| लुक्का-छिपी अशअर नज्मी उर्दू से अनुवाद रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी |
“…पचानवे, छियानवे, सत्तानवे, अट्ठानवे, निन्यानवे, सौ!”
ज़ैद ने अपनी दोनों आँखों से अपनी नन्ही हथेलियाँ हटाईं और एक गहरी साँस ली. उसके पोरों पर आँखों की नमी और धूल का एक चिपचिपा सा मैल जम गया था. उसने अपने सामने मौजूद उस मलबे को देखा जो कभी उसके घर का ‘लाउंज’ हुआ करता था. अब वहाँ सोफ़े की जगह कंक्रीट के बड़े-बड़े ब्लॉक थे और दीवारें किसी टूटे दाँत की तरह उखड़ी हुई थीं.
“मैं आ रहा हूँ!” ज़ैद ऊंची आवाज़ में चिल्लाया.
उसकी आवाज़ उन ख़ामोश ढेरों से टकराकर वापस आई, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला. ज़ैद ने एक शरारती मुस्कुराहट के साथ अपनी बाईं ओर मौजूद एक टूटी अलमारी के पल्ले को देखा. उसे यक़ीन था कि उसकी आठ साल की बहन ज़ोहरा वहीं कहीं छिपी होगी.
“ज़ोहरा! मुझे पता है तुम कहाँ हो. तुम्हारी फ़्रॉक का कोना बाहर झाँक रहा है!” ज़ैद ने झूठ बोला ताकि उसे बाहर निकलने पर मजबूर कर सके.
वह मलबे के ऊपर से गुज़रते हुए आहिस्ता-आहिस्ता आगे बढ़ा. उसके पैरों के नीचे काँच की किरचियाँ ‘किरच-किरच’ कर रही थीं. उसके लिए यह आवाज़ किसी ‘अलार्म’ जैसी थी कि वह दुश्मन के इलाक़े में दाख़िल हो रहा था. उसे अपने पैरों के तलवों में ठंडक महसूस हो रही थी, क्योंकि उसका एक जूता पिछली ‘बड़ी धमक’ के समय कहीं गुम हो गया था.
“अम्मी! आप रसोई में हैं ना?” उसने उस जगह की ओर देख कर पुकारा जहाँ अब सिर्फ़ जले हुए बर्तन और एक टेढ़ा चूल्हा पड़ा था. “मैंने प्याज़ की महक सूँघ ली है. आप चिलमन के पीछे छिपी हैं!”
वहाँ से भी कोई जवाब नहीं आया.
ज़ैद ने महसूस किया कि इस बार सबने बहुत ‘पक्की बारी’ ली है. आम तौर पर तो अब्बा पाँच मिनट बाद ही हँस देते थे या ज़ोहरा कोई आवाज़ निकाल देती थी, पर आज सब बहुत गंभीर लग रहे थे. उसे लगा कि शायद सब इसलिए नहीं बोल रहे क्योंकि बाहर वे ‘भारी जूतों’ वाले लोग घूम रहे हैं जिनके पास लंबी बंदूकें हैं.
“वे लोग भी खेल रहे हैं,” ज़ैद ने सोचा. “लेकिन वे ‘ढूँढने वालों’ की टीम में हैं.”
फ़िज़ा में बारूद और पुराने कपड़ों के जलने की एक भारी गंध बसी थी. ज़ैद ने एक बड़ी सीमेंट की स्लैब के नीचे देखा. वहाँ उसे एक हाथ नज़र आया, जिस पर वही घड़ी थी जो अब्बा पहनते थे. वह हाथ बेजान था, और उस पर मटमैली धूल की एक मोटी परत जमी थी.
“अब्बा! यह चीटिंग है!” ज़ैद ने हँसते हुए उस हाथ को छूने की कोशिश की. “आप इतनी मिट्टी ओढ़कर क्यों लेटे हैं? मैंने आपको पहचान लिया है. अब आपकी बारी है!”
अब्बा का हाथ ठंडा था, बिल्कुल उस कंक्रीट की तरह जिसके नीचे वह दबे हुए थे. ज़ैद को हैरानी हुई कि अब्बा इतनी सर्दी में कैसे इतनी देर तक ख़ामोश रह सकते हैं. उसने सोचा कि शायद अब्बा ने ‘साँस रोकने’ वाला कोई नया करतब सीख लिया है.
“ठीक है, अगर आप नहीं उठते तो मैं मम्मी को ढूँढूँगा,” उसने मुँह बनाकर कहा.
