| लेडीज़ कूपे यात्रा की अंतर्कथाएँ पवन करण |
प्रिय अखिला
मैं जानता हूँ जिस तरह तुम हरि को नहीं भुला सकीं मैं भी इसके बावजूद कि हमने दो बार कन्याकुमारी के समुद्र तट पर बिछी बेंच पर बैठकर एक-दूसरे से परिचय को बढ़ाने वाली कुछ बात की और सन ब्रीज़ होटल के जिस कमरे में तुम ठहरी थीं उसमें तुम्हारे आमंत्रण पर कई दिनों से ठहरा हुआ एक बहने को बेताब, तीव्र आवेग और आवेशमयी, अकल्पनीय और नव-अनुभवजन्य सहवास किया.
‘कंडोम’ लेकर आये हो’
कमरे में घुसते ही आत्मविश्वास से भरा तुम्हारा बोला गया यह पहला वाक्य मेरी स्मृति में सबसे ऊपर कहीं ठहरा हुआ है. जब मैंने विदा लेते समय तुमसे पूछा-
क्या कल भी
और तुमने कोई जबाव नहीं दिया. मैं समझ गया कि तुम वैसी ही एक परिपक्व औरत थीं जिसकी मैं कल्पना किया करता था. कितने बरस हो गये हमें उस स्मृतिजन्य सांझ में एक-दूसरे को बस एक बार सम्पूर्णता में हासिल किये. मेरे उस काम आवेग के साथ-साथ जिसने तुम्हें उफान से भर दिया तुम्हें मुझे इस बात के लिए भी याद रखना होगा कि मैंने न तो तुम्हारा पीछा किया और नहीं ये जानने की कोशिश की तुम कहाँ से आईं थीं और कौन थीं. अपना नाम तो तुमने तब भी नहीं बताया था.

जो किताबें पढ़े बिना रह और जी नहीं सकते, उस समय जब हम मिले थे, मैं ऐसा मनुष्य बनने की प्रक्रिया से गुजर रहा था. चूकि हमारे बीच अधिकतम दैहिक संवाद ही हुआ अत: हम एक-दूसरे की रुचि के विषय में नहीं जान सके. मेरी देह ने तुम्हारी देह से कुछ चुगली कर दी हो तो मुझे पता नहीं. अध्ययन के इसी निरंतर प्रवाह में मुझे ‘लेडीज कूपे’ पढ़ने को मिली. जिससे मैं तुम्हारे बारे में जान सका और शुक्रिया इस बात के लिए कि उसमें आखिरी में मैं भी था.
मैं नहीं जानता कि हरि के साथ का तुम्हारा जीवन किस तरह और कितना आगे बढ़ा मगर ‘लेडीज कूपे’ से तुम्हारे बारे में जानकर मुझे ऐसा अवश्य लगा कि यदि उस ‘कामभरी’ एक शाम के साथ-साथ मुझे तुम्हारे बारे में इतना जानने को मिला होता तो मैं तुम्हारे आगे तुम्हारे जीवन में बने रहने का प्रस्ताव रखता और यह भी तुम पर छोड़ता कि तुम मुझे किस तरह अपने जीवन में बनाये रखना चाहतीं.
मुझसे विवाह करना चाहतीं या परिवार और समाज को चुनौती देते हुए मुझे अपने जीवन में बनाये रखना चाहतीं. यह सच है कि मैं तुम्हें हरि से पहले अपनी शक्ल में उस हरि को तुम्हें लौटा देता. एक दिन जिसे तुमने अपने से दूर कर दिया था. फिर बहुत कुछ तो साथ चलते हुए तय होता. फिर किताबें पढ़ते हुए ही मैंने यह जाना अखिला कि अनगिनत अखिलनंदेश्वरी हैं इस दुनिया में जिन्होंने परिवार के लिए जिम्मेदारी नाम की कब्र में खुद को दफ्न कर लिया. जिनकी इच्छाएं झरने और बहने के लिए सपने तलाशती रहीं. सपने जिन्हें सताते तथा तड़पाते और बस में अनजान हाथ जिन्हें दहकाते रहे. दिन-रात जो स्वयं को भारी महसूस करती रहीं.
