| भारत के प्रगतिशील पुरुषों के पतिपन की पड़ताल (Men At Home: Imagining Liberation in Colonial and Postcolonial India : Gyanendra Pandey) अमिता शीरीं |
इतिहास की असंख्य परतें होती हैं. आम तौर पर हमें केवल राजकीय इतिहास ही पढ़ाया/बताया जाता है. इन परतों में बहुत ढेर सारा इतिहास ऐसा होता है जो हमारी ज़िन्दगी में ही रचा-बसा होता है, लेकिन हम उन्हें ढूंढ ही नहीं पाते, क्योंकि आम तौर पर हमें ‘अपना’ इतिहास पढ़ने/लिखने/देखने की आदत ही नहीं होती. अकादमिक इतिहास में इतिहास की उपाश्रयी धारा (subaltern history) ने इन ढकी मुंदी परतों को उघाड़ने का काम एक हद तक किया है, लेकिन वह आम तौर पर आम लोगों की पहुँच से दूर ही होता है. ज़्यादातर अंग्रेज़ी में लिखा हुआ यह लेखन इस क़दर अकादमिक और अभिजात्य होता है कि पाठक पढ़ने से पहले दस बार सोचेगा. इसके अलावा ज़्यादातर विदेशी प्रकाशनों से छपी ये किताबें इतनी महंगी होती हैं, वह आम पाठक की पहुँच से दूर ही होती हैं.
फिर भी अपनी रुचि का विषय होने के कारण हाल ही में ज्ञानेंद्र पांडेय की 2025 में आई ऐसी ही एक किताब से रूबरू हुई.
Men At Home : Imagining Liberation in Colonial and Postcolonial India.

पहले ज्ञानेंद्र पांडेय का हिंदी में लिखा एक शोध लेख ‘हिन्दुस्तानी आदमी घर में’, सीएसडीएस की पत्रिका प्रतिमान में छपा था. इस लेख में उन्होंने हरिवंश राय बच्चन, राजेन्द्र प्रसाद और राहुल सांकृत्यायन के हवाले से भारत में घरेलू स्पेस में पुरुषों की उपस्थिति की पड़ताल की थी. ज्ञान पांडेय की उक्त पुस्तक इसी लेख का विस्तार है जिसमें उन्होंने भारत के अन्य हिस्सों के प्रचलित लोगों के जीवन और उनके लेखन को अपनी मुख्य स्रोत सामग्री बनाया है.
यह पुस्तक 2025 में ड्यूक यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित हुई. इस पुस्तक को तीन भागों में बाँटा गया है. इन भागों में कुल सात अध्याय हैं. इसके अलावा एक भूमिका (प्रेल्यूड) और एक उपसंहार (एपिलॉग) भी है.
स्रोत सामग्री
स्रोत सामग्री के बतौर ज्ञानेंद्र पांडेय ने राजनीति व साहित्य में चर्चित सवर्ण/दलित पुरुषों के साथ उनकी जीवन संगनियों की आत्मकथाओं, को मुख्य स्रोत बनाया है. कुछ दलित लेखक/लेखिकाओं के जीवनियों से भी प्रसंग उठाये हैं. उनकी किताब के इन चुने हुए चरित्रों का जीवन पूर्व औपनिवेशिक भारत और उत्तर औपनिवेशिक भारत के समाज में विस्तारित है. ये चरित्र हैं –
भीमराव अम्बेदकर (1891-1956) उनकी द्वितीय पत्नी सविता अम्बेदकर (1909-2003), हरिवंशराय बच्चन (1907-2003) व उनकी दूसरी पत्नी तेजी बच्चन (1914-2007), कौशल्या बैसंत्री (1926-2011), मोहनदास करमचंद गाँधी (1869-1948), नरेंद्र जाधव (1950-), बेबी काम्बले (1929-2012) मिर्ज़ा अख्तर (1909-1971), उनकी पत्नी खुर्शीद मिर्ज़ा (1918-89), वसंत मून (1932-2002), राजेंद्र प्रसाद (1884-1964), प्रेमचंद (1880-1936) व उनकी दूसरी पत्नी शिवरानी देवी, अख्तर हुसैन रायपुरी (1912-1992) व उनकी पत्नी हमीदा रायपुरी( 1920-2009), जगजीवन राम (1908-1986) व उनकी दूसरी पत्नी इंद्राणी जगजीवन राम (1911-2002), राहुल सांकृत्यायन (1893-1963) व उनकी तृतीय पत्नी कमला सांकृत्यायन (1920-2009), अमर सिंह (1878-1942), ओमप्रकाश वाल्मीकि (1950-2013).
किताब का आरम्भ करते हुए ज्ञान पांडेय कहते हैं कि
“यह पुस्तक दक्षिण एशियाई घरेलू दुनिया में पुरुषों के अस्तित्व और उस दुनिया में उनके विरोधाभासी विचार, जहाँ वे अपने और अपने प्रिय लोगों, बच्चों, परिवार, समाज और देश के लिए आज़ादी या मुक्ति की बात करते हैं, पर एक निबंध है”
(पृष्ठ 1).
