• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » कुन फ़यकुन : दीपक त्रिपाठी

कुन फ़यकुन : दीपक त्रिपाठी

by arun dev
August 21, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 3 mins read
A A
कुन फ़यकुन : दीपक त्रिपाठी
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
कुन फ़यकुन

जटिल ‘काव्यात्मक एल्गोरिदम’ के कवि हैं आमिर हमज़ा

दीपक त्रिपाठी

 

‘किसी के बोल में तुम शिउली हुए
किसी के बोल में पारिजात
किसी के बोल में तुमने सिंगार पाया
हुए तुम—हरसिंगार!’

परम्परागत पुस्तक-चर्चा का त‌क़ाज़ा तो ये है कि मैं सबसे पहले आमिर हमज़ा के इस पहले कविता-संग्रह ‘कुन फ़यकुन’ का अर्थ बताऊँ और इसके स्रोत या सन्दर्भ की भी चर्चा करूँ, लेकिन मैं यहाँ ऐसा नहीं करूँगा, क्योंकि शीर्षक के अर्थ और सन्दर्भ को ही ध्यान में रखकर कवि ने ये कविता-संग्रह रचा है या मामला कुछ और है, ये मैं नहीं जानता. कवि ने अपनी तरफ़ से स्पष्ट भी नहीं किया है कि उसने ये नाम क्यूँ रखा है. शीर्षक का बहुत अर्थान्वेषण करने पर इस पुस्तक-चर्चा को पढ़नेवाला भटक भी सकता है. कविताओं से पहले कवि आमिर हमज़ा ने स्वयं अपनी तरफ़ से ‘कविताओं से पहले, बाद कविताओं के’ शीर्षक से एक स्वगत भी लिखा है. इसमें भी इस संग्रह के नामकरण पर कोई चर्चा नहीं है. ये संक्षिप्त स्वगत बहुत प्रतीकात्मक और अन्योक्तिपरक है. इसे पढ़कर इनकी कविताओं को समझने के कुछ सूत्र निकाले जा सकते हैं.

आमिर हमज़ा

मैं इस स्थापना-वाक्य से अपनी बात शुरू करता हूँ कि– “ये एक पठनीय कविता-संग्रह है.” ये स्थापना-वाक्य गणित के उस प्रमेय जैसा है जिसमें परिणाम को सबसे पहले सिद्ध मानकर फिर उसे प्रमाणित करने का प्रयास किया जाता है. यहाँ मैं ‘पठनीय’ शब्द को और अधिक स्पष्ट करते हुए कह दूँ कि ‘पठनीय’ से मेरा आशय ‘पढ़ने योग्य’ तो है ही, साथ में ये भी है कि इस तरह के कविता-संग्रह ही समकालीन कविता को समझने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं, इसलिए इनका पाठ आवश्यक है.

मैं यहाँ कुछ बातें बिन्दुवार उद्धृत करना चाहूँगा, जिससे कि इस किताब को पढ़ने के लिए किसी का भी मन बन सके.

 

 

पहली बात

पूरी किताब तीन भागों में विभक्त है– ‘पानी का फूल’, ‘तालाब’, ‘लाहूत के इस तरफ़’. प्रत्येक भाग में क्रमशः तेरह, दस और चौबीस कविताएँ हैं. इन तीनों खण्डों के एक-एक उपनाम भी हैं, जैसे- ‘पानी का फूल : मैं अपनी आँखें नोच-नोच खा रहा हूँ’, ‘तालाब : मरने से नहीं रोने से मरता है दुःख’, ‘लाहूत के इस तरफ़ : तुम्हें ख़ुदाई का भरम छोड़ देना चाहिए’. शीर्षक पर शीर्षक देखकर इस शीर्षकीकरण की प्रवृत्ति पर ध्यान जाना आवश्यक है कि आख़िर ऐसा क्यूँ है. प्रारम्भिक विश्लेषण से अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी वस्तु की संज्ञा-दर-संज्ञा निर्धारित करते हुए उसे चिह्नित करना, वस्तुतः उसे विशेष अर्थ एवं विशेष आग्रह के साथ देखने-समझने या पढ़ने का निवेदन करना है. ये एक प्रकार से अर्थ को स्थिरता प्रदान करने का भी उपक्रम है. ये भी कह सकते हैं कि अर्थ-अन्वेषण में शीर्षक की भी सहायता ली जाय.

