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Home » एकेश्‍वर का राज्‍य : कुमार अम्‍बुज

एकेश्‍वर का राज्‍य : कुमार अम्‍बुज

by arun dev
August 3, 2026
in कविता
Reading Time: 3 mins read
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एकेश्‍वर का राज्‍य : कुमार अम्‍बुज
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कुमार अम्‍बुज की कविताएँ

 

 

1.
एकेश्‍वर का राज्‍य

यह एकेश्‍वर की रोटी है जिसे सब खाते हैं
ये एकेश्‍वर के बोरवेल हैं जिनका पानी सब पीते हैं
यह हवा सबकी लेकिन इसमें प्राणवायु एकेश्‍वर की है
ये एकेश्‍वर की बस्तियाँ एकेश्‍वर के घर जिनमें सब रहते हैं

यह उदधि, यह पर्वत, ये द्वीप, ये बचे-खुचे वनप्रांतर
ये अबला नदियाँ, ये अभ्‍यारण्‍य तमाम एकेश्‍वर के हैं
गोल्‍फ़ के मैदान, ये क्‍लब, ये सभागार, ये मॉल
पेट्रोल पंप, ये शराबख़ाने, ये गोदाम, ये जुआघर
ये बाग़ान, डेयरी, ये शो-रूम, ये ज्‍वेलर
ये बोन्‍ड, ये फंड, ये शेयर, ये सट्टा बाज़ार
ये हथियार एकेश्‍वर के हैं

ये विश्‍वविद्यालय, रेलवे स्‍टेशन, एअरपोर्ट, बस अड्डे
ये बैंक, अस्‍पताल, घंटाघर, ये धर्मस्‍थल एकेश्‍वर के हैं
यह तेल, गैस, खनिज, कारख़ाने, ये अट्टालिकाएँ
ये क्रूज़, ये स्‍टेडियम, ये तार-बेतार, ये दफ़्तर
सब एकेश्‍वर के हैं

जहाँ भी तुम क़दम रखते हो वह जगह एकेश्‍वर की है
जल थल नभ में जो गोचर हैं या अगोचर एकेश्‍वर के हैं
जिन्‍हें तुम अपना मानकर मिलते हो वे एकेश्‍वर के हैं
जिस रोशनी में बनती है तुम्‍हारी परछाईं
वह रोशनी कृत्रिम है एकेश्‍वर की है

ये अधिकारी, ये वर्दीधारी, ये कर्णधार
ये एजेंसियाँ, समितियाँ, टीवी चैनल, ये प्रस्‍तोता
ये अख़बार, ये हथियार, ये चकलाघर एकेश्‍वर के हैं
ये मनोरंजक नायक-उद्धारक-खिलाड़ी-पत्रकार-कवि-कलाकार
जो अपनी मस्‍ती में मदमस्‍त खिलखिला रहे हैं लगातार
ये अवतार, ये साकार, ये निराकार, ये नानाप्रकार एकेश्‍वर के हैं

और जो बचे-खुचे हैं
जो कर रहे हैं विलाप या लहरा रहे हैं मुट्ठियाँ
और हम सोचते हैं वे शायद एकेश्‍वर के नहीं हैं
एक दिन पता चलता है उनमें भी अनेक एकेश्‍वर के हैं
यह लाठी, यह बंदूक, अश्रुगोलों की बारिश एकेश्‍वर की है
और जहाँ उन्‍हें ले जा रहे हैं वे कारागार एकेश्‍वर के हैं

जैसे इस सब के लिए ही हम
हर एक सुविधा और असुविधा की
हर एक गौरव की, ग्‍लानि और दुख की
आँसुओं की और अपने ज़ख्‍मों की ई.एम.आई.
एकेश्‍वर को देते हैं.

 

painting-Sajal Sarkar

2.
गोली और चुंबन

आपको गोली कहीं भी मारी जा सकती है.
शरीर के किसी भी हिस्से में.

अँधेरे में. उजाले में. गोधूलि में.
घर के भीतर. घर के बाहर.
देहरी पर.

न्यायालय में. प्रेस क्लब में. सरकारी परिसर में.
कार्पोरेट के ऑफिस में. बस में. ट्रेन में.
हवाई अड्डे पर.

मेले में. दूतावास में. कॉकपिट में.
आवारगी में. अभिरक्षा में. मंच पर. झाँकी में.
सपने में. संसद के सामने.
यथार्थ में.

गोली किसी भी वक़्त
कहीं भी, किसी को भी मारी जा सकती है.
मज़ाक़ में. सरकारी नल पर. सामूहिक विवाह में.
या बिना बात.

