| मंच प्रवेश अलक़ाज़ी-पद्मसी परिवार का ज़िन्दगीनामा पवन करण |
मंच प्रवेश पढ़कर आप इस बात पर स्वयं से उलझ सकते हैं कि इसे ‘दुनिया से लेकर, दुनिया के लायक’ बनाते हुए स्वयं को निरंतर अद्यतन करता जाता भारतीय रंगमंच का इतिहास कहें या इतिहास होने की सीमा को छूता अलक़ाज़ी-पद्मसी परिवार का ऐतिहासिक जिंदगीनामा. हाँ इतना अवश्य है कि इसे पढ़ने वाला चाहे वह किसी भी विधा जैसे रंगकर्म, चित्रकला, लेखक, नर्तक, वस्त्र-विन्यासकर्ता आदि अथवा इसका मात्र पाठक-जन वह शुरुआत से जहाँ से यह कथानक प्रारंभ होता है अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवार का कला-संभावना से भरा सदस्य जरूर होना चाहेगा.
वह चाहेगा कि उसे भी कुलसुम टेरेस की घोड़े की नाल-नुमा टेबिल पर पद्मसी-अलक़ाज़ी परिवार के साथ, परिवार के सदस्य के रूप में, विविधता भरा लज़ीज खाना खाने और उनके बीच तय दिन बिताने का लगातार अवसर मिले.
इस कथानक में कुलसुम टेरेस में रखी घोड़े की नाल-नुमा टेबिल एक चरित्र की तरह है. कल्पना कीजिए कुलसुमबाई और जाफर भाई के दुनिया से जाने के बाद अब तक सबको देखती और सुनती आई वह टेबिल यदि अपने इर्दगिर्द अब तक का घटा कहना शुरु कर देती? तब वह भी सामने आता जो फ़ैसल अलक़ाज़ी की निगाह और स्मृति दोनों से चूक गया. मैं उम्मीद करता हूँ मंच प्रवेश का कुछ हिस्सा वास्तव में अथवा कल्पना में उस घोड़े की नाल-नुमा टेबिल पर बैठकर भी लिखा गया होगा और वह टेबिल अब भी पद्मसी परिवार के पास कहीं सुरक्षित होगी. उस पर बैठकर खाया-पिया और लिखा जाता होगा.
सुल्तान पद्मसी (बाबी) काश तुम भी अपने दोस्त और बहनोई इब्राहिम अलक़ाज़ी की तरह नौ दशक जिये होते. जिये होते तो दुनियाभर से बेहतर ग्रहण करते हुए आगे बढ़ते भारतीय रंगमंच के पास अपने-अपने ढंग से भारतीय रंगमंच को समृद्ध बनाते दो सुल्तान पद्मसी या दो इब्राहिम अलक़ाज़ी होते. तब संकट जवाहरलाल नेहरू के सामने खड़ा होता कि वह किस्से रानावि संभालने को कहते. यह भी संभव है कि सप्ताह में एक दिन पूरे परिवार के साथ खाने पर कुलसुम टेरेस में मिलने के बावजूद तब वे दोनों एक-दूसरे के साथ नहीं, एक-दूसरे के सामने खड़े होते. उनके बीच बातचीत बंद होती और अपने समर्थक-रंगकर्मियों से घिरे वे एक-दूसरे का चेहरा देखना पसंद नहीं करते. मगर ऐसा कुछ होता और सामने आता उससे पहले ही तुमने तो स्वयं को मार लिया सुल्तान.
काश प्रथम मुगल बादशाह बाबर की तरह ‘बाबरी’ नामक युवक पर अपनी गहन आसक्ति से तुमने भी स्वयं को बाहर निकाल लिया होता.
