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समालोचन

Home » रात : हरे प्रकाश उपाध्याय

रात : हरे प्रकाश उपाध्याय

by arun dev
April 24, 2026
in कथा
Reading Time: 3 mins read
A A
रात : हरे प्रकाश उपाध्याय
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रात
हरे प्रकाश उपाध्याय

रात काफी गुजर चुकी थी, फिर भी अभी रात बहुत बाकी थी.

नींद बीच-बीच में टूट जाती थी, फिर कब नींद जुड़ जाती थी, पता नहीं चलता था. यह अब रोज का नियम था.  नींद अब पहले जैसी नहीं आती थी. पहले जैसा अब कुछ भी नहीं रह गया था. समय के साथ बहुत कुछ टूटता और छुटता चला गया था. फिर भी कुछ सपने बचे हुए थे.

उसने करवट बदली.

जब नींद खुल जाती तो कुछ सोचने लगता. सोचना नहीं कहेंगे, कुछ बेसिर-पैर की बातें उसके दिमाग में आने लगतीं. कुछ डरावने ख्याल आने लगते. ऐसी दुर्घटनाओं के बारे में सोचने लगता, जो उसके साथ कभी नहीं घटी थीं, मगर उसे आशंका होती कि ये दुर्घटनाएं उसके साथ घट सकती हैं. नींद में वे दुर्घटनाएं उसके साथ कभी-कभी घटती हुईं भी दिखती थीं. वह डर जाता था.

उसने फिर करवट बदली और जिस करवट उसकी पत्नी लेटी थी, उसी करवट लेट गया और बिलकुल पास खिसककर उसकी पीठ से सट सा गया. उसने अपना बायां हाथ उसके नितंब पर रख दिया. मगर बेसिर-पैर के ख्याल वैसे ही आते रहे.

पत्नी नींद में थी, मगर जरा-सा कुनमुनाई. वह और चिपक गया. धीरे-धीरे उसे नींद आ गयी.

शादी के सोलह साल हो चुके थे. वह दो बच्चों का पिता था. उसकी अपनी उमर भी पैंतालीस से कुछ अधिक ही हो रही थी, पचास से कुछ कम. सही-सही तो उसे पता नहीं था. स्कूल के प्रमाण पत्र में जो जन्मतिथि थी, वह भी सही नहीं थी. यह उसे पता था. अपनी सही जन्मतिथि पता करने की उसने कोई कोशिश कभी नहीं की थी. इसकी उसे ज़रूरत ही नहीं पड़ी थी. कागज में जो जन्मतिथि थी, उसी से उसका काम चल जा रहा था.

उसका जीवन अब तक ऐसे ही गुजरा था, और ऐसे ही गुजर रहा था, कामचलाऊ तरीके से. किसी तरह काम चल जाए, इसे ही वह बहुत मानता था. रोज उसे लगता था कि अब काम चल नहीं पाएगा पर काम चल जाता था. काम चल जाए, इसके लिए वह जितना हो सकता था और जितना समझ पाता था और जितना उसके अख्तियार में था, उस हिसाब से भरपूर कोशिश करता था. अनेक तरह के अड़ंगे और लफड़े के बावजूद काम चल जाता था. काम चलना नहीं कहेंगे शायद, कह सकते हैं कि काम घिसट जाता था.

काम उसके पास कुछ खास था नहीं. पर कोई न कोई काम मिल जाता था. कई जगह उसने काम किया था. तरह-तरह के काम. जो काम उसे नहीं आते थे, उसे भी जल्दी सीख लेता था. यही कारण है कि उसका काम चल जाता था, वरना एक काम के भरोसे रहता तो भला हो गया होता उसका काम. हर बार उसका काम छूट जाता था. यह भी कह सकते हैं कि कई जगह जान-बूझकर तो कई जगह आजिज आकर वह काम छोड़ देता था. कई दफा तो बेवजह, तो कई जगह कोई-न-कोई वजह बताकर उसका काम छीन लिया जाता था. फिर वह नये काम की तलाश करता था. यह अलग बात है कि काम की तलाश के दौरान भी उसे कुछ-न-कुछ काम करना पड़ता था. क्योंकि बगैर काम किये एक दिन भी गुजारा न था. उसे रोज कुआं खोदना पड़ता था, तब उसे पीने को पानी मिलता था. खाने और पहनने की तो बात ही क्या. घर में वह अकेला कमाने वाला था. घर में वह, उसकी पत्नी और उसके दो बच्चे थे. वही था, जो कुछ कर सकता था. जो भी हाथ से कमाता, मुँह तक आकर वह खत्म हो जाता था.