उसी पल, बाहर गली में एक टैंक के गुज़रने की ग़ुर्राहट सुनाई दी. ज़मीन इस तरह कांपने लगी जैसे किसी ने ज़ैद के पेट के अंदर थरथराहट भर दी हो. ज़ैद तुरंत एक टूटी मेज़ के नीचे घुस गया.
“शुशशशश…” उसने अपनी उँगली अपने लबों पर रखी और उस अंधेरे में मौजूद अपने ‘छिपे हुए’ घर वालों को ख़ामोश रहने का इशारा किया. “वे आ रहे हैं. अगर हमने आवाज़ निकाली तो वे हमें ‘आउट’ कर देंगे.”
वह मेज़ के नीचे दुबक कर बैठ गया, और उसकी आँखें उस अंधेरे में ज़ोहरा और अम्मी को तलाश करने लगीं, जिन्हें अभी ‘ढूँढना’ बाक़ी था.
मेज़ के नीचे अंधेरा ऐसा था जैसे किसी ने काली स्याही की दवात वहाँ उलट दी हो. ज़ैद को लगा कि उसके नथुनों में जले हुए तारों और प्लास्टिक की एक तेज़ गंध घुस रही है. उसने अपनी छोटी सी हथेली से अपनी नाक ढक ली ताकि उसकी साँस लेने की आवाज़ बाहर न जाए.
बाहर गली में वे भारी क़दम अब ठहर गए थे. एक टॉर्च की सफ़ेद रोशनी दरार से अंदर झाँकी और मलबे के ऊपर नाचने लगी. ज़ैद ने देखा कि वह रोशनी अब्बा के उस बेजान हाथ पर पड़ी, फिर उस जले तकिये पर, और फिर एक छोटे से पाँव पर जो एक वज़नी स्लैब के नीचे से बाहर झांक रहा था.
वह पाँव ज़ोहरा का था. उस पर वही नीली जुराब चढ़ी थी जिसका अंगूठा फटा हुआ था.
“ज़ोहरा… तुम तो बिल्कुल मछली बन गई हो,” ज़ैद मन ही मन बुदबुदाया. “हिल भी नहीं रही हो.”
रोशनी का वह दायरा थोड़ी देर वहीं रुका रहा, फिर आगे बढ़ गया. भारी क़दमों की चाप अब दूर हो रही थी. ज़ैद ने संतोष की एक साँस ली. उसे गर्व हुआ कि ‘ढूँढने वाले’ हार गए हैं. वह इस खेल का सबसे माहिर खिलाड़ी था, क्योंकि उसे मालूम था कि साये के अंदर साया बनकर कैसे छिपते हैं.
वह रेंगता हुआ मेज़ के नीचे से बाहर निकला.
“ज़ोहरा! अब बाहर आ जाओ, वे चले गए!” ज़ैद ने नीली जुराब वाले पाँव को हल्का सा टहोका दिया.
पाँव बहुत कठोर और भारी था, बिल्कुल वैसे ही जैसे पत्थर की मूर्तियाँ होती हैं. ज़ैद को ग़ुस्सा आया. उसे लगा कि ज़ोहरा उसे डराने की कोशिश कर रही है. उसने अपना हाथ मलबे की उस दरार में डाला जहाँ से ज़ोहरा का बाक़ी शरीर नज़र आ रहा था. उसे वहाँ एक ठंडा, चिकना सा एहसास हुआ.
“तुमने अपने ऊपर लाल रंग क्यों गिरा लिया है?” उसने अपनी उंगलियों पर लगे उस गाढ़े तरल को देखकर सोचा. उसके लिए वह ख़ून नहीं था; उसे लगा कि ज़ोहरा ने शायद फ्रिज से ‘ज़ुलबिया’1 की चाशनी या जैम निकालकर अपने ऊपर उंडेल लिया है ताकि वह उसे पहचान न सके.
वह और आगे रेंगकर उस जगह पहुँचा जहाँ मम्मी पड़ी थीं. मम्मी का आधा चेहरा एक भारी बीम के नीचे था, और उनके बाल मिट्टी में गुँथ कर एक भूरे क़ालीन जैसे बन गए थे. उनकी एक आँख खुली थी, लेकिन वह स्थिर थी, जैसे वह किसी बहुत दूर की चीज़ को देख रही हो.
“मम्मी, अब उठें ना!” ज़ैद ने मम्मी की उस खुली आँख के सामने अपनी उँगली हिलाई. “देखें, मैंने आपको ढूँढ लिया है. अब मेरी बारी ख़त्म हो गई है. अब आपकी बारी है.”