संभव है कुलसुमबाई ने सुल्तान पद्मसी (बाबी) में इस विकसित हुई जानलेवा समलैंगिक प्रवृत्ति के बीजों को अपने दोनों समलैंगिक भाइयों से स्थानांतरित होकर आया हुआ मानकर अपने भीतर ही भीतर इसे तड़पते, खीजते और घुटते हुए स्वीकार किया हो? क्या इस प्रवृत्ति का विस्तार सुल्तान पद्मसी से होकर इब्राहिम अलक़ाज़ी में आता-आता रह गया (संभव है कुछ अंकुरित, प्रस्फुटित हुआ हो) या अपने प्रारंभ में ही आकर चला गया. यह एक अनुमान है जिसकी संभावना फ़ैसल अलक़ाज़ी खुद अपने इस कथन में करते हैं कि
“लंदन में इब्राहिम अलक़ाज़ी और उनके दोस्त निस्सिम इज़ेकियल जिसे वे अपने साथ लंदन लेकर गये एक ही बिस्तर साझा करते थे.”
मगर यह एक संकेत है जो अनुमान में बदलता है. मगर इब्राहिम अलक़ाज़ी के आगे के जीवन में जिन्होंने भारतीय रंगमंच के सर्वदेशीय विकास में गहन-गंभीर काम किया ऐसे कोई संकेत नहीं मिलते हैं. ऐसा होता तो संभवतया इस रंगमंच-परिवार की कथा की दशा-दिशा-पहचान कुछ और ही होती.
अपने भाई सुल्तान पद्मसी द्वारा निर्देशित ऑस्कर वाइल्ड के ‘सालोमी’ में मंच पर सात पर्दों वाला नृत्य करने के दौरान कपड़े उतारते हुए नाचने तैयार हुई उन्नीस बरस की रोशन पद्मसी को तो इस पद्मसी-अलक़ाज़ी परिवार के नाट्य-सफर में खड़े होकर सैल्यूट ही किया जा सकता है. अनुमान लगाया जा सकता है कि यह स्त्री-इस्पात उन्हें अपनी माँ कुलसुमबाई से मिला. सबको एक किये रहने और फर्नीचर का अपना व्यवसाय संभालने वाली कुलसुम टेरेस कि वह कुलसुमबाई जो अपने पति जाफर भाई के ‘बहकते रहने’ से नहीं डिगीं तो आगे जाकर उनकी बेटी रोशन पद्मसी ने भी मुम्बई से दिल्ली आ चुके अपने पति इब्राहिम अलक़ाज़ी के भटकाव के आगे आजीवन हथियार नहीं डाले. ये कैसे हो सका इसे परख पाना सचमुच जादुई कल्पना है.
दिन-रात मंच पर खुद को पाते और लगातार नये-नये नाट्यशास्त्र को अभिनीत करने की जिद और जुनून पाले अलक़ाज़ी के जीवन में, उमा आनंद के आने के बाद, वह उनकी किस हद तक कितनी रह सकीं यह तो नहीं जाना जा सका मगर वह इब्राहिम अलक़ाज़ी के जीवन में एक कला के लिए समर्पित, निरंतर सक्रिय और अति-धैर्यवान औरत की तरह रहीं, मंच प्रवेश पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है. शायद उन्होंने अपनी अव्यक्त विवशता और छटपटाहट को अकेले स्त्री जीवन के लिए आवश्यक ईंधन में बदल लिया. भारतीय रंगकर्मियों के लिए ब्रिटिश और यूरोपीय शैली के, स्वयं के सोचे-सूझे नवाचार को उनका हिस्सा बनाते हुए, विश्वसनीय परिधान बनाने के लिए विख्यात रोशन अलक़ाज़ी के उमा आनंद से जाकर तकरार करने ने या इब्राहिम अलक़ाज़ी के सामने रोने बिसूरने और दोनों को तमाशा बनाता कोई प्रसंग या कानूनी प्रकरण हमारे सामने नहीं आता है. शायद दोनों के बीच अलगाव बरतने की यह समझदारी बनी. शायद उनकी परंपरागत पारिवारिक भद्रता और सदैव साथ बनी रही मानसिक संपन्नता ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी. संभवतया मंच दोनों को ही मंच से बाहर भी जीवन मंचित करने की शक्ति दे रहा था.
रानावि में रहते इब्राहिम अलक़ाज़ी को मुम्बई में अपने फ्लैट की छत पर खुला रंगमंच बनाते, अपने फ्लैट को रिहर्सल कक्ष और ग्रीन रूम में बदलते, घर के बाथरूम को सार्वजनिक और हर दौर के लिए चाय पर चाय बनते देखने और उसे अपनाने जाते हुए खुद को देखने वाली रोशन अलक़ाज़ी ने दिल्ली में भी इब्राहिम अलक़ाज़ी को रवींद्र भवन के पीछे मेघदूत रंगमंच बनाते और रानावि में कई स्वीकार्य रंगमंच संबंधित नव-विचार स्थापित करते देखा. उनकी स्मृति में यह भी रहा कि मुम्बई में इब्राहिम अलक़ाज़ी की योग्यता और अख्खड़ता के चलते उनका आर्टिस्ट ग्रुप टूट चुका है. जिसमें उन्होंने दुनिया भर के नाटकों का मंचन कर नाटकों के-नाटकों से, अंतरराष्ट्रीय परिचय की नींव डाली. भारत के विख्यात होते चित्रकारों हुसैन, गायतोंडे, सूजा अकबर पद्मसी तैयब मेहता से यारी और उनके द्वारा मुम्बई में गठित प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की पहली चित्र-प्रदर्शनी का इब्राहिम अलक़ाज़ी द्वारा उद्घाटन जिसमें सूजा ने अपना बनाया विवादास्पद न्यूड-चित्र प्रदर्शित किया. क्या उस प्रदर्शनी के उद्घाटन के अवसर पर रोशन अलक़ाज़ी उपस्थित रहीं. संकेत नहीं मिलता.
अपने बचपन में भाई-बहनों के साथ इंग्लैंड में जाकर रहने-पढ़ने वाली और इब्राहिम अलक़ाज़ी और उनके मित्र के साथ भी इंग्लैंड की यात्रा करने वाली रोशन पद्मसी दिल्ली में फ़ैसल और आमाल के साथ एक अलग जीवन जी रही थीं. दिल्ली में एक तरफ वह स्वयं को रानावि के नाटकों में काम करने वाले नाट्यकर्मियों के लिए वस्त्र विन्यास करता देखतीं तो दूसरी तरफ उन्हें इब्राहिम अलक़ाज़ी को शाम या देर रात उमा आनंद के पास जाते हुए देखना होता.
मंच प्रवेश में फ़ैसल अलक़ाज़ी उन दिनों को अपनी माँ के कठिन और कुछ-कुछ विपन्न दिन बताते हैं मगर उनमें पारिवारिक स्तर पर जिससे फ़ैसल और आमाल प्रभावित हो रहे हों, कोई हाय-तौबा या रुदन हमें देखने को नहीं मिलता. बल्कि एक तरह से इस परिस्थिति के प्रति गंभीरता भरा एक स्वीकार्य भाव हमें जानने को मिलता है. कहीं कोई चुभन नहीं, यह आश्चर्यजनक तो है मगर अविश्वसनीय नहीं.
यदि इस प्रसंग में फ़ैसल अलक़ाज़ी द्वारा कुछ छुपाया गया है तो उसे जानने को लेकर शायद किसी की कोई जिज्ञासा नहीं बल्कि उस न बताये गये को लेकर यदि वह है तो उसके प्रति एक विनम्र आदर भाव है. मगर इसमें इन्द्रधनुष जैसा एक मुम्बई से दिल्ली तक अनेक जगहों को अपने में समेटता और फैलकर दर्ज होता एक लिखित दस्तावेजी -समय बनता है जिसमें मुम्बई विठल परिसर में इब्राहिम अलक़ाज़ी का फ्लैट और रानावि में अध्ययन से लेकर प्रस्तुति तक नवाचार सब रंगमंच हैं और इब्राहिम अलक़ाज़ी और रोशन पद्मसी उसके मुख्य अभिनयकर्ता.
फ़ैसल, आमाल, उमा और अन्य जिसमें सह-कलाकार हैं. बाद में एक तरफ त्रिवेणी में कलादीर्घा चलातीं चुनौती-रहित वस्त्र-विन्यासिका-पुस्तकों की लेखिका, भारत की कला-सक्रिय ताकतवर स्त्रियों की एक सदस्या रोशन अलक़ाज़ी हैं तो दूसरी तरफ रानावि छोड़कर आर्ट हैरिटेज स्थापित करते शीर्ष भारतीय नाट्यपुरुष इब्राहिम अलक़ाज़ी जो अलग होने-रहने के बाद भी अपने पुरखा परिवार से मिलने एक परिवार के रूप में अरब जाते रहे. इसे बस अभिनय की सबसे ‘कमाल’ अवस्था ही कहा जा सकता है. जिसमें इब्राहिम अलक़ाज़ी हर समय मेकअप में रहते होंगे और रोशन अपने बनाये वस्त्रों से अपनी आत्मा भी ढक लेती होंगी. दरअसल मंच प्रवेश के केंद्र में ये दो प्रमुख ऐसी शख्सियत हैं परिचित और विकसित भारतीय रंगमंच जिनके इर्दगिर्द घूमता है. यह बाद में एलेक पद्मसी, फ़ैसल अलक़ाज़ी , पर्ल पद्मसी और आमाल अल्लाना की तरफ सकारात्मक रूप लिए खिसकता है.
क्या मंच प्रवेश में कुलसुमबाई, रोशन अलक़ाज़ी , उमा आनंद, पर्ल पद्मसी, डौली ठाकोर और शेरोन प्रभाकर को और कुछ अन्य जैसे की कुछ-कुछ आमाल और राधिका मलिक को (साम्य के अभाव में भी) छह बागी औरतों क्रमश: हेनरिक इब्सन की लोहे जैसी ‘हेड्डा गैबलर’, आगस्टस स्ट्रिटबंड की दबंग ‘मिस जूली’, ज्यां अनुई की युवा विद्रोही ‘एंटीगनी’ और ‘यूरिडसी’ लोर्का की जुनून किसान ‘यर्मा’ और यूरोपीय की ‘मीडिया’ जैसी स्त्रियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, जिन्हें इब्राहिम अलक़ाज़ी ने मंच पर निर्देशित किया और रोशन अलक़ाज़ी ने जिनके लिए नाट्य-अनुकूल वस्त्र तैयार किये. जिनमें तीन औरतें पर्ल पद्मसी, डौली ठाकोर और शेरोन प्रभाकर एलेक पद्मसी के जीवन में रहीं. मगर इन दोनों कला-परिवारों में मुड़कर देखें तो फ़ैसल और राधिका का एक-दूसरे पर दैहिक और बौद्धिक विश्वास सुखद आश्चर्य की तरह दिखता है. क्योंकि पारिवारिक प्रतिष्ठा को आधार की तरह सामने रखकर देखें तो जहाँ डगमगाने की गुंजाइश अधिक है उस भारतीय नाट्य-संदर्भ में फ़ैसल अलक़ाज़ी की सक्रियता भी निरंतर विविध और भरपूर है. रंगमंच के साथ-साथ उनके द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में किये जाने वाले गंभीर ‘समय-लेवा’ काम आश्चर्य से भर देते हैं. फ़ैसल हर समय कुछ न कुछ किये ही जाते हैं. यानि क्षेत्र कोई भी हो वे हर समय कुछ-कुछ इब्राहिम अलक़ाज़ी की तरह अभिनय करने में मशगूल हैं.
ठीक उसी तरह जैसे हर समय कल्पनीय नाट्यभूषा में दिखाई देते एलेक पद्मसी का नाट्यजीवन हमें रोमाँचित करता जाता है. लगता है जैसे उन्होंने स्वयं के लिए स्वयं द्वारा निर्मित-सज्जित मंच और स्वयं लिखित पटकथा पर अभिनय के लिए स्वयं को चुन लिया है और वे भी हर समय जीवन को अभिनय से छोटा मानते समय नामक मंच पर अभिनय करते एक उत्कृष्ट अभिनेता हैं. उनके और इब्राहिम अलक़ाज़ी के द्वारा अभिनीत और निर्देशित विश्व और भारतीय नाटकों की आश्चर्य से भर देने वाली सूची मंच प्रवेश से छांटकर बनायी जा सकती है. मगर क्यों, इसे तो मंच प्रवेश पढ़ने के दौरान पढ़ा जा सकता है. सुल्तान पद्मसी को आयु कम मिली मगर ‘सितारे-रंगकर्मी’ इब्राहिम अलक़ाज़ी और रोशन अलक़ाज़ी के रहते और बाद में एलेक्स पद्मसी और फ़ैसल अलक़ाज़ी ने लगातार और बेहतर काम किया जिसकी जानकारी हमें मंच प्रवेश में मिलती है. लगता है पद्मसी-अलक़ाज़ी परिवार का भारतीय रंगमंच को एक स्थायी और गतिशील चेहरा देने के लिए ही उदय हुआ. जिन किताबों के माध्यम से कई ब्रिटिश और यूरोपियन नाटकों के और उनके भारत में खेले जाने की विशेषताओं के बारे में जाना जा सकता है. उनकी उत्कृष्टता, वैचारिकता, सामाजिकता और विषयवस्तु की खासियत को समझा जा सकता है उनमें मंच प्रवेश प्रमुख प्रवेश द्वार की तरह है.
साथ ही जिन किताबों पर उनमें बसे चरित्रों के माध्यम से ही बात की जा सकती है उनमें एक मंच प्रवेश से प्रमुखता से यह उम्मीद की जा सकती है. मंच प्रवेश भारतीय रंगमंच के प्रगतिशील और आधुनिक इतिहास का हिस्सा है. जिसमें पद्मसी और अलक़ाज़ी परिवार से निकले स्त्री-पुरुष व्यक्तित्वों का अथक, अतुलनीय और अविस्मरणीय योगदान है जिनके किये गये से प्रामाणिक और बेहद नई, सहेजे जाने योग्य स्मृति निर्मित हुई है.
मंच प्रवेश में अलग-अलग खंडों में जिनकी बात की गई है ऐसे सुल्तान पद्मसी, इब्राहिम अलक़ाज़ी , रोशन पद्मसी(अलक़ाज़ी), एलेक पद्मसी, पर्ल पद्मसी, आमाल अल्लाना ने कितने नाटक अभिनीत और निर्देशित किये इनकी गणना और उनके लिए की गईं तैयारियां और उनमें किये गये प्रयोग आश्चर्य से भर देते हैं. फिर यह नाट्य-गणना रुकने वाली भी नहीं क्योंकि इन दोनों परिवारों की अगली पीढ़ी भी कला-रंगमंच के क्षेत्र में सक्रिय है. जिनका प्राथमिक विवरण मंच प्रवेश में मौजूद है.
यह बताने के लिए कि किताब कैसी है उस पर लिखने के क्रम में कितना कम लिखा जा सकता है और उसे पढ़ते हुए कितना अधिक जाना जा सकता है ‘मंच प्रवेश’ एक ऐसे ही विश्वसनीय उदाहरण की तरह हमारे हाथों में है. इस पर लिखते हुए जितना छूटा है वह सब या उससे भी कहीं अधिक किताब में मौजूद है. इसमें जितना रंगमंच का इतिहास है उतना ही इसे इतिहास की तरह रचने वाले पद्मसी-अलक़ाज़ी परिवार का इतिहास है. इब्राहिम अलक़ाज़ी और रोशन अलक़ाज़ी से होकर, जिसके प्रारंभ में सुल्तान पद्मसी आते हैं, आगे बढ़ता इतिहास है. भारतीय रंगमंच के आधुनिक इतिहास की बात कहीं पर और किसी पर खत्म हो मगर हमें उसके प्रारंभ में पद्मसी-अलक़ाज़ी परिवार के लोग मिलेंगे.
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पवन करण
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प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित.


गिरीश कर्नाड के मेमॉयर का शीर्षक यह जीवन खेल में है..
