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समालोचन

Home » नये शेखर की जीवनी (आगमन और प्रस्थान) : राकेश कुमार मिश्र

नये शेखर की जीवनी (आगमन और प्रस्थान) : राकेश कुमार मिश्र

by arun dev
June 10, 2026
in समीक्षा
Reading Time: 12 mins read
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नये शेखर की जीवनी (आगमन और प्रस्थान) : राकेश कुमार मिश्र
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नये शेखर की जीवनी (आगमन और प्रस्थान)
भाषा में साहस का शिल्प


राकेश कुमार मिश्र

 

आरंभ

यदि हमें हिंदी के समकालीन परिदृश्य में बेहद महत्त्वपूर्ण कवि, उपन्यासकार, प्रखर आलोचक और सजग संपादक अविनाश मिश्र के विविध रचना-संसार और उनकी रचनात्मक बेचैनी को एक शब्द में रेखांकित करना हो, तो वह शब्द होगा—“दुस्साहस”.

यह ‘दुस्साहस’ कोई साधारण जिद नहीं है, बल्कि स्थापित परिपाटियों, जड़ हो चुकी रूढ़ियों और स्वीकृत भाषाई ढांचों को चुनौती देने की एक कलात्मक जिद है. इस संदर्भ में हिंदी के प्रतिष्ठित कवि देवी प्रसाद मिश्र का वह मार्मिक अवलोकन (अवकलन) अनायास ही स्मृति में कौंध जाता है, जहाँ वे रचनात्मक निर्भीकता को लेखक का अनिवार्य गुण मानते हैं. अविनाश मिश्र की लेखनी इसी निर्भीक परंपरा का विस्तार करती है, जहाँ स्थापित प्रतिमानों से टकराने का हौसला है.

इस समीक्षक को ज्ञात है कि समीक्षा कोई पूर्व-निर्धारित ‘टेम्पलेट’ या कोई यांत्रिक सांचा नहीं है, जिसे हर पुस्तक पर जस का तस मढ़ दिया जाए. समीक्षा मूलतः किसी कृति (टेक्स्ट) के साथ बिताए गए सघन समय की, उसके भीतर की यात्रा की और उस यात्रा से उपजी अनुभूतियों की एक जीवंत स्मृति है. ‘हिंद युग्म’ द्वारा जनवरी 2025  में प्रकाशित यह उपन्यास—नये शेखर की जीवनी [आगमन और प्रस्थान]—पाठक को ठीक इसी तरह के एक बौद्धिक और संवेदनात्मक अनुभव से गुजारता है. इसी आत्मीय स्मृति को शब्दबद्ध करने और इस विशिष्ट टेक्स्ट की परतों को खोलने के संकल्प के साथ यह पाठक अब अपनी यात्रा को आगे बढ़ाता है. यहाँ ध्यान देना ज़रूरी है कि उपन्यास का दूसरा भाग ‘प्रस्थान’ पूरी तरह नया है, और इसके पहले भाग ‘आगमन’ के भी कुछ हिस्सों को लेखक ने पुनर्लेखन (rewrite)  किया है. इसलिए, उपन्यास के इस नए रूप को केवल 2018 के संस्करण का दोहराव नहीं माना जा सकता.

 

 

 ‘आगमन’ में प्रवेश: आधुनिकता से उत्तर-आधुनिकता की यात्रा

चर्चित लेखक अविनाश मिश्र द्वारा रचित यह उपन्यास समकालीन हिंदी साहित्य की एक बेहद महत्त्वपूर्ण और साहसिक कृति के रूप में उभरता है. इस उपन्यास के मूल आधार, दर्शन और बनावट को समझने के लिए हमें इसके वैचारिक ताने-बाने को थोड़ा और करीब से देखना होगा. इस उपन्यास के केंद्र में ‘प्रयोगवाद‘ और ‘नई कविता‘ आंदोलन के जनक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ के कालजयी और क्लासिक उपन्यास ‘शेखर: एक जीवनी‘ (1941-1944) की छायाएं दिखाई देती हैं. अज्ञेय का शेखर बीसवीं सदी के मध्य का एक ऐसा चरित्र था, जो अपने समय की रोमानियत, स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा, सशस्त्र क्रांति और घोर व्यक्तिवाद के द्वंद्व में फंसा हुआ था. वह सामंतवाद और औपनिवेशिक दासता के खिलाफ एक बौद्धिक विद्रोह था.

अविनाश मिश्र का यह उपन्यास अज्ञेय की उस विरासत को सिर्फ स्वीकार नहीं करता, बल्कि उससे आगे निकलने की एक छटपटाहट और व्याकुलता को भी दर्ज़ करता है. यह ‘नया शेखर’ आज के उत्तर-आधुनिक (Post-modern) समय के अंतर्विरोधों, गहरे बौद्धिक संकटों और टुकड़ों में बिखरी हुई आत्म-खोज की यात्रा का एक जीवंत दस्तावेज़ है. जहाँ ‘पुराना शेखर’ अपनी अस्मिता को गढ़ रहा था, वहीं ‘नया शेखर’ अपनी पहचान के बिखरने और उसे फिर से समेटने की जद्दोजहद से गुजर रहा है.

अविनाश मिश्र यहाँ भाषा को केवल संवाद या कहानी आगे बढ़ाने का माध्यम नहीं रहने देते. उनके हाथों में जाकर भाषा एक धारदार वैचारिक हथियार बन जाती है. वे पारंपरिक शिल्प को तोड़ते हैं और एक ऐसा नया नैरेटिव (कथानक) रचते हैं जो पाठक को लगातार सोचने पर मजबूर करता है.

