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समालोचन

Home » निशानची : नरेश गोस्वामी

निशानची : नरेश गोस्वामी

समाज-विज्ञानी, कथाकार और अनुवादक नरेश गोस्वामी इन दिनों अपनी दो अलग-अलग पुस्तकों के कारण चर्चा में हैं. जहाँ उनकी कृति ‘काँवड़ यात्रा : लोकधार्मिकता का नेपथ्य’ को प्रथम सेतु समाज-विज्ञान पांडुलिपि पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, वहीं उनका पहला उपन्यास ‘आधे सूरज की धूप’ संभावना से प्रकाशित हुआ है. वर्षों से कहानियाँ लिखते आ रहे गोस्वामी की यह नई कहानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गाँव के आपसी रिश्तों में गुँथे सामाजिक-आर्थिक पेंचों को खोलती है. प्रस्तुत है.

by arun dev
March 28, 2026
in कथा
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निशानची : नरेश गोस्वामी
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निशानची
नरेश गोस्वामी 

 

बैठक के पिछवाड़े शोक में आए लोगों के लिए कुर्सियां और चारपाई पड़ी हैं.

यहाँ   एक साथ इतने परिचित बैठे हैं कि मैं अचकचा गया हूँ. इनमें कई लोगों को मैंने अपने बचपन में जवान देखा था. अभी दस साल पहले तक कई लोग तंदुरुस्‍त और खुशपोश दिखते थे. लेकिन, अब उनके चेहरे पुरानी किताबों की तरह दिखने लगे हैं. ऐसे मौक़ों पर मैं असहज हो जाता हूँ. लगता है कि मुझे किसी के साथ आना चाहिए था. हम पाँच-दस साल बाद किसी से अचानक बात शुरू नहीं कर सकते. सबकी जिंदगी में इतना कुछ हो चुका होता है और हमें इसकी कोई ख़बर नहीं होती.

मैं एक-एक कर सबको पहचान रहा हूँ :  टांडा वाले चाचा धनपत और उनका बेटा. मुरादाबाद वाले ताऊ के दोनों बेटे- पप्‍पन और निम्‍मे. प्रकासी चाचा के चारों बेटे- राम्‍मे, सुन्‍ने, श्‍यामे, हरबीर और बेटी सत्‍तो. गली के बुजुर्गों में श्‍याम पंडज्जी, निरंजन सिंह, रामप्रकाश दरोगा, बिजेंदर, चरते, धन्‍नू, श्रीपाल, धन सिंह लंग्‍गड और प्रकासी चाचा की ससुराल के बचे-खुचे लोग. हमारी गली में लीलू चक्‍कीवाले, रामप्रकाश दरोगा के दो बेटे, पप्पे, श्यामू, सोमदत्त जैसे लोग जो अब ख़ुद साठ-पैंसठ के लपेटे में पहुंच गए हैं.

चाची-ताईयों में बाटो, राजिंदरी, बख्‍तावरी, गट्टो, कमलेश बाढ़न, दिल्‍लीवाली और हमेशा पति के नाम से जानी गई ‘सुंदरे पण्डित की बहू’, पुरुषों से दूर दुबारी में बैठी हैं.

अंदर रह-रहकर औरतों का विलाप चल रहा है. जैसे ही चाचा का कोई रिश्‍तेदार आता है, विलाप की तान ऊपर उठने लगती है. औरतें प्रकासी चाचा का नाम लेती हैं. इसके बाद रोने, गला साफ़ करने, नाक सिडुकने की आवाज़ें आने लगती हैं. वे यह काम इतनी बार कर चुकी हैं कि अब उनकी आवाज़ बैठ गई है. कई बार उनसे रोया भी नहीं जाता.  बस एक फटी-फटी सी आवाज़ आती है जिसमें कभी-कभी चाचा का नाम आता रहता है.

उपस्थित लोगों को सामूहिक नमस्‍कार करके मैं सबसे कोने में पड़ी चारपाई के पैताने की तरफ़ बैठ गया हूँ. जिस जगह यह चारपाई बिछी है वहाँ  मेरे बचपन में एक खोर हुआ करती थी. खोर से कुछ दूर एक संडास बना था जिसका इस्तेमाल करने से पहले हमेशा एक चारपाई खड़ी करनी पड़ती थी.

अब सारी जगह सपाट हो गई है.

मुझे राहत महसूस हुई कि मैं यहाँ रम्मी के साथ हूँ… कि अगर कोई अप्रत्याशित बात छिड़ी, किसी के बारे में ज़रूरी ब्योरों का पता नहीं हुआ तो मैं रम्मी की ओट में छिप जाऊंगा.

अब शायद चाचा की देह को नहलाया जा रहा है.

कोई कह रहा है- ‘अरै, वो भिवाणी वालों की चाद्दर लाकै दे’.