तुमसे मिलने से पहले. जीवन जीते हुए, स्त्रियों के दूर-नजदीक रहते हुए मैंने कई स्त्रियों को जाना. फिर ‘लेडीज कूपे’ की स्त्रियाँ भी उनमें शामिल होती गईं. मैं जानता हूँ मुझे तुम्हारी तरफ़ से कोई जबाव नहीं मिलेगा मगर मैं तुमसे जानना चाहता हूँ कि ‘मारीकोलन्तू’ ने एकमात्र और सबसे बड़ी गलती क्या की? मेरी नज़रों में उस समय उसका वेल्लोर से अपने गांव पलूर (कांचीपुरम) लौटना उसका आत्मघाती फैसला था. काश उसने उस वक्त अपनी माँ का हाथ बंटाने के लिए चेत्तियारों के यहाँ न लौटने, बल्कि कभी वापस न लौटने का निर्णय लिया होता और अपने द्वारा कमाये पैसों से कुछ पैसे माँ के पास भेजने की बात की होती और जिनके यहाँ वह काम करती थी उन दोनों विदेशी लेडीज डाक्टरों के सुझाए मार्ग को चुनते हुए उसने पहले दाई और फिर नर्स बनने की राह पर अपना कदम बढ़ाया होता.
मुझे लगता है कोई स्त्री अशिक्षित, अल्पशिक्षित अथवा अशिक्षित कैसी भी हो उसे अपने पैरों पर खड़े करने वाले किसी अवसर को चुनने में कोई चूक नहीं करनी चाहिए. विचारणीय यह भी है कि दो आत्मनिर्भर चिकित्सक स्त्रियों के साथ रहते हुए भी उसके मन में अपने पैरों पर खड़े होने और स्वनिर्भर होकर जीने की दृढ़ता उसके मन में नहीं पनपी. यहाँ प्रश्न यह भी कि आपका परिवार आपको दांव पर लगाता है या आप परिवार के लिए अपनी जिंदगी को दांव पर लगाते हैं. इस एक मुद्दे पर अखिला तुम्हें और मारीकोलन्तु को खुद से प्रश्न करना चाहिए कि किसी भी परिस्थिति में इस व्यवहारिकता से अधिक हत्यारी भावुकता से अंततः: मनुष्य अपनी समझदार निर्णय क्षमता का उपयोग करते हुए स्वयं के लिए बचे ही.
क्या अकेलापन भोगती स्त्रियाँ और स्त्रियों के साथ रहतीं स्त्रियाँ, दोनों ही, स्त्रियों में ही अपनी काम-संतुष्टि की तलाश करने लगती हैं. मारीकोलंतु की इस जीवन यात्रा में दोनों चिकित्सक स्त्रियाँ होमोसेक्सुकल ( समलैंगिक) हैं और एक अंतराल के पश्चात वह भी, अब भी खूबसूरत अधेड़ सुजाता अक्का के लिए होमो सेक्सुअल्टी में एक टूल्स बनकर सक्रिय हो जाती है. अपने भीतर दबे-छुपे काम की संतुष्टि उसकी भी जरूरत थी.
सुजाता अक्का के परस्त्रीगामी पति के संपर्क में तो वह बाद में आती है. हालाँकि सुजाता अक्का के साथ मारीकोलंतु की काम सक्रियता स्वाभाविक और स्वीकार्य लगती है परंतु सुजाता अक्का के पति के साथ उसकी यह स्वनिर्णयित कार्रवाई एक पाठक के रूप में गले नहीं उतरती. मगर इस पर कोई गहरी आपत्ति भी नहीं है. जीवन कितने घुमाव ले, क्या पता. तब क्या हम ‘लेडीज कूपे’ में इसे इस स्थापना की तरह देखें कि स्त्री को स्त्री में वह तलाश लेना चाहिए जो उसे मात्र पुरुष से मिलता है. मगर क्या ‘यह’ मिलना ‘वह’ मिलना है.
होमोसेक्सुकलटी (समलैंगिकता) विकल्प है, मनोदशा है अथवा अंतराल को भरना है. इस पर दोनों ही विचार करने के लिए स्वतंत्र हैं वे भी जो इसमें डूबे हैं और वे भी किनारे खड़े रहकर इन्हें डूबा देख रहे हैं. मारीकोलन्तु की इस कथा में उसके दैहिक विकास के जितने मोहक वर्णन हैं उसके साथ हुए बलात्कार और उसके परिणाम के रूप में उससे जबरदस्ती बच्चे को जन्म दिलवाये जाने का विवरण उतना ही बेचैनी से भरता पीड़ादायी और डरावना है.
