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समालोचन

Home » नये घर में अम्मा : आशुतोष

नये घर में अम्मा : आशुतोष

कथाकार योगिता यादव का तीसरा कहानी-संग्रह, ‘नये घर में अम्मा’ सेतु प्रकाशन से छप कर आया है जिसमें आठ कहानियाँ शामिल हैं. इन कहानियों की ख़ूबियों और ख़ामियों की चर्चा कर रहे हैं, आशुतोष. आशुतोष स्वयं कथाकार हैं; कथा-प्रक्रिया, विचार और प्रभाव की उनकी गहरी समझ इस विवेचना में दिलचस्प ढंग से उभरकर सामने आती है. प्रस्तुत है.

by arun dev
March 19, 2026
in समीक्षा
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नये घर में अम्मा : आशुतोष
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नये घर में अम्मा
अँधेरे की त्रासदी में उजाले की उम्मीद


आशुतोष

अनेक विशिष्ट कहानीकारों के कौशल, प्रतिभा और सामर्थ्य से निर्मित हिन्दी कहानी के इस समकालीन परिदृश्य में योगिता यादव अलग से नजर आती हैं. ‘नये घर में अम्मा’ उनका तीसरा कहानी-संग्रह है. योगिता एक ऐसी कहानीकार हैं जिन्हें अपनी कहानियों के विषय/मुद्दे पर खूब यकीन रहता है. कहानी उनके लिए वृहत्तर सामाजिक दायित्व की तरह है. इसीलिए वे अपनी कहानियों को मूल्य की तरह बरतती हैं और मन से लिखती हैं.

योगिता यादव का कहानियों की नई किताब ‘नये घर में अम्मा’ अपनी विषय-वस्तु, उद्देश्य और व्यापकता के लिहाज से हमारा ध्यान खींचती हैं. इस संग्रह में ‘शहद का छत्ता’, ‘भाप’, ‘तस्कीन’, ‘नये घर में अम्मा’, ‘सिलबट्टा शुक्ल का दाम्पत्य’, ‘ताऊ जी कितने अच्छे हैं’, ‘आखिरी नजर’ और ‘गन्ध’ के रूप में आठ कहानियाँ हैं. कहानियों का फलक बड़ा है, और उससे बड़ी है इन कहानियों की व्यंजना.

योगिता यादव

‘गन्ध’ कहानी स्त्री की यौनिकता, प्रेम और साहचर्य के स्मृति-गन्ध की विशिष्ट कहानी है. बचपने का साथ, किशोरपन का लगाव और फिर युवापन के प्रेम के बाद बिना लगभग घटनाविहीन ढंग से विवाह और संतान. सारिका और अभिनव की यह कहानी प्रेम की कहानी नहीं प्रेम की स्मृति की कहानी है. फ्लाईंग ऑफिसर अभिनव की मृत्यु मिग 21 की दुर्घटना में हो गयी थी. पति के बाद सारिका बेटे शौर्य और शेष बचा जीवन सम्भाल लेती है. आर्थिक रूप से सक्षम है किन्तु पति के साहचर्य  की स्मृति-गन्ध उसके जीवन को उतप्त किये हुए है. ऐसी परस्थितियों में अकेली बची स्त्री का जीवन-संघर्ष अन्यतम होता है, पर यह कहानी जीवन संघर्ष की नहीं चित्त और भावना के संघर्ष की कहानी है. अभिनव के प्रेम की स्मृति केवल भावनात्मक नहीं बल्कि दैहिक भी है. इसी स्तर पर आकर यह कहानी अपनी भंगिमा में खास बन जाती है. जो गन्ध कभी जीवन था वही अब जीवन को हैरान किये हुए है. सारिका की जद्दोजहद को कहानीकार ने अद्भुत ढंग से व्यक्त किया है. वह अपने काउंसलर दोस्त की राय पर उस सेक्स टॉय की दुकान पर जाती है. इसमें उसके मन की झिझक और द्वंद्व चरम पर है.