ऐसा लगता है कि आमिर हमज़ा अपनी हर कविता को विशिष्ट दृष्टिकोण से पढ़ने की अपेक्षा करते हैं या आग्रह करते हैं. शायरों की पंक्तियों को कविता के शीर्षक की ‘टैग लाइन’ के रूप में लिखना साथ ही कई कविताओं के शीर्षकों के साथ उस शीर्षक को समझने के लिए के नीचे ब्रैकेट में उस कविता का सन्दर्भ या प्रसंग स्पष्ट करना आदि, एक प्रकार से कविता को किसी विशेष दृष्टिकोण से समझने का आग्रह है. बेशक ये कविता को किसी ढाँचे में बाँधने जैसा नहीं है, बल्कि कविता को सही सन्दर्भ के साथ समझने का दिशा-निर्देश है.

 

दूसरी बात

इस संग्रह में कई कविताएँ प्रकृतिपरक हैं. प्रकृति को व्यक्त करने में या प्रकृति के माध्यम से अपनी भावाभिव्यक्ति करने में कवि ने कई अनोखे प्रयोग किये हैं, एक तरह का रिस्क उठाया है, शब्दों को अपना मौलिक अर्थ प्रदान किया है, नवीनता का प्रदर्शन किया है. मैं इस सन्दर्भ में मात्र एक ही उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ, शेष इस प्रकार की अन्य कविताएँ इनके संग्रह में उपलब्ध हैं ही. इस संग्रह में एक कविता है ‘मार्च की कविता मार्च जैसी लड़की के लिए’; जैसा कि हम जानते हैं कि बसन्त ऋतु का आगमन अँग्रेज़ी कैलेण्डर के अनुसार मार्च में होता है. यहाँ आमिर चाहते तो ‘मार्च’ की जगह ‘बसन्त’ शब्द का प्रयोग कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. ऐसा इसलिए कि तब ये कविता बहुत परम्परा‌गत और बोझल हो जाती. सिर्फ़ शीर्षक बदल जाने पर ऐसी सम्भावना बन जाती है कि पूरी रचना को समझने का दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य परिवर्तित हो जाता है. इस पूरी कविता में एक बार भी ‘बसन्त’ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है. इस कविता में उस प्रकार के परम्परागत बिम्ब-प्रतिबिम्ब नहीं आये हैं जैसे कि आम तौर से आते हैं. प्रकृति पर प्रयोगधर्मी कविताएँ पढ़नेवालों को इसे अवश्य पढ़ना चाहिए.

 

तीसरी बात

इनकी कविताओं का शिल्प बहुत ही आश्चर्यजनक ढंग से विशिष्ट है. यहाँ शिल्प से मेरा आशय कविता के ‘क्रॉफ्ट’ से है, यानी उसकी ढाँचागत बनावट से है. निःसन्देह रूप से ये शिल्प किसी के द्वारा न तो सीखे जा सकते हैं और न ही सिखाये जा सकते हैं क्यूँकि ये एकदम नये और मौलिक हैं. अपनी नवीनता और मौलिकता के कारण ही इन्हें किसी की नक़्ल भी नहीं कहा जा सकता. कविताओं के फॉर्मेट सम्बन्धी कई प्रयोग एक दृष्टि में तो प्रयोगपरक या रचनात्मक कहे जा सकते हैं, लेकिन ये एक तरह का रिस्क उठाना भी है, जो कि आमिर हमज़ा ने उठाया है.