अखिला यदि मुझे तुम्हारा साथ मिला होता तो मैं तुम्हारी उस दोस्त कैथरीन से जरूर मिलना चाहता जिसके आगे तुमने अपने स्त्री होने को गहरी संवेदनशीलता से परखा. मैं उसके हाथ के बने अंडे ही नहीं माँस के बने व्यंजन भी (उसके हाथों की उंगलियाँ चाट लेने तक नहीं) खाता और एक बार तुम्हारे साथ जाकर तुम्हारी सरसा मामी से जरूर मिलता और उनसे कहता अपनी बेटी को लेकर लिए आपके निर्णय में भले ही, इस प्रश्न के साथ आपके साथ न होऊं कि आखिर आपके आपके आगे क्या इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं था, मगर जिंदगी जीने के लिए जरूरी आपके जज़्बे के अवश्य साथ हूँ और आपका नाम एक कसक की तरह मेरे भीतर हमेशा बसा रहेगा कि आखिर हमने स्त्रियों को कितना विकल्पहीन बना रखा है. कभी तो तुम्हें लगा ही होगा अखिला कि ठीक हुआ जो पिता की मृत्यु के पश्चात शासकीय नौकरी मिली और मैं इस तरह अपने परिवार के काम आई. देह बेचने को विवश सरसा मामी की बेटी भी घर में सबसे बड़ी थी.
लेडीज कूपे में जानकी ने जिस तरह अपने पति प्रभाकर से घर, घर के भीतर अपने कमरे, और कमरे के भीतर एक बिस्तर पर निर्मित होती, बढ़ती जाती दूरी के लिए पैदा होते कारक तत्वों पर बारीक प्रकाश डाला है वह संदेह से परे और गहन विश्वसनीय है. मुझसे पहले पढ़ने वालों ने इसे चुपचाप स्वीकार किया होगा. ये कतई नया नहीं. ये स्त्री-पुरुष के बीच अपरिहार्य कथा है जो अंततः घटकर रहती है. यहाँ जानकी का कथन इस मायने में उल्लेखनीय है कि सिर्फ पति की दिलचस्पी ही पत्नी में घटते जाते हुए कम या खत्म हो जाती हो मामला बस इतना नहीं है. पत्नी की तरफ से भी खिन्नता की यह प्रक्रिया समान रूप से घटती है. जिसमें पति-पुरुष के लिए कोई स्थान नहीं बचता. मगर दोनों आमने-सामने बैठकर इसे स्वीकार नहीं करते. बढ़ चुकी इस दूरी के लिए पति, पत्नी को दोष देता हुआ, पत्नी के सामने और बाहर सबके बीच इस बदलाव को रोना रोता घूमता है. वह इस बात को कभी स्वीकार नहीं करता कि उसमें अब उसकी पत्नी की कोई दिलचस्पी नहीं बची. वह उसे अक्सर पत्नी में काम की भावना के घट जाने के रूप में रेखांकित करता है. जानकी के कथन में आश्चर्य से भरने और तड़पाकर रख देने वाली मगर पुरुषों द्वारा अब तक अविचारित, विश्वसनीय विवरणात्मक है. हम अड़ियल पुरुषों को जानकी नामक आईने में खुद को पराजित होता देखना चाहिए.
शीला की नानी ने शीला को अपने जैसा बना लिया सबको उसका सबूत तब मिला जब शीला ने मृत नानी का जिंदा रहते नानी द्वारा किये जाने वाले श्रृंगार की तरह श्रृंगार किया. उस एक औरत को कौन औरत आत्मसात नहीं करना चाहेगी जो आगे बढ़ने वाली भविष्य की औरत को परंपरा तोड़कर उकसाती हो. जो स्त्री के जीवन में गहरे से जड़े जमाये बैठीं जड़ताओं को हँस-हँसकर तोड़ती हो. किसी स्त्री के लिए स्वयं को ऐसे शक्तिकेन्द्र में विकसित कर लेना आसान भी नहीं होता. इसकी कोख में बहुत सारा ‘सहन-करना’ छिपा होता है. इसके कंधे रीति-रिवाजों के बोझ से झुके हुए होते हैं. इसके घुटने कुरीतियों से टकरा-टकराकर टूटे हुए होते हैं. मगर इस अधोगतिगामी विश्वास को कोई औरत लगातार ठोकर मारती जाती है, मारती जाती है और एक दिन उसे अपने से दूर धकेल देती है. और अपनी ही जैसी औरतों को तैयार करने में जुटी होती है.