“मेरा मन हुआ कि मैं बुरका ओढ़ लूँ. ताकी कोई यह पहचान न पाए कि असल में मैं कौन हूँ. ये जगह मेरे घर और दफ्तर से बीसियों किलोमीटर दूर है, फिर भी गुजरता हुआ हर व्यक्ति ऐसा लगता है कि मुझे पहचान लेगा.”[i]

यह कहानी बहुत ही संयम के साथ स्त्री की यौनिकता के प्रश्न को रेखांकित करती है. ‘गन्ध’ स्त्री की गन्ध के प्रति आसक्ति की कहानी है तो वहीं इसी संग्रह की एक और कहानी ‘शहद का छत्ता’ गन्ध के प्रति स्त्री की विरक्ति की कहानी है. दोनों कहानियों का केन्द्रीय तत्व गन्ध है. दोनों कहानियों में गन्ध का सम्बन्ध स्त्री यौनिकता से है. ‘शहद का छत्ता’ कहानी में रानी मधु मक्खी के रूपक के माध्यम से कामकाजी स्त्रियों और उनकी महिला बॉस की दुनिया है. महिला बॉस देबोमिता सरकार अपनी मातहत काम कर रही श्रुति से  नितांत निजी सम्बन्ध बनाने की माँग करती है, दाव चलती है और फिर दबाव के स्तर तक उतर आती है. श्रुति बॉस के प्रस्ताव को लेकर असहज है.

“जिसकी देह से उसे अजीब तरह की गन्ध आती है और जिसके पास ज्यादा देर खड़ा होना भी श्रुति के लिए उबाऊ हो जाता है.”[ii]
“सरकार की देह से वही गन्ध आ रही है, जिससे श्रुति को उबकाई आती है. वे खुद ही खुद में सिमट रही है, कि सरकार यहाँ से टले”[iii]

स्त्री की यौनिकता को समझने के लिए ‘गन्ध’ और ‘शहद का छत्ता’ इन दोनों कहानियों को एक साथ पढ़ा जा सकता है. सारिका और श्रुति दोनों अपने जीवन में उमग आये ‘गन्ध’ को लेकर जूझ रहीं हैं. एक तरफ सारिका के जीवन में गन्ध प्रेम के आत्मीय स्मृति की है तो दूसरी तरफ श्रुति के जीवन में छाया हुआ गन्ध विरक्ति से उपजा है. श्रुति के सम्बन्ध में देबोमिता सरकार के दैहिक आग्रह को कहानीकार ने स्वाभविक और अस्वाभाविक की कसौटी पर नहीं, पसंद और नापसंद की कसौटी पर प्रस्तुत किया है. इन दोनों कहानियों में योगिता यादव ने देह-गन्ध के संदर्भ में स्त्री की इच्छा और सहमति को महत्वपूर्ण माना है. यह फर्क स्त्री यौनिकता के सन्दर्भ में कहानीकार के वैचारिक अधिष्ठान का फलसफा है.

योगिता यादव के पास जीवनानुभव और साहित्यानुभव की अत्यंत स्वाभाविक पूँजी है. विमर्शों से संदर्भित लोकप्रिय विषयों को भी वे नारेबाजी और शोर से बचा कर उसे हमारे समय के एक मुक्कम्मल बयान में तब्दील कर देती हैं.

‘भाप’ जाति-ग्रंथि की परिपक्व कहानी है. शहर के एक मुहल्ले में नये बसने आये धाणियाँ साहब और उनके परिवार की जाति जानने की उत्सुकता पूरे मुहल्ले को है. उनके नाम के साथ लगे धाणियाँ से कुछ पता नहीं चल पाता. धाणियाँ साहब दिल्ली विधानसभा में काम करते हैं, पत्नी स्कूल में अध्यापिका हैं और समय के साथ उनके तीनों बच्चे प्रशासनिक अधिकारी बन जाते हैं. पूरे मुहल्ले के लोगों का जायज-नाजायज काम और सिफारिश एक नेक पड़ोसी की तरह करते हैं. सभी समय-समय पर उनके शुक्रगुजार होते हैं और समय-समय पर उनकी जाति को लेकर अपनी कुंठा भी व्यक्त करते हैं. यह कहानी जाति और सामाजिक प्रस्थिति को लेकर बहुत स्वाभाविक ढंग से अपनी बात कहती है. इस कहानी में कहानीकार अपने निष्कर्ष के प्रति एकदम स्पष्ट हैं. इसीलिए जातिगत श्रेष्ठता बोध को चित्रित करने के लिए कहानी के अन्य के पात्रों को उनके नाम से नहीं उनकी जाति से सम्बोधित किया गया है. जैसे-शर्माजी, गोयल साहब, मलिक जी, मिसेज कटोच, सैनी आंटी आदि.