मम्मी की आँख की पुतली ने कोई हरकत नहीं की. ज़ैद ने मम्मी के कान के पास अपना मुँह किया और बुलंद आवाज़ में कहा, “अगर आप नहीं उठेंगी, तो मैं अकेला ही सारा ज़ुलबिया खा लूँगा जो अब्बा लाए थे!”
ख़ामोशी इतनी गहरी थी कि ज़ैद को अपने ही कानों के अंदर एक सीटी सुनाई देने लगी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि सबने एक साथ सोने का फ़ैसला क्यों कर लिया था. उसे याद आया कि जब वह स्कूल से थककर आता था, तो मम्मी उसे थोड़ी देर सोने के लिए कहती थीं, लेकिन इतनी देर तो कोई नहीं सोता.
“अब्बा! ज़ोहरा! मम्मी!” ज़ैद एक बार फिर पूरी ताक़त से चिल्लाया. “यह खेल अब बोरिंग हो रहा है! मैं हार गया, बस? अब बाहर आ जाएँ!”
दूर कहीं एक तोप का गोला गिरा. ज़मीन काँपने लगी. दीवारों से और मिट्टी झड़कर ज़ैद के बालों में गिरी. उसे लगा कि ज़मीन भी इस खेल में शामिल है और वह उसे गुदगुदी कर रही है.
उसने फ़ैसला किया कि वह अब उनके पास ही लेट जाएगा. उसे भी थकान महसूस हो रही थी और उसका एक जूता न होने की वजह से उसका पैर ठंडा हो रहा था.
“ठीक है, अगर आप लोग नहीं उठते, तो मैं भी ‘पक्की बारी’ दूँगा,” उसने मम्मी के बाज़ू के पास जगह बनाई और वहीं लेट गया. “मैं इतनी देर तक छिपा रहूँगा कि आप लोग ख़ुद थककर मुझे पुकारेंगे.”
उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और मम्मी के ठंडे हाथ को अपने ऊपर रख लिया, जैसे वह कोई कंबल हो. उसे यक़ीन था कि जब वह दोबारा आँख खोलेगा, तो मम्मी हँसकर उसे गुदगुदी करेंगी और कहेंगी, “अरे मेरा बच्चा तो सबसे अच्छा खिलाड़ी है!”
बाहर गली में बुलडोज़र की ग़ुर्राहट अब क़रीब आ रही थी.
बुलडोज़र की आवाज़ अब एक ऐसी फ्रीक्वेंसी पर पहुँच चुकी थी जिसने मलबे के अंदर दबी हवा को भी थरथरा दिया था. ज़ैद ने महसूस किया कि जिस बीम के नीचे वह अपनी मम्मी के बाज़ू से चिमटा हुआ था, वह अब धीरे धीरे ऊपर की ओर सरक रहा है.
“देखें मम्मी, वे कितने ग़ुस्से में हैं!” वह मम्मी के कान में बुदबुदाया. “वे दीवारें तोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें हम मिल नहीं रहे. वे हार गए हैं, मम्मी! वे बिल्कुल हार गए हैं.”
ज़ैद के चेहरे पर एक जीत वाली मुस्कान थी. उसके लिए यह ‘मशीनी शोर’ उसकी जीत का एलान था. उसे लगा कि बाहर वाला ‘दानव’ अब थककर चीख रहा है.
अचानक, एक पीले रंग का धात्विक पंजा (Excavator Bucket) दीवार के उस हिस्से में दाख़िल हुआ जहाँ अब्बा का हाथ मिट्टी तले दबा था. उस पंजे के दाँतों ने कंक्रीट को इस तरह चबाया जैसे वह कोई बिस्कुट हो. अब्बा की वह घड़ी वाला हाथ, जो अब तक ज़ैद के लिए एक ‘निशानी’ था, अब उस धात्विक पंजे के अंदर मलबे के साथ ग़ायब हो गया.
“अब्बा की बारी ख़त्म हो गई!” ज़ैद बड़बड़ाया. “अब सिर्फ़ मैं, आप और ज़ोहरा बचे हैं, मम्मी.”
उसने अपना सिर मम्मी के ठंडे सीने में और गहराई तक धँसा दिया. उसे वहाँ कोई ‘धक्-धक्’ सुनाई नहीं दे रही थी, पर उसे वहाँ एक
अजीब सी ‘ख़ामोशी’ मिली जो बाहर के शोर से कहीं ज़्यादा भारी थी. उसने सोचा कि शायद मम्मी ने अपने अंदर एक ‘साइलेंसर’ लगा लिया है ताकि ‘ढूँढने वाले’ उनकी साँसों की आवाज़ भी न सुन सकें.
