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Home » कलाओं में कुँवर नारायण की आवाजाही : प्रयाग शुक्ल

कलाओं में कुँवर नारायण की आवाजाही : प्रयाग शुक्ल

by arun dev
September 20, 2026
in कथा
Reading Time: 6 mins read
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कलाओं में कुँवर नारायण की आवाजाही : प्रयाग शुक्ल
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कलाओं में कुँवर नारायण की आवाजाही
प्रयाग शुक्ल

क्या कलाओं की दुनिया में कुँवर नारायण की आवाजाही हमें एकदम से दीख जाती है, या हमें वे कुछ दृश्‍य-चित्र अपनी कल्‍पना से, अपने अनुमान से, बनाने पड़ते हैं कि दे‍खिये यह रहे कुँवर नारायण अमुक कविता – कहानी में, चले आ रहे हैं, किसी कला-रूप का हाथ थामे हुए और उस कला-रूप की छाया-छाप आकर्षित कर रही है हमें. इसका उत्तर यही होगा कि वह आवाजाही हमें एकदम से दीख जाये, ऐसा तो होता नहीं है. कुछ चीजें ऐसी होती हैं किसी रचना के पाठ में जिन्‍हें ‘खोजना’ पड़ता है, और सुधी पाठक का तो काम ही यही है कि वह किसी रचना के भाव-अर्थ को गहरा करने के ‍लिए कुछ ढूंढ़े-खोजे. और खोजकर कुछ पाने का आनंद उठाये.

हाँ, इस खोज को कुछ दिशा या कहें कि कोई दिशा तो चाहिए होती है. तो कलाओं की दुनिया में कुँवर नारायण को आवाजाही, और उनके रचनात्‍मक जीवन में उसके प्रभाव और परिणाम, ढूंढ़ने की, एक्‍सप्‍लोर करने की, दिशा स्‍वयं हमें उनके जीवन प्रसंगों से मिल जाती है. उनके इंटरव्‍यू पढ़ते हुए और स्‍वयं उनकी कई रचनाएँ पढ़ते हुए जिनमें नाटक, संगीत, चित्रकला, फिल्‍म आदि के रेफरेंस सहज ही तैर आते हैं, हम यह तो पहचान ही लेते हैं कि कलाओं में उनकी गहरी दिलचस्‍पी रही है.

कुछ नाम भी तैर आते हैं : इब्राहिम अल्‍काजी, सत्‍यजित राय, पंडित जसराज, संयुक्‍ता पाणिग्रही, ब.व. कारंत आदि के. और तैर आती है, ऊपर को उभर आती है, सिनेमा पर उनकी पूरी पुस्‍तक. फिर वे रचनाएँ भी हैं, कविता-कहानी दोनों विधाओं में, जो किसी कला-विधा के प्रसंग से हैं.

यह कुछ गौर करने वाली बात है कि हिंदी जगत को इस बात की खबर रही है, और है, कि कुँवर नारायण का कलाओं से विशेष संबंध रहा है, एक ऐसा रिश्‍ता जिस पर ध्‍यान देने की ज़रूरत है.

यह अकारण नहीं है कि कुँवर जी की पुस्‍तक- हाँ, हम उन्‍हें यही कहकर तो बुलाते थे – ‘कुँवर जी’ – ‘जिये हुए से ज्‍यादा’ में जो इंटरव्‍यू हैं, उनमें से अधिकतर ने कुँवर जी से कलाओं से उनके रिश्‍तों पर भी कुछ न कुछ जानना चाहा है. उन्‍होंने सबके सवालों का जवाब दिया है. इन्‍हीं में से गगन गिल के सवाल और कुँवर जी के जवाब को सामने रख लेना अच्‍छा होगा.

दोनों सटीक हैं, और थोड़े में होकर बहुत कुछ कहते हैं.

