लाल्टू की नई कविताएँ
कवि-कर्म की जटिलता समय-सापेक्ष तो है ही. उसकी एक बड़ी दिक्कत भाषा भी है, जो बरतते-बरतते पारदर्शी हो जाती है....
Read moreDetailsकवि-कर्म की जटिलता समय-सापेक्ष तो है ही. उसकी एक बड़ी दिक्कत भाषा भी है, जो बरतते-बरतते पारदर्शी हो जाती है....
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प्रमाण दिखाने और ख़ुद को साबित करने की इस महामारी में न जाने कितने लोग पिस रहे हैं. आधार कार्ड,...
अपने इस आलेख में अजय कुमार यादव इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भक्ति आन्दोलन की निर्गुण धारा के क्रांतिकारी...
वरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन जिस विषय पर भी लिखते हैं, उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हुए उसकी जड़ों तक पहुँच जाते...
कवि-कर्म की जटिलता समय-सापेक्ष तो है ही. उसकी एक बड़ी दिक्कत भाषा भी है, जो बरतते-बरतते पारदर्शी हो जाती है....
प्रमाण दिखाने और ख़ुद को साबित करने की इस महामारी में न जाने कितने लोग पिस रहे हैं. आधार कार्ड,...
अपने इस आलेख में अजय कुमार यादव इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भक्ति आन्दोलन की निर्गुण धारा के क्रांतिकारी...
वरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन जिस विषय पर भी लिखते हैं, उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हुए उसकी जड़ों तक पहुँच जाते...
कवि-कर्म की जटिलता समय-सापेक्ष तो है ही. उसकी एक बड़ी दिक्कत भाषा भी है, जो बरतते-बरतते पारदर्शी हो जाती है....
Read moreDetailsप्रमाण दिखाने और ख़ुद को साबित करने की इस महामारी में न जाने कितने लोग पिस रहे हैं. आधार कार्ड,...
Read moreDetailsअपने इस आलेख में अजय कुमार यादव इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भक्ति आन्दोलन की निर्गुण धारा के क्रांतिकारी...
Read moreDetailsवरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन जिस विषय पर भी लिखते हैं, उसे व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हुए उसकी जड़ों तक पहुँच जाते...
Read moreDetailsकवि-कर्म की जटिलता समय-सापेक्ष तो है ही. उसकी एक बड़ी दिक्कत भाषा भी है, जो बरतते-बरतते पारदर्शी हो जाती है....
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समुद्र की अथाह गहराइयों से होते हुए जीवन धरती के समतल पर पसरता चला गया. लाखों वर्षों के परिवर्तनों के...
गरिमा श्रीवास्तव पिछले कई दशकों से तैयारी, तल्लीनता और तसल्ली के साथ लेखन, आलोचना तथा संचयन-संपादन का कार्य कर रही...
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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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