| ‘तुम्हारे मित्र का चेहरा ईसा से बहुत मिलता-जुलता है.’ मक़बूल फ़िदा हुसेन रामकुमार प्रस्तुति : मनोज मोहन |
सड़क पर चलता हुआ व्यक्ति, अनजाने में, एक बार हुसेन को देख कर फिर पीछे मुड़ कर उन्हें एक बार और देखने का लालच सहज में ही छोड़ नहीं पाता. इसका कारण केवल उनका लंबा कद या सफ़ेद और काले बालों की मिली-जुली उनकी लंबी दाढ़ी ही नहीं है, बल्कि उनकी आँखों में डूबी हुई गहराई, उनके चेहरे पर उनके व्यक्तित्व की अद्भुत छाप, उनकी सीधी-सादी मुद्रा भी क्षण भर के लिए उन लोगों को अपनी ओर खींचती है. फिर उनसे मुलाकात हो जाने के बाद तो उनके समूचे व्यक्तित्व से प्रभावित हो जाना अत्यंत स्वाभाविक है.
एक बार पेरिस के एक छोटे से रेस्तरां में पास बैठी एक स्त्री ने मुझसे फ्रेंच में कहा कि तुम्हारे मित्र का चेहरा ईसा से बहुत मिलता-जुलता है. इस पर मैंने हुसेन को आड़े हाथों लिया. परन्तु उनके व्यक्तित्व की कुछ ऐसी तहें हैं जिनकी झलक पा कर उनकी कला को समझने में जितनी आसानी होती है, उतनी ही उलझनें भी सामने आती हैं. दोनों में जितनी समानता है, उतना ही विरोधाभास भी है. लेकिन उनकी कला और उनका व्यक्तित्व… दोनों ही महत्वपूर्ण हैं.

आधुनिक भारतीय चित्रकारों में हुसेन सबसे आगे हैं—और यदि आगे-पीछे की बहस को छोड़ भी दिया जाए तो यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि उनकी कला में जितनी गहराई, मानवीय संवेदना, अनुभूति का विस्तार, रूपवादी प्रयोग और अन्य चित्रकारों पर उनका प्रभाव दिखाई देता है, वह बात अन्य किसी समकालीन भारतीय चित्रकार के विषय में नहीं कही जा सकती. यह संभव है कि कुछ स्तरों पर कुछ कलाकार हुसेन की अपेक्षा अधिक मंजे हुए हों, लेकिन, कुल मिलाकर, एक सम्पूर्ण कलाकार के नाते हुसेन की प्रतिभा अधिक विकसित हुई है. पिछले दस वर्षों की उनकी प्रगति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उनमें वे अंकुर दिखाई देते हैं जिनका पूर्ण रूप से उपयोग करके एक महत्वपूर्ण कलाकार बनने की क्षमता उनमें है.
हुसेन उन व्यक्तियों में से हैं जिनके मुँह में ज़बान है या नहीं—इस पर शक होने लगता है. जब कभी किसी मीटिंग में वे हमारे साथ बैठते हैं तो इससे अलग मत होने पर भी वे केवल गर्दन हिला कर अपनी असहमति प्रकट कर देते हैं, और हमारे ज़िद करने पर भी एक आधे वाक्य से अधिक नहीं कह पाते—वे भी ऐसे अधूरे से वाक्य जिनका मतलब किसी की समझ में नहीं आता. परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि इन समस्याओं पर उनके विचार नहीं हैं या उनके विषय में वे कभी सोचते नहीं. उन्हें वे सब गंभीर बहसें अजीब-सी जान पड़ती हैं. उनकी आँखों और चेहरे की मुद्रा देख कर ऐसा लगता है जैसे मन ही मन वे उनकी व्यर्थता पर हँस रहे हों और सोचते हों कि काम करना ही समस्याओं को हल करना है. अतः किसी सामूहिक प्रदर्शनों के आयोजन में या किसी संस्था को चलाने में उनका नाम शामिल…किया जा सकता है, वे कोई काम भी करेंगे, इसकी आशा उनसे नहीं की जाती.
इसी से उनके व्यक्तित्व से जो अच्छी तरह परिचित नहीं हैं, उन्हें हुसेन की गैरजिम्मेदारी और लापरवाही उभर आती है. परन्तु जिन्हें यह अनुभव हो चुके हैं, वे खीझने के बावजूद हँस कर टाल जाते हैं.
