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समालोचन

Home » साहित्य और एआई: कॉपीराइट का संकट: सारंग उपाध्याय

साहित्य और एआई: कॉपीराइट का संकट: सारंग उपाध्याय

by arun dev
May 4, 2026
in आलेख
Reading Time: 14 mins read
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साहित्य और एआई: कॉपीराइट का संकट: सारंग उपाध्याय
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साहित्य और एआई
 कॉपीराइट का संकट सारंग उपाध्याय

 

रचना प्रक्रिया के भीतर न केवल भावना, कल्पना, बुद्धि और संवेदनात्मक उद्देश्य होते हैं; वरन् वह जीवनानुभव होता है जो लेखक के अंतर्जगत् का अंग है, वह व्यक्तित्व होता है जो लेखक का अंतर्व्यक्तित्व है, वह इतिहास होता है जो लेखक का अपना संवेदनात्मक इतिहास है.

मुक्तिबोध

 

साहित्य जीवन की अभिव्यक्ति है. बाह्य जगत् की पीड़ा से उपजी अनुभूतियों का संसार. शब्द यहाँ अभिव्यक्ति का माध्यम हैं लेकिन सजृन चेतना में धंसे जीवन, स्मृति और संघर्ष से उपजी वेदना. मुक्तिबोध कहते हैं लेखन ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान से गुजरती यात्रा है. ऐसी यात्रा जहाँ एक कविता भाषा से पार समय के भीतर दर्ज एक संवेदनात्मक हस्तक्षेप है तो एक कहानी कथानक और पात्रों से दूर अपने परिवेश की अनुभूति का साक्ष्य. प्रेमचंद के लिए साहित्य यथार्थ की दृष्टि है जहाँ सत्य संपूर्ण रूप से उद्घाटित होता है और वह कितना ही विभत्स क्यों ना हो वहाँ जीवन का आनंद होता है और यह कृत्रिम नहीं बल्कि सच्चा होता है. लेकिन इस समय की विडंबना ही है कि साहित्य का यही संसार कृत्रिम हो रहा है और उसके भीतर का सत्य मशीनी.

डेढ़ दशक पूर्व ब्लॉग, इंटरनेट, वेबसाइट्स ने साहित्य को विस्तार दिया वहीं अब एआई जैसी प्रौद्योगिकी इसे बंधक बना रही है. एग्लोरिदम भाषा रच रहे हैं और साहित्य केवल शब्द संयोजन की संरचना बन रहा है जिसमें ना अनुभव की गहराई है ना भावनाओं की आंच और तो और जीवन संघर्ष की गर्माहट तक अनुपस्थित है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह वही साहित्य है जिसे हम पीढ़ियों से अपनी आत्मा की सच्चाई समझते रहे हैं? क्या मशीनें एक लेखक की अनुभूति, स्मृति और संघर्ष को अनुभव कर जी सकती है? यह केवल सृजन है या अनुकरण? क्या यह हमारे पुरखों द्वारा रचित लेखन पर कब्जा है?

दरअसल, आज एआई और रचना प्रक्रिया का यह विमर्श हिंदी साहित्य का ही नहीं बल्कि वैश्विक है. एआई लेखन को अप्रत्याशित गति और विस्तार दे रहा है लेकिन साहित्य की परंपरा को ध्वस्त कर रहा है. जैसे कला के विविध क्षेत्रों के अनुशासन को इस तकनीक ने भंग किया है वैसे ही यह साहित्य की रचना प्रक्रिया को ही नष्ट कर रहा है बल्कि ज्यादा आक्रामक तरीके से कर रहा है. मात्र दो से ढाई साल के अंदर ही चैट बॉट्स ने कहानियों, कविताओं सहित लेखन की हर विधा के भीतर सृजन के ऐसे सूत्र पकड़ लिए हैं जिन्हें साधने के लिए किसी लेखक अपना समय और जीवन होम करना होता था. यह त्रासदी ही है कि सालों की साधना, असंख्य किताबों की यात्रा और आत्मा की गहरी अनुभूतियाँ एक प्रॉम्प्ट में आकर सिमट गई हैं.

आज वैश्विक स्तर पर हर रचनात्मक और सृजनशील व्यक्ति एआई टूल्स के ऐसे लेखन पर सोचने के लिए मजबूर है कि क्या यह वाकई लेखन है? और यदि है तो फिर मौलिकता की जगह कहाँ है? एक लेखक के अधिकार कहाँ हैं? क्या ऐसे मशीनी लेखन को स्वीकृति मिलनी चाहिए? और यदि नहीं मिलना चाहिए तो फिर क्या ऐसी बड़ी एआई कंपनियों को खून सींचकर लिखे गए शब्दों को क्या महज वाक्य संरचना में हेर-फेर करके लूट लेने दिया जाएगा?

आज इस दौर का यथार्थ है कि एआई मशीन लर्निंग के बूते लाखों किताबों से सीखता है और नई सामग्री उत्पन्न करता है. एक प्रॉम्प्ट से पूरी कहानी या कविता जेनरेट हो सकती है और विश्लेषण भी हो सकता है. सूचना से लेकर विचारों को प्रवाहपूर्ण तरीके से शब्दों और भाषा में पिरोकर प्रस्तुत कर सकता है जबकि विषय की विविधता और ज्ञान का अपार विस्तार जनरेटिव एआई की ताकत ही बन चुकी है.

आज चैट बॉट्स की इन क्षमताओं के बूते कहा जा रहा है कि एआई लेखन को लोकतांत्रिक बना रहा है और हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की शक्ति दे रहा है लेकिन सवाल यह भी है कि पुराने डेटा से सीखकर नया रचने की इस प्रक्रिया में आखिर कॉपीराइट, मौलिकता और लेखकों की आय का क्या होगा? प्रश्न यह भी होगा कि क्या लेखन को भविष्य में आउटपुट ही मानना है तो फिर इससे जुड़ा मालिकाना हक और जिम्मेदारी एआई को ही सौंप दी जाए और यदि लेखक समाज़, लेखन को मनुष्य के जीवन संघर्ष की कीमती संपदा मानता है तो फिर मशीनी लेखन को अनुकरण मानकर नकार दे और अपने अनुभव से पैदा हुई लेखन की इस संपदा लिए एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार हो जाए.

