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Home » नफ़ीस आफ़रीदी: फ़क़ीरी मिज़ाज का अफ़सानानिग़ार: अशोक अग्रवाल

नफ़ीस आफ़रीदी: फ़क़ीरी मिज़ाज का अफ़सानानिग़ार: अशोक अग्रवाल

by arun dev
May 9, 2026
in आत्म
Reading Time: 9 mins read
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नफ़ीस आफ़रीदी: फ़क़ीरी मिज़ाज का अफ़सानानिग़ार:  अशोक अग्रवाल
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नफ़ीस आफ़रीदी
फ़क़ीरी मिज़ाज का अफ़सानानिग़ार


अशोक अग्रवाल

 

यह वर्ष 1969 की स्मृति है, उन दिनों मैं एम. ए.  प्रथम वर्ष का छात्र था. शाम के उस समय पिता  बरामदे में अपने कुछ मित्रों और मंझले ताऊजी के बेटे और मेरे बड़े भाई वीरेंद्र भाई साहब के साथ बैठे थे. मैं लान में सबसे दूर अकेला चहलकदमी कर रहा था.

आगंतुक ने गेट के भीतर प्रवेश करते हुए कहा, ‘मेरा नाम नफ़ीस आफ़रीदी है. मैं कोटा राजस्थान से कुछ दिन पहले हापुड़ आया हूँ . क्या अशोक अग्रवाल का घर यही है? यह मेरी पत्नी अफ़रोज़ शाहीन हैं.”

आगंतुक का लंबा कद,गौरवर्ण और नीलिमा लिए कंजी आंखें उसका अफ़ग़ानिस्तान के रहवासियों की किसी पठान कौम से रक्त संबंध का स्पष्ट संकेत दे रही थीं.

नफ़ीस और मैं एक दूसरे के नाम से पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भली-भांति  परिचित थे. यह वह समय था, जब किसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका में प्रकाशित होने के साथ पूरे हिंदी संसार में आपकी पहचान बन जाती. नफ़ीस के द्वारा अपना नाम उच्चरित करने के बावजूद लगा नहीं कि पहली बार मिलना हो रहा है. इस बात की अनुभूति उत्साहवर्धक थी कि हम पहले से ही एक दूसरे की कहानियों के पाठक रहे हैं और हमारे बीच पहले से ही एक मैत्री संबंध पनप चुका था.

नफ़ीस आफ़रीदी, अफ़रोज़ और मैं लान के अलग हिस्से में अमरूद के पेड़ के नीचे रखी कुर्सियों पर बैठकर बातचीत में मशगूल हो गए. नफ़ीस ने बताया कि अफ़रोज़ भी कहानियाँ और कविताएँ लिखती हैं. बरेली से प्रकाशित होने वाली ‘एकांत’ पत्रिका में उसकी कुछ कविताएँ छप चुकी हैं.

अफ़रोज़ के नाम से पूर्व परिचित होने के बावजूद उसे देखना और मिलना पहली दफ़ा हो रहा था.

श्यामनारायण बैजल, एडवोकेट द्वारा संचालित और कहानीकार प्रणवकुमार बंधोपाध्याय द्वारा संपादित ‘एकांत’ पत्रिका मेरे पास नियमित रूप से आती थी.

अफ़रोज़ शहर के प्रसिद्ध दंत चिकित्सक डॉक्टर शब्बीर की बेटी थी. उसके आकर्षण में सुदर्शन नारंग दांतों में तकलीफ़ न होने के बावजूद अक्सर उनके क्लीनिक पहुंच जाया करता. ‘एकांत’ पत्रिका से भी सुदर्शन ने ही अफ़रोज़ का परिचय कराया था. शाहीन उपनाम भी सुदर्शन ने ही रखा था.

‘एकांत’ में अफ़रोज़ और नफ़ीस की कविताएँ नियमित रूप से छपा करतीं. एक ही संप्रदाय के होने के कारण उनके बीच पत्राचार प्रारंभ हुआ, जो धीरे-धीरे प्रेम में परिवर्तित हो गया.

नफ़ीस आफ़रीदी ने अपने पोस्टकार्ड में एक कविता लिख भेजी–

तुम्हारे और मेरे बीच
लंबी दूरी एक समस्या है
हमारी मजबूरी है
यात्राएँ हम खरीद नहीं सकते.

इसे पढ़कर अफ़रोज़ ने सौ रुपए का एक नोट लिफाफे में रखकर नफ़ीस को भिजवा दिया. इसके तीसरे दिन ही नफ़ीस आफ़रीदी का जो आगमन हापुड़ शहर में हुआ, उसके बाद उसका अपना शहर कोटा (राजस्थान) हमेशा के लिए छूट गया और हापुड़ शहर उसकी ज़िंदगी के आख़िरी क्षण तक स्थायी मुकाम बना रहा.

नफ़ीस के जाने के बाद मंझले ताऊजी के पुत्र वीरेंद्र भाईसाहब ने पिता से कहा, ‘अशोक से मिलने जो लड़की आई है, उसकी शहर में अच्छी ख्याति नहीं है.’ पिता ने सिर्फ़ इतना कहा कि ‘यह अशोक का व्यक्तिगत मामला है.’ दरअसल वह ख़ुद शहर के उन अनगिनत छात्रों में एक थे जो अफ़रोज़ के आशिक़ थे. अफ़रोज़ शाहीन अपने आधुनिक पहनावे और खुले स्वभाव के कारण छोटे कस्बे में बहुत जल्दी चर्चा के केंद्र में चली आई थी. कॉलेज के वार्षिकोत्सव में जब वह अपनी सहपाठी विजय आजाद के साथ किसी नृत्य नाटिका की प्रस्तुति के दौरान मंच पर अवतरित होती तो पूरा हॉल शोरगुल और मनचले छात्रों की सीटियों से गूंज उठता. अधिकतर ऐसी स्थिति बनती कि कॉलेज के इस वार्षिकोत्सव के आयोजकों को प्रोग्राम प्रायः रद्द करना पड़ता.

परंपरागत मुस्लिम परिवेश में रहने के बावजूद हिजाब और बुर्के से उसने दूरी बनाए रखी. उम्र के आखिरी पड़ाव में अक्सर हंसते और खिल्ली उड़ाते हुए वह कहा करती,

‘अशोक भैय्या देखो! नियति का कितना बदसूरत मज़ाक है कि जिन दकियानूसी परंपराओं से मैं बचपन से आज तक बची रही, उसी का निर्वाह उसकी संतति कितनी निष्ठा के साथ कर रही है!’

अफ़रोज़ और उसके बड़े भाई ज़मीर के असली वालिद डॉ. शब्बीर के बड़े भाई थे, जो विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए थे. डॉ. शब्बीर ने उनकी परवरिश अपनी संतान की तरह की और स्वयं आजीवन अविवाहित रहे. ज़मीर को कबूतर पालने का शौक़ था. घर के आंगन में ही उन्होंने जालियों वाले एक कबूतरखाने का निर्माण कराया था, जिसमें कई रंग के कबूतर  निवास करते थे. शाम के समय ज़मीर भाई इन कबूतरों को पिंजरे से बाहर निकाल कर आकाश में उड़ाया करते. कुछ समय खुले आसमान में उड़ने के बाद वह ज़मीर भाई के मुंह से निकली लंबी सीटी के स्वर से वापस छत पर लौट आते. जब भी मेरा जाना नफ़ीस के घर होता तो कबूतरों का यह खेल मुझे दिलचस्प लगता.

 

०

हापुड़ में रहते हुए नफ़ीस ने प्राइवेट छात्र के बतौर हिंदी साहित्य में एम. ए. किया. कोठी गेट स्थित गंगाशरण जूनियर हाई स्कूल में नफ़ीस ने मैनेजर के पद पर और अफ़रोज़ ने प्रधानाचार्य के रूप में कार्य प्रारंभ किया.

नफ़ीस आफ़रीदी बहुत जल्दी हापुड़ के सभी कहानीकारों से घुल मिल गया. अपने स्कूल के प्रांगण में माह में एक बार एक गोष्ठी का अवश्य आयोजन करता. कभी किसी लेखक की किताब पर चर्चा तो कभी कहानीकारों द्वारा अपनी नई कहानियाँ का वाचन. कार्यक्रम के उपरांत रसपान और भोजन के साथ संगीत का भी कार्यक्रम होता. नफ़ीस आफ़रीदी अच्छा नर्तक भी था. अपनी उंगलियों को ऊपर नीचे इस प्रकार मरोड़कर दिखाया करता जैसे उनमें हड्डियों का कोई जोड़ नहीं हो. एक ग्रामोफ़ोन और संगीत के कुछ रिकॉर्ड्स का भी प्रबंध करता. संगीत के साथ नफ़ीस का ठुमके लगाते हुए नृत्य सभी मित्रों का ख़ूब मनोरंजन करता. मयपान के साथ वह कई प्रकार के व्यंजनों की भी व्यवस्था करता.

ये बेफिक्री भरे युवा दिन थे, जिनमें अनेक रंग घुले मिले थे. एक दूसरे से लड़ने, झगड़ने और रूठने मनाने के दिन थे. प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या के साथ-साथ स्वच्छ पारदर्शी जल में छलछलाते मौहब्बत से लबरेज दिन थे. सपने देखने और दिखाने के दिन थे. इसमें सभी ऋतुओं और उत्सवों का सहज संगम था. ईद, दीपावली और होली के उत्सव में सभी मित्रों का सम्मिलन अनिवार्य होता. जिस किसी की अनुपस्थिति होती उसी के घर शेष सभी मित्र अपनी दस्तक देने पहुंच जाते. शर्मिंदा होते हुए उसे विशेष आवभगत का भी आयोजन करना होता.

