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समालोचन

Home » नॉरवेजियन वुड : पवन करण

नॉरवेजियन वुड : पवन करण

हारुकी मुराकामी का उपन्यास ‘नॉरवेजियन वुड’ मूल जापानी भाषा में 1987 में प्रकाशित हुआ था. इसका अंग्रेज़ी अनुवाद जे. रूबीन ने 2000 में किया. अब यह वरिष्ठ लेखक-अनुवादक मदन सोनी द्वारा हिन्दी में अनूदित होकर मंजुल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है. यह मुराकामी का अत्यंत चर्चित और लोकप्रिय उपन्यास है, जिसमें स्मृति, प्रेम, अकेलेपन और युवावस्था की उलझनों का गहरा तथा संवेदनशील चित्रण मिलता है। इस उपन्यास की चर्चा कर रहे हैं कवि पवन करण.

by arun dev
March 14, 2026
in समीक्षा
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नॉरवेजियन वुड : पवन करण
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तुम्हारे जवाब का इंतज़ार मेरे लिए अब तक की सबसे दर्दनाक चीज़ है.

पवन करण

यदि कोई उपन्यास इस दुनिया के भीतर एक और स्वतंत्र दुनिया है तो स्वीकारना चाहिए कि मुराकामी ने कल्पना और भाषा के रास्ते ‘नॉरवेजियन वुड’ नामक अपनी एक दुनिया गढ़ी है. ‘अवसाद’ और ‘काम’(सेक्स) की ऐसी दुनिया जो अपने बहाव में हमें (पाठक को) बहाये लिए जाती है. अवसाद इस उपन्यास का प्रथम अमूर्त नायक है तो ‘काम’ द्वितीय नायक जो दोनों मिलकर उपन्यास के अंत तक पात्रों की मनःस्थिति पर राज करते हुए पाठक को स्वयं से जोड़ने में कामयाब होते हैं.

फिर अवसाद भी साधारण नहीं, ऐसा असाधारण जो उपन्यास के कई पात्रों को मौत की दुनिया में ले जाता है.

बस उपन्यास का मुख्य पात्र ‘तोरी वातानबे’ ही ऐसा है जो अपने को अवसाद की दुनिया में ठीक तरह से धसने से पहले ही खुद को बाहर खींच लाता है. अवसादग्रस्त चरित्रों से सर्वाधिक सामना भी उसी का होता है. उपन्यास के शेष कुछ पात्रों की अवसाद से कोई पहचान न थी तो वे अंत तक उससे बचे रहते हैं जैसे नागासाबा और मिदोरी. फिर अवसाद को पराजित कर आगे बढ़ जाने वाली, झुर्रियों भरी त्वचा लिए’ शानदार रेइको तो इस उपन्यास में आश्चर्य की तरह है ही.

मदन सोनी

बला की खूबसूरत ‘नाओको’ जैसा कि मुराकामी ने उसे दैहिक-वर्णित किया है. अपने बचपन के मित्र ‘किजुकी’ की मौत के बाद अपने भीतर उतरती है तो फिर कभी बाहर नहीं आती. वातानबे के उसे दिलाए लाख विश्वास और उसके साथ संपन्न अति-उजले सक्रिय कामक्षण भी उसे उसके भीतर के अंधेरे से निकालने में कामयाब नहीं हो पाते. क्या बारह तेरह की उम्र से एक-दूसरे को चूमते और सहलाते आ रहे किजुकी की मौत ने उसे अवसाद की स्याह दुनिया में ले जाकर पटक दिया.

