| नूह का कबूतर जो कहना बाकी रह गया विपिन शर्मा |
यह आमिर हमज़ा द्वारा संपादित ख़तों की किताब है. एक पाठक के रूप में हम जानते हैं कि आमिर हमज़ा नवोदित कवियों में अपनी बात अलग तरीके से कहने के लिए जाने जाते हैं. एक गहरी बातचीत और अनकहे का सौंदर्य इस किताब को एक जरूरी और पठनीय किताब के रूप में तब्दील करता है. जैसे इस किताब के शुरुआती पन्ने पर जो परिचय है,
‘हिरोशिमा के बदन को मैंने आग में झुलसते देखा. अपनी कब्र पर मैंने खरगोश से अपना घर बनाने की इल्तिज़ा की. मैंने इत्यादि के फूलों का बोसा लिया और जान पाया–मरने से नहीं रोने से मरता है दुःख’.
आमिर हमजा के द्वारा परिचय में लिखी कुछ पंक्तियाँ हैं . इस किताब में उनके चयन की छाप पूरी किताब में दिखाई देती है.

इस किताब को रचनात्मक गद्य के सुखद अनुभव से गुजरने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए . ख़तों और मानवीय संवेदना का इतिहास बहुत गहरा है. रेनर मारिया रिल्के द्वारा अपने शिष्य फ्रेंज़ काप्पुस को लिखे हुए ख़त दुनिया के साहित्य रसिकों के बीच बहुत प्रसिद्ध हैं. यह केवल ख़त नहीं बल्कि लिखने के बीच की जो मनोदशा और लेखक किन परिस्थितियों से होकर गुजरता है उन सब बातों का ज़िक्र है. और रचना संभव होने के बीच का मार्ग है, उसमें पाई जाने वाली तकलीफों, बेचैनियों, रचनात्मक प्रक्रियाओं पर सघन बातचीत है. यह किताब आज की युवा पीढ़ी के बीच भी अत्यंत प्रसिद्ध है और लोकप्रिय भी. पत्र और मानव सभ्यता का रिश्ता बहुत गहरा है. लोग उदास होने पर भी ख़त लिख़ते थे और खुश होने पर भी. दे –दुनिया के प्रसिद्ध राजनेताओं, वैज्ञानिकों और फिल्म कला जगत से जुड़े हुए लोगों ने एक दूसरे को ख़त लिखे. ख़तों की एक व्यापक परंपरा है.
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन से जुड़े हमारे राजनेताओं ने एक दूसरे को खूब पत्र लिखे. महात्मा गांधी के पत्र प्रसिद्ध हैं, उन्होंने दुनिया भर के राजनेताओं को पत्र लिखे. एडॉल्फ हिटलर और विंस्टन चर्चिल को उनके लिखे हुए ख़त बहुत चर्चित हुए. आजादी का आंदोलन और उसके पश्चात के बौद्धिक विमर्श को निर्मित करने में राजनेताओं बुद्धिजीवी के पत्राचार की एक बड़ी भूमिका है. जैसे गांधी और नेहरू के बीच के ख़त–ओ–किताबात. सहमति–असहमति, गुस्सा नाराज़गी के बीच आपसी प्रेम और आत्मीयता का गहरा बंधन. सरदार पटेल और नेहरू भी आपस में खूब ख़त लिख़ते थे. अम्बेदकर और गांधी के बीच का पत्राचार आज स्वाधीनता के आसपास के कालखंड को समझने का संदर्भ बिंदु है.
एक समय ऐसा था जब रचनाकारों के आपसी संवाद पत्रों के माध्यम से होते थे. सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के अन्य साहित्यकारों को लिखे हुए पत्रों की तो एक किताब ही है. मलयज के अपनी बहन प्रेमलता को लिखे हुए पत्र ‘मलयज के पत्र’ नाम से प्रकाशित हुई. पत्रों का अपना निज संसार है. जहाँ औपचारिक रिश्तों के पार जाकर एक आत्मीयता का संसार बनता है.
आमिर हमज़ा की यह किताब एक थीम और कहें एक प्रोजेक्ट के रूप में शुरू हुई. फिल्म कहानी, कविता अथवा किसी उपन्यास के अपने किसी आत्मीय किरदार को पत्र लिखना था. इस परियोजना में हमारे समय के कई महत्वपूर्ण कवि–कथाकार शामिल हुए. वरिष्ठ भी और नवोदित भी. भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए लोग. यहाँ सुदूर पहाड़ के भी लोग हैं और मुंबई जैसे शहरों में रहते हुए अपने एकांत का संधान करने वाले लोग भी.