गगन ने पूछा,

‘‘फिल्‍मों के साथ, खासकर विदेशी फिल्‍मों के साथ आपका एक बहुत जीवंत रिश्‍ता रहा है. अगर इनकी अनुपस्थिति में आपने काम किया होता तो…’’

इस पर कुँवर जी का जवाब है –

‘‘जरूर कुछ कमी रह जाती. मैं तो बार-बार कहता हूँ कि इतने विषयों में जाने से, इनमें रुचि रखने से मेरी सा‍हित्यिक संस्‍कृति समृद्ध हुई है. उसमें कोई कमी नहीं आयी. संगीत और फिल्‍म के क्षेत्र के लोगों से मेरे घनिष्‍ठ संवाद हुए हैं. सत्‍यजित राय, पंडित जसराज, संयुक्‍ता पाणिग्रही, केलु बाबू जैसे कलाकारों से उनके विषय पर घंटों बातें होतीं थीं, लेकिन मैं जानता हूँ कि कहाँ वे धीरे-धीरे मेरे अपने साहित्यिक जीवन को भी समृद्ध करतीं थीं.’’

इसी तरह एक प्रश्‍नोत्तर में कुँवर जी से पूछा जाता है :

‘‘संगीत एवं साहित्‍य के संबंध पर कुछ बताइये.’’

इस पर कुँवर जी का कहना है :

‘‘साहित्‍य मेरी खास दुनिया है, लेकिन वही अकेली दुनिया नहीं. उसमें दूसरी कलाओं और विषयों के साथ, पास या दूर के रिश्‍ते हैं. फिल्‍म और संगीत के साथ ज्‍यादा नजदीकी संबंध महसूस कर पाता हूँ.’’

‘‘ध्‍वनि का यद्यपि शब्‍द और संगीत दोनों में महत्‍व है, पर एक-सा नहीं. संगीत केवल ध्‍वनि के आश्रय पर भी पनप सकता है, पर कविता बिना अर्थ के अनर्गल ध्‍वनियों का शोर होकर जीवित नहीं रह सकती. उसका क्रमश: अर्थ-प्रधान होते जाना शायद एक बड़ा फर्क है जो आज की छंदमुक्‍त कविता को अगेय बनाता है.’’

तो कुँवर जी जहाँ कलाओं से अपने विशेष संबंधों को तव्‍वजो देते हैं, वहीं रचनात्‍मक दुनिया में उनके होने को कई तरह से जाँचते भी हैं. उन्‍हें पूरी तरह इस बात का भान हैं कि एक कला से दूसरी कला की अंत:क्रिया, उनके बीच परस्‍पर की संधि, किसी सीधी रेखा की तरह नहीं होती. और जहाँ एक का दूसरे के काम आने को वह स्‍वीकार करते हैं, और इसीलिए कलाओं के बीच आवाजाही करते हैं, वहीं यह भी मानते हुए दिखाई पड़ते हैं कि एक कला का दूसरी कला को प्रभावित कर सकना जहाँ हमारे लिए बोधगम्‍य होना चाहिए, वहीं उस प्रभाव को एक कला से दूसरी कला में हस्‍तांतरित होने को सावधानी पूर्वक जानना-परखना चाहिए.

मृणाल पांडे एक जगह कुँवर जी से कहती हैं,

‘‘यदि संगीतकारों से बात कीजिए तो वह कहेंगे कि देखो, हम स्‍वर से खेल रहे हैं. सभी बड़े संगीतकार कहेंगे कि हम स्‍वर से खेल रहे हैं, या फलां स्‍वर दस्‍तक दे रहा है, देखो अब इसको हम ऐसे लगाते हैं. साहित्‍य में ऐसा ….’’

कुँवर जी जैसे लपक के साथ कहते हैं,

‘‘हम मौका नहीं देते हैं. हम समझते हैं कि भाषा हमारी नौकर हैं, हमारे इस्‍तेमाल की चीज है. नहीं सोचते कि यह तो हमारी साथी है, संगी है.’’

यह बात कुँवर जी ने जिस अंदाज में, जिस उत्‍फुल्‍लता के साथ कही है, उससे यही लगता है न कि स्‍वरों से खेलने को उनका जी मचल उठा है. तो कलाएँ, साहित्‍य को, साहित्‍य की रचनाशीलता को, अपनी किसी चर्चा मात्र से प्रभावित करती हैं. और कुँवर जी ने यह बात तो कई बार कही है कि संगीतकारों से उनकी चर्चा घंटों हुआ करती थी.

