| कुमार विश्वबंधु की कविताएँ |
सुबह होने तक
ऐसा होता कि मैं कविता में कुछ लिखता
और वह सच हो जाता
तो सबसे पहले मैं कविता की उस पंक्ति को काटता
जिसमें वर्षों पहले तुम चली गई थी
लिखता, देर शाम तुम वापस लौट आई हो
मैं स्कूल में परिंदों और तितलियों को आने देता
सुबह की मुलायम धूप को खिड़कियों और झरोखों के रास्ते
चुपके से क्लास रूम तक पहुँचा आता
हवाओं को बेरोक-टोक घूमने देता जहाँ भी वे चाहें
मैं होमवर्क की कॉपियों पर झुके दुनिया के सभी बच्चों को
एक बहुत बड़े घास के मैदान में खेलने भेज देता
मैं अपनी कविता में
पृथ्वी को अब तक जंगल के सारे कटे हुए पेड़ गिन-गिनकर
सही-सलामत वापस करता
मरी हुई नदियों को फिर से ज़िंदा करता
नदी के पानी में देर तक तुम्हारा हिलता हुआ चेहरा देखता
और उसी पानी से तुम्हारे लिए
समूचे आसमान को घिस-घिसकर धोता
मैं तुम्हारे साथ मिलकर सूरज, चाँद और सितारों को
अपनी कविता में उतार लाता
और फिर झार-पोंछकर वापस वहीं टाँग आता
आसमान से सदियों की जमी धूल-मिट्टी साफ करने में
न जाने हमें कितना वक़्त लगता
इसलिए तमाम खोए हुए वक़्त को ढूँढ-ढूँढकर
मैं अपनी कविता में वापस लाता
और कविता में लिखता कि धरती पर किसी भी समय में
कोई भी आदमी कहीं भी भूखा न रहे
मैं नफ़रत में लिखे हर शब्द, हर वाक्य
हर एक पंक्ति को समेटकर
पृथ्वी से बाहर अंतरिक्ष में दफन कर आता
फिर चाँद-तारों से जगमगाते आसमान के नीचे निःशब्द
हम दोनों समय की चादर बिछाकर लेट जाते
और मैं तुम्हारी सांसों में
किसी पहाड़ी नदी की तरह चुपचाप बहता रहता
सुबह होने तक.
बच्चे पढ़ रहे हैं
बच्चे
बहुत लिख रहे हैं
बहुत पढ़ रहे हैं
माँ-बाप के सपनों से गुत्थमगुत्था
लड़ रहे हैं
सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम
हांफता दौड़ता समय
उदास आँखों में काले-काले अक्षर
गड़ रहे हैं
पीठ पर भारी बेडौल बस्ता
खाने में ठंडा पास्ता
अंधेरे में जागता खेल का मैदान
और बच्चे
डर रहे हैं.
घंटी
कोई आया है दरवाज़े पर
बजा रहा है घंटी
मैं सुरक्षा के मद्देनज़र
उठा लेता हूँ पास रखी लाठी
धड़कती आँखों से झाँकता हूँ सेफ्टी होल में
खोजता हूँ कोई संदेहास्पद आकृति
दरवाज़े के पार सन्नाटे में छिपा हुआ
घात लगाए कोई ख़ौफ़नाक चेहरा
लेकिन बाहर कोई नहीं है !
कोई भी नहीं है बाहर
भीतर ओस की तरह गिर रहा है समय
कौन है? कौन है वहाँ ?
तसल्ली के लिए पूछता हूँ फिर भी
दीमक खाए किसी पेड़ के खोखल से
जैसे एकाएक सन्न से गुज़र गई हो हवा
अपनी ही आवाज़ सुनकर चौंक पड़ता हूँ
बदहवास दरवाज़ा खोलने पर
कभी दो दिन पुराना अख़बार मिलता है
कभी दूध का बासी पैकेट
कभी किसी की बरसी का कार्ड भी
पड़ा मिल जाता है कोने में
यहाँ वहाँ जमी हुई धूल से
गर्म भाप सी उठती है गंध वर्षों पुरानी
अपने समूचे मुँह पर
मकड़ी की जाली की तरह लिपटती
चिपटती आशंकाओं को नोचता सोचता हूँ
इसी तरह कोई बम रखकर चला जाएगा एक दिन
डरते डरते छूता हूँ अख़बार
काँपते हाथों से उठाता हूँ दूध का पैकेट
मानो किसी दु:स्वप्न को फलांग रहा होऊँ
दहलीज़ के अंदर आकर
जल्दी-जल्दी बंद करता हूँ छिटकनी
जाने कौन आया होगा ?