निश्चित रूप से ज्ञानेंद्र पांडेय अपनी इस किताब में बेहद अकादमिक तौर पर उक्त लोगों के जीवन के प्रसंग उठा कर तथ्यों के साथ अपनी बात रखी है.
पूर्व और उत्तर औपनिवेशिक भारत में अवस्थित इस किताब में इतिहासकार ज्ञान पांडेय ने तथ्यों से यह स्थापित करने की कोशिश की है कि बेशक स्वतंत्रता के बाद परिवार की संरचना में उल्लेखनीय बदलाव आया है लेकिन इन स्वनामधन्य व्यक्तियों के अपने घर के भीतर व्यवहार आमतौर पर उन आदर्शों के विपरीत होता है, जिनकी वे अपने लिए और बाहरी दुनिया से अपेक्षा करते हैं.
अगर हम स्वतंत्रता आन्दोलन की बात करें तो किसी देश की स्वतंत्रता उसका अभीष्ट होता है. भारत में लड़े गए स्वतंत्रता संघर्ष का भी यही उद्देश्य था. लेकिन भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का औरतों की स्वतंत्रता से कोई लेना देना नहीं था. सिर्फ औरत ही नहीं, बल्कि मूलतः समाज के बहुसंख्यक लोगों के लिए जनवाद की बात इसके एजेंडे में कहीं नहीं थी. दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों के जनवादी अधिकार न तो इनके एजेंडे में थे, न ही उनको ‘आज़ादी’ देने की उनकी कोई मंशा थी. इन वर्गों ने जो भी आज़ादी हासिल की वह उनके अपने संघर्षों की ही देन है.
किताब का परिचय देते हुए ही वह कहते हैं कि यह किताब विश्व इतिहास के स्थापित विषय- किसी देश, राज्य और सांस्थानिक राजनीति का इतिहास नहीं बताती. इसको घर के भीतर सामान्य लोगों के सामान्य जीवन के रूप में ही देखा जाना चाहिए. इस किताब में ज्ञानेंद्र पांडेय दक्षिणी एशिया, ख़ास तौर पर भारत में घरेलू जीवन/कामों के प्रति पुरुषों की मानसिक बुनावट की पड़ताल करते हैं.
इसके लिए पहले अध्याय में वह दक्षिण एशिया के औपनिवेशिक और उत्तर औपनिवेशिक घरेलू जीवन की झलकियां पेश करते हैं. वह पाते हैं कि इस समूचे समय में जेंडर और जाति को लेकर भयानक भेदभाव मौजूद थे/हैं. रविन्द्र नाथ टैगोर की प्रसिद्ध पुस्तक ‘घरे बाईरे’ का हवाला देकर वह बताते हैं कि उदारवादी जमींदार पति अपनी पत्नी को परदे और घर से बाहर निकालने की पूरी कोशिश करता है लेकिन बिमला की नारी मुक्ति की अपनी अवधारणा है, और वह एक रोज़ खुद ही स्वदेशी सभा में शामिल हो जाती है.
दलित लेखिका बामा की एक कहानी का उद्धरण देते हुए लेखक बताते हैं कि 11 साल की मैक्कानी की माँ ने बहुत छोटी उम्र में भाग कर उसके पिता से शादी की थी. पिता ने बाद में उसे छोड़ कर दिया. माँ मजदूरी करके अपने बच्चों को पालती रही. पिता बच्चों का उत्तरदायित्व नहीं उठाता लेकिन उससे मिलने बीच बीच में आता. सातवीं बार गर्भवती होने पर उसने परिवार नियोजन का उपाय करने की बात सोची.
यानि उस वक्त का पुरुष वही करता जो उसके मन का होता. ‘आज़ादी’ का उसका विचार अपने लिए कुछ होता और अपने घर की औरतों और नौकर/नौकरानियों के लिए कुछ और होता.
घरेलू कामों के प्रति पुरुषों का दृष्टिकोण
लेखक कहते हैं कि ईश्वर इन अर्थों में इंसानों से महान है क्योंकि ईश्वर को खाना पकाने और घरेलू कामों की चिंता नहीं करनी होती. वह पूरी किताब में उद्धरणों से यह सिद्ध करते हैं घरेलू कामों के प्रति भारतीय पुरुष के मानस की गढ़न इस तरह की है कि वह प्रायः घर के कामों के प्रति उदासीन रहते हैं. महापंडित राहुल सांकृत्यायन अपनी 6 भाग की आत्मकथा में महज आधा पन्ना ‘नून तेल लकड़ी’ पर खर्च करते हैं, वह भी तब जब 1945-47 के बीच वह रूस में अपनी रूसी पत्नी के साथ रह रहे थे. आज के परिदृश्य में भी अधिकांशतः पुरुषों की मानसिक बुनावट इसी तरह की है कि वे प्रायः घरेलू कामों के प्रति उदासीन रहते हैं.