अगली विशेषता इस संग्रह में ये है कि इसमें माँ पर कई कविताएँ हैं. अपनी माँ की अन्तिम यात्रा में शामिल न हो पाने की कसक कवि को आज भी है. ऐसा लगता है कवि अपनी माँ को कविता में बचाने का प्रयास कर रहा है. हालाँकि ये कविताएँ बहुत नर्मो-नाज़ुक या मृदुल-मंजुल भाव-विभाव से युक्त नहीं हैं. माँ की दशा-दुर्दशा का बयान करते हुए आमिर कहीं-कहीं अपने पिता के प्रति बहुत सख़्त और कर्कश भी हो जाते हैं. माँ के जाने से आमिर को इतना गहरा दुख हुआ कि उन्हें अब हर वस्तु अपने से दूर जाती हुई प्रतीत होती है. जो कविताएँ इस संग्रह में माँ से सम्बन्धित हैं, उनके अतिरिक्त कई अन्य कविताओं में भी विरह की आँच महसूस की जा सकती है. ये आँच ऐसी नहीं है कि उसकी तीव्रता-तीक्ष्णता हमें उससे दूर कर दे. ये आँच हमें एक निश्चित दूरी पर स्थिर बनाये रखती है और हमें भी विरहाग्नि के ताप को महसूस कराती रहती है.

ऐसा लगता है कि माँ पर आधारित कविताओं से निकला ये वियोग-सूत्र ही विकसित होकर आमिर की तमाम कविताओं में परिव्याप्त हो गया है. आमिर की अधिकांश कविताएँ शोक और वियोग की अन्तर्धारा से अभिसिंचित हैं. मैंने ‘अभिसिंचित’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया है कि ‘विदा’, ‘अलविदा’, ‘चले जाना’, ‘बिछड़ जाना’ जैसे शब्द ही आमिर की कविताई को सींचते हैं और उसे पुष्पित-पल्लवित करते रहते हैं. ये कविता-संग्रह इसलिए भी पठनीय है कि ये हमें विरह के नवीन अनुभवों से गुज़ारता है. इन नवीन अनुभवों में एक काव्यात्मक अवसाद, एक साहित्यिक विषाद और एक लयात्मक अंतर्द्वन्द्व भी उपस्थित हैं, जो आज के ‘आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस’ और ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’ के युग में दुर्लभ हैं.

एक अन्य महत्त्वपूर्ण आयाम भी आमिर हमज़ा के यहाँ है, वो है इस्लामी सूत्रों, प्रतीकों और स्रोतों का कविता में प्रयोग, जैसे कि इस किताब का शीर्षक ही. इसके अलावा कई कविताओं में इस तरह के प्रयोग हैं. मैं इसे इस रूप में नहीं देख रहा कि कवि ने इस माध्यम से कोई जातीय अस्मिता प्रकट करने का प्रयास किया है अथवा कवि अपनी किसी धार्मिक पहचान को स्पष्ट करना चाह रहा है अथवा किसी प्रकार का साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व करना चाह रहा है. मेरा मानना है कि ये कवि की सांस्कृतिक चेतना का परावर्तन है. कविताएँ पढ़ने पर ये बात और अधिक स्पष्ट होती है कि इस्लामी इतिहास और मिथकों से अपने जीवन के जुड़ाव को आमिर एक व्यक्तिगत विचार की तरह देखते हैं. वो दूसरों को उन घटनाओं या सन्दर्भों से नहीं जोड़ना चाहते, बल्कि उन प्रसंगों और सन्दर्भों से उन्हें स्वयं जो व्यक्तिगत अनुभूति हुई है उसे महसूस कराना चाहते हैं. इतना अवश्य है कि अगर पाठक उन सन्दर्भों से वाक़िफ़ नहीं है तो कविता के मर्म तक नहीं पहुँच पायेगा या कि कुछ हिस्सा नहीं समझ पायेगा.

