| सत्रापी से जोशुआ बेयरमैन की बातचीत अनुवाद : अनुराग अंकुर |
समकालीन विश्व साहित्य में मार्जान (मरजान) सत्रापी का नाम उन रचनाकारों में लिया जाता है जिन्होंने व्यक्तिगत स्मृतियों को इतिहास, राजनीति और संस्कृति के बड़े प्रश्नों से जोड़कर देखने की नई दृष्टि विकसित की. ईरान में जन्मी और बाद में फ़्रांस में बस गई सत्रापी ग्राफ़िक नॉवेल, संस्मरण, फ़िल्म और दृश्य कला की दुनिया की एक महत्त्वपूर्ण हस्ती थीं. उनकी चर्चित कृति पर्सेपोलिस ने न केवल ग्राफ़िक नॉवेल को साहित्यिक प्रतिष्ठा दिलाई, बल्कि ईरान और मध्य-पूर्व के बारे में प्रचलित अनेक पूर्वग्रहों को भी चुनौती दी. 4 जून 2026 को उनके निधन के साथ विश्व साहित्य ने एक ऐसी रचनाकार को खो दिया, जिसने लेखन एवं कला को मनुष्यता, संवाद और प्रतिरोध का माध्यम बनाया.
अगस्त 2006 में अमेरिकी साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका The Believer में प्रकाशित यह साक्षात्कार पत्रकार एवं लेखक जोशुआ बेयरमैन (Joshuah Bearman) ने लिया था. बेयरमैन के अनुसार यह बातचीत पेरिस में सत्रापी के स्टूडियो के पास स्थित एक रेस्तरां में हुई थी, जहाँ वे पर्सेपोलिस के एनिमेटेड फ़िल्म रूपांतरण पर काम कर रही थीं. वे लगातार सिगरेट पीती रहीं, तेज़ी से बोलती रहीं और एक विषय से दूसरे विषय पर सहजता से जाती रहीं.
इस संवाद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सत्रापी दुनिया को ‘अच्छे’ और ‘बुरे’, ‘पूर्व’ और ‘पश्चिम’, ‘हम’ और ‘वे’ जैसी सरल श्रेणियों में बाँटकर देखने का विरोध करती हैं. उनके अनुसार मीडिया और राजनीति अक्सर दुनिया को किसी सुपरहीरो कॉमिक की तरह प्रस्तुत करते हैं, जहाँ एक पक्ष नायक और दूसरा खलनायक होता है. सत्रापी इस सरलीकरण का प्रतिरोध करती हैं और जीवन की जटिलताओं को समझने पर ज़ोर देती हैं. उनके लिए साहित्य का उद्देश्य आसान निष्कर्ष देना नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज को उसकी पूरी जटिलता में समझना है. एक लेखिका के रूप में उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनकी मानवीय दृष्टि है. उनके लिए इतिहास केवल शासकों और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि उन सामान्य लोगों का भी है जो इन परिस्थितियों के बीच अपना जीवन जीते हैं. यही कारण है कि वे कहती हैं कि दुनिया का फैसला केवल जॉर्ज बुश या सद्दाम हुसैन नहीं करते, असली दुनिया तो “आप और मैं” हैं.
वे ईरान की धार्मिक सत्ता की आलोचना करती हैं, लेकिन साथ ही अमेरिकी सत्ता और उसकी साम्राज्यवादी भाषा पर भी प्रश्न उठाती हैं. उनके लिए समस्या किसी एक देश या धर्म की नहीं, बल्कि हर प्रकार की कट्टरता की है. धर्म के प्रश्न पर भी वे स्पष्ट हैं. वे संगठित धर्मों और धार्मिक उग्रता के प्रति गहरी असहमति व्यक्त करती हैं तथा मनुष्यता को किसी भी धार्मिक पहचान से अधिक महत्त्व देती हैं. वे मानती हैं कि दुनिया के अधिकांश संघर्षों की जड़ आर्थिक विषमता में है. समकालीन समय में, जब दुनिया युद्ध, धार्मिक ध्रुवीकरण और पहचान की राजनीति से जूझ रही है, सत्रापी की यह मानवीय और आलोचनात्मक दृष्टि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो उठती है.
अनुराग अंकुर
जोशुआ बेयरमैन: आपकी किताबें हाल ही में इज़राइल में प्रकाशित हुई हैं और वहाँ उन्हें अच्छी प्रतिक्रिया के साथ स्वीकृति मिली है.