धाणियाँ साहब उस मुहल्ले में रहने आये थे तब उनके बेटे क्रमशः दसवीं, आठवीं और छठवीं क्लास में थे और कहानी के अंत तक आकर वे सभी प्रशासनिक अधिकारी बन गये हैं. कहानी में इन बच्चों की प्रगति और अभ्युदय में लगे समय को सूचना के स्तर पर एक कथात्मक ‘टूल्स’ के रूप में बरता गया है. कहानी धाणियाँ साहब, उनकी पत्नी और बच्चों के किसी भी स्तर पर आत्मसंघर्ष या द्वंद्व के चित्रण के प्रति लगभग खामोश है. अपने कथ्य में स्पष्ट होते हुए भी इस कहानी में यथार्थ का एकरेखीय चित्रण है. बावजूद इसके यह भारतीय शहरी जीवन के तमाम लक-दक के बीच उसकी जाति-ग्रन्थि को उजागर करने में सफल रहती है.

शीर्षक कहानी ‘नए घर में अम्मा’ ग्रामीण परिवेश में  निराश्रित स्त्री के देह और जमीन पर कब्जे के कुत्सित और कटु यथार्थ की अद्भुत कहानी है. अम्मा विधवा है, बूढी है, बेसहारा है, कुबड़ी है. अर्थात विडम्बना और असहायता की प्रतिमूर्ति. उसकी जमीन पर सबकी नजर है. गाँव भर के लिए मज़ाक़ और उपहास की पात्र है. रिश्ते में देवर, भतीजे और अब पौत्र लगने वाले पुरुष भी उसके साथ लैंगिक दुराचार करने से नहीं हिचकते हैं. इन सबके बावजूद अम्मा की जिजीविषा प्रबल है. ऐसे में उसके घोर अंधकार समय में रौशनी की किरण बन कर आती है गाँव की नयी प्रधानीन. प्रधानीन ने अम्मा का दुःख समझा. उसका घर बनवाया, नल और अन्य सुविधाओं भी उपलब्ध कराती है. यह कहानी अपनी अंतर्वस्तु में कुछ बड़े संकेत छोड़ती है. स्त्री की देह की जमीन हो या खेती की जमीन उस पर बलात कब्जा पितृसत्ता का स्वभाव है. दूसरे यह कि बूढी अम्मा के अँधेरे जीवन में उजाले की आमद एक स्त्री के कारण होती है. उम्र और समाजिक-आर्थिक स्थिति में पर्याप्त अन्तर होते हुए भी अम्मा का प्रधानीन के साथ बहनापा मुग्ध करता है –

“पर प्रधाननी ने तो उन्हें अपनी सहेली बना लिया था, पैर छूने न पायी थीं कि पकड़कर छाती से चिमटा लिया. अम्मा की आँख से आँसू बहने लगे-किस माँ ने ऐसी देवी जैसी लड़की जनी है.”[iv]

यह कहानी पंचायती राज्य की लोक कल्याणकारी संकल्पनाओं की सामर्थ्य को भी रेखांकित करती है बशर्ते पंचायती राज्य की बागडोर प्रधाननी जैसी आदर्शवादी और सम्वेदनशील स्त्री के हाथ में हो. हमेशा दूसरों के द्वारा किये गये अपमान से रोती-कलपती रहने वाली अम्मा कहानी के अंत में जिस तरह से हरीश को मार कर भगाती है वह उसके आत्मविश्वास का उदाहरण है. हरीश भाग जाता है.

“आक्रोश और आवेग में देहरी के बाहर तक निकल आयीं कि कोई और तो नहीं! आज सबको बाहर खदेड़ देंगी, ये उनका अपना घर है. अम्मा को लगा आज उनकी पीठ पर कूबड़ का भार नहीं है और उनका कद पहले की ही तरह सीधा होने लगा है.”[v]

यह प्रसंग अम्मा के बहाने स्त्री मात्र की अस्मिता और आत्मविश्वास के निर्धारण का जरूरी सूत्र बन गया है. अम्मा का नया घर केवल ईंट-सीमेंट का ढांचा नहीं बल्कि उसके नये व्यक्तित्व और नये वजूद का प्रतीक भी है. उम्र भर पिता, पति और बेटों के घर में रहने वाली स्त्री का अपना घर उसके वजूद के लिए कितना मायने रखता है; इस तथ्य को योगिता यादव की इस कहानी में देखा जा सकता है.