(2)

प्रकासी मेरे सगे चाचा नहीं थे. गहरे सांवले रंग, इकहरे-कमज़ोर शरीर और ठीक-ठाक क़द के इस आदमी की मेरी स्‍मृति में एक बड़ी अजीब सी छवि है. उन्हें देखकर मुझे हमेशा यह एहसास होता था जैसा कोई मक्‍खी बार-बार उनके मुंह पर बैठने की कोशिश करती हो और उसे भगाने की कोशिश में उनका चेहरा तमतमा गया है. उनके चेहरे पर खीझ ही सबसे ज्‍़यादा स्‍थायी चीज़ थी. गाँव में जैसे एक आँख वाले को डिप्‍टी और पैर से लाचार आदमी को दरोगा कहकर अपमानित किया जाता है, कुछ उसी तरह प्रकासी चाचा को टिड्डा कहा जाता था. क्या उनका यह नाम इसलिए पड़ा होगा कि टिड्डे के अगले दोनों पैर एक ख़ास ढंग से आगे की ओर निकले रहते हैं, उसी तरह चलते समय चाचा के घुटने भी बाहर की ओर निकल आते थे. हालांकि अपनी सामान्य स्थिति में टिड्डा कभी खीझा हुआ प्राणी नहीं लगता, जबकि चाचा के चेहरे पर एक चिढ़-सी हमेशा मौजूद रहती थी. रम्मी अक्सर कहता है कि ‘क़ायदे में चाचा का नाम ‘मकौड़ा’ होना चाहिए था’.

क्‍या चाचा के चेहरे पर यह खीझ बचपन में ही आ गई थी?

मेरे बचपन में चाचा कस्‍बे से बाहर मेन रोड़ पर पड़ने वाली माया गत्ता मिल में काम करते थे. मुझे उनका सुबह जाना याद नहीं पड़ता लेकिन शाम के समय पुलिया के आसपास खेलते हुए मैं उन्हें लौटते हुए देखता था. उनके पास एक पुरानी और घिसी हुई सी साइकिल थी. साइकिल का एकदम बेसिक और आदिम संस्करण. अपने जीवन की तरह उन्हें शायद साइकिल के रूप-रंग को लेकर भी कोई आग्रह नहीं नहीं रह गया था. यह तब की बात है जब मैं इस लायक़ हुआ था कि गली के बजाए पुलिया पर जाकर खेल सकूं. उस वक़्त साइकिल ही सबसे तेज़रफ़्तार वाहन था. सड़क पर मोटरसाइकिल या स्‍कूटर कभी कभार दिखाई देते थे. शाद तब मोटरसाइकिल का यह नाम भी निश्चित नहीं हुआ था. तब बहुत सारे लोग इसे फिटफिट कहकर पुकारते थे. चाचा को देखकर मुझे हमेशा संक्षिप्‍त-सा आश्चर्य होता था.

सड़क पर साइकिल से आते आते लोग तेज़ी से गुज़रते थे. लेकिन चाचा की साइकिल को देखकर हमेशा यह लगता था जैसे उन्हें कोई पीछे से धक्का दे रहा है. मेरे आश्चर्य का दूसरा कारण यह था उनकी साइकिल के कैरियर पर हमेशा एक बोरीनुमा चीज़ बंधी रहती थी.

चाचा शायद जल्‍दी घर आ जाते थे. बोरी के इस राज़ का खुलासा करते हुए मुझे एक बार संजय ने मेरे कानों में खुसपुस-खुसपुस करते हुए बताया था कि उनकी बोरी में सोने की अंगूठियां रहती हैं. बाद में मैंने यही बात माँ से भी सुनी थी : ‘प्रकासी जो कबाड़ लावै उसमैं कदी कदी तो सोन्‍ने की गुंठ्ठी भी लिकड़ यावै’.

क्‍या यह बात इसलिए उड़ाई गई थी कि कोई चाचा को ग़रीब न मान लें?

चाचा ने शायद गत्ता मिल की यह नौकरी 1982 के आसपास छोड़ दी थी. सुनने में आया था कि मिल में उनका काम कुछ ऐसा है जो आँखों के लिए बहुत नुकसानदेह है. इसके बाद मैंने उन्हें कभी साइकिल पर नहीं देखा. कुछ समय के लिए उन्होंने शायद दर्जी का काम किया था, लेकिन आँखों की घटती रोशनी के कारण अंततः वह भी छूट गया. इसके बाद मैंने उन्हें हमेशा बैठे या लेटे पाया. उन्हें कभी कोई गंभीर रोग नहीं हुआ. दिन में तीन बार की चाय, सुबह-शाम के भोजन और बीड़ी के अलावा उनका शायद ही कोई और ख़र्च रहा होगा.

इस अहाते में घरों का बंटवारा कुछ ऐसे हुआ था कि पिता और ताऊ को अंदर और बाहर दोनों जगह घर मिले थे. प्रकासी चाचा का घर हमारी बैठक के सामने पड़ता था. बीच में आने जाने का रास्‍ता था. बैठक के ऐन पीछे एक चौड़ी और ख़ाली जगह थी जिसके एक हिस्‍से में हमारी भैंसें बंधा करती थी. दूसरा  हिस्‍सा चौरस पड़ा था. बारिश के दिनों में इस हिस्‍से में घास उग आती थी. मुझे इसका पता किशोरावस्‍था में चला कि वह ताऊ की जगह थी. प्रकासी चाचा की चारपाई इसी खत्ते में डाली जाती थी. बैठक की ओट के बावजूद सर्दियों में नौ-दस बजे तक इस जगह धूप आ जाती थी. फिर शाम के तीन-चार बजे तक वे यहीं विराजमान रहते थे. खाने से लेकर चाय-पानी का काम यहीं निपटता था.