एक बार एक गंभीर समस्या पर हम एक रेस्तरां में बैठे बड़े ज़ोर से बहस कर रहे थे और हुसेन की राय जानना नितान्त आवश्यक था. कुछ देर तक वे हमारी बातें सुनते रहे या बड़े गौर से सुनने का प्रदर्शन करते रहे, फिर चुपचाप बिना किसी से कुछ कहे बाहर चले गये. हमने सोचा कि ग़ुसलखाने गये होंगे लेकिन जब दस-पन्द्रह मिनट बीत गये तो एक मित्र ने याद दिलाया कि शायद नमाज़ पढ़ने न चले गये हों—क्योंकि ऐसा प्रायः वे करते हैं—परन्तु जब घंटा भर बाद लौटे तब हमारी ओर आश्चर्य भरी दृष्टि से देखते हुए कहने लगे—
“आप लोग अभी तक वहाँ बैठे हैं…”
फिर हमारी क्रोध भरी मुद्रा को देखा और हँसते हुए बोले…
“मैं ज़रा बाहर टहलने के लिए चला गया था. आप लोग बहस के बाद जिन नतीजों पर पहुँचें हों, मैं उनसे सहमत हूँ.”
और हमारी हँसी रोके नहीं रुकी.
उनका दृष्टिकोण इस प्रकार का है कि ज़िन्दगी में इतनी मुसीबतें पहले से ही हैं जिनका बोझ हम पर लदा रहता है. फिर उस बोझ को और भारी बनाने से क्या लाभ? उनकी अपनी कोशिश सदा यह रहती है कि इस बोझ को हलके से हलका रखा जाए. किसी बड़ी चिन्ता या उलझन के रहने पर भी सदा उन्हें मुसकुराते देखा है; कभी उनके माथे पर शिकन तक न नहीं देखी, दूसरों से उनकी चर्चा करने की बात तो अलग रही. और जब कभी उसकी चर्चा की भी तो इतने हलके-फुलके ढंग से मानो वह एक बहुत छोटी-सी समस्या हो.
इसी प्रकार का उनका दृष्टिकोण अपनी कला के प्रति भी है. उनके साथ रह कर कुछ लोगों की यह गलत धारणा भी बन सकती है कि वे कला के प्रति गंभीर नहीं हैं, परन्तु मेरे विचार में वह उनके जीवन का एक ऐसा भाग बन गयी है जिसे बाहर रख कर गंभीरता से नहीं लिया जा सकता. अत्यन्त सहज स्वाभाविक रूप से वे अपने मित्र बनाते हैं जिनमें एक गहरी आत्मीयता और घनिष्ठता का भाव झलकता है.
कुछ चित्रकारों की भाँति कैनवस पर जाने से पूर्व वे ऐसा महसूस नहीं करते जैसे ‘किसी की हत्या करने जा रहे हों’ या ‘शून्य में गिर पड़ें’, कभी-कभी कई दिनों तक वे कोई चित्र नहीं बनाते, घंटों यार-दोस्तों के साथ किसी रेस्तरां में बैठे कॉफ़ी पीते रहते हैं, या सिनेमा देखते हैं और गप्पें लड़ाते हैं. रोज़ सुबह उठ कर ब्रश हाथ में ले सफ़ेद कैनवस के साथ संघर्ष करने के नियमों में वे अपने-आपको बाँध नहीं सकते. परन्तु जब काम करने का ‘मू़ड’ होता है तो बड़े-बड़े चित्र पूरे करने में उन्हें अधिक समय नहीं लगता; बिना थके घंटों चित्र बनाते रहते हैं. उनके कथनानुसार जब वे कैनवस के समीप जाते हैं तो चित्र की सृष्टि पहले से ही उनके दिमाग में हो चुकी होती है, उस समय ब्रश और रंगों की सहायता से केवल उसे एक स्थान से दूसरे पर उतारने का काम रह जाता है. तब यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि जब वे खाली बैठे रहते हैं या मित्रों की मंडली में चुप रहते हैं तो उनका दिमाग काम करता है, वहाँ चित्रों के स्केच बनते रहते हैं. चिन्तन उनका सबसे बड़ा आधार है, वह भी अकेले में नहीं, बल्कि परिचितों के साथ रह कर, शोरगुल भरे काफ़ी हाउस में बैठ कर….