घंटी बजाकर बिना रुके चला गया वापस !
कभी-कभी तो कामवाली भी बजा देती है घंटी
अक्सर लौटते वक़्त खबरदार करते हुए
कि वह जा रही है
और मैं बंद कर लूँ घर का दरवाज़ा
क्या पता कौन घुस आए अंदर
लूट लाटकर ढाहता चला जाए सबकुछ
इसलिए जरूरी है कि हरदम सावधान रहे आदमी
ज़माना बुरा है
और जिंदगी कोयला खदान की अंधेरी सुरंग की तरह पोली
जिसमें रिस रहा है पानी हर कहीं से
क्या पता कब क्या अघटन घट जाए
कौन चढ़ आए छाती पर किसके
किसका फिर जाए दिमाग़
निकाल ले पिस्तौल चला दे गोली
हाथ में चाकू लिए
कौन ताक में बैठा हो किसके
किसी पर रत्ती भर भरोसा नहीं रहा अब तो
न दिल पर न दिमाग़ पर
न पानी पर न आग पर
इससे उससे सबसे
हर किसी से रखना होगा परहेज़
इस देश में
ज़िंदा वही बचा रह सकता है
जो नींद में भी रहे चौकन्ना होशियार
अपने सपनों में भी
साथ ले चले कुछ न कुछ हथियार
बिना आहट साँस रोके
अपनी नजरें जमाए रक्खे सेफ्टी होल में
क्या पता कब कोई हत्यारा
बजा दे दरवाज़े की घंटी !
मीटिंग
तुम उनके बीच हो और मीटिंग में हो
इसलिए जरा हँसो
हँसो क्योंकि हँसना जरूरी है
लेकिन उतना ही हँसो जितने से मालूम हो जाय
कि तुम उनके ख़िलाफ़ नहीं हो
देर तक हँसना या फिर बिलकुल ही न हँसना
जोखिम भरा हो सकता है
किसी फैसले पर पहुँचने की जल्दी मत करो
क्योंकि फैसला लिया जा चुका है
तुम यहाँ सहमति के लिए बुलाये गए हो
इसलिए चिंता मत करो
गहरी सांस लो और शरीर को ढीला छोड़ दो
लेकिन गर्दन को स्टैंड बाय पोजिशन में तैयार रखो
ताकि वक़्त आने पर
सहमति के पक्ष में उसे तुरंत हिलाया जा सके
खासकर तब जब यहाँ बैठे सभी लोग
बिना किसी ठोस वजह के बेहद खुश हो रहे हैं
जरूरी है कि तुम भी खुश दिखो
वरना खामख्वाह पहचान लिए जाओगे
मीटिंग में सबकी सुनो और चुप रहो
लेकिन इतना भी चुप-चुप मत रहो
कि चुप्पा समझ लिए जाओ
कि दूसरों को लगे कि तुम कुछ सोच रहे हो
उन्हें सोचने दो कि तुम कुछ भी नहीं सोचते
वरना उन्हें तुरंत शक हो जाएगा
कि तुम उनमें से एक नहीं हो
मीटिंग में हमेशा आखिर में बोलो
लेकिन इतना भी मत बोलो कि तुम्हारे बोलने से
पूरा का पूरा वाक्य खड़ा हो जाये
कोई शब्द बोलो तो पहले तसल्ली कर लो
कि उसमें दूर-दूर तक कोई अर्थ नहीं है
वैसे बोलने से अच्छा यह है कि उन्हीं की भाषा में
कभी हाँ-हाँ कभी हें-हें कभी हीं-हीं करो
और यदि बोलना ही पड़ जाये
तो कॉमा और फुलस्टॉप की तरह बोलो
लेकिन हमेशा प्रश्नचिह्नों से बचो
नहीं तो उन्हें देर सबेर मालूम पड़ जाएगा
कि वह तुम्ही हो
जिसके ख़िलाफ़ आधी रात को
यह आपातकालीन मीटिंग बुलाई गई है
तुम्हारा पजामा कुर्ता
पजामा-कुर्ता में कितने भले लगते हो तुम
सच, जरा भी संदेह नहीं होता
कितना जादू है तुम्हारे पजामा-कुर्ता में