क्या मानसिक स्तर पर काम-क्षीण किजुकी की मृत्यु की वजह भी नाओको के साथ उसकी काम-विफलता रही. कल्पना करें तो नाओको ने अपने साथ-साथ मृत किजुकी के अवसाद को भी जिया. जबकि किजुकी के जीवित रहते नाओको कितनी जिंदादिल थी. इतनी की वह वातान्बे के लिए गर्लफ्रेंड जुटा देती थी. इन जीवन्त विद्यार्थियों के बीच कोई जबरदस्त आर्थिक समस्या थी. ऐसा भी पढ़ने में नहीं आता है. आखिर मुराकामी की रची विद्यार्थियों के बीच की ये ऐसी कौन सी और कैसी दुनिया है जिसमें अधिकतम बीस की उम्र के आसान ‘काम-स्वतंत्रता’ हासिल किये ये विद्यार्थी इस कदर अवसाद के शिकार हो जाते हैं कि मौत से कम कुछ नहीं चाहते.

उपन्यास के पात्र मुख्यता जापान के शहर टोक्यो और क्योटो तथा कुछ अन्य शहरों के बीच आवाजाही करते हैं जिनके बेहद खूबसूरत वर्णन इसमें हमें पढ़ने को मिलते हैं. बीयर, व्हिस्की, काफी, लंच, डिनर हर जगह लगातार और बार-बार आसानी से उपलब्ध है. परिवार, समाज और प्रशासन की ओर से कोई कानूनी बाधा नहीं है. सब कुछ आसान और आसानी से हासिल है. घर, नौकरी, लड़की, मित्र, किताबें और देर रात तक ब्लू फिल्में दिखाने वाले थियेटर. क्या जापान के युवाओं का समाज ऐसा ही है. या इसे अपने अनुसार मुराकामी ने रचा है? मुराकामी का रचा यह युवा संसार हमें मीठा तो लगता है मगर अविश्वसनीयता से भी भरता है. इसमें पसरी रोमांटिक उदासी और जीवन-संघर्षहीनता हमें इस पर एकदम भरोसा न करने को विवश करती है. आर्थिक-सामाजिक संघर्ष भी इतने आसान जैसे खत्म होने को तैयार ही बैठें हों.

पचहत्तर से अधिक लड़कियों के साथ सो चुका वातानबे का हमउम्र छात्र मित्र ‘नागासाबा’ जो गजब का पढ़ाकू और अतिधनाढ्य है और जो यह कहता है की वह किसी भी लेखक को उसकी मृत्यु के तीस साल बाद पढ़ता है. स्कूल/कालेज के दौरान छात्रावास में ठीक उसी तरह का खिलंदड़ा और अधिकारपूर्ण जीवन जीता है जैसे दुनियाभर में शक्तिशाली लोग जीते हैं. उस पर न क्लास में कोई पाबंदी लागू होती है और न छात्रावास में.

यहाँ  नागासावा ठीक किसी भारतीय शक्तिशाली समाज से आने वाले छात्र की तरह, जिसे पूर्व से परंपरागत संरक्षण हासिल है की तरह सक्रिय दिखाई देता है. जिसका लाभ खासतौर पर वातानवे को छात्रावास से रात-भर के लिए बाहर रहकर होटल में लड़कियों के साथ रात बिताने के रूप में मिलता है. जो न अन्य छात्रों से भिड़ने में डरता है न बेतहाशा खर्च करने में. मगर उसके व्यवहार से खिन्न होकर, उसके बारे में सब जानने के बाद भी, कठिन समय और हर परिस्थिति में उसके

साथ बनी रही उसकी प्रेमिका हात्सुमी जब आत्महत्या कर लेती है तो कारण की शक्ल में यहाँ  भी उसे मौत के मुंह में खीचकर ले जाता अवसाद पसरा मिलता है. मगर हात्सुमी की मृत्यु पर हम नागासावा को सामान्य ही पाते हैं. सम्पन्नता और सफलता जिन लोगों के भीतर से संवेदना को अपदस्थ कर देती है, नागासाबा उसका प्रतिनिधि प्रतीक है. जबकि बातानवे और पाठक के मन में हात्सुमी की मृत्यु का दुख देर तक बना रहता है. क्या अवसाद किसी समाज का युवाओं में, अपने शिकार की तलाश में टहलता रहने वाला कटु सत्य है. मुराकामी की गढ़ी-रची ‘नॉरवेजियन  वुड’ की दुनिया तो ऐसी ही है.

