| महाभारत स्मृति, इतिहास और राष्ट्र __________ अजय कुमार यादव |
भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में महाभारत केवल एक प्राचीन आख्यान या युद्धकथा नहीं है. वह भारतीय समाज के आत्मबोध, इतिहास-बोध, नैतिक प्रश्नों, सांस्कृतिक स्मृतियों और सामाजिक अंतर्विरोधों को समझने का एक जटिल माध्यम भी है. जी. एन. देवी की पुस्तक महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र इसी जटिलता को समझने का प्रयास करती है. मूल पुस्तक अंग्रेजी में है. पुस्तक का हिंदी अनुवाद डॉ. हरि प्रताप त्रिपाठी ने किया है. यह पुस्तक अपने प्रश्नों और वैचारिक विस्तार की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इसकी विषय-संरचना में भूमिका, ‘अथक जिज्ञासा’, ‘काल-चक्र’, संदर्भ-ग्रंथ सूची और महाभारत का वंशानुक्रम शामिल हैं.
देवी की पुस्तक की विशेषता यह है कि वे महाभारत को केवल धार्मिक ग्रंथ, पौराणिक आख्यान अथवा कुरुक्षेत्र के युद्ध की कथा मानकर नहीं चलते. उनके लिए महाभारत एक ऐसी सांस्कृतिक संरचना है जो अनेक शताब्दियों में निर्मित होती हुई भारतीय समाज के बदलते अनुभवों को अपने भीतर समेटती रही है. इसलिए पुस्तक का केंद्रीय प्रश्न यह नहीं है कि महाभारत ‘वास्तव में कब’ लिखा गया, बल्कि यह है कि महाभारत भारतीय समाज में इतने लंबे समय तक किस प्रकार जीवित रहा और अलग-अलग समुदायों, परंपराओं तथा ऐतिहासिक अनुभवों ने इसे किस तरह पुनर्परिभाषित किया.

महाभारत : पाठ से अधिक सांस्कृतिक स्मृति
पुस्तक की भूमिका ही लेखक के महाभारत-बोध की एक वैकल्पिक यात्रा प्रस्तुत करती है. बचपन में सुनी कथाओं, साहित्य, नाटक, फिल्मों, मौखिक परंपराओं, पंचांगों, चित्रों और सार्वजनिक स्थलों पर बने रूपांकनों के माध्यम से महाभारत उनके अनुभव-जगत का हिस्सा बना. बाद में विश्वविद्यालयी साहित्य-अध्ययन के दौरान उन्हें यह अनुभव हुआ कि जिस महाभारत ने उनके सांस्कृतिक बोध को गहरे स्तर पर निर्मित किया था, वह साहित्य के अकादमिक अनुशासन में उसी तरह उपस्थित नहीं था. आदिवासी समुदायों के बीच काम करते हुए जब उन्होंने महाभारत की एक दूसरी जीवित प्रस्तुति सुनी, तब उनके भीतर इस महाकाव्य को नए सिरे से समझने की इच्छा पैदा हुई.
यहाँ से पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक सूत्र सामने आता है- महाभारत को ग्रंथ से अधिक स्मृति की प्रक्रिया के रूप में देखना. लेखक के अनुसार, “महाभारत एक असाधारण सांस्कृतिक कृति है.” इस कथन का महत्व केवल प्रशंसात्मक नहीं है. इसके पीछे यह तर्क है कि महाभारत की शक्ति उसकी विशालता में नहीं, बल्कि इस तथ्य में है कि वह निरंतर पुनर्पाठ, पुनर्लेखन, अनुवाद, लोककथा, रंगमंच, नृत्य, चित्रकला, सिनेमा और डिजिटल माध्यमों में अपना नया रूप ग्रहण करता रहा है.
महाकाव्य की पुनर्व्याख्या
देवी महाकाव्य की प्रचलित साहित्यिक अवधारणा पर भी प्रश्न उठाते हैं. केवल किसी रचना की विशालता या उसके पात्रों की संख्या उसे महाकाव्य नहीं बना देती. उनके अनुसार, “महाकाव्य एक ऐसा काव्य है जिसका प्रादुर्भाव एक सभ्यता के प्रारम्भ में होता है और आगे चलकर यह उस सभ्यता का प्रतिबिम्ब बन जाता है.” यह परिभाषा महाकाव्य को केवल साहित्यिक विधा के रूप में नहीं, बल्कि सभ्यता के आत्मबोध की संरचना के रूप में देखने का आग्रह करती है. महाभारत इसी अर्थ में महाकाव्य है कि इसमें किसी एक नायक की विजय की कथा से कहीं अधिक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संसार मौजूद है. इसमें राजवंश, युद्ध, परिवार, धर्म, सत्ता, स्त्री, जाति, लोकविश्वास, दार्शनिक प्रश्न और अनेक प्रकार की स्मृतियाँ एक साथ उपस्थित हैं. यहाँ देवी का मानना है कि महाभारत-वाचन पारंपरिक ‘नायक-केंद्रित’ महाकाव्य की धारणा से अलग दिखाई देता है. रामायण की तुलना में महाभारत का संसार अधिक बहुकेंद्रित और अंतर्विरोधपूर्ण है. इसमें कोई एक पात्र समूचे आख्यान का अर्थ निर्धारित नहीं करता. यही बहुलता इसे भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में दीर्घजीवी बनाती है.