प्रेमचंद घरेलू काम में हाथ बंटाते थे, और बीमार रहने पर बच्चों की देखभाल कर लेते. अम्बेदकर भी कभी-कभी पूरा खाना बनाते और लोगों को खाने के लिए आमंत्रित करते. लेकिन बाकी समय ये लोग भी अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक दुनिया के कामों में मसरूफ़ रहते. हरिवंश राय बच्चन के लेखन के महान काम के लिए उनकी समर्थ पत्नी तेजी बच्चन ने अपना कैरियर छोड़ दिया और बच्चों की परवरिश में खुद को झोंक दिया. वहीं बच्चन जब अपने विश्वविद्यालय के अध्यापन और लेखन के काम से ऊब जाते तो सैन्य शिक्षा के लिए आवेदन कर देते. या उच्च शिक्षा के लिए बच्चों और पत्नी को छोड़ कर पीएचडी करने दो साल के लिए विदेश चले जाते.
मेहनतकश वर्ग में यह स्थिति थोड़ी भिन्न थी. इस वर्ग में ज़्यादातर दलित जाति से लोग होते हैं. कौशल्या बैसंत्री, बेबी काम्बले और ओमप्रकाश बाल्मीकि की जीवनी इसके लिए स्रोत सामग्री बनी है. इन परिवारों में पति-पत्नी दोनो को घर से बाहर मजदूरी करनी होती. लेकिन घर का काम मुख्यतः औरतों के जिम्मे होता. माँ की अनुपस्थिति में घर की बड़ी लड़की अपने छोटे भाई बहनों की ‘परवरिश’ करती है. पति काम से लौट कर अक्सर दारू पिए होता और औरत की पिटाई करता. अगले दिन दोनो फिर काम पर चले जाते. अभाव और घरेलू हिंसा उनके जीवन का सच है.
इस तरह वर्ग जो भी हो भारतीय पुरुष का दिमाग इस तरह गढ़ा होता है कि वह यह मान कर चलता है कि घरेलू काम उसका काम नहीं है. वह घर के बाहर काम करेगा और घर के भीतर के सारे काम औरतों के जिम्मे. बेशक महात्मा गाँधी अपने शौचालय को खुद साफ़ करते थे, लेकिन घर में खाना बनाने की पूरी ज़िम्मेदारी बा की थी. राजेंद्र प्रसाद की जीवनी का एक हवाला वह देते हैं कि जब चंपारण सत्याग्रह के लिए राजेंद्र प्रसाद गाँधी जी के साथ वहां पर मौजूद थे तो एक महराज खाना पकाता था. पर जब बा भी वहां आ गई तो गाँधी जी ने यह कह कर उस खाना बनाने वाले महराज को हटा दिया कि अब तो बा आ गई हैं तो खाना वही बनायेंगी. फिर तो बा बेहद प्रेम से 15-16 लोगों का खाना पका कर सबको खिलाती थीं.
मेरे हिसाब से ‘माँ’ का यह महिमामंडन औरतों को हमेशा छलता आया है. माँ त्याग की मूर्ति होती है और उसे ऐसा ही होना चाहिए. तमाम सारी आत्मकथाओं का अवलोकन करने से यही समझ में आता है कि औरतों की जगह घर के भीतर है, जबकि पुरुषों की जगह घर के बाहर है.
स्त्री पुरुष सम्बन्ध
भारत की बात करते हुए ज्ञान पांडेय कहते हैं कि भारत एक आधुनिक देश है मगर इसकी चेतना सामंती है. तमाम सारी आत्मकथाओं का विश्लेषण करते हुए वह यह पाते हैं कि भारतीय पुरुष का दृष्टिकोण औरतों के प्रति पर्याप्त रूप से सामंती है. न सिर्फ़ पुरुषों का बल्कि औरतों का रुख भी पर्याप्त सामंती है. हरेक वर्ग में गृहस्थाश्रम की चक्की हमेशा औरतों को ही पीसनी पड़ती है.
इन तमाम सारी आत्मकथाओं को आधार बनाते हुए ज्ञान पांडेय ने तफसील से इस बात की बारीकी से पड़ताल करने की कोशिश है कि वस्तुतः भारतीय समाज में आज़ादी के पहले और आजादी के बाद औरत-पुरुष के व्यक्तिगत रिश्ते कैसे थे. घरेलू कामों के प्रति पुरुषों की मानसिक बुनावट कैसी थी. ज़ाहिर है सभी वर्गों में स्त्री-पुरुष संबंधों में सामंती पितृसत्ता स्पष्ट झलकती थी. चाहे उच्च वर्ग व उच्च जाति के परिवार हों या निम्न वर्ग और दलित जाति के परिवार. स्त्री पुरुष संबंधों में पितृसत्तात्मक पुरुषीय श्रेष्ठता को स्थापित किया जाता है. न केवल पुरुष बल्कि औरतें भी इस बात को स्वीकार करती हैं कि पुरुष उनसे श्रेष्ठ हैं.