आज चैट बॉट्स के आने के बाद लेखन की दुनिया एआई को लेकर स्वीकारोक्ति भाव की बजाय आमने-सामने की लड़ाई में है. अन्याय, उत्पीड़न और विषमताओं के लिए खड़े होने वाले लेखक समुदाय ने एआई चैट बॉट कंपनियों पर सीधे आरोप लगाया है कि इन चैट बॉट्स को कच्चा माल दे कौन रहा है? लिखे हुए को ही बुनकर, गुनकर और हेर-फेर के साथ प्रस्तुत कर देने में सबसे ज्यादा नुकसान एक लेखक का ही हो रहा है? आखिर कंपनियों को ये हक किसने दिया? यही वजह है कि वे मौलिक लेखन को बचाने के लिए आवाज उठा रहे हैं और इन कंपनियों को कानूनी की दहलीज पर खींच रहे हैं. 2023 में ही 13 हज़ार से अधिक लेखकों के प्रतिनिधित्व करने वाला अमेरिकी संगठन ऑथर्स गिल्ड कोर्ट पहुंच गया. संगठन ने न्यूयॉर्क की मैनहटन फेडरल कोर्ट में ओपनएआई के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन का मुकदमा दायर किया. आरोप था कि चैटजीपीटी को ट्रेन करने के लिए लाखों कॉपीराइट किताबों का इस्तेमाल बिना अनुमति किया गया और उनसे डेरिवेटिव वर्क्स बनाए गए. यही नहीं मेटा को भी घेरा गया और उसके खिलाफ भी मुकदमा हुआ जिसमें कहा गया कि उसके एलएलएएमए मॉडल को ट्रेन करने के लिए हजारों किताबें उठाई गईं.

हालांकि इस मामले में लेखकों को अधूरी जीत मिली. 25 जून 2025 को मेटा को तकनीकी आधार पर एक जीत मिली, जब फेडरल जज ने कहा कि ट्रेनिंग में किताबों का उपयोग फेयर यूज़ माना जा सकता है. इधर कानूनी विश्लेषक भी मानते हैं कि मेटा ने कुछ मामलों में आंशिक राहत पाई है. हालांकि इस बात से कम से कम यह तो तय हो गया कि एआई कंपनियों को पूरी तरह मनमानी की छूट नहीं मिल सकती. लेकिन सबसे अच्छी बात यह रही कि लेखकों के आक्रोश और दायर किए गए इन मुकदमों ने लेखकों को अपनी चिंता खुलकर सामने रखने का मौका दिया. इधर ओपनएआई के खिलाफ मुकदमा अभी भी चल रहा है

खास बात यह है कि इस पूरे मामले में कई लेखकों ने सीधे विरोध जताया. जोनाथन फ्रांजन, जिनकी कृतियाँ द करेक्शन्स और फ्रीडम अमेरिकी साहित्य की पहचान मानी जाती हैं मानते हैं कि जनरेटिव एआई असल में सिलिकॉन वैली द्वारा कंटेंट प्रोवाइडर्स के शोषण का एक नया तरीका है. लेखकों को यह अधिकार होना चाहिए कि वे तय करें उनके कार्य कब और कैसे इस्तेमाल हों, और यदि वे सहमत हों तो उन्हें उचित मुआवज़ा मिले.

इधर फैंटेसी की दुनिया के दिग्गज जॉर्ज आर.आर. मार्टिन, जिनकी अ सॉन्ग ऑफ आइस एंड फायर सीरीज़ ने गेम ऑफ थ्रोन्स को जन्म दिया ने गिल्ड की वेबसाइट पर लिखा- हम लेखक उन कहानियों के रचयिता हैं, जिन्हें एआई कंपनियाँ अपने मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं. हमारे काम के बिना उनकी तकनीक कुछ भी नहीं है. अब वक्त आ गया है कि हम खड़े हों और अपने अधिकारों की रक्षा करें.

यह बहस यहीं तक सीमित नहीं रही. 2025 में ही मिडनाइट्स चिल्ड्रन और द सैटेनिक वर्सेज जैसे क्लासिक्स के लेखक सलमान रुश्दी ने लंदन में जारी सोसाइटी ऑफ ऑथर्स के ओपन लेटर पर हस्ताक्षर करते हुए कहा- एआई साहित्य को कमजोर कर रहा है, क्योंकि यह कल्पना की जगह कॉपी करता है. इसी पत्र में बुकर पुरस्कार विजेता द सेंस ऑफ ऐन एंडिंग के लेखक जूलियन बार्न्स ने जोड़ा- साहित्य में एआई का उभार एक बौद्धिक चोरी है, जो मानवीय रचनात्मकता का मूल्य घटा देता है.

दिलचस्प बात यह है कि एआई पर आपत्तियाँ किसी एक लेखक या देश तक सीमित नहीं रहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय लेखक संगठन भी इसमें कूद पड़े. पेन इंटरनेशनल, यूरोपियन राइटर्स काउंसिल और राइटर्स गिल्ड ऑफ अमेरिका जैसे बड़े और प्रमुख लेखक संगठनों ने अलग-अलग सांस्कृतिक और भौगोलिक संदर्भों से आते हुए भी एक साझा चिंता जताई. संगठनों ने माना कि एआई लेखन, लेखक और साहित्य की नैतिक संरचना के लिए एक संभावित खतरा है. ऑथर्स गिल्ड ने तो 2025 में ह्यूमन ऑथर्ड नाम का एक सर्टिफिकेशन ही लॉन्च कर दिया कि पाठक यह पहचान सकें कि वे जो पढ़ रहे हैं वह एआई मुक्त है या नहीं. गिल्ड की सीईओ मैरी रासेनबर्गर दो टूक कहा कि एआई लेखकों के कार्यों का शोषण कर रहा है, और हमें पारदर्शिता की जरूरत है ताकि पाठक जानें कि क्या पढ़ रहे हैं मानवीय रचना या मशीन की नकल.

इधर पेन इंटरनेशनल, जो एक सदी से अधिक समय से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लेखकीय अधिकारों की रक्षा करता आया है ने तो अपनी वेबसाइट पर मांग ही कर डाली कि प्रकाशक और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स हर किताब के कवर पर स्पष्ट रूप से लिखें कि वह एआई जनरेटेड है या नहीं. पाठकों को यह जानने का अधिकार है कि वे मानवीय रचनाकार की किताब पढ़ रहे हैं या मशीन की नकल. हालांकि अमेरिका में राइटर्स गिल्ड ऑफ अमेरिका का रुख अपेक्षाकृत व्यावहारिक रहा, गिल्ड एआई को सहायक उपकरण मानने को तैयार है, लेकिन लेखक की सहमति, श्रेय और रचनात्मक नियंत्रण को अनिवार्य शर्त मानता है. हॉलीवुड स्क्रीनराइटर्स की इस यूनियन ने 2025 में नीति जारी की कि एआई जनित स्क्रिप्ट्स को क्रेडिट नहीं दिया जाएगा और लेखकों की सहमति अनिवार्य होगी. उनकी प्रेसिडेंट मेरेडिथ स्टेम ने कहा- एआई लेखकों की जगह नहीं ले सकता, क्योंकि रचनात्मकता मानवीय है. 