उपन्यास के प्रथम भाग ‘आगमन’ में प्रवेश करते ही जो तत्व पाठक को सबसे पहले अपनी ओर आकर्षित करता है, वह है शेखर की “घोर ईमानदारी”. यह ईमानदारी कोई सामान्य नैतिक गुण नहीं है, बल्कि यह इस हद तक बेबाक और निर्भीक है कि ‘नये शेखर’ के जीवन में आत्मघाती (Self-destructive) प्रतीत होने लगती है. वह समाज, व्यवस्था और यहाँ तक कि ख़ुद के ढोंग को भी पूरी नग्नता के साथ उजागर करता है, भले ही इसकी कीमत उसे अपने विनाश से चुकानी पड़े.

यदि हम तथ्यों और इतिहास के धरातल पर देखें, तो उपन्यास का शेखर एक बेहद संवेदनशील समय में सांस लेता है: “वह इंदिरा गांधी की हत्या (1984) के बाद और राजीव गांधी की हत्या (1991) के ठीक पहले पैदा हुआ था.” इस विशिष्ट कालखंड पर ठहरकर विचार करना बेहद ज़रूरी है. अस्सी और नब्बे का यह दशक भारतीय इतिहास में केवल राजनीतिक उथल-पुथल का समय नहीं था, बल्कि यह बड़े आर्थिक और सामाजिक बदलावों की आंधियों का दौर था. यह वह दौर था जब भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था के दरवाज़े वैश्विक बाज़ार के लिए खोले. इसके आगमन के साथ ही भारतीय समाज में सबकुछ बाज़ार, मुनाफे और एक अजीब सी बदहवासी की चपेट में आने लगा था. यह दूरदर्शन के एकाधिकार और शुरुआती बॉलीवुड का वह दौर था जो सतही और बेदम तो था, लेकिन इसके बावजूद उसने भारतीय मध्यवर्ग के भीतर एक नई ‘कंज्यूमरिस्ट’ (उपभोक्तावादी) संस्कृति और बड़ी-बड़ी आकांक्षाओं को नए सिरे से गढ़ना शुरू कर दिया था.

‘नये शेखर की जीवनी’ दरअसल उस पीढ़ी की कहानी है जो एक पुराने, संभलते हुए भारत में पैदा हुई थी लेकिन जिसे जवानी में कदम रखते ही एक बेकाबू, वैश्वीकृत और बाज़ारवादी दुनिया में धकेल दिया गया. अविनाश मिश्र का यह उपन्यास इसी 80 और 90 के दशक के उस संक्रमण काल की त्रासदी और एक बौद्धिक युवा के भीतर चलते मानसिक द्वंद्व का एक बेजोड़ साहित्यिक दस्तावेज़ है.

 

 

नगरीय समाजशास्त्र, ‘स्पेशियल टर्न‘ और उत्तर-आधुनिक संकट

अविनाश मिश्र का उपन्यास ‘नये शेखर की जीवनी’ केवल एक व्यक्ति के अंतर्मन की कथा नहीं है, बल्कि यह भूगोल, स्थान (Space) और मानव-चेतना के अंतर्संबंधों का एक जटिल आख्यान है. इसे समकालीन नगरीय समाजशास्त्र और उत्तर-आधुनिक दर्शन के आलोक में निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से गहराई से समझा जा सकता है:

 

  1. ‘स्पेशियल टर्न‘ (Spatial Turn) और शहरों का मनोवैज्ञानिक भूगोल

साहित्य और समाजशास्त्र में ‘स्पेशियल टर्न’ (स्थानिक मोड़) इस बात पर ज़ोर देता है कि ‘स्थान’ या ‘शहर’ केवल एक निर्जीव पृष्ठभूमि (Background) नहीं होते जहाँ घटनाएँ घटित होती हैं, बल्कि वे ख़ुद में एक सक्रिय चरित्र होते हैं जो मानव व्यवहार और चेतना को निर्मित व रूपांतरित करते हैं.

‘नये शेखर’ की इस यात्रा में अलग-अलग शहर (जैसे दिल्ली और अन्य महानगरीय केंद्र) उसके साथ किसी साए या परछाई की तरह निरंतर चलते हैं. ये शहर उसके लिए केवल भूगोल नहीं हैं, बल्कि उसकी मानसिक बनावट के हिस्से हैं. उपन्यासकार बेहद बारीकी से रेखांकित करता है कि इन शहरों ने शेखर को सिर्फ ‘बनाया’ (विकसित) ही नहीं है, बल्कि पर्याप्त ‘बिगाड़ा’ (विखंडित) भी है. महानगरीय जीवन की गति, उसकी अमानवीयता और उसकी कृत्रिमता शेखर के भीतर एक गहरा अलगाव पैदा करती है. शहर यहाँ एक ऐसे कारखाने के रूप में उभरता है जो मनुष्य की सहज संवेदनाओं को कुचलकर उसे उत्तर-आधुनिक सांचे में ढाल देता है.

