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समालोचन

Home » जयशंकर प्रसाद के राष्ट्रीय विचार : राय कृष्णदास

जयशंकर प्रसाद के राष्ट्रीय विचार : राय कृष्णदास

by arun dev
January 26, 2026
in विशेष
Reading Time: 5 mins read
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जयशंकर प्रसाद के राष्ट्रीय विचार : राय कृष्णदास
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प्रसाद जी के राष्ट्रीय विचार
राय कृष्णदास


प्रस्तुति : मनोज मोहन

 

प्रसाद जी के संबंध में नये लोग अन्वेषण कर रहे हैं, यह बड़े ही संतोष का विषय है. उन के महान् व्यक्तित्व और कृतित्व पर जितना भी प्रकाश पड़ सके, स्तुत्य ही नहीं हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है. प्रसाद जी का व्यक्तित्व इतिहास की सामग्री है अतः उसे सँभाल कर रखना अपेक्षित है. प्रसाद जी से मेरा जो भ्रातृत्व था, उस नाते अनेक खोजी जिज्ञासु मुझ से भी मिलते रहते हैं. मुझे ऐसा भासित होता है कि प्रसाद जी के विषय में अनेक ऐसी बातें सामने लायी जा रही है जो इतिहास विरुद्ध हैं— कम से कम उन के निकटतम व्यक्तियों को तो उन बातों का पता न था.

मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि मेरे और उन के बीच किसी भी प्रकार का दुराव न था, हम लोग आपस में हर संभव परिस्थितियों की चर्चा करते रहते. फिर प्रसाद जी ने जान-बूझ कर ये बातें मुझ से क्यों न कहीं, यह समझ नहीं पड़ता. मुझे यह तो अवश्य जान पड़ता है कि कुछ सूत्र प्रसाद जी के व्यक्तित्व को ग्लैमर दे रहे हैं परंतु किसी महाकवि को ऐसे अनैतिहासिक दंतकथाओं की अपेक्षा नहीं रहती- उस का काव्य ही उस का व्यक्तित्व है. भला हम हिमालय के पेडेस्टल बनाएँगे, या क्षीर सागर में एक लोटा जल मिला कर उसे बढ़ा देंगे. अतएव मुझे कुछ बातें आप के सामने प्रकट करनी चाहिए.

अभी हाल में एक खोजी मेरे पास आये थे. वह प्रसाद जी की राजनैतिक विचारधारा पर कार्य कर रहे हैं. उन्होंने प्रश्न किया कि

“क्या प्रसाद जी सक्रिय राजनीति में थे?”

उन्हें कुछ लोगों ने ऐसी सूचना दी थी कि प्रसाद जी कांग्रेस द्वारा प्रवर्तित स्वातंत्र्य आंदोलन में कूद पड़े थे.

वस्तुतः उस काल में साहित्यिकों में राष्ट्रवादियों के दो वर्ग थे. एक में तो संपूर्णानंद, गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, हरिभाऊ उपाध्याय जैसे व्यक्ति थे जो सक्रिय राजनीति में थे परंतु एक बहुत बड़ा वर्ग था जो राष्ट्रीय विचारों का तो अवश्य था, फिर भी सक्रिय राजनीति से संबद्ध न था. इसमें प्रसाद जी, भाई मैथिलीशरण, पंत, निराला, महादेवी और अनेक महत्त्वपूर्ण कवियों के नाम लिये जा सकते हैं. यद्यपि ये कभी ‘आंदोलन’ में न कूदे परंतु इनमें देशभक्ति की कमी न थी.

उक्त जिज्ञासु ने मुझ से पूछा कि
“क्या मैथिलीशरण जी व्यक्तिगत स्वातंत्र्य आंदोलन में, 1941 में, जेल नहीं गये थे?”

मैंने उत्तर दिया:

यह भी एक मिथ है. 1941 में अंग्रेजी सरकार ने पुलिस को बहुत व्यापक अधिकार दे रखे थे. संयोगवश चिरगाँव में उस समय एक बड़ा दुष्ट दरोगा था. उस की छत्रछाया में वहाँ बड़ा अनाचार फैला. स्वभावतः चिरगाँव-बासी त्रस्त हो कर भाई मैथिलीशरण तथा उनके अग्रज पू. राम किशोर जी गुप्त (नन्ना) के पास आये. इन लोगों के प्रभाव से उक्त दारोगा की कुछ न चली.