मार्जान सत्रापी: इज़राइल जैसे देश में लोग ईरान को लेकर बहुत उत्सुक रहते हैं, इसलिए वहाँ दिलचस्पी होना स्वाभाविक है. खासकर अभी जो कुछ वहाँ चल रहा है— नई सरकार वगैरह— उसके बीच लोग जानना चाहते हैं कि फ़्रांस में रहने वाली यह ईरानी अपने कॉमिक्स में क्या कह रही है. मुझे लगता है, यह अच्छी बात है. अब मेरी किताबें दूसरे देशों में भी प्रकाशित हो रही हैं और हर जगह लोग उनमें कुछ न कुछ ऐसा खोज लेते हैं, जो उन्हें आकर्षित करता है.
जोशुआ बेयरमैन: मुझे लगता है कि आपकी रचनाओं की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण यह है कि वे एक ऐसे देश को मानवीय चेहरा देती हैं, जिसके बारे में दुनिया बहुत कम जानती है. ईरान की जो आम छवि बनाई जाती है, वह एक डरावने धर्मतांत्रिक राज्य की है, जहाँ ऐसे पागल लोग भरे पड़े हैं जो पश्चिम को मिटा देना चाहते हैं. मानो हर ईरानी अपनी अलमारी में झंडों का ढेर लगाए बैठा हो और “अमेरिका मुर्दाबाद” या “इज़राइल मुर्दाबाद” के अगले प्रदर्शन का इंतज़ार कर रहा हो. लेकिन आपकी किताबें एक बिल्कुल अलग कहानी कहती हैं. उनमें ऐसे लोग हैं जिनकी परेशानियाँ, दुख और खुशियाँ हमारी ही तरह हैं. और डर भी. वहाँ ऐसे ईरानी दिखाई देते हैं जो अपने शासन से उतने ही डरे हुए हैं, जितने हम हैं.
मार्जान सत्रापी: बिल्कुल. असली समस्या यही है. आज दुनिया को हमेशा ‘हाँ’ या ‘नहीं’, ‘काला’ या ‘सफेद’ में बाँटकर समझाया जाता है. सतही सुपरहीरो वाली कहानियों की तरह. एक पक्ष पूरी तरह अच्छा और दूसरा पूरी तरह बुरा. लेकिन मैं कोई नैतिक शिक्षा देने नहीं बैठी हूँ. यह मेरा काम नहीं है कि लोगों को बताऊँ कि क्या सही है और क्या गलत. मैं बस परिस्थितियों को उतनी ईमानदारी से सामने रखने की कोशिश करती हूँ, जितनी ईमानदारी से मैं उन्हें देख और समझ पाई हूँ. यही वजह है कि मैं अपने जीवन को ही अपनी रचनाओं का आधार बनाती हूँ. मैंने यह सब स्वयं देखा है और अब वही आपको बता रही हूँ. दुनिया बैटमैन और रॉबिन की जोकर से लड़ाई जितनी सीधी-सादी नहीं है. चीज़ें उससे कहीं ज़्यादा उलझी हुई हैं. और जटिल सवालों के आसान जवाब तलाशने वाले लोगों से ज़्यादा डरावना मुझे कुछ नहीं लगता.
जोशुआ बेयरमैन: कॉमिक पुस्तकों की दुनिया में तो शुरुआत से ही अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष वाली सुपरहीरो कहानियाँ प्रमुख रही हैं. ऐसे में जब आप अपनी कथाओं को अधिक गहराई और जटिलता देती हैं, तो क्या कॉमिक्स माध्यम के बारे में भी आपकी कोई टिप्पणी है?
मार्जान सत्रापी: नहीं, मेरा तो मानना है कि कॉमिक्स हमेशा से इससे कहीं अधिक रहे हैं. वे कभी सिर्फ सुपरहीरो तक सीमित नहीं रहे. और आज तो आर्ट स्पीगेलमैन जैसे रचनाकारों ने दिखा दिया है कि कॉमिक्स कितने शक्तिशाली माध्यम हो सकते हैं. जो सैको कॉमिक्स के ज़रिए राजनीतिक रिपोर्टिंग करते हैं. इसलिए कॉमिक्स भी अभिव्यक्ति का एक माध्यम हैं. न वे सिनेमा हैं, न साहित्य; वे अपनी तरह का एक अलग माध्यम हैं. उनकी खासियत यह है कि कहानी कहने के लिए चित्रों का इस्तेमाल किया जाता है. बहुत-सी खराब फ़िल्में भी बनती हैं— बंदूकें, मारधाड़ और आर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर जैसे नायकों से भरी हुई. लेकिन यह सिनेमा की गलती नहीं है. गलती उन लोगों की है जिन्होंने वे फ़िल्में बनाई हैं.