इसी गंगाशरण जूनियर हाई स्कूल के प्रांगण में किसी रविवार के दिन नफ़ीस आफ़रीदी के उपन्यास ‘वायदा ख़िलाफ़’ पर एक अविस्मरणीय गोष्ठी का आयोजन सुप्रसिद्ध जनवादी लेखक सव्यसाची की अध्यक्षता में संपन्न हुआ. इसमें बाहर से आने वाले महत्त्वपूर्ण लेखकों में डॉक्टर कर्णसिंह चौहान और सुधीश पचौरी के नाम आज भी याद आते हैं.

 

०

नफ़ीस नैसर्गिक प्रतिभा का धनी था. चाहे वह प्लेटफ़ार्म की बेंच पर बैठा हो अथवा ट्रेन का सफ़र कर रहा हो, उसके लिखने में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होता था.

वर्ष 1974 का कोई दिन रहा होगा. हापुड़ के टाउन हॉल में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण को सुनने के लिए भारी संख्या में भीड़ एकत्रित हुई थी. पीछे की कतार में घास पर बैठे हुए नफ़ीस को वाजपेयीजी के भाषण सुनने के साथ-साथ झोले में रखे रजिस्टर को बाहर निकाल नई कहानी लिखते देख मुझे अत्यंत विस्मय हुआ. वह उन लेखकों में था, जिनके लिए लिखना सांस लेने जैसी सहज और स्वाभाविक क्रिया थी. न लिखने के लिए उसे कभी किसी बहाने का सहारा नहीं लेना पड़ा.

अपनी इसी व्यस्त जिंदगी के दौरान उसने ‘मुस्लिम लेखकों के कथा साहित्य में सामाजिक दृष्टि’ विषय पर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से डॉक्टर तिलक सिंह के निर्देशन में अपना शोध कार्य संपन्न किया. कुछ दिनों तक वह बेहद शान से अपने नाम के आगे डॉक्टर शब्द लगाता रहा, फिर स्वयं ही उसकी व्यर्थता समझ अपने रचनात्मक लेखन से डॉक्टर शब्द को दूर कर दिया.

 

 

०

सरकारी वित्तीय मदद प्राप्त स्कूल की सूची में सम्मिलित होने के साथ गंगाशरण जूनियर हाई स्कूल की स्वायत्तता जाती रही. उत्तर प्रदेश सरकार के जिला शिक्षा अधिकारी का हस्ताक्षेप बढ़ता चला गया. सबसे पहले उन्होंने मैनेजर पद पर नियुक्त नफ़ीस आफ़रीदी की सेवाएँ गैर जरूरी बताते हुए समाप्त कर दी और अफ़रोज़ के प्रधानाचार्य पद को सामान्य अध्यापक के रूप में मान्यता देते हुए उस स्कूल में कार्यरत एक जूनियर अध्यापक को प्रधानाचार्य के पद पर नियुक्त कर दिया. अफ़रोज़ को यह अपमानजनक और कानून के विरुद्ध लगा. अध्यापक पद पर कार्य करने से उसने इंकार कर दिया और कानूनी लड़ाई के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट चली गई.

नफ़ीस ने कई कॉलेजों में प्रवक्ता के पद के लिए आवेदन करना प्रारंभ किया. मुज़फ्फ़रनगर के पास के किसी कस्बे के एक कॉलेज में उसका चयन भी हो गया, जो बाद में संचालन समिति के अल्पसंख्यक विरोधी होने के कारण उसे वहाँ नियुक्ति नहीं मिली. भोपाल स्थित हमीदिया कॉलेज में हिंदी के अध्यापक के पद पर उसकी नियुक्ति हो गई. यह संभवतः उसके जीवन की  सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी, जो उसे आर्थिक सुरक्षा देने के साथ साहित्य और कला की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध भोपाल शहर में रचनात्मक दृष्टि से उसे नए अवसर भी उपलब्ध कराने में मददगार  होती. अफ़रोज़ किसी भी सूरत में हापुड़ शहर छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुई और नफ़ीस प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थिति में भी अफ़रोज़ के बिना किसी दूसरे शहर में रहने की कल्पना नहीं कर सकता था. हमीदिया कॉलेज में नियुक्ति का पत्र डस्टबिन में फेंक दिया गया.

आखिरकार जी.टी. रोड स्थित हिंद पॉकेट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड में नफ़ीस आफ़रीदी ने मुख्य संपादक के बतौर कार्य प्रारंभ किया. नफ़ीस का मूल स्वभाव था, जिस कार्य को भी वह हाथ में लेता उसमें पूरी निष्ठा और श्रम के साथ अपने को खपा देता. वह समय का नहीं, समय ही उसका पीछा करता. हिन्द पॉकेट बुक्स के संचालक दीनानाथ मेहरोत्रा उसका गहरा सम्मान करते. बीच-बीच में कुछ दिन का अंतराल आता जब उसकी हिंद पॉकेट बुक्स से विदाई भी होती, लेकिन कुछ दिनों बाद ही दीनानाथ जी का उसे बुलावा आ जाता और वह सारे गिले शिकवा भुलाकर वापस इस संस्था में चला आता. बरसों तक हिन्द पाकेट बुक्स  प्राइवेट लिमिटेड में मुख्य संपादक के पद पर कार्य करते हुए नफ़ीस अफरीदी ने विश्व कथा साहित्य, विश्व चिंतन, प्रेमचंद रचनावली और रवीद्र ग्रंथावली के अंतर्गत लगभग 75 पुस्तकों का संपादन किया.

 

 

०
नफ़ीस समय का पाबंद था और सुबह 7:00 बजे हापुड़ से दिल्ली जाने वाली शटल ट्रेन से साहिबाबाद तक की यात्रा करता. कंधे से लटके झोले में हिंदी के कई दैनिक समाचार पत्रों के साथ बहुत सी पत्रिकाएँ भी रखी होतीं. हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तकों के प्रचार लिए वही जनसंपर्क का भी निर्वाह करता.

उन दिनों प्रकाशन के कार्य से मेरा भी शाहदरा जाना अक्सर होता. शटल छूटने से 15 मिनट पहले वह खिड़की के पास वाली सीट पर कब्जा जमा लेता और सामने वाली खिड़की के पास की सीट पर मेरे लिए जगह सुरक्षित करने के लिए अपना झोला रख देता. प्लेटफ़ार्म पर मुझे देखते ही वह खिड़की से आवाज़ लगाता.

लंबे समय तक वह मात्र 12000 से 15000 तक के वेतन पर हिन्द पॉकेट बुक्स में संपादक के पद पर कार्य करता रहा. उसके संपर्क दिल्ली से निकलने वाले सभी समाचारपत्रों के संपादकों से बहुत अच्छे रहे. ख़ुद भी वह एक अच्छे कहानीकार के रूप में जाना जाता. मित्रों के दबाव के बावजूद उसने अन्यत्र किसी संस्था में जाने का कोई प्रयास नहीं किया, जबकि उसके कई मित्र हरीश पाठक, धीरेंद्र अस्थाना आदि बेहतर मौका उपलब्ध होते ही उसे लपकते ऊंचे पायदान पर चढ़ते गए. नफ़ीस चाहता तो आसानी से अपने लिए बेहतर जगह तलाश लेता.

जब कभी मैं उससे किसी बड़े समाचार समूह या दूरदर्शन से जुड़ने की बात करता तो उसका सीधा-सादा उत्तर होता, ‘मेरी तो फ़ितरत ही ऐसी है कि जहाँ बैठ गया वहीं बैठा रह गया. वहाँ की मिट्टी मुझसे छूटती ही नहीं.’  कोटा से हापुड़ आया तो हापुड़ का ही हो गया. अफ़रोज़ से जुड़ा तो वही मेरा आखिरी मुकाम बन गया. जीवन जीने के लिए जितना अनिवार्य है, उतना भर मिल जाए, उससे अधिक कुछ नहीं. उसका इस तरह का निस्पृह जीवन किसी सूफी फ़कीर का आभास देता.

शेखर मलहोत्रा के स्वामित्व में जब हिंद पॉकेट बुक्स जोरबाग़ कॉलोनी में चला आया तो उन्होंने नफ़ीस आफ़रीदी को भी अपने पास बुला लिया. कुछ वर्ष बाद नोएडा में भी उन्होंने एक शाखा खोली जिसका उत्तरदायित्व नफ़ीस आफ़रीदी को ही सौंपा. एक बार दिल्ली से लौटते हुए प्लेटफ़ार्म पर नफ़ीस का पैर फिसल गया और कूल्हे की हड्डी दुर्घटनाग्रस्त होने के साथ उसका दिल्ली जाना और हिंद पॉकेट बुक्स हमेशा के लिए छूट गया.

