• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » नुसरत : नय्यर मसूद : अनुवाद: आयशा आरफ़ीन

नुसरत : नय्यर मसूद : अनुवाद: आयशा आरफ़ीन

by arun dev
July 24, 2026
in कथा
Reading Time: 9 mins read
A A
नुसरत : नय्यर मसूद : अनुवाद: आयशा आरफ़ीन
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
नय्यर मसूद
नुसरत


उर्दू से अनुवाद: आयशा आरफ़ीन

My dreame thou brok’st not, but continued’st it,
Thou art so truth, that thoughts of thee suffice
To make dreames truth; and fables histories.
 (JOHN DONNE)

(तूने नहीं तोड़ा ख़्वाब मेरा, बल्कि रखा क़ायम इसे,
तू बेहद सच्चा है कि महज़ तेरे ध्यान से बदलते ख़्वाब हक़ीक़त में; और फ़साने गुज़श्ता में)

 

सवार-ए-दौलत-ए-जावीद बर गुज़ार आमद
एनान-ए-उ न गिरफ़्तन्द, अज़ गुज़ार बेरफ़्त
(फ़ज़्लुल्लाह हुरूफ़ी के काग़ज़ात से)

(सदा रहने वाली ख़ुशहाली और तरक़्क़ी का सवार गुज़र कर आगे बढ़ गया
उसकी लगाम किसी ने नहीं थामी और वो यूँ ही गुज़रता चला गया)

 

 

बदकार (बुरी) औरत का क़िस्सा मुझे अब याद नहीं लेकिन उस वक़्त मुझे उसमें बड़ी दिलचस्पी थी. इसलिए जब मुझको मालूम हुआ कि उसका मामला हमारे यहाँ पेश होगा और वो इसके हल के लिए हमारे घर आएगी तो मैं बहुत ख़ुश हुआ. इससे पहले भी एक मशहूर बदकार औरत का मामला हमारे घर में पेश हो चुका था और मेरे बुज़ुर्गों ने उसे ठीक तरीक़े से हल कर दिया था लेकिन वो मेरे होश संभालने से पहले की बात थी. मैंने उसका ज़िक्र ही ज़िक्र सुना था और ये ज़िक्र उस वक़्त तक जारी था जब तक इस दूसरी बदकार औरत का क़िस्सा शुरू नहीं हुआ.

जिस दिन वो हमारे यहाँ आने वाली थी उस दिन मकान का बाहरी कमरा ख़ूब साफ़ किया गया और उसमें कई बैठने की जगहें बढ़ा दी गईं. कमरे की ज़्यादा सजावट के लिए उसमें कई अनोखी चीज़ों को बढ़ा दिया गया जिनमें से कुछ सैकड़ों साल पुरानी थीं. इस काम में बुज़ुर्गों ने मेरी भी मदद ली और मैंने अपने हिस्से का काम बड़े शौक़ से किया. जब मैं एक आसन ठीक कर रहा था उस वक़्त बुज़ुर्गों की बातों से मुझे अंदाज़ा हुआ कि बदकार औरत को इसी पर बिठाया जाएगा तो मेरा दिल धड़कने लगा और वो मुझे वहाँ बैठी हुई दिखाई देने लगी. दरअस्ल मुझे इस पूरे मामले में दिलचस्पी ही इस ख़याल से थी कि मैं एक बदकार औरत को देखूँगा.

बुज़ुर्गों के अलावा बाहर के कुछ लोग भी इस मामले के हल में शामिल होने वाले थे. ये इज़्ज़तदार मेहमान थे जो इससे पहले भी हमारे यहाँ आ चुके थे और मेहमान-नवाज़ी का ख़ास ख़याल इन्हीं इज़्ज़तदार मेहमानों के लिए किया गया था. बुज़ुर्ग मुझको बार-बार जो हुक्म दे रहे थे वो भी ज़्यादातर इन्हीं इज़्ज़तदार मेहमानों की आव-भगत के लिए था. कुल मिलाकर मुझे इन इज़्ज़तदार मेहमानों की कोई ख़ास परवाह नहीं थी.