स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के आधार पर जांचे तो उस दौर के हिसाब से राजेंद्र प्रसाद, राहुल संकृत्यायन, प्रेमचंद आदि की शादी बहुत बचपन में हो गई थी. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी पत्नी का साथ जीवन भर साथ निभाया, लेकिन पहले पढ़ाई और फिर राजनीति और वकालत के चक्कर में वह हर समय घर से बाहर रहे. और अपनी पत्नी को कम समय दे पाए. उनकी पत्नी के रूप में उनकी किशोरी पत्नी के अकेलेपन का हम केवल अंदाज़ा ही लगा सकते हैं. अपनी आत्मकथा में वह कहते हैं कि 45 साल के वैवाहिक जीवन में वह बमुश्किल 45 महीने ही अपनी पत्नी के साथ रहे.
राहुल और प्रेमचंद दोनो ने अपनी पहली शादी को नकार दिया था. विद्रोही राहुल तो घर छोड़ कर चले गए थे. बाद में उन्होंने रूस में एक शादी की और ‘राष्ट्र’ की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उसे एक बेटा सौंप कर वापस भारत आये और फिर अपने से उम्र में कहीं छोटी कमला से शादी की. जिन्होंने पत्नी और सेक्रेटरी के रूप में उनकी जीवन भर सेवा की. प्रेमचंद ने भी अपनी पहली पत्नी को छोड़ दिया था. कहीं इस बात का ज़िक्र करते हुए प्रेमचंद उनके सुन्दर न होने की भी चर्चा करते हैं. हालाँकि बाद में उन्होंने एक बाल विधवा शिवरानी देवी से अपनी पसंद से शादी की.
मज़े की बात यह है कि राहुल और प्रेमचंद दोनों ने ही अपनी पत्नियों को अपनी पहली शादी के बारे में नहीं बताया. उन्हें इसके बारे में किसी तीसरे व्यक्ति से पता चला. कमला ने तो राहुल पर पत्राचार का सम्बन्ध भी तोड़ लेने की जिद की. जबकि शिवरानी देवी ने प्रेमचन्द से आग्रह किया कि वह उन्हें भी वापस लेकर आयें और वह साथ रहेंगे. लेकिन उसके पहले ही उनकी पहली पत्नी का देहांत हो गया.
बेशक बाल विवाह उन दिनों की कुरीति थी. लेकिन इसमें पत्नी की क्या गलती. पुरुषों के रूप में तो दोनों ही इतिहास के प्रसिद्ध व्यक्ति हो गए और उनकी पहली पत्नियाँ गुमनामी में विलोप हो गई.
वहीं जगजीवन राम की नैतिकता इन लोगों से अलग है. उनका विवाह भी बहुत छोटी उम्र में हो गया था. उनकी पहली पत्नी से कोई बच्चा नहीं हुआ. परिवार के तमाम दबाव के बावजूद उन्होंने अपनी पत्नी को त्यागने से इंकार कर दिया. बाद में उनकी मौत के बाद जगजीवन राम ने दूसरी शादी की.
दो मुस्लिम दंपत्ति का ज़िक्र इस किताब में हुआ है. इन दोनों में ही कई विवाह का उदाहरण नहीं मिलता. अकबर रायपुरी और हमीदा रायपुरी, अकबर मिर्ज़ा और खुर्शीद मिर्ज़ा दोनो ही परिवार उच्च मध्यवर्ग के खानदानी थे, जो विभाजन के बाद पकिस्तान चले गए थे. उन दोनों की पत्नियों ने ‘हमसफ़र’ (हमीदा रायपुरी), ‘गर्दे-राह’ (खुर्शीद अख्तर) नाम की आत्मकथाएं लिखी हैं. बेशक अपने-अपने शौहरों के साथ अपेक्षाकृत आरामदायक जीवन जीने के बाद भी ‘घर’ के सारे तनाव उनके हिस्से ही आये. विभाजन के बाद ‘घरों’ की शिफ्टिंग और अपने-अपने पतियों के मूड के हिसाब से खुद को और घर को ढालना ताउम्र जारी रहे. दोनो ही पत्नियां पर्याप्त बुद्धिजीवी थीं और अपने अपने क्षेत्र की जानकार थीं लेकिन उन्हें भी अपने-अपने हिस्से की पितृसत्ता झेलनी पड़ी. अपनी आत्मकथा में हमीदा लिखती हैं कि
‘मेरा अस्तित्व अर्थहीन था’.
किताब के पहले भाग ‘लीगेसीज़’ में दो अध्याय हैं. पहला ‘द इंडियन मॉडर्न’ जिसमें वह घरेलू स्पेस की पड़ताल करते हैं. इसके दूसरे अध्याय ‘होम्स आवर फ़ादर्स बिल्ट’ में ऐतिहासिक रूप से घरों की बनावट को देखते हैं जिसमें पुरुष तो घर के बाहरी और प्रमुख हिस्से (मर्दाना) में जगह पाता है, जबकि घर के अँधेरे कोने और अंदरूनी हिस्से (ज़नाना) औरतों के हिस्से आते हैं.