 

 

०
सुबह की सैर के समय रेलवे प्लेटफ़ार्म पर कभी-कभी संगम एक्सप्रेस की किसी अनारक्षित बोगी से उतरते हुए अफ़रोज़ दिखाई दे जाती. मेरे पूछने पर उसका यही उत्तर होता, ‘अशोक भैय्या बस अगली तारीख़ पर मेरे पक्ष में निर्णय आ जाएगा.’  शरीर से वह थोड़ी स्थूल और अधिक सांवली दिखाई देने लगी थी. चेहरे पर थकान भी. टी स्टॉल पर खड़े चाय पीते हुए कुछ देर बातें करने के बाद हम एक दूसरे से विदा लेते.

जब अफ़रोज़ सामान्य प्राध्यापक के पद पर भी कार्य करने के लिए तैयार हो गई तो जिला शिक्षा अधिकारी ने उससे यह कहकर कि पहले कोर्ट से अपना केस वापस लो, तभी कुछ निर्णय हो पाएगा, उसके आवेदन को खारिज़ कर दिया. बरस दर बरस बीत गए और वह तारीख अफ़रोज़ के जीवन में कभी नहीं आई.

 

 

०
कहानी लिखने के लिए नफ़ीस के पास न तो समय की कोई कमी थी और न ही कहानी के लिए जरूरी विषयों और पात्रों की. चरित्र और घटनाएँ हवा में उसके इर्दगिर्द घूमते रहते और किसी भी समय उसका सृजन प्रारंभ हो जाता. उसकी कहानियाँ जीवन और जगत के वे किस्से हैं जो हमारे चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं. उसकी अधिकांश कहानियाँ निम्न श्रेणी के जीवन को जीते मुस्लिम परिवेश की कहानियाँ हैं. किस्सागोई उसकी कहानियों की पहली शर्त थी. पात्रों की नैसर्गिक बातचीत को उन्हीं की बोली में बयाँ करना लेखक की विशेषता है. नमूने के तौर पर उनकी एक कहानी ‘अर्द्धविराम’ का यह छोटा सा अंश देखा जा सकता है—

‘उस रात जनता एक्सप्रेस की सवारियाँ छोड़कर करीम लौटा तो बेहद थक गया था. भूख भी तेज लग आई थी. पलौथी मार बोरिए पर बैठकर उसने मरियम से रोटी मांगी थी.

मरियम झपटती हुई कोठरी से निकली थी और दालन के खंभे से टिक कर हाथ नचाती हुई चीख़ने लगी, मेरे से काहे को रोटी मांगे हैगा, कलमुंहे,मांग उस जवान जौधा सौत से, जिसे मेरी छाती पे मूंग दलने छोड़ रखा हैगा.हाय, इस करमजले को लाज सरम नईं आई जो अधेड़ापे में उठा लाया पराई जनी को.’

यही भाषा की प्रवाहमयता नफ़ीस की कहानियों को जीवंत बनाती है. ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘सारिका’, ‘इंडिया टुडे’, ‘नई कहानियाँ’ आदि सुप्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रकाशित होकर बहुचर्चित हुईं और पाठकों का ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित किया. धर्मवीर भारती, राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी और नागार्जुन जैसे लेखक उसकी किस्सागोई और अपने निम्न वर्गीय परिवेश को जीवंतता से उकेरने के हुनर के मुरीद थे.

अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में नफ़ीस आफ़रीदी का कहना है—

‘मुझे पसंद है यह खेल, जिसमें मैं ख़ुद शिकारी होता हूँ और ख़ुद ही छटपटाता, लहू उगलता शिकार. शिकारी होकर समयगत सच्चाइयों की चीरफाड़ करता हूँ और ख़ुद अपना शिकार बनकर आदमी की तकलीफ़ के करीब पहुंचता हूँ.’

 

 

०
नफ़ीस आफ़रीदी का जीवन पारिवारिक और आर्थिक विडम्बनाओं से भरा था. कहानी लेखन उसका पैशन और जीवन की पहली प्राथमिकता होने के बावजूद अर्थोपार्जन का भी माध्यम था. एक कहानी को एक ही सिटिंग में पूरा करना उसका स्वभाव बन गया था. एक ही कहानी पर बार-बार काम करना और उसका परिमार्जन करने के लिए उसके पास अवकाश नहीं था. दिन के 12 घंटे उसकी नौकरी में जाया हो जाते. जो समय शेष रहता उसका भी अधिकांश दूसरों के लिए लेखन और संपादन करने में निकल जाता. वह अपनी कहानियाँ उन्हीं पत्रिकाओं को भेजना पसंद करता, जहाँ से उसे अच्छे पारिश्रमिक की आशा होती. लेखन के प्रति उसकी इस लापरवाही या उन पर बार-बार काम करने की आदत न होने के कारण उसकी बहुत सी कहानियों की भ्रूण हत्या हो गई, जिनमें उसकी अविस्मरणीय कहानियाँ बनने की प्रबल संभावनाएँ छिपी थीं.

 

 

०
शहीद सुखदेव के छोटे भाई मथरादास थापर इंडियन कोल्ड स्टोरेज में इंजीनियर होने के साथ नारंग परिवार द्वारा संचालित समिट इंडस्ट्रीज में भी पार्टनर थे. वह हमेशा इस बात से क्षुब्ध रहा करते कि शहीद भगत सिंह की तुलना में उनके भाई की शहादत को नजरअंदाज कर दिया गया था. वह अपने भाई शहीद सुखदेव के जीवन और उनकी शहादत पर किताब लिखना चाहते थे. स्वयं उनमें लिखने की कोई प्रतिभा नहीं थी. उनकी समस्या का समाधान सुदर्शन के माध्यम से नफ़ीस आफ़रीदी द्वारा संपन्न हुआ.

मात्र दो हजार के पारिश्रमिक पर नफ़ीस ने ख़ुशी के साथ यह लेखन प्रारंभ किया. मथरादास थापर इंडियन कोल्ड स्टोरेज की छत पर बने दो कमरों के घर में रहा करते. कमरों के बाहर का बरामदा लोहे की जलियाँ से घिरा था, खुली छत पर बड़ी तादाद में बंदर उधम मचाते रहते. शहीद सुखदेव और उसके क्रांतिकारी साथियों के समय को जानने की जिज्ञासा मुझे भी नफ़ीस के साथ कई बार उनके घर ले गई. व्हिस्की पीते हुए मथरादास थापर की जुबानी भगत सिंह और उनके मित्रों के अंतरंग संस्मरण रोमांचित करने के साथ उन शहीदों के पारस्परिक प्रतिस्पर्धा और गहरे सौहार्द को भी अभिव्यक्त करते. मथरादास थापर निःसंतान थे और एक संबंधी की लड़की को अपनी दत्तक पुत्री के रूप में ग्रहण कर लिया था. आखिरी दिनों में समिट इंडस्ट्री से उनकी हिस्सेदारी समाप्त कर दी गई थी और वह वृद्धावस्था में हापुड़ शहर को छोड़कर अपनी दत्तक पुत्री के घर लुधियाना चले गए.

नफ़ीस ने पूरे एक वर्ष उस पुस्तक पर परिश्रम किया और लगभग 200 पृष्ठ की पांडुलिपि ‘मेरे भाई शहीद सुखदेव’ नाम से न सिर्फ़ तैयार की, बल्कि व्यक्तिगत प्रयास से दिल्ली के निधि प्रकाशन से उसे प्रकाशित भी करवाया और एडवांस के रूप में दो हजार रुपए भी थापर साहब को दिलवाये. मथरादास थापर ने जब यह राशि नफ़ीस को पेशकश की तो उसने यह कहते हुए स्पष्ट इनकार कर दिया कि मैं अपना पारिश्रमिक आपसे पहले ही वसूल कर चुका हूँ. इस किताब को लिखने में जिस आंतरिक आनंद की अनुभूति मैंने महसूस की वह दुर्लभ है. इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि किताब पर किसका नाम लेखक के रूप में छपा है!

शहर के कई यशपिपासु लेखकों की रचनाओं और पांडुलिपियों का संपादन, संशोधन, यहाँ तक कि पुनर्लेखन तक का कार्य वह मित्रतावश अथवा नाममात्र के पारिश्रमिक पर कर देता. मेरे उलाहना देने और यह कहने पर कि ऐसा कर तुम श्रमजीवी लेखकों को लज्जित करने के साथ उनके हक़ का हनन कर रहे हो. वह मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना कहता, ‘क्या करूं अशोक, मेरी फितरत ही ऐसी है कि तत्कालीन जरूरत से अधिक मुझसे मांगा ही नहीं जाता.’

एक कटु अनुभव का स्मरण करते उसे वह निःसंकोच अपने मित्रों से साझा भी करता. दिल्ली के एक प्रकाशक ने उसके द्वारा संपादित ‘मुस्लिम परिवेश की कहानियाँ’ का प्रकाशन किया था. उसे अपने घर कोटा जाने के लिए कुछ रूपयों की ज़रूरत आन पड़ी. वह उस प्रकाशक के दरियागंज स्थित उसके दफ़्तर गया और अपनी रॉयल्टी की मांग की. उसके इनकार करने पर उसने जिद्द पकड़ ली कि वह बिना रायल्टी लिए उसके दफ़्तर से नहीं जाएगा. दफ़्तर के बंद करने का समय हो आया. प्रकाशक ने उससे यह कहते हुए, ‘आप यहीं आराम करें’ दफ़्तर का शटर गिरा दिया. अपने को बंद देख वह घबरा गया और जोर-जोर से शटर को थपथपाते हुए रोने चिल्लाने लगा. प्रकाशक को शटर खोलना पड़ा. शटर खुलने के बाद वह चुपचाप बाहर निकल आया. इतना अपमानित उसने जीवन में इससे पूर्व कभी नहीं किया था.