इतिहास और मिथक
पुस्तक का सबसे महत्त्वपूर्ण और विचारोत्तेजक पक्ष इतिहास तथा मिथक के संबंध पर विचार है. महाभारत को एक ओर इतिहास मान लेने और दूसरी ओर उसे केवल मिथकीय कल्पना मान लेने-दोनों प्रवृत्तियों से लेखक दूरी बनाते हैं. उनके लिए महाभारत का महत्त्व इस बात में है कि इसमें ऐतिहासिक अनुभव और मिथकीय कल्पना एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं. देवी का प्रश्न है कि यदि व्यास जैसे समर्थ कवि ऐतिहासिक आख्यान प्रस्तुत कर सकते थे, तो उन्होंने मिथकों का इतना व्यापक उपयोग क्यों किया? इस प्रश्न के उत्तर में वे मिथक को इतिहास से विचलन नहीं, बल्कि इतिहास को देखने और समझने की एक विशिष्ट पद्धति के रूप में देखते हैं. वे स्पष्ट करते हैं कि “इतिहास को देखने का तरीका ही महत्वपूर्ण रूप से इस काव्य का एक विशेष लक्ष्य है.” यह स्थापना पुस्तक की आलोचनात्मक शक्ति का केंद्र है. महाभारत में इतिहास की खोज केवल घटनाओं की तारीख और क्रम खोजने से पूरी नहीं होती. इतिहास लोगों की स्मृतियों, कल्पनाओं, सामाजिक संरचनाओं और सांस्कृतिक पुनर्निर्माणों में भी जीवित रहता है. इस दृष्टि से महाभारत को ‘इतिहास का विकल्प’ मानने की बजाय ‘ऐतिहासिक स्मृति के निर्माण की प्रक्रिया’ के रूप में देखना अधिक फलदायी है.
फिर भी यहाँ एक आलोचनात्मक सावधानी आवश्यक है. मिथक और इतिहास के इस संश्लेषण को स्वीकार करते हुए यह भी देखना होगा कि दोनों की ज्ञानमीमांसक प्रकृतियाँ अलग हैं. मिथकीय आख्यान से सांस्कृतिक स्मृति और मानसिक संसार को समझा जा सकता है, लेकिन उससे सीधे ऐतिहासिक तथ्य सिद्ध नहीं किए जा सकते. पुस्तक इस अंतर को पूरी तरह समाप्त नहीं करती, पर उसकी चर्चा पाठक को इस बुनियादी समस्या पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करती है.
मौखिक परंपरा और पाठ का निर्माण
महाभारत की निर्मिति के संबंध में पुस्तक मौखिक परंपरा की केंद्रीय भूमिका पर बल देती है. लेखक के अनुसार, महाभारत का निर्माण किसी एक क्षण में किसी एक लेखक द्वारा तैयार किए गए स्थिर ग्रंथ की तरह नहीं समझा जा सकता. उसके भीतर पहले से प्रचलित अनेक कथाएँ, आख्यान और स्मृतियाँ शामिल होती गईं. नल-दमयंती, सावित्री-सत्यवान जैसी कथाओं का समावेश इसी व्यापक प्रक्रिया का संकेत है. लेखक लिखते हैं कि “पीढ़ी दर पीढ़ी इस ग्रंथ का प्रसार मौखिक रूप में हुआ…” इस कथन का आशय केवल इतना नहीं है कि महाभारत लिखे जाने से पहले मौखिक था. इसका बड़ा अर्थ यह है कि मौखिकता ने उसके स्वरूप को निरंतर बदलने की क्षमता प्रदान की. विभिन्न समुदायों और क्षेत्रों में कथा के प्रसार के साथ नए अनुभव उसमें जुड़ते रहे और इस तरह महाभारत एक स्थिर पाठ के बजाय गतिशील सांस्कृतिक संरचना बन गया. यही कारण है कि महाभारत के अनेक संस्करणों, लोककथात्मक रूपांतरणों और क्षेत्रीय पुनर्पाठों को उसके ‘मूल’ से विचलन मानना समस्या पैदा करता है. उसके जीवित रहने का रहस्य ही उसकी बहुलता में है.