किताब के दूसरे भाग ‘प्रैक्टिसेज’ यानि व्यव्हार में ड्यूटी, डिसिप्लिन और डिग्निटी नाम के तीन अध्याय हैं. अपने पेशे के प्रति प्रतिबद्धता पुरुषों का कर्तव्य है और घर के देख रेख औरतों की ज़िम्मेदारी है. इसी सूत्र के आधार पर, राहुल, हरिवंश राय बच्चन और प्रेमचंद आदि अपने लेखन, नौकरी और देश के प्रति समर्पण को अंजाम देते रहे हैं जबकि उनकी जीवन संगीनियां उनके बच्चों और घर की परवरिश करती रहीं. हालाँकि प्रेमचंद की दूसरी पत्नी शिवरानी देवी एक अच्छी लेखिका थीं. आज उनकी किताब ‘प्रेमचंद घर में’ काफ़ी चर्चित है. ज्ञान भी अपनी किताब में कई जगह पर उन्हें उद्धरित करते हैं. शिवरानी देवी ने कुछ कहानियां भी लिखी हैं. लेकिन वह कभी भी प्रेमचंद की तरह प्रसिद्ध लेखिकाओं में नहीं शुमार होती. प्रेमचंद ने उन्हें अपनी कहानी छपाने से मन किया था.
पुस्तक के तीसरे भाग ‘हिस्ट्री इन अ विसेरल रजिस्टर’ में दो अध्याय हैं. छठे अध्याय ‘थिंग्स मेन टच्ड’ और ‘नेचर ऑफ़ मेन’. छठे अध्याय में वह बहुत शिद्दत से इस बात को उठाते हैं कि घर के भीतर पुरुष खाना छू सकते हैं खाने के लिए लेकिन उसे पकाने या उसे तैयार करने में उसकी कोई गति नहीं होती. वह घर के बिस्तर को छू सकता है सोने के लिए लेकिन उसे धोने या साफ़ सुथरा करने में उसकी कोई भूमिका नहीं होती. अंत में घर में औरत को छू सकता है लेकिन केवल उसके शरीर को छूने में उसकी रूचि होती है. एक सोचने वाली भावनात्मक व्यक्ति के रूप में नहीं.
पहले उल्लेख किया जा चुका है कि प्रेमचंद और आंबेडकर घरेलू काम में आकस्मिक हिस्सेदारी करते थे. लेकिन मुख्य काम में नियमित सहायक के तौर पर भी उनकी भूमिका नहीं होती थी. बच्चन तो घर के काम से हमेशा दूर रहे. सारा बोझ तेजी बच्चन ने अपने कन्धों पर उठा रखा था.
अंतिम अध्याय ‘पुरुषों की प्रकृति’ ज्ञान पांडेय का बहुत प्रिय अध्याय है. इस अध्याय में उन्होंने औरतों के बारे में पुरुषों के सोचने के तरीके पर चर्चा की है. पहला – औरतों की जिम्मेदारियों, झुकाव और प्रकृति के बारे में पुरुषों के विचार. वह घर को ही औरतों के क्षेत्र के रूप में देखते हैं. दूसरा – अपनी खुद की जिम्मेदारियों के बारे में पुरुषों की व्याख्या. वह है घर से बाहर की दुनिया. समूचा विश्व का इतिहास उनका क्षेत्र है. तीसरा पुरुषों के विचार के बारे में स्वयं औरतों के सोचने का ढंग. यहाँ पर वह बेबी काम्बले की नवरापना (पतिपन) की अवधारणा के बारे में विस्तार से बताते हैं. विभिन्न उदाहरण देते हुए वह यह बताने की कोशिश करते हैं कि भारत में यह नवरापन (पतिपन के लिए मराठी शब्द) बहुतायत में मिलता है. जिसके तहत वे खुद को पत्नी का उद्धारक, शिक्षक, निर्देशक, खुदा मानने लगता है. कई बार स्वयं औरतें भी इसको ही सही मानने लगती हैं.
अंत में, लेखक बहुत बारीक़ी से आत्मालोचना करता है. बेशक ‘घर’ को लेकर स्वयं इतिहासकार भी उसी स्टीरिओटाइप छवि से बंधा हुआ हुआ है. अमेरिका में रच बस चुका इतिहासकार जब अपनी दूसरी पत्नी के साथ साल में एक बार ‘अपने घर’ में समय बिताने भारत आता है और उसकी पत्नी पूछती है कि ‘क्या तुम वहां के अपने घर को मिस कर रहे हो?’, वह जवाब देता है कि ‘नहीं जब तुम और बच्चे यहीं हो तो घर को कैसे मिस करूंगा’. उनकी पत्नी का जवाब है – ‘लेकिन मैं मिस करती हूँ.’ लेकिन लेखक घरेलू स्पेस में घरेलू कामों में कितना और कैसे शामिल होता है, इसका हवाला नहीं देता. शायद उनके जीवन में ये मुद्दा ही न हो.
इस किताब की एक और रोचक बात है – कि हरेक अध्याय के बाद एक पन्ना कोरा छोड़ दिया गया है और उस पर लिखा
‘इस पन्ने को इरादतन कोरा छोड़ दिया गया है’.