“कहा जाता है कि उस समय अंग्रेज़ी सरकार ने थानेदारों के पास दस्तख़त किये हुए सादे वारंट भेज दिये थे, थानेदार उन पर जिस व्यक्ति का भी चाहे, नाम कर डालता और उसे जेल भेज देता. उक्त थानेदार ने इन लोगों पर झल्ला कर यह योजना बनाई थी कि इनके सारे परिवार को ही जेल में डाल दे, परंतु भाई मैथिलीशरण की गिरफ्तारी से जो शोर मचा, उस से वह मामला वहीं का वहीं दब गया. बाद में यारों ने इसे राजनैतिक जामा पहना दिया. पर इसके बिना भी मैथिलीशरण के कवित्व या राष्ट्रीयता में कोई कमी न रहती. इसी प्रकार प्रसाद-पंत-महादेवी-निराला की राष्ट्रवादिता में कोई अंतर नहीं पड़ता, यदि वे लोग सक्रिय राजनीति में न थे.”

उक्त भाई ने प्रश्न किया,
“क्या प्रसाद जी ने 1919 से ही खादी पहनना नहीं शुरू कर दिया था? मुझे ऐसा काशी के ही एक राजनैतिक नेता श्री… सिंह ने बताया है?”

मैंने उत्तर दिया,
श्री… सिंह का प्रसाद जी से कोई विशेष संपर्क न था; प्रसाद जी से वह अवस्था में इतने छोटे थे कि उन को भ्रांति हो सकती है. ध्यान देने योग्य है कि 1919 में तो खादी का प्रचार ही न हुआ था. अवश्य ही, बाद में प्रसाद जी नियमित खादी पहनते थे. इस विषय में हम लोगों का प्रसिद्ध फ़िकरा—’ऐय्यर (गांधी आश्रम के व्यवस्थापक), देखो हम लोग तुम से निकल भागे’ छप भी चुका है. (श्री वीरेश्वर ऐय्यर बड़े उत्साह से खादी बेचते. हम लोग काशी नागरी प्रचारिणी सभा में गोष्ठी करते, वहाँ से निकलते तो गांधी आश्रम की दुकान रास्ते में पड़ती. हम लोगों के हाथ, ऐय्यर भाई कुछ न कुछ रोज़ ही बेच लेते. हम लोगों ने उस पटरी से जाना छोड़ दिया. फिर सामने वाली पटरी से प्रसाद जी उक्त फिकरा कसते.)

परंतु प्रसाद जी के खादी प्रेम के पीछे एक कहानी है. वस्तुतः स्वदेशी आंदोलन के प्रभाव में हम लोगों ने विलायती कपड़ों का तो बहिष्कार कर रखा था परंतु खादी आंदोलन तो संभवतः उसके बाद प्रारंभ हुआ. उस समय भला प्रसाद जी कैसे खादी पहनने लगे ?

प्रसाद जी के खादी प्रेम के पीछे का इतिहास है: 1925 के दिसंबर 12 को मैं कानपुर में था. वहाँ कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था. भाई गणेश शंकर विद्यार्थी ने उक्त अवसर पर कला-प्रदर्शनी का आयोजन किया था. उसका भार मुझे ही सौंपा था. मैंने कला-भवन की सामग्री के आधार पर उक्त प्रदर्शनी सजायी. उसी समय मैंने विश्वबंधु बापू से हस्ताक्षर भी प्राप्त किया. तब बापू का यह नियम था कि खादी पहनने वालों को ही वह अपना हस्ताक्षर दिया करते. इतना ही नहीं, हस्ताक्षर करते समय वह टोक कर पूछ लिया करतेः तुम खादी पहनते हो न?

किसी कारणवश मुझे हस्ताक्षर देते समय बापू उक्त बात पूछना भूल गये. मुझे हस्ताक्षर तो मिल गया, पर मेरे मन में कुछ उथल-पुथल सी हुई कि मैंने बापू से धोखे से हस्ताक्षर प्राप्त कर लिया है. अस्तु, उसी समय से मैंने खादी पहनने का प्रण लिया, जो भगवान की कृपा से बराबर निभता रहा. फिर बार-बार भाई मैथिलीशरण और भाई जयशंकर से खादी पहनने का अनुरोध करता रहा. कुछ दिनों बाद मैथिलीशरण ने खादी पहनना शुरू किया. फिर तो उनका सारा परिवार ही खादी पहनता. वह स्वयं चरखा कातते. वह भी प्रसाद जी से आग्रह करने लगे, प्रसाद जी कुछ दिनों बाद खादी पहनने लगे. उन का यह क्रम जन्म मर निभा.