जब सबके आने का वक़्त क़रीब आया तो बुज़ुर्गों में बेचैनी सी पैदा हुई और मुझे कई बार मकान के बग़ल वाले दरवाज़े से निकल कर बाहरी कमरे तक जाना और वापस आना पड़ा. बाहरी कमरा मकान के बरामदे का एक हिस्सा था और बग़ल वाले दरवाज़े से वहाँ तक जाने के लिए लम्बा फ़ासला तय करना होता था. इस फ़ासले में दरवाज़े के सामने का वो अहाता भी शामिल था जिसके बड़े हिस्से को छोटी पत्तियों वाला पुराना दरख़्त घेरे हुए था. बुज़ुर्गों के बार-बार हुक्म देने की वजह से मुझमें भी बेचैनी पैदा हो गई थी और जल्दी-जल्दी बाहरी कमरे के कई चक्कर लगाने की वजह से मैं धीमे-धीमे हाँफ रहा था, फिर भी जैसा कि हमेशा से मेरी आदत थी, दरख़्त के नीचे से गुज़रते वक़्त मैं हाथ ऊपर उठाकर उसकी डालों को हिला ज़रूर देता था और उस दिन की बेचैनी के बावजूद डालों को हिलाने के बाद मेरी नज़र अहाते के एक कोने में बने हुए पुराने छत वाले दालान की तरफ़ ज़रूर उठ जाती थी जहाँ बैठा हुआ बूढ़ा जर्राह (ज़ख्म का इलाज करने वाला, सर्जन) ऐसे मौक़ों पर हमेशा कहता:

“दरख़्त को बेवजह क्यूँ छेड़ते हो.”

मगर आज बूढ़ा जर्राह हर बार ख़ामोश रहा था. वो अपने सामने मालूम नहीं कौन-कौन सी दवाएँ और मरहम फैलाए बैठा था और इन सामानों में ऐसा खोया हुआ था कि उसे दरख़्त की वकालत का होश न था. मैंने उसको इस सामान के साथ पहली बार उसी दिन देखा क्यूँकि वो मेरे होश संभालने से पहले ही जर्राही का काम छोड़ चुका था. वो अपने ज़माने में जर्राही का बड़ा उस्ताद था लेकिन मैंने उसके कमाल का ज़िक्र ही ज़िक्र सुना था. मेरे लिए वो सिर्फ़ एक बूढ़ा था जो घर में होने वाली हर बात के बारे में सवाल पर सवाल कर के हम लोगों को परेशान कर देता था. बुढ़ापे ने उसकी जिज्ञासा बढ़ा दी थी. मगर उसके ज़्यादातर सवालों का अंजाम अच्छा नहीं होता था. बुज़ुर्ग उसे डाँट दिया करते थे और मैं अधूरे और ग़लत-सलत जवाबों से उलझन में डाल कर उसके दिमाग़ को थका देता था.

बदकार औरत का क़िस्सा छिड़ते ही बूढ़े जर्राह को उसमें बहुत दिलचस्पी पैदा हो गई थी और दिन में कई-कई बार वो अपने दालान से जैसे-तैसे निकलता और बड़बड़ाता हुआ वापस आता दिखाई देता. मगर आज जब उसके उत्साह का ठिकाना न होना चाहिए था, वो इस तरह चुप अपने काम में लगा हुआ था जैसे उसे दुनिया में किसी बात की ख़बर ही न हो.