कहने को प्रकासी चाचा और हमारा कुनबा एक ही था. लेकिन उनके और हमारे परिवार की बेल कई पीढ़ी पहले अलग हो चुकी थी. मैंने जब से होश संभाला था, तब से अपने और उनके परिवार को एक दूसरे से हमेशा दूर पाया. यह दूरी हर चीज़ में दिखती थी. हमें उनके यहाँ   जाने की मनाही थी. हमारे मेहमान उनकी तरफ़ नहीं जाते थे. उनके मेहमान हमारी तरफ़ नहीं आते थे. प्रकासी चाचा से मैं बचपन से नमस्ते करता आ रहा था, लेकिन यह नमस्ते पूरी तरह ऐच्छिक थी. इसे मेरे शालीन और संस्कारवान व्यवहार का प्रमाण माना जाता था. लोगबाग इसे हमारे परिवार का बड़प्‍पन मानते थे.

लेकिन, चाचा ने हमारे परिवार का रौब कभी स्वीकार नहीं किया. उनके व्यवहार में हमारे प्रति एक अजीब-सी उपेक्षा थी जिसका स्थायी अर्थ शायद यह था कि अगर तुम मुझे कोई भाव नहीं देते तो मैं भी तुम्हें घंटा नहीं समझता. चाचा के आगे पड़ने पर मेरे पिता उनसे नमस्कार तो कर लेते थे, लेकिन अपना स्वर इतना हल्का रखते थे कि बस किसी तरह चाचा तक पहुंच जाए. कई बार तो ध्वनि के बजाय ख़ाली नमस्कार की मुद्रा ही रह जाती थी, जबकि अपने अन्य परिचितों से मिलते हुए उनकी आवाज़ इतनी साफ़ रहती थी कि आसपास से गुज़रते पाँच लोग और सुन लें!

हमारे पास भीतर के घर के अलावा अहाते के बाहरी हिस्‍से में एक पक्की बैठक और बरामदा था, जबकि प्रकासी चाचा का पूरा परिवार जिस जगह में रहता था उसे देखकर मुझे कभी घर जैसी चीज़ का एहसास नहीं हुआ. वहाँ  जाकर हमेशा लगता था जैसे कहीं खड़ा होने के लिए भी किसी दूसरी चीज़ को उसकी जगह से हटाना पड़ेगा. उनका घर दहलीज से ही शुरु हो जाता था. अंदर पैर रखते ही बाईं तरफ़ नल और वहीं नहाने-धोने की जगह, दाईं तरफ़ एक कोठरी जिसके आधे हिस्से में चाचा द्वारा गत्ता मिल से लाया गया उपयोगी कबाड़ भरा रहता था और दोनों के बीच भैंस बांधने की जगह. नल के बराबर में एक छोटा दरवाज़ा और खुलता था जो शायद उठने-बैठने और सोने का मुख्‍य कमरा रहा होगा. बाद में जैसे-जैसे चाचा के बेटों की शादी होती गई वैसे वैसे इस जगह में कुछ तोड़फोड़ करके और कई छोटे-छोटे डिब्‍बे बनते गए.

उन दिनों मुझे यह बात समझ नहीं आती थी कि चाचा की खाट हमेशा घर के बाहर क्‍यों रहती है?

(3)

प्रकासी चाचा को मैं बरसों बरस उसी जगह पर देखता रहा. कभी ऊंघते, कभी बीड़ी और माचिस को हाथ में लेकर निष्चेष्ट बैठे हुए— कभी खिंचे हुए चेहरे पर दुनिया को एक आँख से देखकर दूसरी आँख से नज़रअंदाज़ कर देने वाले भाव के साथ.

गर्मियों में उनकी चारपाई दीवार के साथ सटाकर लगाई जाती थी. ग्‍यारह बजते-बजते वे अपने घर में कहीं अंदर चले जाते थे. लेकिन, धूप ढलते ही उनकी चारपाई उनके घर के दरवाजे के बाजू में दुबारा डाल दी जाती थी. उनकी चारपाई रास्ते का एक हिस्सा घेरे रहती थी. लेकिन, चूंकि तकनीकी अर्थ में चारपाई उनके मकान की बाहरी दीवार के साथ लगी होती थी इसलिए उस पर कोई आपत्ति नहीं कर सकता था. फिर भी गाहे बगाहे कोई न कोई कह ही देता था : ‘ एक यू है के यहाँ  बीच मैंई पड़ा रह्वै’.

पिछले बरसों में मैं जब जब यहाँ  आया तो प्रकासी चाचा की खाट को मौसम के अनुसार अपने दरवाज़े के सामने या बैठक के पिछवाड़े वाली जगह में पाया. एक बार रम्मी बता रहा था कि सबसे छोटे बेटे की शादी के बाद कुछ समय के लिए चाचा का यह जीवन-क्रम गड़बड़ा गया था. बहू आने के बाद घर के भीतर उनकी चारपाई की जगह ख़त्म हो गई थी.