नूह का कबूतर के बारे में आमिर हमज़ा का कहना है, ‘दीमकों का निवाला होने से बचे. यादों में बसे, संग्रहालयों में संभले और आवाज़ में रचे ख़तों के सीने में दिल नहीं वक्त धड़कता है’. और इस वक्त को अपने अंदर समेटा है इस संग्रह में संकलित पत्रों ने. इन पत्रों का हिस्सा बनने से पहले जो आमिर हमज़ा द्वारा लिखी भूमिका डाकिया डाक लाया एक पाठक के रूप में हमें अपनी गिरफ्त,मोह पाश में लेती है.
मन तक जाता हुआ तरल गद्य. जॉन कीट्स का फैनी ब्राउन को ख़त में यह कहना ‘काश मैं और तुम तितलियाँ होते और बस तीन दिन जीते.’ यहाँ लोर्का, रिल्के, फ्रेंज काफ्का, मिलेना से अपनी इस इल्तिज़ा के साथ हैं, ‘मेरे साथ चलो मिलेना. हम एक दूसरे को बिना किसी संकोच डर या रुकावट के प्यार करेंगे; क्योंकि दुनिया कल ख़त्म हो रही है.
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, फणीश्वर नाथ रेणु और मुक्तिबोध, महात्मा गांधी, प्रथम विश्व युद्ध का सिपाही अमर सिंह रावल ख़तों के माध्यम से अपनी बात साझा कर रहे हैं. अमर सिंह रावल जब युद्ध के मोर्चे से ख़त लिख़ते हैं, तो उन्हें दुनिया शवों से पटी नज़र आती है. आप सोचिए यह कितना तकलीफ देह है, ‘केवल घायल इंसान ही जीवित हैं,बाकी सब मर गए. हमें लाशों के ढेरों पर रहना पड़ता है, क्योंकि कहीं खाली जगह ही नज़र नहीं आती’.
फणीश्वर नाथ रेणु राष्ट्रपति को पत्र लिखकर अपना पद्मश्री सम्मान लौटाते हैं. क्योंकि उन्हें जनता का दमन गवारा नहीं है. मुक्तिबोध नेमीचंद जैन को ख़त लिखकर अपनी पाण्डुलिपि उन्हें न भेज पाने की स्थिति से अवगत कराते हैं. हमें पक्षाघात से जूझते हुए अपने जीनियस महाकवि मुक्तिबोध की मन: स्थिति का पता चलता है. जब वह कहते हैं ‘मैं अब बिस्तर से नीचे नहीं उतर सकता हूँ. आप सबकी बहुत-बहुत याद आती है’. यह सब बातें अमीर हमज़ा की भूमिका डाकिया डाक लाया में दर्ज हुई है.
नुहू का कबूतर की भूमिका समकाल की कुछ चंद बेहद रचनात्मक भूमिकाओं में से एक है. यह सुरुचिपूर्ण संपादन उस चिंता से उपजता है, ‘जिसमें लेटर बॉक्स के निरंतर गायब होने और और डाकखानों के निरंतर सिमटते जाने की पीड़ा है. आज डाकखाने अमेजॉन, फ्लिपकार्ट के सामान को ग्राहकों तक पहुंचाने का माध्यम भर रह गए हैं अथवा सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार और क्रियान्वयन का स्थान. वहाँ ख़त–औ किताब गायब हैं, जिनके लिए उनकी कल्पना की गई थी. सुख-दुख और खुशबू से भरे, ख़तों का दौर जैसे गुजर चुका है. पीली वर्दी पहने डाकिया भी गायब है. यहाँ संदर्भ है निदा फ़ाज़ली का वह कहते हैं‘
सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैली में रखे आंसू और मुस्कान.
यह किताब एक मौलिक अवधारणा को लेकर बुनी गई है. यह अपने पसंदीदा– प्रिय किरदारों, जो किसी किताब, कविता, कहानी, उपन्यास और किसी भी कला के हो सकते हैं. उनको ख़त के माध्यम से संबोधित करने को लेकर बुनी गई है. संपादक पहले ही घोषित कर देता है. अथवा अपनी कामना के रूप में प्रकट करता है कि इस किताब में शामिल कवियों लेखकों के चयन का आधार सिर्फ़ उनकी लिखाई है. हिंदी में चयन का आधार अन्य वजह भी होती रही हैं. संपादक की साफ़गोई और अपनी बात रखने का सलीका इस किताब की दिशा को तय करता है.