इस पर मैं उसे छेड़ता ज़रूर, लेकिन अब मुझे थकन महसूस हो रही थी, इसलिए कि सब लोगों के पहुँचने का वक़्त हो चुका था लेकिन अभी तक कोई आया नहीं था. बुज़ुर्गों की बेचैनी बढ़ गई थी और एक बार फिर मैं बग़ल वाले दरवाज़े से निकल कर दरख़्त की डालों को हिलाता हुआ बाहरी कमरे की तरफ़ चला. हर बार की तरह इस बार भी दरख़्त पर से छोटी-छोटी पीली पत्तियाँ बरसने लगी थीं जिनको अपने बालों और कंधों पर से झाड़ता हुआ जब मैं बाहरी कमरे में पहुँचा तो वहाँ कोई भी न था.

मैं वहाँ देर तक रुका रहा. आख़िर इस क़दर सजावटी कमरे का सन्नाटा मुझे बुरा मालूम होने लगा. आने वालों की देर से मैं उकता गया और मेरा जी चाहा कि अब बदकार औरत और इज़्ज़तदार मेहमानों के बारे में कुछ न सोचूँ. उस वक़्त मुझे नुसरत का ख़याल आया.

दरख़्त के नीचे से गुज़रते हुए हर बार मैंने देखा था कि वो उसके तने से टेक लगाए बैठी है. कभी सामने बूढ़े जर्राह की तरफ़ देख रही है, कभी ज़मीन की तरफ़, और उँगलियों से मिट्टी पर लकीरें खींच रही है. फिर मैंने ये सोचा कि पहली या दूसरी बार जब मैं दरख़्त के नीचे से गुज़र रहा था तो उसने गर्दन घुमा कर मेरी तरफ़ देखा था और शायद मुझे सलाम भी किया था. लेकिन मैं उस वक़्त की घबराहट में उसे जवाब नहीं दे सका. उस वक़्त तो मेरी समझ में भी न आया था कि उसने मुझे सलाम करने के लिए हाथ उठाया था. वो अच्छे लहजे वाली और आराम से चलने वाली लड़की थी और अपने किसी बीमार रिश्तेदार की तीमारदारी (बीमार की देख-रेख करने वाला) के लिए हमारे यहाँ आया करती थी.

मैं अक्सर उसे देखता कि किसी के बुलाने पर बहुत हल्के क़दमों से चलती हुई, जैसे पैरों के नीचे किसी चीज़ के टूट जाने का डर हो, मकान के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जा रही है. जब वो घर में मौजूद होती तो उसका नाम बार-बार सुनने में आता. मगर मैं उससे बहुत कम बात करता था, इसलिए कि एक तो वो बेहद धीमी आवाज़ में बोलती थी, दूसरा ये कि बात करते वक़्त नज़र नहीं उठाती थी. लेकिन वो मुझको सलाम ज़रूर करती थी.

तो मैं बाहरी कमरे से वापस चला गया और दरख़्त के पास पहुँच कर रुक गया. मैंने दरख़्त की डालों को आहिस्ता से छुआ. दरख़्त पतझड़ की गिरफ़्त में था और उसकी ज़्यादातर पत्तियाँ पीली होकर गिर चुकी थीं. डालों पर कहीं-कहीं मकड़ियों ने जाले बुन दिए थे और बहुत-सी पत्तियाँ ऐसी थीं जो ज़मीन पर गिरने के बजाए उन जालों में अटक गई थीं. मैंने नुसरत की तरफ़ देखा. अब वो आगे को झुकी हुई बैठी थी. उसका चेहरा उसके घुटनों पर टिका हुआ था. उस वक़्त भी वो ज़मीन पर लकीरें खींच रही थी. मगर मैंने देखा कि आहिस्ता-आहिस्ता उसका हाथ रुक गया. उसके बालों और कंधों पर छोटी-छोटी पीली पत्तियाँ नज़र आ रही थीं और उसका लिबास सफ़ेद था. दरख़्त के नीचे तेज़ धूप फैली हुई थी मगर ये धूप में बैठने का मौसम न था.

“इतनी सर्दी तो नहीं है.” मैंने कहा. उसने सर उठाकर मुझे देखा और मैंने फिर कहा:

“बड़ी सर्दी लग रही है नुसरत?”