‘कड़-कड़… तड़ाख़!’
ज़ैद के ऊपर मौजूद वह अलमारी, जो अब तक उसकी छत बनी हुई थी, एक ही झटके में ऊपर उठ गई.
अचानक, उस अंधेरी गुफ़ा में रोशनी का एक तेज़ सैलाब दाख़िल हुआ. ज़ैद की आँखें चुंधिया गईं. उसे महसूस हुआ कि कोई बहुत बड़ी शक्ति उसे और उसके इर्द-गिर्द मौजूद मलबे को ज़मीन से ऊपर उठा रही है. उसे लगा कि वह हवा में उड़ रहा है… बिल्कुल उसी तरह जैसे अब्बा उसे बचपन में हवा में उछालकर पकड़ लेते थे.
ज़ैद ने अपनी आँखें खोलीं, तो उसे सामने एक आदमी नज़र आया जिसने पीले रंग का हेलमेट पहन रखा था और उसके चेहरे पर हैरानी और दहशत का एक अजीब मिला-जुला भाव था.
“मिल गया! यहाँ एक बच्चा है!” वह आदमी चिल्लाया.
ज़ैद ने उस आदमी की ओर देखा और ज़ोर से हँसा. उसकी हँसी में वह मासूमियत थी जो सिर्फ़ उस वक़्त आती है जब आप किसी को बहुत बुरी तरह हरा देते हैं.
“मैं नहीं मिला! मैंने ख़ुद अपनी आँखें खोली हैं!” उसने मम्मी के उस बाज़ू को अब भी कसकर थाम रखा था जो अब मलबे से अलग होकर उसके हाथ में एक बेजान लकड़ी की तरह लटक रहा था. “मम्मी, देखें! मैंने कहा था ना कि मैं ‘पक्की बारी’ दूँगा! मैं जीत गया!”
वह आदमी और उसके साथी हैरान खड़े उस पाँच साल के बच्चे को देख रहे थे, जिसके हाथ में उसकी माँ का कटा हुआ बाज़ू था और जिसके चेहरे पर एक ऐसी जीत की चमक थी जो उन तमाम लोगों की हार से बहुत ज़्यादा बड़ी थी.
1 ज़ुलबिया (या ज़ूलबिया) एक पारंपरिक और स्वादिष्ट ईरानी मिठाई है, जो हमारे यहाँ की जलेबी जैसी ही होती है.
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asharnajmi2020@gmail.com |
रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी उर्दू के युवा लेखक,अनुवादक एवं स्तम्भकार हैं. आप उर्दू की बहुचर्चित त्रैमासिक पत्रिका ‘इस्बात’ के सह सम्पादक हैं. आपके द्वारा हिन्दी से उर्दू में अनूदित पुस्तक ‘एक फ़िक्शन निगार का सफ़र(शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी एवं उदयन वाजपेयी के बीच संवाद)’ उर्दू पाठकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई. इसके साथ ही आपने अशअर नजमी के उपन्यासों “सिफ़र की तौहीन” एवं “कांग्रेस हाऊस” का भी हिन्दी अनुवाद किया है और डाॅ. नुसरत मेहदी काव्य संग्रह “रक़्सां है ज़िंदगी” का संचयन एवं संकलन भी कर चुके हैं. आप दूरदर्शन मध्य प्रदेश में उर्दू समाचार वाचक भी हैं एवं उर्दू की सुप्रसिद्ध वेबसाइट rekhta.org के लिए स्वतन्त्र रूप से शायरों एवं साहित्यकारों का परिचय एवं ब्लॉग भी लिखते हैं. |

अशअर नज्मी उर्दू के सुपरिचित लेखक हैं. 2021 में प्रकाशित उनके उपन्यास उसने कहा था को उर्दू का पहला पोस्ट्माडर्न नॉवेल माना जाता है. उनके दो अन्य उपन्यास शून्य की तौहीन और काँग्रेस हाउस का हिन्दी अनुवाद ‘सेतु प्रकाशन’ और ‘राजपाल एण्ड संस’ छाप चुके हैं. इसके अतिरिक्त दो उर्दू लघुकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. पिछले दो दशकों तक भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री से जुड़े रहे, जहां उन्होंने कई टीवी धारावाहिक लिखे. 2008 से उर्दू साहित्यिक पत्रिका ‘इसबात’ के संपादक पद पर कार्यरत हैं. वो मुंबई में रहते हैं.
रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी उर्दू के युवा लेखक,अनुवादक एवं स्तम्भकार हैं. आप उर्दू की बहुचर्चित त्रैमासिक पत्रिका ‘इस्बात’ के सह सम्पादक हैं. आपके द्वारा हिन्दी से उर्दू में अनूदित पुस्तक ‘एक फ़िक्शन निगार का सफ़र(शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी एवं उदयन वाजपेयी के बीच संवाद)’ उर्दू पाठकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई. इसके साथ ही आपने अशअर नजमी के उपन्यासों “सिफ़र की तौहीन” एवं “कांग्रेस हाऊस” का भी हिन्दी अनुवाद किया है और डाॅ. नुसरत मेहदी काव्य संग्रह “रक़्सां है ज़िंदगी” का संचयन एवं संकलन भी कर चुके हैं. आप दूरदर्शन मध्य प्रदेश में उर्दू समाचार वाचक भी हैं एवं उर्दू की सुप्रसिद्ध वेबसाइट rekhta.org के लिए स्वतन्त्र रूप से शायरों एवं साहित्यकारों का परिचय एवं ब्लॉग भी लिखते हैं.


मार्मिक कहानी 😒 कुछ भी कहना मुश्किल. यह युद्ध कहीं भी हो सकता है. ग़ज़ा में, ईरान में, सहारनपुर में और भारत में कहीं भी…
दहला देने वाली कहानी।
सुंदर अनुवाद।
कुछ पंक्तियों के बाद दिल किया रुक जाऊँ ,अब नहीं पढ़ पाऊँगा ।दिल दहला देने वाली कहानी ।हमेशा याद रहने वाली कहानी ।
क्या मर्मस्पर्शी और दारुण कहानी है । गजब मारक है । पढ़
कर मैं हिल गया भाई ।
उफ़्फ़ क्या मार्मिक कहानी है! आँखों के सामने सारे दृश्य जीवंत हो गए। ऐसी लुका छिपी संसार के किसी बच्चे को खेलने को न मिले।
बढ़िया कहानी है।
👍
उफ़्फ़ यह कहानी। कैसा सा गाढ़ा सच। रुक रुक कर हिचकियों और सिसकियों के बीच कहानी पढ़ी। काश! ये कहानी लिखने की वजह न बनाई होती दुनियावालों ने। अशअर साहब को सलाम पहुंचे।
रूह कंपा देने वाली कहानी!
उफ़्फ़…. कहानी पढ़कर ऐसा लगा कि मैं भी उस भयानक मंजर को अपनी आंखों से देख रही हूं। कहानी उस अनकही हकीकत को बायां कर रही है जिसे हम देख तो सकते है पर महसूस नहीं कर सकते। मार्मिक कहानी।
यह सिर्फ़ बारूदी युद्ध का दारुण दृश्य नहीं है। ये क्रूरताएं अब हमारे वक़्त के सभी समाजों, संबंधों और भौगोलिकताओं में भी लगातार उग आती गयी हैं। ये बर्बरताएं ही अब पृथ्वी की नई परिस्थितियां हैं जिसमें जीवन को फिर से कोई अपना नया समाज ढूँढना और बनाना होगा। पता नहीं जीवन को इसके लिए भी कोई विकल्प यह रक्तरंजित समय देगा कि नहीं, पाँच बरस के ज़ैद की तरह। अब तो हर वक्त ये आँखें हथेलियों के अंदर ही ढंपी रहना चाहती हैं। इससे भी बुरा वक़्त क्या होगा। उफ़्फ़ …
कहानी बहुत कलात्मक न होते हुए भी अपने कथ्य और संवेदना के स्तर पर अच्छी बन पड़ी है। इसके पीछे एक पसमंज़र है। मंज़र के पीछे मौजूद एक और मंज़र, जो कहानी को उसकी सीधी कथा से कुछ अधिक विस्तार देता है। La vita è bella का स्मरण होना लाज़िमी है, यद्यपि दोनों की स्थितियाँ और कथात्मक विन्यास भिन्न हैं, मगर खेल वहाँ भी है। ऐसा खेल जो करुणा उत्पन्न करे।
इस कहानी की अपनी सादगी और भावुकता है, और शायद इसी कारण उसका असर भी बनता है। और यह असर एक डिप्रेशिंग हॉरर है।
फिर भी यह सवाल रह जाता है कि ऐसी कहानियाँ आज कहाँ और किस तरह लिखी जा रही हैं ? और क्या हमारे समय में सरल कथ्य के भीतर इतनी मानवीय जटिलता को बचाए रखना अब भी सम्भव है ?
पीड़ा और बेचैनी से भर देने वाली कहानी। ….इसे सामने लाने के लिए शुक्रिया।