 

  1. महानगरीय विसंगतियां और नैतिकता का नया विमर्श (दिल्ली का संदर्भ)

महानगरीय जीवन की विसंगतियों और पूँजीवादी दबावों को रेखांकित करते हुए दिल्ली के संदर्भ में शेखर को एक गहरा इल्हाम होता है, जो महानगरीय समाजशास्त्र का एक बड़ा सच बनकर उभरता है:

“एक नैतिक व्यक्ति की ज़रूरतें बहुत कम होती हैं. इतनी कम कि धीरे-धीरे वे बिल्कुल ख़त्म हो जाती हैं. ज़रूरतों का पूरा न हो पाना भी आदमी को नैतिक बना देता है.” (पृष्ठ १७)

यह कथन उपभोक्तावादी (Consumerist) संस्कृति पर एक करारा प्रहार है. दिल्ली जैसे महानगर जहाँ मनुष्य की पहचान इस बात से तय होती है कि वह क्या और कितना उपभोग कर सकता है, वहाँ शेखर नैतिकता की एक नई परिभाषा खोजता है. महानगर लगातार कृत्रिम ज़रूरतें पैदा करता है और जो व्यक्ति इस अंधी दौड़ में शामिल होने से इनकार कर देता है या जो संसाधनों के अभाव के कारण इसमें शामिल नहीं हो पाता, समाज उसे भले ही ‘असफल’ माने, लेकिन वही अभाव उसे एक अलग तरह की ‘नैतिकता’ और आन्तरिक स्वतंत्रता प्रदान करता है. यहाँ ‘ज़रूरतों का ख़त्म होना’ व्यवस्था के खिलाफ एक मूक विद्रोह है.

 

  1. अतीत की बेदखली और उत्तर-आधुनिक मानव (Post-modern Man) का संकट

नगरीय समाजशास्त्र का एक कड़वा सच यह भी है कि महानगर मनुष्य को उसके अतीत और जड़ों से काट देते हैं. इस उपन्यास में अतीत और परिवार को एक बहुत ही हल्की, धुंधली परछाई की तरह पार्श्व (Background) में रखा गया है. यह कोई कलात्मक कमज़ोरी नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के उस ‘उत्तर-आधुनिक मानव’ (Post-modern Man) का सचेत प्रतीक है जिसके पास अतीत की स्मृतियाँ या तो पूरी तरह धुंधली हो चुकी हैं या वे गायब हैं. पारंपरिक उपन्यासों में चरित्र अक्सर अपने अतीत और पारिवारिक पृष्ठभूमि से ऊर्जा लेते थे, लेकिन ‘नया शेखर’ इस संबल से वंचित है. वह एक ऐसी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करता है जिसके पास कोई अतीत नहीं है, क्योंकि बाज़ार और महानगर ने उसकी स्मृतियों को ‘कमोडिटी’ (वस्तु) में बदल दिया है या मिटा दिया है. उसके पास एक हिंसक वर्तमान है, जहाँ हर पल अस्तित्व को बचाए रखने का एक क्रूर और गलाकाट संघर्ष है. एक अनिश्चित भविष्य है, जहाँ कोई ठोस आश्वासन या उम्मीद दिखाई नहीं देती.

अविनाश मिश्र का यह आख्यान ‘स्पेशियल टर्न’ (स्थानिक विमर्श) के माध्यम से यह दिखाता है कि कैसे कंक्रीट के जंगल और महानगरीय संरचनाएँ मनुष्य के भीतर के आत्म (Self) को खंडित करती हैं. ‘नये शेखर की जीवनी’ दरअसल उस आधुनिक त्रासदी का दस्तावेज़ है जहाँ मनुष्य शहर में रहने तो आता है, लेकिन धीरे-धीरे ख़ुद भी उसी शहर की तरह एक ठंडी, बेजान और अंतर्विरोधों से भरी संरचना में तब्दील हो जाता है.

 

 

कानपुर–आख्यान: एथनोग्राफिक अध्ययन और ‘स्पेस ऑफ ट्रांजिशन‘

अविनाश मिश्र के उपन्यास ‘नये शेखर की जीवनी’ में ‘कानपुर’ केवल एक भौगोलिक स्थान या कहानी का अगला पड़ाव भर नहीं है. उपन्यास के प्रथम भाग ‘आगमन’ (पृष्ठ २० से ३३) में कानपुर का जो चित्रण किया गया है, वह इस उपन्यास को एक विशिष्ट कलात्मक और दार्शनिक ऊंचाई प्रदान करता है. यहाँ लेखक एक उपन्यासकार से अधिक एक मानवविज्ञानी (Ethnographer) की भूमिका में दिखाई देते हैं, जो शहर की धड़कनों, उसकी भाषा और उसके अनूठे मनोविज्ञान का एक सचित्र एथनोग्राफिक अध्ययन (Ethnographic Study) प्रस्तुत करते हैं. नगरीय समाजशास्त्र में कुछ शहरों को ‘स्पेस ऑफ ट्रांजिशन’ (संक्रमण का क्षेत्र) माना जाता है—एक ऐसा स्थान जहाँ पुरानी संस्कृतियाँ टूट रही होती हैं और आधुनिकता पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाती. कानपुर ऐतिहासिक रूप से ‘पूर्व का मैनचेस्टर’ (मजदूरों और मिलों का शहर) रहा है, जहाँ एक अनूठा अल्हड़पन, अक्खड़पन और ज़िंदादिली है.