देवी महाभारत की एक बड़ी विशेषता उसके ‘संश्लेषणकारी’ चरित्र में देखते हैं. उनके अनुसार, महाभारत में मिथकीय अतीत और ऐतिहासिक अतीत को एक ही आख्यान में पिरोने की कोशिश दिखाई देती है. इस प्रक्रिया में आत्मसातीकरण, सम्मिश्रण, संयोजन और अंगीकरण जैसी प्रवृत्तियाँ काम करती हैं. इस संदर्भ में पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष गैर-ब्राह्मणवादी परंपराओं के साथ महाभारत के संबंध की ओर संकेत करना है. लेखक के अनुसार, महाभारत “गैर-ब्राह्मणवादी वर्गों द्वारा भी पसंद किया गया एवं प्रशंसित होते हुए अध्ययन, रूपांतरण एवं पुनर्पाठ, पुनर्लेखन आदि का विषय बना.” यह स्थापना महाभारत की सामाजिक पहुँच को समझने में उपयोगी है. महाभारत केवल किसी एक धार्मिक या सामाजिक समूह का ग्रंथ नहीं रहा; विभिन्न समुदायों ने इसे अपनी दृष्टि से ग्रहण और पुनर्निर्मित किया.
बौद्ध प्रभाव और धर्म की अवधारणा
पुस्तक का एक उल्लेखनीय पक्ष महाभारत और बौद्ध परंपरा के संबंध की ओर ध्यान आकर्षित करना है. लेखक उस ऐतिहासिक समय की ओर संकेत करते हैं जब वैदिक चिंतन और बौद्ध विचारों के बीच गंभीर वैचारिक तथा सामाजिक संघर्ष मौजूद था. इसी संदर्भ में वे महाभारत के भीतर बौद्ध प्रतीकों और विचारों के संभावित समावेशन की बात करते हैं. पुस्तक में कहा गया है कि “महाभारत ने समकालीन समय के कुछ प्रमुख बौद्ध प्रतीकों को अंतर्ग्रहण कर आख्यान में इन्हें एकीकृत किया.”
यह तर्क महाभारत को किसी एक बंद धार्मिक व्यवस्था का ग्रंथ मानने से रोकता है. इसी क्रम में ‘धर्म’ की अवधारणा पर भी लेखक पुनर्विचार करते हैं. लोकमानस में कृष्ण और भगवद्गीता की केंद्रीयता के कारण महाभारत की छवि मुख्यतः धर्मग्रंथ की बनी है, किंतु लेखक यह संकेत देते हैं कि ‘धर्म’ का अर्थ ऐतिहासिक रूप से एक जैसा नहीं रहा. प्रारंभिक संदर्भों में इसका अर्थ व्यवस्था, संतुलन और जीवन को संचालित करने वाले सिद्धांत से जुड़ा था; बाद की सामाजिक-धार्मिक संरचनाओं में इसके अर्थों का विस्तार और परिवर्तन हुआ. इस प्रकार पुस्तक महाभारत को धर्म की स्थिर संहिता के रूप में पढ़ने के बजाय धर्म की ऐतिहासिक अवधारणा के विकास से जोड़ती है. यह दृष्टि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इससे महाभारत के भीतर उपस्थित नैतिक और सामाजिक प्रश्नों को ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ने का अवसर मिलता है.
‘राष्ट्र’ की अवधारणा
पुस्तक का सबसे महत्त्वाकांक्षी पक्ष उसके शीर्षक में निहित ‘राष्ट्र’ की अवधारणा है. आधुनिक राष्ट्र-राज्य की संकल्पना को प्राचीन महाभारत पर सीधे आरोपित करना इतिहास-दृष्टि की गंभीर भूल होगी. देवी की स्थापना इससे अधिक सूक्ष्म है. वे महाभारत को ऐसी सांस्कृतिक स्मृति के रूप में देखते हैं जो विविधताओं से भरे भूगोल और समाज को साझा अतीत की अनुभूति से जोड़ती है. इस अर्थ में महाभारत किसी राजनीतिक राष्ट्र का संविधान नहीं, बल्कि भारतीय समाज द्वारा अपने अतीत को याद करने की एक दीर्घकालिक सांस्कृतिक पद्धति है. लेखक के विचार में यह एकरूपता पर आधारित राष्ट्रीयता नहीं, बल्कि विविधताओं को स्वीकार करने वाली सांस्कृतिक एकता की ओर संकेत करता है. पुस्तक में महाभारत को किसी काल्पनिक एकरूप राष्ट्र की स्थापना से अलग रखते हुए उसकी विविधतामूलक प्रकृति पर बल दिया गया है.
यहाँ पुस्तक समकालीन समय के लिए भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न छोड़ती है- क्या राष्ट्र की कल्पना केवल राजनीतिक सीमा, राज्य और नागरिकता से बनती है, या साझा सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी उसके निर्माण में भूमिका निभाती हैं? महाभारत इस प्रश्न का कोई सरल उत्तर नहीं देता; बल्कि भारतीय इतिहास में स्मृति और सामूहिक पहचान के जटिल संबंध को समझने का अवसर प्रदान करता है.