 

 

०
बातचीत करते-करते वह यकायक उत्तेजित होकर जोर-जोर से बोलने लगता. उसकी बात के विरोध या समर्थन में कुछ न बोलकर चुप्पी साधने से वह और अधिक उत्तेजित हो जाता. यहाँ तक कि उसकी आंखें डबडबा आतीं. अपने प्रेम या आक्रोश को अभिव्यक्त करने का एकमात्र उपाय उसके लिए उन मित्रों पर कविताएँ या कहानी लिखना होता. नागार्जुन और अमितेश्वर से संबंधित संस्मरणों में मैं उसके इस व्यक्तित्व पर विस्तार से लिख चुका हूँ. उन्हें लिखना उनकी पुनरावृति होगी.

अपने विषय में नफ़ीस ने जो कुछ लिखा है उसकी कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं, जो उसके आंतरिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करते हैं—

‘मेरे भीतर लावे होते हैं और आंखों की दहलीज पर पानी की लरजती हुई असंख्य बूंदें. बहुत गर्म मिज़ाज हूँ और बर्फ़ की मानिंद ठण्डा भी. मेरे लड़ाकू तेवरों ने बहुत लोगों को मुझसे नाराज कराया है. मेरी डबडबाई आंखों के सवाल खाली गए हैं और प्रतिदान में महज दीर्घ चुप्पी मिली है. भीतर के लावे और आंखों के पिघलने का एक रिश्ता है.’

 

०
अफ़ग़ानिस्तान के दर्रों से निकलकर नफ़ीस आफ़रीदी के पुरखे राजस्थान के कोटा शहर में बस गए थे. अपने दादा, पिता और चाचा के बारे में नफ़ीस दिलचस्प किस्से बयान करता. हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि श्री बशीर अहमद मयूख उसके सगे चाचा हैं. लगभग सौ वर्ष की आयु को छू रहे मयूख जी को हिंदी संसार उनके द्वारा ऋग्वेद की ऋचाओं के लयबद्ध हिंदी अनुवादों के माध्यम से भली-भांति परिचित है. उनकी भाषा उर्दू और फारसी थी, जबकि हिन्दी और संस्कृत भाषा को उन्होंने अपने श्रमसाध्य अध्ययन से अर्जित किया था. उन्हें पद्मश्री, बिहारी पुरस्कार के अलावा कई पुरस्कार मिले हैं. भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा उनके कई संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं.

एक बार मयूखजी का आगमन हापुड़ हुआ, उन दिनों वह रेल मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य थे. उनसे मिलवाने नफ़ीस उन्हें मेरे घर लाया और उनके साथ दिल्ली जाना. उनके ठहरने की व्यवस्था रेल मंत्रालय द्वारा की गई थी. नई दिल्ली स्टेशन पर अलग से विराजमान एक वातानुकूलित कोच में उन्होंने अपने साथ हमें भी ठहराया और देर तक व्यक्तिगत चर्चा करते रहे. मयूख साहब के केंद्र और प्रदेश की सरकारों में पदस्थ मंत्रियों और अधिकारियों से निजी संपर्क थे, लेकिन नफ़ीस आफ़रीदी ने कभी उनका लाभ नहीं उठाया. नफ़ीस ने बताया कि उसके मयूख चाचाजी ने कोटा में मयूरेश्वर नाम से एक शिव मंदिर का निर्माण भी कराया है, जिसमें प्रत्येक दिन विधि विधान से पूजा अर्चन होता है.

छह भाई बहनों में नफ़ीस सबसे बड़ा था. कोटा में रह रहा उसका छोटा भाई सलीम आफ़रीदी भी शायरी लिखता है. ‘परिंदों का बसेरा’ शीर्षक से उसकी ग़ज़लों की एक किताब हिंदी में प्रकाशित हो चुकी है. नफ़ीस से छोटी चार बहने हैं जिनके बीच वह ‘अच्छे भाई’ संबोधन से जाना जाता है.

हापुड़ आने के कुछ वर्ष बाद वह अपनी दो छोटी बहनों के साथ हमारे परिवार से मिलवाने के लिए घर आया. लंबे कद, गौरवर्ण और आंखों के रंग से उनके वंशजों के मूलस्थान अफ़ग़ानिस्तान के साथ उनके अनुवांशिक जीवन को आसानी से जोड़ा जा सकता था. आजीवन अपनी बहनों के साथ नफ़ीस के मधुर संबंध रहे.

कोटा में रहने वाली उसकी एक छोटी बहन के पति सांप्रदायिक दंगों में गोली का शिकार हो इस दुनिया से जाते रहे थे. यह  हृदय विदारक घटना थी, जिसका जब भी नफ़ीस ज़िक्र करता, उसकी आंखें भर आतीं.

 

०
कूल्हे की हड्डी के ऑपरेशन के बावजूद वह छड़ी के साथ हिन्द पाकेट बुक्स के कार्यालय जाता रहा. नमिता गोखले के द्वारा हिंद पॉकेट बुक्स के अधिग्रहण के बाद उसका हिंद पॉकेट बुक्स से संबंध विच्छेद हो गया.

वर्ष 2016 से उसका आगमन अभिषेक के पास  संभावना प्रकाशन में शुरू हुआ. अभिषेक के दफ्तर जाने से पहले वह मेरे पास कुछ देर के लिए बैठता और दिमाग में भरी सभी शिकायतें, जिसके केंद्र में अफ़रोज़ होती, बेबाक भाषा में अपना तमाम आक्रोश और शिकायतें बयान करते हुए कहता कि इस औरत के कारण उसकी ज़िंदगी दोजख बन गई है. बात-बात पर उससे लड़ती रहती है और उसे भी चुप्प नहीं रहने देती. कुछ क्षण बाद ही वह अफ़रोज़ की मर्माहत करने वाली मनःस्थिति और शारीरिक लाचारी का ज़िक्र करते हुए भावुक भी हो आता.

शुगर की समस्या से ग्रस्त होने के साथ गठिया के दर्द के कारण अफ़रोज़ का चारपाई से उठना भी मुश्किल हो चला था. इकलौता बेटा राजा अलग घर में रहता था. दोपहर का भोजन उसी का कोई पोता उनके पास पहुंचा देता. यह उस पति का लाचार रुदन होता, जिससे वह बेइंतहा प्यार करता था. टमाटर की चटनी के साथ दो ब्रेड के पीस खाने के बाद ब्लड प्रेशर की दवाई लेने के बाद अभिषेक के कार्यालय चला जाता. वहीं कभी-कभी सुदर्शन भी मेरी उपस्थिति में चला आता. उस समय कुछ देर के लिए पुराने दिनों की वापसी का भ्रम होता. शाम के समय घर लौटते हुए वह अफ़रोज़ के लिए बिस्कुट और नमकीन के पैकेट साथ ले जाना न भूलता.

 

०
नफ़ीस और अफ़रोज़ की दो संतानें थीं. दोनों हंसकर कहा करते कि उनकी मां ने कभी बुर्का नहीं पहना लेकिन उनका लड़का राजा अपनी बीवी की ख़ूबसूरती से इतना डरता है कि उसे हमेशा बुर्के में रखता है. उन दोनों की नापसंदगी के बावजूद राजा ने अपने दो बेटों को मदरसे में पढ़ने के लिए भेजा. चार पोतों में एक पोता कामरान ही इंजीनियरिंग का डिप्लोमा ले पाया. सबसे अधिक दुखी वह उस दिन हुआ जब उसके एक पोते ने कुछ रूपयों के लिए उसकी अलमारी में रखी किताबें तक रद्दी वाले को बेच दीं. इन किताबों में नफ़ीस की ख़ुद की लिखी किताबें भी थीं और कुछ की तो मात्र एक प्रति ही, जिसे संजोकर उसने रखी थी. कुछ किताबें ऐसी थीं, जिनके प्रकाशक ही अपना धंधा बंद कर चुके थे.

नफ़ीस और अफ़रोज़ की बेटी गुड़िया का जीवन भी विडंबनाओं से भरा रहा. पारिवारिक रिश्तेदारी के चलते गुड़िया का विवाह जिस लड़के से हुआ वह दिल्ली में ऑटो चालक था. साथ ही मादक पदार्थों का व्यसनी भी. इसके बावजूद गुड़िया ने अपनी तीन लड़कियों को दिल्ली में ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई करवाई और उन्हें कंप्यूटर की शिक्षा भी दिलवाई. नफ़ीस अपनी बेटी और नातिनों के प्रति बेहद संवेदनशील रहा.

आखिरी कुछ सालों में उसके जीवन में ख़ुशी के कुछ पल उस समय आए जब उसे पता चला कि कोटा स्थित उसके पुरखों की ज़मीन जायदाद, कृषि भूमि और चालीस के लगभग दुकानों का स्वामित्व राजस्थान हाई कोर्ट द्वारा उनके परिवार के हक़ में कर दिया गया है. नफ़ीस के अनुसार इनका मूल्य कई सौ करोड़ रुपए था और हाई कोर्ट के निर्देशानुसार उसके सभी भाई बहनों के नाम पंजीकृत किए जा रहे थे. मेरे यह कहने पर भी कि यह दीवानी से जुड़ा मामला है और जो बरसों बरस चलता रहता है. उसका यही कहना होता कि उसकी मंझली बहन, जो उस मुकदमे की सारी कार्रवाई अंजाम दे रही है, का कहना है कि अधिक से अधिक एक साल लगेगा.