 

दो)

योगिता स्त्री विमर्श की रेडिकल आचारसंहिता से प्रेरणा तो ग्रहण करती है पर उसे अपनी सीमा नहीं बनाती. उनकी निगाह में स्त्री-विमर्श का आदर्श अंततः स्त्री और पुरुष के आपसी सहयोग और सम्मान पर आधारित मैत्रीपूर्ण साहचर्य की स्थापना ही है. उनकी एक महत्वपूर्ण कहानी ‘सिलबट्टा शुक्ल का दाम्पत्य’ है. यह कहानी स्त्री-विमर्श के चिर-परिचित लोकप्रिय कैनन को तोड़ती है. कहानी के शिलाव्रत शुक्ल का दाम्पत्य उनकी पत्नी सृष्टि की कैरियर आकांक्षा के भेंट चढ जाता है. शिलाव्रत उर्फ़ सिलबट्टा शुक्ल का मिजाज आम भारतीय घरेलू पुरुषों की ही तरह था. उन्होंने अब तक यही देखा और सुना था कि विवाह के बाद पत्नी अपने पति को तरह-तरह के सुस्वादु व्यंजन बनाकर खिलाने को अपना परम सौभाग्य मानती है. लेकिन भारतीय पत्नियों के इस पुरातन दायित्व को शिलाव्रत शुक्ल की पत्नी सृष्टि मिश्रा पलट देती हैं. वे ठहरीं पहले एम.ए. और फिर बाद में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाली असाध्य साधिका. वे सास-ससुर, पति के लिए भोजन तो बनाती थीं; पर भोजन बनाना उनके लिए महज एक शुष्क दायित्व ही था. ‘पति के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है’ जैसे घिसे-पिटे मुहावरे में उन्हें कोई यकीन नहीं था. शुक्ल जी हर जुगत कर हार गये किन्तु उनकी पत्नी सृष्टि किसी भी स्तर पर उनके दाम्पत्य में ‘रस’ घोलने को तैयार न हुयीं.

योगिता की इस कहानी के दो पाठ हो सकते हैं. रेडिकल स्त्रीवादी पाठ के तहत कहा जा सकता है कि सृष्टि ने अपनी अस्मिता के प्रति सचेत है. स्त्री जब अपनी खुदमुख्तारी की राह पर चलने का संकल्प लेती है तो पितृसत्ता का रस-ध्वंस होना तय है. इस पाठ में यह कहानी स्त्री-अस्मिता के संकल्प की कहानी लगेगी. इससे भिन्न एक अन्य पाठ में यह कहानी स्त्री-अस्मिता की निर्माण प्रक्रिया में पुरुष की स्थिति पर एक विवेकसम्मत विचार का प्रस्ताव करती लगेगी. सृष्टि का अपने कैरियर के प्रति सचेत आग्रह वरेण्य है, किन्तु आग्रह की उस आँधी में वे अपने दाम्पत्य से सहज ढंग से संतुलन नहीं बिठा पाती है. बिठा पाना तो दूर, वह इसके लिए कोई प्रयत्न भी नहीं करती. शिलाव्रत शुक्ल ने हनीमून पर चलने का प्रस्ताव रखा.

“मगर सृष्टि जी ने इस प्रस्ताव को भी उसी बेदिली से ठुकरा दिया और साफ़ कह दिया, शादी की रस्मों में ही माँ-बाबू ने उनका बहुत समय बरबाद करवा दिया है. अब वे पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाना चाहती हैं. जब कुछ बन जाएँगी, तब खुद ही घूम लेंगी.”[vi]

‘खुद ही घूम लेंगी’ वाक्य का निहितार्थ स्पष्ट है. पर इसके बावजूद शिलाव्रत शुक्ल और उनका परिवार सृष्टि के इस निहितार्थ के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं करते. सृष्टि की आत्मनिष्ठा शिलाव्रत शुक्ल के इच्छित दाम्पत्य-रस को बेरंग करता रहता है. इस दूसरे पाठ में कहानी अधिक अर्थवान नजर आती है. पहला पाठ एजेंडा केन्द्रित है और दूसरा पाठ संवेदना केन्द्रित है. इस दूसरे पाठ में योगिता पुरुष को भी एक संवेदनात्मक एवं समावेशी दृष्टि के साथ देखने-समझने की हिमायती नजर आती हैं. कहानीकार ने अपनी ओर से सृष्टि मिश्रा के कैरियर के प्रति चरम आग्रह को सीधे प्रश्नांकित नहीं किया है, किन्तु सृष्टि के उस आग्रह से उत्पन्न शिलाव्रत शुक्ल के खामोश दुःख को भी पर्याप्त संवेदना के साथ चित्रित किया है. यह कहानी योगिता यादव की समृद्ध और परिपक्व दृष्टि की बानगी है और यह भी कि हिंदी की स्त्रीवादी लेखन में इस दृष्टि की बहुत कम कहानियाँ मिलेंगी.