‘काल-चक्र’ और समय की भारतीय अवधारणा
पुस्तक का दूसरा प्रमुख वैचारिक खंड ‘काल-चक्र’ है. यहाँ समय को केवल रैखिक क्रम के रूप में नहीं, बल्कि चक्रात्मक गति के रूप में देखने की भारतीय प्रवृत्ति पर विचार किया गया है. चक्र की अवधारणा राजनीतिक और धार्मिक दोनों संदर्भों में सामने आती है. ‘चक्रवर्ती’ की धारणा से लेकर बौद्ध परंपरा में चक्र के प्रतीक तक लेखक समय, सत्ता और सांस्कृतिक विचार के संबंधों को जोड़ते हैं. यह विवेचन महत्त्वपूर्ण है, लेकिन इसे ‘भारतीय समय-बोध’ की एकमात्र और सर्वव्यापी विशेषता मान लेना उचित नहीं होगा. भारतीय परंपराओं में वंशावली, पीढ़ियों का क्रम, राजवंशों का इतिहास और घटनाओं का अनुक्रम भी महत्त्वपूर्ण रहे हैं. अतः चक्रात्मक और रैखिक समय को परस्पर विरोधी ध्रुवों के बजाय भारतीय ऐतिहासिक चेतना में सह-अस्तित्व रखने वाली प्रवृत्तियों के रूप में देखना अधिक उत्पादक होगा.

अंतर्विषयक दृष्टि और पुस्तक की सीमा
जी. एन. देवी की बौद्धिक पृष्ठभूमि इस पुस्तक की पद्धति में स्पष्ट दिखाई देती है. साहित्य, इतिहास, मानवशास्त्र, लोकपरंपरा, धर्म और सांस्कृतिक अध्ययन-इन सभी को साथ लेकर महाभारत को समझने की कोशिश की गई है. यही पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति है. महाभारत जैसी बहुस्तरीय रचना को केवल साहित्यिक आलोचना की किसी एक पद्धति से समझना संभव भी नहीं है.
साथ ही, अंतर्विषयकता अपने साथ एक चुनौती भी लाती है. इतिहास, मानवशास्त्र, भाषाविज्ञान और साहित्य के प्रमाणों की प्रकृति अलग-अलग होती है. इसलिए विभिन्न अनुशासनों के निष्कर्षों को एक ही ज्ञानमीमांसक धरातल पर रख देने से सावधानी बरतनी पड़ती है. पुस्तक कई स्थानों पर विचारोत्तेजक संकेत देती है, किंतु कुछ स्थापनाओं के लिए अधिक विस्तृत प्रमाण और संदर्भ अपेक्षित महसूस होते हैं. विशेषकर महाभारत के काल-निर्धारण, सामाजिक संरचनाओं और विभिन्न धार्मिक प्रभावों के प्रश्न पर पाठक को लेखक के तर्क के साथ-साथ उपलब्ध वैकल्पिक इतिहास-दृष्टियों को भी ध्यान में रखना चाहिए.
हिंदी अनुवाद
जी. एन. देवी की पुस्तक Mahabharata: The Epic and the Nation का हिंदी रूपांतरण डॉ. हरि प्रताप त्रिपाठी द्वारा महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र शीर्षक से किया गया है. मूल पुस्तक 2022 में प्रकाशित हुई थी और इसकी संरचना में भूमिका, ‘The Epic Quest’, ‘The Wheel’, संदर्भ-सूची तथा महाभारत में प्रस्तुत वंशक्रम शामिल हैं. हिंदी अनुवाद के सामने केवल भाषा बदलने की चुनौती नहीं है; उसे एक ऐसी बौद्धिक संरचना को दूसरी भाषा में पुनर्निर्मित करना है जिसमें साहित्य, इतिहास, मानवशास्त्र, भाषाविज्ञान, धर्म, मिथक, सांस्कृतिक स्मृति और राष्ट्र की अवधारणा एक-दूसरे से लगातार संवाद करती हैं.
इस संदर्भ में मूल और अनूदित पाठ का एक छोटा-सा उदाहरण अनुवाद की प्रकृति को स्पष्ट करता है. मूल अंग्रेज़ी में देवी लिखते हैं-“speaking to the nation”; हिंदी में इसका रूप है-“राष्ट्र से संवाद”. यह शाब्दिक अनुवाद न होकर अर्थपरक रूपांतरण है. ‘Speaking’ के लिए ‘बोलना’ या ‘कहना’ भी संभव था, लेकिन ‘संवाद’ शब्द महाभारत और आधुनिक समाज के बीच निरंतर अंतःक्रिया का अधिक व्यापक अर्थ निर्मित करता है. इसकी विशेषता यही है कि अनुवादक ने अंग्रेज़ी क्रिया की सामान्य अभिव्यक्ति को हिंदी के वैचारिक मुहावरे में बदल दिया है. हालांकि ‘राष्ट्र से संवाद के क्रम में बनी हुई है’ जैसी संरचना थोड़ी अमूर्त लगती है; ‘राष्ट्र से निरंतर संवाद करती हुई’ हिंदी में अधिक स्वाभाविक प्रतीत हो सकती थी. फिर भी वर्तमान रूप मूल विचार की गंभीरता को सुरक्षित रखता है.
