीरता को दर्शकों के बड़े वर्ग द्वारा स्वीकार करते हुए सराहा गया. वे कला फिल्में कितनी कठिनाइयां झेलते हुए बनकर बाहर आईं इसे गिका ने अतिरेक और भावुकता से दूर रहकर निरपेक्षता के साथ सामने रखा है. कि कितनी कठिनाइयों में पूंजी जुटाते और कितनी मितव्ययिता के साथ उसे सहकारिता के साथ खर्च करने के बाद इन फिल्मों का निर्माण हुआ और जिन्होंने खुद की श्रेष्ठता को साबित करते हुए राष्ट्रीय सम्मान हासिल किये. जिनके निर्माण में गिका के साथ-साथ बाबा कारंत और श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों और कई प्रतिभाशाली कलाकारों ने खुद को झोंक दिया.
यहाँ गिरीश कारनाड को एक माध्यम से दूसरे माध्यम में आसानी से स्थानान्तरित होते देखना लगभग जादुई है. कई माध्यमों में उनकी सक्रियता भी हैरत में डालती है. इधर वे सिनेमा में सक्रिय थे उधर उनके नाटकों की रंगमंच पर सक्रियता जारी थी. उनकी किताबें अपने पाठकों तक पहुंचने में कामयाब हो ही रही थीं.
लंदन के नेहरू सेंटर के निदेशक, भारत के हाईकमीशन के सचिव और संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रहने के पूर्व वे फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे के निदेशक रहे जहाँ उन्हें कुछ वास्तविक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. मगर वे उलझने जितनी रोचक हैं उससे कहीं अधिक सृजनात्मक भी है. जैसे उन्होंने एफटीटीआई की इस मान्यता और प्रमुखता में बदलाव हासिल करने में सफलता प्राप्त की जिसके चलते वे फिल्म के पर्दे पर जंचने (आकर्षक लगने वाले) चेहरों को ही प्राथमिकता देते थे. मगर उन्होंने साधारण लगने दिखने वाले चेहरों को प्राथमिकता देने का परिणाम मूलक बदलाव किया. जिसके चलते ओम पुरी जैसा समर्थ अभिनेता बरास्ते एफटीटीआई फिल्मों में आ सका. जिसे ओम पुरी ने सार्वजनिक रूप से किसी महत्वपूर्ण सम्मान समारोह में स्वीकार भी किया कि वे आज यहाँ गिरीश कारनाड की वजह से पहुंच सके हैं. एफटीटीआई में निदेशक रहने के दौरान उनके एक छात्र नसीरुद्दीन शाह भी रहे. वे तब भी उतने ही उग्र और आंदोलनकारी थे, जितने की वे आज हैं.
अभी कुछ दिन पहले हमने उन्हें जंतर-मंतर पर आंदोलनकारी युवाओं के बीच देखा और उन्होंने एक बयान जारी कर सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को कठघरे में भी रखा. एक्टिंग कोर्स कर रहे नसीरुद्दीन शाह ने अन्य साथियों के साथ निर्देशन का कोर्स कर रहे विद्यार्थियों की कार्यप्रणाली के विरुद्ध एफटीटीआई के खिलाफ जो कठिन और दीर्घ आंदोलन किया और उससे निपटने के क्रम में गिका ने जिस तरीके को आजमाया उसके बारे में जानना भी रोचक है. मगर गिका ने अमरीश पुरी ओम पुरी और नसीरुद्दीन शाह और अन्य के लिए अभिनय के शानदार अवसर भी बनाये. हेमा मालिनी से उनके विवाह की बात चलने वाला भी एक रोचक किस्सा है.
गिरीश कारनाड के इस संस्मरणात्मक आत्मकथ्य को जिसकी जीवन सघनता पर मेरी ये प्रतिक्रिया बहुत साधारण और संक्षिप्त है, एक शानदार, दमकीले और निरंतर सृजनात्मक-सक्रियता से भरे विशेष आत्मकथ्य के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता. उनके आगे के जीवन के बारे में जान पाने की उत्सुक जिज्ञासा और प्रतीक्षा हमेशा बनी रहेगी और न जान पाने का अफसोस भी. हो सकता है कभी कोई द्वार अथवा खिड़की खुले.
मैं यदि इस आत्मकथा को नहीं पढ़ पाता तो एक आवश्यक रूप से जाने जाने योग्य जीवन से अपरिचित रह जाता. हाँ ये भी कि मेरी इस प्रतिक्रिया को इस संस्मरणात्मक आत्मकथ्य के सार के रूप में ग्रहण करने की भूल न कर बैठें मैं इस पुस्तक के भीतर से इसका बहुत कम परिचयात्मक बाहर ला सका हूँ. बाहर तो इसे पढ़ने के लिए आमंत्रित करती मेरी यह टीप है. जो है वह तो भीतर है.
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पवन करण पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान आदि से सम्मानित. |





मैं गिरीश कर्नाड को उनके उस सीमित रूप में ही जानता हूँ जो पर्दे पर दिखाई देता रहा या इधर उधर से सामने आता रहा। उनके नाटककार और लेखक वाले पक्ष से भी थोड़ा परिचय है लेकिन इसके अलावा जो पूरा जीवन और व्यक्तित्व था उसका अंदाज़ा नहीं था।
यह समीक्षा पढ़ते हुए लगा कि हम किसी इंसान को उसकी सार्वजनिक छवि से कितना कम जान पाते हैं! किताब पढ़ी जाएगी।
गिरीश कर्नाड और अमोल पालेकर की आत्मकथाएं लगभग साथ पढ़ी मैंने। एक बड़ा अंतर मुझे मिला कि गिरीश कर्नाड जी ने बड़ी सहजता से उन प्रसंगों को लिखा है जहां रचनात्मक या वैचारिक मतभेद हुए, अनबन हुईं और आगे उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ जबकि अमोल जी ने उन प्रसंगों को अधिक तवज्जो दी है जहां वे स्वयं को सही पाते हैं। गिरीश कर्नाड जी की अभिव्यक्ति में वह ठहराव और unbiased विश्लेषण दिखता है जो आत्मकथाओं को पाठक के लिए महत्वपूर्ण बनाता है, यही खूबी Mother Mary comes to me. में भी दिखती है।
अपने बारे में जो इंसान स्वयं लिखता है, ज्यादातर विश्वसनीय नहीं होता। खासकर लेखक। उसे कथानक को नाटकीय बनाने की आदत होती है।
पवन जी ने एक प्रभावपूर्ण, रवानी गद्य से पूरी किताब या कहें लेखक गिरीश कर्नाड के जीवन और उनकी रचनाशीलता और जीवन के विविध आयामों को बखान में शामिल कर लिया है जो किसी समीक्षा की पर्याप्त जिम्मेदारी होती है। शुक्रिया।
गिका भारत के पहले Rodes scholar थे जिसके जरिए वे ऑक्सफोर्ड अध्ययन करने गए। मैं सोच रहा था क्या इसका जिक्र गिरीश कर्नाड ने नहीं किया होगा या पवन कारण नहीं किया?
इस स्कॉलरशिप के मिलने का जिक्र किया है। Rodes Scholer इस नाम का लिखना रह गया। शुक्रिया।
पवन करण जी का यह लेख पढ़कर ऐसा लगा कि बस इसे ऐसे ही पढ़ते रहें। संस्मरणात्मक आत्मकथा कितनी रोचक हो सकती है, इसको शानदार तरीके से प्रस्तुत किया।समालोचन और पवन करण जी को इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।