‘ताऊ जी कितने अच्छे हैं’ कहानी अपने विषय-वस्तु को लेकर अत्यंत जरुरी कहानी है. यह परिवारों के भीतर निजी रिश्तों द्वारा बच्चों के लैंगिक उत्पीड़न को अपना विषय बनाती है. कहानी का ताऊ अपने छोटे भाई के घर आता-जाता रहता है. भाई का परिवार ताऊ के अनेक अहैतुक कृपाओं से कृतज्ञ है. किन्तु ताऊ भाई की छोटी बच्ची का लैंगिक शोषण करता है. बच्ची अपनी इस व्यथा को अपने कृतज्ञ माँ-बाप से कह भी नहीं पातीं. लेकिन छोटी बेटी ताऊ के दुर्व्यवहार के प्रति अपना बदला पूरा करती है. वह ताऊ को अपना जूठा पानी पिलाती है. ‘एक झूठे आदमी को जूठा पानी पिलाना’ भले बाल सुलभ प्रतिरोध है किन्तु इसकी व्यंजना बड़ी है.

पारिवारिक रिश्तों में बच्चों के लैंगिक शोषण के मुद्दे पर शिल्पी ने एक अविस्मरणीय कहानी ‘पापा, तुम्हारे भाई’ शीर्षक से लिखी थी. योगिता की इस कहानी को पढ़ते हुए शिल्पी की उस कहानी की याद स्वाभाविक ही है. घरों के भीतर बच्चों के प्रति किये इस जघन्य अपराध ने न जाने कितने बच्चों के मुस्तकबिल को नष्ट कर दिया है. योगिता अपनी कहानी में ताऊ के यौन हमले की शिकार बच्ची की मानसिक स्थिति का मार्मिक और हतप्रभ कर देने वाला चित्रण किया है –

“दीदी झूल रही हैं मस्ती में. मेरे झूले में अब वो मस्ती नहीं रही, वह किर्र-किर्र की आवाज कर रहा है. मुझे फिर वही स्पर्श महसूस हो रहा है. मैं कस कर दोनों टाँगें भींच लेती हूँ. रात, रजाई और गन्ध ने मुझे फिर से घेर लिया है.”[vii]

इस तरह के अनेक उदाहरण इस कहानी में मौजूद हैं. यह कहानी हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि ‘जिस देश का बचपन अपने घर में ही इतना भयग्रस्त और असुरक्षित हो तो उस देश की जवानी से कितना रचनात्मक होने की उम्मीद की जा सकती है?’ इन सभी बातों के साथ यह कहानी अत्यंत उद्देश्यपूर्ण है और सलीके से लिखी गयी है.

योगिता अपने समय और संदर्भ को उसकी पारम्परिक बुनावट के साथ बदल रहे चरित्र को भी बहुत बारीकी से समझती हैं. सामाजिक-जीवन में हो रहे परिवर्तनों और उसके कारणों की पहचान में योगिता यादव के पत्रकारीय-अनुभव काम आते हैं. इस दृष्टि उनकी चर्चित कहानी ‘तस्कीन’ को देखा जा सकता है. इस कहानी में भारत की बहुजातीय और बहुधार्मिक समाज में बढ़ रही साम्रदायिक परिस्थितियों का विश्वसनीय चित्रण उपलब्ध है. कहानी की मुख्य स्त्री-पात्र श्रीमती वर्मा जो कर्तव्यनिष्ठ, आदर्शवादी और अनुशासनप्रिय सरकारी शिक्षिका हैं. उनके पति वर्मा जी पत्नी से बिलकुल उलट धर्म-भीरु व्यक्ति हैं. उनके चारो तरह विभिन्न माध्यमों के द्वारा इस्लाम के अनुयायियों के प्रति अविश्वास और घृणा का वातावरण बनाया जा रहा है. सब इस तरह के ‘नैरेटिव’ के गिरफ्त में हैं. सचेत और तार्किक श्रीमती वर्मा भी इस ‘नैरेटिव’ से बच नहीं पातीं. मुसलमानों के प्रति बनायी जा रही उस घृणा का ताजा शिकार श्रीमती वर्मा के विद्यालय की छात्रा ‘तस्कीन’ भी होती है. लेकिन अचानक से भड़के दंगे में श्रीमती वर्मा द्वारा तस्कीन को बचाने के लिए आगे आना, इस कहानी को विशिष्ट बना देता है.