अगला-पिछला कुछ भी याद नहीं रहता
मंत्र के अटूट प्रभाव की तरह
देखनेवाला ठगा-सा बस देखता ही रह जाता है
पजामा-कुर्ता में चाहे नेता हो या कि चोर
साधु हो या कि बलात्कारी
कवि हो या कि दलाल
देखने में एक जैसा भला लगता है
सच, बहुत भली पोशाक है तुम्हारी
चाहे जो कोई पहन ले
देखने में अच्छा ही लगता है
और सोचने में भी
लगता है कोई तो है
जो असल में चाहे कितना ही संदिग्ध हो
पर दीखता आदमी जैसा है
मिसफिट
पिता को न खरीदना आता था
न बेचना
मोल तोल करना न जानते थे
माँ उन्हें खूब सिखा-पढ़ाकर बाज़ार भेजती
लेकिन उनके पल्ले कुछ पड़ता नहीं था
जब कभी सौदा-सुलूफ करने निकलते
कुछ न कुछ नुकसान करके ही वापस आते थे
माँ कहती, “अहाँ लेक्चर ते बहुत दै छियै
केना पढ़वै-लिखवै छियै कॉलेज में
कुछ समझ में नै आवै छै”
पिता जवाब में केवल मुस्कुराते
बैठे-बैठे पैर हिलाते रहते
पिता साहित्य खूब समझते थे
कक्षा में विद्यार्थियों को समझा भी देते थे
पर गणित उनका हमेशा कमजोर रहा
जोड़-घटाव गुणा-भाग में अक्सर गलतियाँ कर जाते
जोड़-तोड़ कुछ आता न था
गोटी-ओटी बिठाना जानते नहीं थे
जमाने भर में मिसफिट थे
जहाँ कहीं बैठते
आसानी से अलग पहचान लिए जाते थे

चरित्र नहीं, तो साला कुछ भी नहीं
पिता पहनने-ओढ़ने के शौकीन थे
खिदिरपुर कॉलेज कलकत्ता में
एडहॉक प्रोफ़ेसर के पद पर बहाल हुए थे
पहला ही दिन था
पिता गला बंद चटख लाल स्वेटर
और खाकी जीन्स पहनकर कॉलेज पहुँचे थे
लगभग चालीस पैंतालिस साल पहले की बात है
पिता उस रोज की घटना को याद करते हुए बताते थे
कि स्टाफ रूम में उस समय मौजूद सभी प्रोफ़ेसर
कितनी बुरी तरह से बिमछ उठे थे
प्रिंसिपल साहब भी टेंशन में आ गए थे
एक सीनियर प्रोफ़ेसर ने उन्हें अलग ले जाकर चेताया भी था
कि आइन्दा ऐसे ‘छेले मानुस’ टाइप कपड़े पहनकर न आएँ
वरना नौकरी खतरे में पड़ सकती है
पिता उस समय कुछ बोले तो नही
पर मन में सोचा
धौ’ जो होगा देखा जाएगा!
सो पिता के पहनावे में आगे भी कुछ ख़ास सुधार नहीं हुआ
कोई टोकता तो पिता भी डटकर बहस करते
कहते, ख़राबी मेरे कपड़ों में नहीं है
असल में आपलोगों का एस्थेटिक सेंस ही भोथराया हुआ है
माने? तुमी बोलछो की?
माने यह कि आप लोग सोशल रेवोल्यूशन की बात तो बहुत करते हैं
पर किसी भी तरह के परिवर्तन से डरते हैं
अरे दादा, एस्थेटिक चेंज भी तो जरूरी है!
लोग हालांकि उनके तर्क का जवाब नही दे पाते थे
फिर भी आपत्ति उठाते
किन्तु एक टीचर का ड्रेस तो टीचर जैसा ही होना चाहिए न?
इस पर पिता का जवाब होता
एक टीचर का ड्रेस टीचर जैसा नहीं
बल्कि एक टीचर का ड्रेस आदमी जैसा होना चाहिए
और यह कपड़ा-तपड़ा तो बाहर की बातें है
असल चीज़ है ज्ञान
और उससे भी असल चीज़ है चरित्र!