46 लेखक संघों का प्रतिनिधित्व करने वाले यूरोपियन राइटर्स काउंसिल भी इसका हिस्सा बना. एआई के खिलाफ सख्त स्टैंड लेते हुए अप्रैल 2025 में अपने मैनिफेस्टो को मुख्य आवाज अ कॉल फॉर ट्रांसपेरेंसी इन एआई जनरेटेडेड बुक्स में जोड़ते हुए संगठन की प्रेसिडेंट नीना जॉर्ज ने कहा- एआई साहित्य की डेरिवेटिव प्रकृति को बढ़ावा दे रहा है, लेकिन यह लेखकों की रचनात्मकता को कमजोर कर रहा है. उन्होंने यूरोपीय यूनियन से मांग की कि एआई एक्ट में लेखकों के अधिकारों को शामिल किया जाए.

कुल मिलाकर वैश्विक साहित्यिक लेखन के परिदृश्य में एआई एक अलग राजनीति के साथ खड़ा है. आज अमेरिका हो, यूरोप हो या ब्रिटेन लेखक और उनके संगठन इसे बौद्धिक चोरी कह रहे हैं, कोई कल्पना की हत्या, तो कोई आर्थिक शोषण. सारे संगठनों का साझा सवाल यह है कि क्या लेखन को केवल भाषा-उत्पादन की प्रक्रिया में बदल दिया जाएगा, या उसे मानवीय अनुभव, संवेदना और चेतना का विस्तार बने रहने दिया जाएगा.

बहरहाल, भारत के साहित्यिक और लेखन संसार में परिदृश्य धुंधला दिखाई देता है. भारत में एआई चैट बॉट्स की मौजूदगी को लेखकों ने महसूस किया है लेकिन विरोध के स्वर मुखर नहीं हैं. ऐसा भी दिखाई देता है कि ऐसी तकनीक की उपस्थिति के प्रति उदासीनता ज्यादा है बजाय एक सार्थक हस्तक्षेप के, यानी टेक्नॉलॉजी से दूर ही हैं. यह दुनिया तकनीक और वैश्विक दुनिया के बदलावों से दूर चैट बॉट के प्रति ना संवेदनशील है ना उसे लेकर किसी तरह की आशंका व्यक्त करती है बल्कि तटस्थ ही दिखाई देती है. इस लेख के लेखक ने भारत के दो प्रतिनिधि संगठनों से जुड़े लेखकों से इस बारे में तकरीबन छह माह पूर्व प्रश्न भेजकर समझने का प्रयास किया कि आखिर वे हिंदी साहित्य की रचना प्रक्रिया में एआई चैट बॉट्स के हस्तक्षेप को लेकर क्या सोचते हैं और क्या वे भी वैश्विक स्तर पर सक्रिय लेखक संगठनों की तरह ही एआई कंपनियों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ेंगे तो वे किसी तरह की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहे. एक बड़े लेखक ने इस विषय में जानकारी का अभाव बताया तो दूसरे लेखक ने वैश्विक चिंता में साझा बयान टाइप कुछ कह दिया. सीधे शब्दों में साहित्य की दुनिया किसी भी तरह की प्रतिक्रिया से दूर दिखाई देती है. एक तरह से भारतीय साहित्यिक जगत् में भी एआई को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं दिखाई देती हैं. कहीं हंसी ठिठोली है तो कहीं एक ठहरी हुई चुप्पी.

हाँ जो लोग परिचित हैं अथवा तकनीकी संसार में हो रहे फेरबदल को जानने समझने के लिए प्रयासरत् हैं वे इसे गंभीरता से लेते हैं और उहोंने इस पर गंभीरतापूर्वक लिखा भी है. जाहिर है इसी क्रम में कई साहित्यकार इसे भाषा और लेखन के लोकतंत्रीकरण का माध्यम मानते हैं, वहीं दूसरी ओर यह चिंता भी सामने आती है कि इससे रचनात्मकता और मौलिकता के साथ लेखक की पहचान पर असर पड़ सकता है.

बहरहाल, देखा जाए तो भारतीय साहित्य का परिदृश्य, खासकर हिंदी का संसार, हमेशा से सामाजिक बदलाव और मानवीय भावनाओं की गहराई का दर्पण रहा है. लेकिन एआई की दस्तक ने उतनी खलबली पैदा नहीं की है हाँ सवाल हैं और परिचर्चा भी है, साहित्यिक पत्रिकाओं, इंटरनेट और लेकर अखबारों में लेख हैं लेकिन अभी तक न्याय, अदालत और विरोध के वैसे तेवर नहीं दिखाई दिए हैं जैसे पश्चिम में दिखाई देते हैं. हिंदी के साहित्यकार और आलोचक मानते हैं कि एआई लेखन को आसान जरूर बना रहा है, मगर इसकी सबसे बड़ी चुनौती मौलिकता ही है.

दरअसल हिंदी साहित्य में एआई को लेकर दो तरह की तस्वीर बनती दिखाई देती है एक जो विरोधाभासी लेकिन वास्तविक है. एक तरफ एआई साहित्य को वैश्विक बना रहा है, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नई पहचान दे रहा है. दूसरी तरफ, वही एआई साहित्य की आत्मा, उसकी मौलिकता और लेखकों की मेहनत को कमजोर भी कर सकता है. कुल मिलाकर चैट बॉट्स एक तरह से दोधारी तलवार की तरह सामने हैं जिसे भारतीय लेखक और प्रकाशक सामने खड़ा देख रहे हैं एक तरफ नई संभावनाओं का द्वार, दूसरी तरफ अपनी रचनात्मक अस्मिता के खो जाने का डर. यहाँ एक नए द्वंद्व की स्थिति है जहाँ तकनीक अवसर भी है और चुनौती भी. मशीनें रचना तो कर सकती हैं, लेकिन संवेदना नहीं गढ़ सकतीं, इसलिए अब लेखकों के सामने दो रास्ते हैं या तो वे एआई से डरकर अपनी जगह खो दें, या उसे साधन बनाकर अपनी रचनात्मकता को और ऊंचाई दें. सवाल यह है कि क्या हिंदी साहित्य लेखकों सहित अपनी रचनात्मकता को एआई कंपनियों को सौंप देगा? या फिर यह संसार एक बंधक के रूप में रहेगा जो अपने रचे हुए से एक मशीन को दूसरा वह सबकुछ रचने देगा जिस पर उसी का अधिकार नहीं होगा?