नूह का कबूतर में पहला ख़त लिखा है हिंदी की सुपरिचित कवयित्री अनुराधा सिंह ने अपने प्रिय फिल्मी किरदार रितेश बत्रा की चर्चित फिल्म ‘द लंच बॉक्स ’ के साजन फर्नांडीज को. कला रसिक जानते हैं यह एक नायब फिल्म है. प्रेम, संवेदना और प्रतीक्षा आदि बहुत सारे तत्वों का सम्मिश्रण है. कवियों का गद्य उनकी कसौटी है. ‘पत्नियों और मांओं ने इस पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रेम पत्र लिखे हैं’ नामक इस ख़त को कुछ सुंदर वाक्यों, जिन पर आप ठहर जाकविताएँ और सोचने के लिए विवश हों, के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए.
प्रेम का मतलब एक जगह ठहरना नहीं बल्कि साथ मिलकर एक ही क्षितिज की ओर देखना है
हम वह बातें भूल जाते हैं जिन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता.
युवा कवि अंचित द्वारा इतालो केल्विनो की कहानी ‘द मैन हू शाउटेड टेरेसा’ यह ख़त टेरेसा के मार्फ़त हम सबके मन की बात करता है. मनुष्य अपने होने में मनुष्य है, अपने उतार–चढ़ावों, प्रेम–अप्रेम में. यहाँ कुछ बुनियादी बातें हैं और एक कवि के कोमल मन का अथाह विस्तार. एक पत्र जो संवेदनाओं के लिए भाषा–देश की सीमाओं के परे जाकर बात करता है. इस ख़त में लिखा एक वाक्य विस्मृत नहीं होता, ‘ मैं कहना चाहता हूँ कि हम चुनावों से बनते हैं, पर तुमसे नहीं कहूँगा. खुद से कहूँगा (p. 27)
कई बार लगता है यह ख़त हम सबका है. हर रचनात्मक व्यक्ति की आकुलता. ‘महबूब के न मिलने से कविता बनती है. यह किसी और शायर कि खोज थी और अब मेरा हासिल है’. यह शब्द हमारे मन के कोने में सुरक्षित हो जाते हैं. हम भी किसी न किसी आवाज़ के नशे के आदी हैं. हम सबके अंदर एक पाब्लो है,जो प्रतीक्षारत है.
नूह का कबूतर किताब की विशेषता है उसके अंदर समाहित एक आंतरिक लय, सिंफनी के संगीत जैसा कुछ. बाबुषा कोहली अपने ख़त प्रेम की लौ और पहाड़ में बारिश में गाइड फिल्म के मुख्य पात्र स्वामी को पाती के माध्यम से कोलाहल में एकांत का संधान करती हैं. स्वामी को एक पत्र तो जैसे न्यौता है अपने अंदर की यात्रा पर चलने के लिए. निर्णयात्मक होने से परे संवेदनशील होना ही मनुष्यता के संरक्षण का रास्ता है. इस ख़त में दयारा बुग्याल का ज़िक्र है, एक स्वप्न सरीखी जगह. यह ख़त पहाड़ों और फ़िल्म के जिक्र को लेकर चलता है.
प्रांजल धर का ख़त बाकविताएँ मुड़ता रहा हूँ, सल्वाडोर डाली के चित्र ‘माई वाईफ, न्यूड कंटेम्प्लेटिंग हर ऑन फ्लैश बिकमिंग स्टेयर्स, वट्रेब्रे ऑफ ए कॉलम,स्काई कविताएँड आर्किटेक्चर (1945) पेंटिग को संबोधित ख़त से ज्यादा एक कविता, जहाँ देश–दुनिया के दुःख हैं, भटकाव हैं, बोहमियन जिंदगी. बनारसी पान और जाफरान की खुशबू, भिंडी के खेत में मल त्यागते लोग और प्रेमिका को यह उलाहना कि कहाँ उलझा दिया तुमने अपने नैनो को इंस्टाग्राम और फेसबुक की घटिया दुनिया में. तमाम दुनिया की परिक्रमा के बाद बस बात इतनी है साबुन की नई बट्टी लाना, नहाना और तब अपना बायाँ हाथ दिखाना, जो नहीं लिखा इस ख़त में इरादतन वह समझना’. प्रांजल ने इस ख़त में जैसे पूरी दुनिया के दुखों को ओढ़ लिया है.