उर्दू-शायरी और इस्लामिक सन्दर्भों का इस प्रकार हिन्दी-कविता में आना एक प्रकार से हिन्दी और उर्दू के मिलन का अवसर बन जाने जैसा भी है. एक हिन्दुस्तानी माहौल बन जाने जैसा है. प्राय: ऐसा कम ही देखा जाता है. ये सुखद विषय है कि आमिर के पास हिन्दी के अतिरिक्त अपनी भाषा और वैचारिकी को पोषित करने के लिए एक और इतिहास, भाषा तथा साहित्य की मज़बूत पृष्ठभूमि उपलब्ध है. इससे न सिर्फ़ इनकी कविताई का सार्थक विस्तार होता है, बल्कि पाठक की साहित्य-समझ का विस्तार भी होता है. इसी साहित्य-समझ से ही समाज को गहराई से समझने की दृष्टि प्राप्त होती है. आमिर हमज़ा अपनी इस सशक्त भाषाई दक्षता का सटीक इस्तेमाल नये शब्दों को गढ़ने और उनके इस्तेमाल में भी करते हैं. कई शब्द तो अपने नयेपन के कारण चौंकाते भी हैं, जैसे— ख़्वाबनिगार, यादनिगार, विदानिगार, रंगनिगार आदि.

इस पुस्तक-चर्चा के क्रम में मैंने ऊपर ‘कुन फ़यकुन’ में संकलित कविताओं के तमाम पक्षों की तरफ़ मात्र संकेत किया है. जिस तरफ़ संकेत किया गया है उस तरफ़ जाने पर ही आमिर को विस्तार से समझा जा सकता है. इनके यहाँ कई ऐसे मज़बूत पक्ष हैं जिन पर अलग-अलग आलेख लिखे जा सकते हैं. इनका ये पहला कविता-संग्रह भले है, लेकिन ये पुख़्ता कवि हैं. इन्हें किसी नये कवि की तरह पढ़ना भूल होगी.

इस संग्रह की कई कविताएँ गद्य की सीमाओं को छूती हुई नज़र आती हैं. एक कविता है ‘बंकर में कभी नहीं, ज़मीं पर ही खिलेंगे फूल’ इसके साथ ब्रैकेट में लिखा है— ‘एटोनमेंट’ फ़िल्म की नायिका ‘सिसिलिया टैलिस’ के लिए चि‌ट्ठी कविता. इस कविता का अधिकांश गद्य जैसा है, ख़ासकर शुरुआती अंश. इस कविता का उल्लेख मैं कई कारणों से कर रहा हूँ. एक कारण तो इसका शिल्प है; दूसरा कारण कि ये कविता एक विशिष्ट सन्दर्भ से ही समझी जा सकती है. ये एक फ़िल्म की नायिका के नाम कवितारूपी चिट्ठी है या चिट्ठीरूपी कविता है. आख़िर एक अंग्रेज़ी फ़िल्म की नायिका के नाम हिन्दी में पत्र लिखकर कवि कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करना चाह रहा है. ये भी कह सकते हैं कि ये कविता उसी को समझ में आयेगी जिसने इस फ़िल्म को देखा हो, या इस नायिका से किसी अन्य फिल्म के माध्यम से परिचित हो. जब कविता में प्रवेश करते हैं तो हमारा ये भ्रम टूट जाता है टूट जाता है कि फ़िल्म देखना आवश्यक है. हम बिना फ़िल्म देखे भी इस कविता के मर्म को समझ सकते हैं. आमिर की कविताओं में गद्य-प्रधान शैली का होना या उनका किसी विशिष्ट सन्दर्भयुक्त होना केवल एक-दो कविताओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कई कविताओं में शिल्प और विषय के ऐसे प्रयोग हुए हैं, इसीलिये मैंने इस कविता का उदाहरण दिया है.

मेरा मानना है कि आमिर हमज़ा एक अपनी काल्पनिक दुनिया का निर्माण करते हैं और अपने पाठकों को उसमें आने का का आमंत्रण देते हैं. इस ‘काल्पनिक दुनिया’ को इनका अपना ‘सृजन-संसार’ भी कह सकते हैं, जो कि इनके ‘कुन’ कहने से बना है. इस संसार में भाषा से लेकर भावों और विचारों तक सबकुछ वास्तविक और यथार्थ है, मगर उसे समझने के लिए कुछ पूर्वज्ञान की आवश्यकता है. यह एक प्रकार से काव्य-व्यवस्था को ‘रिनोवेट’ (Renovate) करके वास्तविकता बयान करने का प्रयास है. इस तरह की प्रवृत्ति के कवि को सीधे तौर पर यथार्थवादी नहीं कहा जा सकता, बल्कि उसके बयानिया को समझने के लिए उसकी पूरी व्यवस्था को समझना होता है. कवि सीधे-सीधे उस वातावरण का निरू‌पण नहीं करता जिसमें वो साँस ले रहा है, बल्कि वो एक नवीन वातावरण का निर्माण करता है या नवीन वातावरण के निर्माण का प्रस्ताव करता है.