कोई भी माध्यम उतना ही अच्छा हो सकता है, जितने अच्छे लोग उसमें काम कर रहे हों. अगर कॉमिक्स का इस्तेमाल कभी घटिया या उबाऊ कहानियाँ सुनाने के लिए हुआ है, तो समस्या कॉमिक्स में नहीं, बल्कि उन्हें लिखने वालों में है.
जोशुआ बेयरमैन: क्या आपको लगता है कि कॉमिक्स के माध्यम का इस्तेमाल करने के कारण आप ज़्यादा बड़े पाठक-वर्ग तक पहुँच पाती हैं?
मार्जान सत्रापी: हो सकता है. क्योंकि इसमें चित्र होते हैं. आप एक चित्र देखते हैं और तुरंत समझ जाते हैं कि मूल बात क्या है. शायद यह माध्यम इसलिए भी ज़्यादा सुलभ है क्योंकि हम आज चित्रों और दृश्य माध्यमों की संस्कृति में जी रहे हैं. लोग कहानियों को इस रूप में देखने के अभ्यस्त हैं. वे चित्रों को पढ़ना और समझना जानते हैं.
जोशुआ बेयरमैन: क्या कोई ऐसा समय आया था जब आपको लगा कि आप अपनी आत्मकथा को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करना चाहती हैं?
मार्जान सत्रापी: मैं इसके बारे में हमेशा सोचती रहती थी. फिर एक समय ऐसा आया जब मैं कल्पना कर सकती थी कि वह कैसी दिखाई देगी. हालाँकि जब मैं काम करने बैठी, तब मुझे खुद भी नहीं पता था कि पन्नों पर आखिर क्या उभरकर आएगा. कई बार अपनी ही कहानी आपको चौंका देती है. कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें मैंने पहले से सोचा नहीं था, या जो शुरू में मुझे ठीक से याद भी नहीं थीं, लेकिन काम करते-करते वे अपने आप सामने आ गईं.
जोशुआ बेयरमैन: आपकी किताबें एक तरह से अलग-अलग संस्कृतियों के बीच पुल का काम करती हैं. अगर इनमें सिर्फ़ शब्द होते, तो शायद वे यह काम इतनी अच्छी तरह न कर पातीं.
मार्जान सत्रापी: शायद. साथ ही मेरे लिए भी यह ज़्यादा मुश्किल होता. अगर मुझे सिर्फ़ शब्दों में आत्मकथा लिखनी होती, तो मुझे अपने मन में मौजूद किसी दृश्य को भाषा में व्यक्त करने का तरीका खोजना पड़ता. मेरे लिए उसे बना देना कहीं आसान है. फिर शब्द अपने आप में एक तरह का फ़िल्टर भी होते हैं. उनका अनुवाद होता है. यहाँ तक कि अपनी मूल भाषा में भी एक बात को अलग-अलग तरह से समझा जा सकता है. फिर भी उसमें कुछ न कुछ अस्पष्टता बनी रहती है. अगर लेखक और पाठक अलग-अलग संस्कृतियों से आते हों, तो वह दूरी शब्दों में भी दिखाई दे सकती है. लेकिन चित्रों के साथ संवाद कहीं ज़्यादा सीधा होता है.
जोशुआ बेयरमैन: आप वेस्ट पॉइंट गई थीं और उसके बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स के ओप-एड पेज के लिए एक कार्टून भी बनाया था. आप वहाँ एक चीज़ देखने की उम्मीद लेकर गई थीं— गुस्सैल सैन्य प्रशिक्षक, युद्ध-विरोधी विचार रखने पर शायद तुरंत गोली मार दिए जाने का ख़तरा—लेकिन आपको कुछ और ही देखने को मिला. ऐसा लगता है कि आपकी बहुत-सी रचनाओं का सार भी यही है.