पत्रकार एवं लेखक प्रियंका दुबे रॉबर्ट ब्रेसां की फ़िल्म ‘मूशेट की किरदार मूशेट के नाम बेहद आत्मीयता से लिखा ख़त, ‘सूरजमुखी की पंखुड़ी पर सुबह की ओस जैसी मासूम आंखें’ में ग्रीन वीच पार्क से मूशेट को संबोधित करती हैं. यह सिर्फ़ फिल्म के एक पात्र को संबोधित पत्र नहीं है बल्कि दुनिया भर की बच्चियों को जिन्हें करुणा और दुलार की आवश्यकता है उनके नाम एक गहरी संवेदना है. इस ख़त में सलीम लगंडे की पीड़ा है ग्रेविटी फिल्म के नायक मैट के प्रेम में उत्सर्ग का जिक्र और हिमालय के प्रति अथाह प्रेम.
सुपरिचित हिंदी कवि कमलजीत चौधरी ने बहुत सुंदर ख़त गिरीश कर्नाड के नाटक नागमंडल की किरदार ‘रानी’ के नाम लिखा है दूरी को पंख ही पाट सकते हैं. जैसे प्रेम का व्याकरण रचता सुंदर संवाद. जैसे पाठक एक कविता पढ़ रहा है. मिर्जा जब अपेक्षित रानी को कहता है ‘रानी आप आजाद होंगी. आपको सच्चा प्यार, चरम सुख और अद्वितीय प्रतिष्ठा प्राप्त होगी.’ (47) यह स्त्री मन और जीवन के प्रति आदर,नेह और प्रेम से भरा गद्य है.
शहराती जीवन से बहुत दूर रहने वाले हिंदी के महत्वपूर्ण कवि अजेय का लिखा हुआ ख़त कई बार पढ़ा गया. रात के पक्षी के साथ लोक– संगीत की जुगलबंदी. यह अकिरो कुरोसोवा की फिल्म देरसु उजाला के किरदार देरसु उजाला के नाम ख़त. इस ख़त को पढ़ते हुए जैसे संवेदनाओं का साधारणीकरण होता है. गाँव की सरलता और शहरी जीवन की जटिलता हमारी आंखों के सामने खड़ी हो जाती है. यह ख़त हमारे मन को थोड़ा और नरम करता है. जो गाँव देहात और दूर दराज के पहाड़ का व्यक्ति है वह वनस्पतियों से भी बात कर सकता है. शहर के हम सबके अनुभव भिन्न हो सकते हैं. मगर गाँव के व्यक्ति के लिए शहर आज भी अजूबा है. यह ख़त पता नहीं क्यों, स्मृति का हिस्सा बन गया.
यहाँ शैलजा पाठक शिवानी के उपन्यास कृष्णकली की किरदार कृष्णकली के नाम ख़त लिख़ती हैं. यह कृष्णकली के माध्यम से तमाम हाशिए पर जी रही स्त्रियों को गहरा संबोधन है. रविंद्रनाथ टैगोर भी कृष्ण कली का जिक्र करते हैं. बताते हैं यह उसे समय की एक विशिष्ट कोठे वाली थी. कला और सौंदर्य से लबालब भरी हुई स्त्री और अपनी शर्तों पर जीने वाली. यह ख़त एक गहरी अंतर यात्रा है कृष्ण काली के साथ हमारी. शैलजा इस ख़त के अंत में रहती हैं‘मैं तो क्या तुम्हें जो भी जानता है वह तुम्हें कभी भूल नहीं सकता.
इन ख़तों को पढ़ते हुए लगता है जैसे हम एक मुसलसल सफ़र पर निकले हैं.
यहाँ नवीन रांगियाल अल्बर्ट कामू के उपन्यास आउटसाइडर के किरदार म्योरसॉल को ख़त लिख़ते हैं ख़त की शुरुआत ही कुछ ऐसे है
म्योरसाल: मैं सोचता नहीं, सिर्फ देख़ता हूँ. हर उस बात को स्वीकारता हूँ जो मेरे सामने है.