यहाँ मारग्रेट का मामला तो इस मामले में एकदम अलग है कि उसे हर दिन अपने पति एबी के अनवरत और उसके आगे हर क्षण तनकर खड़े रहते अपराजित अहंकार से टकराना है. वह रसायनशास्त्री है और अपने पति को उसके प्रति व्यवहार को विद्यालय में और घर के भीतर विभिन्न रसायनों और उनके प्रभावों और परिणामों की नजर से देखती है. पति से उसका प्रतिकार भी बहुत रोचक और अविश्वसनीय किस्म का है. मगर वह है. वह अपना और पति का पूरा जीवन खंगालकर सबके सामने रख देती है. स्त्री जीवन का यह भी एक पहलू है जो मारग्रेट के माध्यम से हमारे सामने आता है. इसके लिए उसने बर्दाश्त करने की अपनी क्षमता को किस हद तक सब्र करने में बदला होगा तब जाकर वह एबी को इस हद तक पहुंचा पाई होगी. ओह! अखिला ऐबी को अस्पताल छोड़कर घर जा रही मारग्रेट के चेहरे पर दिखाई दिये संतोष के बारे में मैं तुमसे कभी नहीं पूछ सकूंगा. मैं तय नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं इसे मारग्रेट का अपराध कहूँ या विवशता, मगर एक बात तो जेहन में आती है कि अंतत: हारकर उसने एबी से कानूनी रूप से अलग होने के बारे में क्यों नहीं सोचा. आखिर वह अपने अकेले रहने को वहन कर पाने में सक्षम औरत थी. क्या मारग्रेट एबी का अपने आगे पराजित होना उसका थकना-मरना देखना चाहती थी. शायद हाँ. स्त्री हो या पुरुष हरेक को किसी भी तरह के अपराध से बचना चाहिए. मगर स्त्री हो या पुरुष अपराध करने का अधिकार दोनों के पास होता है. यह कथन विवादास्पद हो सकता है मगर इस कथन की मौजूदगी से इनकार नहीं किया जा सकता.
लेडीज कूपे की प्रभादेवी उतार-चढ़ाव भरा एक संपन्न जीवन जीने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं करतीं. मगर कूपे में उनकी उपस्थिति साधारण नहीं. वह इस मामले में कुछ हटकर है कि प्रभादेवी पैसे के दम पर आगे बढ़ती हैं और उसी पैसे के बल पर खुद को दूषित होने से बचाती हुए वापस भी लौट आती हैं. उनके वापस लौटने में हम तमाम स्त्रियों का ‘स्त्री को स्वयं को समाज में खुलकर प्रस्तुत करने से भ्रमित हुए पुरुष की नजदीकी से उत्पन्न अनुभव के साथ’ वापस लौटना देख सकते हैं. मगर यह भी सच है कि ऐसे वातावरण के निर्माण में भी प्रभादेवी की ही सक्रियता थी. बात बिगड़ने की ओर बढ़ने पर जिसे वे तेजी से झटक देती हैं. प्रभादेवी का स्वयं निर्मित ‘उन्हें आनंद प्रदान करता क्रियाकलाप’ उन्हें स्वयं को स्वयं के पास लौटने का रास्ता सुझाता है. वे उस पर चलकर स्वयं से स्वयं को प्राप्त करने की कोशिश करती हैं. मगर बिस्तर पर पति के साथ तैयार इस चक्र में घूमकर वे कितना हासिल कर सकीं ये उनके अलावा कोई नहीं बता सकता.
अखिला ‘लेडीज कूपे’ पढ़कर मैं तुम्हारे द्वारा की गई बेंगलूर से कन्याकुमारी तक की गई उस यात्रा और उसमें मिलीं जानकी, शीला, प्रभादेवी, माॅरगाॅट और मारीकोलंतु को जान सका. इस जानने में मेरा स्त्री जीवन के कष्टकारी आत्मघाती, आत्मविश्वासी और आत्मनिरीक्षक जीवन-वैविध्य से परिचय और भी गहरा हुआ. मुझे लगता है इन स्त्रियों के कथन के साथ-साथ और भी असंख्य स्त्री-कथाओं से संसार की स्त्री बनती है.
