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Home » कुछ जगहें तुम्हें रोक लेती हैं आवाज़ देकर: कुमार अम्बुज की कुछ नई कविताएँ

कुछ जगहें तुम्हें रोक लेती हैं आवाज़ देकर: कुमार अम्बुज की कुछ नई कविताएँ

by arun dev
April 13, 2026
in कविता
Reading Time: 3 mins read
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कुछ जगहें तुम्हें रोक लेती हैं आवाज़ देकर: कुमार अम्बुज की कुछ नई कविताएँ
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कुमार अम्बुज की कुछ नई कविताएँ

 

घाव

कोई आलिंगन नहीं
हिलते हुए हाथ को भी
नि‍गाह भर के नहीं देखा
उस समय के आकाश की
लालिमा को भी नहीं देखा सिर उठाकर
अपने प्रिय गाछ को भी तुम यों ही चुपचाप
अकेले रास्ते पर अकेला छोड़ आए
तुम उस समय समझ नहीं सके थे
यह अंतिम विदाई है.

 

 

 

संभ्रम

दूर तक भटकने के बाद
तुम विश्वास कर पाते हो
अब कहीं कोई वैसी नदी नहीं है
जो तुम खो चुके हो सन् अड़सठ के चैत में
दरअसल इधर कहीं भी कोई नदी नहीं है
नदी होने की तरह नदी

सब तरफ़
धूप है रेत है और मरीचिका
तुम बार-बार पड़ जाते हो भ्रम में.

 

 

 

उपलब्धि

देखो, यह स्थापत्य
यह तुम्हारा ही मलबा है
जीवन जीने की कोशिश में
बार-बार ढहते जाने से बन गया है.

 

 

 

 

फ़र्क

तकलीफ़ होने पर
असहाय ग़रीब आदमी
केवल बद्दुआ दे सकते हैं

जिनके पास
ताक़त है सत्ता है
वे भला क्‍यों देंगे बद्दुआ
वे तो सीधे मार सकते हैं गोली.

 

 

 

 

 

क्‍योंकि

जब से माँ चली गई है
उसकी छूटी हुई चीज़ों से बातें करता हूँ
ध्‍यान रखता हूँ कि उसकी चीज़ें
कहीं गुम न हो जाएँ
अगर वे गुम गईं तो फिर
माँ की तरफ़ से बात करनेवाला
कोई नहीं रहेगा.

 

 

 

 

 

यह भी प्रेम

कुछ जगहें तुम्हें रोक लेती हैं आवाज़ देकर
कुछ जगहों पर तुम रुक जाते हो ख़ुद ब ख़ुद
एक गहरी घाटी की तरफ़ मुँह करके पुकारते हो
तुम्हारी आवाज़ लौट आती है तुम तक
यही प्रतिध्वनि हासिल है इस जीवन का

अब समय की यह सूनी घाटी है
और यह गूँज अनुगूँज
सुनो इसे
यह भी प्रेम है.

 

 

 

 

 

नित्य

मैं तुम्‍हें जानता हूँ
मगर अब तक जाने हुए को भूलकर
देखता हूँ तुम्‍हें फिर इस तरह
जैसे बिल्कुल नहीं जानता हूँ.

 

 

Painting Swagata Bhattacharyya

 

 

पलटकर देखने से

पलटकर देखने से
सांत्वना भर जाती है बोझिल दृश्य में
एक उदास आशा आशा से हो जाती है

इत्मीनान हो जाता है कि कोई
हाथ छुड़ाकर नहीं जा रहा है

पलटकर देखने से स्मृति में
पलटकर देखने की तस्वीर बन जाती है

पलटकर देखने से देख सकते हैं
कि पलटकर देखने से कोई
पत्थर का नहीं हो जाता

पलटकर देखने से याद आता है
हम सब मांसपेशियों से बने हैं
और यह हृदय भी आख़ि‍र
एक मांसपेशी है.

 

 

 

 

वयस्‍कता

बचपन एक भरा-पूरा देश था
फिर विवश मैं विस्थापित हुआ
अब भटकता हूँ जैसे शरणार्थी
रहता हूँ कहीं नहीं की
नागरिकता में.