मार्जान सत्रापी: हाँ, मैंने वहाँ बहुत कुछ सीखा. फ़्रांस में आपको यही सुनने को मिलता है कि 11 सितंबर के बाद सारे अमेरिकी ‘फ़्रीडम फ्राइज़’ खाने लगे हैं और फ़्रांसीसी शराब पीना छोड़ चुके हैं या कुछ ऐसा ही. यहाँ की ख़बरें देखकर लगता है जैसे सारे अमेरिकी भारी-भरकम राष्ट्रवादी हैं, जो पूरे मध्य-पूर्व में युद्ध छेड़ने पर तुले हुए हैं. बेशक, कुछ लोगों ने सचमुच ‘फ़्रीडम फ्राइज़’ जैसी बातें की थीं. लेकिन फ़्रांस में आपको वे अमेरिकी नहीं दिखाए जाते जो बुश का विरोध कर रहे थे. इसलिए जब यहाँ लोग ‘मूर्ख अमेरिकियों’ की बात करते हैं, तो मैं खुद को अमेरिका का बचाव करते हुए पाती हूँ. मैं कहती हूँ, “नहीं, सब लोग ऐसे नहीं हैं. अमेरिका आज भी सिर्फ़ अपनी सरकार का नाम नहीं है. उसके अपने आदर्श हैं, अपनी ताकत है.”
जोशुआ बेयरमैन: और जब आप अमेरिका में होती हैं, तब शायद फ़्रांस का बचाव करती होंगी.
मार्जान सत्रापी: (हँसते हुए) हाँ, कुछ ऐसा ही है. और जहाँ भी जाती हूँ, मुझे ईरान का बचाव करना पड़ता है. क्योंकि ईरान को तो लोग बिल्कुल समझते ही नहीं, खासकर अमेरिका में. मेरा मतलब है, ज़रा देखिए—बुश ने ‘Axis of Evil’ कह दिया, फिर बातें होने लगीं कि हमें सबक सिखाना है और न जाने क्या-क्या. लेकिन जैसे अमेरिका के लोग सिर्फ़ बुश नहीं हैं, वैसे ही ईरान के लोग सिर्फ़ अयातुल्ला भी नहीं हैं. इसलिए मैं हमेशा बीच में फँसी रहती हूँ.
जोशुआ बेयरमैन: आपकी भूमिका संयुक्त राष्ट्र की किसी सद्भावना-दूत जैसी हो गई है.
मार्जान सत्रापी: अब तो मेरा काम ही सबका बचाव करना हो गया है. लेकिन मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है. मैं बहुत यात्रा करती हूँ, लोगों से बातें करना मुझे अच्छा लगता है, और उससे भी ज़्यादा उनकी बातें सुनना. और मैं लोगों के बारे में पहले से कोई धारणा बनाकर नहीं चलती. बहुत पहले मुझे एक बात समझ में आ गई थी— मैं चाहे जितना सोचूँ कि मैं बहुत कुछ जानती हूँ, सच यह है कि मैं बहुत कम जानती हूँ. और जिस दिन मुझे यह बात समझ में आई, उसी दिन से मैंने सचमुच सीखना शुरू किया. यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है—मुझे पता है कि मैं सब कुछ नहीं जानती.
ईरान में कुछ लोग कट्टरपंथी हैं, कुछ नहीं हैं. मेरे बहुत अच्छे इज़राइली दोस्त हैं. मेरे बहुत अच्छे अमेरिकी दोस्त भी हैं. हमारी संस्कृतियाँ अलग हैं, लेकिन कई बातों पर हमारी सोच एक जैसी है. यही इंसानियत है, और मुझे लगता है कि हम इसे धीरे-धीरे खोते जा रहे हैं. एक तरह से मेरे कॉमिक्स भी इसी खोती हुई इंसानियत को बचाए रखने की कोशिश हैं.
जोशुआ बेयरमैन: आपकी किताबें इस बात को सीधे नहीं कहतीं, लेकिन लगातार उसकी ओर इशारा करती रहती हैं. क्या यह जान-बूझकर किया गया प्रयास था?
मार्जान सत्रापी: बिल्कुल. मैं हमेशा यह दिखाना चाहती थी कि हम एक-दूसरे से जितना अलग समझते हैं, उतने अलग नहीं हैं. शायद हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम खुद को दूसरे की जगह रखकर नहीं देखते. हर किसी को लगता है कि दुख सिर्फ़ उसी के हिस्से में आया है. या फिर कि आइसक्रीम सिर्फ़ वही पसंद करता है, या अपने बच्चों को छुट्टियों में घुमाने सिर्फ़ वही ले जाता है. लोग यह जानकर हैरान रह जाते हैं कि ईरान में भी हम पंक रॉक सुनते थे. कई बार तो हमें उसके बारे में अमेरिकियों से पहले पता चल जाता था. मेरे कुछ अमेरिकी दोस्त ऐसे हैं जिन्हें पंक आंदोलन के बारे में मुझसे बाद में पता चला. यही छोटी-छोटी कहानियों की ताकत है. वे आपको बड़ी बातें समझा सकती हैं. इसीलिए मैंने अपनी छोटी-छोटी निजी कहानियों के ज़रिए दुनिया के बारे में बात करने की कोशिश की. क्योंकि दुनिया का फैसला जॉर्ज बुश और सद्दाम हुसैन नहीं करते. वे अख़बारों की सुर्खियाँ ज़रूर बनाते हैं, लेकिन असली ज़िंदगी वे नहीं हैं. असली ज़िंदगी तो आप और हम हैं.
जोशुआ बेयरमैन: आप कॉमिक्स जैसे अपेक्षाकृत सरल माध्यम का इस्तेमाल करके एक जटिल और बहुस्तरीय कहानी कहती हैं. लेकिन दूसरी ओर, विशाल समाचार संस्थानों, फ़िल्मों और पत्रिकाओं की पूरी दुनिया अक्सर उसी जटिलता को पकड़ने में नाकाम रहती है. यह एक अजीब उलटफेर है. अख़बारों के पहले पन्ने और टीवी न्यूज़, जिनसे हमें दुनिया और राजनीति की पेचीदगियाँ समझनी चाहिए, खुद किसी कॉमिक बुक की तरह सरल हो गए हैं, जबकि आपने कॉमिक बुक को दुनिया की जटिलताओं को समझने की खिड़की बना दिया है.
मार्जान सत्रापी: क्योंकि मेरी तरह की कहानियाँ ख़बरें नहीं बेचतीं. मैंने तो अब टीवी देखना लगभग छोड़ ही दिया है. वहाँ आपको सिर्फ़ घटनाएँ और उनके नतीजे बताए जाते हैं. लेकिन कहानी कभी सिर्फ़ इतनी नहीं होती. असली बात यह है कि चीज़ें क्यों हुईं. लेकिन एक हद तक हिंसा ही ख़बर बनती है और लोग ऐसी जटिल ख़बरें सुनना भी नहीं चाहते. क्योंकि जिस दिन आप मान लेते हैं कि चीज़ें जटिल हैं, उसी दिन आपकी अपनी ज़िंदगी भी जटिल हो जाती है.
जोशुआ बेयरमैन: हाल के फ़्रांसीसी दंगों को देखना आपके लिए अजीब अनुभव रहा होगा. क्योंकि उनका संबंध कहीं-न-कहीं अस्मिता के सवालों, पूर्व और पश्चिम जैसी बहसों से था और आप खुद इन दोनों दुनियाओं के बीच खड़ी हैं. दंगों को भी “सभ्यताओं के टकराव” की बड़ी कहानी का हिस्सा बना दिया गया, जिसकी पहली बड़ी घटना 1979 की ईरानी क्रांति मानी जाती है— जो आपकी आत्मकथा का भी केंद्रीय प्रसंग है. ऐसा लगता है कि आप उस कहानी से कभी बाहर नहीं निकल पातीं.
मार्जान सत्रापी: दुर्भाग्य से. और सच कहूँ तो वह कहानी काफी हद तक गढ़ी हुई है. यहाँ यह देखना हैरान करने वाला था कि उसे किस तरह बनाया गया. हर जगह एक ही बात—”मुस्लिम ग़ुस्सा”, “मुस्लिम आक्रोश” वगैरह. लेकिन वे दंगे मुसलमान होने की वजह से नहीं हुए थे. समस्या यह थी कि ये लोग समाज में बराबरी से शामिल नहीं हो पाए थे. अगर उन्हें अपनी पहचान को लेकर संकट है, तो वह उन पर थोपा गया संकट है. सोचिए, अगर फ़्रांस में तीन पीढ़ियों से रहने के बाद भी अरब मूल के लोगों को फ़्रांसीसी नहीं, बल्कि सिर्फ़ “अरबी” कहा जाए, तो वे नाराज़ क्यों नहीं होंगे? लोग पूछते हैं कि अरबी खुद को फ़्रांसीसी क्यों नहीं मानते. मैं कहती हूँ— क्योंकि फ़्रांसीसी उन्हें फ़्रांसीसी नहीं मानते. फिर गृह मंत्रालय की तरफ़ से यह कहा गया कि सड़कों से “कचरा” साफ़ करना है. इससे हिंसा सही नहीं ठहर जाती—उन्हें शहर जलाने का अधिकार नहीं था—लेकिन कम-से-कम यह समझ में आता है कि ऐसा हुआ क्यों.
जोशुआ बेयरमैन: और फ़्रांस के उस पुराने “सभ्यता मिशन” का क्या हुआ?
मार्जान सत्रापी: हाँ, सिद्धांत में वह आज भी मौजूद है. लेकिन असली सवाल पैसे का है, मेरे दोस्त. प्रवासियों की अर्थव्यवस्था का. मुझे फ़्रांस में कभी कोई खास दिक्कत नहीं हुई. लेकिन मैं एक संपन्न परिवार से आती हूँ. पढ़ी-लिखी हूँ. एक अच्छे इलाके में रहती हूँ. इसलिए किसी को मुझसे परेशानी नहीं है. अगर मेरे पास न पैसा होता, न शिक्षा, और मैं किसी उपेक्षित बस्ती में रहती, तो मैं भी “समस्या” कहलाती. सच कहूँ तो नस्लवाद उतना बड़ा मुद्दा नहीं है जितनी गरीबी है. और यह बात सिर्फ़ फ़्रांस की नहीं, पूरी दुनिया की है. जो चीज़ें हमें जातीय या नस्ली संघर्ष लगती हैं, वे अक्सर आर्थिक संघर्ष होती हैं.
दुनिया के लगभग हर बड़े संघर्ष को ध्यान से देखिए—आख़िर में बात गरीबी, संसाधनों और आर्थिक असमानता पर आकर टिकती है. जितनी ज़्यादा गरीबी, उतना ज़्यादा संघर्ष.
भूख सभ्यता को खा जाती है. पश्चिम भूखा नहीं है, इसलिए वह खुद को इतना सभ्य कह पाता है. और सच पूछिए तो “सभ्यता” सबसे बड़ा भ्रम है.
जोशुआ बेयरमैन: मैंने पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव अभियान को कवर किया था. उस दौरान मैं बहुत-से लोगों से मिला. मेरा अनुमान है कि जिन लोगों से मैं मिला, उनमें लगभग एक चौथाई की राजनीति पूरी तरह बुक ऑफ़ रिवेलेशन्स से प्रेरित थी.
मार्जान सत्रापी: लेकिन यह सिर्फ़ अमेरिका की समस्या नहीं है. पागल लोग किसी एक देश में नहीं रहते. वे हर जगह हैं. जॉर्ज बुश “Axis of Evil” की बात करते हैं. इसमें और मुल्लाओं के “महान शैतान” वाले भाषण में आखिर फ़र्क़ ही क्या है?
एक कहता है, “क़ुरान पढ़ो.”
दूसरा कहता है, “बाइबिल पढ़ो.”
मुल्ला कहता है कि वह ईश्वर का सबसे बड़ा मित्र है. जॉर्ज बुश भी लगभग यही दावा करते हैं. समस्या यह है कि न किसी ने ईश्वर को देखा है, न उनसे बातचीत की है. फिर कोई कैसे तय कर सकता है कि ईश्वर ने क्या कहा?
हाँ, मुल्ला एक धार्मिक व्यक्ति है. उससे ऐसी बातें सुनना शायद असामान्य नहीं है. लेकिन बुश दुनिया के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के राष्ट्रपति थे. वहाँ से ऐसी बातें आना सामान्य नहीं है.
जोशुआ बेयरमैन: मध्य-पूर्व में बुश प्रशासन की प्रलयवादी ईसाई सोच के राजनीतिक परिणाम भी दिखाई देते हैं. अमेरिका में ऐसे लोग हैं जो इराक, ईरान, इज़राइल— हर जगह अस्थिरता चाहते हैं, क्योंकि वे उसे अंतिम प्रलय से पहले आने वाले संकेतों के रूप में देखते हैं.
मार्जान सत्रापी: यह प्रलय वाली बात मैं कभी समझ नहीं पाई. लोग चाहते हैं कि दुनिया कल ही खत्म हो जाए. लेकिन क्यों? ज़िंदगी पहले ही बहुत छोटी है. एक दिन तो मरना ही है. फिर इतनी जल्दी किस बात की? दुनिया भर में धर्म का यह नया उभार मुझे सचमुच डराता है. क्या हम फिर से बूढ़ी औरतों को जादूगरनी कहकर जलाने लगेंगे?
दस-पंद्रह साल पहले अगर आप कहते कि आप ईश्वर में विश्वास नहीं करते, तो किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था. आज नास्तिक या अज्ञेयवादी होना भी किसी राजनीतिक बयान की तरह देखा जाता है. जब लोग मुझसे पूछते हैं कि मेरा धर्म क्या है, तो मैं कहती हूँ— मेरा कोई धर्म नहीं है. और कुछ लोग यह सुनकर हैरान रह जाते हैं. उन्हें समझ नहीं आता. मैं कहती हूँ, मुझे उसकी ज़रूरत नहीं है.
मैं इंसानियत का सम्मान करती हूँ. वही मेरा धर्म है. और सच कहूँ तो मुझे उन धर्मों से चिढ़ है जो किसी कारोबार की तरह चलाए जाते हैं. हर तरफ़ इतना पैसा घूम रहा है— लेकिन किसलिए? ताकि स्वर्ग में जाकर कोई शानदार मकान ख़रीदा जा सके? मुझे यह बात कभी समझ नहीं आती.
जोशुआ बेयरमैन: ईरान के नए राष्ट्रपति के बारे में आपका क्या विचार है?
मार्जान सत्रापी: वे दुनिया भर में बढ़ रही धार्मिक कट्टरता की उसी लहर का हिस्सा हैं. और जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का नेतृत्व जॉर्ज बुश जैसे व्यक्ति के हाथ में हो, तो फिर ईरान जैसी धर्मतांत्रिक तानाशाही से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? पूरा इलाका या तो सैनिकों के हाथ में है या मुल्लाओं के. ईरान में कट्टरता के पीछे गहरी सामाजिक समस्याएँ भी हैं. दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में होने के बावजूद वहाँ भयानक गरीबी है. ऐसे में मुल्ला आते हैं और लोगों से तरह-तरह के वादे करते हैं. फिर अपनी नाकामियों का दोष अमेरिका पर मढ़ देते हैं. उनके दो बड़े दुश्मन— सद्दाम और तालिबान— पहले ही हट चुके हैं. अब बस अमेरिका बचा है. इसलिए अमेरिका-विरोधी बयानबाज़ी और तेज़ होती जा रही है.
जोशुआ बेयरमैन: क्या आपको कभी ईरान के सुधारवादी आंदोलन से उम्मीद थी?
मार्जान सत्रापी: आजकल भला आशावादी कौन हो सकता है? ऐसा लगता है जैसे सबने अपना विवेक खो दिया है. कोई बातचीत ही नहीं करना चाहता. पूरी दुनिया जैसे कुछ काउबॉय लोगों के हाथ में चल रही है. जिस दिशा में चीज़ें जा रही हैं, उसे देखकर मेरे लिए आशावादी होना मुश्किल है. मैं सचमुच चिंतित हूँ. क्योंकि इतिहास हमें बताता है कि हालात बहुत तेज़ी से बिगड़ सकते हैं. ज़रा सोचिए, पहला विश्वयुद्ध कैसे शुरू हुआ था.
जोशुआ बेयरमैन: कमजोर नेतृत्व, गलतफ़हमियाँ और संचार की विफलताएँ.
मार्जान सत्रापी: और तब तो कम-से-कम राजनयिक मौजूद थे! आज बुश पचास साल की कूटनीतिक परंपरा को यूँ ही किनारे कर देते हैं. फिर बताइए, मैं आशावादी कैसे रहूँ?
जोशुआ बेयरमैन: लेकिन दूसरी तरफ़ आपकी किताबों की जड़ में तो आशा ही दिखाई देती है.
मार्जान सत्रापी: हाँ, थोड़ी-सी उम्मीद तो है ही. नहीं तो मैं अभी जाकर बंदूक उठा लूँ और सब खत्म कर दूँ. जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तब तक यह उम्मीद भी रहेगी कि शायद कोई चमत्कार हो जाए. मेरा दिमाग़ तो कोई रास्ता नहीं देखता, लेकिन जीने की जो सहज इच्छा है, वह अब भी उम्मीद करती है. वह कहती है—चलो, कोशिश करके देखते हैं. जिस दिन वह उम्मीद मुझमें नहीं रहेगी, मैं कसम खाकर कहती हूँ, मैं जीना नहीं चाहूँगी. मैं अपने पाठकों तक यही बात पहुँचाना चाहती हूँ. आत्महत्या वाली नहीं, उम्मीद वाली. मेरा भरोसा आखिरकार अच्छे लोगों पर है. बात इतनी-सी है. बुरे लोग सचमुच पागल होते हैं. पूरी तरह पागल. और समस्या यह है कि बहुत ज़्यादा पागल लोगों की ज़रूरत भी नहीं पड़ती. कुछ ही लोग पूरी दुनिया का सत्यानाश करने के लिए काफी होते हैं. उनकी ताकत वहीं से आती है. लेकिन मुझे लगता है कि अच्छे लोग उनसे कहीं ज़्यादा हैं.