एक सार्वजनिक प्रदर्शनी में भारत सरकार के शिक्षा विभाग के पवेलियन में हुसेन को लगभग १० फ़ीट लम्बा और १२ फ़ीट चौड़ा एक ‘म्यूरल’ बनाना था जिसका विषय था हमारे देश में प्राचीन काल से ले कर आज तक की शिक्षा प्रगति. उन्होंने मुझसे उनको सहायता करने के लिए कहा और मैं तुरन्त तैयार हो गया.
उस काम के लिए हमें एक महीना मिला था परन्तु २० दिनों तक बीच में लगाये हुए उस ‘हार्डबोर्ड’ के तख्ते पर उन्होंने एक रेखा तक नहीं खींची, उसके ‘रफ़ स्केच’ तक नहीं बनाये. मेरे चिन्तित होने पर वे मुस्कुरा कर कहते कि अभी जल्दी क्या है? आखिरी सप्ताह में पूरा कर देंगे और छुट्टी पा जाएँगे. फिर एक रात को खाने के बाद वे अकेले ही पवेलियन में आये और लगभग दो घंटों से कम समय में उस काले बोर्ड पर सफ़ेद चाक से सारे चित्र का ढाँचा तैयार कर दिया. ताल पत्रों के समय से ले कर आज के वैज्ञानिक युग तक का शिक्षा का इतिहास उन्होंने बिम्बों द्वारा अत्यन्त सुन्दर रूप से चित्रित कर दिया. अब केवल रंग भरने बाक़ी थे जो उनके दिमाग में थे. अगले दिन सुबह उसे देख कर मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही.
इसी प्रकार, उनके प्रसिद्ध विशाल चित्रों ‘ज़मीन’ (जिस पर उन्हें राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार मिला और जो आजकल दिल्ली के ‘नवकला संग्रहालय’ में है), ‘आवाज़ें’ और ‘आदमी’ (जिसे जापान की अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी में विशेष ख्याति मिली) आदि का जन्म हुआ, जिनका आधुनिक भारतीय चित्रकला में अपना विशेष स्थान है. उनसे प्रभावित हो कर कुछ अन्य चित्रकारों ने भी बहुत बड़े-बड़े चित्र बनाये परन्तु सफलता कम ही को मिली. उनका दिमाग़ और हृदय—दोनों ही अनगिनत चित्रों की गहरी खानें हैं जिन्हें खोद कर अन्दर भरा हुआ कोष वे ऊपर निकाल लेते हैं. उनके मित्रों की यह शिकायत रहती है कि वे उन खानों की गहराई का पूरा फ़ायदा नहीं उठाते. परन्तु कौन जानता है कि ऐसा करने पर कहीं वे शीघ्र ही बंजर न हो जाएँ.
उनके व्यक्तित्व का जो सबसे बड़ा गुण मुझे दिखाई देता है—वह है उनकी साहसिक प्रवृत्ति जिसकी छाया उनकी कला पर भी पायी जाती है. अपने चित्रकार की सांसारिक सफलता, प्रसिद्धि एवं आर्थिक लाभ की उन्होंने कभी चिन्ता नहीं की. जिस काम में या जिस धारा में कुछ देर तक बहने के बाद जब उन्हें उससे विरक्ति होने लगी तो उससे अलग होने में उन्हें कोई कठिनाई नहीं पड़ी, चाहे लोगों ने इस प्रकार की उनकी कृतियों की कितनी ही प्रशंसा क्यों न की हो या उससे उन्हें कितना ही अधिक लाभ क्यों न हुआ हो.