 

मशीन में बंधक सृजन और कॉपी राइट के सवाल

इधर, लेखकों के अधिकारों और रचना की मौलिकता के बीच यहीं से कॉपीराइट के सवाल भी उठे हैं. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि एआई से जुड़े कॉपीराइट विवाद तेजी से वृद्धि हुई है. ऊपर हम उन तथ्यों का जिक्र कर चुके हैं जिसमें कुछ मामले कोर्ट में हैं तो वहीं हड़तालों का असर भी है. जाहिर है इसका प्रभाव भी दिखा है जिसमें यूरोप में एआई एक्ट 2024 पारित किया गया, जिसमें एआई से बनी सामग्री पर स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य किया गया जबकि यूनेस्को ने 2021 में रिकंमंडेशंस ऑन द एथिक्स ऑफ आर्टिफिशल इंटेलिजेंस जारी की थी, जो दुनिया का पहला वैश्विक मानक है जिसमें एआई को मानवाधिकारों, पारदर्शिता और सांस्कृतिक विविधता के सम्मान के निर्देश जारी किए गए. खासकर चेतावनी दी गई कि कॉपीराइट उल्लंघन रचनात्मक विविधता को नुकसान पहुंचा सकता है.

बहरहाल, बात भारत की करें तो यहाँ यह संकट और भी पेचीदा है. देश में कॉपीराइट एक्ट 1957 की धारा 2(d) के अनुसार लेखक केवल मानव हो सकता है. इधर भारत में एआई और कॉपीराइट पर बहस का सबसे दिलचस्प उदाहरण 2020 में सामने आया, जब भारतीय कॉपीराइट ऑफिस ने राघव नाम से एक एआई पेंटिंग ऐप को सूर्यास्त नामक कृति का सहलेखक माना. सूर्यास्त मूल रूप से विंसेंट वैन गॉग की मशहूर स्टैरी नाइट का रोबोट संस्करण था, जिसे एआई राघव ने तैयार किया और उसके स्वामी अंकित साहनी ने इसके लिए आवेदन किया. कॉपीराइट ऑफिस ने राघव को एकमात्र लेखक तो नहीं माना, लेकिन उसे सहलेखक मानकर पंजीकरण कर दिया.

महत्वपूर्ण बात यह थी कि पहला विवादास्पद मामला था जिसमें किसी एआई को कॉपीराइट का सहलेखक स्वीकार किया गया. निर्णय के बाद कानूनी और शैक्षणिक जगत् में बहस छिड़ गई कि क्या एआई को लेखक मानना उचित है जबकि उसमें न तो मानवीय चेतना है और न ही कानूनी व्यक्तित्व? कुछ विशेषज्ञों का कहना था कि यह कदम नवाचार को प्रोत्साहन देगा, जबकि अन्य ने इसे जल्दबाजी में लिया गया और विवादास्पद बताया. इधर बाद में 2021 में कॉपीराइट ऑफिस ने इस पंजीकरण पर पुनर्विचार भी किया और इसे विसंगति करार दिया. यानी राघव केस ने साफ कर दिया कि भारत का कॉपीराइट कानून एआई जैसे नए दौर के लिए बना ही नहीं है बल्कि उसमें लेखक की परिभाषा आज भी इंसान से जुड़ी है, लेकिन यहाँ यह बात सामने आई कि तकनीक अपना रूप बदलते हुए बहुत कुछ पुरानी चीजों को इस रूप में बदलने जा रही है जहाँ मशीन भी रचनात्मक कार्य कर रही है. यही टकराव भारत समेत दुनिया भर में कॉपीराइट बहस का केंद्र बना हुआ है.

इधर भारतीय मीडिया और एआई विवाद का सबसे अहम मुकदमा कुछ समय पहले ही सामने आया, जब नवंबर 2024 में एएनआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में ओपनएआई के खिलाफ कॉपीराइट उल्लंघन का दावा किया. एएनआई का आरोप है कि उनके समाचार लेखों को चैटजीपीटी जैसे मॉडल्स को ट्रेन करने के लिए बिना अनुमति इस्तेमाल किया गया. यह भारत का पहला मुकदमा है जिसमें किसी समाचार एजेंसी ने एआई कंपनी पर इस पैमाने पर कानूनी चुनौती दी. इस केस ने भारतीय कॉपीराइट कानून के सामने कई बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या ट्रेनिंग के लिए डेटा का भंडारण ही कॉपीराइट उल्लंघन है? क्या एआई द्वारा तैयार किया गया आउटपुट जो उन्हीं लेखों से सीखकर बना है, व्युत्पन्न कृति माना जाएगा? क्या यह प्रक्रिया फेयर यूज़ (धारा-52, कॉपीराइट एक्ट 1957) के दायरे में आती है, या यह सीधे-सीधे उल्लंघन है? और सबसे अहम जब ओपनएआई के सर्वर अमेरिका में हैं तो क्या भारतीय अदालत को इस पर अधिकार क्षेत्र है?

इस पूरे मामले विशेषज्ञों ने अलग ही राय दी. कइयों ने माना कि यह मुकदमा भारतीय न्यायशास्त्र के लिए लिटमस टेस्ट साबित होगा. जानी-मानी लॉ फर्म सिरिल अमरचंद मंगलदास की स्वाति शर्मा ने इस मामले पर कहा कि अदालत को यह तय करना होगा कि एआई ट्रेनिंग के दौरान कॉपीराइटेड सामग्री का डाउनलोड करना, कॉपीराइट का उल्लंघन है या नहीं, और क्या एआई आउटपुट को कॉपीराइटेड स्रोत का अंश माना जा सकता है. वहीं एक और कानूनी फर्म एजेडबी एंड पार्टनर्स  की अपराजिता राणा कहना है कि भारत में फेयर यूज़ की व्याख्या अमेरिका जैसी नहीं है, इसलिए परिणाम अलग हो सकते हैं.

बहरहाल, इस मामले पर अब तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है, और यह मामला विचाराधीन है और भविष्य में  फैसला जैसा भी हो कानूनी विश्लेषकों का अनुमान है कि अगर कोर्ट एएनआई के पक्ष में फैसला देता है, तो एआई कंपनियों को कंटेंट ट्रेनिंग के लिए लाइसेंसिंग की सख्त प्रक्रिया अपनानी पड़ेगी, जिससे रचनाकारों और मीडिया हाउस के अधिकार मजबूत होंगे. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि नवाचार और एआई डेवलपमेंट की रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है, वहीं, अगर ओपनएआई के पक्ष में फैसला हुआ, तो यह भारत में एआई कंपनियों के लिए राहत होगा, लेकिन कॉपीराइट धारकों के लिए झटका साबित हो सकता है.