चरित्र नहीं, तो साला कुछ भी नहीं
फिर कोट-टाई लगाओ जीन्स पहनो या कि धोती-कुर्ता
किसी को क्या फर्क पड़ता है!
|
कुमार विश्वबंधु कक्षा में साहित्य, इ इत्ता है, उ उत्ता है, नामवर सिंह का आलोचनात्मक संघर्ष, समय से संवाद 388/8, बेहाला एअरपोर्ट रोड, मेन गेट, कोलकाता-70006 |




कुमार विश्वबंधु की ये कविताएँ समकालीन सभ्यता के उस ‘सुसंस्कृत पाखंड’ और ‘अदृश्य आतंक’ का निर्मम एक्स-रे हैं, जिसे हमने अपनी दिनचर्या का सहज हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया है।
किन्तु कुमार विश्वबंधु केवल विद्रूपताओं के कवि नहीं हैं; उनके पास एक गहरा यूटोपिया और नैतिक विकल्प भी है। ‘सुबह होने तक’ फैंटेसी और प्रेम के सहारे बिगड़ी हुई दुनिया को फिर से जीने लायक बनाने की एक उदात्त कोशिश है—जहाँ कविता समय को पीछे मोड़ सकती है, नफ़रत को अंतरिक्ष में दफ़न कर सकती है और कटी हुई प्रकृति को उसका हरापन लौटा सकती है। इस पूरे परिदृश्य का नैतिक शिखर ‘मिसफिट’ है, जहाँ पिता का चरित्र इस बाजारू, जोड़-तोड़ और नफ़ा-नुकसान की दुनिया के सामने एक चट्टान की तरह खड़ा होता है। “चरित्र नहीं, तो साला कुछ भी नहीं”—यह पंक्ति इस पूरी पोएटिक्स का घोषणापत्र है, जो बताती है कि इस दौर में ‘मिसफिट’ होना ही दरअसल मनुष्य होने की एकमात्र शर्त है।
मिसफिट और मीटिंग शीर्षक कविताएं बेहतरीन लगी।
समालोचन पर हर बार कुछ नया मिलता है। निराला ।
कुमार विश्वबंधु की कविताओं का आस्वाद जिसमें बांग्ला
के शब्द हिल-मिल कर सादेपन को देशी खुशबू से भर देते हैं।
आलतू- फालतू के शब्द को पुचकारकर ऐसे फिट करते हैं मानो पालतू। मुझे बहुत पसंद आयी ये तकनीक। इन कविताओं में ‘मीटिंग’ सबसे अच्छी लगी। फिर ‘तुम्हारा पजामा कुर्ता’ , फिर ‘ चरित्र नहीं, तो साला कुछ भी नहीं ‘ और ‘मिसफिट’ । ‘मीटिंग’ को पढ़ना चाहूँगी , वीडियो बना लूँ ?
कुमार विश्वबंधु की सभी कविताएँ अच्छी लगीं। आवश्यकतानुसार भाषायी सम्मिश्रण से दो कविताएँ. ‘चरित्र नहीं, तो साला कुछ भी नहीं’ और ‘मिसफिट’ प्रभावित करती हैं परंतु सर्वाधिक पसंद आई पहली और दूसरी कविता।
हमारे समय की विडंबना है कि जिस परिमाण में आप सही, सार्थक, मानवीय और चरित्रवान होने की कोशिश करते हैं दरअसल उसी परिमाण में आप अपने समय में मिसफिट होते जाते हैं। सभी कविताएँ बड़ी शिद्दत से इस एक विडंबना की अलग-अलग कोणों से पड़ताल करती हैं।
कुमार विश्वबंधु की ये कवितायें अच्छी लगीं| ‘मीटिंग’, ‘तुम्हारा कुर्ता पजामा’ तथा ‘मिसफिट’ विशेष रूप से प्रभावित करती हैं| पंक्तियाँ “लगता है कोई तो है जो असल में चाहे कितना ही संदिग्ध हो पर दीखता आदमी जैसा है” हमारे समय की बहुत सी विद्रूपताओं को रेखांकित करती हैं| रीड बिटवीन दी लाइन्स की थ्योरी से इतर बहुत कुछ साफ़ साफ़ संकेत करती दिखाई देती हैं| कवि को बधाई!