धर्म-विशेष के प्रति चलाये जा रहे नैरेटिव से सामाजिक-चित्त में किस तरह परिवर्तन हो रहे हैं; योगिता बहुत विश्वसनीयता के साथ उसे दर्ज करती हैं –

“अजब परशानी हो गयी है. मन का कुछ खरीद भी नहीं सकते. दिन का चैन और रातों की नींद दोनों पर संकट है. शाम को वाक करते हुए भी मिसेज बत्तरा इसी मुद्दे पर चर्चा करती रहीं -‘क्या बतायें पूरा माहौल ही खराब हो गया है. एक वीडियो आया है मेरे मोबाइल पर, जिसमें एक जूसवाला पान की पीक मिलकर पिला रहा था लोगों को जूस में. बहुत मारा लोगों ने.”[viii]

ठीक इसी तरह की बात वर्मा जी भी करते हैं –

“मांस खाते हैं और बहुत कट्टर होते हैं, मार-काट तो इनके खून में है. नारियल पानी बेचने के बहाने हथियार पैने कर रहे हैं.”[ix]

साम्प्रदायिकता और उसके नैरेटिव पर सुभाष चन्द्र अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘साम्प्रदायिकता’ में कहते हैं कि –

“साम्प्रदायिकता दूसरे धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायियों के प्रति घृणा पैदा करती है, उसके बारे में तरह-तरह के झूठ-मिथक गढ़ती है व इनको जोर-शोर से प्रचारित करती है तथा हिंसा का सहारा लेती है. फासिस्ट साम्प्रदायिक बड़े आक्रामक तेवर के साथ इस बात को लोगों की चेतना का हिस्सा बनाने की कोशिश करते हैं कि एक समुदाय को खत्म करने में ही दूसरे समुदाय का हित है, दोनों समुदायों के हित परस्पर विरोधी हैं इसलिए वे साथ-साथ नहीं रह सकते.”[x]

योगिता यादव की कहानी ‘तस्कीन’ को इस तथ्य के रचनात्मक साक्ष्य की तरह पढ़ा जाना चाहिए. किन्तु इस कहानी की सफलता महज इस बात तक सीमित नहीं है कि वह साम्प्रदायिकता के नाक-नक्श को पहचानती है, बल्कि इससे आगे बढ़कर यह साम्प्रदायिकता के दमघोंटू वातावरण में प्रेम और संवेदना की एक ताज़ी हवा की भी कहानी है. कहानी के अंत में डरी-सहमी तस्कीन को जब त्यागी जी अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर लगभग धकेल रहे थे, वैसे में श्रीमती वर्मा एक झटके के साथ त्यागी जी की गाड़ी से तस्कीन को बाहर खींच लेती हैं और कहती हैं कि ‘ये मेरी बच्ची है.’

संरचना में यह छोटा-सा वाक्य अपनी अनुगूँज में महाकाव्यात्मक है. योगिता का मंतव्य स्पष्ट है कि हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच पैदा की जा रही घृणा, अविश्वास और वैमनस्य की बड़ी से बड़ी राजनीति से ज्यादा ताकतवर एक छोटी सी संवेदित मनुष्यता है. इस संवेदित मनुष्यता के लिए स्त्री (श्रीमती वर्मा) का आगे आना भी एक बड़ा संदेश है. इसका अर्थ है कि अँधेरों के तमाम छल-छद्म के बीच रौशनी की मुकम्मल खबर स्त्री ही लाएगी. इस दृष्टि से यह कहानी साम्प्रदायिकता के अँधेरे से ज्यादा संवेदना के उजाले की कहानी है. अपने इसी आशावाद के चलते आज के दमघोंटू माहौल से मुक्ति के लिए ‘तस्कीन-ए दिल’ के वास्ते ही सही ‘तस्कीन’ जरुरी कहानी लगती है.

योगिता की इस संग्रह कहानियों में प्रेम बहुत स्वाभाविक ढंग से आता है, और उसी तरह से चला भी जाता है. प्रेम के मिल जाने और चले जाने को लेकर कम-से-कम इस संग्रह की कहानियों में कोई जद्दोजहद नही देखने को मिलता है. उनके यहाँ परिवार केंद्र में है. वे परिवार की कहानी कहती हैं. जहाँ प्रेम है तो भी वे प्रेम की नहीं प्रेम की स्मृति की कहानी कहती हैं. ‘गन्ध’ कहानी सारिका और अभिनव के बचपन के प्रेम के बावजूद प्रेम की नहीं प्रेम की स्मृति की कहानी है, ‘सिलबट्टा शुक्ल का दाम्पत्य’ विवाह के बाद प्रेम की प्रतीक्षा की कहानी है,

‘आखिरी नजर’ कहानी प्रसंगवश प्रेम की स्मृति की कहानी है. कथा के नैरेटर ‘मैं’ की भेंट माँ की मृत्यु पर अपनी पूर्व प्रेमिका पूर्वी से होती है. उन दोनों के प्रेम की राजदार और संरक्षक माँ ही थी. पर पूर्वी की शादी कहीं अन्यत्र हो जाती है, और ‘मैं’ उसे एक सामान्य प्रसंग की तरह स्वीकार कर अपना घर-संसार बसा लेता है. प्रेम को पाने के लिए कोई संघर्ष नहीं करता और बहुत बाद में उससे मिलने पर रोता है.