वो सीधी होकर बैठ गई. उसकी नज़रें बूढ़े जर्राह पर जमी हुई थीं.

“बड़ी सर्दी लग रही है नुसरत?”

“नहीं तो.” उसने कहा और हल्के से मुस्कुराई.

“फिर भी धूप में बैठी हो?”

इसका उसने कोई जवाब नहीं दिया.

“अन्दर घर में क्यूँ नहीं गई?” मैंने बग़ल वाले दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया. “यहाँ धूप बहुत तेज़ है.”

“बाबा ने बुलाया था.” उसने बूढ़े जर्राह की तरफ़ देखते हुए कहा.

“चलो फिर बाबा ही के पास बैठें.” मैंने कहा. “यहाँ धूप बहुत तेज़ है.”

और ऐसा मालूम होता था कि वो बूढ़े जर्राह के पास जाने के लिए तैयार है. लेकिन वो अपनी जगह से उठी नहीं, इस पर मैंने अपनी बात दोहराई और देर तक उसके उठने का इंतेज़ार करता रहा. आख़िर उसने आहिस्ता से कहा:

“मैं चल नहीं पाती.” और उसने सर को हल्के से हिलाते हुए अपने पैरों की तरफ़ इशारा किया. तब मैंने देखा.

“नुसरत ये क्या हुआ!”

उसके पैर बुरी तरह कुचले हुए थे. उनकी रंगत काई जैसी थी और वो इतने सूज गए थे कि उनको इंसानी पैर समझना मुश्किल था. उनकी चमड़ी जगह-जगह से चटख़ गई थी और छोटे-छोटे दरारों में से हल्की लाली झलक रही थी. दायाँ पैर बहुत ज़्यादा बिगड़ चुका था. बाएँ पैर की उँगलियाँ बिल्कुल गोल हो रही थीं और दाएँ पैर के तलवे में आधी से ज़्यादा घुसी थीं. उनके जोड़ खुल रहे थे. ऐसा मालूम होता था कि दायाँ पैर बाएँ पैर की उँगलियों को बड़ी ताक़त से अपने में मिलाये जा रहा है और अब लगता है कि उँगलियाँ टूट कर दाएँ पैर में गुम हो जाएँगी. ये सब एक ज़बरदस्त कश्मकश मालूम हो रही थी जिसके असर से नुसरत की पिंडलियों पर नीली रगें उभर आई थीं.

“नुसरत ये क्या हुआ?” और ये मैंने बार-बार कहा.

“सब ने कह दिया है कि दोनों पैर काटे जाएँगे.” उसने कहा. “मगर बाबा चाहता है कि एक बार….” इसके बाद उसकी आवाज़ इतनी धीमी हो गई कि मैं कुछ सुन नहीं पाया. मैंने बूढ़े जर्राह की तरफ़ देखा. अब वो लोहे के कुछ औज़ारों को बारी-बारी आँखों के क़रीब लाकर देख रहा था. पास ही मिट्टी के बर्तन में कोई चीज़ पक रही थी और दालान में धुआँ भरा हुआ था.

“….बाबा ने कहा किसी को बताना मत.” नुसरत कह रही थी, “और इसके लिए उसने आज का दिन तय किया. उसने कहा था आज सब दूसरी तरफ़ लगे हुए होंगे.”

“नुसरत मगर हुआ क्या था?”

इस पर उसने मुझे पूरा क़िस्सा सुनाया जिसके कुछ हिस्से मैं भूल चुका हूँ और कुछ हिस्से मैं सुन ही नहीं सका इसलिए कि बीच-बीच में नुसरत की आवाज़ डूब जाती थी. शायद उसे तकलीफ़ ज़्यादा थी. उसने कुछ लोगों का ज़िक्र किया था जो एक गाड़ी पर सवार थे और उन्हें कहीं जाने की जल्दी थी. शायद कोई हादसा हुआ था. गाड़ी के सामने कोई रुकावट थी जिसको हटाना ज़रूरी था. नुसरत ने वो रुकावट हटा दी. लेकिन इससे पहले कि वो ख़ुद भी हटती, गाड़ी चल पड़ी जिससे नुसरत के दोनों पैर कुचल गए. गाड़ी रुके बिना निकल गई और नुसरत देर तक वहीं पड़ी रही.