किसी भी स्त्री को खंगालने पर उसके भीतर से अपने बारे में उसका कहना बाहर निकलकर आ जाएगा. उसे झाड़ने पर कितना कुछ उसके भीतर से झरेगा. ‘लेडीज कूपे’ की दुनिया मात्र स्त्रियों के कष्टों, दुखों और शोषण की दुनिया नहीं हैं. ये उपमाएं तो इसके संदर्भ में छोटी हैं. फिर वह तो प्रधान तत्व की तरह उसमें शामिल है ही. क्योंकि घर हो या बाहर वह तो हर जगह उसके पीछे पड़ा ही रहता है. वह उससे भी कहीं आगे जाकर स्त्रियों की एक ऐसी सघन मनोवैज्ञानिक, निरंतर विचारता, स्वयं को देखती और स्वयं के बारे में सोचती जाती दुनिया है, जिसमें स्त्रियों की स्वयं की पसंद, खान-पान, वस्त्र-चयन और उनके प्रभावी तथा सुविधाजनक और आकर्षक पहनावा, बनाव- श्रृंगार के बेहद बारीक दृश्य तथा हृदय और देह की आवाज के अति संवेदनशील, खटास-मिठास और उतार-चढ़ाव भरे अनपढ़े-अनसुने विवरण उपस्थित हैं. जिसमें स्त्री की आवाज़ के साथ-साथ उसकी देह की आवाज भी सुनाई देती हो, बल्कि वही अधिक सुनाई देती हो, मेरे पास इसे एक ऐसी और बढ़िया किताब कहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है. एक ऐसी किताब जिसे अपने कथनों से एक यात्रा में हर उम्र की कुछ स्त्रियों ने रचा है. जो इसे पढ़ने वाले के भीतर मात्र इन स्त्रियों की कथा नहीं रहती आधी दुनिया की कथा बन जाती है. अखिला की कथा बन जाती है.
अखिला, अभी इतना ही आगे कभी कुछ सूझेगा तो इसी तरह, जिसे तुम कभी नहीं पढ़ सकोगी, मैं फिर कहूँगा. मेरे पास सिवाय एक शानदार संसर्ग की स्मृति के कुछ नहीं था मगर अब हमेशा तुम्हारी याद बनाये रखने के लिए ‘लेडीज कूपे’ साथ है.
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| पवन करण (18 जून, 1964; ग्वालियर,म.प्र.)
प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित. |




‘लेडीज कूपे’ पर आज सुबह-सुबह पवन करण की अद्भुत समीक्षा पढ़कर लगा कि कोई श्रेष्ठतम कृति पचीस साल बाद भी अपनी अर्थवत्ता बनाए रखती है। उन्हें बहुत डूबकर और एकदम नए तरीके से इस कृति को इस तरह कुरेदा है कि इसे फिर से पढ़े बिना निग़ाहो-दिल को क़रार नहीं आएगा। अनीता नायर का बहुचर्चित उपन्यास लेडीज कूपे 2001 में प्रकाशित हुआ था और आते ही उसने भारतीय अंगरेज़ी साहित्य में असाधारण हलचल पैदा की थी। स्त्री-अनुभव को केवल उत्पीड़न, करुणा अथवा सामाजिक सुधार के परिचित विमर्श में सीमित न रखकर उसने स्त्री की इच्छा, देह, अकेलेपन, अपराधबोध, प्रतिरोध और आत्मनिर्णय के जटिल प्रदेश में प्रवेश किया।
इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद चार वर्ष बाद 2005 में शुचिता मित्तल ने किया। यह उल्लेख आवश्यक है; क्योंकि हिन्दी में अच्छे साहित्यिक अनुवाद नगण्य हैं। अधिकांश अनुवाद मूल कृति की लय, संवेदना और सांस्कृतिक ताप का ऐसा कबाड़ा कर देते हैं कि पाठक सचमुच सिर पीट ले। दु:खद यह भी है कि मूल लेखक प्रायः इन अनुवादों को पढ़ नहीं पाते; इसलिए अनुवादक की साहित्यिक हिंसा का उन्हें पता तक नहीं चलता। लेकिन शुचिता मित्तल का अनुवाद सचमुच अपने नाम की तरह शुचितापूर्ण, संवेदनशील और अत्यंत प्रभावी था। उसमें नायर के गद्य की अंतरंगता, स्त्री-मन की सूक्ष्म ऐंद्रिकता और भारतीय जीवन की घरेलू गंध सुरक्षित रही। और क़माल की बात ये है कि पवन करण ने उसे उसी गहराई से लिखा है, जिससे इस कृति के भीतर का उल्लास खिल उठता है।