ऐसे ही ‘सिलबट्टा शुक्ल का दाम्पत्य’ कहानी के शिलाव्रत शुक्ल शिला श्री से प्रेम करते थे. किन्तु विजातीय कन्या से विवाह से परिवार के इंकार और सजातीय सृष्टि मिश्रा से विवाह के निर्णय में भारी मन से ही सही शिलाव्रत शुक्ल शामिल हो जाते हैं. फिर तो अपने शिलाश्री के खोये हुए प्रेम को सृष्टि से पाने में हहरते रहते हैं. मतलब कोई पात्र स्त्री या पुरुष अपने प्रेम के लिए तनिक संघर्ष नहीं करता. सब प्रेम करते हैं, विवाह हो गया तो ठीक, नहीं हुआ तो भी ठीक. इसका कारण हैं कि योगिता की निगाह परिवार पर है. इस संग्रह की हर कहानी में परिवार मौजूद है. इस संग्रह की कहानियाँ परिवारों के सुख-चैन, दुःख-दर्द की बात करने में ज्यादा सहज हैं.

 

तीन)

योगिता परिवार की कहानी कहती हैं पर परिवार बनने की प्रक्रिया पर नहीं परिवार बन जाने के बाद की स्थितियों को अपनी कहानी का विषय बनाती हैं. यह ‘प्रक्रिया’ वाली बात अन्य स्थितियों पर भी लागू होती है. मसलन योगिता अपनी तमाम कहानियों में बताई गयी स्थितियों, घटनाओं या पात्रों की चेतना के निर्माण प्रक्रिया पर ज्यादा बात नहीं करतीं हैं. बस उनकी सूचना दे देती हैं.

‘शहद का छत्ता’ कहानी की देबोमिता सरकार सृष्टि के प्रति अपने आक्रामक यौन आकर्षण का प्रस्ताव करती है. पर कहानी में इसके स्पष्ट साक्ष्य नहीं हैं कि देबोनिता का आकर्षण केवल सृष्टि के प्रति है या अन्य किसी और स्त्री के प्रति भी है. कहानी में देबोनिता की ओर से इस सम्बन्ध उसके विचार उपलब्ध नहीं है. इसी तरह ‘भाप’ कहानी के धाणियाँ साहब के बारे में बस इतना पता चलता है कि वे दिल्ली विधानसभा में काम करते हैं. उनका पद क्या है? वे इतने सामर्थ्यवान कैसे हैं? यह सब पता नहीं चलता. धाणियाँ साहब के ‘तीनों बच्चे प्रशासनिक अधिकारी बनकर अपने-अपने पद पर पहुँच गये’. इसकी भी कोई प्रक्रिया कहानी में नहीं है. कहानी में आये हुए इन सूचनाओं/तथ्यों की प्रक्रिया के अभाव में कुछ चीजें स्पष्ट नहीं हो पाती. जैसे ‘तस्कीन’ कहानी में अलग-अलग स्थानों पर तस्कीन के सन्दर्भ में जो कहा गया है उससे भी कुछ मुश्किलें आती है. ‘क्लास की ये खूब लड़ाकी’, ‘पढ़ाई में औसत’, ‘व्यवहार में कटु’, ‘अब कुछ दिनों से तस्कीन हिजाब लपेटकर आने लगी है.’, ‘जबकि वह क्लास में उत्साहित होकर सवालों के जबाब देने वाली लड़की है.’ ‘वह धीरे-धीरे एक दूसरे ही रंग में ढल रही थी.’ इन सभी बातों से तस्कीन के व्यक्तित्व को समझने की आंतरिक संगति थोड़ी लड़खड़ा जाती है. दूसरे यह कि तस्कीन के बार में ये सारी बातें ‘वाचक’ के द्वारा कहीं गयी हैं, तस्कीन ऐसा क्यों होती जा हैं इसकी कोई प्रक्रिया कहानी में नहीं है.