हरि प्रताप त्रिपाठी के अनुवाद की सफलता यह है कि उन्होंने मूल कृति की प्रश्नाकुलता को बनाए रखने का प्रयास किया है. देवी का लेखन किसी स्थापित निष्कर्ष को पाठक पर थोपने के बजाय लगातार प्रश्नों की ओर ले जाता है. मूल अंग्रेज़ी में भी लेखक महाभारत के उद्देश्य, उसकी दीर्घजीविता, मौखिक और लिखित स्वरूप तथा उसके ‘epic’ होने की प्रकृति को लेकर लगातार सवाल उठाता है. हिंदी अनुवाद में इस प्रश्नात्मकता का बने रहना विशेष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यदि ऐसे वाक्यों को अत्यधिक निर्णायक या उपदेशात्मक बना दिया जाता, तो देवी की आलोचनात्मक मुद्रा ही बदल जाती. अनुवादक ने मूल की इसी बौद्धिक बेचैनी को पर्याप्त रूप से सुरक्षित रखा है.
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात अवधारणात्मक शब्दावली की है. इस पुस्तक में ‘epic’, ‘nation’, ‘civilization’, ‘oral tradition’, ‘myth’, ‘history’, ‘memory’ और ‘cultural imagination’ जैसे शब्द सामान्य शब्द नहीं, बल्कि लेखक के तर्क के आधार हैं. इसलिए उनका अनुवाद केवल शब्दकोशीय समानार्थक शब्द खोज लेने से पूरा नहीं हो सकता. उदाहरण के लिए, ‘nation’ को केवल ‘राष्ट्र’ कहना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि देवी स्वयं आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा को महाभारत पर आरोपित करने को ऐतिहासिक विसंगति मानते हैं. वे स्पष्ट करते हैं कि महाभारत के समय के राज्यों और समुदायों पर आधुनिक ‘nation’ की संकल्पना आरोपित करना anachronism होगा. हिंदी अनुवाद में ‘राष्ट्र’ शब्द इसी वैचारिक तनाव को साथ लेकर आता है. इस दृष्टि से शीर्षक का ‘महाकाव्य एवं राष्ट्र’ होना पाठक को एक सरल निष्कर्ष नहीं, बल्कि एक जटिल वैचारिक प्रश्न की ओर ले जाता है.
‘Nation’ के अनुवाद की कठिनाई को मूल पाठ का एक और छोटा उदाहरण अधिक स्पष्ट करता है. देवी कहते हैं-“national epic”, लेकिन उसी संदर्भ में आधुनिक ‘nation’ को प्राचीन महाभारत पर आरोपित करना anachronism बताते हैं. हिंदी में ‘राष्ट्रीय महाकाव्य’ और ‘राष्ट्र’ दोनों शब्द परंपरा, आधुनिक राजनीति और सांस्कृतिक स्मृति के अलग-अलग अर्थ-संदर्भ सक्रिय करते हैं. अनुवाद की विशेषता यह है कि वह इस तनाव को मिटाता नहीं है. यदि अनुवादक ‘nation’ को किसी अधिक सामान्य शब्द से बदल देते, तो पुस्तक के केंद्रीय वैचारिक प्रश्न का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा कमजोर हो जाता. इसलिए ‘राष्ट्र’ का चुनाव यहाँ अर्थ की दृष्टि से अधिक चुनौतीपूर्ण होते हुए भी आवश्यक है.
इसी प्रकार ‘epic’ के लिए ‘महाकाव्य’ का प्रयोग स्वाभाविक और परंपरासम्मत है, किंतु देवी के यहाँ ‘epic’ का अर्थ केवल एक दीर्घ काव्य नहीं है. वे उसे सभ्यता की स्मृति और उसके आत्मबोध से जोड़ते हैं. उनके अनुसार किसी कविता की लंबाई मात्र उसे महाकाव्य नहीं बना देती; महत्त्वपूर्ण यह है कि वह किसी सभ्यता के उदय के साथ निर्मित होकर आगे चलकर उस सभ्यता का प्रतीक बन जाए. इसलिए ‘महाकाव्य’ शब्द का हिंदी में प्रयोग अपने भीतर भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा का एक अतिरिक्त अर्थ-क्षेत्र भी सक्रिय करता है. अनुवाद की चुनौती यही है कि मूल की आधुनिक अकादमिक अवधारणा और हिंदी के पारंपरिक साहित्यिक अर्थ-संसार के बीच संतुलन बना रहे.
मूल अंग्रेज़ी में देवी लिखते हैं-“an icon for that civilization” और हिंदी में इसका रूपांतर “उस सभ्यता का प्रतिबिम्ब बन जाता है” है. यहाँ अनुवाद की एक दिलचस्प विशेषता और सीमा दोनों दिखाई देती हैं. ‘Icon’ का अर्थ ‘प्रतीक’, ‘प्रतिरूप’ या ‘प्रतिमान’ के अधिक निकट है, जबकि ‘प्रतिबिम्ब’ में किसी सभ्यता के प्रतिबिंबित होने का अर्थ अधिक सक्रिय हो जाता है. हिंदी पाठ में ‘प्रतिबिम्ब’ साहित्यिक दृष्टि से सुंदर और सहज है, लेकिन ‘icon’ की सांस्कृतिक-वैचारिक विशिष्टता कुछ कम हो जाती है. ‘उस सभ्यता का प्रतीक बन जाता है’ मूल अर्थ के अधिक निकट होता. फिर भी ‘प्रतिबिम्ब’ महाकाव्य और सभ्यता के पारस्परिक संबंध को संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है.