 

 

 

 

 

विचित्र अपराध

तुम जब असमय चल बसे
तो सबने कहा
इस तरह नहीं जाना था अचानक
अभी तो कितनी जवाबदारियाँ बाक़ी हैं
बच्चे भी रोज़गार से नहीं
पत्नी के सामने है पहाड़ सी ज़िंदगी
कुछ दिनों बाद इन गमलों में
तुम्‍हारे लगाये पौधों में फूल आएँगे
क्या होगा इन सबका
तुम्हारे बिना

तुमने जीते जी सब कुछ किया
खटते रहे हँसते रहे उलझते रहे
चिंताओं में साँसत में फँसे रहे
और मरने पर
कहा जा रहा है यह सब
जैसे अचानक चले जाना
तुम्‍हारा इरादतन अपराध हुआ.

 

 

 

 

सापेक्षता

उदाहरण के लिए-
हर चीज़ का रंग केसरिया कर दोगे
तो केसरिया का कोई मतलब नहीं रहेगा

केसरिया भी तब तक ही है अर्थवान
जब तक उसके आसपास
कुछ वे चीज़ें भी हैं
जो केसरिया नहीं हैं.

 

 

 

 

तब भी 1-0

मैं फ़ुटबॉल को एक किक लगाऊँ
और हो सकता है मेरा पैर टूटकर
चला जाए गोल-पोस्ट में.

 

 

Painting : Swagata Bhattacharyya

 

मृत्युलेख
(एक बुदबुदाहट)

जैसे अकस्‍मात नामक कोई जीवन का न्‍यायाधीश है. और सारे विधान आँसुओं से गल गए हैं. शब्‍द धुँधले हो रहे हैं. अब तुम अपनी आँखों की बीनाई का क्‍या करोगे? तुम दृश्‍य में अदृश्‍य को कैसे आत्मसात करोगे. इस अंसभव को किस तरह संभव करोगे. तुम एक कोशीय जीव नहीं हो. तुम स्‍मृति का क्‍या करोगे?

मृत्‍यु ने तुम्‍हारे प्रिय को नहीं, तुम्‍हें नष्‍ट कर दिया है. तुम एक अधखाए पशु हो. स्‍थायी रूप से घायल. यह असाध्य पक्षाघात है. अब एक विकलांगता में तुम्‍हें चलना है. और इस तरह चलना है मानो तुम एकदम ठीक हो. दुरुस्त हो. लेकिन तुम क्षितिज तक कैसे चलोगे?

तुम ज्‍़यादा से ज्‍़यादा या कम से कम ज़मीन का एक छोटा-सा टुकड़ा थे. कुछ सिंचित, कुछ असिंचित. कुछ काली मिट्टी, कुछ पथरीली. अब तुम आकाश में कैसे रह सकोगे? क्‍या दुख सहन करते हुए. या दूसरों के दुख में शरीक होते हुए. सामाजिकता से या एकाकीपन से? अब तुम कुछ नहीं जानते. तुम संज्ञाहीन हो और जीवन के जबड़े में हो. तुम अकाल काल के सामने हो. तुम निर्वात हो. अब पृथ्वी के वायुमंडल में कैसे रह सकोगे?

तुम इस साक्षात् मृत्यु को कैसे स्वीकार करोगे? रो-रोकर. लिख-लिखकर. या हँसकर. संगीत से प्रतिकार करोगे? बाख़ से. मंसूर से. बीथोवन से. गंधर्व से. या नीत्‍शे से, बुद्ध से. नचिकेता से? मूर्खता से, प्रवचनों से या भावुकता से? सुभाषितों से, लोकोक्तियों से. कविता से. मूक रहकर या वाचाल होकर? लेकिन तुम मरुस्थल में किस तरह चलोगे. नाव से रेत का समुद्र कैसे पार करोगे. ध्रुव तारे के बिना किस तरह दिशा जानोगे?

आगे तुम कैसे जीओगे? छाती पर पत्थर रखकर या छाती को पाषाण बनाकर? अपने ही किसी हिस्से से रोज द्वंद्व करते हुए. बर्फ़ की सिल्ली की तरह बूँद-बूँद गलते हुए? अब जबकि तुम्‍हारे भीतर दो ही कठिन ऋतुएँ रह गईं हैं. एक में लू चलती है. दूसरी में शीतलहर. तुम्‍हें नहीं पता तुम अभी किस तापक्रम में साँस ले रहे हो. प्राणवायु लेते हो या छोड़ते हो? तुम क्‍या कह सकते हो. तुम अपनी भाषा भूल रहे हो. तुम जो कहते हो वह संप्रेषित नहीं होता. तुम काल द्वारा की गई नृशंसता के अवाक् साक्षी हो. तुम उसे क्षमा नहीं कर सकते. मगर तुम महज़ याचिकाकर्ता हो, न्यायाधीश नहीं. तुम उसे दण्‍ड कैसे दे सकते हो?