इस प्रकार प्रसाद जी ने 1926 के लगभग खादी प्रारंभ की. प्रसाद जी के ही अनुकरण में उनके दल के कई अन्य लोगों ने यथा ‘विनोद शंकर व्यास, वाचस्पति पाठक, डॉ. राजेंद्र नारायण शर्मा, आदि ने भी खादी पहनना आरंभ किया. वे गांधीवादी तो न थे परंतु गांधी जी को पूज्य भाव से देखते.

दूसरी ओर, यह सही है कि प्रसाद जी ने बहुत पहले अंग्रेज़ सम्राट की प्रशस्ति में एक कविता लिखी थी. परंतु यह तो उस समय का रिवाज़ था. यह वस्तुतः शाहे-वक़्त की प्रशस्ति की परंपरा में थी. इसे प्रसाद जी की अंग्रेज़परस्ती नहीं कही जा सकती. प्रसाद जी यदि चाटुकार होते तो उस समय के खुशामदियों की भाँति गवर्नर या कमिश्नर-कलक्टर की प्रशस्ति लिखते. भारतेंदु जी ने भी ब्रिटिश राजवंश की प्रशस्ति लिखी थी, परंतु भला भारतेंदु को अंग्रेज़परस्त कहा जा सकता है?

वस्तुतः प्रसाद जी की राष्ट्रीय भावना गांधी युग के पहले की चीज है. प्रसाद जी की गांधी जी और मालवीय जी के प्रति अपार श्रद्धा थी. परंतु मालवीय जी के दृष्टिकोण के प्रति उनका झुकाव था, जैसा उनकी रचनाओं से भी ज्ञात होता है.

उक्त जिज्ञासु के मन में यह भी प्रश्न था कि प्रसाद जी के राष्ट्रीय विचार किस प्रकार के थे? मेरी समझ में इस का उत्तर उनके नाटकों से पूरी तौर से मिल जाता है. इन में हिंदू राजाओं के प्रत्येक उज्ज्वल प्रसंग को उन्होंने प्रकाशित किया है. उनका मन इंद्र पर भी ऐसा ही कुछ लिखने को था. उस की भूमिका उन्होंने तैयार भी कर ली थी जो काशी नागरी प्रचारिणी सभा के ‘कोशोत्सव स्मारक ग्रंथ’ में ‘भारत का प्रथम सम्राट’ नामक लेख में प्रकाशित हुई है. पर इस प्रस्तावित काव्य (अथवा नाटक) को वह लिख न पाये. इस वर्ग की सभी कृतियों में उन्होंने अतीत के गौरव को उद्घाटित किया है. मेरी समझ में ऐसा हिंदू-राष्ट्रत्व उस समय उफान ले रहा था. वस्तुतः इसका शंखनाद भारतेंदु के लेखन तक में मिलता है. परंतु उनमें वैसी संकीर्णता न थी, जो आज कल पायी जाती है.

प्रसाद जी के उक्त दृष्टिकोण के पीछे उनका स्वतः का इतिहास प्रेम था. वह स्वयं इन विषयों पर खोज करते रहते. परंतु इसकी कुछ प्रेरणा उन्हें डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल से भी प्राप्त हुई थी. जायसवाल जी भी हम लोगों के घनिष्ठ मित्र थे. वह भारतीय इतिहास के प्रकांड पंडित थे, उन्होंने ‘भारतीय राजतंत्र’ और ‘अंधकारयुगीन भारत’ जैसे ग्रंथों द्वारा भारतीय इतिहास को नये आयाम दिये. जायसवाल जी का दृष्टिकोण सर्वथा भारतीय था. इसकी आवश्यकता थी क्यों कि पाश्चात्य विद्वान और उनके अंधानुकरण में भारतीय विद्वान नितांत साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से भारतीय इतिहास प्रस्तुत कर रहे थे. जायसवाल जी के व्यक्तित्व का, लेखन का प्रसाद जी पर प्रभाव स्पष्ट है. यद्यपि स्वयं जायसवाल जी प्रसाद जी के ऐतिहासिक विश्लेषणों से संतुष्ट न जान पड़े पर दोनों में पूर्ण सौहार्द था, अतः जायसवाल जी ने कभी प्रसाद जी की खुल कर आलोचना न की थी. जायसवाल जी का काव्य बोध भी बहुत पुराना था, उनके आदर्श भारतेंदुकालीन कवि थे.