दूसरी ओर, अगर अदालत ओपनएआई के पक्ष में जाती है और फेयर यूज़ को व्यापक रूप में मान्यता देती है, तो एआई डेवलपमेंट को भारत में खुली राह मिल जाएगी. लेकिन इस स्थिति में पत्रकारों और क्रिएटर्स का विश्वास कमजोर होगा, क्योंकि उन्हें लगेगा कि उनकी सामग्री बिना अनुमति और पारिश्रमिक के इस्तेमाल हो रही है.

असल में, यह मुकदमा सिर्फ एएनआई और ओपनएआई के बीच नहीं है यह एक ऐसी बहस का प्रतीक है जिसमें मौलिकता बनाम नवाचार की टकराहट है और यही वह सवाल है जो आने वाले वर्षों में न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में एआई और कॉपीराइट कानून को नया रूप देगा.

इधर बीते साल 2025 में कॉपी राइट मामले में नया मोड़ तब आया भारतीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों के एक समूह की ओर से ओपनएआई के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में मुकदमा दायर किया गया. इस मामले में फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स, जिसमें पेंगुइन रैंडम हाउस, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस और पैन मैकमिलन जैसे वैश्विक प्रकाशकों के साथ-साथ भारत की रूपा पब्लिकेशंस और एस. चंद एंड कंपनी भी शामिल हैं. इन प्रकाशकों के आरोप है कि उनकी कॉपीराइटेड पुस्तकों और सामग्री का उपयोग एआई मॉडल्स को प्रशिक्षित करने के लिए बिना अनुमति किया गया.

खास बात यह है कि प्रकाशकों की मांग केवल क्षतिपूर्ति तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने कोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि एआई कंपनियाँ उनकी कॉपीराइट सामग्री तक पहुंच को रोका जाए और ऐसे डेटा सेट्स को हटाया जाए जिनमें इन रचनाओं का उपयोग हुआ है. यहाँ फेडरेशन के महासचिव प्रणव गुप्ता मानते हैं कि अदालत से मांग है कि वे ओपनएआई को कॉपीराइट सामग्री तक पहुंचने से रोकें.

इधर भारत के डिजिटल मीडिया संस्थान भी इस कानूनी लड़ाई में शामिल हो गए हैं. भारत में कई बड़े प्रमुख मीडिया हाउस और डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएश्न ने इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है. इन मीडिया हाउस का आरोप है कि उनके समाचार लेखों और कंटेंट का उपयोग एआई मॉडल्स के प्रशिक्षण में किया गया. यहाँ एआई और कॉपीराइट का संघर्ष अब केवल वैश्विक नहीं रहा, बल्कि भारत में भी एक निर्णायक कानूनी और नीतिगत प्रश्न के रूप में उभर चुका है.

कॉपीराइट की न्यायिक जंग के बीच संगीत उद्योग भी इससे अछूता नहीं रहा है. जनवरी 2025 में भारत की दो प्रमुख कंपनियाँ सारेगामा और टी-सीरीज़ ओपनएआई को मुंबई हाईकोर्ट में घसीट लिया. कंपनियों ने मुकदमा लगाकार आरोप लगाया कि ओपनएआई और अन्य एआई प्लेटफ़ॉर्म्स ने उनके कॉपीराइट गानों और म्यूज़िक कैटलॉग का उपयोग ट्रेनिंग डेटा के रूप में किया और उस आधार पर नई रचनाएं और साउंडट्रैक बनाए. कंपनियों ने कहा कि यह न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि कलाकारों की मौलिकता और संगीत की सांस्कृतिक धरोहर पर भी सीधा हमला है. यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय संगीत उद्योग के वैश्विक स्तर पर सुनने वाले हैं और लाखों लोगों का रोजगार भी जुड़ा हुआ है.

कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अदालत सारेगामा और टी-सीरीज़ के पक्ष में जाती है, तो एआई कंपनियों को संगीत या दूसरी कलात्मक सामग्री का उपयोग करने से पहले अनिवार्य लाइसेंसिंग करनी पड़ेगी. इसका सकारात्मक पहलू यह होगा कि कलाकारों और संगीतकारों को अपने कार्य का उचित मुआवज़ा मिलेगा और उनकी बौद्धिक संपदा सुरक्षित होगी. लेकिन दूसरा पहलू यह है कि इससे एआई रिसर्च और डेवलपमेंट पर बोझ बढ़ सकता है, खासकर छोटे स्टार्टअप्स के लिए, वहीं अगर अदालत एआई कंपनियों के पक्ष में फैसला देती है, तो संगीतकारों और रिकॉर्ड कंपनियों का विश्वास हिल सकता है. असल में एएनआई और सारेगामा-टी-सीरीज़ जैसे मुकदमें सिर्फ कॉपीराइट विवाद नहीं हैं, बल्कि उस बहस के प्रतीक हैं जिसमें मौलिकता और नवाचार आमने-सामने खड़े हैं. अदालतों के फैसले यह तय करेंगे कि भारत में एआई का भविष्य किस दिशा में जाएगा. क्या यह रचनाकारों का सहयोगी बनेगा या उनके अधिकारों के लिए चुनौती?

बौद्धिक संपदा और एआई जैसे विषयों पर नीतिगत शोध करने वाली संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर लॉ एंड इकोनॉमिक्स (आईसीएलई) के सह-संस्थापक और अरुल जॉर्ज स्कारिया मानते हैं कि भारतीय कॉपीराइट एक्ट 1957 मौजूदा समय की चुनौतियों से जूझने के लिए पर्याप्त नहीं है. जनरेटिव एआई मॉडल्स जैसे चैटजीपीटी या डैल-ई इंटरनेट से विशाल मात्रा में डेटा लेकर सीखते हैं जिसमें साहित्य, संगीत, कला और फिल्मों जैसी कॉपीराइटेड सामग्री भी शामिल होती है. लेकिन सोचिए जब इन रचनाओं का उपयोग बिना अनुमति और बिना मुआवजे के किया जाता है, तो असल में किसका नुकसान होता है?