तब चाचा ने एक जुगाड़ भिड़ाया था.

चाचा के एक बालसखा थे इलम सिंह. चाचा और इलमे दूसरी कक्षा तक साथ पढ़े थे. उसके बाद दोनों ने ही पढ़ाई छोड़ दी थी. इलम सिंह के पास बीस-पच्‍चीस बीघे ज़मीन थी. धीरे-धीरे वह पक्‍का किसान बन गया और प्रकासी चाचा कस्बे के सबसे बड़े आढ़ती रामरतन के यहाँ   काम करने लगे. लेकिन, इलम सिंह और चाचा की बचपन से चली आ रही दोस्‍ती क़ायम रही. ख़ैर, किस्‍सा-कोताह ये कि छोटे बेटे के ब्‍याह में चाचा ने इलम सिंह को भी कार्ड दिया था. बकौल रम्मी चाचा पहले ही सैटिंग में लग गए थे. चाचा को पता था कि इस दौरान पत्नी की मौत के बाद इलम सिंह का टंडा-बोरिया घर से उठ चुका था. अब वह पूरी तरह घेर में रहने लगा था. सुबह-शाम की चाय और खाना बेटे या पोते वहीं पहुंचा आते थे. भाई बता रहा था कि चाचा और इलम सिंह के बीच बारात के दौरान ही बात हो गई थी. इलम सिंह ने चाचा से कहा था :

‘मैं भी घेर में केल्‍ला (अकेला) पड़ा रह्वूं, तू आ जागा तो मेरा भी जी लगण लगैगा ’ .

इस तरह, बेटे के ब्‍याह के बाद चाचा शाम के वक़्त इलम सिंह के घेर की ओर चले जाते. रात में वहीं सोते और सुबह आठ-नौ बजे के आसपास अपने घर लौट आते. चाचा और इलम सिंह के लिए यह संयोग कितना खुशनुमा रहा होगा! दोनों बूढ़े घर की व्यवस्था से बाहर हो चुके थे. किसी को उनकी ज़रूरत नहीं रह गई थी. इलम सिंह ने तो फिर भी साठ-पैंसठ साल की उम्र तक जम कर खेती की थी, प्रकासी चाचा तो चालीस-पैंतालीस की उम्र के बाद से ही घर वालों की रोटियां तोड़ रहे थे.

पर चाचा ग़ज़ब खुद्दार आदमी थे. किसी ने ज़रा भी तीन-पाँच की तो सामने वाले को वहीं हाथ के हाथ जवाब देते थे— रम्मी बता रहा था.

साल-डेढ़ साल के बाद चाचा के साथ कुछ ऐसा ही वाक़या पेश आया.

एक दिन इलम सिंह बाहर गया हुआ था. चाचा अपने घर से रात का खाना खाकर घेर की ओर निकले. दो-चार बीड़ी फूंकी और सो गए. रात में एक दो बार आँख खुली तो चीज़ों का जायज़ा लिया. सारे पशु अपनी अपनी जगह बंधे थे. दरवाजे की कुण्‍डी देखी, वह भी ठीक लगी थी. कुछ भी असामान्य नहीं था इसलिए घूम‍ फिर कर दुबारा सो गए. लेकिन सुबह अचानक एक अजीब-से शोर से आँख खुली. चाचा ने दृश्य देखा तो अचकचा कर बैठ गए. दो भैंसें आपस में सींग उलझा बैठीं थीं. कभी एक दूसरी को दीवार तक ठेलती चलती जाती, फिर दूसरी पलटवार करती. चाचा की आँख सींगों की इस कटाकट के कारण ही खुली थी. पड़ोसियों ने चाचा के जागने से पहले ही इलम सिंह के घर ख़बर कर दी थी.

इलम सिंह का बड़ा बेटा घेर में  घुसते ही चाचा पर बरस पड़ा :

‘तू रात्‍तू यहाँ   पड़ा रह्वै अर तझै फेर भी पता नी रहत्‍ता के कहाँ   के हो रा’.

भाई के मुताबिक़ चाचा ने इस बेइज्‍़ज़ती का तुरंत प्रतिवाद नहीं किया. भैंसों के उलझे हुए सींग छुड़ा लिए गए और जब सब कुछ शांत हो गया तो चाचा ने अपनी चादर उठाई और दरवाजे की ओर बढ़ने लगे. गेट पर पहुंच कर चाचा ने कहा :

लमडे़ (लड़के) सुण! मैं यहाँ  थारे (तुम्‍हारे ) डांग्‍गर (पशु) घेरण की लिया ना आत्‍ता’.

लोग कहते हैं कि चाचा ने अपना फरमान सुनाया और तुरत गेट से बाहर निकल लिए. इसके बाद इलम सिंह कई बार चाचा के पास आया. लेकिन चाचा टस से मस नहीं हुए.