शुचित मित्तल का वह अनुवाद इतना मनोहारी था कि उसे पढ़कर पूरा उपन्यास एक नैसर्गिक पाठ लगता था। किसी युवा स्त्री के भीतर के निखार और उसकी तीव्रतम भावनाओं के पैरहन के माध्यम से जो इस कृति के भीतर जो फ़ज़ा तैयार होती है, उसकी महक बरसों बरस बनी रहती है और तभी तो करण इतने बरस बाद आज की इस सहर में सारी महक भर देते हैं। किसी अनुवाद में ऐसी जीवंतता और रवानी कम ही देखने में आती है। मैंने इन पचीस बरस में इस उपन्यास को पचीस बार पढ़ा होगा और इससे भी अधिक को यह उपन्यास पढ़वाया होगा। अंगरेज़ी और हिन्दी की मेरी दोनों प्रतियाँ मुझे बहुत सुकून देती हैं और यह एहसास करवाती हैं कि स्त्री के भीतर की स्वतंत्रता की पुकार की यह कृति चलते-चलते सहज ही ब्राह्मणवादी मानसिकता पर और उसके शुचितावाद पर किस तरह मर्मांतक टिप्पणियां जड़ते हुए पुरुष वर्चस्ववाद के दाग़-दाग़ उजालों को निर्वस्त्र करती चलती है।
पवन करण ने जो लिखा है, वह पारंपरिक अर्थ में न समीक्षा है, न आलोचनात्मक आलेख और न ही किसी अकादमिक सिद्धांत का प्रदर्शन। यह एक विलक्षण पत्रात्मक पाठ है। उपन्यास की नायिका अखिला के नाम लिखा गया ऐसा प्रेमपत्र, जिसमें प्रेम से अधिक स्मृति, कामना से अधिक आत्मस्वीकार और आलोचना से अधिक नैतिक बेचैनी उपस्थित है। पवन करण ने सचमुच अद्भुत लिखा है। उन्होंने उपन्यास को बाहर खड़े आलोचक की तरह नहीं पढ़ा; वे उसके भीतर उतर गए हैं, उसके पात्रों से बात करने लगे हैं और अंततः स्वयं को उसी कथा का एक काल्पनिक पात्र बना देते हैं। मैंने यह उपन्यास पचीस साल पहले पढ़ा था और फिर जब इसका हिन्दी अनुवाद आया तो इसे फिर पढ़ा। और ये अखिला तभी से मन-मस्तिष्क में अपनी साहसिक कोमलाओं के साथ जीवंत है।
इस समीक्षात्मक रचना की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका संबोधन है, “प्रिय अखिला।” इस एक संबोधन से साहित्यिक आलोचना की निर्जीव औपचारिकता टूट जाती है। अखिला अब किसी पुस्तक के पन्नों में बंद चरित्र नहीं रहती; वह एक जीवंत और जीवित स्त्री बन जाती है, जिससे लेखक कभी कन्याकुमारी में मिला था, जिसके साथ उसने देह और स्मृति का एक संक्षिप्त संसार साझा किया था और जिसे वह बाद में उपन्यास पढ़ते हुए पहचानता है। यहाँ पवन करण कथा और जीवन, कल्पना और स्मृति, पाठक और पात्र के बीच की सीमाएँ मिटा देते हैं। अंगरेज़ी आलोचना की भाषा में कहें तो यह एक प्रकार का “पार्टिसिपैटरी रीडिंग” है। ऐसा पाठ, जिसमें पाठक पुस्तक को केवल समझता नहीं, अपने जीवन से उसकी रिक्त जगहें भरता है। इसलिए समालोचन की यह पहल एक नई शुरुआत बनती है और इसकी एक लंबी रेंज निकलकर आ सकती है। यह शैली किसी कृति की धड़कन को आवाज़ का शिल्प देकर खड़ा करती है और वह कृति हमारे बीच उपस्थित हो जाती है।