जाहिर है उन रचनाकारों का जिन्होंने अपनी रचनात्मकता से समाज को समृद्ध किया है. स्कारिया और झावर इसे डिजिटल उपनिवेशवाद कहते हैं, जहाँ वैश्विक टेक कंपनियाँ भारतीय सृजनात्मक संपदा से फायदा उठाती हैं लेकिन बदले में कुछ नहीं लौटातीं. वे फेयर यूज प्रावधान जैसे एक और अहम पहलू पर ध्यान दिलाते हैं-

अरुल स्कारिया ने हाल ही में वर्षा झावर के साथ मिलकर अपना रिसर्च पेपर स्ट्राइकिंग द बैलेंस: अडॉप्टिंग इंडियन कॉपीराइट लॉ फॉर जेनएआई एंड बियॉन्ड (2025) लिखा है. भारतीय कॉपीराइट और जेनरेटिव एआई को लेकर यह एक गंभीर शोध है. बैंगलुरु में नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (एनएलएसआईयू) के एसोसिएट प्रोफेसर अरुल जनरेटिव एआई और कॉपीराइट को लेकर कहते हैं-

यह बहस केवल भारत तक सीमित नहीं है; दुनियाभर में अदालतें इसी सवाल से जूझ रही हैं कि एआई मॉडल का प्रशिक्षण फेयर यूज़ माना जाए या रचनाकारों की बौद्धिक संपत्ति का उल्लंघन. अमेरिका में न्यूयॉर्क टाइम्स बनाम ओपनएआई, गैटी इमेजेस बनाम स्टैबिलिटी एआई, ऑर्थर गिल्ड केस, और कॉमेडियन सारा सिल्वरमैन सहित कई मुकदमों में यही मुद्दा उठाया गया है कि क्या बिना अनुमति किताबों, तस्वीरों और पत्रकारिता सामग्री का उपयोग प्रशिक्षण में किया जा सकता है.

दरअसल, अदालतें अब यह भी देख रही हैं कि कई जगह एआई मॉडल आउटपुट में मूल सामग्री को लगभग शब्दशः दोहरा रहे हैं. भारत में भी यह मामला अब अदालतों तक पहुंच चुका है. समस्या यह है कि भारतीय अदालतों में भी व्याख्या साफ नहीं है क्योंकि कभी न्यायालय अमेरिकी फेयर यूज़ परीक्षण के अपनाते हैं, तो कभी भारतीय कॉपीराइट कानून की संकीर्ण धारा 52 तक सीमित रहते हैं. स्कारिया झावर का तर्क है कि यही अस्पष्टता भविष्य में एआई संबंधी मुकदमों को और कठिन बना देगी, क्योंकि तकनीक तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन कानून अभी भी उस दुनिया में खड़ा है जहाँ डेटा, मॉडल ट्रेनिंग और डिजिटल प्रतिकृति जैसी अवधारणाएं मौजूद ही नहीं थीं.

दरअसल, आज जनरेटिव एआई के विस्तार के बीच भारतीय प्रकाशन जगत्, लेखन और साहित्य के साथ मीडिया और मनोरंजन उद्योग उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं, जहाँ तकनीक और रचनात्मकता एक साथ अवसर भी हैं और चुनौती भी. EY की 2025 रिपोर्ट बताती है कि भारत में जनरेटिव एआई अब सिर्फ पोस्ट प्रोडक्शन या तकनीकी सहायता तक सीमित नहीं, बल्कि कंटेंट निर्माण, स्क्रिप्ट लेखन, एनीमेशन, वीएफएक्स और दर्शक व्यवहार विश्लेषण तक गहराई से पहुंच चुका है. उद्योग में कंटेंट उत्पादन और कार्यदक्षता का स्तर तेजी से बढ़ा है, और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों पर एआई आधारित व्यक्तिगत अनुशंसा दर्शकों जोड़ रही है. हालांकि यहाँ कला उद्योग और रचनात्मक जगत को लेकर चिंताएं भी हैं क्योंकि भारत की स्थिति और संवेदनशील है. भाषाई विविधता, सांस्कृतिक स्मृति और क्षेत्रीय रचनात्मकता राष्ट्रीय पहचान का भाग हैं और ऐसे में एआई मॉडल बिना लाइसेंस और बिना रॉयल्टी के स्थानीय भाषाओं व सांस्कृतिक सामग्री से सीखते हैं, तो यह तकनीकी प्रगति नहीं बल्कि डिजिटल उपनिवेशवाद का रूप ले सकता है जैसा कि शोशाना जुबॉफ जैसे कई शोधकर्ता चेतावनी दे रहे हैं.

महत्वपूर्ण और राहत की बात यह है कि बीते साल ही भारत सरकार इसे लेकर एक्शन में आई है और सरकार एआई और कॉपीराइट के बीच उभरते संघर्ष को लेकर नीतिगत स्तर पर ठोस निर्णय लेती दिखाई दे रही है. एनएआई और ओपनएआई का विवाद सामने आने बाद ही 2025 में संसद की एक स्थायी समिति ने यह सुझाव दिया कि एआई आधारित कंटेंट निर्माण के लिए लाइसेंसिंग व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए.

इसी क्रम में उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने वन नेशन, वन लाइसेंस, वन पेमेंट मॉडल पर एक वर्किंग पेपर जारी किया, जिसमें यह प्रस्ताव रखा गया है कि एआई कंपनियाँ कॉपीराइट संरक्षित सामग्री का उपयोग करना चाहती है तो एक केंद्रीकृत लाइसेंस प्राप्त करें और उसके बदले रॉयल्टी का भुगतान करें. इसका अर्थ हुआ कि एआई डेवलपर्स को सामग्री तक पहुंच तो मिलेगी, लेकिन उसके व्यावसायिक उपयोग पर रचनाकारों को पारिश्रमिक देना अनिवार्य होगा. हालांकि यह व्यवस्था अभी प्रारंभिक विचार विमर्श के चरण में है और इसे कानून का रूप नहीं दिया गया है, लेकिन साफ दिखाई देता है कि भारत कॉपीराइट और एआई के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए एक विशिष्ट मॉडल विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. हालांकि रिसर्चर और विशेषज्ञ मानते हैं कि एआई को खतरा नहीं बल्कि साधन माना जाना चाहिए लेकिन शर्त यह है कि कानून समान रूप से कलाकारों, पत्रकारों, संगीतकारों और स्टार्टअप्स की रक्षा करे.

बहरहाल, भारत को एआई और कंटेंट कॉपी राइट्स और रचनाकारों की बौद्धिक संपदा को सुरक्षित रखने के लिए दुनिया की नीतियों पर भी विचार करना होगा क्योंकि जिस तरह के डेटा कानून हैं वह लगातार बाधा पैदा करेंगे विशेष रूप से अमेरिका का क्लाउड एक्ट. लिहाजा भारत के लिए जरूरी है कि वह बीच का रास्ता अपनाए जिसकी ओर वह कदम बढ़ा रहा है. आज अमेरिका में फेयर यूज़ का सिद्धांत लागू होता है जिसका सीधा मतलब है किसी कॉपीराइट सामग्री का सीमित उपयोग कुछ परिस्थितियों में बिना अनुमति भी किया जा सकता है जैसे कि रिसर्च जैसे, शिक्षा या नए तरह के सृजन के लिए. हालांकि यहाँ एआई कंपनियाँ इसी तर्क का सहारा लेकर कहती हैं कि वे केवल डेटा से सीखती हैं जैसे कि (भारत में ओपनएआई तर्क दे रही है) न कि उसे सीधे कॉपी करके प्रकाशित करती हैं, इसलिए उनके अनुसार एआई प्रशिक्षण फेयर यूज़ के दायरे में आ सकता है. हाँ इस पर अभी भी अदालतों में बहस जारी है और यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि एआई पर यह सिद्धांत कितनी हद तक लागू होगा.

दूसरी ओर यूरोप ने डेटा कानून की तरह ही अधिक सतर्क और रचनाकार केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया है. यूरोपीय यूनियन एआई एक्ट और उससे जुड़े नियमों के हिसाब से यह व्यवस्था बनाई गई है कि यदि कोई लेखक, कलाकार या प्रकाशक नहीं चाहता कि उसकी सामग्री एआई प्रशिक्षण में उपयोग हो, तो वह इससे बाहर रहने ऑप्ट आउट (opt-out) का विकल्प चुन सकता है, यानी यहाँ प्राथमिकता यह है कि रचनाकार की अनुमति और नियंत्रण बना रहे.

इधर भारत के लिए अवसर है कि वह बीच का रास्ता अपनाए जैसे कि वह अपने डेटा कानून को तय कर रहा है. आज भारत सरकार की ओर से एक राष्ट्र, एक लाइसेंस, एक भुगतान ढांचा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है. इस मॉडल का मूल विचार सरल है कि एआई कंपनियाँ कॉपीराइट सामग्री का उपयोग कर सकती हैं, लेकिन इसके लिए रॉयल्टी का भुगतान, डेटा पारदर्शिता, रचनाकारों का आर्थिक लाभ सुनिश्चित किया जाए. यही नहीं यह व्यवस्था स्टार्टअप्स और नई कंपनियों के लिए भी प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रयास करती है, ताकि नवाचार पर अनावश्यक बाधाएं न आएं. आज यह ढांचा कानून के रूप में लागू होता है, तो भारत एक ऐसा संतुलित मॉडल प्रस्तुत कर सकता है, जिसमें अमेरिका की तरह पूर्ण छूट नहीं है और न ही यूरोप की तरह केवल नियंत्रण, बल्कि एक ऐसा व्यावहारिक समाधान है जिसमें तकनीकी प्रगति और रचनात्मक अधिकार दोनों को साथ लेकर चलने की कोशिश की गई है क्योंकि भविष्य का सवाल यह नहीं है कि एआई भारतीय रचनात्मक उद्योग में आएगा या नहीं बल्कि वह आ चुका है. असली प्रश्न यह है कि भारत इसे साझेदार बनाएगा या प्रतिस्पर्धी. जाहिर है यदि नियम-कानून हैं और व्यवस्था पारदर्शी है तो एआई भारतीय क्रिएटर्स की आवाज़ को बढ़ाएगा, लेकिन यदि इसे बिना दिशा और बिना जवाबदेही के छोड़ दिया गया, तो वही आवाज़ जो हमारी सांस्कृतिक विविधता और रचनात्मकता की आत्मा है अल्गोरिदम की गूंज में खो सकती है.


References

  1. Authors sue OpenAI over copyright infringement claims. The New York Times. https://www.nytimes.com/2023/09/20/books/authors-openai-lawsuit-chatgpt-copyright.html
  2. AG and authors file class-action suit against OpenAI. https://authorsguild.org/news/ag-and-authors-file-class-action-suit-against-openai/
  3. AI survey: 90% of writers want consent and compensation for AI training use. https://authorsguild.org/news/ag-ai-survey-reveals-authors-overwhelmingly-want-consent-and-compensation-for-use-of-their-works/
  4. Human-authored certification initiative announced. https://authorsguild.org/news/ag-launches-human-authored-certification-to-preserve-authenticity-in-literature/
  5. AI labelling policy framework (Initiative 2504). https://europeanwriterscouncil.eu/2504_labellingai/
  6. US Authors Guild to certify books as truly human-written. The Guardian. https://www.theguardian.com/books/2025/jan/30/us-authors-guild-to-certify-books-from-human-intellect-rather-than-ai-human-authored
  7. Authors Guild reinforces its stance on AI licensing. Publishers Weekly. https://www.publishersweekly.com/pw/by-topic/digital/copyright/article/96745-authors-guild-reinforces-its-position-on-ai-licensing.html
  8. More than 70 writers send OpenAI warning letter to publishers. https://www.npr.org/2025/07/03/nx-s1-5454736/more-than-70-writers-send-open-letter-about-ai-to-literary-publishers
  9. White paper: Protecting the human spark in literature. https://pen.org/press-release/new-pen-america-white-paper-the-human-spark-that-drives-creativity-must-be-safeguarded-as-potential-threats-loom-from-artificial-intelligence/
  10. Open letter calling for ethical AI use in publishing. https://societyofauthors.org/2023/07/25/join-thousands-of-authors-and-sign-the-authors-guilds-ai-open-letter/
  11. Sarah Silverman sues Meta and OpenAI for copyright violations. Reuters. https://www.reuters.com/legal/sarah-silverman-sues-meta-openai-copyright-infringement-2023-07-09/
  12. India AI copyright law: One nation, one licence, one payment model. https://www.courtkutchehry.com/pages/blog/india-ai-copyright-law-one-nation-one-licence-one-payment-2025/
  13. Parliamentary panel suggests licensing requirements for AI content creators. https://www.thehindu.com/news/national/parliamentary-panel-suggests-licensing-requirements-for-ai-content-creators/article70049384.ece
  14. Indian AI royalty proposal targets data practices of OpenAI, Google. https://www.reuters.com/sustainability/boards-policy-regulation/indian-ai-royalty-proposal-targets-data-practices-openai-google-2025-12-09/
  15. AI copyright policy working paper. https://www.dpiit.gov.in/static/uploads/2025/12/ff266bbeed10c48e3479c941484f3525.pdf
  16. OpenAI faces data scraping allegations in India’s generative AI copyright infringement suit. https://www.worldtrademarkreview.com/article/openai-faces-data-scraping-allegations-in-indias-first-ever-generative-ai-copyright-infringement-suit
  17. OpenAI case: Indian news websites raise copyright concerns. https://indianexpress.com/article/india/openai-case-indian-news-websites-copyright-9802312/
  18. Indian media joins copyright lawsuit against OpenAI. https://www.medianama.com/2025/02/223-openai-copyright-lawsuit-indian-media/
  19. OpenAI faces new copyright case from global publishers in India. https://www.reuters.com/technology/artificial-intelligence/openai-faces-new-copyright-case-global-publishers-india-2025-01-24/
  20. Hearing in copyright case against OpenAI brought by Indian publishers. https://www.techpolicy.press/hearing-in-copyright-case-against-openai-brought-by-indian-publishers-set-for-march/
  21. Regulating AI and copyright in India: Towards a “one nation, one licence, one payment” model. SSRN. https://papers.ssrn.com/sol3/papers.cfm?abstract_id=5115655
सारंग उपाध्याय
लेखक और पत्रकार