“कैसे लोग थे.” मैंने उसका क़िस्सा सुनकर कहा. “उनको पता भी नहीं चला कि उन्होंने तुमको कुचल दिया है?”

“नहीं, उन्हें मालूम हो गया था.” नुसरत ने कहा. इसीलिए मेरे पैर सिर्फ़ अगले पहिये से कुचले. इसके बाद ही उन्होंने गाड़ी को इस तरह मोड़ कर निकाला कि पिछला पहिया मेरे पैरों पर से नहीं गुज़र सका.”

“मगर वो रुके नहीं?”

“उन्हें जल्दी थी.”

“न तुमने उन्हें रोका?”

“उन्हें जल्दी थी. फिर भी मैंने ये तो कह दिया…” और उसकी आवाज़ डूब गई.

“तुम ने क्या कह दिया नुसरत?”

“मगर उन्होंने शायद सुना नहीं.”

“तुमने क्या कहा था नुसरत?”

मैंने कहा, “देखी मेरी लाचारी.”

इस पर मैं हँसे बिना न रह सका.

“ऐसी बेकार बात!” मैंने कहा, “इससे फ़ायदा क्या था? अगर वो सुन भी लेते तो क्या होता.”

“मैं इसके सिवा और क्या कहती?”

इसका जवाब मेरे पास नहीं था. इसलिए मैंने कहा:

“उन जैसे लोगों पर ऐसी बात का क्या असर हो सकता था. देखी मेरी लाचारी!” मैंने नुसरत के लहजे की नक़ल उतारी, “तुम्हारी समझ में इतना भी न आया कि वो कैसे लोग थे.”

“लोग तो ऐसे ही होते हैं.” ये कह कर उसने फिर पहले की तरह घुटनों पर अपना चेहरा टिका लिया. मुझे महसूस हुआ कि वो रोना नहीं चाहती तो मैंने बात आगे बढ़ाई.

“फिर, उसके बाद क्या हुआ. तुम्हें वहाँ से किस तरह उठाया गया?”

उसने बताना शुरू ही किया था कि मुझे कुछ सख़्त आवाज़ें सुनाई दीं. मैंने मुड़ कर बूढ़े जर्राह की तरफ़ देखा. वो कमर पर हाथ रख कर उठ रहा था मगर आवाज़ें उधर से नहीं आ रही थीं. मैंने नुसरत की तरफ़ देखा. वो कुछ कह रही थी लेकिन उसकी नर्म आवाज़ उन सख़्त आवाज़ों में दबी जा रही थी. आख़िर मुझे उनकी दिशा का अंदाज़ा हो गया और मैंने पीछे हट कर देखा. दूर बाहरी कमरे की तरफ़ गाड़ियाँ आ कर रुक रही थीं. बदकार औरत आ गई थी.

मैं उस तरफ़ दौड़ा.

 

Painting- Sajal Sarkar, De-Civilization in Process, 2026

२.