उपन्यास में मध्य तक हम हात्सुमी की मृत्यु से पहले किज़ुकी और नाओको की बहन और उसके चाचा की अकाल और अवसादग्रस्त मृत्यु की पीड़ा से ख़ुद को गुजरते देख चुके होते हैं. किजुकी की मृत्यु के बाद, बातानवे के साथ संयोगवश एक आँसुओं से भरे किंतु संतुष्ट संसर्ग के पश्चात स्वस्थ होने सेनोटोरियम पहुंची नाओको को बातानवे ऐसा व्यग्र खत लिखता है कि बातानवे के साथ इस उपन्यास का मुझ सरीखा पाठक भी उसके जवाब का इंतजार करने लगता है. एक दीर्घ प्रतीक्षा के पश्चात तोरी बातानवे को मिला नाओको का खत इस उपन्यास को सेनोटोरियम की समझदार-आदर्श, सपनीली और कुछ अविश्वसनीय दुनिया में ले जाता है. नाओको से मिलने पहुंचा बातानवे जब तक सेनेटोरियम में रहता है वहाँ  की शांत हरी-भरी और खुली दुनिया पाठक का मन मोहे रहती है.

‘नॉरवेजियन वुड’ का सेनोटोरियम वाला दीर्घ-भाग खास है. एक अलग दुनिया जिसकी तुलना लगातार मुराकामी नामक पेंटर के हाथों किसी रचती चली जाने वाली पेंटिंग से की जा सकती है. जहाँ  सब अच्छा-अच्छा है. यहाँ  हम अवसाद को सुस्ताते या कुछ समय के लिए ही सही जीवन से पराजित सा होते देख सकते हैं. यहाँ  हम चांदनी रात में अपने जिस्म की चांदनी से चांदनी को मात देती नग्न नाओको को देखते और जानदार रेइको से मिलते हैं. एक-दूसरे में बिना धसे वातानवे और नाओको के बीच एक अनूठी सी काम-सक्रियता यहाँ  भी है, जो रेइको द्वारा प्रेरित-उत्पादित वातावरण से संपन्न होती है, जिसमें जारी रहने वाला संवाद नाओको के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को भी उभारता है.

यहाँ  इस उपन्यास के पाठक को सेनोटोरियम से बड़ी उपलब्धि के रूप में रेइको मिलती है जो अपने आप में एक कमाल की कैरेक्टर है. जिसे उसकी बारह वर्षीय लेस्बियन शिष्या से मिला अवसाद यहाँ  सेनेटोरियम में खीचकर लाया है. अपने भीतर के अंधकार को बाहर खींचकर पटक देने में समर्थ दिखाई देती वह वातानवे को अपने जीवन और उसके साथ घटे उस प्रसंग के बारे में दो खंडों में बताती है अंततः जो उसे यहाँ  ले आया. विश्वास नहीं होता एक बारह वर्षीय शिष्या उसे इस हद तक काम-विवश कर सकती है कि वह उतने समय के लिए ही सही इस हद तक उसकी पराधीनता स्वीकार कर बैठे और अंततः उसके द्वारा प्रचारित-प्रसारित षड्यंत्र का शिकार होकर स्याह-मानसिक- रुग्णता का शिकार हो जाए.

प्रश्न उठता है रेइको को यहाँ  स्वयं को समाज के बीच बचाना चाहिए था, होता यह है कि वह स्वयं को बचाने से बचने की जिद करना शुरू कर देती है और आखिरकार अपने पति और परिवार दोनों को गंवा देती है और यहाँ  इस सेनोटोरियम तक पहुंच जाती है. पर रेइको सेनोटोरियम की ऐसी पात्र है जो अपनी चहक से सेनोटोरियम में पसरी गहरी खामोशी को अपनी सक्रियता और अपने हास्यबोध भरे बातूनीपन से समय-समय पर नोचकर उसे संवेदनशील होने का अहसास कराती रहती है. यहाँ  इस उपन्यास के रसप्रिय पाठक को वातानबे से कुढ़न हो सकती है की जीवन में उसकी मुलाकात किसी रेइको से क्यों नहीं हुई. मगर पाठक को यह भी नहीं भूलना चाहिए की रेइको, मुराकामी ने इस उपन्यास में जो दुनिया गढ़ी है, उसमें फैले वातावरण की उपज है. जिसकी रोचकता पाठक के हृदय की धड़कन ठीक ‘मिदोरी’ की तरह बढ़ाती है.