कुछ वर्ष पूर्व उन्होंने कुछ लकड़ी के खिलौने बनाये जिनकी बहुत प्रशंसा हुई और जो हाथों-हाथ बिक भी गये. कुछ समय बाद उन्होंने अनुभव किया कि उनमें कला का कुछ अंश है लेकिन कुल मिला कर वे सस्ते से लगते हैं—थोड़े रोमांटिक और चकाचौंध करने वाले. शीघ्र ही उन खिलौनों से उन्होंने अपना पीछा छुड़ा लिया. चित्रों में भी कोई नया प्रयोग करके कुछ देर बाद उनका जी ऊब जाता है. जहाँ एक ओर यह उनकी शक्ति है, वहाँ यह प्रवृत्ति उनकी कला के विकास में बाधा भी बन जाती है. नये प्रयोग की सब संभावनाओं को पाने में वे असफल रह जाते हैं. वे उसके अंकुरों को पा लेते हैं परन्तु उनको विकसित करने की इच्छा उनमें नहीं उठती जिससे उनकी पकड़ मज़बूत नहीं हो पाती कुछ दरवाज़े बन्द ही रह जाते हैं.

एक बार हम दोनों इकट्ठे यूरोप में यात्रा कर रहे थे. सोवियत संघ, फ़िनलैंड के बाद हमारा प्रोग्राम पेरिस, जूरिक, लन्दन जाने का था जहाँ दोनों अपने चित्रों की इकट्ठी प्रदर्शनियाँ करने का प्रोग्राम बना रहे थे. एक महीने की यात्रा के बाद हेलसंकी में, न जाने उन पर कैसी सनक सवार हुई और कहने लगे कि अब तो वापस घर लौट जाने को मन कर रहा है. उन्हें अपनी पाँचवर्षीया लड़की की याद सताने लगी. मेरे लाख समझाने-बुझाने पर भी वे अपनी बात पर अड़े रहे और बिना पश्चिमी यूरोप घूमे वे अफ़ग़ानिस्तान के रास्ते वापस लौट आये.
परन्तु उनकी यह सनक कुछ समय पूर्व अपनी चरम सीमा पर एक घटना में दिखाई दी. जनवरी १९५९ में एक भारतीय चित्रकला प्रदर्शनी के अवसर पर उन्हें छह मास के लिए अमरीका रहने का निमंत्रण मिला. इस सामूहिक प्रदर्शनी में उनके चित्रों की न्यूयॉर्क में विशेष प्रशंसा हुई और चार प्रदर्शित चित्रों में से तीन बिक गये. वहाँ के कला जगत के महत्वपूर्ण व्यक्तियों से उनका परिचय हुआ जिनकी सहायता से उनका हर दिन का प्रोग्राम बनाया जाने लगा. न्यूयॉर्क के बाद इस प्रदर्शनी के साथ उन्हें वाशिंगटन, सैन-फ्रांसिस्को और दूसरे शहरों में भी जाना था, वहाँ के लोगों से मिलना, दूसरे चित्रकारों का काम देखना था. सब प्रकार की सुविधाएँ उन्हें दी गयीं. पर इन सज्जन ने बंबई जाने वाले पहले हवाई जहाज़ में अपनी सीट करवा ली.
यदि एक या दो दिन बाद जगह मिली तो इस बीच सीट ‘कैंसल’ करवाने की सो प्रतिशत संभावनाएँ रहती हैं. फिर वे यह चिन्ता नहीं करते कि अगले दिन किसके साथ लंच का वायदा किया हुआ है और किसके साथ ‘डिनर’ का. उन्हें सूचना तक देने का कष्ट वे नहीं उठा सकते. सब तरह के लोगों के साथ घंटों तक रहने के वे आदी हैं, चाहे वह ठेठ व्यापारी हो या लेखक, ‘आर्किटेक्ट’ हो या ‘डिप्लोमेट’ या संगीतज्ञ.
कभी-कभी मज़ाक से उन्हें हम छेड़ते हैं कि अमुक व्यक्ति (जिसे सामने से आता देख कर हम सड़क पार करके दूसरी पटरी पर जा पहुँचे) के साथ किस प्रकार वे दोस्ती रख सकते हैं. परन्तु सब तरह के लोगों को सहने की अपार क्षमता उनमें है. एक बार इसका कारण पूछने पर उन्होंने बतलाया कि विभिन्न लोगों के साथ समय काटने के बाद उनके दिमाग में ऐसा भारीपन आ जाता है जिसे चित्र बना कर ही वे हलका कर पाते हैं.