काम की तलाश में वह गाँव छोड़कर शहर आया था. और यहीं धीरे-धीरे रहने लगा था.

उसने फिर करवट बदली. इस बार वह पत्नी की तरफ से मुँह फेरकर, उसकी तरफ पीठ करके लेट गया.

शहर आने के बाद उसने प्रेम विवाह कर लिया था. यह अलग लफड़े वाली कहानी है. इस लफड़े में उसकी जान बच गई, यही बहुत था. वही जानता है कि इस मामले में उस पर क्या नहीं गुजरी थी. उसकी गलती बस यही थी कि उसने प्रेम किया था. प्रेम किया भी क्या था, बस हो गया था. उसके जैसे लोगों को भला कोई प्रेम कहाँ करता है. यह तो गनीमत कहिए कि उसी जैसी एक सनकी लड़की थी, जिसने उससे प्रेम कर लिया था. उसकी सबसे बड़ी गलती यह थी कि उसने दूसरे धर्म में प्रेम कर लिया था. अब जो भी था, जैसा भी था. वह खौफनाक दौर भी तो आखिर बीत ही गया था.

अब उसके घर वालों ने और उसकी लुगाई के घर वालों ने, दोनों परिवारों ने उनसे संबंध तोड़ लिया था. उसकी जान बख्श दी गयी थी. यही बहुत था. अब उसके जीवन में कोई नाता-रिश्ता नहीं बचा था. सबके लिए वह मर गया था और सब उसके लिए मर गये थे. माँ, बाप, भाई, बहन सबने उससे मुँह फेर लिया था. सारे रिश्तेदारों ने उससे संबंध तोड़ लिए थे. कह सकते हैं कि धीरे-धीरे वह सबसे अलग-थलग पड़ता गया था और अब तक इतना अलग और अकेला पड़ गया था, जैसे वह मनुष्य जगत में एक अलग प्रजाति हो. जैसे उसने किसी माँ की कोख से जन्म ही न लिया हो और किसी आँधी-पानी की रात आसमान से अनचाहे धरती पर टपक गया हो. उसने भी अपने जीवन से सारी यादें भरसक पोंछ देने की कोशिश की थी. यह अलग बात है कि यादें कभी पूरी-पूरी मिटती नहीं हैं.

एक मच्छर ने काटा था. फिर नींद टूट गयी थी. उसने पैरों पर चादर खींच लिया. पत्नी की तरफ देखा, उसे लगा, वह सो रही है.

उसने करवट बदला मगर पत्नी से दूर ही रहा.

बच्चे बड़े हो रहे थे. वह उनके भविष्य के बारे में सोचने लगा.

वह ज्यादा लंबा सोच नहीं पाता था. उसे आगे का सोचते हुए डर लगता था, पता नहीं क्या होगा. हर चीज इतनी मुश्किल होती जा रही थी कि गुजरते हुए वक्त को काटना ही बहुत मुश्किल हो रहा था. फिर आगे का क्या भरोसा. उसे कुल मिलाकर बुरे अनुभव ही विरासत में मिले थे. वह जितना आगे का सोचता, उतना ही डर जाता. पता नहीं कैसे कटेंगे आगे के दिन. पीछे के दिन कैसे कट गए, यह भी समझ नहीं पाता था. वह जब बीते दिनों के बारे में सोचता तो उसे अचरज होता था कि उसने जीवन के इतने वर्ष कैसे काट लिए. क्या उसके बच्चे भी इसी तरह अपने दिन काटते चले जाएंगे? क्या वह उन्हें विरासत में बुरे दिन की संपदा ही बस सौंप पाएगा? अच्छे दिन के आसार तो कहीं नजर नहीं आ रहे थे. जो नजर आ रहा था, वह अंधेरा ही अंधेरा था. अंधेरा बढ़ता जा रहा था और वह घिरता जा रहा था.

नीम बेहोशी जैसी नींद उसे आ गयी.

पत्नी ने कहा, आटा और चावल दोनों नहीं हैं. सब्जी भी बस थोड़ी सी बची है. मकान मालिक ने कल कहा था कि हर हाल में दो-एक दिन में किराया चाहिए ही चाहिए. आप लोगों के आधार कार्ड का क्या हुआ, जल्दी से बनवा लीजिए, पुलिस वेरीफिकेशन होना है. पुलिस बार-बार पूछ रही है. पत्नी उसकी विवशता जानती थी और वह इतनी विवश थी कि उसे इन सब चीजों का कोई उपाय नहीं सूझता था तो बताकर वह रोने लगती थी. रोती हुई पत्नी का सामना कर पाना एक अलग किस्म की मुसीबत थी, पर उसे अक्सर इसका सामना करना पड़ता था. उसे लगता था, साली यह भी उतनी सीधी नहीं है, जितनी दिखती है. यह एक अलग मुसीबत है. इसके नखरे और जाहिली ने तो जीवन और नर्क कर रखा है.

बारिश हो रही थी और छाता भी नहीं था. पर घर से निकलना जरूरी था क्योंकि घर में आटा और चावल दोनों नहीं था. उसने सोचा, क्या होगा, अगर इस वक्त वह बीमार हो जाए. या ऐसा हो कि घर के किसी सदस्य के साथ कोई हादसा हो जाए. उसने जेब टटोला. एक जेब में तीन रुपये थे और दूसरी जेब में एक दस का फटा हुआ नोट था, जिसे रात में घर लौटते हुए ई-रिक्शे वाले ने धोखे से वापस किया था और वह भी जल्दी-जल्दी में उसे देख नहीं पाया था. वह नोट जेब में जैसे रखा था, वैसे ही महीने भर से पड़ा था. वह सोचता था कि वह भी धोखे के साथ किसी दिन उसे चला देगा पर वह उस धोखे के लिए काम भर का दुस्साहस बटोर नहीं पा रहा था.

वह बारिश में ही निकल गया. बारिश उतनी अधिक नहीं थी. थोड़ा भीगने का डर था पर जाया तो जा ही सकता था. इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं था. उसे एक जगह नया काम मिल सकता था, ऐसी संभावना थी. वहाँ से कुछ एडवांस भी मिल जाने का लालच था. उतने से सब काम तो नहीं हो सकता था पर थोड़ा आटा-चावल तो आ ही सकता था. घर किराया का देखा जाएगा. बच्चों की किताबें भी लेनी थी पर उसे भी थोड़ा टाला जा सकता था. वह पुरानी किताबों के प्रबंध के लिए भी कोशिश कर रहा था. बच्चे सरकारी स्कूल में ही जाते हैं और वहाँ किताब-कॉपियों की उतनी कोई जोर-जबरदस्ती तो है नहीं. साले पढ़ नहीं पा रहे हैं. हाथ तंगी से बाहर निकले तो वह उन्हें किसी प्राइवेट स्कूल में डाल देगा. सोचकर वह पेट के बल लेटकर सोने लगा.

घर से निकल कर तेज-तेज चलने लगा, जैसे बारिश में चला जाता है. वह भी तब जब छाता भी न हो. चलते-चलते, थोड़ी दूर चलने पर बारिश तो रुक गयी, पर काले बादल अब भी आसमान में छाये हुए थे. तेज हवा चलनी शुरू हो गयी थी.

उसने करवट फिर बदली. भरपूर नींद में था.

चलते-चलते उसने रेलवे फाटक पार किया और पुलिस चौकी के सामने से गुजरा. चौकी के बाहर एक सिपाही अपनी बंद मोटर साइकिल पर बैठा था और मोटर साइकिल के हैंडल में लगे आईने में देखते हुए एक छोटी सी कंघी से बाल सवार रहा था. उसने अपनी टोपी अपने कमर में खोस रखी थी. वह गा भी रहा था – रात दीया बुझाकर पिया क्या-क्या किया…

ज्यों ही थोड़ा सा आगे वह बढ़ा होगा कि अचानक चार लोगों ने उसे घेर लिया और उस पर हमला बोल दिया. ताबड़तोड़ थप्पड़ और बेल्ट से उसकी पिटाई करने लगे. वह उन लोगों को पहचानता तक न था. वह किसी को बचाने के लिए गुहार लगाने की जगह उन्हीं से फरियाद करने लगा कि आप लोग मुझे क्यों मार रहे हैं, मैंने क्या किया है…. गनीमत कहिये कि तभी एक पाँचवाँ आदमी आया, जो शायद उन्हीं में से था, वह चिल्लाकर बोला- अरे छोड़ दो इसे, यह वह नहीं है, यह कोई और है. वे मारने वाले थम से गए. उनमें से एक ने उसे हिकारत से देखते हुए कहा कि जाओ तुम वह नहीं हो, कोई और हो साले तो बच गए अन्यथा आज तो तुम मर ही जाते. तुम्हारा भाग्य बढ़िया है, बच गए, जाओ ऐश करो.

वह पिटाई से लगभग बेहोश हो गया था.

उसका पूरा शरीर पसीने से भीग गया था. नींद में ही वह चीख पड़ा. बगल में लेटी पत्नी जग गयी. उसे समझ नहीं आया कि क्या हुआ, ऐसा तो कभी नहीं होता था. वह पूरी तरह जगी नहीं थी, उसने अधजगे में ही पूछा – क्या हुआ? वह कुछ नहीं बोला. पत्नी फिर से नींद के आगोश में समा गयी.

उसकी नींद टूट गयी. वह बिस्तर पर ही था, आश्वस्त हुआ. धीरे-धीरे फिर सोने की कोशिश करने लगा. रात अभी बहुत बाकी थी. सुबह उसे नये काम की तलाश में निकलना था. उसने अपनी ज़िंदगी की मुसीबतों के बारे में सोचना शुरू किया. सोचते-सोचते कुछ समय बाद फिर से उसकी आँख लग गयी. दिन भर काम का मारा हुआ था.

रात अभी थी. अचानक घर की डोरबेल बजने लगी.

इतनी रात को कौन हो सकता है? उसका तो कोई रिश्तेदार भी नहीं है, कोई जानने वाला भी नहीं है. इस शहर में किसी से जान-पहचान या दोस्ती जैसी कोई चीज है भी तो वह बेहद कामकाजी किस्म की ही है. फिर इतनी रात को उसके घर कौन आ सकता है? वह इस बार बहुत अधिक डर गया. चोर-डाकू-हत्यारे ही हो सकते हैं, और कौन हो सकता है? इतनी रात को और कौन आ सकता है. रोज सुबह के अखबार में रात में गुजरे ऐसे तमाम हादसों की रपट भरी होती है. वह उन रपटों को रोज ध्यान से पढ़ता है. उसकी हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि वह आवाज़ देकर पूछ सके कि आखिर कौन है, जो इतनी रात को डोरबेल बजा रहा है. डोर बोल बजती जा रही है. उसने छिपने के बारे में सोचा. मगर पाँच सौ वर्गफीट के इस घर में मुश्किल से दो कमरे थे, वह इसमें कहाँ छिप सकता था और अकेले छिप जाने से कोई उपाय तो था नहीं. पूरे परिवार का उसे ख्याल था. सबको कहाँ छिपा दे. उसने सोचा कि काश धरती फट जाए या घर की छत उड़ जाए और उसके परिवार के सभी चारों जन परिंदे बन जाएं तो इस घर से उड़कर कहीं किसी पेड़ पर जा बैठें. बजती रहे डोर बेल. मगर ऐसा भला कहाँ संभव था. रात गहरी थी और डोर बेल बज रही थी. वह बहुत बेचैन हो गया. बहुत अधिक डर गया. कोई उपाय समझ में नहीं आ रहा था.

उसने करवट बदलकर जिधर पत्नी लेटी थी, उधर हाथ बढ़ाया. पत्नी वहाँ नहीं थी. घबराहट में वह बिस्तर पर उठकर बैठ गया.

डोर बेल बजनी बंद हो गयी थी. पत्नी उसके लिए चाय का कप और पानी का गिलास लिए सामने खड़ी थी. अभी-अभी जिस ख्याल से वह गुजरा था, वह उसके जेहन से अचानक गुजर गया. जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो. जैसे स्लेट पर चॉक से लिखा सब कुछ, ज़रा सा हाथ लगते पुछ गया हो. यह सब अब रोज की बात थी. वह जल्दी-जल्दी चाय पीने लगा. आज उसे नये काम की तलाश में जल्दी ही निकलना था. उसे कोई काम मिल तो जाएगा न? दुआ कीजिए.

 

हरे प्रकाश उपाध्याय कुछ समय पत्रकारिता के बाद अब जीविकोपार्जन के लिए प्रकाशन का कुछ काम बिहार के एक गाँव में जन्म. अभी लखनऊ में वास. पाँच किताबें- चार कविता संग्रह – 1. खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएं 2. नया रास्ता 3. काली मुसहर का बयान 4. हर जगह से भगाया गया हूँ एक उपन्यास- बखेड़ापुर अनियतकालीन पत्रिका ‘मंतव्य’ का संपादन
पता – महाराजापुरम केसरीखेड़ा रेलवे क्रॉसिंग के पास पो- मानक नगर लखनऊ -226011
मोबाइल – 8756219902

Tags: 20262026 कथारातहरे प्रकाश उपाध्याय
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Comments 12

  1. Deepak Sharma says:
    4 weeks ago

    किसी दु: स्वप्न की भांति बढ़ रही यह कहानी ‘रात’ उसी की प्रकृति के अनुसार तीसरा अंक नहीं रखती। अपने पाठक को अपने संंग ले कर हरे प्रकाश जी एक ओर अपनी कहानी के केन्द्रीय पात्र की परिस्थितयों के वर्णन के लिए यदि अपनी भाषा में सपाट बयानी उपयोग में लाते हैं तो वहीं दूसरी ओर उसके अमूर्त भयों को उस के विभिन्न दुस्वप्नों द्वारा मूर्त रूप देने हेतु जिस लिप्त भाव से उन्हें प्रस्तुत करते हैं वह वाकई सराहनीय है।
    कहानी ‘रात’ के लिए हरे प्रकाश जी को बधाई।
    तथा अरुण देब जी को इसे ‘समालोचन’ में लाने के लिए धन्यवाद।
    शुभ कामनांए,
    दीपक शर्मा

    Reply
  2. Chandreshwar चंद्रेश्वर says:
    4 weeks ago

    हरे प्रकाश उपाध्याय की कहानी रात पढ़ी मैंने। यह एक अच्छी कहानी है। ‘रात’ शीर्षक आज के समय का रूपक है।एक ग़रीब मेहनतकश के जीवन की जद्दोजहद के साथ आज के बुरे,भयावह और अराजक समय को भी चित्रित किया गया है। कहानीकार को बधाई और शुभकामनाएँ।
    चंद्रेश्वर, लखनऊ

    Reply
  3. पवन करण says:
    4 weeks ago

    इस एकदम सरल कहानी का मनोविज्ञान बहुत बढ़िया है।…..हमारा ..तुम्हारा। ….शुभकामनाएं।

    Reply
  4. Anonymous says:
    4 weeks ago

    हरे प्रकाश उपाध्याय जी की कहानी रात पढ़ी, अच्छी लगी। कहानी के केंद्रीय पात्र की मनोदशा का का चित्रण जिस तरह से हुआ है वह आज के समय की विडंबनाओ को भी अभिव्यक्त करता है। कहानी एक आम आदमी के जीवन के संघर्षों, मानसिक चिंताओं और अस्तित्व की जद्दोजहद को बहुत ही मार्मिक ढंग से चित्रित करती है।रात’ कहानी आधुनिक जीवन की उस कड़वी सच्चाई को बयां करती है जहाँ एक इंसान अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने की भागदौड़ में इतना थक गया है कि उसे सुकून की नींद भी मयस्सर नहीं है।

    Reply
  5. VED PRAKASH says:
    4 weeks ago

    रात पढ़ने के बाद ऐसा महसूस हुआ की गरीबी के दिनों में जितने भयावह ख्याल आ सकते हैं वह सब आ जाते हैं और आदमी जीने की जद्दोजहद में बहुत कुछ सोचता है करता है लेकिन कहां तक सफल हो पता है यह थोड़ा सा सोचने की बात हो सकती है कहानी अच्छी है हरे प्रकाश उपाध्याय जी को मैंने पहली बार पढ़ा है पढ़कर अच्छा लगा साधुवाद

    Reply
  6. ललन चतुर्वेदी says:
    4 weeks ago

    आम आदमी की विश्वसनीय कहानी.कोई झूठ-सांच ,जोड़-तोड़,भटकाव नहीं. complete. perfect .not more than this.