समय का उपचार तो आख़‍िर यही होगा कि समय तुम पर उदासी की परत दर परत बि‍छाता चला जाए. इस हद तक कि आदमी एक चट्टान हो जाए. अवसाद और खारेपन से निर्मित विशाल चट्टान. जिस पर हरीतिमा के नाम पर काई भी नहीं लगेगी.
क्‍या तुम किसी को एक द‍िन उत्‍खनन में मिलोगे?

नमक की जमी हुई
शिला की तरह?

 

 

कुमार अम्‍बुज

लोकतांत्रिकता, स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न समाज के पक्षधर कुमार अम्बुज का जन्म 13 अप्रैल 1957 को जिला गुना, मध्य प्रदेश में हुआ. संप्रति वे भोपाल में रहते हैं.  किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण, अमीरी रेखा और उपशीर्षक उनके छह प्रकाशित कविता संग्रह है. ‘इच्छाएँ और ‘मज़ाक़’ दो कहानी संकलन हैं. ‘थलचर’ शीर्षक से सर्जनात्मक वैचारिक डायरी है और ‘मनुष्य का अवकाश’ श्रम और धर्म विषयक निबंध संग्रह. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, ‘कवि ने कहा’, ‘75 कविताएँ’ श्रृंखला में कविता संचयन है. उन्होंने गुजरात दंगों पर केंद्रित पुस्तक ‘क्या हमें चुप रहना चाहिए’ और ‘वसुधा’ के कवितांक सहित अनेक वैचारिक पुस्तिकाओं का संपादन किया है. विश्व सिनेमा से चयनित फिल्मों पर निबंधों की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य. कविता के लिए ‘भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार’, ‘माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार’, ‘श्रीकांत वर्मा पुरस्कार’, ‘गिरिजा कुमार माथुर सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, वागीश्वरी पुरस्कार तथा कुसुमाग्रज सम्मान से सम्मानित.
ई-मेल : kumarambujbpl@gmail.com

Tags: 20262026 कविताकुमार अम्बुजकुमार अम्बुज की कुछ नई कविताएँ
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Comments 12

  1. अशोक अग्रवाल says:
    1 month ago

    कुमार अंबुज की कविताएं हमेशा पढ़ने पर नया आस्वाद प्रदान करती हैं।

    Reply
  2. उर्मिला सिंह says:
    1 month ago

    आपकी कविताएं बहुत सुंदर होती हैं। सभी कविताएं बहुत अच्छी हैं किंतु मुझे पलट कर देखने से कविता बहुत हृदय स्पर्शी लगी

    Reply
  3. ज्योतिकृष्ण वर्मा says:
    1 month ago

    कुमार अम्बुज की कविताएं मुझे विशेष रूप से पसंद हैं – सहज ग्राह्य भाषा के साथ छोटी-छोटी पर गहरी अर्थवान| ‘फ़र्क’, ‘क्योंकि’ और ‘सापेक्षता’ विशेष रूप से अच्छी लगीं| “समालोचन” पर इन कविताओं से रु-ब-रु कराने के लिए प्रिय अरुण देव जी हार्दिक आभार!

    Reply
  4. M P Haridev says:
    1 month ago

    नाव से रेत का समंदर कैसे पार करोगे । अरुण देव जी, आपने। तेज़ी जी को लिखा कि गूगल से पत्रिका का लिंक मिल जाएगा । सो आ गया ।
    इसका लिंक शेयर कर प्रिंट निकलवाऊँगा ।

    Reply
  5. Jayshree Purwar says:
    1 month ago

    कुमार अम्बुज जी की कविताएँ मुझे सदा से प्रिय हैं । कम शब्दों में गहरी बात कह देना ।

    Reply
  6. Naresh Saxena says:
    1 month ago

    कुमार अम्बुज को जन्मदिन बहुत मुबारक हो ।
    वे सबसे अच्छा लिखने वालों में हैं ।
    उन्हें बहुत बधाई और प्रेम ।

    Reply
  7. प्रिया वर्मा says:
    1 month ago

    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं 💐 बहुत सुंदर कविताएं हैं। दो पंक्ति की गोलपोस्ट वाली कविता तो बहुत ही गहरी है।