संभवतः यह उनके लिए है जब औरतें खुद अपना इतिहास लिखेंगी, या जब इन पन्नों को औरतों/वंचितों के इतिहास से भरा जाएगा.
निश्चित रूप से, जिन लोगों को हम बेहद चाव से पढ़ते/ देखते आये हैं, उनका रूप घर में कैसा था, यह जानना बेहद उत्सुकता जगाता है. समूची किताब में लेखक ने अकादमिक अनुशासन का बेहद खूबसूरती से पालन किया है. लेकिन एक ‘घर’ का औरतों के लिए क्या मतलब होता है, इस विषय में पितृसत्ता की विस्तार से चर्चा किये बगैर पूरा ही नहीं हो सकता है. पूरी किताब में पितृसत्ता शब्द का प्रयोग ही मुश्किल से दो चार बार ही हुआ है. जबकि सच यह है कि पितृसत्ता के विचार को गहराई से समझे बिना हम स्त्री-पुरुष सम्बन्ध को समझ ही नहीं सकते. लेकिन दिक्कत यह है इतिहास के सबाल्टर्न इतिहास कहने वाले बहुत सोचे-समझे तरीके से पितृसत्ता को विमर्श का मुख्य मुद्दा नहीं बनाते. क्योंकि जब हम पितृसत्ता की बात करेंगे तो हमें वर्ग की बात करनी होगी. क्योंकि ऐतिहासिक रूप से पितृसत्ता का उदय वर्ग के साथ ही हुआ था. जब आप इस रूप में पितृसत्ता की बात करेंगे तो आपको इतिहास में अपनी पक्षधरता उजागर करनी होगी.
जिन बातों को ज्ञानेंद्र पांडेय कुछ आत्मकथाओं के द्वारा सामान्यीकृत करते हैं, वह आज हमारे समाज में बहुत आम फहम बाते हैं. पितृसत्ता की राजनीति समझने के साथ हम इन सब को आसानी से समझ लेते हैं.
इसके अलावा बेहद करीने से लिखी गई यह किताब अपनी भाषा में भी बहुत परिष्कृत है. लेकिन हमें यह समझना होगा, इतिहास के आम लोगों के जीवन के परतों का इतिहास लोगों के सामने रखने के लिए यह किताब निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है. लेकिन यह आम लोगों की पहुँच से कोसों दूर है. आम लोग इसे छू भी नहीं सकते, क्योंकि इस किताब के पेपर बैक का मूल्य 2696/ रुपये मात्र है और हार्ड कवर की कीमत तो 10000/ से अधिक है.
इसलिए अगर हम सचमुच आम जन के इतिहास की बात करते हैं तो इसे जनता की भाषा में जनसुलभ होना चाहिए. फिर भी दक्षिण एशिया में मर्दानगी और ‘नवरापन’ के इतिहास की जब भी बात की जायेगी यह किताब एक स्रोत सामग्री के रूप में याद की जायेगी. लेकिन इस नवरापन की अकादमिक व्याख्या के लिए अभी और भी आयामों से पड़ताल करनी होगी.
किताब वाया किताब
इसी किताब में प्रेमचंद के घरेलू व्यवहार को समझने के लिए जिस किताब का ज़िक्र हुआ, वह है शिवरानी देवी की – ‘प्रेमचंद: घर में’. प्रेमचंद को क़रीब से समझने के लिए इस किताब को पढ़ा. इस किताब को पढ़ने के बाद प्रेमचंद की जो तस्वीर उभरती है उससे उनके प्रति आदर कई गुना बढ़ गया. बेशक हरेक व्यक्ति अपने युग और परिवेश की पैदाइश होता है. लेकिन प्रेमचंद का स्त्रियों के प्रति जो रुख़ था, वह आज के तमाम नामचीन लेखकों में भी देखने को नहीं मिलता.
ज्ञान पांडेय ने हालांकि प्रेमचंद के घरेलू कामकाज करने का ज़िक्र तो किया है लेकिन बहुत सेलेक्टिव्ली वह उनके उस रूप पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं जिसमें उनकी नकारात्मक छवि ही उभरती है. इतिहासकार के पास यह सुविधा होती है कि अपनी दिमागी परिकल्पना को आकार देने के लिए वह किन तथ्यों को उठाता है.
कुल मिला कर ज्ञानेंद्र पांडेय की यह किताब अपनी बात कहने के लिए तमाम सारे अकादमिक टूल्स का उपयोग करने के बावजूद इस बात की पड़ताल नहीं कर सकी कि आज़ादी के पहले और आजादी के बाद नामचीन पुरुष घरेलू कामों के प्रति इतने उदासीन क्यों रह गए. वे कौन से सामजिक-राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक आधार होते हैं जिनके दम पर किसी मुल्क किसी समाज की मानसिक गढ़न तैयार होती है?