उनके सृजन के लिए इस तरह के लोगों से मिलना-जुलना अनिवार्य-सा है. इसका एक सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि कला-जगत् से दूर बसने वाले लोग जब हुसेन के सम्पर्क में आये तो स्वाभाविकतः कला के प्रति उनकी रुचि बढ़ी, वे आधुनिक चित्र खरीदने लग गये और इनमें से दो धनी व्यापारियों ने बंबई में दो ‘आर्ट गैलरियाँ’ खोल ली हैं.
एक बार बम्बई के सी. सी. आई. क्लब के ‘लॉन’ में हम दोनों बैठे एक मित्र की प्रतीक्षा करते हुए चाय पी रहे थे. उस मित्र के घर का ‘फ़र्नीचर’ हुसेन ने डिज़ाइन किया था जिसे मैंने उसी दिन देखा भी था. ‘फ़र्नीचर’ सचमुच अपने ढंग का एक ही था जो मूर्तिकला के सिद्धान्तों के निकट था. परन्तु मेरे मन में असंतोष था—क्यों हुसेन अपना सारा समय अपने चित्रों को न दे कर इधर-उधर के दिलचस्प प्रयोगों में नष्ट करते हैं. मैंने अपना यह विचार उन पर प्रकट भी किया और तनिक क्रोध में कहा कि आखिर वे चित्रकार हैं, ‘फ़र्नीचर’ का काम तो कभी किया नहीं. मुझसे सहमत होते हुए भी वे बोले कि उन्होंने सात साल तक ‘फ़र्नीचर डिजाइन’ किया है. मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही. उस दिन, इतनी घनिष्ठ मैत्री होने पर भी, पहली ही बार अपने अतीत के बारे में कुछ बातें बतलायीं कि कैसे शुरू-शुरू में अपनी जीविका कमाने के लिए, इन्दौर से बंबई आ कर, उन्होंने सिनेमा के लिए बड़े-बड़े बोर्ड बनाये. उनका यह काम इतना पसन्द किया जाने लगा कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों का सारा काम उनके पास आने लगा. आय अच्छी होने लगी. लेकिन एक दिन वह सब कारोबार छोड़ कर सारे समय चित्र बनाने लगे और जब पैसा समाप्त हो गया तो एक ‘फ़र्नीचर’ की दूकान पर नौकरी कर ली. बाक़ी समय में चित्र बनाते रहे. ‘फ़र्नीचर’ के ‘डिजाइन’ करने में उन्हें इतनी सफलता मिली कि वे प्रधान बना दिये गये और ५०० रु. मासिक उनका वेतन हो गया जो बीस वर्ष पूर्व एक उच्च मध्य-वर्गीय व्यक्ति की आय समझी जाती थी. फिर एक दिन वह भी छोड़ दिया. आर्थिक सुरक्षा की चिन्ता उन्होंने कभी नहीं की जिससे वे सदा स्वतंत्र रहे और अपनी कला को भी किसी प्रकार की सीमाओं में नहीं बाँधा.
मौलिकता भी हुसेन की कला की एक अद्वितीय विशेषता है. अपनी कला में उन्होंने जो नये प्रयोग किये वे सर्वथा उनकी काल्पनिक शक्ति और अनुभूति की गहराई की उपज थे. यह बात बिना किसी अतिशयोक्ति के कही जा सकती है कि अन्य भारतीय चित्रकारों के मुकाबले में, विदेशी एवं प्राचीन भारतीय कला के प्रभावों की छाप हुसेन की कला में बहुत कम दिखाई देती है. यूरोप में कलाकारों की कृतियों को देखा, उनकी प्रशंसा की और उनसे सीखा, परन्तु उनकी छाया तक इनके चित्रों में कभी भोंडे रूप से दिखाई नहीं दी.