किताब की कवर के अन्तिम पृष्ठ पर कई विद्वानों की छोटी-छोटी टिप्पणी दी गयी हैं जो कि आमिर हमज़ा के कवि-व्यक्तित्व और उनकी कविता से सम्बन्धित हैं. वस्तुतः ये विचार या अतिसंक्षिप्त टिप्पणियाँ आमिर की स्वीकार्यता का प्रमाण तो हैं ही साथ ही उनके कवित्व-गुण का सूत्र-रूप में उद्घाटन भी हैं. परम्परागत शब्दावली में कहें तो ये टिप्पणियाँ आमिर के लिए आशीर्वाद जैसी भी हैं. इनमें विद्वानों ने जो कहा है, अगर आमिर को लगता है कि अभी वो उतनी श्रेष्ठता नहीं रखते, तो आमिर को वैसा बनने के लिए प्रयास करना चाहिए. इस प्रकार के विभिन्न विचारों को किताब में उद्धत करने से ये भी संकेत मिलता है कि कवि अपने पूर्ववर्ती कवियों और आलोचकों को महत्त्व देता है और है स्वयं को उन्हीं की परम्परा में जोड़कर देखता है.

 

 अन्तिम बात

आमिर की कुछ कविताएँ अपनी संवेदना और वैचारिकी में इतनी जटिल हैं कि पाठक के समक्ष एक चुनौती भी प्रस्तुत करती हैं. इनकी कविताएँ पाठक से और अधिक संवेदनशीलता तथा और अधिक प्रबुद्ध होने की माँग करती हैं. इनका ‘काव्यात्मक एल्गोरिदम’ जटिल सामाजिक और मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने के कारण कहीं-कहीं जटिल भी हो गया है, लेकिन एक बार आमिर की मनःस्थिति और वाह्य स्थिति-परिस्थिति जानने के बाद इन्हें समझना आसान हो जाता है. मैं तो यही कहना चाहूँगा कि आमिर दिन-ब-दिन जटिल होते इस समाज को व्यक्त करनेवाले कवि का प्रतिनिधित्व करते रहें और हिन्दी-कविता को इसी प्रकार समृद्ध करते रहें.

‘तुम्हारी पीठ ग़ैर पीड़ाओं की इबारत के बोझ तले दब गई
तुम्हारी आँखों के नीचे ठीक गाल के ऊपर एक तालाब बना
जहाँ बगुलों ने तुम्हारे भीतर की मछलियों को निगल डाला.’

 

पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें.

दीपक त्रिपाठी
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, हिन्दी-विभाग
रामकृष्ण कॉलेज, मधुबनी, बिहार- 847211
 ईमेल : deepakruhani@gmail.com
Tags: 20262026 समीक्षाआमिर हमज़ाकुन फ़यकुनदीपक त्रिपाठी
ShareTweetSend
Previous Post

स्मृति और दंश : विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी : कुँवर प्रांजल सिंह

Next Post

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना : पुनर्पाठ : संतोष अर्श

Related Posts

फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज
फ़िल्म

फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज

खेल-खेल में बीता जीवन : गिरीश कारनाड
समीक्षा

खेल-खेल में बीता जीवन : गिरीश कारनाड

शोक से शब्द तक : गगन गिल
आत्म

शोक से शब्द तक : गगन गिल

Comments 4

  1. विनय कुमार says:
    3 weeks ago

    आमिर की काव्यभाषा मुझे भी प्रिय है।
    भयंकर सपाट और अस्मिता मूलक अभिव्यक्तियों के दौर में मैं बिम्बों का कवि होना आसान नहीं। कई नये कवि इस कठिन मार्ग पर चल रहे, आमिर भी उनमें से एक है।
    आमिर का यह संग्रह तो नहीं पढ़ा मगर पहले कुछ कविताएँ पढ़ी हैं और इतिहास दृष्टि और लोक के प्रयोग से प्रभावित हुआ था।
    बहुत सुंदर समीक्षा।दीपक त्रिपाठी को बधाई। आलोचना की नयी भाषा के लिए।