यह म्योरसॉल के माध्यम से हमारे खुद के जीवन को ही समझने की कोशिश है. नवीन जिंदगी की विसंगतियों में जिंदगी की संगति का संधान करते हैं. जिंदगी एब्सर्ड है और इसकी कोई तुक नहीं है. यह ख़त मानता है इससे जिंदगी की तकलीफें कम हो जाती हैं. प्रत्येक घटित को हम देखने लगते हैं. एक निरपेक्ष भाव से. नवीन इस ख़त में म्योरसोल से बात करते हुए हमारे वक्त से संवाद करते हैं.
प्रिया वर्मा ने प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के पात्र हामिद को ख़त लिखा. हामिद जो बचपन से हमारा प्रिय पात्र है. वह हम जैसा है और हम उस जैसे. कई बार ईद पर नमाज के बाद मिलन के दृश्य में हमने हमीद को खोजा है. प्रिया वर्मा हामिद द्वारा चिमटे के दाम पूछने को लेकर उसे उलाहना देती हैं . कि कई बार गरीबी से हम इतना ज्यादा समझदार हो जाते हैं कि अपनी उम्र में नहीं रह पाते उससे बाहर हो जाते हैं. इस ख़त में 21वीं सदी की दुनिया के कुछ गहरे चित्र हैं और लहू लुहान होती दुनिया के प्रति चिंता भी. दुनिया के एक हिस्से में जब स्कूलों पर बम गिराए गए,शहरों को नेस्तनाबूत कर दिया गया. यहाँ हमीद को याद करने के बहाने पूरी दुनिया के दुखों से गहरा साबका है. छोटे से ख़त में ढेर सारी बचपन की स्मृतियाँ हैं.
फहीम अहमद का अब्दुल बिस्मिल्लाह की कहानी लंठ के किरदार आरिफ़ के नाम लिखा गया ख़त ‘स्मृतियों के भी यातना शिविर लगाते हैं’. आरिफ़ जैसे कैरेक्टर यूनीक होते हैं, एक बार हमारे नजर से गुजर जाकविताएँ तो जेहन में अमिट हो जाते हैं. ऐसे मनुष्य हमारे इर्द –गिर्द बहुतायत में है जो समाज के सफलता के बनाए पैमानों पर कोशिश तो करते हैं खरा उतरने की, मगर अपनी सरलता और सहजता में महज़ लोगों के लिए कंधा साबित होते हैं. महज भीड़ का हिस्सा. क्योंकि भीड़ की ताकतवर लोगों को जरूरत होती है. जैसे यह ख़त आरिफ के नाम ना होकर देश की बहुसंख्यक आबादी के नाम लिखा गया है. जब हमें प्रेम की चाह होती है, तो हमें मरुस्थल के हवाले कर दिया जाता है. यह ख़त राजनीतिक परिदृश्य का भी एक स्कैच खींचता है– हंसो नहीं साफ-साफ दिख रहा था कि तुमको रैली में ले जाकर तुम्हारी कौम के लोगों को चिढ़ाना चाहते थे. सबको दिख रहा था कि तुम्हारी शादी नहीं होनी है मगर तुम रैली में भगवा पहने घूमते रहे. (P. 90) यह इस किताब के कुछ बेहद पठनीय पत्रों में से एक है.
मुमताज इकबाल ने ख़त लिखा है निर्मल वर्मा के उपन्यास वे दिन की किरदार रायना को, मिलन्कोविच के गिटार का उदास स्वर. इस ख़त के माध्यम से हम जैसे प्राग के जीवन को अपनी आंखों के सामने घटित होते देखते हैं. नियति को कुछ अलग तरीके से महसूस करते हुए उन शब्दों के माध्यम से जिनमें कहा गया है कई बार दरवाजा खटखटाकर भी हमें बंद दरवाजा ही नसीब होता है मगर कई बार हमें खींच लिया जाता है उसे जगह के अंदर जहाँ हमने कोई सांकल को हिलाकर दरवाजे पर दस्तक ही नहीं दी. और हम वहाँ होने के लिए बाध्य होते हैं. यह रायना के मार्फ़त अपनी नियति से साक्षात्कार है. यहाँ आपको रिल्के, मार्क्स के नाम बुदबुदाने मात्र से एक परिवेश निर्मित होता दिखाई देगा. और इस ख़त के अंत में एक बात जो आपको हमेशा याद रह जाएगी ‘प्यार उसे आधे भाग के लिए चाह है जिसे हमने खो दिया है’.