‘नये शेखर’ के लिए कानपुर एक ऐसा ‘संक्रमण क्षेत्र’ बनता है जो उसके भीतर के सीधेपन को तोड़ता है और उसे जीवन की कड़वी और वास्तविक सच्चाइयों से रू-ब-रू कराता है. यह शहर उसे इस तरह बदलता है कि जब वह वहाँ से निकलता है, तो वह पहले जैसा नहीं रह जाता. उपन्यासकार इस बदलाव को बेहद खूबसूरती से दर्ज़ करते हैं: “कानपुर से जुदा होकर शेखर एक एकांत वक्ता बन चुका था, इसलिए वह डायरी लिखने लगा. यह डायरी ‘बदनाम डायरी’ हुई…” महानगरों की भीड़ में अकेला हो गया शेखर जब आत्म-संवाद के लिए डायरी लिखना शुरू करता है, तो उस पर कानपुर की उस ‘अजीब’ संस्कृति का प्रभाव साफ दिखता है, जिसे वह ‘बदनामी’ का नाम देता है.

 

 

‘बदनामी‘ का समाजशास्त्र: एक अनूठा सांस्कृतिक मुहावरा

कानपुर के विशिष्ट चरित्र और उसके भाषाई व सांस्कृतिक सौंदर्य को समझने के लिए उपन्यास का यह अंश सबसे मारक और उल्लेखनीय है:

“कानपुर में वह आदमी जो सबसे अच्छी कुल्फी खिलाता था, अपनी कुल्फी को बदनाम कुल्फी कहता था. कानपुर का सबसे अच्छा होटल सबसे बदनाम होटल था… सबसे अच्छे लड्डू ‘ठग्गू के लड्डू’ के नाम से बदनाम थे… बदनामी के वास्तविक अर्थ और आयाम क्या हैं, ये समझने के लिए कानपुर में रहना बहुत ज़रूरी है.” (पृष्ठ ३३)

यह अंश कानपुर के एक बहुत गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक यथार्थ को उजागर करता है. सामान्य दुनिया में ‘बदनामी’ एक नकारात्मक शब्द है, लेकिन कानपुर के लोक-व्यवहार में आकर इस शब्द का अर्थ पूरी तरह उलट जाता है. यहाँ ‘बदनामी’ का अर्थ पतन नहीं, बल्कि एक प्रकार की प्रसिद्धि, प्रामाणिकता और विशिष्टता है.

यहाँ अर्थ का उलट जाना यानी Inversion of Meaning देखा जा सकता है. यह मानवविज्ञान (Ethnography) का एक सुंदर उदाहरण है, जहाँ कोई समाज स्थापित भाषाई प्रतीकों को तोड़कर अपने नए अर्थ गढ़ता है. कानपुर में ‘बदनामी’ दरअसल एक आत्मीयता का, एक गहरे अपनेपन का और श्रेष्ठता का पर्याय बन जाती है. अविनाश मिश्र का यह ‘कानपुर आख्यान’ हिंदी साहित्य में शहरों के चित्रण की एक नई मिसाल है. लेखक ने कानपुर की गलियों, उसके स्वाद और उसके भाषाई मुहावरों के ज़रिए यह दिखाया है कि कैसे एक शहर मनुष्य के भीतर के ‘एकांत वक्ता’ को जगा सकता है. ‘नये शेखर’ के निर्माण में कानपुर की यह ‘बदनाम’ विरासत एक बेहद ज़रूरी और ठोस बुनियाद की तरह काम करती है.

कानपुर ने शेखर को जो सिखाया, वह किसी यूनिवर्सिटी या बौद्धिक सेमिनार में नहीं सीखा जा सकता था. उसने शेखर को जीवन को उसकी समग्रता और उसके अंतर्विरोधों के साथ देखना सिखाया. ‘बदनामी’ के इस नए व्याकरण को समझकर शेखर समाज के तय किए गए ‘सफलता’, ‘नैतिकता’ और ‘सम्मान’ के खोखले पैमानों से मुक्त हो जाता है. यही कारण है कि उसकी डायरी भी ‘बदनाम डायरी’ बनती है—एक ऐसी डायरी जो समाज के झूठ को स्वीकार करने के बजाय अपनी कड़वी सच्चाइयों को ईमानदारी से बयां करती है.

 

 

मध्य
‘प्रस्थान’ की तैयारी: दिल्ली की क्रूरता और दैहिक राजनीति (Biopolitics)

उपन्यास के दूसरे भाग ‘प्रस्थान’ में कथा दिल्ली वापस लौटती है, जहाँ दिल्ली अपने सबसे अमानवीय और वीभत्स रूप में सामने आती है. दिल्ली के इस अंधकार को दर्शाने के लिए उपन्यासकार तीन नए पात्रों—सन्नी, रीना और रोली—से हमारा परिचय कराता है, जिनका जीवन कबाड़ और कूड़े के पहाड़ों के बीच सांस लेते हुए बीत रहा है. अविनाश मिश्र अपने पूर्ववर्ती उपन्यास ‘वर्षावास’ (2022) की ही तरह यहाँ भी कामुकता, देह और यौनिकता के अनेक पक्षों को बेधड़क चित्रित किया है. उपन्यासकार ने एड्स और कंडोम के इतिहास के ज़रिए यह दिखाया है कि कैसे पूँजीवाद और बाज़ारवादी व्यवस्था ने नियंत्रण के नए स्वरूप स्थापित करने के लिए अंततः मानव अस्तित्व को ही एक ‘निरोध’ में बदल दिया.