    Reply
  8. विनय सौरभ says:
    1 month ago

    कुमार अंबुज मेरे बहुत प्रिय कवि हैं। उनसे सीखा है और प्रभावित रहा हूँ ।
    ये कविताएँ वैचारिक रूप से समृद्ध करती हैं। जीवन को देखने की एक दृष्टि देती हैं।
    उन्हें जन्मदिन की मुबारकबाद।
    कविताओं के लिए समालोचन का शुक्रिया ।

    Reply
  9. Vinita Badmera says:
    1 month ago

    कुमार अंबुज की सभी कविताएं शानदार हैं लेकिन पलटकर देखने वाली अद्भुत है।
    कवि को जन्मदिन मुबारक हो।

    Reply
  10. Seema Singh says:
    1 month ago

    बहुत ही सुंदर कविताएँ
    कवि को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ

    Reply
  11. tribhuvan says:
    1 month ago

    बड़ी ही सुंदर और स्पृहा वाली कविताएँ हैं। कुमार अंबुज मेरे प्रिय कवियों में हैं। उनके यहाँ स्मृतियों और संवेद का संसार बहुत वैभवशाली है। वे अपने बचपन के हर रंग और हर परछाईं को मानो माइक्रोस्कोप के नीचे रखकर देखते हैं। घावों की लालिमा, संभ्रम की मरीचिका और माँ की छुई वस्तुओं का चुपचाप संवाद अपने में कई कमाल लिए हुए हैं। कोई आलिंगन नहीं, कोई सिर नहीं उठाया। यह विदाई का वह लम्हा है, जब समय स्वयं तितली बनकर उड़ जाता है और पीछे केवल पंखों पर चिपके परागकण रह जाते हैं। उपलब्धि का मलबा, वयस्कता का शरणार्थी-भटकाव, जीवन जीने की कोशिश में बार-बार ढहते जाना और उस ढहने से ही स्थापत्य बन जाना एक तरह का असाधारण है। असहाय गरीब की बद्दुआ और सत्ता वाले की गोली वाक़ई एक नाज़ुक-क्रूर द्वंद्व है, जिसमें हम हर रोज शक्ति और पीड़ा के बीच की हवा को पकड़ते रहते हैं। यह एक गहरी कविता है। ‘क्योंकि’ में माँ की चीज़ों से बातें करना और ‘यह भी प्रेम’ में घाटी की प्रतिध्वनि स्मृति को जीवित रखने का जादू हैं। पलटकर देखने से बोझिल दृश्य में सांत्वना भर जाती है, हृदय एक मांसपेशी मात्र होकर भी धड़कता रहता है और मृत्युलेख नमक की जमी हुई शिला की तरह हमारे जीवन में घुलकर जिजीविषा उत्पन्न करता रहता है। नित्य में ‘जाने हुए को भूलकर फिर देखना’ यह वही चिर-परिचित को अजनबी बनाने का खेल है, जो कला का मूल है। सापेक्षता का केसरिया और अंतिम किक ‘तब भी 1-0’—सब मिलकर जीवन की विचित्र अपराध-भावना को एक नाज़ुक, क्रूर, अनमोल चीज़ बना देते हैं। ये कविताएँ स्मृति की उन पारदर्शी पंखुरियों पर लिखी गई हैं, जिन्हें छूते ही वे कुम्हलाने लगती हैं। यह उनकी आधारभूत कोमलता है, जो समकालीन कविता में करुणा की तरह कम कवियों के यहाँ पाई जाती है।

    Reply
  12. अजित कुमार राय कन्नौज says:
    4 weeks ago

    कुमार अम्बुज यहाँ मृत्यु की घाटियों में जीवन राग रचते हुए दिखाई पड़ते हैं और फन्तासी शिल्प का प्रयोग करते हुए छोटे छोटे जीवनानुभवों का कोलाज रचते हैं। किन्तु उनके गद्य में उनकी कविता से अधिक काव्यात्मक सान्द्रता मौजूद है। तो क्या इस गद्य युग में कविता को भी पलट कर देखने की जरूरत नहीं है ? उसके मलबे से नया स्थापत्य रचने की जरूरत को अलक्षित नहीं किया जा सकता है ——
    हैं कुछ खराबियां मेरी तामीर में जरूर,
    सौ मर्तबा मिटा के बनाया गया हूँ मैं।

    Reply

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