चाचा को इस कड़क व्यवहार का दण्‍ड कई तरह से भुगतना पड़ा. गर्मियों में रात के समय तो उनकी चारपाई बाहर खुले में डाल दी जाती थी, लेकिन सर्दी और बारिश में उन्हें घर के अंदर ही पनाह लेनी पड़ती थी. गर्मी और उमस के कारण चौमासे में उनके शरीर पर एक बार लाल लाल दाने निकल आए. इस खुजली से चाचा महीनों परेशान रहे. हमारी बैठक का बरामदा ख़ाली पड़ा रहता था, चाचा चाहते तो अपनी चारपाई वहाँ   डाल सकते थे. बैठक रात के समय ख़ाली पड़ी रहती थी. बड़े भाई अंदर वाले घर में सोया करते थे. लेकिन चाचा को यह गवारा नहीं था कि इस मामले में भाई से बात करें. और बड़े भाई को कभी शऊर नहीं आया कि कभी चाचा से जाकर ख़ुद ही कह दें. असल में, प्रकासी चाचा और उनके परिवार के लिए हमारी बैठक केवल तभी खुलती थी जब उनके यहाँ   कोई शादी-ब्‍याह होता था.

सन् 2000 के बाद जब बड़े भाई बच्‍चों की पढ़ाई-लिखाई के लिए दिल्ली आ गए तो बैठक क्‍या पूरा घर ही वीरान हो गया. चूंकि उनकी क्लिनिक कस्‍बे में ही थी इसलिए वे दिल्‍ली से रोज आया-जाया करते थे. दोपहर के समय घंटे-दो घंटे के आराम के लिए वे हमेशा  घर आया करते थे, लेकिन उनका ठिकाना अंदर वाला घर होता था. बैठक तब भी बंद ही रहती थी.

ऐसे में, पूरी बैठक प्रकासी चाचा के लिए खोली जा सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

अभी कोई दो साल पहले मैंने पिता से कहा था :

‘’जब बैठक में कोई रहता ही नहीं तो उसे क्‍यों न प्रकासी चाचा के लिए खोल दिया जाए. इस बहाने उसकी साफ-सफाई भी हो जाया करेगी.‘’

उस दिन मैं तहसील के एक काम से अपने कस्‍बे में गया हुआ था. कागजात साढ़े तीन बजे मिलने थे. मेरे पास पूरे तीन घंटे थे. वैसे भी, मैं घर की चाबी लेकर आया था कि अगर वक़्त मिला तो बैठक भी खोल कर देख लूंगा. उस दिन घर के अहाते में घुसा तो दो चीज़ों पर एकदम ध्यान गया कि बैठक के बरामदे में धूल की चादर जमी है, खिड़की-दरवाजे सब धूल से अटे हैं और चाचा अपने दरवाजे के पास चारपाई पर लेटे हुए हैं.

(4)  

अहाते में घुसते ही मैंने चाचा से राम-राम की, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया. थोड़ी देर बाद उन्होंने कम्‍बल से बमुश्किल मुंह बाहर निकाला. अच्‍छा हुआ कि इसी बीच उनकी बड़ी बहू विमला बाहर निकल आईं. उसने बताया कि चाचा ‘महीने भर से बीमार चल रहे हैं. नज़र कमज़ोर हो गई है. एक बार में किसी को पहचानते भी नहीं’.

मैं चाचा से बात करना चाहता था पर उनकी स्थिति देखकर मेरा इरादा बदल गया. मैंने विमला को इशारे में कहा कि चाचा को परेशान न किया जाए. वह चाय बनाने की बात कहकर अंदर चली गई. चाचा की चारपाई और बैठक के बीच की दूरी बमुश्किल दस कदम होगी. लेकिन लौटते हुए मैं अजीब से अवसाद से घिर गया. बरामदे के फ़र्श, दरवाजे और खिड़कियों पर जमी गर्द, चाचा की टुटही चारपाई और आसपास पसरे उजाड़ को देखकर एकबारगी लगा कि मैं किसी खण्‍डहर में चला आया हूँ.

उस दिन शाम को दिल्‍ली लौटा तो मैंने पिता से कहा :

अब वहाँ   सब उजाड़ हो गया है. बड़े-बूढ़ों में बस प्रकासी चाचा बचे हैं. हम कभी वहाँ  जाकर रहेंगे नहीं तो  बैठक को कम से कम चाचा के उठने-बैठने के लिए तो खोला ही जा सकता है.

पिता मेरी बात सुनने के बाद काफी देर तक चुप बैठे रहे. थोड़ी ही देर बाद मैं समझ गया कि दरअसल पिता चुप नहीं थे. उन्होंने शायद कोई पिछला बही-खाता खोल लिया था. फिर अचानक उनकी यह ख़ामोशी टूटी.

‘तुम्‍हें शायद पता नहीं है कि ये कितने गंदे लोग हैं. ये केवल आज की बात नहीं है. इस प्रकासी की माँ के संबंध चंदरभान हलवाई से थे. यह पूरा कुनबा चरित्रहीन है. इनकी बहुएं और बेटियां— सब इस नीच कर्म में लिप्‍त रही हैं… क्योंकि तुम वहाँ   बहुत ज्‍़यादा नहीं रहे, इसलिए सारी बातें नहीं जानते. इनके यहाँ  बाहरी मर्दों का मेला लगा रहता था. जब तक हमारे चाचाजी रहे तो थोड़ी-बहुत शर्म भी थी, उनके बाद तो इन लोगों के पगहे खुल गए’.

उनका चेहरा घृणा से टेढ़ा होता जा रहा था.

‘इन लोगों ने वहाँ  क्या नरक मचाया है, तुम्हें इसका पता नहीं है. तुम्हारी माँ भी कभी उन लोगों के नजदीक नहीं लगी… वह कहे बिना मानती नहीं थी. इसलिए वहाँ  रोज़ किचकिच और झगड़ा होता था… तुम यह भी नहीं जानते कि तुम्हारी माँ तुम सब भाइयों को पढ़ाई के लिए इसीलिए बाहर भेजना चाहती थी क्योंकि वह तुम्हें इन लोगों के प्रभाव से दूर रखना चाहती थी’.

पिता आवेश में बोले जा रहे थे. मुझे लगा जैसे वे बहुत पहले कंठस्थ कर ली गई पंक्तियों को सुना भर रहे हैं. पिता को वे पंक्तियां इस क़दर याद थी कि उन्हें कहने के लिए कुछ सोचने की भी ज़रूरत नहीं थी.

‘यह सब आपकी धारणा भर है. आपने उनके बारे में पहले से कुछ चीज़ें सुन या मान रखी हैं. आप जीवन भर उन्‍हीं स्‍टीरियोटाइप्‍स को ढोते रहे हैं. क्‍या आप कभी इन धारणाओं से स्वतंत्र हो कर सोच सके कि उन लोगों का जीवन कितने अभावों से घिरा रहा है. आप खु़द मुझे उनकी पीढ़ियों के किस्से सुना चुके हैं…. जिस कुनबे में पिछले साठ सत्तर सालों से एक भी आदमी के पास किसी भी तरह की नौकरी न रही हो, एक भी आदमी आठवीं कक्षा तक न पहुंचा हो, उनका जीवन कैसा होगा… ज़मीन एक टुकड़ा किसी के पास है नहीं तो फिर जीवन कैसे चलाएं?… ऐसे लोगों को हमेशा समझौते करने पड़ते हैं. आपने या बाबाजी ने उनकी कभी कोई मदद नहीं की. फिर वे लोगों के पास न जाते, उनके खेतों में काम न करते तो क्‍या करते… आपने कभी सोचकर देखा है कि एक ही अहाते में रहते हुए बाकी लोग हमें कैसे देखते हैं और उन्हें कैसे देखते हैं? दरअसल, आप यह देखना नहीं चाहते कि यह सारा अंतर आर्थिक हैसियत से पैदा हुआ है. आपके पिता अध्यापक न होते, तो आप पढ़-लिख पाते? और ये जो आप बाबाजी को नगर-गुरु बताते फिरते हैं, इसके पीछे नौकरी की निश्चिंतता ही तो थी…’ .

पिता मेरी बात तल्लीनता से सुनते रहे. वे अपनी बात के प्रतिवाद से कतई नाराज़ नहीं दिखे. उनके चेहरे पर किसी न्यायाधीश जैसा ठंडापन था.

‘नहीं, ये तो तुम्हारी जिद है. तुम हर चीज़ को आर्थिक स्थिति का परिणाम मानते हो… क्‍या मूल प्रकृति कोई चीज़ नहीं होती, क्‍या संस्कारों का कोई अर्थ नहीं होता? सोहनपाल का उदाहरण देखो, जब उसने आत्‍महत्‍या कर ली थी तो पूरा परिवार बेसहारा हो गया. घर में एक चवन्‍नी नहीं थी. उसके तो सात बच्‍चे थे. लेकिन देखो तुम्‍हारी ताई रेवती ने अपने सारे बच्चों को कैसे संस्कार दिए. उसने तीन-तीन भैंस बांधी, दूध बेचा. वह भी तो चौधरियों के खेतों से ही चारा लाया करती थी. लेकिन मज़ाल कि कोई उसकी तरफ़ आँख उठाकर देख ले… ये संस्कार उसके भीतर थे, तभी तो सारे बच्चे सफल हुए… पर तुम मानोगे नहीं, तुम्हें तो हर चीज़ में सिर्फ़ आर्थिक कोण दिखाई देता है…. लेकिन आदमी का एक मूल स्वभाव होता है, जिससे वह अच्छा या बुरा बनता है’.

उन्होंने अपने फ़ैसले का अंतिम भाग पढ़ दिया था.

(5)

आज जब प्रकासी चाचा नहीं रहे तो पिता के साथ दो साल पहले हुई वह बहस याद आ रही है.

उन्हें अब किसी की जगह नहीं चाहिए.

लोगों की भीड़ में पिता कुर्सी पर बैठे हैं. हमेशा की तरह गंभीर और अपने भीतर झांकते हुए से. उनके आसपास और कई लोग हैं. दिल्‍ली के एक स्‍कूल में प्रिंसिपल रहे निरंजन सिंह, सामाजिक अधिकारिता और बाल विकास मंत्रालय में ऊंचे पद पर रहे श्‍याम पंडज्‍जी, सेना में जेसीओ से रिटायर होकर स्‍थानीय बैंक में सुरक्षा अधिकारी के पद पर काम कर रहे राजिंदर सिंह, वकील से जज बने योगेश्‍वर. ये सारे लोग नौकरी से रिटायर होकर वापस इस कस्‍बे में लौट आए थे. कभी प्रकासी चाचा ने इन्हीं लोगों के साथ स्कूल जाना शुरू किया था. ये सब उनके बचपन के यार थे.

निरंजन सिंह कह रहे हैं :  प्रकासी का निशाना बहुत पक्‍का था. ऐसी कंकरी मारता था कि अगले ही पल आम या अमरूद ज़मीन पर, लेकिन मज़ाल कि पेड़ की एक भी डाल टूट जाए!

‘अरे, प्रकासी तैराक भी बहुत तगड़ा था. पांडों के इतने लंबे-चौड़े जोहड़ को मिनटों में नाप डालता था. मुझे भी उसी ने तैरना सिखाया था.‘, यह क़लफ़दार कुर्ते-पाजामें में बैठे श्याम पंडज्जी की आवाज़ थी.

चाचा के घर से विलाप की एक और लहर उठी है. बैठक के पिछवाड़े बैठे लोग दरवाजे की ओर देखने लगे हैं. शायद अर्थी ले चलने की सारी तैयारी पूरी हो चुकी है. जिन रिश्तेदारों को आना था, आ चुके हैं. अब विलाप की जो लहर उठी है, वह शायद आखिरी है. नयी बहुओं को विलाप का शायद पूरा अभ्‍यास नहीं है और चाचा के उम्र के आसपास की वृद्धाएं अपनी क्षमता से ज्‍़यादा रो चुकी हैं. उनके विलाप में  आगे पीछे की लय ख़त्‍म हो गई है. अब उनके थके और कमज़ोर गलों से बमुश्किल ‘ हो रे….प्रकासी भाई…ईई..’ निकल पा रहा है.

चाचा का सांवला रंग अब कुछ पीला-सा दिख रहा है. उनके चेहरे पर अब वह खीझ नहीं है जो जीवन भर दूर से दिखाई देती थी. उन्‍हें अब मक्खियां परेशान नहीं करेंगी, न उमस और गर्मी के कारण उनके शरीर पर फुंसिया निकलेंगी. उन्‍हें अब किसी को पुकारने या किसी का इंतज़ार करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी कि कोई आए और उनकी चारपाई धूप से छांव या छांव से धूप में कर दे.

कोई कह रहा है : चलो बई चलो..

लोग उठने लगे हैं.       

               

 

नरेश गोस्वामी समाज-विज्ञानी, हिंदी कथाकार और अनुवादक हैं. उनकी पुस्तक ‘स्मृति-शेष: स्मरण का समाज-विज्ञान’ सामाजिक स्मृति और संस्कृति के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती है. ‘काँवड़ यात्रा : लोकधार्मिकता का नेपथ्य’ को प्रथम सेतु समाज विज्ञान पांडुलिपि पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. ‘आधे सूरज की धूप’ उनका उपन्यास है, जो संभावना से प्रकाशित हुआ है. वे वर्षों तक ‘प्रतिमान’ के संपादक रहे हैं.

naresh.goswami@gmail.com

Tags: 20262026 कहानीनरेश गोस्वामीनिशानची
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समीक्षा

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Comments 7

  1. मनोज मोहन says:
    2 weeks ago

    ऐसी कहानी पढ़ने को नहीं मिलती. खोती जा रही सामाजिक संवेदनशीलता का जो जिक्र नरेश जी ने किया है, वह विलुप्तप्राय है….

    Reply
  2. अशोक अग्रवाल says:
    2 weeks ago

    अपने कथ्य पर केंद्रित सुगठित और भावनात्मक संवेदनशील सुंदर कहानी।

    Reply
  3. ललन चतुर्वेदी says:
    2 weeks ago

    आज इस कहानी को शुरू करने के पूर्व मेज पर चाय का कप रख लिया था ठंडी चाय नहीं पीता लेकिन आज ठंडी करके पीता रहा. इस विषय पर और भी कहानियां ,यहाँ तक कि उपन्यास भी लिखे गए हैं लेकिन प्रस्तुत कहानी में मैं डूब गया. वर्णनात्मकता औत दृश्यों की बात छोड़ते हुए जब हम अंत की और बढ़ते हैं तो पिता और पुत्र का प्रकासी चाचा के सम्बन्ध में जो तर्कपूर्ण बात है वह बहुत कुछ सोचने को विवश करता है. समाज में ही नहीं परिवार और कुटुम्ब में भी वर्ग भेद है.कोई भी आर्थिक रूप से समृद्ध व्यक्ति अपने गरीब सम्बन्धियों से दूरी बनाने के लिए बेबुनियाद तर्क गढ़ता रहता है. वह स्वयम को डिक्लास करने के लिए कभी सोच नहीं सकता. क्या यह चिंतनीय नहीं है कि एक शिक्षित आदमी की ऐसी सोच समाज के लिए कितनी नुकसानदेह है. साम्यवादी प्रवृति के चिन्तक इस सम्बन्ध में क्या सोचते हैं,यह मैं नहीं जानता लेकिन मनुष्य होने के नाते मैं मनुष्य की गरिमापूर्ण जिन्दगी का हिमायती हूँ. हिंदी में इस तरह की साफ़-सुथरी और निष्पक्ष तथा पूर्वाग्रहमुक्त रचनाओं की जरूरत है.
    मृत्यु सारे जाले साफ़ कर देती है. अब उन्हें जगह नहीं चाहिए -यह एक वाक्य सम्पूर्ण कहानी पर टार्च की तरह रोशनी फेंक रहा है. कहानी यह सवाल उठाती है कि समाज और परिवार में ऐसे उपेक्षितों को मुनासिब जगह कब मिलेगी इस कहानी की समीक्षा कहानी जितनी ही लम्बी होगी.फिलहाल इतना ही .