ऐसे ही अन्य ख़त इस किताब में जैसे अध्यात्म और रूह के रूहानी तजुर्बात का सफर के नाम से काजी अब्दुल सत्तर के उपन्यास दाराशुकोह के किरदार दाराशुकोह के नाम ख़त यह लिखा है अखलाक आहान ने. यह दाराशुकोह के व्यक्तित्व के विभिन्न अंगों और हमारे देश समाज मिली-जुली तहज़ीब, दाराशुकोह को विभिन्न तरीके से देखे जाने का लहज़ा आदि को लेकर बात करता है.
एक ख़त है ‘वहाँ पानी नफरत का नाम था’शीर्षक से अमन सोनी वीरेन डंगवाल की कविता राम सिंह के किरदार राम सिंह के नाम ख़त लिख़ते हैं. यह ख़त राम सिंह से ज़्यादा पहाड़ की रूतों को ख़त है, टिहरी, लंबगाँव और हल्द्वानी जगह कोई भी हो, बात जो ख़त में कही गई वह सच है. जलते जंगल और शराब के नशे में डूबे लोग. पहाड़ पर लंबे प्रवास ने इस पत्र के साथ एक जुड़ाव महसूस कराया. अमन सोनी का कहना कि ‘पहाड़ में शराब झरनों की तरह बहती है तब भी और अब भी. यह एक पहाड़ के बाशिंदे के रूप में अपनी आँखों से देखा सच लगा. राम सिंह कक्कू हर पहाड़ पर बसने वाले के भेज्जी जैसे हो जाते हैं.
नूह का कबूतर में अमर दलपुरा विनोद पदरज की कविता खंड दीप निवाजी पुरा भालपुर की औरतों के किरदार/ किरदारों के नाम ख़त ’क्या तुम मेरी मृत्यु पर गीत गाओगी’ शीर्षक से ख़त लिखा है. यह उन तमाम स्त्रियों के नाम ख़त है जो इस दुनिया से चली गई. जो खामोशी से इस दुनिया से रुखसत हुई अथवा उन्हें रुखसत कर दिया गया. यहाँ राजस्थान का जीवन है मगर स्त्रियों के दुख एक जैसे हैं. छुटपन में कुछ समय का दुख और अनाम होकर मर जाना. कई बार लोगों द्वारा कहना बोझ कम हुआ. युवावस्था में मरना कुछ समय की स्मृति रह जाना है. यह एक गहरा ख़त है जो उन सभी स्त्रियों को संबोधित करता है, जो कहीं खो गई हैं. चली गई हैं असमय ही इस दुनिया से विदा हो गई.
यूसुफ़ का ख़त कमल अमरोही की फिल्म पाक़ीज़ा की किरदार साहिबजान के नाम है. कोठे पर साज़ पड़े मिलते हैं बगैर सुरों के यह उस महिला के नाम तो ख़त है ही, जिसे उस जगह पर लाकर खड़ा कर दिया गया है, जिसे कोठा कहा जाता है. जहाँ दिन में लोग जाने से कतराते हैं और रात को तथाकथित संभ्रांत लोग अपनी रातें गुलजार करते हैं. यह ख़त साहिबजान जैसी स्त्रियों को बहुत विनम्रता और आदर के साथ पुकारता है. यह बात है हर साहिब जान को अपना सलीम मिले जो उसके सम्मान की रक्षा करें उसके पाक कदमों और उसके व्यक्तित्व को दुनिया की लोलुप नजर से बचाए. इस ख़त में हमारी दुनिया का हाल भी लिखा गया है. जो धर्म और जाति के नाम पर बहुत बुरी तरीके से तक्सीम है.
महत्वपूर्ण हिंदी कवि और आलोचक विजय कुमार जैनेंद्र कुमार के उपन्यास त्यागपत्र के किरदार मृणाल के नाम ख़त लिख़ते हैं. उसे प्यारी मृणाल बुआ के नाम से संबोधित करते हैं. हम जानते हैं मृणाल जैसी स्त्रियाँ अपनी कोमलता और भावुकता में यूनिक होती हैं. उनके प्रेम को प्रेम नहीं मिलता. मिलती है तो बस यंत्रणा और दर –ब–दर होना उनके माथे पर लिख दिया जाता है. विजय कुमार इस ख़त में लिखते हैं की वापसी की कोई यात्रा नहीं होती. हम सिर्फ वाह्य स्थूल घटनाओं को देख रहे थे तुम्हारे निरंतर अकेले पड़ते चले जाने की वे प्रक्रियाकविताएँ है क्या रहा होगा तुम्हारा अन्तर्जगत?
कवि एवं गद्य लेखक जयशंकर रवींद्रनाथटैगोर के उपन्यास गोरा के किरदार गोरा के नाम ‘क्या तुम्हें विलियम शेक्सपियर का ईसाई होना याद आता है’ नाम से ख़त लिख़ते हैं. यह ख़त वैश्वीकरण के दौर में उभर रही अस्मिताओं के विमर्श पर सवाल खड़ा करता है. हमें शेक्सपियर का ईसाई और अंग्रेज नागरिक होना याद नहीं रह जाता, बस याद रह जाता है उनका एक बड़ा लेखक होना. जैसे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ उतने ही हमारे अपने हैं जितने अन्य अदीब. अन्य तमाम अस्मिताकविताएँ वक्त के साथ धूमिल हो जाती हैं और शाश्वत रहती है इंसानियत.
राहुल श्रीवास्तव एक चौखट अभी भी खड़ी थी शीर्षक के अंतर्गत रजत कपूर की फिल्म आंखों देखी के किरदार बाबूजी के नाम ख़त लिख़ते हैं. इस ख़त में वह हमारे मध्यम वर्गीय परिवारों की स्थिति और भाइयों के आपसी अन्तर्द्वन्द को अभिव्यक्त करते हैं.
निशांत कौशिक शम्सुर्रहमान फारुकी के अत्यंत ख्यात उपन्यास कई चंद थे सारे आसमाँ की किरदार वजीर खान को,‘ प्रेमियों की कब्र पर शहर बन –बन कर धंस रहे हैं’ शीर्षक से ख़त लिखकर याद किया. यहाँ सिर्फ वजीर खानम की याद नहीं है, बल्कि दिल्ली शहर और लोगों की बदल रही मानसिकता को भी दर्ज किया गया है. एक महाकाव्यात्मक उपन्यास की याद को जैसे छोटे ख़त में दर्ज किया गया है.
इस किताब की जियोग्राफी काफी बड़ी है. स्मृतियों का व्यापक संसार भी. सत्यव्रत रजक फणीश्वर नाथ रेणु की कहानी तीसरी कसम के किरदार हीरामन को ’घटवारिन के पास कोई नदी नहीं थी’ चिट्ठी लिखकर उनसे अपने मन का हाल साझा करते हैं. बात यह है‘ जिसकी सारी दुनिया होती है उसका कोई नहीं होता मीता’. यह मैथिल की जमीन है, जहाँ मीता मिली हीरामन को, मगर प्रेम की चाह में अप्रेम की त्रासदी के साथ जीने ही पड़ा हीरामन को. सत्यव्रत अपने समय का भी हाल बयाँ करते हैं.
अनुराग अमन ने मन्नू भंडारी को आपका बंटी के किरदार बंटी के नाम ख़त लिखा है. यह ख़त बाल मनोविज्ञान की उलझनों और बेचैनियों को हमसे साझा करता है. मन्नू भंडारी के उपन्यास आपके बंटी की तो यहाँ कहानी है, मगर बात कुछ और है यहाँ शनी है, जो खुद को न समझे जाने से धीरे धीरे चिडचिडा और अकेला होता जा रहा है. एक ख़त है जो इस पत्र के लेखक को कहीं मिल गया है जो किसी पागल द्वारा लिखा गया है. लेकिन है बहुत सच्चा जैसे किसी के मन का गहरा विश्लेषण. एक बच्चे के व्यक्तित्व की गहरी डिटेल्स दर्ज़ हैं इसमें. प्रेम और उसकी महीनता और बहुपरत होने की स्थिति.
विजय राही ‘रकीब को बुरा भला मै क्यों कहूँ’ ख़त में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय के अत्यंत चर्चित और बहु पठित उपन्यास शेखर एक जीवनी के पात्र शेखर को ख़त लिख़ते हैं. यह ख़त अपने मन को और जीवन को खोल देना जैसा है. बचपन से लेकर किशोर अवस्था की स्मृतियाँ,प्रेम,दैहिक खिंचाव, रचनात्मकता जीवन संघर्ष सब कुछ दर्ज़ कर दिया गया है. लगता है जैसे शेखर हमारे अंदर का विद्रोह भाव है. हम सब में एक शेखर है. यह ख़त हमारे गाँव देहात को समझने की खिड़की भी है.