| अमिता शीरीं लेखक, अनुवादक, शिक्षक, राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता.शिक्षा- पीएच.डी. (इतिहास इलाहाबाद विश्वविद्यालय) जेल डायरी ‘सलाखों के पार’ और अनुवाद की 5 किताब, कविता संग्रह – ‘एक काली कविता’ प्रकाशित. amitasheereen@gmail.com |




पढ़ा । समझ में आ सके अत:विस्तार से लिखा है । अमूमन पितृ-सत्ता का प्रभुत्व है । पास-पड़ोस के घरों से पता चलता है । हमारे पड़ोसियों में दो परिवारों की एक-एक पत्नी पब्लिक स्कूल में टीचर है । एक परिवार का पुरुष कुछ मात्रा में घर के काम में सहयोग करता है । क्योंकि उसकी माँ गुज़र चुकी । दूसरे परिवार में तीन भाई और उनके माता-पिता जीवित हैं । दो पुत्रवधू और एक माँ मिलकर घरेलू काम करती हैं ।
लेखक से सहमत हूँ कि पुरुष कमाने जाते हैं और पत्नियाँ और बूढ़ी माँ भी घर के काम में सहयोग देती हैं ।
आलेख के आखिरी हिस्से में लेखिका ने इस पूरी किताब को ही संदिग्ध बना दिया। अगर ज्ञान पांडेय प्रेमचंद्र के सम्बंध में सेलेक्टिवली ऐसे हिस्से चुनते हैं जिनसे प्रेमचंद की नकारात्मक छवि बने तो ऐसा ही वह दूसरे लेखकों के साथ क्यों नहीं कर सकते!
अमिता जी ने बहुत सटीक ढंग से इस किताब पर लिखा है। लेख के तीन चौथाई हिस्से तक यही विचार आते रहे कि जिस शब्द और अवधारणा से इस सारे आचरण की व्याख्या हो सकती है। जिस धागे को पकड़ लेने से ये सारी बनावट उधड़ सकती है, वह इतने निर्दोष तरीके से गायब क्यों है? मगर अंत में आलेख में वह अच्छे से हाथ आता है और पुस्तक लेखक के इस सेलेक्टिव नजरिए के पीछे जो ’पुरुषपन’ या ( सवर्ण पुरूषपन) अदृश्य रूप से काम कर रहा होगा, इसे बखूबी उजागर करता है। हालांकि यही बात पुस्तक पढ़ने के बाद ज्यादा अच्छे से समझ आएगी। अभी तो आलेख के पाठ को ही आधार बना कर अनुमान है कि लेखक इस आचरण और प्रिविलेज के बनने बिगड़ने और उन्हें बदलने के मूल कारणों और तरीकों का रुख नहीं करता। और अगर ऐसा है , लगातार ही ऐसा रहा आया है तो यह काम किनका कार्यभार है और कौन इससे निरपेक्ष रहेंगे, समझा ही जा सकता है।
जरूरी सवाल को उठाता एक जरूरी आलेख। यह सच है कि स्त्रियां घर और बाहर दोनों जगह पर काम कर रही है और पूरी जिम्मेदारी के साथ कर रही हैं मैं ऐसे बहुत से परिवारों को जानता हूं जहां अगर स्त्री काम करना बंद कर दे तो उसे परिवार के लोग भूखे मर जाए मर्दों के बीच यह अजीब तरह का सच है कि अगर खाना बनाना है तो वह औरत ही बनाएगी मर्द इसे सीखना भी नहीं चाहते इसलिए भी उन्हें सीखना चाहिए कि वह कभी भूख से तड़पकर न मर जाए मगर मर्द ऐसा नहीं करते उनका सारा गुरुर इस बात में है कि वह औरतों वाले काम नहीं करते मैं आज तक नहीं समझ पाया कि यह औरतों वाला काम क्या होता है परिवार से समझना क्यों नहीं चाहता की काम सिर्फ काम होता है औरतों वाला काम या मर्द वाला काम नहीं होता जब कुदरत ने ही और तू वाला काम और मर्दों वाला काम में बटवारा नहीं किया और उन्होंने बच्चे पैदा करने की जिम्मेदारी भी दोनों को दी तो यह आदमी के दिमाग की खुराफात ही है कि वह बंटवारे की लाइन खींच रहा है आपका यह आलेख बहुत से सवाल उठता है और मुझे लगता है कि इस पर पूरी ईमानदारी के साथ विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।
यह लेख, जिसे समीक्षा भी कह सकते हैं, बहुत ही महत्वपूर्ण और दिलचस्प भी है। सच है कि बहुत से ऐसे विचारोत्तेजक पुस्तकों तक आम जन की पहुंच दो कारणों से सीमित होती है। एक, इनको पढ़ने और समझने के लिए जिस बौद्धिक भाषा ज्ञान की ज़रूरत होती है, उसके लिए मेहनत और शिक्षा दोनों का अभाव होता है। दो, यह बहुत महंगी किताबें होती हैं और पुस्तकालय ऐसे कितने किताबों पर धन खर्च करते हैं और उन पुस्तकालयों तक कितनों की पहुंच है यह भी काबिले गौर है।