 

निरोध का ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय यात्राक्रम

निरोध का शुरुआती उल्लेख प्राचीन मिस्र और फ्रांस की ‘लेस कॉम्बेरेल्स’ गुफाओं के भित्तिचित्रों में मिलता है. शुरुआत में ये पशुओं की अंतड़ियों या लिनन के कपड़ों से बनते थे. सन् 1640 में प्रयुक्त ऐसा ही एक प्राचीन निरोध आज भी ऑस्ट्रिया के संग्रहालय में सुरक्षित है. अमेरिकी आविष्कारक चार्ल्स गुडइयर ने वल्केनाइज्ड रबर विकसित किया, जो लचीला और जलरोधी था. लंबे कानूनी संघर्ष के बाद, 1844 में इसे अमेरिकी पेटेंट संख्या 3633 प्राप्त हुई. इसने निरोध के आधुनिक औद्योगिक उत्पादन की नींव रखी. 1920 के दशक में लेटेक्स की खोज ने इस उद्योग को पूरी तरह बदल दिया. इसकी उच्च तन्य शक्ति (Tensile Strength) और टिकाऊपन ने न केवल सुरक्षा को पुख्ता किया, बल्कि बाज़ार के माध्यम से मानव शुक्राणुओं की हदें और भविष्य की जनसांख्यिकी (Demographics) को नियंत्रित करना शुरू कर दिया.

निरोध का यह इतिहास केवल एक वस्तु का विकास नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे राज्य और पूँजी ने मनुष्य की सबसे निजी और प्राकृतिक इच्छाओं को तकनीक और बाज़ार के दायरे में लाकर उन्हें अपनी शर्तों पर संचालित किया है.

 

 

मिशेल फूको, बायो-पॉलिटिक्स (जैव-राजनीति) और ‘नये शेखर‘ का प्रतिरोध

अविनाश मिश्र के उपन्यास ‘नये शेखर की जीवनी’ (विशेषकर ‘प्रस्थान’ खंड) में एड्स और निरोध के इतिहास का जो आख्यान बुना गया है, वह केवल तकनीकी या ऐतिहासिक विवरण नहीं है. जब हम इसके सामाजिक और राजनैतिक निहितार्थों को देखते हैं, तो यह विमर्श सीधे तौर पर बीसवीं सदी के प्रख्यात फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको [Michel Foucault (1926–1984)] के ‘बायोपॉवर’ और ‘बायो-पॉलिटिक्स’ के सिद्धांतों से जाकर जुड़ता है. मिशेल फूको ने स्थापित किया था कि आधुनिक राज्यसत्ता (Modern State) अब केवल सीमाओं की रक्षा या मृत्युदंड देने तक सीमित नहीं है. अब उसका चरित्र बदल चुका है; वह ‘बायोपॉवर’ (जैव-शक्ति) का रूप धारण कर चुकी है. इसका अर्थ है: सत्ता अब मनुष्य को सीधे मारने के बजाय, उसके जीवित रहने की शर्तों को नियंत्रित करती है. वह मनुष्य के शरीर (Body), उसकी कामुकता (Sexuality), उसकी प्रजनन दर (Demographics) और उसके स्वास्थ्य को अपनी शर्तों पर संचालित और विनियमित (Regulate) करती है.

उपन्यासकार इसी सिद्धांत के आलोक में दिखाता है कि कैसे मनुष्य की सबसे निजी, प्राकृतिक और सहज जैविक क्रियाओं (Biological Functions) को राज्य और पूँजी ने अपने नियंत्रण के दायरे में ले लिया है.

 

 

एड्स और पूँजीवादी बाज़ार का गठजोड़

1980 के दशक में जब दुनिया के सामने एड्स (AIDS/HIV) जैसी भयानक और रहस्यमयी महामारी का संकट आया, तो वह समय केवल एक स्वास्थ्य आपातकाल नहीं था. फूको के नज़रिए से देखें तो, वैश्विक पूँजीवादी बाज़ार और बहुराष्ट्रीय संस्थाओं ने इस मानवीय त्रासदी को एक बहुत बड़े व्यापारिक और राजनैतिक ‘अवसर’ के रूप में भुनाया. तीसरी दुनिया के विकासशील और गरीब देशों में ‘सुरक्षा’ और ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य’ के बड़े-बड़े नारों के साथ निरोध और अन्य स्वास्थ्य उत्पादों को मुफ्त या बेहद सस्ते दामों में बाँटा गया. यह वितरण केवल एक वायरस से बचाव का परोपकारी उपकरण नहीं था. इसके पीछे वैश्विक पूँजीवाद का एक गहरा राजनैतिक एजेंडा था, जिसका उद्देश्य विकासशील देशों की आबादी, उनकी कामुकता और उनकी देह पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना था. पूँजीवाद ने यहाँ मनुष्य की कामुकता को भी एक ‘उत्पाद’ (Commodity) और नियंत्रण के सांचे में तब्दील कर दिया. सभ्यता और तकनीक के विकास के साथ-साथ ये उत्पाद और अधिक परिष्कृत, अत्यधिक लचीले और वैज्ञानिक रूप से ‘सुरक्षित’ तो होते गए, लेकिन जैसा कि उपन्यासकार अंत में एक बड़ा दार्शनिक संकेत करता है: “इसके बावजूद वे कभी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं हो पाए.”