अनुवाद की एक और उल्लेखनीय विशेषता मौखिक परंपरा से संबंधित शब्दावली का निर्वाह है. देवी महाभारत को केवल किसी स्थिर लिखित ग्रंथ के रूप में नहीं देखते. वे उसके मौखिक संचरण, विभिन्न भाषाओं में रूपांतरण और लोक-परंपराओं में उसके पुनर्निर्माण को उसके अस्तित्व का अनिवार्य हिस्सा मानते हैं. वे बताते हैं कि महाभारत की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ती रही और बाद में उसमें नए आख्यान तथा सामग्री जुड़ती गई. ऐसे संदर्भों में ‘oral epic’, ‘oral tradition’, ‘rendering’, ‘revision’, ‘adaptation’ जैसे शब्दों के हिंदी रूप केवल भाषिक विकल्प नहीं हैं; वे भारतीय साहित्य की मौखिक और लिखित परंपराओं के संबंध को समझने की कुंजी हैं. हिंदी अनुवाद इस वैचारिक अंतर को सामान्यतः बनाए रखता है.
मौखिक परंपरा के संदर्भ में अंग्रेज़ी का “oral tradition” हिंदी में ‘मौखिक परंपरा’ और ‘oral epic’ का ‘मौखिक महाकाव्य’ के रूप में रूपांतरण विशेष रूप से उपयोगी है. देवी के यहाँ मौखिकता केवल लिखित पाठ का प्रारंभिक रूप नहीं, बल्कि स्वयं एक जीवित सांस्कृतिक प्रक्रिया है. हिंदी अनुवाद में ‘मौखिक परंपरा’, ‘रूपांतरण’, ‘पुनर्पाठ’ और ‘पुनर्लेखन’ जैसे शब्द इस प्रक्रिया को समझने योग्य बनाते हैं. इसकी विशेषता यह है कि अनुवाद भारतीय साहित्यिक संदर्भ में पहले से प्रचलित शब्दावली का उपयोग करता है; किंतु ‘rendering’ और ‘adaptation’ के बीच जो सूक्ष्म अंतर मूल में है, वह हिंदी में कुछ हद तक एक-दूसरे के निकट आ जाता है. इस स्तर पर अनुवाद की अर्थ-संभावना व्यापक है, पर तकनीकी विभेदों को और स्पष्ट किया जा सकता था.
विशेष रूप से ‘काल-चक्र’ और ‘राष्ट्र’ जैसी अवधारणाओं का हिंदी रूपांतरण उल्लेखनीय है. देवी के तर्क में ‘wheel’ महज भौतिक चक्र नहीं, बल्कि समय, सत्ता, नैतिकता और सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक बन जाता है. वे महाभारत को भारत की राष्ट्रीय स्मृति से जोड़ते हुए यह भी कहते हैं कि उसका एकत्व किसी समान सामूहिक आत्मबोध से अधिक अतीत को याद करने की एक साझा पद्धति में निहित है. हिंदी में ‘काल-चक्र’ और ‘राष्ट्र’ जैसे शब्द इस विमर्श को भारतीय वैचारिक शब्दावली के भीतर ग्रहण करने की सुविधा देते हैं, लेकिन साथ ही पाठक को सावधान भी करते हैं कि यहाँ राष्ट्र आधुनिक राज्य या राजनीतिक राष्ट्रवाद का पर्याय नहीं है.
यहाँ मूल का “manner of remembering the past” हिंदी में “अतीत को स्मरण करने की हमारी पद्धति” बनता है. यह अनुवाद वैचारिक दृष्टि से काफी सफल है, क्योंकि ‘remembering’ को केवल ‘स्मरण’ और ‘manner’ को केवल ‘ढंग’ न रखकर ‘पद्धति’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है. इससे देवी के तर्क में मौजूद इतिहास-दृष्टि का बौद्धिक पक्ष उभरता है. इसकी एक छोटी सीमा यह है कि ‘हमारी पद्धति’ हिंदी अकादमिक भाषा में कुछ औपचारिक और अमूर्त सुनाई देती है; फिर भी अर्थ की दृष्टि से यह मूल के काफी निकट है.
‘धर्म’ का प्रश्न भी इसी प्रकार महत्त्वपूर्ण है. देवी महाभारत को केवल धार्मिक ग्रंथ के रूप में पढ़ने से बचते हैं और धर्म की ऐतिहासिक तथा दार्शनिक बहुलता पर विचार करते हैं. वे जाति-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और नैतिक दुविधाओं को भी महाभारत के भीतर से देखने का प्रयास करते हैं. ऐसे स्थानों पर हिंदी अनुवाद की सफलता इस बात में है कि वह भारतीय पाठक के लिए परिचित शब्द ‘धर्म’ को किसी एक स्थिर धार्मिक अर्थ में सीमित नहीं करता.