जोशुआ बेयरमैन: यह तो काफ़ी आशावादी बात हुई. और अपने माध्यम के विस्तार को देखकर भी आपको खुशी होती होगी. लॉस एंजेलिस की Skylight Books जैसी किताबों की दुकानों में अब स्वतंत्र कॉमिक्स के लिए पूरी अलमारियाँ हैं. लोग अपनी कॉमिक्स लेकर आते हैं और बेचते हैं. यह दुनिया लगातार फैल रही है.
मार्जान सत्रापी: बिल्कुल. यह बहुत रोमांचक है. मैं अकेली कार्टूनिस्ट नहीं बने रहना चाहती. मैं चाहती हूँ कि और लोग आएँ. मैं एक पूरी नई पीढ़ी को सामने आते देखना चाहती हूँ. दुनिया में इतने लेखक हैं, इतने फ़िल्मकार हैं, इतने फ़ोटोग्राफ़र हैं. फिर अच्छे कॉमिक कलाकार और क्यों न हों?
जोशुआ बेयरमैन: मैंने सुना है कि आपने आर्ट स्पीगेलमैन से शर्त लगाई थी कि अमेरिकी चुनाव में जॉन केरी जीतेंगे.
मार्जान सत्रापी: (हँसते हुए) हाँ, और मैं हार गई. उस डिनर का बिल मुझे चुकाना पड़ा. मुसीबत यह थी कि मैंने सिर्फ़ आर्ट स्पीगेलमैन से ही शर्त नहीं लगाई थी. मैंने यही शर्त लगभग हज़ार लोगों से लगा रखी थी. तो मुझे बहुत सारे लोगों के डिनर का खर्च उठाना पड़ा.
जोशुआ बेयरमैन: इसका मतलब यह हुआ कि आप वाकई आशावादी हैं.
मार्जान सत्रापी: मैं हमेशा सबसे अच्छे नतीजे पर विश्वास करना चाहती हूँ. ठीक है, शायद आप सही कह रहे हैं. शायद मैं सचमुच आशावादी हूँ.
(अगस्त 2006, The Believer )
अनुराग अंकुर कविताएँ लिखते हैं. हिंदी साहित्य, लोक संस्कृति और सामाजिक विमर्श से जुड़े विषयों पर लेखन, अनुवाद एवं संपादन कार्य में सक्रिय हैं. वर्तमान में वे डॉ. बी. आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली के छात्र हैं. |




जो चीज़ें हमें जातीय या नस्ली संघर्ष लगती हैं, वे अक्सर आर्थिक संघर्ष होती हैं.
गहरी बातचीत है। हम तक पहुंचाने के लिए समालोचन और अनुराग जी का आभार।
बहुत अच्छा प्रयास, इस तरह की सामग्री समालोचन में ही संभव है। मैं भी मार्जान पर कुछ लिखने के बारे में सोच रहा था, लेकिन व्यस्तताओं के कारण संभव नहीं हुआ।
सरस और सुपाठ्य। पढ़ते हुए लगा नहीं कि अनूदित पाठ है। हार्दिक शुभकामनाएं।
मार्जान की दूसरी कृति एंब्रॉयडरी भी कमाल थी। यह साक्षात्कार समृद्ध करने वाला है। आभार अनुराग अंकुर, आभार समालोचन
बहुत सधा हुआ और पठनीय अनुवाद। अनुराग अंकुर को बधाई।
मार्जान के व्यक्तित्व को जान पाया। इतने सुंदर अनुवाद को उपलब्ध कराने के लिए शुक्रिया समालोचन और अनुराग अंकुर।
दुनिया में लेखन के इतर भी कितने माध्यम हैं। सतरापी ने न सिर्फ़ कॉमिक्स को लेकर अलग प्रयोग किए बल्कि उसे प्रतिरोध का माध्यम भी बनाया। इस सुंदर प्रस्तुति के लिए आभार। आगे भी ऐसे ही कामों की जरूरत है।