जिन जिज्ञासु महोदय ने उपर्युक्त प्रश्नों के द्वारा मेरे मन में लुकाछिपी करती बहुत सी स्मृतियाँ प्रकट करायीं, उन्हें एक और विचित्र सूचना प्राप्त हुई थी— क्या कामायनी की रचना साकेत के पूर्व ही हो चुकी थी, भले ही उस का प्रकाशन बहुत बाद में हुआ?

साकेत की रचना पद्धति के विषय में हम परिचित हैं. संभवतः 1920 के पहले वह तैयार हो चुका था. मुझे जहाँ तक स्मरण आता है, प्रसाद जी ने कामायनी की रचना 1920 के बाद प्रारंभ की. इसका काम बीच-बीच में रुक जाता था, प्रसाद जी और कुछ लिखने लग जाते थे. फिर अंतिम बीमारी में, उन्हें कुछ ऐसा भास होने लगा था कि अब चला-चली है. उसी बीच उन्होंने यह रत्न हिंदी को दिया. सौभाग्यवश उनके देहांत के थोड़े ही पहले इसकी कुछ प्रतियाँ छप कर उनके पास आ गयी थी. उन्होंने उसकी मुझे भी हस्ताक्षर युक्त एक प्रति दी थी, जो मेरी अमूल्य निधि है.

एक प्रश्न आया कि क्या अपने बलिदान के ठीक एक दिन पूर्व चंद्रशेखर आज़ाद, प्रसाद जी के यहाँ टिके थे? लोगों ने उक्त खोजी को एक घर भी दिखलाया, जिसमें चंद्रशेखर जी टिके बताये जाते हैं. यह तो ठीक है कि आज़ाद उसके आस-पास काशी आये थे और भाई श्रीप्रकाश से मिले भी थे. प्रसाद जी से मेरी इस बात की कभी चर्चा भी हुई, परंतु उन्होंने एक बार भी यह नहीं कहा. जहाँ तक मुझे ज्ञात है, चंद्रशेखर आज़ाद पं. शिव विनायक मिश्र वैद्य के यहाँ टिका करते थे. आज यह ‘रहस्य’ कहाँ से प्रकट हुआ, मैं नहीं कह सकता.

अंग्रेज़ों के प्रति उस समय के प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति के हृदय में आक्रोश था, कभी-कभी यह आक्रोश घृणा का भी रूप धर लेता. अपने काव्य ‘कारा’ में (हम लोगों के मना करने पर भी) भाई मैथिलीशरण तो यहाँ तक कह गये— “उलटा सीधा डाग यहाँ ले कर तुम आये”. इसी तरह प्रसाद जी या उस मंडल के किसी व्यक्ति का भी उस साम्राज्य तंत्र के प्रति कोई निश्चित अथवा सक्रिय विरोध न था. यहाँ उदाहरण के लिए एक घटना का वर्णन करूँगा.

चित्र 1)-तत्कालीन वायसराय की पत्नी लेडी विलिंग्डन का काशी नागरी प्रचारिणी सभा में आगमन बायें से दायें (पहली पंक्ति) बाबू श्यामसुंदर दास, राय कृष्णदास, प्रत्रालाल आई. सी. एस. (कलक्टर बनारस), बनारस के कमिश्नर की पत्नी, लेडी विलिंग्डन, जयशंकर प्रसाद (यह उन का एकमात्र चित्र है जिस में वह पाजामा पहने हुए दिखाई देते हैं: इस अवसर पर विशेष रूप से उन्होंने पाजामा पहना था), (दूसरी पंक्ति) पंड्या वैजनाथ, ठाकुर शिवकुमार सिंह (सभा के संस्थापकों में से एक), श्री कृष्णदेव प्रसाद गौड़, श्री रामचंद्र वर्मा और श्री ब्रजरत्न (अंशत: दृष्टिगत