सेमिनार में. प्रवचनों में. आंदोलन में. हड़ताल में.
जुलूस में. अकेले में. दुकेले में. या सरेआम.
छत पर. बरामदे में. गली में.
सिनेमा हॉल में.

खेतों में, खलिहान में, मवेशियों के बाड़े में.
बारिश में. ठिठुरते जाड़ों में. तपती दुपहरी में.
रेगिस्‍तान में. पहाड़ों पर. समुद्र के किनारे.
सुदूर रिसोर्ट में.

स्‍काईक्रेपर की छाँव में. झोंपड़ पट्टी में.
अकादमी के सभागार में. कला-भवन में.
या बॉर में. किसी समाचार में.
पैदल चलते हुए. दुपहिया पर. कार में.
या कार से उतारकर सड़क किनारे. नहर में.
पार्क में. उदासी में. मातम में. बुख़ार में.
पतझर में. बसंत बहार में.

गोली कहीं भी किसी भी समय मारी जा सकती है
पपीता खरीदते हुए. कीमोथेरेपी कराते हुए.
अस्‍पताल में. स्‍कूल में. धर्मस्‍थल में.
जेल में. अनुलोम-विलोम में.
खदान में. खुले मैदान में.
तलघर के अंधकार में.

त्‍योहार के दिन. या शवयात्रा में.
पर्यटन स्‍थल पर. रेस्‍तराँ में.
जलसाघर में. तरणताल में.
छाती पर रखे संविधान को भी भेदकर
मारी जा सकती है गोली.

ये काग़ज़ भर जाएँगे तमाम.
मोटी मोटी किताबें बन जाएँगी अनेक.
कम पड़ जाएँगे पुस्‍तकालय. इतने तरीक़े हैं.
इतनी क्रूरता है. इतनी नृशंसता. सत्‍ता की इतनी लालसा.
इतने दृश्‍य हैं. इतने प्रसंग. और यह सब इतना रोज़मर्रा है
इतना ज़्यादा है, इतनी स्‍मृतियाँ हैं, इतनी जगहें कि इस बाबत
दशमलव शून्‍य शून्‍य शून्‍य एक प्रतिशत भी लिख पाना नामुमकिन
इस वक़्त में तो और भी नामुमकिन. यह कविता जो दरअसल
मैं लिखना चाहता था चुंबनों के बारे में.

धोखादेह तसल्‍ली के लिए फिलहाल
जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं गोली की जगह चुंबन रखकर.

 

 

 

3.
ऊब की दुनिया

हर कोई हद दर्जे तक ऊब गया है
बिना किसी काम के इस नाशुक्रे काम से
दिन से, रात से, ख़ुशियों के झंझावात से

यह कोहरा ऊब के रंग का है
ये ऊब के बादल हैं जिनसे हो रही है बारिश

लिखने की ऊब पढ़ने में आ गई है
जैसे पढ़ने की लिखने में
संगीत की ऊब फैल गई है चित्रकला तक
रंगशाला की सबसे पीछे बैठे दर्शक तक

सरकारी ऊब का हाल पहले से ही बुरा था
अब सब तरफ़ मुख्‍य कार्यकारी अधिकारियों की
ऊब ने कर लिया है क़ब्‍ज़ा
मानो कोई अनश्‍वर अतिक्रमण
ऊबे हुए लोग भी ऊबकर कहते हैं-
अब ऊब का भी हो गया है निजीकरण

कोई जगह कहीं ऐसी दिखती नहीं
जो हो ऊब से खाली

खाली जगहों पर बन चुके हैं ऊब के मकान
ऊब की बालकनी में ऊब की रस्‍सी पर सूखते हैं
ऊब की उमस से भीगे कपड़े
खिड़कियों में दिखाई देते हैं ऊब के परदे
या फिर ऊब से ऊबे चेहरे
जो झाँककर देखते हैं बाहर की ऊब
सुनते हैं दरवाजों पर ऊब की खट-खट
गलियों में फेरीवाले लगाते हैं ऊब के फेरे

प्रेमियों के बीच प्रेम की जगह पसर गई है ऊब
संपन्‍नता की एक ऊब है जैसे विपन्‍नता की
मध्‍यवर्ग की ऊब बदल गई है ऊब के उत्‍सव में
साहित्‍य की साहित्‍योत्‍सव में कला की कला-उत्‍सव में
आखिर ऊब भरे संसार में
यही सब होना बाक़ी था

लोग ऊब चुके हैं ट्रैफिक के धुएँ से उड़ती धूल से
विघटनों उद्घाटनों की मालाओं से फूल से
आईटी और बैंकिंग सेक्‍टर से निफ्टी फिफ्टी से
दिन-रात काग़ज़ खोजने से हर साँस पर ओटीपी से
तरह-तरह के सम्‍मान से इनाम ओ इकराम से