यह अविश्वसनीयता (Unreliability) केवल लेटेक्स या रबर से बने एक भौतिक उत्पाद की तकनीकी विफलता नहीं है. यह दरअसल उस आधुनिक पूँजीवादी और नव-उदारवादी व्यवस्था (Neo-liberal System) की अविश्वसनीयता है, जो हमारे चारों तरफ सुरक्षा, आराम और चकाचौंध का एक छद्म भ्रम (Illusion of Safety) पैदा करती है. यह व्यवस्था हमें यह विश्वास दिलाती है कि हम सुरक्षित और स्वतंत्र हैं, जबकि पर्दे के पीछे वह धीरे-धीरे मनुष्य को उसकी मौलिक, आदिम और वास्तविक स्वतंत्रता से पूरी तरह वंचित कर देती है. यह सुरक्षा ही अंततः हमारा कारावास बन जाती है.

 

 

‘नये शेखर‘ का भाषा और शिल्प के माध्यम से प्रतिरोध

इस चौतरफा अमानवीय और नियंत्रित व्यवस्था के बीच अविनाश मिश्र का ‘नया शेखर’ एक बेहद अनूठा चरित्र बनकर उभरता है. जहाँ एक तरफ तिहाड़ जैसी जेलें हैं, महानगरों का अलगाव है, और दूसरी तरफ बाज़ार का यह अदृश्य बायो-पॉलिटिकल शिकंजा है—वहां शेखर आत्मसमर्पण नहीं करता. वह इस दमनकारी तंत्र के खिलाफ अपनी भाषा के ‘दुस्साहस’ और उपन्यास के विद्रोही ‘शिल्प’ (Anti-novel Structure) को अपना हथियार बनाता है. पारंपरिक आख्यान के नियमों को तोड़ना ही उसका पहला विद्रोह है. वह इस क्रूर और कृत्रिम समय में अपनी “घोर ईमानदारी” को बचाए रखते हुए जीवित रहने और इस दमघोंटू यथार्थ से ‘प्रस्थान’ करने की एक साहसिक कोशिश करता है. यह उपन्यास फूको के सिद्धांतों का एक व्यावहारिक और साहित्यिक विस्तार है. यह दिखाता है कि समकालीन समाज में मनुष्य का शरीर ही सत्ता और बाज़ार का सबसे बड़ा कुरुक्षेत्र बन चुका है, और इस कुरुक्षेत्र में केवल वही कला या भाषा प्रासंगिक है जो इस नियंत्रण को पहचानने और उसे चुनौती देने का दुस्साहस रखती है.

 

 

‘प्रस्थान‘: कारावास का समाजशास्त्र, प्रति-उपन्यास और बहुध्वन्यात्मकता (Polyphony)

अविनाश मिश्र के इस वृहत्तर आख्यान का दूसरा भाग ‘प्रस्थान’ कलात्मक और वैचारिक धरातल पर अत्यंत विस्मयकारी है. यह भाग न केवल पहले भाग ‘आगमन’ के सूत्रों को आगे बढ़ाता है, बल्कि उपन्यास की पारंपरिक विधागत सीमाओं को पूरी तरह से ध्वस्त कर देता है. उपन्यास के इस खंड के आरंभ में पिता की एक धुंधली और हल्की छाया दिखाई देती है. यह छाया कोई ठोस उपस्थिति नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव है जो उपन्यास के अंत में दोबारा लौटकर आता है. लेकिन ‘प्रस्थान’ का सबसे महत्वपूर्ण और विचलित करने वाला पक्ष है—अपराध और कारावास की आंतरिक दुनिया.

सन्नी नामक चरित्र के माध्यम से हमारा सामना दिल्ली की ‘तिहाड़ जेल’ के उस वीभत्स, क्रूर और भयावह संसार से होता है, जो सामान्य समाज की नज़रों से ओझल है. लेखक यहाँ स्थापित करते हैं कि तिहाड़ सिर्फ सजा काटने का स्थान (कारावास) नहीं है, बल्कि वह छोटे और नौसिखिए अपराधियों को ‘बड़ा अपराधी’ बनाने तथा उन्हें अंडरवर्ल्ड में स्थापित करने का एक संगठित प्रशिक्षण केंद्र बन चुका है.

बाहरी पूँजीवादी संसार के ‘सेवकों’ या बिचौलियों की तरह, तिहाड़ के भीतर के ‘सेवादार’ (वे कैदी जिन्हें कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं) सब कुछ अपने नियंत्रण में रखते हैं. असल में, जेल का पूरा प्रशासनिक तंत्र इन सेवादारों के अनौपचारिक नेटवर्क द्वारा ही संचालित होता है. यहाँ कैदियों के दैनिक जीवन के दृश्यों, उनकी मजबूरियों और शोषण से गुजरते हुए ‘सेवा’ शब्द के कई अदृश्य, हिंसक और विद्रूप अर्थ स्वतः ही उजागर होने लगते हैं.

तिहाड़ के इन प्रसंगों को पढ़ते हुए मलयालम साहित्य के सबसे प्रतिष्ठित और क्रांतिकारी रचनाकारों में से एक वैकोम मुहम्मद बशीर (1908-1994) की जेल पर केंद्रित कहानियों (जैसे ‘मथिलुकल’ या ‘दीवारें’) की याद आना स्वाभाविक है. बशीर जहाँ जेल में मानवीय जिजीविषा और प्रेम की तलाश करते हैं, वहीं अविनाश मिश्र उसके व्यवस्थागत क्रूर तंत्र को बेनकाब करते हैं.

उपन्यासकार अपराध के मनोविज्ञान की गहरी पड़ताल करते हुए यह स्थापना देते हैं कि अपराध की जड़ें केवल मनुष्य के तात्कालिक वर्तमान में नहीं होतीं, बल्कि उसके स्रोत अपराधी के बचपन, उसकी उपेक्षा और उसके सामाजिक-आर्थिक परिवेश में छिपे होते हैं. बकौल उपन्यासकार, “पहले जुर्म की स्मृतियां नहीं होती हैं.” लेकिन यहाँ यक्ष-प्रश्न यह खड़ा होता है कि असल में वे “विस्मृति बीज” कहाँ हैं, जो मनुष्य को धीरे-धीरे अपराधी बना देते हैं? यह उपन्यास सन्नी और उसके साथी कैदियों के माध्यम से चेतना के उसी अंधेरे कोने में छिपे “विस्मृति बीज” की बखूबी खोज करता है.

 

 

स्पर्श और भूख: दमित कामनाओं का भूगोल

इस उपन्यास का एक और अत्यंत संवेदनशील और दार्शनिक सिरा है—’स्पेशियल टच’ (स्पर्श) और ‘भूख’ का अंतर्संबंध. “Every touch is a telegram”, अंग्रेजी की प्रख्यात लेखिका और कवयित्री सुमना रॉय की यह पंक्ति यहाँ याद आती है कि हर स्पर्श एक संदेश है, एक संवाद है. लेकिन इस क्रूर समाज में ऐसे वंचित लोगों की एक बहुत बड़ी आबादी है, जिनके हिस्से में कभी कोई सहज, प्रेमपूर्ण या सुखद स्पर्श आया ही नहीं. ‘प्रस्थान’ के पात्र (सन्नी, रोली और रानी) इसी वंचित और शोषित समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं. इनके जीवन में दर्ज़ हर स्पर्श पर यौवन की हिंसा, जबरदस्ती और शोषण के गहरे निशान हैं. इन पात्रों का शरीर किसी मानचित्र की तरह है, जिस पर पूरा भूगोल अमिट हिंसक बिंदुओं के रूप में अंकित है.

 स्पर्श के समानांतर वह ‘भूख’ है जिसे उपन्यासकार ने कई नए सामाजिक संदर्भों के साथ दर्ज़ किया है. मध्यवर्गीय परिवारों में यह भूख ‘यौवन कुंठा’ (Sexual Frustration) के रूप में साफ दिखाई देती है. दूसरी ओर, समाज में ऐसे नव-धनाढ्य (Neo-rich) सेठ और साहूकार हैं, जो अपनी पूँजी और वर्चस्व का नंगा प्रदर्शन करने के लिए रात के अंधेरे में नए-नए शिकारों की तलाश में निकलते हैं.

 घरेलू या सामाजिक परिवेश के भीतर छिपी यौवन कुंठाओं के बारे में पढ़ते हुए हिंदी के अनूठे आधुनिकतावादी उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद (1927-2020) का चर्चित उपन्यास ‘एक नौकरानी की डायरी’ (2010) याद आता है, जो इसी तरह के दमित अंतर्मन की परतों को खोलता है.

 

 

‘वर्षावास‘ से ‘प्रस्थान‘ की यात्रा: प्रति-उपन्यास (Anti-Novel) की शृंखला

अविनाश मिश्र के पिछले उपन्यास ‘वर्षावास’ (2022) के बाद ‘आगमन’ और ‘प्रस्थान’ को पढ़ना दरअसल प्रति-उपन्यास (Anti-novel) की एक पूरी शृंखला को क्रमबद्ध रूप से पढ़ने जैसा है. जहाँ एक पारंपरिक उपन्यास में एक रैखिक (Linear) कहानी, कुछ निश्चित और बंधी-बंधाई भूमिकाओं वाले किरदार, एक तय समयचक्र (Timeline) और एक स्पष्ट अंत होता है; वहीं ‘प्रति-उपन्यास’ इन स्थापित नियमों, संरचनाओं और तौर-तरीकों का सचेत रूप से विरोध करता है. वह कहानी के पारंपरिक ‘प्लॉट’ को पूरी तरह नकार देता है. 1950 से  1960 के दशक में फ्रांस में शुरू हुआ ‘न्यू नॉवेल‘ (Nouveau Roman) आंदोलन प्रति-उपन्यास का सबसे बड़ा वैश्विक उदाहरण है. ‘आगमन’ और ‘प्रस्थान’ उपन्यास की शक्ल में कई साहित्यिक विधाओं की एक विशाल जुगलबंदी या सिम्फनी (Symphony) हैं. इसमें पाठक को एक साथ:कविता का संगीतात्मक वितान, कहानी का आख्यान, उपन्यास की विस्तृत बुनावट, आलोचना की वैचारिकता, और साक्षात्कार के साथ संस्मरण का आत्मीय आस्वाद मिलता है.

‘प्रस्थान’ जिस तरह से हाशिए पर धकेले गए, दमित और शोषित चरित्रों की आवाज़ों को बिना किसी सेंसरशिप के जगह देता है, वह इसे संरचना के स्तर पर एक बहुध्वन्यात्मक उपन्यास (Polyphonic Novel) बनाता है. मिखाइल बाख्तिन के इस सिद्धांत के ‘आगमन’ और ‘प्रस्थान’ में केवल पात्रों की भीड़ (बहुलता) नहीं है, बल्कि हर पात्र की अपनी स्वतंत्र वैचारिक संप्रभुता है, जो लेखक के नियंत्रण से मुक्त है.