    Reply
  2. अजेय * says:
    3 weeks ago

    अच्छी समीक्षा है। मैंने आमिर की कविताएँ पढ़ी हैं। वो एक सीरियस कवि की तरह हिंदी जगत में उभरा है। संग्रह से पहले भी अनेक रचनाएँ पढ़ीं। और संग्रह भी पढ़ रहा हूँ । उस के अपने मुंह से भी सुनी हैं ये कविताएँ। मैं आमिर को भाषा के जादूगर की तरह पढ़ता हूँ। यह रिव्यु पढ कर लगा कि अचानक ही बात खत्म कर दी गई। थोड़ी और बात होनी चाहिए थी। मन हुआहै कि कुछ लिखूँ। यहाँ लंबी टिप्पणी न दूंगा। इस लिए कि यह टिप्पणी मेरी लिखने की तड़प मिटा देगी। उसे एक आलेख बनने तक सहेज रखूंगा। फिलहाल कुछ व्यस्तताएं हैं । इंतज़ार करें।

    Reply
  3. Mohd Raza Husain says:
    3 weeks ago

    आलेख में जिस व्यक्ति की कविताओं का ज़िक्र किया गया, उन की रचनाओं से में वाक़िफ नहीं, लिहाज़ा इन पर गुफ्तगू अबस है, लेकिन मज़मून निगार ने बराय मेहरबानी कविताओं से चंद अल्फ़ाज़ नक़ल कर दिए है, और इन को हैरानकुन माना है। इन पर कुछ लिखना मुमकिन है। बेशक़ ख़्वाबनिगार, यादनिगार, विदानिगार, रंगनिगार आदि अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल आज तक शायद ही किया गया हो। ये अपने आप में एक मज़हका अम्ल है। फ़र्डिनेंड डी सोस्युर ने संकेत विज्ञान दिया, और बताया कि अल्फ़ाज़ का अज़ खुद कोई अर्थ नहीं होता, अर्थ सामाजिक परंपरा की बुनियाद पर तय होता है। ऊपर दिए गए अल्फ़ाज़ की तश्क़ील के वक़्त लिंग्विस्टिक, व्याकरण के अलावा इस सामाजिक परंपरा को फरामोश कर दिया गया है।
    ख्वाबनिगार, ख्वाब ( यानी सपना, जो आता है, या देखा जाता है) और निगार ( जो फारसी का लफ़्ज़ है जिस का अधिकांश प्रत्यय के रूप में नाम के बाद प्रयोग किया जाता है कर्तृवाचक संज्ञा के अर्थ निकलते हैं, जैसे मज़मून निगार, ख़बर निगार, नामा निगार वगैरा) को मिलाकर बनाने की नाकाम कोशिश की गई है। इस लफ़्ज़ का वजूद तस्लीम किया जा सकता है, अगर इन को पूरे संदर्भ के साथ कविताओं में पढ़ा जाए, लेकिन फिर भी ये अल्फ़ाज़ अजीब ही मालूम होंगे।
    शुक्रिया।

    Reply
  4. rahul jha says:
    3 weeks ago

    सबसे ख़ास बात यह…

    कि आमिर की कविता में…शब्दों के भीतर जो एक अविकल चाहना की बेचैनी है…तपिश है…

    वह कही-न-कहीं बहुत चुपचाप…बहुत धीरे से अपने होने की अनिश्चितता को एक गहरा अर्थ देती है…

    अपने होने की अनिश्चितता…और संभव-असंभव की पीड़ा के द्वंद से निकले एक निजी कंफेशन की तरह आमिर की कविता बहुत कुछ कहती है….

    आमिर की क़िताब पर त्रिपाठीजी ने बड़े मन स् लिखा है…!

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2026 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक