| संस्कृत का शूद्र कवि शूद्रक और मृच्छकटिकम्
प्रेमकुमार मणि |
मृच्छकटिकम् संस्कृत साहित्य का एक नाटक है जिसके रचयिता शूद्रक हैं. नाटक और नाटककार दोनों लम्बे समय से विद्वानों के आकर्षण रहे हैं. इसके पूर्व एक दीर्घ अवधि तक दोनों पर्याप्त उपेक्षित भी रहे. आकर्षण और उपेक्षा के कारण होते है. इसे हम आगे समझना चाहेंगे. शूद्रक का समय उपलब्ध स्रोतों के आधार पर ईसा की तीसरी शताब्दी है. किन्तु कोई-कोई दूसरी या फिर छठी सदी में भी उन्हें खींच ले जाते हैं. अनेक विद्वानों के अनुसार कालिदास के पूर्व उनकी अवस्थिति है; किन्तु कालिदास ने जब अपनी रचना में एक जगह भास और कुछ दूसरे नाटककारों को याद किया तो शूद्रक को क्यों याद नहीं किया.
क्या शूद्रक इतना उपेक्षणीय हैं? संभवतः कालिदास की दृष्टि में हों. लेकिन विद्वानों ने कालिदास की नजर में भी शूद्रक को उपेक्षणीय नहीं माना. बल्कि इस आधार पर कहा गया उनकी अवस्थिति कालिदास के बाद है. लेकिन यह भी कहा जाता रहा है कि कवि भास ही शूद्रक हैं. कुल मिला कर यह कि शूद्रक का समय, स्थान, सामाजिक स्थिति सब विवादों में है. वह उत्तर के हैं या दक्षिण के, कालिदास के पूर्व है या पश्चात्, ब्राह्मण है या शूद्र इन सब पर विद्वान एकमत नहीं हैं. और तो और वे थे भी या नहीं, इस बिंदु पर भी चर्चा होती है. लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा है मृच्छकटिकम् का महत्व बढ़ता जा रहा है. स्वाभाविक है इसके साथ उसके रचयिता शूद्रक का महत्व भी बढ़ा है.
प्रथमतः हमें मृच्छकटिकम् और उसके महत्व पर थोड़ी चर्चा कर लेनी चाहिए. मृच्छकटिक का अर्थ है मिट्टी की गाड़ी. यह नाटक अधिक चर्चा में इसलिए है कि संस्कृत नाटकों की मुख्य धारा से बहुत पृथक दिखता है. है तो यह भी सुखांत, किन्तु इसकी कहानी में प्रेम और विप्लव का ऐसा योग है, जो इसे कुछ पृथक और विशिष्ट बना जाता है. यह पर्याप्त राजनीतिक भी है. कालिदास के नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम से यह सर्वथा भिन्न मिज़ाज का है. कुछ बिंदुओं पर उससे अधिक अर्थपूर्ण. बड़ी बात यह कि यह पर्याप्त यथार्थवादी है. इसलिए यह अपने ज़माने की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थितियों को अधिक प्रामाणिकता से हमारे समक्ष रख जाता है. इस रूप में इतिहास अध्ययन का यह प्रामाणिक साहित्यिक स्रोत बन जाता है. इसका पाठ यह भी बताता है कि इसके रचनाकार के दरबारी होने की संभावना नहीं है. कोई दरबारी लेखक ऐसा विप्लवकारी नाटक नहीं लिख सकता.
मृच्छकटिक दस अंकों का एक वृहदकार नाटक है. सभी अंकों के अलग शीर्षक हैं जो अनुक्रम में इस प्रकार हैं- अलंकारन्यास, द्यूतकसंवाहक, सन्धिच्छेद, मदनिका- शर्विलक, दुर्दिन, प्रवहणविपर्यय, आर्यकापहरण, वसंतसेना मोचन, व्यवहार और संहार.
नाटक का शीर्षक मृच्छकटिक कुछ अनूठा है. मिट्टी की गाड़ी. कैसी गाड़ी! तो खिलौना गाड़ी. यानि मिट्टी की खिलौना गाड़ी. स्मरण रहे यह कोई आधुनिक नहीं, प्राचीन संस्कृत नाटक है. कवि चारुदत्त का बेटा रोहसेन अपने बालसखा, जो धनी गृहस्थपुत्र है, जैसी स्वर्णमंडित खिलौना गाड़ी के लिए ठुनक रहा है. लेकिन चारुदत्त की औकात तो मिट्टी के खिलौना गाड़ी देने भर की है. वह बेटे को मिट्टी की खिलौना गाड़ी ही देता है. इसी बीच नगर गणिका वसंतसेना आती है और बच्चे का रोना सुन अपने स्वर्णाभूषण उसकी मिट्टी की गाड़ी में रख देती है कि लो तुम्हारी गाड़ी भी सोना की हो गई या तू इससे स्वर्णमंडित खिलौना गाड़ी बनवा लेना. बच्चे को लेकर खड़ी हुई यह कहानी राज-विद्रोह पर ख़त्म होती है. कथा-क्रम इस प्रकार है.
2).
प्रथम अंक में नगर की गणिका वसंतसेना को हासिल करने के प्रयास में राजा पालक का साला संस्थापक लगा रहता है. यह संस्थापक हमेशा स को श के रूप में उच्चारण करता है जैसे साथ को शाथ की तरह बोलना. अतएव लोग इसे शकार कहने लगे हैं. चूँकि राजा का साला है इसलिए नगर जीवन में उसका प्रभाव है. इस प्रभाव का इस्तेमाल वह वसंतसेना को हासिल करने में भी करता है. वह उसके पीछे पड़ा है. वसंतसेना को लगता है यह शकार मेरे आभूषण छीन लेगा. जब शकार विट तथा चेट के साथ अँधेरी रात में उसका पीछा कर रहा होता है, तब वसंतसेना बचाव हेतु एक घर में प्रवेश कर जाती है, जो एक गृहस्थ कवि चारुदत्त का है. यह घर चारुदत्त का है इसका पता शकार के वार्तालाप से ही वसंतसेना को चलता है. चारुदत्त का परिवार पहले व्यापार करता था और संपन्न था, किन्तु किन्हीं कारणों से अब विपन्न है. वसंतसेना उसके घर अपने गहने छोड़ जाती है. कहानी आगे बढ़ती है. दूसरे अंक में चारुदत्त का सेवक संवाहक जो जुआरी है जुए में बुरी तरह हार जाता है लेकिन उदारचित्त चारुदत्त उसे ऋणमुक्त कर देते हैं. बाद में वह बौद्ध भिक्षु बन जाता है.
नाटक आगे बढ़ता है. वसंतसेना की सेविका है मदनिका जिस पर एक चोर शर्विलक आकर्षित है. दोनों में गहन प्रेम है. उस समय अग्रिम धन देकर बंधुआ सेविका रखने का प्रचलन रहा होगा. क्योंकि एक निश्चित धन वसंतसेना को देकर शर्विलक अपनी प्रेमिका मदनिका को मुक्त कराना चाहता है. वह चारुदत्त के घर सेंध लगा कर वसंतसेना द्वारा रखे गए गहने चुरा लेता है. वह उन गहनों के साथ जब वसंतसेना के घर जा कर मदनिका से मिलता है और उसे बताता है कि उसने उसे मुक्त कराने के लिए धन की व्यवस्था कर ली है और उसके हाथ में चारुदत्त के घर से चुराए गहने रखता है तब मदनिका उन गहनों को पहचान जाती है कि ये तो उसकी स्वामिनी के गहने हैं. शर्विलक भी सब सच बता देता है. यह पता चलने पर कि उसने चारुदत्त के यहाँ चोरी की है उसे ग्लानि होती है. वह अपनी प्रेमिका से स्वीकार करता है कि चारुदत्त जैसे सज्जन को दुखी करना वह नहीं चाहता, वरना मुझ जैसे धूर्त चोर का राजा क्या बिगाड़ लेगा. यानी मुझे राजा से नहीं, चारुदत्त जैसे सज्जन से भय लगता है. मदनिका कहती है कि ऐसा कर कि तुम (शर्विलक) वसंतसेना से कहना कि ये गहने चारुदत्त ने भेजे हैं. ऐसा करने से तुम चोरी के पाप से भी बच जाओगे. वसंतसेना यह सब छुप कर सुन रही थी. मदनिका जब शर्विलक को वसंतसेना के पास ले जाती है तब शर्विलक कहता है आर्य चारुदत्त ने ये गहने इसलिए भेजे है कि उनके जीर्ण-शीर्ण घर में इसकी सुरक्षा संभव नहीं थी. वसंतसेना कहती है कि सुनो मेरी भी बात. चारुदत्त ने मुझ से कहा था कि जो इन आभूषणों के साथ जाएगा उसे मदनिका को सौंप देना. मैं तुम्हे पत्निवत मदनिका को सौंपती हूँ.
चारुदत्त की पत्नी का नाम द्यूता है. जब उसे पता चलता है कि वसंतसेना के आभूषण चोर ले गया तो वह अपने रत्नावली नामक कीमती गहने को अपने सेवक मैत्रेय के हाथ वसंतसेना को भेजती है. वह कहता है कि चूँकि आभूषण जुए में हारा जा चुका है अतएव उसके बदले द्यूता ने ये आभूषण दिए हैं. वसंतसेना सब जान जाती है. वे आभूषण उन्हें लौटा देती है. सूचित करती है कि शाम को मैं चारुदत्त के घर आउंगी. पाँचवें अंक में सुहाने वर्षाकाल के बीच चारुदत्त और वसंतसेना का सम्मिलन होता है. वसंतसेना उस रोज चारुदत्त के घर ही रह जाती है.
राजा पालक को किसी ज्योतिषी ने बताया हुआ है कि गोपालदारकआर्य्यक से उसके राजपद को खतरा है. अतएव पालक आर्यक को बंदी बना लेता है. आर्यक और शर्विलक मित्र हैं. शर्विलक साहस कर के आर्यक को बंदीगृह से मुक्त करा लेता है. बंदीगृह से बाहर आया आर्यक चारुदत्त की गाड़ी में बैठ जाता है और बेड़ियों की झनक को आभूषणों की खनक समझ गाड़ीवान गाड़ी हाँक देता है. गाड़ी की एक जगह जांच भी होती है. लेकिन ऐसा लगता है शर्विलक और आर्यक ने भागने के प्रबंध ठीक से किए थे. दो राज कर्मचारी वीरक और चंदनक उसकी मदद करते हैं. आर्यक पुष्पकरण्डक उद्यान में चारुमित्र से मिलता है. उसे चारूदत्त जैसे कवि का भी समर्थन है. वसंतसेना भी उससे मिलने को आकुल है. वह उद्यान जाना चाहती है. लेकिन उतावलेपन में गलती से शकार की गाड़ी पर बैठ जाती है और अन्तत: उसके चंगुल में आ जाती है.
प्रणय निवेदन को नकारने पर शकार वसंतसेना की गला दबा कर अपने जाने हत्या कर देता है. शव ठिकाने लगा कर वह न्यायाधिकरण में पहुंचता है और चारुमित्र पर हत्या का आरोप लगा कर उसे दण्डित करने का निवेदन करता है. नौवें अंक का शीर्षक व्यवहार है. इसमें चारुदत्त के विरुद्ध वसंतसेना की हत्या का मुक़दमा चलता है. इसी बीच चारुदत्त का पुत्र रोहसेन अपनी मिट्टी की गाड़ी लिए आता है जिसमें वसंत सेना के स्वर्णाभूषण हैं. इसे ही साक्ष्य मान कर अंततः उसे फांसी की सजा मिलती है. अब उसे फांसी की सजा की तैयारी चल रही है. जल्लाद जो चांडाल हैं फांसी देना नहीं चाहते. लेकिन उन्हें हुक्म का पालन तो करना होगा. लेकिन वे दुविधा में हैं और देर करते जा रहे हैं. चांडाल जनों का भी दिल-दिमाग और बोध है, जो चारुदत्त को निर्दोष पा रहा है. (स्मरण होता है रूसी लेखक टॉलस्टॉय का उपन्यास ‘रिसरेक्शन’ जिसमें उसका नायक नेखलुदोव ऐसी ही परिस्थितियों में कत्यूषा को सजायाफ्ता होने से नहीं बचा पाता.) चांडाल देर करते जा रहे हैं. लेकिन अचानक से वसंतसेना भिक्षु संवाहक के साथ वहाँ आ जाती है. वस्तुतः वसंतसेना मरी नहीं अचेत हुई थी और शकार ने उसे मृत मान लिया था. इसी बीच उद्यान में भिक्षु संवाहक आता है और वसंतसेना का उपचार करता है. यह वही संवाहक है जिसे चारुमित्र ने ऋणमुक्त किया था. वह उनका अनुगृहीत है. अब नई कहानी शुरू होती है. इस बीच आर्यक के नेतृत्व में राजा पालक के विरुद्ध विद्रोह सफल हो जाता है. शर्विलक ने फुर्ती दिखाते हुए राजा पालक पर हमला कर दिया और उसे मार डाला. उसका मित्र आर्यक नया राजा होता है. उसका हुक्म आता है कि चारुमित्र को छोड़ा जाये और शकार को फांसी दी जाय. अब तो चारुमित्र को नई जिम्मेदारी मिलती है. संवाहक नए शासन में बौद्ध विहारों का प्रमुख बनाया जाता है. चारुदत्त उदारता प्रदर्शित करते हुए शकार को फांसी देने से रोक लेता है. उसे क्षमा करते हुए उसे दोषमुक्त भी करवाता है. वसंतसेना के साथ चारुदत्त का विवाह होता है. इस तरह उत्सव की तरह नाटक समाप्त होता है.
3).
मृच्छकटिक के कथा-विश्लेषण से बहुत सारे प्रश्न उभरते हैं. यह हमारी जमी-जमायी चेतना और संस्कारों को झकझोरता है. जैसे शर्विलक वर्ण से ब्राह्मण और पेशे अथवा स्वभाव से चोर है. क्या यह वर्ण व्यवस्था पर ही प्रश्न नहीं उठाता है? उत्कृष्ट सामाजिक स्थिति और निकृष्ट प्रवृति या पेशा! संभव है यह सामाजिक सत्य हो, किन्तु उस समय साहित्य में ऐसी चीजों को र
खना निश्चित तौर पर रचनाकार के साहस का परिचायक है. प्रेमचंद की कुछ रचनाओं में ब्राह्मण पात्रों को चरित्रहीन या लोभी या कभी पेटू के रूप में रखा गया है. लेकिन यह बीसवीं शताब्दी की बात है. प्रेमचंद को भी इसके लिए पर्याप्त विरोध झेलने पड़े थे. किन्तु उस प्राचीन ज़माने में शूद्रक ने इस तरह के सामाजिक यथार्थ को प्रदर्शित किया है, तब यह उनका साहस ही कहा जाएगा. क्योंकि वह सामंतवादी युग था और उच्चवर्णीय शक्तियां और सरोकार ही समाज और साहित्य के नियामक थे. यही कारण है कि उनके आस-पास के संस्कृत कवि ऐसा नहीं करते दिखते हैं.
यदि खोज करें तो ऐसे बिंदुओं की एक लम्बी फेहरिश्त बनेगी. अब देखिए कि शर्विलक एक गणिका की दासी मदनिका से प्रेम करता है और उससे विवाह करता है, कोई रखैल नहीं बनाता. दासी के अद्विज होने की अधिक संभावना है. इस तरह यह एक अन्तरवर्णीय विवाह भी है. प्रतिलोम कोटि का नहीं है, किन्तु दोनों के बीच प्रेम की जो सघनता है वह बहुत सहज है. यानी इस तरह अंतर्वर्णीय विवाहों को शूद्रक सहज पा रहा है. कम-से-कम एक रचनाकार का जो प्रस्तावित समाज अथवा यूटोपिया है उसमें वह इसे सहज देखना चाहता है. यह सब रचनाकार शूद्रक के दृष्टिकोण का भी परिचायक है.
रचनाकार फ्रांसीसी लेखक ज्यां जेने के सैकड़ों साल पहले हुआ, किन्तु उसी तरह चोर जीवन को प्रतिष्ठित करता हुआ दीखता है. यह चोर ब्राह्मण शर्विलक सचमुच विद्रोही प्रवृति का भी है. कुछ मस्त-मौला भी है. तीसरे अंक में जब वह चोरी करने जाता है तो सेंध मारने में माप करने वाला सूत्र (धागा) ले जाना भूल गया है. मौके पर स्वयं को धिक्कारते हुए सोचता है:
धिक् कष्टम्! प्रमाणसूत्रं मे विस्मृतम्। (विचिन्त्य) आं, इदं यज्ञोपवीतं प्रमाणसूत्रं भविष्यति।
यज्ञोपवीतं हि नाम ब्राह्मणस्य महदुपकरणद्रव्यम्, विशेषतोऽस्मादृशस्य। कुतः?
एतेन मापयति भित्तिषु कर्ममार्गम्।
एतेन मोचयति भूषणसम्प्रयोगम्।
उद्घाटनं भवति यन्त्रदृढे कपाटे।
दष्टस्य कीटभुजगस्य परिवेष्टनं च॥
(तीसरा अंक )
(ओह! धिक्कार है. मापने का धागा भूल गया. (सोच कर) अच्छा. यज्ञोपवीत तो है. ब्राह्मण के लिए यह जनेऊ बड़े काम की चीज है. खास कर मेरे जैसे चोर ब्राह्मण के लिए. इस जनेऊ से दीवारों को माप सकता हूँ. इससे आभूषणों को खोल सकता हूँ. किवाड़ की किल्लियाँ खोल सकता हूँ. और यदि जो कीट भुजंग काट ले तो इससे बाँध कर विष विस्तार को रोक सकता हूँ.)
शर्विलक का यह उद्गार क्या जनेऊ की पूरी पवित्रता और पाखण्ड पर एक गहरा व्यंग नहीं है?
शर्विलक आर्यक जैसे एक विद्रोही शूद्र नेता का सहयोगी है. यह प्राचीन काल के राजनीतिक चरित्र की एक बानगी भी देता है. पालक के विरुद्ध विद्रोह में कोई विचारधारा भी है जिस से आर्यक और शर्विलक यहाँ तक कि चारुदत्त जैसा प्रबुद्ध कवि, जो वर्ण से ब्राह्मण है, साथ है. यह उस ज़माने की एक सामाजिक राजनीतिक स्थिति है. कोई विद्रोह हो रहा है तो उसमें विभिन्न वर्णों के लोगों के एक साथ होने की संभावनाएं बनती हैं. एक शूद्र आर्यक की राजनीति का साथ शर्विलक और चारुदत्त जैसे ब्राह्मण दे रहे हैं. प्रायः उस काल को घनीभूत वर्णव्यवस्था का समय माना गया है. लेकिन यह नाटक एक भिन्न तस्वीर पेश करता है. यह भी ज्ञात होता है कि राज में उलट-फेर अथवा तखता-पलट केवल वाह्य आक्रमणों से नहीं, आंतरिक विद्रोह से भी संभव होता था. क्या सचमुच ऐसा नहीं प्रतीत होता कि नाटक फ्रांसीसी क्रांति के बेस्टाइल के पतन की तरह का एक दृश्य स्थापित कर जाता है! इसलिए ही यह नाटक कुछ अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होता है.
चारुदत्त एक निर्धन कवि है. नाटक के अनुसार उसका परिवार पहले व्यापार करता था. व्यापार वैश्य वर्ण का पेशा है. इसका अर्थ है यह वर्णव्यवस्था और मनुस्मृति की पोथी एक दिखावे की तरह था. इसका बहुत जोर नहीं था. ब्राह्मण वैश्य की तरह व्यापार भी कर सकता था और शर्विलक की तरह चोरी भी. चारुदत्त और शर्विलक दोनों आर्यक की राजनीति के सहयोगी हैं. यह एक अलग अर्थ उपस्थापित करता है. चारुदत्त जो वर्ण और कवि स्तर पर प्रतिष्ठित है, पर व्यवहार अंक में मुकदमा चलता है और उसे मृत्युदंड मिलता है. इससे दो बातों का पता चलता है. पहला तो यह कि न्यायालय राजा से अलग होते थे और दूसरा कि ब्राह्मण को भी मृत्युदंड दिया जा सकता था. मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण अवध्य है. उसे मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता. लेकिन चारुदत्त को मृत्युदंड मिलता है. वह गणिका वसंतसेना से अंततः विवाह करता है. यह उस समाज में होता था या नहीं, इससे अधिक महत्वपूर्ण है कि मृच्छकटिक का रचनाकार ऐसा चाहता है.
शूद्रक प्रायः मनुस्मृति के आदेशों की अवहेलना करता है और उसकी धज्जियां उड़ाता है. कुछ ऐसा ही आर्यक के राजा बनने का दृश्य भी है. आर्यक अद्विज है यह स्पष्ट है. मगध में नंदों और मौर्यों के शासन में आने का इतिहास है. दोनों शूद्र राजवंश हैं. लेकिन पुष्यमित्र शुंग के खुले विद्रोह, जिस में उस ने मौर्य राजा वृहद्रथ को सैन्य परेड में मार कर सत्ता हासिल की थी, के बाद बहुत समय तक शूद्रों के सत्तासीन होने की कोई सूचना नहीं मिलती.
गुप्त मूलतः वैश्य थे और उन लोगों ने वर्ण व्यवस्था वाले ब्राह्मण धर्म को स्वीकार लिया था. लेकिन ऐसे समय के बीच कोई नाटककार यदि अपनी रचना में शूद्र नायकत्व को स्थापित करता है तो यह महत्वपूर्ण बात है. कोई जरूरी नहीं कि ऐसा होना कभी संभव हुआ हो. नहीं हुआ और शूद्रक ऐसी कल्पना करता है यह रचनाकार शूद्रक का चरित्र और दृष्टिकोण उद्घाटित करता है.
शूद्रक का स्त्री विषयक सोच भी कुछ अलग है. उसकी स्त्रियाँ अधिक विवेकशील और साहसी हैं. वे मनु के स्त्री विषयक सोच का अनुपालन करती नहीं दिखतीं. इसका अर्थ यह है कि मनु ने अपने समय की सामाजिक स्थिति के आधार पर सामाजिक संहिता नहीं बनाई, अपितु अपनी सोच के आधार पर बनाई है. मनु स्त्रियों को कभी स्वतंत्र रखने की बात नहीं करते. उनकी संहिता में स्त्री और शूद्रों को भरसक गुलाम की तरह रखा गया है. मनु के अनुसार ‘मा भजेत स्त्री स्वतंत्रताम,’ स्त्रियों को स्वतंत्र मत रखो. बाल्यकाल में पिता, युवा काल में पति और वृद्धावस्था में पुत्रों के अधीन रहने की व्यवस्था है. उनके लिए जीवन के उत्स के लिए कोई अवसर नहीं दिया गया है. किन्तु मृच्छकटिक की वसंतसेना और मदनिका कुछ अधिक प्रगल्भ दिखती है. एक गणिका है दूसरी उसकी सेविका. दोनों का विवाह ब्राह्मण से होता है. एक प्रतिष्ठित कवि है, दूसरा निरादृत चोर. शूद्रक उन्हें रखैल नहीं, पत्नी बनाते है. वसंतसेना और मदनिका दोनों धन से नहीं, व्यक्तित्व से प्रेम करती हैं. वसन्तसेना के लिए अवसर था कि वह राजा के साले संस्थानक के प्रेम को स्वीकार कर भौतिक सुख से रह सके. लेकिन वह उसे ठुकराती है. वह दरिद्र कवि से प्रेम करती और अंततः उसे हासिल करती है. एक स्त्री के रूप में वह अपनी इच्छा का भी प्रदर्शन करती है. वह किसी पुरुष की सेवा में सात जन्म तक रहने वाली हिन्दू स्त्री नहीं है. दूसरे ही अंक में वह अपनी सेविका मदनिका से अपने मन की बात बताती है.
हज्जे, रमिदुच्छामि, न सेविदुं
(चेटि! रन्तुमिच्छामि, न सेवितुं)
‘यानी रमण की इच्छा रखती हूँ, सेवा की नहीं.’
इतना साहसिक और परंपरा से अलग संवाद शूद्रक ही गढ़ सकते थे. मदनिका के यह कहने पर कि चारुदत्त निर्धन हैं, वसंतसेना कहती है, इसीलिए तो उन्हें चाहती हूँ. निर्धन से प्रेम करने वाली वेश्या संसार में निंदा का पात्र नहीं बनती.
मदनिका भी आम स्त्री से कुछ अलग है. उसका प्रेमी शर्विलक चोरी किए हुए आभूषण पहले उसके सामने करता है. उसका प्रेमी उसकी मुक्ति के लिए कितना चिंतित है यह मदनिका अनुभव करती है, किन्तु अपने प्रेमी के चरित्र की उसे चिन्ता है. वह ऐसे उपाय बताती है कि शर्विलक ही आभूषण वसंतसेना के समक्ष रख दे कि इसे चारुदत्त ने भेजा है कि उनका घर इसे रखने के लिए असुरक्षित है. छुप कर सब सुन रही वसंतसेना अपनी सेविका के प्रेम और चरित्र को समझती है. वह एक चोर और चोरी के कृत्य को सुन्दर और सुखद बना देती है जैसे चारुदत्त के बेटे रोहिसेन की मिट्टी की खिलौना गाड़ी को उसने स्वर्णाभूषणों से भर दिया था कुछ वैसा ही. वह अत्यंत उदार ह्रदय है. जब आभूषण उसके समक्ष रखा जाता है तो उसे स्वीकारते हुए वह कहती है कि हाँ, चारुदत्त ने उस से कहा था कि जो व्यक्ति इसे लेकर जाएगा उसे मदनिका को सौंप देना. मैं मदनिका को मुक्त करती हूँ. तुम इसे पत्निवत स्वीकार करो. ध्यान रहे शूद्रक के पत्निवत शब्द पर. वह उसे पत्निवत सौंप रही है. उसका विवाह कराती है. रखैल नहीं बनाती. यह सब इस नाटक की विशेषता है.
4).
यह स्वाभाविक है कि हम रचनाकार शूद्रक के ऐतिह्य पर भी विचार करें. जैसा कि पहले बता चुका हूँ कालिदास ने इनकी चर्चा नहीं की है. उन्होंने भास की चर्चा की है. भास निश्चित रूप से कालिदास और शूद्रक से पूर्व के हैं. उनकी अनेक रचनाओं को 1912 ईस्वी में उद्घाटित करने वाले गणपति शास्त्री ने उनकी दस कृतियों की चर्चा की है. इनकी खोज उन्होंने केरल राज्य में की. भास का एक नाटक दरिद्र चारुदत्त है, जिसकी कथा मृच्छकटिक के चारुदत्त और वसंतसेना की प्रणय कथा ही है. यह केवल चार अंकों का नाटक है, जिसमें आर्यक के विद्रोह की कथा नहीं है. इससे इतना तो स्पष्ट है कि शूद्रक भास के बाद का है. कालिदास ने संभवतः इन्हें चर्चा के अनुरूप नहीं माना होगा इसलिए इनका उल्लेख नहीं किया. शूद्रक आज ही जब इतने विवादित हैं तो उस ज़माने में होना अस्वाभाविक नहीं है. इसका अर्थ है शूद्रक कालिदास से पूर्व और भास के बाद के कवि हैं. अनुमान है इनका समय ईसा की दूसरी या तीसरी सदी रही हो. मृच्छकटिकम् का संस्कृत से हिंदी रूपांतर और भाषा टीका देने वाले डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी की किताब मोतीलाल बनारसी दास ने प्रकाशित की है. इस में एक सुदीर्घ प्रस्तावना लेख भी है, जिसमें शूद्रक पर विचार किया गया है. डॉ. त्रिपाठी के बताते हैं,
‘प्रो. कोनो के अनुसार आभीर वंश के राजा शिवदत्त का ही दूसरा नाम शूद्रक था. डॉ. फ्लीट के अनुसार इसी शिवदत्त ने अथवा इसके पुत्र ईश्वरसेन ने आंध्र वंश के अंतिम राजा का नाश किया था. अतः शिवदत्त का समय 248 ईस्वी के आसपास है. किन्तु इस मत के मान लेने पर पहला प्रश्न यही उठता है कि यदि शिवदत्त मृच्छकटिक का कर्त्ता है तो उसका नाम इस नाटक से न जुड़ कर शूद्रक का क्यों जुड़ा? यदि इसका उत्तर यह दिया जाये कि आभीर होने के कारण शिवदत्त शूद्र था और लोक में उसकी इसी रूप में प्रसिद्धि थी अतः शूद्रक नाम ही इस नाटक के साथ जुड़ा तो यह एक भ्रामक कल्पना होगी. प्रस्तावना में ही शूद्रक को द्विज कहा गया है.
‘द्विजमुख्यतमः कविर्बभूव प्रथितः शूद्रक इत्यगाधसत्त्वः’
द्विज होने के कारण ही वह अश्वमेध वेदाध्ययन और तपस्या का अधिकारी बना होगा. आभीर राजा शिवदत्त को शूद्रक मानने की कल्पना को बल देने के लिए मृच्छकटिक के गोपाल दारक आर्यक में आभीर राजा शिवदत्त को देखना भी असंगत है’ (प्रस्तावना पृष्ठ 3)
एक दूसरे पश्चिमी विद्वान पिशेल मृच्छकटिक का रचयिता दण्डी को मानते हैं. इसके लिए राजशेखर की उस उक्ति का हवाला दिया गया है जिसमें उन्होंने दण्डी के तीन प्रबंधों की चर्चा की है. त्रयोदण्डी प्रबन्धाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुता’ इसमें दसकुमारचरितम और काव्यादर्श तो है, तीसरा अज्ञात है. पिशेल के अनुसार यह तीसरा मृच्छकटिक ही है. लेकिन इस उक्ति में बहुत बल नहीं दीखता. डॉ. त्रिपाठी कहते है दण्डी ने मृच्छकटिक में अपना नाम न देकर शूद्रक क्यों दिया?
यदि शूद्रक नाम ही उन्हें इतना पसंद था तो दशकुमारचरित और काव्यादर्श में भी शूद्रक नाम ही देते.
हाँ, विद्वानों के इस मत में दम अवश्य है कि भास ही शूद्रक हो सकते हैं. क्योंकि दरिद्र चारुदत्त की कथा का बाद में विस्तार किया जाना संभव है. इसी आधार पर डॉ. कीथ भी शूद्रक को काल्पनिक मानते हैं. अर्थात शूद्रक कोई व्यक्ति नहीं था. सुप्रसिद्ध हिंदी लेखक रांगेय राघव ने मृच्छकटिक का हिंदी में नाट्यरूपान्तर किया है. इस में एक भूमिका भी है. रांगेय राघव के अनुसार :
‘शूद्रक संभवतः कोई गोप राजा ही था; जिसने चारुदत्त ब्राह्मण और आर्यक की कथा मिला दी थी. भास ने केवल ब्राह्मण कथा लिखी थी, शूद्रक ने गोप उत्थान भी लिख दिया. रांगेय राघव ने मृच्छकटिक की विशेषता भी रेखांकित की है. उनके अनुसार
‘(इसकी) राजनीतिक विशेषता यह है कि इस में क्षत्रिय राजा बुरा बताया गया है. गोपपुत्र आर्यक एक ग्वाला है, जिसे कवि राजा बनाता है. यद्यपि कवि वर्णाश्रम को मानता है, पर वह गोप को राजा बनता है.’
(मृच्छकटिक, अनुवाद रांगेय राघव, भूमिका, राजपाल एंड संस, दिल्ली , 1957)
बलदेव उपाध्याय कृत ‘संस्कृत साहित्य का इतिहास’ में शूद्रक को महत्वपूर्ण नाटककार माना गया है. किन्तु काल-क्रम में उन्हें भास, कालिदास और विशाखदत्त के बाद रखा गया है. आचार्य उपाध्याय उन्हें विशाखदत्त और कालिदास के बाद का रचनाकार मानते हैं. भास के बाद तो वह हैं ही. कालिदास के भी बाद हैं, यह नई बात है. आप्टे के संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश के आखिर में संस्कृत के मूर्धन्य रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, जिसमें शूद्रक नहीं हैं. हाँ, शब्दकोश में शूद्रक को ‘एक राजा और मृच्छकटिक का प्रख्यात प्रणेता’ अवश्य कहा गया है. मूल संस्कृत मृच्छकटिक के आरम्भ में शूद्रक के बारे में विस्तार से बताया गया है. आचार्य उपाध्याय इसे प्रक्षेप मानते हैं. इसलिए कि कोई सुबुद्ध व्यक्ति अपनी प्रशस्ति, यहाँ तक कि जीवित अग्नि में प्रवेश कर भस्मीभूत होने का विवरण (शूद्रकोग्नि प्रविष्टः) कैसे लिख सकता है. मृच्छकटिक के इसी वर्णन के आधार पर उन्हें द्विज कहा गया है. अर्थात यह सब भ्रांत धारणा बाद में जोड़ी गई मालूम होती है. बलदेव उपाध्याय को सीधे उद्धृत करना अधिक उपयुक्त होगा-