पत्रकार और लेखक सारंग उपाध्याय का जन्म 9 जनवरी, 1984 को भुसावल, महाराष्ट्र में हुआ. जड़ें मध्य प्रदेश के हरदा जिले में. इन्दौर यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा मिली. बीते 15 सालों से इन्दौर, मुम्बई, नागपुर, औरंगाबाद, भोपाल और दिल्ली में पत्रकारिता की. वर्तमान में ‘अमर उजाला’ दिल्ली में कार्यरत हैं. सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों के लेखन में लगातार सक्रिय सारंग सिनेमा में विशेष रुचि रखते हैं. डॉ. राममनोहर लोहिया के साथी बालकृष्ण गुप्त के आलेखों पर केन्द्रित उनकी एक किताब ‘हाशिये पर दुनिया’ 2013 में प्रकाशित है. कहानियों के लिए उन्हें 2018 में म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के ‘पुनर्नवा पुरस्कार’ से पुरस्कृत किया गया है. ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’ उनका पहला उपन्यास है. इस उपन्यास पर उन्हें शैलेश मटियानी पुरस्कार भी मिला है.

ई-मेल : sonu.upadhyay@gmail.com

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Comments 2

  1. ऐश्वर्य मोहन गहराना says:
    2 weeks ago

    कानून मेरा अपना विषय है और मैंने अपने व्यावसायिक कामों में एआई का सहायक के रूप में उपयोग भी लिया है। यह आलेख सामयिक आवश्यक और सुस्पष्ट है। इस आलेख की चिंताएँ सभी लेखकों और पाठकों की चिंताएँ भी होनी चाहिए।

    पहली बात तो यह कह सकता हूँ कि कॉपीराइट कानून के बारे में आम भारतीय लेखक क्या अधिवक्ता में भी कोई जागरूकता नहीं हैं। भारत में फिल्म आदि निर्माता भी कॉपीराइट कानून को गंभीरता से नहीं लेते, तो एआई तो और बड़ी ताकतों के हाथ में है।
    दूसरा यह कि एआई को प्रॉम्प्ट की आवश्यकता है और जितना अधिक क्रिएटिव प्रॉम्प्ट होगा उतना ही बढ़िया उत्पाद एआई देता है। जैसा कि इस लेख में कहा गया है कि उसके लिए एआई को ट्रेनिंग की आवश्यकता है। विधि विशेषज्ञों के बीच अभी तक आम सहमति रही है (मानवीय) पढ़ाई, अध्ययन, रिसर्च, ट्रेनिंग के लिए कॉपीराइट रुकावट नहीं हो सकता जब तक कि सीधा व्यावसायिक प्रयोग न हो रहा हो।
    एआई और कॉपीराइट के बीच यहीं एक सीमा रेखा खींची जा सकती है। क्योंकि एआई अंधिकांशतः तुरंत ही या कि सीधा ही जानकारी ट्रेनिंग आदि का व्यावसायिक प्रयोग करने में सक्षम है एक धुंधली रेखा है जिसे सीमा रेखा में बदला जा सकता है।
    एक बात और है। दुनिया भर में कॉपीराइट के मुद्दे पर, जैसा कि इस आलेख से भी स्पष्ट है, सभी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इस कारण कोई गंभीर निष्कर्ष आता मुझे नहीं दिखता। अदालत इस समय पर लागू कानून की व्याख्या कर सकती है, उन्हें नए सामयिक अर्थ दे सकती है परंतु नया नहीं बना सकती।
    वास्तविक आवश्यकता है, पल पल बदलती दुनिया में नए स्पष्ट कानून की, जिसे देशों की विधायिकाएं – संसद- ही बना सकती हैं।
    किसी भी देश की संसद से कानून में परिवर्तन या स्पष्टीकरण जोड़ने के लिए प्रतिवेदन दिए जाने, उस पर चर्चा होने या मसौदा तैयार होने की अधिक जानकारी हमारे सामने नहीं आई है। यूरोपीय यूनियन एआई एक्ट और उससे जुड़े नियमों, जिनका इस लेख में जिक्र है, मैं सहमत हूँ। मगर यह इस अर्थ में काफी नहीं है कि यह अपने काम को एआई द्वारा प्रयोग से रोकने की क्षमता तो लेखक को देती है परंतु आम लेखक को इस से राहत नहीं मिलती और एआई को नवसृजन से भी नहीं रोकतीं।
    भारत में उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) ने वन नेशन, वन लाइसेंस, वन पेमेंट मॉडल पर एक वर्किंग पेपर में वर्णित भुगतान संबंधी प्रस्ताव रोचक है परंतु यह लेखक को कोई स्वायत्ता नहीं देता।

    Reply
  2. Amit Bhushan says:
    2 weeks ago

    जब AI नहीं था तब भी अच्छे और कबाड़ लेखक थे और आगे भी होंगे… अंतरिक्ष मे तेजी से आगे बढ़ते हुए स्पेसयान के लिए calculations मनुष्य नहीं कर सकता है, टेक्नोलॉजी कर सकता है… AI नहीं था तो क्या देश में रिसर्च और साहित्य का स्तर उच्च हो गया यदि कहीं कोई मसला है तो वह है कि लेखन सामग्री में लेखक का अंश कितना है… कॉपीराइट के लिए नए तरीके खोजे जाएंगे… बाकी पहले भी चुरा के छापते थे… मसला साहित्य की है या AI की है यह स्पष्टतया विचार करना होगा अन्यथा धारा प्रवाह में तो सब प्रवाह ही है स्थिर सत्य क्या…

    Reply

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