नफ़ीस सपना पाले था कि उसके हिस्से में कम से कम 50 करोड़ रुपए अवश्य आएँगे और वह दिल्ली में सबसे पहले गुड़िया के लिए उसका घर खरीदेगा जिसकी पूरी जिंदगी किराए के घर में जिल्लत उठाते हुए गुज़री है. हापुड़ के मुख्य बाजार में आफ़रीदी एँड सन्स के नाम से रेडीमेड गारमेंट्स का विशाल शोरूम खोलेगा. अभिषेक से कहता कि तुम्हें भी इतना पर्याप्त पैसा दूंगा कि भविष्य में अच्छी किताबें छापने में किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़े. अफ़रोज़ के लिए एक नर्स की व्यवस्था करूंगा जो 24 घंटे उसकी देखभाल में लगी रहेगी.

वर्ष 2019 के किसी दिन अफ़रोज़ शाहीन सोते हुए इस दुनिया से विदा हो गई. जब मैंने नफ़ीस को फ़ोन कर जनाज़ा उठने के समय के बारे में दरियाफ़्त की तो उसने कहा,

‘क़ब्रिस्तान का रास्ता काफी ख़राब है. सड़क टूटी फूटी और कई जगह फिसलने वाली दलदल है. तुम स्वयं छड़ी का सहारा लेकर चल रहे हो. अपने को मुसीबत में बिल्कुल नहीं डालना, अभिषेक से कहना कि अकेला वह ही आ जायेगा.’

 

०
वास्तविकता तो यह थी कि अफ़रोज़ की विदाई के साथ ही नफ़ीस की जिजीविषा जाती रही. उससे फ़ोन पर संपर्क भी इकतरफा रह गया. उसने संभावना प्रकाशन आना बंद कर दिया था. एक विचित्र प्रकार की निस्पृहता का भाव उसके भीतर जन्म ले चुका था. मैं जब कहता कि बचाव का रास्ता सिर्फ़ उसके लिखते रहना है. वह मेरी बात को स्वीकार कर मुझे भरोसा दिलाता कि वह जल्दी ही कुछ लिखना प्रारंभ कर देगा. उसके मस्तिष्क के कबड़खाने में असंख्य चेहरे, चरित्र और घटनाएँ भरी पड़ी हैं. कुछ दिन बाद मैं जब फ़ोन करता तो वह विवशता से कहता कि ‘क्या करूं अशोक, काग़ज़ छूने को ही मन नहीं करता.’ अफ़रोज़ के जाने के बाद जिसके जीवित रहते वह हमेशा शिकायतों से भरा रहता, अब एक ऐसे स्थाई शून्य का शिकार हो गया था, जिससे निकलने की कोई राह उसे नहीं सूझ रही थी.

नफ़ीस का यह सपना उसके जीते जी पूरा न हो सका. उसके इस सपने को विरासत के रूप में उसके बेटे राजा ने देखना प्रारंभ कर दिया है.

 

०
20 जनवरी 2023 को आकस्मिक रूप से चाय बनाते हुए मैं बेहोश होकर रसोईघर में गिर गया. चार महीने तक कामा की स्थिति में रहने के बाद होश आया. बिस्तर पर टिके धीरे-धीरे दैनिक दिनचर्या की ओर लौटा.

23 जनवरी 2024 के दिन फेसबुक पर अभिषेक की पोस्ट देख जानकारी मिली कि नफ़ीस आफ़रीदी ने सभी मित्रों को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है.

कुछ देर बाद अभिषेक आया तो उसने जानकारी दी कि पिछली रात ही नफ़ीस आफ़रीदी ने उसकी और अजय गोयल की उपस्थिति में अंतिम सांस ली. मुझे उसने इसलिए सूचित नहीं किया कि कहीं यह सूचना मुझे रात्रि भर के लिए उद्वेलित न कर दे. वह उनके जनाज़े के साथ उन्हें सुपुर्देख़ाक करने जा रहा है.

नफ़ीस आफ़रीदी को पिछले एक माह से श्वांस लेने में दिक़्क़त आ रही थी. मोहल्ले के किसी डॉक्टर से उनका इलाज चल रहा था. पिछली रात आकस्मिक रूप से उनकी सांस लेने की गति धीमी होती चली गई और उसी बेहोशी में उनका निधन हो गया.

अपने पुरखों की तरह जो अफ़ग़ानिस्तान के दर्रों से निकलकर राजस्थान के कोटा में बसे थे, नफ़ीस भी अपने प्रेम के चलते कोटा से निकल कर 20 वर्ष की युवा उम्र में हापुड़ आया और फिर एक दिन उसी की ज़मीन में सुपुर्देख़ाक हो गया.

वर्ष 1968 में  हापुड़ शहर में कहानीकारों की जो मंडली बनी थी, नफ़ीस के निधन के साथ मंडली की आखिरी कड़ी भी टूट गई.

 

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नफ़ीस सांप्रदायिकता के विरुद्ध न सिर्फ़ खुलकर बोलता था, बल्कि उसके लेखन में इसकी गूंज एक-एक शब्द में सुनाई देती है. कहानी संग्रह ‘दूसरी दुनिया’ की भूमिका में वह बेहद तकलीफ़ के साथ लिखता है–

‘यह कैसी दुनिया है, जिसे ज्यादातर लोग क़रीब से नहीं जानते. दूर-दूर से सिर्फ़ नाम सुना है, पर उसकी ज़िंदगी की सच्ची तस्वीरों को नहीं देखा. उन्हें एक पहचान दे दी गई है– मुसलमान!  लेकिन रोज रोज जीते और फिर मर जाते हुए इन लोगों की तकलीफों भरी दुनिया का कोई पुरसाने हाल नहीं. जहाँ औरतें कैद हैं और गुलामी का तौक ढो रही हैं , जहाँ ग़रीबी गिजबिजा रही है, जहाँ नस्ल के नाम पर आदमी के वजूद को ही नकार दिया जाता है, जहाँ बचपन जवानियाँ देखे बिना बुढ़ापे में तब्दील हो जाते हैं, जिनकी हसरतों को घुन लग गए हैं, जिनकी बेचारगी और बेबसी को इस्तेमाल करने वाली ताकतें  उन्हें इस्तेमाल कर रही हैं और बदले में उन्हें जहालत और अंधेरे बांट रही है ऐसी दुनिया की हकीकत से रूबरू कराती हैं ये कहानियाँ.’

‘ये कहानियाँ साफ़-साफ़ जायजा लेती हैं और इशारा करती है कि जिस क़ौम को ‘ मुसलमान’ नाम से उछाला जा रहा है, दरअसल हम उसे जानते ही नहीं. ये असंख्य इंसान की अपनी रोजी-रोटी और रोजमर्रा की आफ़तों से जूझते हुए सोच ही नहीं पाते कि उनकी एक खास पहचान बताई जाती है, चीखी, चिल्लाई जाती है. वे सिरे से बेखबर है. उन्हें दिन दुनिया की भी खबर नहीं. तब वे कैसे जाने कि उनके साथ कितना बड़ा इंसानी ज़ुल्म किया जा रहा है. दो वक्त की रोटी को मोहताज कमेरा सियासत की फरेबों और लफ्फाजियों को क्या समझे?’

‘उस दुनिया को बहुत बड़ी दुनिया ने नहीं देखा. इस दुनिया की सच्ची तस्वीरें को अपने समूचेपन में दिखाने का प्रयास हैं ये कहानियाँ.’

नफीस आफरीदी का समूचा लेखन मुस्लिम निम्नवर्गीय परिवेश को समूचे  नंगेपन से अभिव्यक्त करता एक ऐसा आईना है जिसमें आप अपने इर्द-गिर्द के बदरंग और कुरूप चेहरों की पहचान आसानी से कर सकते हैं.

लेखक का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि जिन ताकतों के विरुद्ध वह जिंदगी भर लड़ाइयाँ लड़ता रहा, उसी वास्तविक ज़िंदगी में निरंतर पराजित होने की यातना जीवन के आखिरी क्षणों तक झेलता रहा.

अपने लेखन के विषय और लेखन प्रक्रिया के बारे में विस्तार से उसने लिखा, वह दृष्टव्य है –

‘दरअसल सारा जीवन समस्याओं का घर है. कुछ न कुछ लगा ही रहता है. पीछा छूटता ही नहीं. तमाम उम्र उनसे जूझते रहो, संघर्ष करते रहो, यही नियति है, लेकिन यह सोच तो निराशावादी है. हाँ, है तो सही, क्योंकि यहाँ मैंने समस्याओं की निरंतरता का एकतरफा बखान कर दिया है. समाधान की बात ही नहीं कही है, जो अनिवार्य है.’

‘मेरा मानना है की समस्या के बिना कोई साहित्य नहीं रचा जाता. जीवन और जगत की तमाम समस्याओं, उलझनों, संकटों, और संघर्षों को हम साहित्य में परिघटित होते देखते हैं. यही से शुरू होता है समाधान का सिलसिला. निर्माण की नींव रखी जाती है और इमारत बुलन्द होती चली जाती हैं,  यदि समस्याएँ न हों तो साहित्य की जरूरत ही क्या होगी, किसके लिए होगी. इसके बिना तो मुर्दे की कल्पना ही की जा सकती है और जहाँ मुर्दापन हो, वहाँ साहित्य नहीं होता और जिस साहित्यिक रचना के द्वारा विश्वास ही न जगाया जा सके, वह साहित्य कल्याणकारी नहीं होता.’