दरअसल इस उपन्यास पर इसके चरित्रों के माध्यम से ही की जा सकती है. कारण यह कि इसमें ऐसा कोई घटनाक्रम नहीं घटता कि जिसके इर्दगिर्द इसका कथानक और इसके चरित्र घूमते हों. देखा जाए तो इसके पात्र इसके कथानक को निर्मित करते हैं. पात्र आगे बढ़ते हैं और  निर्मित होते हुए इसका कथ्य अपने कदम आगे बढ़ाता है. जैसे खिलंदड़ी  ‘मिदोरी’ की मानसिक गतिविधियां इसे गति प्रदान करती हैं. वातानबे के साथ हर बार ठीक मुहाने पर पहुंचकर लौट आती ‘मिदोरी’ एक रोचक पात्र है, जो नाओको के सेनोटोरियम में रहने के दौरान उसके नजदीक आती है. जिनका वह क्रमवार वर्णन करती है- उसके दिमाग में इस कदर कामक्रीड़ा के दृश्य भरे हैं कि तोरी उससे पूछ लेता है ‘लगता है आजकल ब्लू फिल्में ज्यादा देख रही हो.’

वातानबे के साथ उसके शारीरिक संबंध नहीं बनते मगर उपन्यास में वह जब तक दृश्य में रहती है, अपने मन में निरंतर चलते जाने वाली काम-कल्पनाओं से इस कमी को पूरा करती जाती है. मजेदार यह है कि मुराकामी उसके मन में वातानवे की अधिक उम्र की प्रेमिका को ले जाकर बिठा देते हैं जो उसके साथ मनचाहा काम- व्यवहार रचती है. नाओको की मृत्यु के बाद सेनोटोरियम से बाहर आकर नई जगह जाते हुए रेइको का वातानबे से मिलना भी कम उल्लेखनीय नहीं मगर बेहतर यही हो कि पाठक मेरी तरह सीधे उसे पढ़े. मगर उस हिस्से को काम रहित मानकर न चलें. काम यहाँ  भी अपने भरपूर सौंदर्य के साथ उपस्थित है.

हारुकी मुराकामी

हारुकी मुराकामी नें अपने इस उपन्यास ‘नॉरवेजियन वुड’ में जो दरअसल एक संगीत-शैली है, में संसर्ग-दृश्यों को रचने में कोई कंजूसी नहीं की है. बल्कि उन्होंने हर जगह काम-सक्रियता को संभव बनाने उसके लिए स्थान तलाशने की सफलतम कोशिश की है. जहाँ  इसके पात्र संसर्ग कर सकते हैं वहाँ  वे कोई चूक नहीं करते और जहाँ  वे बस काम-केंद्रित वार्तालाप कर सकते हैं वहाँ  वे उसे करते जाते हैं. लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं कि इस उपन्यास में कई प्रकाशमान कामदृश्य हैं, जो पाठक की देह और दिमाग को उत्तेजित करने से अधिक उसकी मिठास से भरते हैं. ये कामदृश्य और इन्हें अंजाम देते पात्र दरअसल मुराकामी के दिमाग की उपज हैं जो एक गंभीर और संवेदनशील पाठक को कथानक के स्तर पर एक हद तक अस्वाभाविक लगते हैं. हालाकि मुराकामी के इन पात्रों की उम्र, रेइको को छोड़कर, लगभग सभी की युवावस्था में प्रवेश करते समय अथवा हाल में कर चुके की है मगर उनकी सक्रियताएं और संवादशीलता बेहद परिपक्व है. तब यह आप पर है कि आप उसे प्रश्नवाचकता से स्वीकार करते हैं अथवा स्वाभाविकता से.