“शूद्रक नामक राजा की संस्कृत साहित्य में खूब प्रसिद्धि है. जिस प्रकार विक्रमादित्य के विषय में अनेक दंतकथाएं हैं, उसी प्रकार शूद्रक के विषय में भी है. कादम्बरी में विदिशा नगरी में, कथासरित्सागर में शोभावती तथा वेतालपञ्चविंशति में वर्धमान नामक नगर में शूद्रक के राज करने का वर्णन पाया जाता है. कथासरित्सागर का कथन है कि किसी ब्राह्मण ने राजा को आसन्नमृत्यु जान कर उसे दीर्घ जीवन की आशा से अपने प्राण निछावर कर दिए थे. हर्षचरित में लिखा है कि शूद्रक चकोर के राजा चंद्रकेतु का शत्रु था. राजतरंगिणीकार स्थिर निश्चलता के दृष्टान्त के लिए शूद्रक का स्मरण करते हैं. स्कंदपुराण के अनुसार विक्रमादित्य के सत्ताईस वर्ष पहिले शूद्रक ने राज किया था. प्रसिद्धि है कि कालिदास के पूर्ववर्ती रामिल तथा सोमिल नामक कवियों ने मिल कर ‘शूद्रक-कथा’ नामक पुस्तक लिखी थी. अततः शूद्रक राजा की पर्याप्त प्रसिद्धि है. यूरोपीय लेखकों की सम्मति में शूद्रक इस के कर्ता नहीं हैं. बहुत से लोग तो शूद्रक की सत्ता में ही विश्वास नहीं करते, परन्तु ये सब भ्रांत धारणाएं हैं. तथ्य यह प्रतीत होता है कि विक्रमादित्य के सामान ही शूद्रक भी ऐतिहासिक क्षेत्र से उठ कर कल्पना जगत के पात्र माने जाने लगे थे और जिस प्रकार ऐतिहासिक लोग प्रथम शतक में विक्रमादित्य के अस्तित्व के विषय में ही संदेहशील थे उसी प्रकार शूद्रक के विषय में भी. आधुनिक शोध से दोनों ही ऐतिहासिक व्यक्ति सिद्ध होते हैं. ऐसी दशा में शूद्रक को मृच्छकटिक का रचयिता न मानने वाले डॉ. सिल्वा लेवी तथा कीथ का मत स्वयं ध्वस्त हो जाता है. पिशेल ने जो दण्डी को इसका रचयिता होने का श्रेय दिया है वह भी कालविरोध होने से भ्रांत प्रतीत होता है. शूद्रक ऐतिहासिक व्यक्ति थे और वे ही मृच्छकटिक के यथार्थ लेखक थे.”
(संस्कृत साहित्य का इतिहास, शारदा निकेतन, वाराणसी, दशम संस्करण, 2001 , पृष्ठ 513 )
उपरोक्त बातों से शूद्रक के अवास्तविक होने विषयक चर्चा पर विराम लग जाता है. यह भी कि मृच्छकटिक के आरम्भ में उनकी प्रशस्ति में जो कहा गया है और यह भ्रान्ति कि वह द्विज थे भी पूरी तरह प्रक्षिप्त जान पड़ता है. हाँ, यह कहा जा सकता है कि भास ने अपने चार अंकीय नाटक दरिद्र चारुदत्त को विस्तार देते हुए उसे मृच्छकटिक बना दिया. लेकिन इससे यह भी आभास होता है कि भास स्वयं शूद्र था. संभव है बाद में भास ने ही अपना नाम शूद्रक रख लिया हो. क्योंकि यह नाटक का रचनाकार कोई द्विज है यह विश्वसनीय नहीं प्रतीत होता. मृच्छकटिक बार-बार मनुस्मृति के अनुदेशों का उल्लंघन करता है. अंतर्वर्णीय विवाहों, गणिकाओं को वधुओं के रूप में स्थापित करना. एक ब्राह्मण को भी मृत्युदंड देना, यज्ञ पर बैठे राजा पालक को विद्रोहियों द्वारा मार दिया जाना जैसी घटनाएं कुछ बड़ी बात कहती है.
शूद्रक एक विप्लव-गाथा लिख रहा है. अपने समय का यह सामाजिक-राजनीतिक आख्यान है. यहाँ प्रेम का परिदृश्य भी परिपाटी से हट कर है. उसमें कुछ सन्देश है. इसकी स्त्रियां प्रबुद्ध और उदार हैं. वह समाज के लिए कुछ सन्देश छोड़ना चाहती हैं.
डॉ. रमाशंकर त्रिपाठी द्वारा शर्विलक पर की गई टिप्पणी देखने लायक है: –
“शर्विलक में साहस और वीरता कूट-कूट कर भरी है. वह क्रांतिकारियों का अगुआ है. जेल का फाटक तोड़ कर रक्षकों के बीच से गोपालदारक आर्यक को भगा ले जाना शर्विलक जैसे शूर-वीर का ही काम है. राजा के महल के अन्दर घुस कर पालक का वध करना तथा शीघ्र ही राजगद्दी पर आर्यक का अभिषेक करना भी शर्विलक का ही काम है. क्रांति तथा पुन: शांति-स्थापन आदि सभी कार्य शर्विलक द्वारा ही किये गए हैं.”
(मृच्छकटिकम्, भाषा-टीका, त्रिपाठी, प्रस्तावना, पृष्ठ 38)
संस्कृत साहित्य में सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों की चर्चा अन्य कृतियों में भी उपलब्ध है. विशाखदत्त का नाटक ‘मुद्राराक्षस’ कुछ अधिक ही राजनीतिकृत है, जिस में स्त्री और प्रणय दृश्यों का नितांत अभाव है. कालिदास के ‘मालविकाग्निमित्रम’ में तत्कालीन समय तो है, लेकिन कोई राजनीति नहीं है. बाणभट्ट का ‘हर्षचरित’ कुछ अलग तरह की रचना जरूर है, लेकिन ‘मृच्छकटिक’ लीक से पूरी तरह हट कर है. यह न केवल मनुवादी सामाजिक अनुदेशों की अवहेलना करता है, अपितु एक नयी सामाजिक व्यवस्था की प्रस्तावना भी करता है. सामंतवादी युग ज़माने में राज विद्रोह की कहानी को साहित्य, वह भी नाटक जैसे दृश्य काव्य में रखना एक राजनीति ही है. यह शूद्रक संभवतः इसलिए कर सका कि वह निन्मवर्ण से है. शूद्र है. संस्कृत को सामान्यतः द्विजों की भाषा सिद्ध करने वालों के लिए भी शूद्रक एक चुनौती है. यह एक दिलचस्प तथ्य है कि संस्कृत में ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था, विशेष कर मनु संहिता का पर्याप्त विरोध मिलता है. आधुनिक हिन्दी साहित्य इस मामले में बहुत पीछे है. हिन्दी साहित्य के आधुनिक प्रगतिवादी कहे जाने वाले दौर में भी आर्थिक पहलू पर अधिक जोर दिया गया सामाजिक पर बहुत कम. नतीजा हुआ साहित्य धीरे-धीरे जड़ों से कटने लगा, जैसे रीतिकालीन साहित्य कट गया था. संस्कृत में संभवत: बौद्धों के कारण ऐसी स्थिति नहीं आई.
बौद्धों ने संस्कृत को संकर बना कर उसे भाषा के रूप में तो जन पक्षीय बनाया ही, उसके साहित्य को भी प्रभावित किया. अश्वघोष की परम्परा अनेक स्तरों पर विकसित होती रही. शूद्रक इसी परम्परा से हैं. उनका मृच्छकटिक एक ऐसा उदाहरण है, जिस पर किसी भी साहित्य का इतिहास गर्व कर सकता है. वसंतसेना और चारुदत्त का उद्दात्त प्रेम तो अपनी जगह पर है ही, (जो भास के इसी विषयक नाटक में भी आ चुका है) लेकिन उससे अलग राजकीय विद्रोह की स्थितियां विकसित कर रहे शर्विलक, उसमें किन्हीं स्तरों पर सहयोग कर रहे चारुदत्त, वीरक और चंदनक जैसे राजकर्मचारी, उन सब का नेता आर्यक ये सब कुछ इतने आधुनिक लगते हैं कि आश्चर्य होता है. इसी आधुनिक बोध के आधार पर मृच्छकटिक के अमेरिकन अनुवादक डॉ. राइडर इसे कॉस्मोपोलिटन चरित्रों वाला नाटक कहते हैं. इसे दुनिया के किसी भी देश में आज भी अभिनीत किया जा सकता है और दर्शक उसमें अपने समकाल के सामाजिक-राजनीतिक मिथ्याचार की अनुभूति कर सकेंगे. जब यह नाटक लिखा गया था तब समाजवादी विचार अस्तित्व में नहीं थे, किन्तु समत्व के आदर्श जरूर थे.
शूद्रक इसी समत्व के आदर्श को स्थापित करने वाला रचनाकार है. अतिरिक्त रूप से विशिष्ट और इसलिए उल्लेखनीय.
| प्रेमकुमार मणि
बिहार के किसान पृष्ठभूमि के एक स्वतन्त्रता सेनानी पिता और शिक्षिका माँ के घर 25 जुलाई 1953 को जन्मे मणि ने विज्ञान विषयों के साथ स्नातक किया और फिर नवनालन्दा महाविहार में भिक्षु जगदीश काश्यप के सान्निध्य में रह कर बौद्धधर्म दर्शन की अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त की. छात्र जीवन में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े, कुछ समय तक सरकारी नौकरी की और छोड़ी, राजनीतिक आन्दोलनों और सक्रियताओं से जुड़े, कथाकार, उपन्यासकार और प्रतिनिधि लेखक के रूप में पहचान बनाई और कुछ पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया. निरन्तर समसामयिक विषयों पर भी लिखते रहे. पाँच कहानी संग्रह, एक उपन्यास और लेखों के पाँच संकलन प्रकाशित हो चुके हैं एवं अनेक कहानियों के अनुवाद अंग्रेज़ी, फ्रांसिसी, उर्दू, तेलगु, बांग्ला, गुजराती और मराठी आदि भाषाओं में हो चुके हैं. लेखन के साथ वह अपनी सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं. 943166221 |




हिंदी में प्रेमकुमार मणि जैसे बहुत कम लेखक हैं जो गहरे अध्ययन का शौक रखते हैं, उन्होंने बुद्धिज़्म पर भी काफ़ी लिखा है…
यह मणि जी का व्यवस्थित और दृष्टिसम्पन्न लेख है। इसके लिए बधाई। लेख में कई जगह यह चिंता व्यक्त की गयी है कि कालिदास जैसे लेखकों/कवियों ने क्यों शूद्रक का नाम दर्ज नहीं किया है। इसका सीधा जवाब यह हो सकता है कि चर्चा तो अब भी कथित ‘बड़ी जात’ वालों के घर में पैदा हो गए लेखक/विद्वान् नेटिव कौमों की विद्वत्ता और महत्व को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। न ही उन्हें चर्चा तक के योग्य समझते हैं।
एक और बात यह कि मणि जी शूद्रक के समय को वर्णव्यवस्था के घनीभूत होने के समय के रूप में देख रहे हैं। मुझे लगता है यहाँ संशोधन की आवश्यकता है। जातीय वर्चस्व का सबसे गंदा नाच पिछड़े सौ डेढ़ सौ सालों में हुआ है। इसके पहले सभी जातियों के शासक और विद्वान् होते रहे हैं। यहाँ पर केपी जायसवाल के अंधकार युगीन भारत की चर्चा भी की जा सकती है।