‘सभी लेखक अपनी रचनाओं में समस्याएँ उठाते हैं, उनके समाधान भी बताते हैं. सृजनात्मक लेखन में यही सब होता है. यह प्रक्रिया है जीवन जीने की, उसे समझने और पार लगाने की. मेरी अपनी रचनाएँ भी इसी प्रक्रिया से गुज़रती हैं. मैं दबे- घुटे, पल- पल जीते और दिन- रात मरते, खांसते- कांखते, आठ- आठ आंसू रोते आदमी का प्रबल पक्षधर हूँ . मैंने मानवीय अस्मिता और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लिखा है. विकृतियों और विसंगतियों पर प्रहार किया है. टूटे बिखरे घरों को खड़ा करने, खुरदुरे, अलगाव भरे रिश्तों को फिर से जोड़ने और बदहवास दुनिया की दौड़ में अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हुए मैंने अपनी कहानियों में आम आदमी के दर्द को जिया है, इसलिए मेरा लेखन आम आदमी को समर्पित है. इस तरह मेरा लेखन समस्याओं से शुरू होकर समाधान पर खत्म होता है और यही हर किसी के लिए की कलम की सार्थकता है.’

 

 

0
नफीस का कहना था कि हमें जिमनास्टिक करने वाला कहानी का अबोध पुत्र नहीं बनना है. लॉलीपॉप की मिठास और उसका रस हमारा नहीं है. हमारे साथ तो सिर्फ़ तकलीफों का लंबा सिलसिला है. कड़वा और बदमजा. बेरहम और बेदर्द. यह ऐसा तंत्र- पाश है, जिससे छूटना आसान नहीं.

नफीस ने लिखा और भरपूर लिखा. अपने समय की सर्वाधिक चर्चित पत्रिकाओं में उसकी कहानियों का प्रकाशन हुआ. मंगलेश डबराल जब तक ‘रविवारीय जनसत्ता’ के संपादक रहे, उसकी कहानियाँ नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं. बाबा नागार्जुन के शब्दों में वह चौबीस घंटे का कथाकार था.

अपने कहानी संग्रहों के प्रकाशन को लेकर उसने हमेशा लापरवाही बरती, जबकि वह हिंद पॉकेट बुक्स जैसी प्रख्यात संस्था में लंबे समय तक संपादक रहा. उसके कहानी संग्रह शाहदरा के छोटे-छोटे प्रकाशनों से छपते रहे और बिना किसी चर्चा के लावारिस बच्चों की तरह साहित्य की दुनिया में खो गए. धर्मवीर भारती, राजेंद्र यादव और कमलेश्वर की प्रशंसा के बावजूद उसे हिंदी संसार में वह सम्मान नहीं मिला, जिसका वह हकदार था.

जीवन के आखिरी वर्षों में उसकी गहरी इच्छा थी कि उसकी रचनाएँ सुनियोजित रूप से प्रकाशित हो पुस्तकों का आकार लें. उसकी इस इच्छा की पूर्ति हलीम मुस्लिम पीजी कॉलेज कानपुर में कार्यरत प्रसिद्ध विद्वान और लेखक डॉ. एम, फिरोज़ खान ने आकस्मिक रूप से हापुड़ आकर पूरी की. नफीस ने अभिषेक को अपने घर फिरोज़ खान से मिलवाने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया. अभिषेक को वह अपने साहित्यिक वारिस की तरह देखता था.

विचित्र विडंबना यह रही कि अपने जीवन काल में वह उन पुस्तकों को न देख सका,  जिनका भव्य प्रकाशन गहरी शिद्दत और लगाव के साथ फिरोज खान ने उसकी मृत्यु के चंद दिनों बाद अपने व्यक्तिगत संसाधनों से संभव बनाया. डा. एम फिरोज खान ने उसके शोध प्रबंध ‘हिन्दी के मुस्लिम कथाकारों के कथा साहित्य में सामाजिक परिवेश’ के साथ ‘नफीस आफरीदी की समग्र कहानियाँ’ और ‘नफीस आफरीदी के संपूर्ण उपन्यास’ का  प्रकाशन संभव बनाया. काश! नफीस अपने समग्र लेखन को पुस्ताकार रुप में देख अपने जीवन की सुंदरतम सृष्टि का स्पर्श कर पाता!

 

अशोक  अग्रवाल के और संस्मरण यहाँ पढ़ें.

 

वरिष्ठ कथाकार अशोक अग्रवाल की सम्पूर्ण  कहानियों का संग्रह ‘आधी सदी का कोरस’ तथा ‘किसी वक्त किसी जगह’ शीर्षक  से यात्रा वृतांत‘ तथा संस्मरणों की पुस्तक  संग साथ’ संभावना प्रकाशन’ हापुड़ से प्रकाशित है.

मोब.-८२६५८७४१८6

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Comments 17

  1. प्रमोद द्विवेदी says:
    1 month ago

    बड़े ही मन से लिखा संस्मरण। बीस साल पहले नफ़ीस साहब अक्सर हमसे मिलने जनसत्ता नोएडा में आते थे। देर तक हौले हौले बतियाना उनके स्वभाव का हिस्सा था। काफी दिन बाद चला कि वे रोज़ हापुड़ से आते हैं। अपने प्रकाशन में बैठने के बाद मित्रों से मिलते -जुलते हैं। ऐसे स्मृति लेख कितनी चीजों की याद दिला देते हैं। लेखक का आभार। अरुण देव जी तो अनमोल रतन निकाल कर लाते हैं।

    Reply
  2. स्वप्निल श्रीवास्तव says:
    1 month ago

    अशोक भाई का नफ़ीस आफरीदी का संस्मरण पढ़ते हुये हापुड़ प्रवास की याद आ गयी. नफ़ीस की भी याद आती है. अफरोज से प्रेम के चलते वे कोटा से हापुड़ आ गये और इसी शहर के होकर रह गये थे. उनके अंतिम दिन बेहद त्रासद थे. सुदर्शन के बाद नफ़ीस का जाना हापुड़ में शून्य पैदा कर दिया है.

    Reply
  3. ललन चतुर्वेदी says:
    1 month ago

    अशोक अग्रवाल जी जब भी कुछ लिखते हैं.पूरी तन्मयता से लिखते हैं और बतौर पाठक मैं भी उतनी ही तन्मयता से पढता हूँ. यह संस्मरण पढ़ते हुए सारे दृश्य रील की तरह आँखों में आते-जाते रहे. मन दुखी ही हुआ. ऐसे समर्पित लोग को बहुत से लोग जानते तक नहीं,मैंने उनका नाम पहली बार सुना.

    Reply
  4. त्रिभुवन says:
    1 month ago

    क्या ही सुंदर और हृदयहारी संस्मरण है। नफ़ीस साहब के जीवन के बारे में जिस संवेदना और सहृदयता से लिखा गया है, वह मन को मोह लेता है। बहुत ही नफ़ासत और प्रेमाकुलता से आप्लावित जीवन को जीने वाले जीवट के धनी इस शायर को जिस तरह, जिन शब्दों और हृदय की जिन गहराइयों से याद किया गया है, वह क़ाबिले-तारीफ़ है। इसके लिए अशोक जी की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है। मुझे लगता है, अशोक जी ने एक बहुत ही ज़रूरी लेखक की वे यादें ताज़ा कर दी हैं, जो हमें रोशनी और सुकून नहीं देतीं, अंधेरे से परिचित करवाती और विचलित करती हैं। मुझे याद है, वर्षों पहले मैंने उनकी कहानियाँ पढ़ी थीं। वे बहुत ही सादा तरह से लिखने वाले, लेकिन झकझोर देने वाले कथाकार थे। उन्होंने अपने कहानी संग्रह “दूसरी दुनिया” की भूमिका में जो लिखा है, उसे आज के समय में पढ़ा जाना बहुत-बहुत-बहुत अनिवार्य है। इस लेख में बहुत से ज़रूरी पहलुओं को अशोक अग्रवाल साहब ने रेखांकित किया ही है; लेकिन ख़ुद नफ़ीस साहब ने जो लिखा था, वह भूमिका भी बहुत ग़ज़ब की है और ऐसा प्रतीत होता है कि साहित्य के ज्ञान से विहीन हमारे राजनेताओं और समकालीन बोध से पीठ फेरे बैठे आम इंटेलेक्चुअल का बाना पहने बैठे नागरिक ने अगर थोड़ा बहुत भी नफ़ीस साहब जैसे कथाकारों को पढ़ा होता तो आज जो हालात हैं, वैसे नहीं होते। नफ़ीस साहब ने तीन दशक पहले जो कुछ मुलसमानों के बारे में लिखा था, उसे शासकीय व्यवस्था संभालने वालों ने पढ़ लिया होता तो देश एक ऐसी पटरी पर नहीं जाता, जहाँ घृणा हमारे नागरिक प्रेम पर भारी पड़ रही है। अशोक अग्रवाल साहब ने एक ऐसे अंधेरे पन्ने को खोलने का काम किया है, जो बताता है कि कुछ कथाकार क्यों ज़रूरी हो जाते हैं, भले उनके नाम आलोचना के क्षेत्र से उपेक्षित कर दिए जाएं। नफ़ीस साहब की कहानियाँ अपने समय की आँख में आँख डालकर बताती हैं कि इस देश में मुसलमान की हालत क्या हो गई है। “ये अंसख्य इंसान अपनी रोज़ी-रोटी और रोज़मर्रा की आफ़तों से जूझते हुए सोच ही नहीं पाते कि उनकी एक ख़ास पहचान बताई जाती है, चीखी, चिल्लाई जाती है। वे सिरे से बेख़बर हैं। उन्हें दीनदुनिया की भी ख़बर नहीं है। तब वे कैसे जानें कि उनके साथ कितना बड़ा इंसानी ज़ुल्म किया जा रहा है। दो वक़्त की रोटी को मोहताज कमेरा सियासत की फ़रेबों और लफ़्फ़ाजियों को क्या समझे? ” अशोक अग्रवाल साहब ने कोटा से हापुड़ और हापुड़ से दिल्ली के बीच जूझते जिस जीवन की इतनी संवेदनशीलता के साथ यादें ताज़ा की हैं, वह हमारे समय का एक ज़रूरी हिस्सा है। इस तरह के संस्मरणों की उपयोगिता बहुत अधिक है। समालोचन ने इसे प्रकाशित करके हमारे समय पर बहुत उपकार किया है। समालोचन और अशोक अग्रवाल साहब को बहुत धन्यवाद।