पात्रों के जीवन में कोई समस्या नहीं. कोई संघर्ष नहीं. है तो अवसाद और भोग. मुराकामी ने यह दुनिया किसके लिए रची है? क्या उनके लिए जिन्हें दुनिया की कोई परवाह नहीं है. वे स्वयं अपने आप में एक दुनिया हैं.  सामाजिक संघर्षों पर लापरवाह और सतही बातें करते मुराकामी ने नॉरवेजियन वुड की दुनिया सामाजिक सच्चाई को छुपाने, इसे नकारते हुए हर समय काम की भूख जगाये रखने के लिए रची है?

हकीकत यह भी है कि इस उपन्यास में वृहत जापानी समाज, जहाँ  यह उपन्यास जन्म लेता है, वह कहीं है ही नहीं, जो बीच-बीच में संवेदनशील पाठक को हैरत में डालता है. इस उपन्यास में अमेरिकी लेखकों की किताबों का जिक्र है. संगीत की धुनों का जिक्र है. भारत में भूख से मरते बच्चों का जिक्र है. तब क्या अवसाद और उससे होने वाली मौतें अभाव रहित जीवन की वास्तविकता है. लेकिन हम देखते हैं कि मुराकामी ने उसे कितना महिमा मंडित कर दिया है. जहाँ  आँख से आँसू नहीं गिरते. एक स्त्रीदेह पर पुरुष देह गिरती है.

 

यह किताब यहाँ से प्राप्त करें

 

पवन करण
(18 जून, 1964; ग्वालियर,म.प्र.)
प्रकाशित काव्य-संग्रह : ‘इस तरह मैं’, ‘स्त्री मेरे भीतर’, ‘अस्पताल के बाहर टेलीफ़ोन’, ‘कहना नहीं आता’, ‘कोट के बाज़ू पर बटन’, ‘कल की थकान’ और ‘स्त्रीशतक’ खंड–एक एवं ‘स्त्रीशतक’ खंड–दो प्रकाशित.
सम्मान : ‘रामविलास शर्मा पुरस्कार’, ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी सम्मान’, ‘शीला सिद्धांतकर स्मृति सम्मान’, ‘परम्परा ऋतुराज सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, ‘स्पंदन सम्मान आदि से सम्मानित.
pawankaran64@rediffmail.com
Tags: 20262026 समीक्षानॉरवेजियन वुडपवन करणमदन सोनी
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Comments 4

  1. वंदना गुप्ता says:
    4 weeks ago

    पवन करण जी आपकी समीक्षा ने किताब पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न कर दी। जल्द मंगवाती हूँ।
    बेहतरीन समीक्षा। हार्दिक बधाई ।

    Reply
  2. मदन सोनी says:
    4 weeks ago

    बहुत सुन्दर समीक्षा।

    Reply
  3. तेजी ग्रोवर says:
    4 weeks ago

    बहुत बढ़िया तहरीर है यह।

    उम्मीद है किताब पढ़ी जाएगी।

    मदन सोनी ने अनुवाद की दुनिया में चुपचाप एक क्रांति लिख डाली है। हिन्दी के पास अब विश्व साहित्य के उत्कृष्ट अनुवाद सहज ही उपलब्ध हैं।

    मदन ने केवल साहित्यिक कृतियों का ही अनुवाद नहीं किया। अच्छा होगा Arun जी, यदि समालोचन का एक पूरा अंक इस विषय पर आ सके कि पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी में कौन कौन सी ऐसी पुस्तकें उपलब्ध हैं जिन्हें क्लासिक कहा जा सकता है।

    Reply
  4. NavRatan says:
    3 weeks ago

    लाजवाब तब्सरा…अब ये मंगाना ही पड़ेगा… शुक्रिया जी।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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