    Reply
  4. ज्ञानचन्द बागड़ी says:
    2 weeks ago

    इस वर्ष पढ़ने की शुरुआत नरेश जी की दोनों पुस्तकों से ही हुई। बहुत कम हिन्दी के लेखक हैं जो साहित्य के साथ सामाजिक अध्ययन को साथ लेकर चलते हैं।

    यह कहानी अपनी धीमी, उदास लय में ग्रामीण जीवन की जटिल परतों को खोलती है। ‘निशानची’ केवल प्रकासी चाचा की कथा नहीं, बल्कि आर्थिक विषमता, पारिवारिक दूरी और सामाजिक पूर्वाग्रहों से निर्मित एक व्यापक यथार्थ की पड़ताल है।

    इसकी प्रमुख शक्ति स्मृतिपरक शैली है, जहाँ मृत्यु के वर्तमान से अतीत की परतें खुलती हैं और एक हाशिए पर पड़े जीवन का संवेदनशील चित्र उभरता है। प्रकासी चाचा दया के पात्र भर नहीं, बल्कि अपनी खुद्दारी और अंतर्विरोधों के साथ जीवित चरित्र बनते हैं।

    कहानी का केंद्रीय तनाव पिता-पुत्र संवाद में संकेंद्रित है, जो ‘संस्कार बनाम आर्थिक परिस्थिति’ के प्रश्न को उभारता है। लेखक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, बल्कि पाठक को सोचने के लिए छोड़ देता है।

    पश्चिम उत्तर प्रदेश की स्थानीय भाषा और सूक्ष्म विवरण कहानी को प्रामाणिक बनाते हैं। अंत में, मृत्यु के बाद चाचा के ‘निशाने’ की याद एक मार्मिक विडंबना रचती है—जीवन भर उपेक्षित व्यक्ति स्मृतियों में पुनः प्रतिष्ठित होता है।

    संक्षेप में, यह कहानी स्मृति, वर्ग और मानवीय दूरी की प्रभावी और विचारोत्तेजक अभिव्यक्ति है।

    Reply
  5. राजाराम भादू says:
    2 weeks ago

    ग्रामीण जीवन के आन्तरिक अन्तर्विरोधों को उजागर करती एक सहज कहानी। गाँव में सामूहिकता के साथ पारिवारिकता का भी ह्रास होता गया है। इसका प्रभाव व्यक्ति की संवेदना पर पडा है। लोग अधिक निर्मम और निर्लिप्त होते गये हैं। यहाँ तो मृतक के बचपन के कई मित्र जुड गये हैं, अन्यथा विपन्न व्यक्ति की मृत्यु पर अब ज्यादा लोग नहीं जुटते। नरेश ने सच का संवेदनशील अन्वेषण किया है।

    Reply
  6. Satyanarayan Jnvu says:
    2 weeks ago

    सहज शिल्प की बेहतरीन कहानी।पढ़ते हुए भीतर तक हिल गया।कितने निसंग ढंग से गांव परिवार और समाज के लोग संवेदनहीन होते जा रहे हैं। निर्मम और निर्लिप्त ।अब उनके भीतर कुछ नहीं रेंगता।

    Reply
  7. योगेंद्र आहूजा says:
    1 week ago

    कहानी एक साधारण-सी दिखने वाली परिस्थिति के ज़रिये इंसान, समाज, वर्ग-भेद और स्मृति के सवालों को उजागर करती है। ‘मैं’ के लहजे में कही गई इस कहानी की सहज, स्थानीय (हरियाणवी रंग लिए) भाषा इसे अत्यंत वास्तविक और जीवंत बनाती है।

    कहानी बताती है कि हमारे पूर्वाग्रह अक्सर इंसान को सही मायनों में समझने से रोकते हैं, और उपेक्षित ज़िंदगियाँ भी अपने भीतर एक ख़ामोश गरिमा और शान समेटे हो सकती हैं।

    कहानी बाध्य करती है कि हम अपने आसपास के ‘प्रकासी चाचा’ को पहचानें—ऐसे लोग, जो हमारे बीच और क़रीब होते हुए भी हमारी नज़रों से ओझल होते हैं l

    नरेश जी को इस सशक्त कहानी के लिए बधाई l

    Reply

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