1934 में काशी नागरी प्रचारिणी सभा में तत्कालीन अंग्रेज़ वाइसराय की पत्नी लेडी विलिंग्डन पधारीं; उस समय भारत कला भवन ‘सभा’ का ही एक विभाग था. उनके कार्यक्रम में कला भवन का निरीक्षण भी था अतएव मुझे भी उपस्थित होना था. उस समय का एक ग्रुप फोटो यहाँ प्रकाशित हो रहा है, जिस में प्रसाद जी भी हैं (चित्र 1). मुझे तो कला भवन के निहोरे वहाँ जाना ही था, पर प्रसाद जी उसे ‘तमाशा’ मान कर उस में उपस्थित हुए, यदि उनके मन में अंग्रेज़ों के प्रति घृणा की भावना वैसी उग्र होती तो भला वह उस अवसर पर क्यों आते? न उन के मन में अंग्रेज़ी साम्राज्य से इतना लगाव था, जिसके कारण वह उस में सम्मिलित हुए. इतना ही नहीं उन्होंने इस अवसर पर पाजामा धारण किया, अन्यथा वह धोती ही पहनते थे.

उसी तरंग की बात सुनिए. मुझे कुछ आक्रोश था, लेडी विलिंग्डन पर नहीं— पर उनके चारों ओर के स्थानीय चाटुकारों पर. संभवतः इसी को व्यक्त करते हुए मैंने घर लौट कर अपने हाथ-पाँव ही नहीं धोये, वरन् अपने छाते जूते तक को धो डाला तब मैंने घर में प्रवेश किया. इसके पीछे छुआछूत की बात नहीं थी उस समय तक मैं गांधीवादी प्रभाव में सभी जातियों, यहाँ तक अहिंदू वर्ग के हाथ का बना भोजन भी स्वीकार कर लेता. परंतु उक्त घटना से हमारा साम्राज्य-विद्वेष प्रकट होता है. प्रसाद जी को ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया हुई हो, ऐसा नहीं ज्ञात होता. मेरे उपर्युक्त व्यवहार की उन्होंने हँसी उड़ाई हो तो आश्चर्य भी नहीं. परंतु उनकी समस्त भावना, जिसमें बनारसी मौज की लहर भी है, एक बात से प्रकट हो जाती है- उन्होंने लेडी विलिंग्डन का नाम बेलनडाइन रखा; उन्होंने कहा “यह विलिंग्डन नहीं, बेलनडाइन है.”

चित्र 2 ) ऊपर से नीचे (खाना-1) कविराज प्रतापसिंह, गणेशदास, श्री कांतानाथ पांडे चोंच (खाना-2) श्री दिनेशदत्त झा, श्री जयशंकर प्रसाद, सांवलजी नागर, लक्ष्मीकांत झा, (बीच में) कमला नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, (खाना-3) शिवप्रसाद मिश्र रुद्र, संपूर्णानंद, बलदेव प्रसाद मिश्र, रामानंद मिश्र (जिन के निवास पर यह गोष्ठी हुई) रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद (शेष अज्ञात)

उपर्युक्त खोजी ने उस ग्रुप फ़ोटो (चित्र 2) की भी चर्चा की जिसमें जवाहरलाल जी और कमला जी के साथ काशी के कुछ मूर्धन्य साहित्यिक हैं. इसमें भी प्रसाद जी उपस्थित थे. किसी कारण मैं उस बैठक में न जा सका था, संभवतः उन दिनों मैं प्रायः मलेरिया से पीड़ित रहता. इस ग्रुप फ़ोटो के संबंध में उपर्युक्त खोजी को किसी व्यक्ति ने भ्रामक सूचना दी और उस के आधार पर यह भी सिद्ध किया कि प्रसाद जी जवाहरलाल से बहुत प्रभावित थे. वस्तुतः प्रसाद जी का झुकाव उग्र राष्ट्रीयता की ओर था, जैसा हम ऊपर इंगित कर चुके हैं अतः जवाहरलाल जी के समाजवादी विचारों का उन पर तनिक भी प्रभाव न था. उस समय जवाहरलाल जी सरल हिंदी का प्रचार कर रहे थे. कला भवन संग्रह में उनकी किसी पुस्तक की भूमिका है, जो स्वयं उन की अपनी हस्तलिपि में है. इसमें उन्होंने सरल हिंदी की हिमायत की है:

(ये हिंदी के लेख इस छोटी पुस्तक में दिये हुए हैं और उनके साथ कुछ और भी लेख जो अंग्रेजी में लिखे गये हैं और जिनका अनुवाद किया गया है.)