जब ‘कल्‍पना’ पत्रिका के संस्‍थापक–संपादक– संचालक बदरीविशाल पित्ती पर एक पुस्‍तक संपादित कर रहा था तो मैंने कुँवर जी से भी उसके लिए एक लेख लिखने का आग्रह किया था. एक मर्म भरा लेख उन्‍होंने लिखा भी. प्रसंगवश उससे एक अंश यहाँ प्रस्‍तुत कर रहा हूँ.

‘‘पित्ती जी का लखनऊ और फैजाबाद में भी मेरे घर पर आना जाना होता रहता था – मुख्‍यत: डॉ. लोहिया और पालन जी के कारण. लेकिन हमारे बीच निकटता का मुख्‍य कारण राजनीति नहीं थी. साहित्‍य, शास्‍त्रीय संगीत और कलाओं में गहरी रुचि हमारे बीच घनिष्‍ठता का ज्‍यादा बड़ा कारण थी. उनके साथ एक बार उस्‍ताद रहीमुद्दीन खाँ डागर से लखनऊ में भेंट की एक प्रसन्‍न स्‍मृति आज भी मेरे मन में है. हैदराबाद में पुरा कलाओं, मध्‍ययुगीन चित्रों और रामकथा श्रंखला के हुसेन के चित्रों के नये संकलन को देखना एक अपूर्व अनुभव था.’’

यहीं हम यह भी याद कर सकते हैं कि हमारे समय में हिंदी के पांच-छह जिन बड़े लेखकों-कवियों का कलाओं से गहरा संबंध था, वे सब कुँवर जी के निकट रहे हैं : मसलन, ‘अज्ञेय’ शमशेर बहादुर सिंह, निर्मल वर्मा, कृष्‍णा सोबती, रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा. परख सकते हैं कि ‘कल्‍पना’ की तरह ही ‘अज्ञेय’ के ‘प्रतीक’ में भी कलाओं पर प्रचुर सामग्री आती थी. यह भी ग़ौर कर सकते हैं कि ‘प्रतीक’ में फिल्‍म, कला आदि के बाकायदा स्‍तंभ हुआ करते थे, जिनमें कपिला वात्‍स्‍यायन, रघुवीर सहाय जैसे लोग लिखा करते थे. प्रसंगवश यहाँ यह भी याद कर लेना अच्‍छा होगा कि स्‍वयं कुँवर नारायण और श्रीलाल शुक्‍ल ने जब ‘छायानट’ पत्रिका का संपादन किया ता उसमें फिल्‍म, नाटक पर जो समग्री आयी वह कला विमर्श बनाने वाली थी.

यह कुछ इन लेखकों-कवियों की बनायी दुनिया के कारण भी हुआ है कि अब युवा कवि-लेखक अपने परिचय में कलाओं के प्रति अपनी आवाजाही को उल्‍लेखनीय मानने लगे हैं. पिछले दिनों भोपाल के अपेक्षाकृत युवा कवि अनुराग तिवारी के नये कविता संग्रह में, उनके परिचय में ये पंक्तियाँ पढ़ने को मिलीं :

‘विभिन्‍न कला माध्‍यमों खासकर शास्‍त्रीय संगीत, नृत्‍य, नाट्य और लोक कलाओं में गहरी रुचि रखते हैं, या यूँ कहें कि इन रुचियों की वजह से ही वे कविता तक पहुंचे हैं.’’

कुँवर जी की एक कविता हैं : एक चीनी कवि मित्र द्वारा बनाये अपने एक रेखाचित्र को सोचते हुए –

यह मेरे एक चीनी कवि-मित्र का
झटपट बनाया हुआ
रेखाचित्र है

मुझे नहीं मालूम था कि मैं
रेखांकित किया जा रहा हूँ

मैं कुछ सुन रहा था
कुछ देख रहा था
कुछ सोच रहा था

उसी समय में
रेखाओं के माध्यम से
मुझे भी कोई
देख सुन और सोच रहा था.

रेखाओं में एक कौतुक है
जिससे एक काग़ज़ी व्योम खेल रहा है

उसमें कल्पना का रंग भरते ही
चित्र बदल जाता है
किसी अनाम यात्री की
ऊबड़-खाबड़ यात्राओं में.

शायद मैं विभिन्न देशों को जोड़ने वाले
किसी ‘रेशमी मार्ग’ पर भटक रहा था.