उनकी अनुभूति अत्यन्त आधुनिक होते हुए भी भारतीय है—उन सीमित सिद्धान्तों के आधार पर नहीं जिनकी चर्चा प्रायः हमारे कला आलोचक किया करते हैं—बल्कि उन स्वस्थ, फैले हुए, व्यापक सिद्धान्तों के आधार पर जिनका एक स्थायी मूल्य है, जो कला को एक परिधि में बाँधने के बदले उसे मुक्त और स्वच्छन्द वातावरण देते हैं. उनके रंगों, उनकी आकृतियों और समूचे संयोजन में अलंकारिता का ऐसा पुट होता है जो कभी उनके चित्रों को अलंकारिक या मंडित नहीं बनने देता यद्यपि सतही रूप से देखने में दर्शक को ऐसा आभास हो सकता है. अपने एक पत्र में उन्होंने लिखा था—
“दो-तीन विचारों और दृष्टिकोणों के आधार पर मैं आजकल चित्र बना रहा हूँ. (जो प्रायः मेरी आदत है). मैं कभी एक ही विचारधारा के पीछे डगमगाता हुआ नहीं चल सकता चाहे कितना ही मैं यह महसूस क्यों न करूँ कि अब जल्दी ही मैं उसे पा जाऊँगा, जिसकी मैं खोज कर रहा था. यकायक मैं उस धारा को तोड़ देता हूँ और उस प्रवाह की हत्या कर देता हूँ. कोई भी एक चिड़िया की सीधी-सादी पहली उड़ान को देख कर उसे महसूस करेगा उस अत्यन्त परिपूर्ण राकेट की अपेक्षा जो सीधा आकाश और आकाश के पार एक ज़ोर के साथ जा पहुँचता है.”
हुसेन की कला का प्रभाव कुछ अन्य भारतीय चित्रकारों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. कभी-कभी तो किसी तांतवीया (टेक्स्टाइल) ‘डिजाइन’ को या प्रदर्शनी में किसी चित्र को देख कर यह आभास होने लगता है कि शायद वह हुसेन का बनाया हुआ हो. कोई उन जैसे हाथ बनाने की कोशिश करता है, कोई पैर और कोई उनके बनाये चेहरे. वे स्वयं इस सत्य का महत्व, शायद, महसूस नहीं करते परन्तु आज स्थिति यह है कि उनकी कला, कला के प्रति उनके दृष्टिकोण, विभिन्न कला संस्थाओं के साथ उनके सम्बन्ध आदि—इन सबका, कम या अधिक मात्रा में, प्रभाव भारतीय आधुनिक चित्रकला के आन्दोलन पर पड़ता है. वे किस ‘आर्ट गेलरी’ को चित्र दे कर अपना सहयोग दिखाते हैं, वे किन व्यक्तियों को सहायता दे कर उन्हें महत्वपूर्ण बनाते हैं—इन सबके क्या परिणाम निकलेंगे, यह सब उन्हें सोचना चाहिए. कभी-कभी अनजाने में, सब की हाँ में हाँ मिला कर वे उनसे अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और जल्दी ही अपने दिये सहयोग को भूल भी जाते हैं, परन्तु जब कोई मित्र उन्हें इसकी याद दिला कर उनके व्यवहार की आलोचना करता है तब उन्हें अपनी गलती का आभास होता है.
इतना यश, आर्थिक लाभ और लोकप्रियता प्राप्त कर लेने पर भी हुसेन की दैनिक ज़िन्दगी में कोई अन्तर नहीं आया. अन्य चित्रकारों की भांति न कभी मोटर खरीदने का विचार उनके मन में आया, न मकान खरीदने का न अच्छे कपड़े बनवाने का. वे न शराब पीते हैं, न सिगरेट—काफ़ी से उन्हें अगाध प्रेम है और रेस्तरां में बैठना उन्हें बहुत अच्छा लगता है.
न्यूयार्क में उन्हें तीन हज़ार रुपये मिले जो उन्होंने १५ दिनों में खर्च कर डाले; रंगों के अतिरिक्त कोई सामान भी नहीं खरीदा, बस, टेक्सी ले कर सारा दिन न्यूयार्क की सड़कों पर घूमते रहे, काफ़ी पी और शाम को ब्राडवे में सबसे अच्छी सीट पर बैठ कर कोई नाटक देखा. नाटक देखने का उन्हें बहुत शौक़ है. पैसा न उनके बैंक में रहता है न अधिक देर तक जेब में. इन मामलों में उनका दिल इतना बड़ा है कि प्राग में एक बार, उन्होंने अपनी प्रदर्शनी के सारे चित्र एक लड़की को उपहार स्वरूप दे डाले.
(कल्पना 1961, दिसम्बर, अंक 127 से आभार सहित )
मनोज मोहन
मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. manojmohan2828@gmail.com |