 

 

अंत
 कुछ संशय और अनुत्तरित सवाल

इस समीक्षा के समापन पर, एक सजग और विवेकशील पाठक के तौर पर उपन्यास की बुनावट को लेकर कुछ बुनियादी संशय, आलोचनात्मक सवाल और अनुत्तरित बिंदु मन में उभरते हैं. उपन्यास की सफलता इस बात में नहीं है कि वह सभी उत्तर दे दे, बल्कि इसमें है कि वह पाठक को बेचैन करने वाले सवाल सौंप दे. इस आख्यान के अंत में एक स्वाभाविक और सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि ‘नये शेखर’ का पूरा जीवन, उसका अंतर्मन और उसकी पूरी चेतना साहित्य, सिद्धांतों, बौद्धिक संदर्भों और किताबों से इतनी अधिक आच्छादित (Overwhelmed) क्यों है ? यहाँ यह संशय गहराता है कि क्या शेखर वास्तविक और हाड़-मांस के जीवन को उसकी संपूर्ण नग्नता और सहजता में जीने से डरता है? क्या वह जीवन को सीधे जीने के बजाय, उसे हमेशा किताबों, कविताओं और सिद्धांतों के चश्मे से देख रहा है? ‘आगमन’ और ‘प्रस्थान’—उपन्यास के इन दोनों ही भागों में शेखर का वास्तविक, व्यावहारिक और सक्रिय सामाजिक जीवन कम दिखता है.

‘नये शेखर’ के इस जटिल चरित्र के बारे में गहराई से सोचते हुए एफ. स्कॉट फिट्जगेराल्ड [F. Scott Fitzgerald (1896 – 1940)] के चर्चित अमेरिकी उपन्यास The Great Gatsby (1925) का मुख्य पात्र जय गैट्सबी (Jay Gatsby) बरबस याद आता है. गैट्सबी की तरह ही ‘नये शेखर’ के पास भी कोई ठोस, संबल देने वाला अतीत नहीं है. पूँजीवाद, महानगर और नव-उदारवाद के इस क्रूर दौर ने उसकी स्मृतियों के इतिहास को उससे छीन लिया है. वह एक ऐसी ‘रूटलेस’ (जड़विहीन) स्थिति में खड़ा है जहाँ पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं है और आगे का रास्ता पूरी तरह धुंधलके में डूबा हुआ है.

यही अतीत का गहरा रहस्य, सामाजिक शून्यता का अकेलापन और वर्तमान का निरंतर हिंसक द्वंद्व अविनाश मिश्र के ‘नये शेखर’ को केवल एक चरित्र नहीं रहने देता. यह सारे अंतर्विरोध मिलकर उसे हमारे समय का सबसे प्रासंगिक, विचलित करने वाला और जटिल उत्तर-आधुनिक चरित्र (Post-modern Character) बना देते हैं. वह एक ऐसा दर्पण है जिसमें आज की बौद्धिक युवा पीढ़ी अपनी ही विखंडित पहचान, अपनी कुंठाओं और अपने अस्तित्व की छटपटाहट को साफ़ देख सकती है. पाठक के तौर पर ‘शेखर त्रयी’ के अंतिम खंड ‘अन्वेषण’ का इंतज़ार है.

 

ये उपन्यास यहाँ से प्राप्त करें

 

राकेश कुमार मिश्र
1990. छपरा, बिहारलम्बे समय से रंगमंच, साहित्य और अनुवाद की दुनिया में सक्रिय. कविताएँ सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित.
2016 में नाटक उम्मीद का गीत का लेखन और निर्देशन

संपर्क :
डॉ. आशाबेन पटेल सरकारी विज्ञान कॉलेज. उंझा, मेहसाणा 384170
rakeshansh90@gmail.com

Tags: 20262026 समीक्षाअविनाश मिश्रनये शेखर की जीवनीराकेश कुमार मिश्र
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Comments 3

  1. निरंजन श्रोत्रिय says:
    1 month ago

    पढ़ी मैंने राकेश मिश्रा की मीमांसा। इतने गहरे में उतर कर कौन पड़ताल करता है किसी सृजन की ! इस बहाने यह भी अच्छा है कि कम-अज़-कम कथा साहित्य में इसी पीढ़ी का एक समझदार आलोचक पैदा हुआ है, उसकी उम्र पर न जाएं , उसकी स्टडी और स्टैंड पर जाएं।

    Reply
  2. Rajendra JOSHI says:
    1 month ago

    वाह! क्या ही सुंदर व्याख्या की है! अद्भुत! यह क्रम जारी रहना चाहिए! परंपरा से उत्तर आधुनिकता,भाषा के ऐसे यात्रा- पड़ाव हैं,जिन पर वाद चलते रहना चाहिए! अविनाशमिश्र के भाषाई दुस्साहस को अलग अलग दृष्टि से देखा जा सकता है! वादे वादे जायते तत्वबोध:! राकेश कुमार मिश्र और अरुण देव को इस समालोचित लेख के लिए बधाई! साधुवाद!

    Reply
  3. सुशील सुमन says:
    1 month ago

    बहुत अच्छी समीक्षा, भाई!
    ऐसी गहन पुस्तक-समीक्षाएँ इनदिनों दुर्लभ हैं।

    Reply

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