जो व्यक्ति और कवि कला से अच्‍छी तरह से परिचित हो जिसे कलाकृतियों की रचना का अनुमान हो, जो कला की विभिन्न रचना-विधियों को जानता हो, वही लिख सकता है, रेखाओं के कागजी व्‍योम के बारे में.

कुँवर जी की एक और कविता सामने रखते हैं :

 

         “कुछ पुरानी सीढ़ियाँ

एक चबूतरे पर कब्र-बराबर सिंहासन
लुढ़कते खंभे
‘प्रवेश’ और ‘निकास’ के लिए
किसी ज़र्द मेहराब का फाटक —
बस इतनी मंच-सज्जा काफी थी
खेलने के लिए कुछ घंटों में
‘तुगलक’ के जीवन का पूरा नाटक

साहित्‍य और कला की कौन-सी विधा का, कौन-सा गुण, दूसरी विधा में बड़ी बारीकी से, बड़ी सूक्ष्‍मता से कब, कैसे प्रवेश कर जाएगा और किसी कृति, किसी रचना, किसी प्रस्‍तुति को संपन्‍न कर जाएगा, कौन जानता है.

और एक संगीत को छोड़ दें, तो पाएंगे कि नृत्‍य, नाटक, चित्रकला, मूर्तिशिल्‍प, वास्‍तुशिल्‍प, फिल्‍म में बिंब, दृश्‍य रूप में, दृश्‍यमान रूप में उपस्थित रहते हैं, और निश्‍चय ही किसी कवि का अगर परिचय इन विधाओं से है तो उसकी कविता, बिंबों के मामलों में, इन विधाओं की बिंब-रचना से किसी न किसी रूप में प्रभावित होगी, क्‍योंकि कविता का एक मुख्‍य गुण स्‍वयं बिंब रचना का है.

कुँवर जी की कविता में, कहानियों में, बिंब-रचना की एक महत्‍वपूर्ण भूमिका है.

तो फिर हम उनसे पूछे गये एक सवाल की ओर, और उस सवाल के उत्तर को एक बार फिर याद कर लेते हैं.

सवाल था :

‘‘फिल्‍मों के साथ, खासकर विदेशी फिल्‍मों के साथ आपका एक बहुत जीवंत रिश्‍ता रहा है. अगर इनकी अनुपस्थिति में आपने काम किया होता तो…’’

छूटते ही कुँवर जी का जवाब है :

‘‘निश्‍चय ही कुछ कमी रह जाती. मैं तो बार बार कहता हूँ कि इतने विषयों में जाने से मेरी साहित्यिक संस्‍कृति समृद्ध हुई है.’’

कलाओं के प्रति कवि-कथाकार के रूप में कुँवर जी का यह कृतज्ञता भाव यही तो बताता है कि उन्‍हें इस बात का भरपूर एहसास था कि कलाओं के बीच की आवाजाही, उनके रचनात्‍मक जीवन को भी कुछ न कुछ देगी.

कला-रसिक के रूप में, सहृदय के रूप में, तो एक स्‍वाभाविक इच्‍छा कलाओं की ओर जाने की उनमें थी ही.

मैं जिन-जिन पत्र-पत्रिकाओं से संपादन के रूप में जुड़ा रहा, उनमें कुँवर जी से लिखने का आग्रह सबसे पहले इसीलिए तो करता रहा कि उनसे कुछ ऐसा मिलेगा, जिसका अपना मूल्‍य और महत्‍व होगा. जब मैं नव भारत टाइम्‍स का सहायक संपादक था तो मेरे आग्रह पर कुँवर जी ने फिल्‍म महोत्‍सवों पर लेख लिखे. जब राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका ‘रंग प्रसंग’ का संपादक था तो उसके लिए भी उनकी सुंदर टिप्‍पणियाँ मिलीं. जब संगीत नाटक अकादेमी की पत्रिका ‘संगना’ के संपादन से जुड़ा तो उस पत्रिका के लिए भी उनकी सलाह, मेरे लिए महत्‍वपूर्ण हो उठी.

आज इस सबके लिए भी, उनके प्रति एक कृतज्ञता भाव का उदय होना स्‍वाभाविक है.

कहना यही चाहता हूँ कि कलाओं के बीच उनकी आवाजाही स्‍वयं उनके रचना-जगत को तो समृद्ध करने वाली रही है, वह हिंदी जगत के भी कई रूपों में काम आयी है.