‘नये घर में अम्मा’ कहानी में बूढी, कुबड़ी और विधवा अम्मा के प्रति कुनबे के देवर, भतीजे और पौत्र के द्वारा किये जा रहे लैंगिक दुराचार के प्रति गाँव के किसी व्यक्ति की कोई प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं है. यहाँ तक कि अम्मा ने प्रधानीन से पहली ही मुलाकात में –

“फिर हिम्मत जुटाकर टूटी छान, फूटी किस्मत और सूखी देह को रौंदती सब दास्ताँ धीरे-धीरे कह सुनाई.”[xi]

बावजूद इसके ‘सूखे देह को रौंदने’ वाली बात पर प्रधानीन की कोई प्रतिक्रिया कहानी में नहीं है. एक निराश्रित बूढी स्त्री के प्रति लैंगिक उत्पीड़न के प्रति गाँव के लोगों की चुप्पी अस्वाभाविक है. चुप्पी है तो इस चुप्पी का कारण/प्रक्रिया भी होनी चाहिए. दरअसल कहानी में जो कहा जाता है यदि उसकी तार्किक प्रक्रिया भी उसी कहानी में मौजूद है तो कहानी की संप्रेषणीयता और समृद्ध होती है.

इन प्रक्रियागत सीमाओं को थोड़ी देर के लिए यदि स्थगित कर देखा जाय तो योगिता की कहानियाँ अपने कथ्य और मकसद में बेजोड़ ठहरती हैं. छोटे-छोटे वाक्यों में सच्ची बात कहना योगिता को जैसे सिद्ध हो गया है. यह एक ईमानदार लेखन है जिसमें ऊपरी तौर पर आयातित अलंकरणों की चमक-दमक नहीं बल्कि बदलाव की सात्विक और स्वाभाविक कौंध है. इसीलिए शिल्प की जटिलता में पड़े बगैर अपनी बात कहने की निष्ठा और सामर्थ्य के चलते योगिता अलग दिखती हैं. वे भाषाई और शिल्पगत ‘शोर’ की जगह विषय-वस्तु की मूल ‘ध्वनि’ को महत्व देती हैं. उन्हें दिखने वाली कहानियों की जगह महसूस की जाने वाली कहानियाँ लिखने पर ज्यादा यकीन है.

ख़ास बात यह भी कि इस संग्रह की कहनियाँ अँधेरे की त्रासदी के बावजूद उजाले की उम्मीद को जिंदा रखती हैं और आज के समय में ऐसा होना कोई मामूली बात नहीं है.

 

यह संग्रह यहाँ से प्राप्त करें .

सन्दर्भ :

[i]   यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025, पृष्ठ : 112
[ii]    यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025, पृष्ठ : 18
[iii]   यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025,  पृष्ठ : 19
[iv]   यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025, पृष्ठ: 79
[v]    यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025,  पृष्ठ : 80
[vi]   यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025, पृष्ठ : 86
[vii]  यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025,  पृष्ठ : 99
[viii] यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025, पृष्ठ : 51
[ix]   यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025, पृष्ठ : 52
[x]   चन्द्र, सुभाष, साम्प्रदायिकता, साहित्य उपक्रम, 2008, पृष्ठ : 12

[xi]  यादव योगिता , नये घर में अम्मा, सेतु प्रकाशन, प्रा. लि., नोयडा, 2025, पृष्ठ : 73

आशुतोष

प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानियाँ-आलेख प्रकाशित. कहानियों का ओड़िया, तेलुगु और अंग्रेजी में अनुवाद और अनेक कहानियों की नाट्य प्रस्तुतियाँ.  सहलेखन और संपादन में सात पुस्तकें प्रकाशित. दो कहानी संग्रह – “मरें तो उम्र भर के लिए” (भारतीय ज्ञानपीठ, अब वाणी प्रकाशन) और “उम्र पैंतालीस बतलाई गयी थी” (आधार प्रकाशन, चंडीगढ़) से प्रकाशित.
भारतीय भाषा परिषद कोलकाता का युवा पुरस्कार और वनमाली राष्ट्रीय युवा कथा सम्मान से सम्मानित.

सम्प्रति : एसोसियट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, कला संकाय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली – 110007

ashutosh2025du@gmail.com

Tags: 20262026 समीक्षाआशुतोषनये घर में अम्मायोगिता यादव
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Comments 3

  1. डॉक्टर विजया सती says:
    4 weeks ago

    बेहतरीन आलेख
    कथाकार को समझने का ठोस आधार देता है

    Reply
  2. संध्या says:
    4 weeks ago

    बहुत खूबसूरत समीक्षा। कहानियों की कथा और शिल्प दोनों को समझने में सहायक है।

    Reply
  3. राकेश बिहारी says:
    3 weeks ago

    बढ़िया लिखा है आशुतोष ने। कहानी के मर्म को समझते हैं आशुतोष।

    Reply

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