बौद्ध विचार और महाभारत के संबंध के संदर्भ में भी अनुवाद की अवधारणात्मक सावधानी दिखाई देती है. मूल में देवी लिखते हैं कि बौद्ध प्रतीकों को आख्यान में “integrated them into the narrative” किया गया; हिंदी में इसे “आख्यान में इन्हें एकीकृत किया” के रूप में रूपांतरित किया गया है. ‘एकीकृत’ यहाँ साधारण ‘मिला दिया’ की अपेक्षा अधिक उपयुक्त है, क्योंकि लेखक केवल दो तत्वों के मेल की नहीं, बल्कि आख्यान की संरचना में उनके वैचारिक समावेश की बात कर रहे हैं. इस प्रकार यह अनुवाद अकादमिक अर्थ-सटीकता बनाए रखता है. यद्यपि ‘एकीकृत’ संस्कृतनिष्ठ और कुछ हद तक तकनीकी शब्द है, लेकिन पुस्तक के अकादमिक संदर्भ में उसकी यही तकनीकीता उपयोगी सिद्ध होती है.
फिर भी, अनुवाद की कुछ भाषिक सीमाएँ दिखाई देती हैं. मूल अंग्रेज़ी की अकादमिक शैली कई जगह लंबी, बहुस्तरीय और अमूर्त वाक्य-संरचना पर आधारित है. ऐसी संरचना को हिंदी में लगभग उसी क्रम में बनाए रखने पर वाक्य कभी-कभी बोझिल हो सकते हैं. विशेषतः जहाँ लेखक एक ही वाक्य में ऐतिहासिक तथ्य, वैचारिक निष्कर्ष और प्रश्नात्मक टिप्पणी को जोड़ देता है, वहाँ हिंदी की स्वाभाविक वाक्य-लय कुछ प्रभावित होती है. इसी तरह अंग्रेज़ी की अमूर्त संज्ञाओं (Abstract noun) आधारित अकादमिक भाषा का अत्यधिक निकटानुवाद हिंदी में कभी-कभी वैचारिक घनत्व तो बनाए रखता है, लेकिन पठनीयता को कम करता है. यहाँ अनुवादक के सामने हमेशा शाब्दिक निष्ठा और भाषिक स्वाभाविकता के बीच चुनाव की स्थिति रहती है.
इस समस्या को इतिहास संबंधी पदावली में विशेष रूप से देखा जा सकता है. मूल में इतिहास की कार्यप्रणाली को “logically progressing causality” कहा गया है, जिसका आशय कारण से परिणाम और परिणाम से आगे के कारण की क्रमिक संरचना से है. हिंदी में इस अवधारणा को बनाए रखना आवश्यक था, क्योंकि इसी के बरक्स देवी महाभारत की इतिहास-दृष्टि को अलग करते हैं. अनुवाद की विशेषता यह है कि वह इस वैचारिक अंतर को सरल बनाकर समाप्त नहीं करता; किंतु ऐसी अवधारणाएँ हिंदी में लंबी व्याख्यात्मक संरचनाएँ पैदा करती हैं. इसलिए कुछ स्थानों पर भाषा मूल की अंग्रेज़ी अकादमिक संरचना के निकट दिखाई देती है और हिंदी की स्वाभाविक लय अपेक्षाकृत पीछे चली जाती है.
राष्ट्र संबंधी प्रसंग में भी मूल का “jingoistic and unitary” हिंदी में ‘उग्र राष्ट्रवाद’ और ‘ऐकिक’ जैसी अभिव्यक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया गया है. ‘उग्र राष्ट्रवाद’ ‘jingoistic’ के अर्थ को प्रभावी ढंग से पकड़ता है, लेकिन ‘ऐकिक’ सामान्य हिंदी पाठक के लिए अपेक्षाकृत कठिन शब्द है. ‘एकरूपतावादी’ या ‘एकात्मक’ जैसे विकल्प संदर्भ के अनुसार अधिक स्पष्ट हो सकते थे. यहाँ अनुवादक ने वैचारिक संक्षिप्तता को प्राथमिकता दी है, किंतु सहजता की कुछ कीमत चुकानी पड़ी है. यही वह क्षेत्र है जहाँ अनुवाद की विद्वत्ता और उसकी पठनीयता के बीच तनाव स्पष्ट होता है.
यह भी ध्यान देने योग्य है कि देवी स्वयं भाषा की भूमिका को अत्यंत गंभीरता से लेते हैं. महाभारत की विभिन्न भाषायी परंपराओं पर विचार करते हुए वे संस्कृत, तमिल और पाली जैसी भाषाओं की संरचना तथा अतीत को व्यक्त करने की उनकी क्षमताओं में अंतर पर चर्चा करते हैं. ऐसे लेखक का हिंदी अनुवाद इसलिए सामान्य अनुवाद की तुलना में अधिक कठिन हो जाता है, क्योंकि यहाँ भाषा स्वयं विमर्श का विषय है. इस दृष्टि से डॉ. हरि प्रताप त्रिपाठी का कार्य केवल अंग्रेज़ी पाठ को हिंदी में पहुँचाने का नहीं, बल्कि एक बहुभाषिक और बहुस्तरीय विमर्श को हिंदी के बौद्धिक मुहावरे में पुनर्स्थापित करने का कार्य है.