    Reply
  5. देवेन्द्र मेवाड़ी says:
    1 month ago

    सप्रेम नमस्कार।
    सन् साठ के दशक में मैं स्वयं भी कहानियां लिख रहा था। कहानी, माध्यम, उत्कर्ष,नई कहानियां आदि साहित्यिक पत्रिकाओं में मेरी कहानियां प्रकाशित हो रही थीं।
    तब मैं नफ़ीस अफ़रीदी की कहानियां पढ़ता था। शायद दो-एक पत्रों का आदान-प्रदान भी हुआ था। मेरी किसी कहानी पर उन्होंने लिखा भी था कि वह उन्हें अच्छी लगी थी।
    मैं मन से यह संस्मरण पढ़ूंगा अशोक जी।
    आपके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता रहता हूं।

    Reply
  6. कुमार अम्बुज says:
    1 month ago

    ऐसे संस्मरण सांस्कृतिक, समाजिक और साहित्य-कला के इतिहास को दर्ज करते हुए चलते हैं। कहा भी गया है कैसे कैसे लोग थे, कैसा जमाना था, जो बिला जाते हैं। आसमान निगल जाता है। नफीस जी से मेरी एकमात्र संक्षिप्त मुलाक़ात क़रीब पैंतीस बरस पहले राधाकृष्ण प्रकाशन में हुई थी। वे वहाँ संपादक थे। मेरा पहला कविता संग्रह वहीं से आनेवाला था जिसके प्रूफ़ उन्होंने मुझे दिए थे। मैं संग्रह वापस लेने के लिए गया था। बहरहाल, तब उन्होंने मुझसे प्रेमिल और आत्मीय व्यवहार किया। लेकिन उनके बारे में आज इस संस्मरण से जो जाना, उसने संवेदित कर दिया है।
    अशोक जी ने कमाल का स्मृति लेखा मुमकिन किया।

    Reply
  7. Mohammad Firoz khan says:
    1 month ago

    अशोक अग्रवाल जी का यह संस्मरण अत्यंत मार्मिक, जीवंत और संवेदनशील लेखन का उत्कृष्ट उदाहरण कहा जा सकता है।
    उन्होंने नफ़ीस आफ़रीदी के व्यक्तित्व और संघर्ष को जिस आत्मीयता के साथ प्रस्तुत किया है, वह पाठक के अन्तर्मन को छू जाता है।
    यह संस्मरण केवल एक लेखक की स्मृति नहीं, बल्कि पूरे साहित्यिक दौर का जीवंत दस्तावेज़ बन गया है।
    भाषा की सहजता और प्रस्तुति इसे अत्यंत प्रभावशाली बनाती है।
    नफ़ीस आफ़रीदी के जीवन की विडम्बनाओं और मानवीय संवेदनाओ को बेहद गहराई से उभारकर सामने लाने की कोशिश की गयी है ।
    लेखक ने मित्रता, प्रेम, संघर्ष और साहित्यिक रिश्तों को बड़ी ईमानदारी से चित्रित किया है।
    संस्मरण को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे एक पूरी दुनिया हमारी आँखों के सामने चल रही हो।
    इस लेख के माध्यम से एक उपेक्षित लेकिन महत्त्वपूर्ण कथाकार को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सराहनीय प्रयास हुआ है।
    अशोक अग्रवाल जी की स्मरण शक्ति, संवेदना और लेखकीय कौशल प्रशंसनीय है।
    समालोचना द्वारा ऐसे महत्त्वपूर्ण संस्मरण का प्रकाशन हिंदी साहित्य के लिए अत्यंत मूल्यवान योगदान साबित होगा।

    Reply
  8. ओमा शर्मा says:
    1 month ago

    कैसा अद्भुत शोकगीत है! स्मृति को निजी कोनों और संदर्भों को इत्मीनान से साधते हुए मानो यह अभी देखी किसी फिल्म का हिस्सा है,न कि आधी सदी से ज्यादा फैले जीवन का। अशोक जी की यह कला प्रणम्य है।

    Reply
  9. Anonymous says:
    1 month ago

    “नफीस अफरीदी- फकीरी मिजाज का अफसाना निगार” अशोक अग्रवाल जी का यह लेख संवेदनशील लेखन का बेहतरीन मिसाल कहा जा सकता है।
    नफ़ीस आफ़रीदी के जीवन और व्यक्तित्व को इन्होनें जिस विधा के साथ प्रस्तुत किया है, वह पाठक के दिल व दिमाग पर गहरा असर डालताहै।
    यह लेख नफीस आफरीदी की साहित्यिक यात्रा का जिन्दा दस्तावेज़ है।
    भाषा बेहद सरल और प्रस्तुति बेहद असरदार है।
    नफ़ीस आफरीदी के जीवन के अनछुए पहलू और मनोदशा को बेहद गहराई से प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी है ।
    लेखक ने मानवीय सम्बन्धो को बड़ी ईमानदारी से चित्रित करने की कोशिश की है।
    संस्मरण को पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे कि नफीस आफरीदी की एक पूरी साहित्यिक दुनिया हमारी आँखों के सामने चल रही हो।
    इस लेख के माध्यम से एक अहम अफसाना निगार को नई नस्ल तक पहुँचाने की सफल कोशिश है।
    अशोक अग्रवाल जी का यह संस्मरण काबिल ए तारीफ है।
    डॉ जगदम्बा दुबे
    असिस्टेंट प्रोफेसर
    उर्दू विभाग
    हलीम मुस्लिम पीजी कॉलेज कानपुर

    Reply
  10. Khudeja khan says:
    1 month ago

    ‘नफ़ीस अफ़रीदी’ को अशोक अग्रवाल जी जिस शिद्दत से याद करते हैं वो उनके गहरे संग – साथ का परिचायक तो है ही अपने दोस्त के प्रति वफ़ादारी भी है। मरणोपरांत ही सही साहित्य जगत को ऐसे लेखक से परिचित कराना ज़रूरी है जिसने अपने लेखन को अपनी महत्वकांक्षा नहीं बनाया। कम लिखकर ज़्यादा चर्चित होने का फार्मूला जहां चौतरफ़ा लागू होता हो ऐसे में एक लेखक,अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर अपनी बिरादरी की आवाज़ बनकर,उन त्रासदियों को सुनाना चाहता है जो उपेक्षित भी हैं और सत्ता के षड़यंत्र का शिकार भी।
    अशोक जी ने नफ़ीस अफ़रीदी का सजीव जीवन वृतांत समक्ष रख दिया है जिससे एक अनजान व्यक्ति भी भलीभांति परिचित हो सकता है।
    समालोचन, साहित्यिक अवदान में आहुति देने वाले कलमकारों को ज़िन्दा रखता है।

    Reply
  11. Teji Grover says:
    1 month ago

    मित्र अशोक अग्रवाल ने हमेशा की तरह एक ऐसा संस्मरण पाठकों को अर्पित किया है जिससे न केवल उनकी आँखें खुलती हैं, एक गहरा नैतिक बोध होता है बल्कि स्वयं को एक रेखा के आगे न जाने देकर लेखक कैसे साक्षी भाव से एक जीवन्त और मार्मिक किरदार को पूरी तरह जी जाता है, यह भी समझ में आता है। कितना दुखद है न कि हिन्दी में ऐसी घनीभूत प्रतिभा को भुला दिया जाना एक आम-फ़हम बात है। औरों ने भी महसूस किया है कि अशोक विधागत सीमाओं को भुलाकर लिखते हैं। उनके फ़न के क़ायल होने के सिवा पाठक के पास कोई चारा नहीं। उपन्यास के सुख-दुख, कविता के मर्म, जीवनी और गल्प के संश्लिष्ट आकाश के नीचे पाठक एक सुदीर्घ यात्रा करता है। हिन्दी के जिन लेखकों को नफ़ीस जैसे अदीबों, अफसानानिगारों, और साफ-शफ़्फ़ाफ़ और बेदाग अन्तरात्मा वाले इन्सानों का कोई बोध नहीं होता, उनके लेखन में वह तत्त्व कहाँ से पैदा होंगे, जो मसलन अशोक जी के लेखन में होते हैं?