    Reply
  7. Lakhan lal pal says:
    4 weeks ago

    हरे प्रकाश उपाध्याय जी की कहानी ‘रात’ श्रमिक जीवन की कड़वी सच्चाई को उद्घाटित करती है। स्वप्न और यथार्थ, चेतना और अचेतना, भय और संघर्ष – इन सभी में इतना महीन आवरण है कि लगता ही नहीं है कि जागते जीवन की घटना है या सोते जीवन की।
    नींद दिन भर की थकान को विश्राम दे देती है। लेकिन रात यहां किसी तरह का सुकून नहीं पहुंचाती है। चेतन और अचेतन मन में बराबर आवाजाही बनी रहती है।
    हाड़तोड़ मेहनत, बेबसी, संघर्ष और उस संघर्ष से उपजी प्रताड़ना, हर करवट में साकार हो जाती है। मारपीट वाले दृश्य पाठक को अनायास झिंझोड़ते है। रात के अंतिम पहर के डर को, एक अदना सी चाय मुक्ति दिला जाती है।
    अनवरत संघर्षों का नाम ही जीवन है। यह जीवन कभी ठहरता नहीं है। निरंतर चलते रहने वाली यह प्रक्रिया यूं ही रात-दिन विस्तार पाती रहती है!
    कहानी के रूप में?
    नहीं, जीवन के रूप में।
    जैसे जीवन संघर्षों का अंत नहीं है, वैसे ही इस कहानी का कोई अंत नहीं है।

    Reply
  8. Anonymous says:
    4 weeks ago

    हरे भाई आप प्रिय कवि हैं। कहानी मत लिखें, मैंने भी कोशिश की थी बस के नहीं लगी। आपकी ये कहानी पढ़ी, स्वाद नहीं आया। बांधता कुछ भी महसूस नहीं हुआ भाई।

    Reply
  9. Indra kumar dixit says:
    4 weeks ago

    मैने पूरी कहानी `रात`रात में ही पढ़ी। एक हैंड टू माउथ आदमी की रात दिन से भी भयानक होकर कैसे बिताती है,यह कहानी बड़ी ही शिद्दत और जीवंतता से प्रस्तुत करती है।आदमी की कशमकश देखना हो तो रात कहानी को पढ़ना चाहिए. कवि हरे प्रकाश उपाध्याय एक कहानीकार के रूप में भी सफल लगे।

    Reply
  10. नरेश चन्द्रकर says:
    4 weeks ago

    नरेश चन्द्रकर
    हरे प्रकाश जी कवि है और मेरे प्रिय मित्र भी है। उनकी यह कहानी जीवन की बेचैनी, असुरक्षा के एहसास को पकड़ती हुई कहानी लगी मुझे। कहानी का पात्र जो सपनों और वास्तविकता के बीच झूलता रहता है, गांव से शहर काम तलाशते हुए आया है उससे कहानी पढ़ते पढ़ते मानसिक नजदीकियां बनने लगती है। परन्तु कहानी में अचानक मुख्य पात्र को चार लोग घेरते हैं और उस पात्र पर हमला कर देते हैं तो यह घटना कहानी का अनायास आया मोड़ लगा, जो मुझे अटपटा तत्व लगा । पर यह अनायास घटना का तार उस आदत से जुड़ता हुआ लगा मुझे। जिसमें रात के समय उसके मन में तरह-तरह के डर आते हैं—दुर्घटनाओं के, गरीबी के, बच्चों के भविष्य के, और अचानक होने वाली हिंसा के। वह सपनों और वास्तविकता के बीच झूलता वह पात्र कहानी समाप्त होने पर भी मन में ठहर जाता है। यही हरे प्रकाश जी की कहन शैली की विशेषता लगी मुझे।
    अभिनंदन हरे प्रकाश जी

    Reply
  11. Ravindra swapnil prajapati says:
    2 days ago

    आँखों मैं तेरती कहानी ऐसी रातें हर मध्ययवर्गीय आदमी के जीवन का हिस्सा रहीं हैं बधाई

    Reply
  12. Kumar Mukul says:
    23 hours ago

    एक संवेदनशील आम आदमी के सपने, अच्छी कहानी

    Reply

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समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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