समग्रतः यह अनुवाद भाषांतरण से अधिक वैचारिक अंतरण का प्रयास है. इसकी सफलता इस बात में है कि पाठक को देवी की महाभारत संबंधी जिज्ञासाओं, ऐतिहासिक प्रश्नों और सांस्कृतिक तर्कों तक पहुँचने के लिए मूल अंग्रेज़ी की बाधा से मुक्त करता है. जहाँ कहीं वाक्य-विन्यास कुछ भारी या अकादमिकता कुछ अधिक सघन हो जाती है, वहाँ भी यह सीमा उस व्यापक बौद्धिक परियोजना की तुलना में गौण दिखाई देती है जिसे अनुवाद हिंदी पाठक के सामने उपस्थित करता है. मूल पुस्तक स्वयं महाभारत को स्थिर ग्रंथ के बजाय निरंतर पुनर्पाठित सांस्कृतिक उपस्थिति के रूप में देखती है; हिंदी अनुवाद भी इसी अर्थ में उस पुनर्पाठ की एक नई कड़ी बन जाता है.
इसलिए महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र का हिंदी रूपांतरण केवल एक अंग्रेज़ी पुस्तक का हिंदी संस्करण नहीं है. यह हिंदी पाठक के लिए महाभारत को स्मृति, इतिहास, भाषा, सभ्यता और राष्ट्र के अंतर्संबंधों के भीतर नए सिरे से पढ़ने का अवसर निर्मित करता है. यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है.
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डॉ. अजय कुमार यादव सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की है. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में एसोसिएट फेलो हैं. साहित्य इतिहास लेखन,भक्ति काव्य और अस्मिता मूलक विमर्शों के अध्ययन में विशेष रूचि है.संपर्क -ajjujnu@gmail.com |

डॉ. अजय कुमार यादव सत्यवती महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं. जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की है. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में एसोसिएट फेलो हैं. साहित्य इतिहास लेखन,भक्ति काव्य और अस्मिता मूलक विमर्शों के अध्ययन में विशेष रूचि है.


शानदार समीक्षा सर।।
महाभारत को केवल एक धार्मिक/पौराणिक आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र, समाज, सत्ता और हमारी सामूहिक चेतना के संदर्भ में देखने का दृष्टिकोण बेहद प्रभावशाली है। लेख की गहराई और समकालीन संदर्भों से जुड़ाव इसे और अधिक पठनीय बनाता है। ऐसे विमर्श हमें अपनी परंपरा और इतिहास को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर देते हैं।
नए दृष्टि से महाभारत को देखना अत्यंत विचारोत्तेजक है। लेख के लिए धन्यवाद।
महाभारत : एक असुविधाजनक प्रश्न
गणेश एन. देवी—भारतीय भाषाओं, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं के महत्वपूर्ण अध्येता हैं। उनकी पुस्तक महाभारत : महाकाव्य एवं राष्ट्र महाभारत को किसी स्थिर धार्मिक ग्रंथ की तरह नहीं, बल्कि स्मृति, मिथक, इतिहास और लोकपरंपराओं में लगातार बदलती सांस्कृतिक उपस्थिति के रूप में पढ़ती है। यही इसकी शक्ति है—और यहीं इसकी सीमा भी दिखाई देने लगती है।
अलग-अलग समुदायों और परंपराओं की बहुल स्मृतियों को एक व्यापक ‘भारतीय स्मृति’ की छतरी के नीचे लाते हुए उनके अंतर्विरोध, असमानताएँ और स्थानीय विशिष्टताएँ कहीं-कहीं धुँधली पड़ जाती हैं। ‘भारतीय समय-बोध’ को मुख्यतः चक्रात्मक मानना आकर्षक है, लेकिन क्या इतना व्यापक निष्कर्ष भारत की असंख्य ऐतिहासिक चेतनाओं को समेट सकता है?
और ‘राष्ट्र’—यही पुस्तक का सबसे जोखिमभरा शब्द है। आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा से प्राचीन महाभारत को पढ़ते हुए इतिहास और वर्तमान के बीच की दूरी आसानी से मिट सकती है। तब यह खतरा पैदा होता है कि हम महाभारत को उसके अपने बहुवचन में पढ़ने के बजाय आज की भारतीय पहचान के लिए उसमें एक सुविधाजनक एकवचन खोजने लगें।
इसलिए पुस्तक से निकलने वाला सबसे असुविधाजनक प्रश्न शायद यही है—
क्या हम महाभारत की बहुल स्मृतियों को समझ रहे हैं, या अपनी वर्तमान वैचारिक जरूरतों के लिए एक नया ‘भारतीय महाभारत’ निर्मित कर रहे हैं?
यहीं इस पुस्तक की शक्ति भी है और उसकी वास्तविक आलोचनात्मक परीक्षा की शुरुआत भी।