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  12. Naresh Goswami says:
    1 month ago

    अशोक जी के इस संस्मरण में हिंदी की रचनाशीलता का क्रूर इतिहास भी चला आया है। कई दफ़ा, ऐसा लगता है कि हिंदी की दुनिया केवल जीवितों— उनमें भी उच्च-पदस्थों, शक्ति-सत्ता की संस्थाओं से जुड़े और राज्य या सेठाश्रयी संगठनों द्वारा सम्मानित रचनाकारों को ही याद रखती है।
    वर्ना नफ़ीस आफ़रीदी में क्या नहीं था! प्रेम के लिए अपनी परिचित दुनिया को छोड़ देने का साहस था; सामाजिक-आर्थिक पायदान पर चढ़ने के अवसर थे; ऐसे संपर्क भी थे जिनके ज़रिए ज़्यादा सुकून की ज़िंदगी की ओर जा सकते थे, लेकिन उन्होंने एक छोटी-सी और सीमित दुनिया का नागरिक बनने का निर्णय लिया और वैसे ही अदृश्य और नामालूम लोगों की कथाएं लिखीं, लेकिन हिंदी के संसार को नफ़ीस साहब याद करने लायक़ नहीं लगे।
    अशोक जी से मुलाकातों के दौरान उनका ज़िक्र न आया होता तो कभी पता भी नहीं चलता कि नफ़ीस साहब जीवन भर इसी दिल्ली की सरहदों के आसपास रहे थे।
    पिछले दिनों, मैं उनके ‘कहानी समग्र’ से गुज़र रहा था। उसमें एक के बाद एक अलक्षित क्षणों, अदृश्य हाशियों और ख़ारिज कर दिए गए दृश्यों की सशक्त कहानियां हैं।
    ‘धर्मयुग’ (1973) में प्रकाशित उनकी कहानी ‘अर्द्धविराम’ जिसका अशोक जी ने इस संस्मरण में उल्लेख किया है, भावनात्मक रूप से टूटे-बिखरे, सामाजिक तौर पर किसी भी गणना से बाहर छोड़ दिए गए, लेकिन फिर भी अपने भीतर प्रेम और करुणा को अक्षुण्ण रखे लोगों की अविस्मरणीय कहानी है।
    अशोक जी ने यह संस्मरण लिखकर एक समर्थ रचनाकार को जन-स्मृति में उसका बक़ाया अधिकार दिलाया है।

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  13. लोकमित्र गौतम says:
    1 month ago

    नफीस आफरीदी साहब के साथ एक बेहद आत्मीय याद मेरी भी…ये 1996 की बात है. मैं इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली राजनीतिक पत्रिका माया के दिल्ली ब्यूरो में कार्यरत था और खूब धुँआधार लिखा करता था एक दिन माया के दफ्तर में एक लंबा चौड़ा शख्स आया,परिचय हुआ और 10 मिनट बाद ऐसी आत्मीयता हो गयी जैसे हम एक दूसरे को सालों से जानते थे- ये नफीस आफरीदी साब थे. वह मेरे पास इसलिए आये थे कि मैं हिंद पॉकेट बुक्स के लिए दो तीन किताबें लिखूँ. वह मुझसे कह रहे थे तुम इतना अखबारी लेखन करते हो जो 24 घन्टे या दो चार दिन में रद्दी हो जाता है,तुम कुछ किताबें लिखो. उन्होंने कुछ विषय दिये मैंने जब एक महीने तक कोई प्रपोजल नहीं बनाया तो मुझसे मिले और बोले कल हर हाल में आउटलाइन चाहिए मैंने बनाया तो खुद उसे दुरुस्त किया और हिंद पॉकेट बुक्स के मैनेजमेंट के पास ले गए लेकिन हमारी बात नहीं बनी क्योंकि वह लगभग 250 पेज की किताब सिर्फ,5000 में चाहते थे मैंने मना कर दिया लेकिन उन्होंने कभी बुरा नहीं माना मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया.यह बेहद आत्मीय संस्मरण पढ़कर उनकी बहुत याद आयी. नमन आपको विलक्षण कथाकार.

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  14. जय सुशील says:
    1 month ago

    बहुत सुंदर संस्मरण है। अमूमन हिंदी में लिखी चीज़ें पूरी पढ़ना मुश्किल है। इतना कुछ प्रयोग टाइप रहता है। यह बहुत ही सलीके से लिखा गया है संस्मरण। अच्छा लगा।

    Reply
  15. जीतेश्वरी says:
    1 month ago

    नफ़ीस आफ़रीदी पर लिखा गया यह एक ऐसा अद्भुत संस्मरण है जिसे पढ़ना शुरू किया तो मानो ऐसा लगा जैसे यह हमारी आंखों के सामने किसी चलचित्र की तरह घटित हो रही है। अशोक जी की भाषा में ऐसी जीवंतता है कि पढ़ते हुए देखने की अनुभूति होती है।

    इस संस्मरण में नफ़ीस आफ़रीदी के मार्मिक जीवन से परिचित होने पर लगता है कि वे एक ऐसे मनुष्य थे जो बेहद तकलीफ भरे आर्थिक जरूरतों के बावजूद गज़ब के आत्मसंतोष और खुद्दारी से जीवन जीने वाले व्यक्तियों में से एक थे। उनके लिए जीवन की जरूरत उतनी ही थी जितने में जीने लायक जीवन का गुजर बसर संभव हो जाए।

    यह एक संवेदनशील कथाकार का अपने समकालीन दूसरे संवेदनशील कथाकार को याद किया गया एक ऐसा अफ़साना है जिसकी याद बरसों तक हमारे दिलों में बनी रहेगी।

    अशोक अग्रवाल स्वयं बेहद मोहब्बत से भरे हुए व्यक्ति हैं उनसे मिलकर ऐसा कौन होगा जो उनका नहीं हुआ होगा। अपने संग साथ रहे, अपने परिचितों को वे जिस शिद्दत से याद करते हैं और जिस शिद्दत से अपने रिश्तों को निभाने में यकीन रखते हैं वह खासकर हमारी पीढ़ी के लोगों में तो जैसे असम्भव ही है।

    मैं इस संस्मरण में क्या प्रतिक्रिया लिखूं ? समझ नहीं पा रही। ऐसा लग रहा है जैसे इस संस्मरण को पढ़ते हुए जो अनुभव मुझे हुआ है वह मेरे शब्दों में कुछ कहने या लिखने से अधिक मूल्यवान है।

    हिंदी साहित्य में संस्मरण की विधा लगभग समाप्त हो चली है। अशोक अग्रवाल जी उन विरले लेखकों में हैं जिन्होंने इस विधा को फिर से एक बार जिंदा कर दिया है।

    इस संस्मरण में अशोक जी ने बेहद मोहब्बत से भरे अपने समय के एक जिंदादिल कहानीकार नफ़ीस आफ़रीदी से हमारा परिचय करवाया है, इसके लिए दिल से उन्हें बेहद शुक्रिया। साथ ही समालोचन का बहुत-बहुत आभार जिसके माध्यम से हमें इस सुंदर एवं जीवंत संस्मरण से मुखातिब होने का सुंदर अवसर मिला।

    Reply
  16. Kailash Banwasi says:
    1 month ago

    अशोक जी के संस्मरण बेहद आत्मीय और मन को छू जाने वाले होते हैं। इतने खुले हृदय से लिखते हैं,ऐसा पारदर्शी कि सब कुछ आंखों के आगे गुज़रता महसूस होता है। कथाकार नफ़ीस आफरीदी का नाम ही मुझे किशोरवय से आकर्षित करता रहा है। सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान में उनकी कहानियां जब भी मिलीं, पढ़ गया।निम्न वर्गीय मुस्लिम परिवेश और किरदार उनकी कहानियों में बहुत शिद्दत से दर्ज हुआ है। उनके विषय में आज इस संस्मरण से अधिक जानकर इस बात पर हैरान हूं कि यह बंदा दिन भर की व्यावसायिक व्यस्तता के बावजूद कहानियां कैसे लिख लेता रहा? हिंदी साहित्य में एक समय था जब मुस्लिम परिवेश के कथाकारों पर अक्सर चर्चा होती थी, और तब के वे लेखक चर्चित होते थे।इस विषय को अब छेड़ा भी नहीं जाता।कभी शानी ने इस अभाव और नाइंसाफी पर कड़ी आपत्ति की थी। यहां की साझी संस्कृति और विरासत, और इनका मूल्यांकन मुस्लिम समाज की उपस्थिति के एकांगी ही रहेगी।
    नफ़ीस आफरीदी इसके प्रतिनिधि लेखक हैं। लेकिन इधर उन्हें गुमनामी ही हासिल हुई। और और बात उन पर होनी चाहिए।
    आदरणीय अशोक जी को, साथ ही समालोचन को आत्मीय बधाई और साधुवाद, और शुभकामनाएं 🌹

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  17. Anonymous says:
    4 weeks ago

    बेहद सामयिक |बहुत महत्वपूर्ण |आज के ज़माने में ऐसे लेखकों की कोई चर्चा नहीं करता |आभार अशोक जी ,धन्यवाद समालोचन |– हरिमोहन शर्मा

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