आधार कार्ड में दिखते अलौकिक चेहरे से
झूठ को सच कहनेवाले सचमुच के भौंपू से
समाचार से, ज्ञान से, सेल्‍फ़ी से
और उसके संज्ञान से

इस विहंगम में केवल मक्खियाँ मज़े में हैं
जो जलेबियों से कतई नहीं ऊबी हैं
उड़ाये नहीं उड़ रही हैं

सीलन भरी दीवारों पर ऊब दिख रही है काई की तरह
और वह सूखी दीवारों पर दिखती है विद्रूप
जैसे उखड़े पलस्‍तर से बनी आकृतियाँ
ये रूपक उन दो आदमियों से काफी मिलते-जुलते हैं
जो हर काल में हर युग में हर सभ्‍यता को
नयी ऊब से भरते हैं और लगातार
ऊब की तरह झरते हैं.

 

painting-Sajal Sarkar

4.
सभी करदाता

जो घर में बैठा अख़बार पढ़ रहा है
या रसोई में दाल बघार रहा है, टैक्‍स दे रहा है
जो नल से पानी भर रहा है टैक्‍स देकर भर रहा है
जो पंखा सुधरवा रहा है, या ऑनलाइन कुछ मँगा रहा है
जो नमक खरीदने गया है या चाय पत्‍ती, टैक्‍स दे रहा है
जो एस्‍प्रिन या ईसबगोल खरीदकर लाया है
टैक्‍स देकर लाया है

जो पढ़ रहा है जो पढ़ा रहा है टैक्‍स दे रहा है
जो अस्‍पताल से अपने प्रिय को वापस लाया है
पाई पाई का टैक्‍स चुकाकर ला पाया है
जो टॉकीज में बैठा हँस रहा है टैक्‍स दे रहा है
जो आँसू बहा रहा है टैक्‍स देकर बहा रहा है

प्रत्‍येक निवेदन पर शिकायत पर टैक्‍स
अर्जिंयाँ सारी हो जाती है ख़ारिज
प्रतिवेदन चले जाते हैं रद्दी में
न जाने कहाँ बिला जाता है टैक्‍स
न प्रत्‍यक्ष दिखता है न अप्रत्‍यक्ष
जैसे नेकियाँ गिर जाती हैं नाले में

सड़कों पर वाहन दौड़ रहे हैं टैक्‍स देते हुए
आशा पर टैक्‍स निराशा पर टैक्‍स
जो बाज़ार में सबसे सस्‍ती सब्‍जी ख़रीदेगा
वह भी टैक्‍स देगा किसी न किसी चीज़ पर

जैसे ही आदमी चाय पियेगा या पानी
बिस्‍कुट खाएगा, भात खाएगा या बड़ा पाव
घर में लाएगा आलू प्‍याज दाल चावल आटा
कमीज़ खरीदेगा या फ़ोन करेगा दोस्‍त को
बिना टैक्‍स चुकाये कुछ कर नहीं सकता

किसी चीज़ की परछाईं को भी छुओगे
तत्‍काल जेब से कट जाएगा टैक्‍स
हर जगह बैठा है
एक अदृश्‍य जेबकतरा मुस्‍तैद

जो टैक्‍स चुरा रहे हैं जो नहीं दे रहे हैं टैक्‍स
वे इतने गिने-चुने अमीर हैं कि फ़कीर  हैं
या इस क़दर रहबर कि किसी भी टैक्‍स से परे हैं
इन अ-करदाताओं के अलावा जो भी सोचता है
कि वह टैक्‍स नहीं देता वह गाफ़ि‍ल है
या विक्षिप्‍त है

जो भी इस पुण्‍यभूमि पर जीवित है
टैक्‍स देकर जीवित है
और जो मर गया है टैक्‍स देकर मरा है.

 

 

5.
अधिसूचना

नियमानुसार आप आंदोलन नहीं कर सकते
सार्वजनिक जगहों पर अनशन नहीं कर सकते
संसद की तरफ़ देखकर शिकायत नहीं कर सकते
नारेबाजी नहीं, कोई रैली नहीं, नहीं दे सकते ज्ञापन
जादू टोना नाटक कविता पोस्‍टर जंतर मंतर नहीं कर सकते
मुआवजा नहीं माँग सकते दायर नहीं कर सकते कहीं याचिका
अल्पसंख्यक होकर बहुसंख्यकों के बीच नहीं रह सकते
और नियमानुसार आप आत्‍म-हत्‍या भी नहीं कर सकते
नियमानुसार केवल आपकी हत्‍या की जा सकती है.

 

 

painting-Sajal Sarkar

6.
पालनहारे

क्‍या हम बच्‍चों को इसलिए पालते हैं
कि एक दिन उन्हें गोली लग जाए
उन्हें लाठियों से मारा जाए
और वे अपनी पूर्णायु के सुख-दुख से नहीं
अचानक गुंडों से घिरकर मारे जाएँ

कि उन्‍हें पढ़ने-लिखने न दिया जाए
या बीच में ही कहीं छूट जाए उनकी पढ़ाई
पढ़ भी लें तो दूर-दूर तक रोज़गार न दे दिखाई
रेगिस्‍तान में चमकती मरीचिका की तरह भी नहीं

कि एक दिन वे प्‍यास से मर जाएँ और भूख से
अँधेरी रात में तारों भरे आकाश के नीचे
उगते डूबते चंद्रमा की ओस में कुचली हुई दूब में
या दिन के उजाले की सार्वजनिक धूप में
और उस अपराध के बोध से जो उन्होंने
कभी किया ही नहीं

कि वे अस्‍पताल भी न पहुँच पाएँ
जैसे-तैसे पहुँचें तो कहा जाए कि देर हो चुकी है
कि‍ इनका इलाज तो दरअसल
वहीं हो चुका था जहाँ से इन्हें लाया गया है
और उन्हें मारनेवाले कहें कि हम पालनहारे हैं

कि एक दिन हर चीज़ पर ख़ात्‍मा लगाकर
तय कर दिया जाए ये गोली से नहीं मरे
लाठी से नहीं और न किसी हथियार से
ये तो महज़ इसलिए मरे
कि इन्हें पाला गया ज्‍़यादा लाड़-प्‍यार से

क्‍या हम बच्‍चों को इसलिए पालते हैं
कि इस तरह उन्हें मार कर मुनादी कर दी जाए
सारी ग़लती चौराहों पर घूमते वधिकों की नहीं
कुछ ग़लती घर से बाहर पाँव रखनेवालों की भी होती है

और एक कीर्तन मंडली स्‍क्रीन पर बजाए शहनाई
दोहराने लगे अर्धाली, समरथ को नहीं दोष गुसाईं.

 

 

 

7.
विडंबना

अनेक ऐसे लोगों के नाम पर रख दिए गए हैं
पुलों, गलियों या रास्तों के नाम
जिन्होंने आबादियों के बीच कभी पुल नहीं बनाये
और न ही कोई पगडंडी या रास्ते
बल्कि जो थे उन्हें ख़त्‍म किए

तुम जिन्हें विस्मृत कर देना चाहते हो
वे रोज़ तुम्हें उनकी याद दिलाते हैं
हवा में उमस है धुआँ है और चिरायँध
चार क़दम भी चलना दूभर
साँस भर आती है
और आँख

इन पुलों इन रास्तों के नामों पर चलकर
कोई आदमी सही ठिकानों तक नहीं पहुँचता
अकसर ऐसी जगह पहुँचता है जो उसकी हो नहीं सकती
अपनी छूटी हुई जगहों की आस में भटकते रहते हैं लोग
शहर-दर-शहर हर तरफ़ से उठती हैं एक-सी आवाज़ें-
यहाँ से जाओ यह जगह तुम्हारी नहीं
नहीं है तुम्हारे लिए सुई की नोक के बराबर भी जगह

भाई के पास एक बार फिर नहीं है
अपने भाई के लिए कोई जगह

तुम अपनी गलियों मुहल्ले का नाम किसी को बताते हो
तो जैसे बताते हो अपने परिजन के क़ातिलों के नाम
तुम्हारे चेहरे पर उड़कर आती है मृतकों की राख
अपने देह की धूल अपने समय की ख़ाक
जिस राह से गुज़रो वहीं चमकते हैं
तुम्हारे ही रक्त के तसले में डूबे
अनेक चेहरे

अब तुम्‍हारे पास कोई सूचना, ख़त, चालान
या कोई वारंट आता है तो तुम देखते हो
तुम्‍हारे अस्‍थायी पते में भी दमक रहा है
तुम्‍हारे बच्‍चों के क़ातिल का नाम.

 

 

 

8.
प्रस्‍ताव

अगर एक भला चंगा आदमी अचानक मर जाए
थाने में न्‍यायालय कोषालय राजस्‍व विभाग में
आंदोलन में या राजकाज के भयानक गलियारों में
कार्पोरेटी दिनचर्या का कठिन जीवन जीते हुए
कारख़ाने में या कार्य संस्‍कृति के लाऊंज में
गुहार का घंटा बजाते हुए
असमय मारा जाए किसी दरबार में
तो इस तरह की मौतों के बारे में
लिखा जाए कि वे मारे गए प्राकृतिक आपदाओं में.

 

painting-Sajal Sarkar

9
कहीं भी कोई सरकार

यदि वह प्रजापालक नहीं है
तो क्‍या है फिर पुलिस और बंदूक़ों के अलावा
वसूली और जाँच अधिकारियों के सिवाय
किसी दिलजले वक्‍तव्‍य के अलावा

अगर वह वत्‍सल और फ़िक्रमंद नहीं है
तो क्‍या है वह किसी दुस्‍वप्‍न के सिवाय
दुरूह बीमारी और अंधविश्‍वास के अलावा

अगर वह हमारी मुसीबत में
आत्‍मीय की तरह नहीं है सिरहाने
जन के आँसू नहीं बहते हैं उसके गाल पर
तो फिर वह है ऐसी आफ़त
जैसे अपनी सेना को रौंदता हुआ ऐरावत

जब तुम सड़कों पर हो हलकान
और वह समझाने लगे तब
‍कि कितना सहनशील होना चाहिए लोगों को
हर सवाल पर कर दे मुक़दमा तो वह फिर क्‍या है
छाती पर टापें बरसाते अश्‍वारोही दस्ते के अलावा?

 

 

10.
श्रद्धांजलि

रात में एक तारे को टूटते हुए देखता हूँ और सोचता हूँ उन तारों के बारे में, जो द‍िन में टूटते हुए नहीं द‍िखते. उनके बिखरते अंतिम प्रकाश की लकीर तक नहीं. अनगिन ऐसे भी हैं जो टूट चुके हैं लेकिन यदि सभ्‍यताएँ बची रहीं तो हज़ारों प्रकाश वर्ष बाद, मेरी जगह कोई और उनका टूटना देखेगा.

किसी नदी, तालाब, पोखर, कुएँ या झील के सामने खड़ा होता हूँ तो लगता है कि ज़रूर ही कुछ लोग यहाँ दुर्घटना में डूब कर मरे होंगे. या दुख, निराशा या आकस्मिक अवसाद में अपने जीवन का अंत यहीं किया होगा. बचपन से देखी-सुनी, इस तरह की रोज़ाना की ख़बरों ने मनोमस्तिष्‍क में ऐसी जगह घेर ली है कि इनके समक्ष सबसे पहला यही दुर्भाग्‍यपूर्ण ख़याल आता है. और अभी जैसे, मैं विसर्जित अनाम लोगों को श्रद्धांजलि देने, अनायास यहाँ तक चला आया हूँ.

 

कुमार अम्‍बुज

लोकतांत्रिकता, स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न समाज के पक्षधर कुमार अम्बुज का जन्म 13 अप्रैल 1957 को जिला गुना, मध्य प्रदेश में हुआ. संप्रति वे भोपाल में रहते हैं.  किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण, अमीरी रेखा और उपशीर्षक उनके छह प्रकाशित कविता संग्रह है. ‘इच्छाएँ और ‘मज़ाक़’ दो कहानी संकलन हैं. ‘थलचर’ शीर्षक से सर्जनात्मक वैचारिक डायरी है और ‘मनुष्य का अवकाश’ श्रम और धर्म विषयक निबंध संग्रह. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, ‘कवि ने कहा’, ‘75 कविताएँ’ श्रृंखला में कविता संचयन है. उन्होंने गुजरात दंगों पर केंद्रित पुस्तक ‘क्या हमें चुप रहना चाहिए’ और ‘वसुधा’ के कवितांक सहित अनेक वैचारिक पुस्तिकाओं का संपादन किया है. विश्व सिनेमा से चयनित फिल्मों पर निबंधों की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य. कविता के लिए ‘भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार’, ‘माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार’, ‘श्रीकांत वर्मा पुरस्कार’, ‘गिरिजा कुमार माथुर सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, वागीश्वरी पुरस्कार तथा कुसुमाग्रज सम्मान से सम्मानित.
ई-मेल : kumarambujbpl@gmail.com
Tags: 20262026 कविताएकेश्‍वर का राज्‍यकुमार अम्बुजजेन ज़ी
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Comments 11

  1. अजेय कुमार says:
    1 week ago

    बहुत ही अच्छी कविताएँ। समसामयिक और विचारोत्तेजक

    Reply
  2. पवन करण says:
    1 week ago

    इस विहंगम में केवल मक्खियाँ मज़े में हैं
    जो जलेबियों से कतई नहीं ऊबी हैं
    उड़ाये नहीं उड़ रही हैं……हस्तक्षेपकारी कविताएं हैं। सामयिक।

    Reply
  3. Sadashiv Shrotriya says:
    1 week ago

    सचमुच बहुत अच्छी कविताएं। अपने समय की स्थितियों का एक संवेदनशील कवि द्वारा किया गया अत्यंत सशक्त चित्रण।

    Reply
  4. farid khan says:
    7 days ago

    इन कविताओं का ऐसा असर है कि कुछ देर बोलने बतियाने का मन नहीं करता. पालनहारे, विडंबना, श्रद्धांजलि आदि ख़ास कर.

    Reply
  5. Yogesh Dhyani says:
    7 days ago

    कुमार अम्बुज भारत की उस तस्वीर को बहुत अच्छे से पहचानते हैं जो इसके मध्य वर्ग और आम आदमी की दैनिक ज़रूरतों से बनती है। इन कविताओं का प्रवाह जीवन की तरह है। इन कविताओं के विषय बिल्कुल हमारे आस-पास और जान पहचान के हैं। ये कविता हम सबका बयान हैं। ये कविताएं कि सी फूल की तरह हवा में स्पष्ट खिली और खुली हुई हैं, उनके अर्थ किसी कलात्मकता की चाह में किन्हीं पंक्तियों के भीतर नहीं छुपाये गये हैं इसीलिए ये कविताएं अपने भाव सम्प्रेषण में अद्वतीय हैं।
    बहुत अच्छा लगा पढ़कर।

    Reply
  6. राजेन्द्र जोशी says:
    7 days ago

    कुमार अंबुज का यह कविता-समूह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि समकालीन भारतीय लोकतंत्र, सत्ता, पूँजी, हिंसा, कर-व्यवस्था, नागरिक स्वतंत्रता और सामाजिक अवसाद का एक सघन काव्य-दस्तावेज़ है। इन कविताओं में भावुकता कम है, नैतिक बेचैनी अधिक; घोषणात्मकता है, पर वह अनुभव से अर्जित है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी एक घटना पर नहीं टिकतीं, बल्कि पूरे समय की संरचना को पकड़ने का प्रयास करती हैं।

    1. समय की सबसे तीखी राजनीतिक कविता

    “एकेश्वर का राज्य” समकालीन हिंदी की उन दुर्लभ कविताओं में है जो धार्मिक रूपक के भीतर सत्ता, पूँजी, मीडिया, न्यायपालिका, बाज़ार और प्रशासन के केंद्रीकरण को एक साथ समेट लेती है। “एकेश्वर” यहाँ ईश्वर नहीं, बल्कि सर्वग्रासी सत्ता का रूपक है। यह कविता मुक्तिबोध की वैचारिक बेचैनी और रघुवीर सहाय की राजनीतिक दृष्टि की याद दिलाती है, लेकिन अपनी अलग भाषा और संरचना के साथ।

    2. पुनरावृत्ति का सृजनात्मक प्रयोग

    इन कविताओं में “एकेश्वर के हैं”, “गोली…”, “ऊब…”, “टैक्स…” जैसी पुनरावृत्तियाँ केवल अलंकार नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की एकरसता और दमन की निरंतरता का काव्यात्मक उपकरण हैं। कई बार यही पुनरावृत्ति सम्मोहन पैदा करती है, तो कहीं-कहीं अत्यधिक विस्तार कविता की ऊर्जा को थोड़ा कम भी करता है।

    3. व्यंग्य का नया मुहावरा

    “सभी करदाता”, “अधिसूचना” और “प्रस्ताव” में व्यंग्य किसी हास्य से नहीं, बल्कि प्रशासनिक भाषा की नकल से पैदा होता है। सरकारी अधिसूचना की शैली में नागरिक अधिकारों का क्षरण दिखाना अत्यंत प्रभावशाली है।

    4. ‘गोली और चुंबन’ : संग्रह की शिखर कविता

    यह कविता भय के सर्वव्यापी वातावरण को दर्ज करती है। अंतिम पंक्ति—

    “गोली की जगह चुंबन रखकर पढ़िए”

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    यह कविता किसी भी संवेदनशील पाठक को भीतर तक विचलित करती है। बच्चों की मृत्यु, बेरोज़गारी और संस्थागत हिंसा को माता-पिता के प्रश्न में बदल देना कविता को अत्यंत मानवीय बना देता है।

    7. भाषा

    भाषा सरल है, लेकिन उसमें समाचार, सरकारी दस्तावेज़, बाज़ार और लोक-भाषा का मिश्रण है। यही उसकी शक्ति है। कहीं भी कठिन शब्दावली का अनावश्यक प्रदर्शन नहीं।

    कुछ सीमाएँ

    * कई कविताएँ विचार के विस्तार में कविता से अधिक घोषणापत्र जैसी प्रतीत होती हैं।
    * प्रतीकात्मकता अपेक्षाकृत कम है; प्रत्यक्ष राजनीतिक वक्तव्य अधिक हैं।
    * लगभग सभी कविताओं का स्वर एक ही दिशा में है, जिससे संग्रह में भावात्मक विविधता सीमित हो जाती है।
    * निजी जीवन, प्रेम और प्रकृति की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम होने से संग्रह का भाव-संतुलन कुछ एकरेखीय लगता है।

    पाठकों की संभावित प्रतिक्रिया

    सामान्य पाठक

    “यह कविता पढ़कर बेचैनी होती है। लगता है कवि हमारे ही समय की खबर लिख रहा है।”

    युवा पाठक

    “कविताएँ सोशल मीडिया की तेज़ भाषा में नहीं हैं, लेकिन हर पंक्ति आज की राजनीति और व्यवस्था पर टिप्पणी लगती है।”

    साहित्य प्रेमी

    “मुक्तिबोध, धूमिल और रघुवीर सहाय के बाद राजनीतिक कविता की एक नई आवाज़ दिखाई देती है।”

    असहमत पाठक

    “कवि सत्ता-विरोध में इतने एकाग्र हैं कि समाज के दूसरे पक्षों की जटिलताएँ अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं।”

    साहित्यिक महत्व

    यह कविता-समूह केवल विरोध का दस्तावेज़ नहीं है; यह लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की पुनर्स्मृति भी है। कुमार अंबुज प्रतिरोध को नारे में नहीं बदलते; वे उसे जीवन की रोज़मर्रा की वस्तुओं—रोटी, टैक्स, सड़क, अस्पताल, चुंबन, ऊब—के माध्यम से व्यक्त करते हैं। यही उनकी कविता को व्यापक सामाजिक अर्थ देता है।
    कुमार अंबुज की ये कविताएँ समकालीन हिंदी कविता की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रखी जा सकती हैं। वे सत्ता, हिंसा और नागरिक जीवन के अंतर्संबंधों को गहरी वैचारिक सजगता और कलात्मक संयम के साथ अभिव्यक्त करती हैं। यदि कहीं आलोचना की गुंजाइश है तो वह कविता के कुछ हिस्सों में विचार की प्रधानता और भाव-संयम की एकरूपता है; फिर भी यह संग्रह हमारे समय को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक और लंबे समय तक चर्चा में रहने वाला काव्य-हस्तक्षेप है।

    Reply
    • Anonymous says:
      6 days ago

      चैट जीपीटी से लिख कर आप क्या साबित करना चाहते हैं। हर लेख को चैट जीपीटी में कॉपी करके मूल्यांकन का कमांड देते हैं और यहां लाकर पेस्ट कर देते हैं। ख़ुद से लिखिए। आपको नहीं मालूम कि सबको मालूम है कि आप कैसे लिखते हैं।

      Reply
  7. रविन्द्र says:
    7 days ago

    बेहद मारक, प्रासंगिक और विचारोत्तेजक कविताएँ! कुमार अम्बुज जी ने समकालीन यथार्थ और समय की बेचैनी को बेहद प्रखरता व गहराई से उकेरा है। बेहतरीन संकलन के लिए समालोचन का आभार

    Reply
  8. पुरु says:
    6 days ago

    सभी कविताएं बेहद अच्छी हैं। समय को देखने की नई दृष्टि देती है। एक ज़रूरी हस्तक्षेप भी करती हैं।

    Reply
  9. कैलाश बनवासी says:
    4 days ago

    अंबुज जी इस बार बहुत मुखर हैं।उनकी पूर्व की कविताओं में में भी हमारे समय की सत्ता, पूंजी,धर्म, कार्पोरेट, प्रशासन आदि का आतंक,भय,तनाव और उससे निपटने की जिजीविषा या असहायता बराबर आती रही हैं, लेकिन इस बार उन्होंने न केवल शिल्प बदला है वरन् भाषा भी।यह अधिक दो टूक है ,संशय नहीं है या एक मुकम्मल कविता बना लेने की इच्छा से भरी कविताएं नहीं हैं। कुमार अंबुज यहां गज़ब का विस्तार लिए हुए हैं,जीवन से जुड़ी तमाम चीजों तक फैलते हुए। फुटकर के शिल्प में हम नागरिकों की थोक पीड़ा है। सत्ता और उनके चौतरफा बिखरे प्नतिनिधि हम नागरिकों के साथ जैसा आधुनिक क्रूर खेल और षड़यंत्र कर रही है और नागरिक निरंतर असहाय और निरुपाय हो रहा है।
    कड़वी सच्चाई है कि हम इन्हीं सब के बीच अंतहीन ऊब में जी रहे हैं हर सांस के लिए ओटीपी का इंतजार करते हुए।
    कुमार अंबुज के साथ साथ समालोचन को बहुत बहुत बधाई।

    Reply
  10. त्रिभुवन says:
    2 hours ago

    मैं इन कविताओं को कई बार पढ़ चुका हूँ। अद्भुत हैं। लंबे समय से ऐसी कविताएँ हिन्दी में दिखी नहीं। अंबुज जी भाषा में मनुष्यता की जिस अंतिम चौकी को ले आए हैं, वह बहुत प्रभावी है।

    इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है, भाषा अपने सुरक्षित घर से बाहर निकलकर उस अँधेरे प्रदेश में आ गई है, जहाँ मनुष्य का जीवन किसी सरकारी वाक्य, किसी गोली, किसी कर अथवा किसी अधिसूचना से अचानक समाप्त किया जा सकता है। इनका वास्तविक विषय सत्ता मात्र नहीं, सत्ता निर्मित वह भयावह सामान्यता है, जिसमें हिंसा घटना नहीं, त्रिकाल संध्या या पांच बार की नमाज जैसी दिनचर्या है। अंबुज जी इसी सामान्यता की चमड़ी उधेड़ते हैं और रेखांकित करते हैं कि उसके नीचे मनुष्य का रक्त अब भी गर्म है।

    ‘एकेश्वर का राज्य’ क्या कमाल है। इसमें एकेश्वर कोई धार्मिक सत्ता नहीं, प्रत्युत् पूँजी, प्रशासन, मीडिया और हिंसा का सर्वग्रासी स्वामित्व है। वस्तुओं की लंबी सूची धीरे-धीरे एक ऐसे कारागार में बदलती है, जिसकी दीवारें दिखाई नहीं देतीं। ‘सभी करदाता’ और ‘अधिसूचना’ इसी अदृश्य घेरे को अधिक निर्मम बनाती हैं। अंबुज जी का व्यंग्य हँसाता नहीं; वह मुस्कान के भीतर लोहे का महीन स्वाद छोड़ जाता है। उनकी परिपक्व भाषा जितनी सहज है, उसका राजनीतिक अर्थ उतना ही विस्फोटक।

    ‘गोली और चुंबन’ भी क्या कमाल है। यह विलक्षण कविता है। गोली की जगह चुंबन रख देने का प्रस्ताव केवल काव्यात्मक उलटबाँसी नहीं; यह हिंसा से अपहृत संसार को प्रेम की भाषा में पुनः प्राप्त करने का असंभव, किंतु अनिवार्य प्रयत्न है। यहीं यह “आपदा” के निकट पहुँचती है। उस आपदा के, जो घटकर समाप्त नहीं होती, हर क्षण घटते रहने की आशंका बन जाती है। ‘पालनहारे’ में बच्चों की मृत्यु सभ्यता के नैतिक दिवालियेपन को तो दर्शाती ही है, वह एक कारुणिक दृश्य पैदा करती है। ‘श्रद्धांजलि’ अनाम मृतकों को वह स्मृति देती है, जिसे इतिहास और समाचार दोनों नष्ट कर देते हैं।

    ‘ऊब की दुनिया’, ‘विडंबना’, ‘प्रस्ताव’ और ‘कहीं भी कोई सरकार’ हमारे समय की प्रशासनिक कुरूपता को रूपक, पुनरावृत्ति और सूखी हुई करुणा से पकड़ती हैं। इन कविताओं की बड़ी उपलब्धि यह है कि वे नारे के निकट जाकर भी नारा नहीं बनतीं। वे सत्ता का प्रतिपक्ष भर नहीं रचतीं, अपितु उस अनुपस्थित मनुष्य को वापस बुलाती हैं जिसका घर, पता, देह, स्मृति और भविष्य छीन लिया गया है। यह कविता भाषा में बची हुई मनुष्यता की अंतिम चौकी है, जहाँ करुणा पहरा देती है और शब्द, पराजित दिखते हुए भी, मनुष्य के पक्ष में जीवित रहते हैं। कुमार अंबुज इस समय के सबसे प्रभावशाली कवि तो हैं ही, उनकी इन कविताओं ने उनके भीतर के चैतन्य को और भी प्रखरता से सामने ला दिया है।

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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