आप बहुत-बहुत अछा काम कर रहे हैं।
पवन करण ने बड़े सर्जनात्मक तरीके से पुस्तक से साक्षात्कार कराया है। लगता है, इस पुस्तक की जैसी प्रकृति और अन्तर्वस्तु है उसका आस्वाद इसी तरह लिखने से मिल सकता था। समालोचन का वितान ऐसे ही विस्तार पाता है।
जब कोई बड़ा और संवेदनशील कवि किसी पुस्तक पर अपनी टिप्पणी देता है, तो वह केवल एक प्रतिक्रिया नहीं होती, बल्कि अनेक पुराने और नए पाठकों को उस पुस्तक तक पहुँचाने वाला एक महत्वपूर्ण सेतु बन जाता है। मित्र कवि पवन करण की टिप्पणी भी ऐसा ही एक रास्ता खोलती है।
यह पुस्तक अंग्रेज़ी में Enter Stage Right: The Alkazi-Padamsee Family Memoir के रूप में बहुत (शायद 2021) पहले प्रकाशित हो चुकी थी, लेकिन हिंदी के पाठक लंबे समय तक इससे वंचित रहे। राजकमल प्रकाशन की पहल और सुपरिचित रंग समीक्षक अमितेश कुमार जी के अत्यंत पठनीय एवं प्रवाहमान अनुवाद ने इसे हिंदी पाठकों के लिए सुलभ बनाया है। यह अपने आप में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक घटना है। यदि भविष्य में इस पुस्तक पर होने वाली चर्चाओं में अनुवाद की इस महत्त्वपूर्ण भूमिका का उल्लेख भी शामिल हो, तो वह इस संपूर्ण रचनात्मक प्रयास को और अधिक पूर्णता प्रदान करेगा।
फ़ैसल अलक़ाज़ी की यह अत्यंत रोचक पुस्तक मैंने श्रेया और मलयानिल के पुस्तकालय से लेकर पूरे दिन बैठे-बैठे काफ़ी समय पहले मूल रूप में ही पढ़ी थी। तब इसे पढ़ते हुए लगा था कि मैं किसी एक परिवार का संस्मरण नहीं, भारतीय रंगमंच, आधुनिक कला और सांस्कृतिक चेतना के एक जीवित, धड़कते हुए इतिहास से गुजर रहा हूँ। यह ऐसा परिवार है, जिसके लिए प्रतिभा कोई अलग से अर्जित उपलब्धि नहीं, जीवन जीने की स्वाभाविक पद्धति रही है। अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवारों की स्मृतियाँ बताती हैं कि कला केवल मंच, कैनवास या कैमरे तक सीमित नहीं रहती; वह घरों के भीतर, पारिवारिक संबंधों में, प्रेम और असहमति में, सफलताओं और विफलताओं में भी लगातार घटित होती रहती है। लेकिन आज पवन करण जी का यह लेख पढ़ते हुए वही पुस्तक मेरे सामने एक बिल्कुल नई रोशनी में खुली। अद्वितीय कवि पवन करण ने इसकी केवल समीक्षा नहीं की, इसके पात्रों, संबंधों और सृजनात्मक बेचैनियों के भीतर उतरकर उनकी धड़कनों को सुना है। उनका लेख इस परिवार की विलक्षणता का उत्सव मनाते हुए भी उसकी मानवीय जटिलताओं से आँख नहीं चुराता। कलाकारों के चमकते हुए सार्वजनिक चेहरों के पीछे मौजूद अकेलापन, संघर्ष, पारिवारिक तनाव और सृजन की कठोर कीमत भी इसमें बराबर दिखाई देती है। किसी पहले से पढ़ी हुई पुस्तक पर लिखा गया लेख जब आपको उस पुस्तक को फिर से पढ़ने के लिए विवश कर दे तो समझना चाहिए कि लेखक ने अपना काम असाधारण संवेदनशीलता और गहराई से किया है। पवन करण के इस लेख ने आज सचमुच हृदय को छू लिया। यह केवल एक पुस्तक पर लिखा गया सुंदर लेख नहीं, भारतीय रंगमंच के उस स्वर्णिम, बेचैन और बहुरंगी संसार में प्रवेश करने वाला एक आत्मीय द्वार है।