“मैं आशा करता हूँ कि मुझे आइंदा मौक़ा मिलेगा हिंदी में लिखने का. आजकल फिर से कुछ बहस छिड़ी हुई है हिंदी और उर्दू और हिंदुस्तानी की. मुझ को यह बहस बहुत फ़िजूल मालूम होती है. हमारी बोलने की और लिखने की भाषा थोड़े से लोगों के लिए नहीं है, वह तो आम जनता की समझ में आनी चाहिए. इसलिए हमें उसको बिलकुल सहल बनाना है जिसमें न संस्कृत के शब्द बहुत हों न अरबी और फारसी के. वह भाषा क्या हो इसको थोड़े ऊपर के आदमी नहीं निश्चय कर सकते. यह बात आम जनता ही तय कर सकती है. इस सरल बीच की भाषा को हिंदुस्तानी ही कहना ठीक है और उस के लिए दोनों लिपियाँ, देवनागरी और उर्दू की, काम में लानी चाहिए. भाषा तो सरल हो लेकिन विचार कैसे ? विचार और प्रश्न भी ऐसे हों जो आम जनता से संबंध रखते हैं. तब हमारी भाषाएँ बढ़ेंगी और उन की शक्ति फैलेगी.”

इलाहाबाद जवाहरलाल नेहरू
26 मार्च 1937

प्रसाद जी जवाहरलाल जी के उक्त विचारों से असहमत थे, वह स्पष्ट कहते कि ऐसी सरल हिंदी काव्य की भाषा नहीं हो सकती. स्वयं प्रसाद जी की भाषा इस का ज्वलंत उदाहरण है.

अब मैं उक्त ग्रुप फोटोग्राफ़ (चित्र नं. 2) विषय में कुछ कहना चाहता हूँ. यह पं. रामानंद मिश्र वकील की बैठक का दृश्य है जो स्थानीय बाँस फाटक मुहल्ले पर स्थित है. रामानंद जी साहित्यिक रुचि के व्यक्ति हैं और प्रसाद जी के यहाँ बैठा करते थे. उस समय काशी में ‘रत्नाकर रसिक मंडल’ नामक एक संस्था थी. उसी ने एक गोष्ठी में जवाहरलाल जी और कमला जी को आमंत्रित किया था. उस समय जवाहरलाल जी के विचारों से काशी के साहित्यकार प्रभावित न हो सके.

यारों ने इस प्रसंग में उड़ा दिया कि उस अवसर पर नवीन जी के सभापतित्व में नेहरू जी का काशी के टाउन हाल में व्याख्यान हुआ, पर यह भी भ्रम है, क्यों कि उक्त व्याख्यान 1941 के लगभग उत्तरप्रदेश राजनीतिक सम्मेलन के अवसर पर हुआ था जब न तो प्रसाद जी थे, न कमला नेहरू ही.

 (दिनमान २३ मई, 1971 से आभार सहित)

 

मनोज मोहन

मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं.

manojmohan2828@gmail.com

Tags: 20262026 आलेखजयशंकर प्रसाद की राष्ट्रीय चेतनाजयशंकर प्रसाद के राष्ट्रीय विचारमनोज मोहनराय कृष्णदास
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Comments 2

  1. पंकज चौधरी says:
    4 months ago

    प्रसाद और निराला दोनों दक्षिणपंथी स्वर के लेखक हैं। यद्यपि निराला को ब्राह्मण होने के कारण छायावाद का सबसे बड़ा कवि माना जाता है और प्रसाद को उनसे कम आंका जाता है। जबकि प्रसाद के यहां विधाओं की जितनी विविधता, गुणवत्ता और परिमाण हैं हिंदी साहित्य के इतिहास में अभी भी किसी के लिए चुनौती है। राष्ट्रवाद भी ब्राह्मणों का ही फलता-फुलता है। काशी प्रसाद जायसवाल और जयशंकर प्रसाद इतिहास के अभागे हैं। ये बात सबसे पहले बनियों को समझनी होगी।

    Reply
    • Anonymous says:
      4 months ago

      प्रसाद जी निस्संदेह छायावाद के सबसे बड़े कवि हैं। उनके लेखन में विविधता है और दार्शनिक गहनता है जो किसी भी रचनाकार को साहित्य में स्थाई स्थान पर बैठाती है। रही बात ब्राम्हण और बनियों की तो बनिए वर्ण व्यवस्था के स्तर में स्वयं ही अपने को हर मामले में नीचे मानते हैं। तो वे क्या समझेंगे ?

      Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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