फिर भी इस लेख से विद्वतापूर्ण किताब का दोनों तरह का अनुवाद प्राप्त हुआ, इसकी सरल भाषा में प्रस्तुति और इसका सारांश मिला। निश्चित रूप से किताब में और भी बहुत कुछ होगा ही पर अमिता शीरीं का शुक्रिया कि उन्होंने यह लेख लिखा।
मुझे उनकी यह स्थापना बेहद प्रासंगिक लगी कि पितृसत्ता की पड़ताल के लिए वर्ग विभाजन को समझना बेहद ज़रूरी है। इसे तो आज के प्रचलित नारी विमर्श में भुला ही दिया गया है। आज के अनेक प्रसिद्ध साहित्यकारों तक की बहु प्रशंसित रचनाओं तक में पितृसत्ता की बारीक पड़ताल नदारद ही रहती है, उसके सरलीकृत रूप से ही वाहवाही बटोरने का चलन सा दिखाई देता है।
यह भी काबिले तारीफ है कि अमिता सभी किरदारों के उनके समय के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आकलन की आवश्यकता पर ज़ोर देती हैं। आज के मूल्यों के प्रकाश में अतीत को जांचना अनुचित भी होता है और भ्रमित करके चरित्र हनन का ख़तरा भी पैदा करता है।
अमिता शीरीं की एक बात से असहमति प्रकट करना चाहती हूं। इतिहासकार को यह छूट नहीं होती कि वे अपनी स्थापनाओं के पक्ष में चुनिंदा तथ्य इस्तेमाल करें। यह आरोप पत्रकारों पर अधिक लगता है। इतिहासकार का काम अपने चुने हुए विषय पर उपलब्ध सारी सामग्री का अवलोकन करना होता है, चाहे वह उसकी विचारधारा के पक्ष में हो या नहीं।
इसमें अगर ज्योतिबा और सावित्री बाई पर कोई सामग्री होती तो एक ही समय पर तरह तरह की विचारधाराओं और आचरण की संभावना और वैविधता पर भी रोशनी पड़ती। शायद किताब में उनपर कोई सामग्री नहीं है।
अमिता शीरीं को बधाई।
सार्वजनिक या सृजनामक जीवन में योगदान करने वाले लोगों के जीवन को रखने का यह प्रयास दिलचस्प तो है लेकिन इसमें एक चैन की सुविधा और संदिग्धता भी झलकती है। इसमें कोई शक नहीं कि अपेक्षा यह रहती है कि हर व्यक्ति हर मोर्चे पर 100 नंबर लिए रहता रहे जो एक आदर्श हो सकता है लेकिन संभव नहीं। रचनात्मकता को उसके पैमाने पर परखें या निजी आचरण से? यह प्रश्न अक्सर उछलता है। अमिता जी अलबत्ता एक विशिष्ट किताब की बारीक पक्षों की बढ़िया विवेचना प्रस्तुत की है।
ज्ञानेंद्र पांडे की पुस्तक men at home पर अमिता शीरी की समीक्षा पुस्तक के बहाने भारतीय परिवारों में पति पत्नी संबंधों पर नए सिरे से विचार करती है । हिंदी में इस तरह की पुस्तकों का अभाव है और अंग्रेजी की यह पुस्तक आम पाठक की सीमा से बाहर है ।
पिछले दशकों में पितृसत्ता और सामंतवाद और सामंती मानसिकता पर शोध हुए हैं, जो मनोवैज्ञानिक कम समाजशास्त्रीय अधिक हैं । भारतीय परिवारों की मानसिकता, जिसमें एक लड़की बड़ी होती है, उसे समझे बिना कोई भी विचार एकांगी ही होगा । यह शुभ संकेत है कि नई पीढ़ी जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी कर रही है और अपने सहयोगी या अपनी सहयोगी से विवाह कर रही है, उसमें स्त्री पुरुष संबंध और उनके माता पिता के स्त्री संबंधों में अंतर है । कोरोना काल की भयावह स्थिति में भी दोनों के संबंध सहज और मानवीय हुए थे, लेकिन उसका हल्ला अधिक था, वास्तविकता कम । इसलिए वे संबंध korona के बाद उस तरह के नहीं रहे, जैसा कहा गया था ।
भारतीय संदर्भ में स्त्री पुरुष संबंधों और पारिवारिक जीवन स्थितियों पर नए सिरे से विचार करने के लिए यह पुस्तक प्रेरित करती है ।
सबाल्टर्न इतिहास ने अतीत के ओझल और विस्मृत किन्तु अहम क्षेत्रों को उजागर किया है। साथ ही तथ्यों को प्रस्तुत करने और विश्लेषित करने की गैर- पारम्परिक शैली अपनायी है। निश्चय ही हर पद्धति की तरह उसकी सीमाएँ हैं। अमिता जी की इस समीक्षा से ये दोनों बातें उभर कर आती हैं। उन्होंने बड़े खुलेपन से किताब की अन्तर्वस्तु और एप्रोच को हमारे सामने रख दिया है। जब ऐसी किताबें दुर्लभ हों तो इस तरह की समीक्षाओं की अहमियत बढ जाती है। समालोचन उन्हें इस तरह पब्लिक स्फियर में ला रहा है।