गिना सकता हूँ क‍ि कविता-कहानी में वह सीधे-सीधे भी अपनी किन रचनाओं में कलाओं से जुड़े है, या जुड़ते हुए नज़र आते हैं, पर, उसका लोभ संवरण फिलहाल इस अवसर पर, इसलिए कर रहा हूँ कि अपने-अपने स्‍वर पर ‘खोज’ का वह काम करने में हमें जो आनंद आएगा, वह किसी के बताने-सुझाने में नहीं आएगा. अपने स्‍तर पर तो यह काम मैं निरंतर करना चाहूंगा. कलाओं से उनके रिश्‍ते को हमेशा याद करते रहना चाहूंगा, क्‍योंकि जानता हूँ कि उसके बिना कुछ कमी रह जाएगी.

अंत में करता हूँ ‘बा. वा. कारंत की याद’ शीर्षक कविता का पाठ –

“मंच पर तुम्हारे प्रवेश और निकास
हमेशा ही कुछ अजीब रहे

पूरी पृथ्वी की तरह खुला मंच

और आकाश की तरह मुक्त नेपथ्य
तुम्हें विभोर करते थे

कोरस में भी जब तुम गाते
तुम्हारी सधी हुई दृढ़ आवाज़
सबके बीच भी
सबसे अलग सुनाई देती
“तुम जीनियस हो बा.वा.,” मैंने एक बार कहा था.
तुमने हँसकर कहा, “नहीं, मैं चोमन हूँ
ज़ोर-ज़ोर से अपनी ढोल पीटता
इस पूरे गँवई विश्वास के साथ
कि मैं बेजोड़ हूँ.”
उस ढोल में पोल नहीं
एक सच्ची आवाज़ है
एक अनोखी गमक,
जिसमें बसा है
एक बहुत बड़े यकीन का अनहद-नाद!

 

‘कवि, कथाकार, निबंधकार, कला समीक्षक और अनुवादक प्रयाग शुक्ल का जन्म 1940 में कोलकाता में हुआ था. उनके ’यह जो हरा है’, ’इस पृष्ठ पर’, ’सुनयना फिर न कहना’ समेत दस कविता संग्रह प्रकाशित हैं. उनके तीन उपन्यास, पाँच कहानी संग्रह और यात्रा-वर्णनों की  कई पुस्तकें भी हैं. कला पुस्तकों में ’आज की कला’, ’हेलेन गैनली की नोटबुक’ और ’कला की दुनिया में’ उल्लेखनीय हैं. उनकी यात्रा पुस्तकों में ’सम पर सूर्यास्त’, ’सुरगांव बंजारी’ और ’ग्लोब और गुब्बारे’ महत्वपूर्ण हैं.

उन्होंने बांग्ला से कई अनुवाद किए हैं. जिनमें रवींद्रनाथ ठाकुर की ’गीतांजलि’ सहित जीवनानन्द दास, शंख घोष और तसलीमा नसरीन की कविताएं शामिल हैं. बंकिमचंद्र के प्रतिनिधि निबन्धों के अनुवाद पर साहित्य अकादमी का अनुवाद पुरस्कार प्राप्त हुआ. उनकी अन्य पुस्तकों में ’अर्धविराम’ (आलोचना) और ’हाट और समाज’ (निबंध संकलन) हैं. ’कल्पना: काशी अंक’, ’कविता नदी’, ’कला और कविता’, ’रंग तेंदुलकर’ और ’अंकयात्रा’ उनकी संपादित पुस्तकें हैं.

उन्होंने बच्चों के लिए रुचि लेकर बहुत लिखा है. ’हक्का बक्का’, ’धम्मक धम्मक’, ’उड़ना आसमान में उड़ना’, ’धूप खिली है हवा चली है’, ’ऊंट चला भाई ऊंट चला’ और ’कहां नाव के पांव’ चर्चित बाल कविता संग्रह हैं. साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों के सिलसिले में उन्होंने देश-विदेश की बहुतेरी यात्राएं की हैं. वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका ’रंग प्रसंग’ और संगीत नाटक अकादमी की ’संगना’ के संपादक रह चुके हैं.’

prayagshukla2018@gmail.com

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