लेडीज कूपे की मूल संरचना ही असाधारण है। रेलगाड़ी का महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बा एक गतिमान स्त्री-संसार में बदल जाता है। वह वर्जीनिया वुल्फ के “अपने एक कमरे” का भारतीय, सार्वजनिक और यात्रारत रूप है। यह कमरा स्थिर नहीं है; पटरियों पर दौड़ता है। इसमें स्त्रियाँ पहली बार परिवार की दीवारों, पति या पिता की निगरानी और सामाजिक भूमिकाओं से बाहर एक-दूसरे को अपनी कहानियाँ सुनाती हैं। जहाँ तक मुझे याद है, वे जानकी, शीला, मार्गरेट, प्रभादेवी और मारीकोलंतु थीं। उनकी कथाएँ मिलकर एक बहुस्वरीय आख्यान रचती हैं। कोई एक स्त्री सम्पूर्ण स्त्री-अनुभव का प्रतिनिधित्व नहीं करती; प्रत्येक आवाज़ दूसरी आवाज़ को जटिल बनाती है।
पवन करण की दृष्टि इन स्त्रियों के दुःख पर ही नहीं ठहरती। वे उनकी इच्छाओं, ग़लतियों, प्रतिशोधों और नैतिक अस्पष्टताओं की पड़ताल करते हैं। मारीकोलंतु के जीवन में वे वर्ग, अशिक्षा, बलात्कार, मातृत्व, समलैंगिक इच्छा और आर्थिक निर्भरता के उलझे हुए प्रश्न देखते हैं। मार्गरेट के अपने अहंकारी पति एबी के विरुद्ध विचित्र प्रतिकार को वे सरल स्त्री-मुक्ति घोषित नहीं करते; उसके भीतर अपराध, विवशता और दबी हुई हिंसा का त्रिकोण खोजते हैं। जानकी के माध्यम से वे यह साहसिक बात स्वीकार करते हैं कि वैवाहिक जीवन में केवल पति की रुचि पत्नी में समाप्त नहीं होती—पत्नी भी पति से भावनात्मक और दैहिक रूप से विरत हो सकती है। यहाँ पुरुष-पाठक पहली बार अपने पितृसत्तात्मक आत्मविश्वास के आईने में स्वयं को पराजित देखता है।
यही पवन करण के पाठ को विशेष बनाता है। यह स्त्री-विमर्श पर अधिकार जताता हुआ पुरुष का लेख नहीं, स्त्री-कथाओं के सामने स्वयं को प्रश्नांकित करता पुरुष-पाठक है। फिर भी यह पाठ पूर्णतः निर्दोष नहीं है। आरम्भिक दैहिक स्मृति और अखिला को सम्बोधित पुरुष-स्वर में कहीं-कहीं स्त्री को पुरुष की कामना के माध्यम से पुनः निर्मित करने का जोखिम दिखाई देता है। लेकिन पवन करण इस जोखिम से भागते नहीं। वे अपनी इच्छा, अपनी कल्पना और अपनी सीमाओं को छिपाते नहीं हैं। यही ईमानदारी उनके लेख को पुरुष-दृष्टि का उत्सव बनने से बचाकर पुरुष-दृष्टि की आत्मपरीक्षा में बदल देती है।
अंततः पवन करण हमें यह बताते हैं कि महान उपन्यास पाठक को केवल पात्रों से परिचित नहीं कराता; वह उसके भीतर छिपे हुए मनुष्य को भी उसके सामने उपस्थित करता है। लेडीज कूपे पढ़ने के बाद अखिला केवल अखिला नहीं रहती—वह उन असंख्य स्त्रियों का नाम बन जाती है, जिन्होंने परिवार की जिम्मेदारी नामक कब्र में अपनी इच्छाएँ दफना दीं, फिर भी जिनकी देह, स्मृति और स्वप्न किसी अदृश्य रेलगाड़ी में निरंतर यात्रा करते रहे। पवन करण ने उन आवाज़ों को सुना ही नहीं, उनके सामने अपना हृदय, अपनी कामना और अपनी पुरुष-सत्ता भी रख दी है। इसी कारण उनका यह लेख समीक्षा से आगे जाकर साहित्य के साथ किया गया एक अत्यंत आत्मीय, बेचैन और अविस्मरणीय संवाद बन जाता है।
Would like to read both, hindi and english, editions. I remember Shuchita Mittal from her Vanita days….a long time ago.
Would also read it against The Women of Brewster Place.
एक कथन इस समीक्षा में “अपराध करने का अधिकार स्त्री और पुरुष दोनों के पास है” ।
यही इस समीक्षा का हासिल ओर फिक्र को मुंतशिर कर देने वाला कथन है।