चर्चित कहानीकार और अनुवादक ओम शर्मा स्टीफन स्वाइग के उपन्यास ‘बिवेयर ऑफ पिटी के किरदार कविताएँ टन हॉफ मिलर के नाम ख़त’ लिख़ते हैं. हम जानते हैं कि ओमा शर्मा स्टीफन स्वाइग के गहरे अध्येताओं और प्रामाणिक अनुवादकों में से हैं. स्वाइग की जीवनी का उन्होंने ‘वो गुज़रा जमाना’ के नाम से अनुवाद किया है. यह कविताएँ टन हॉफ मिलर एक आर्मी अफसर जो एक पार्टी में एक स्त्री को नृत्य के लिए प्रस्ताव करता है. मगर उसे शारीरिक रूप से समर्थ ना जानकर खुद को असहज महसूस करता है. उसको इस असहजता से वह जूडिथ नाम की स्त्री उबारती है. वह उसकी बहन के प्रति आकर्षण महसूस करता है. यह ख़त सहानुभूति, अनुभूति और प्रेम जैसे मुद्दों पर बात करता है. एक डॉक्टर कोनेडोर हैं; जिनसे मिलने के पश्चात हॉफ मिलर अपने निर्णय और जिंदगी को अलग तरीके से देखने लगता है. यह ख़त स्टीफन स्वाइग और हॉफ मिलर दोनों को ही संबोधित है. इस ख़त के बाद वाले हिस्से में ख़त लिखने वाले ओमा शर्मा इस बात पर रोशनी डालते भी हैं.
हिंदी के अनूठे कथाकार सैनी अशेष ने ‘हलो, कांस्टेस द लेडी चैटर्लीज़’ नाम से लॉरेंस के उपन्यास लेडी लेडी चैटर्लीज़ लवर की किरदार लेडी चैटर्लीज़ के नाम ख़त लिखा है. यह ख़त उस लेखक के नाम है जो अपने समय में अत्यंत विवादास्पद और चर्चित रहा और समय बीत जाने के बाद वह अपने चरित्र सृष्टि में बेहद आधुनिकतावादी कहा गया. लेडी चैटर्लीज़ को महीनता और मानवीयता के साथ समझता ख़त. लॉरेंस के खुद के जीवन में भी झांकता हुए. यदि उनकी प्रेमिका फ्रीडा ना होती,तो लेडी चैटर्लीज़ भी न होती.
नूह का कबूतर किताब को थोड़ा धीमे–धीमे पढ़ा जाना चाहिए. इतने सारे कवि–लेखकों से लिखवा लेना और इतना सुंदर संयोजन प्रशंसा के योग्य है. इस तरह की परियोजनाकविताएँ शिद्दत और धैर्य की मांग करती हैं. नूह का कबूतर किताब एक नए प्रकाशन गृह हिंदीस्थान से अक्टूबर 2025 में आयी है. रचनात्मक और आत्मीय गद्य पढ़ने वाले पाठकों को यह किताब प्रिय लगी है.
यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें
विपिन शर्मा
मेरठनई सदी का सिनेमा, मनुष्यता का पक्ष, आजादी की उत्तरगाथा, तुम जिंदगी का नमक हो पुस्तक प्रकाशित
vipinsharmaanhad82@gmail. com




यह कान्सेप्ट ही अपने आप में अनोखा है कि लेखकों से उनके प्रिय पात्रों को ख़त लिखवाए जाएँ, जल्दी पढ़ता हूँ। ऐसी कल्पनाशील पुस्तक से परिचित कराने के लिए आपका आभार।
आमिर हमजा की क़िताब ‘नूह का कबूतर’ निश्चय ही एक नई सूझ है और विधाओं के पार जाकर साहित्य की अभिनव राहें खोजती है।विपिन शर्मा इससे परिचय कराने के लिए बधाई के पात्र हैं।पर समालोचना के कंटेंट को काली पृष्ठभूमि में प्रस्तुत करना कुछ असुविधाजनक लग रहा है।यह आँखों पर अधिक दबाव डालता है।
बहुत सुंदर और ज़रूरी आलेख। विपिन जी और हम सबको बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। समालोचन का आभार🌼