बाहरी कमरे की ज़्यादातर बैठने की जगहें भर गई थीं. इज़्ज़तदार मेहमान भी क़रीब-क़रीब सब आ गए थे. उनके चेहरों पर हमेशा से कहीं ज़्यादा संजीदगी थी,  इतनी कि उस पर अक्खड़पन का वहम होता था. मेरे बुज़ुर्ग चूँकि मेज़बान भी थे इसलिए उनके चेहरों पर अक्खड़पन और ख़ुशमिज़ाजी की कश्मकश नज़र आती थी. औरतें भी कई थीं. इस भीड़ में बदकार औरत भी थी और मेरी उम्मीद के उलट वो दूसरों से बहुत अलग नज़र नहीं आ रही थी. उसने एक के ऊपर एक कई चादरें ओढ़ रखी थीं और उसके चेहरे से सिर्फ़ थकन झलक रही थी. इतने कपड़ों के बावजूद उसका लिबास ऐसा था कि उसके पेट का कुछ हिस्सा साफ़ दिखाई देता था जिस पर नीली रगें उभरी हुई थीं. साँस लेने में उसके होंठ थोड़े से खुल जाते थे और होंठ खुलते ही उसके दो दांत पूरे दिखाई देने लगते और ये इतनी जल्दी-जल्दी हो रहा था कि उसके दांत लगातार बाहर निकले हुए मालूम होते थे. उसको देख कर मुझे मायूसी हुई. उसके बिल्कुल क़रीब एक लड़की मौजूद थी जिस की तरफ़ बार-बार झुक कर वो कुछ कहती थी. एक बार उसके कुछ कहने पर लड़की ने इधर-उधर देखा तो उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और वो अपनी जगह से उठ कर मेरे पास आई. फिर उसने कहा:

“पानी मिलेगा?”

मैं फ़ौरन बग़ल वाले दरवाज़े की तरफ़ लपका. दरख़्त के नीचे पहुँच कर मैंने देखा कि बूढ़ा जर्राह नुसरत के सामने बैठा उसके पैरों को ग़ौर से देख रहा है. मेरी चाप सुन कर उसने सर उठाया और आँखों को सिकोड़ते हुए मुझे पहचानने की कोशिश की. मैंने दरख़्त की डालें नहीं हिलाई थीं वरना वो मुझको फ़ौरन पहचान लेता. मकान के अन्दर से पानी का गिलास लेकर मैं बाहरी कमरे की तरफ़ जा रहा था तो मैंने देखा कि बूढ़ा पहले की तरह अब भी नुसरत के पैरों का जायज़ा ले रहा है.

बदकार औरत ने गिलास एक साँस में ख़ाली कर दिया. लड़की ने गिलास उससे लेकर मुझे वापस किया और ये तीन बार हुआ,  इसलिए कि कुछ इज़्ज़तदार मेहमान अभी तक नहीं आए थे. कमरे में रह-रह कर अचानक ख़ामोशी फैल जाती थी जिसे तोड़ने के लिए कोई-न-कोई बुज़ुर्ग आहिस्ता से खँखार कर पास बैठे हुए मेहमानों से कोई रस्मी बात कह देता.

चौथी बार मैं पानी लाया और अब की बार लड़की ने गिलास मेरे हाथ से ले कर ख़ुद एक-एक घूँट कर के पानी पीना शुरू किया. पानी और शीशे के पीछे से झलकते हुए उसके दो दांत बहुत बड़े दिखाई दे रहे थे. गिलास उससे वापस ले कर मैंने वहीं दरवाज़े के पास ज़मीन पर रख दिया और लड़की फिर बदकार औरत के पास चली गई.

और अब कमरे की फ़ज़ा इतनी बोझल हो गई थी कि मेरा वहाँ ठहरना मुश्किल हो गया. मैंने कुछ देर के लिए वहाँ से हट जाना ठीक समझा.

 

 

 

३.

जब मैं दरख़्त के नीचे से गुज़र रहा था तो मैंने बूढ़े जर्राह की आवाज़ सुनी.

“इधर आओ.” वो मुझे बुला रहा था. मैं उसकी तरफ़ मुड़ गया.

“क़रीब आओ.” मैं उसके क़रीब चला गया. उसने मेरे कंधे पर हाथ रख कर मुझे अपनी तरफ़ झुकाया.

“दोनों पैर चिपक गए हैं.” वो सरगोशी में कह रहा था,  “सबसे पहला काम इन्हें छुड़ाना है. इसमें दर्द बहुत होता है. शायद वो तड़पे. शायद मैं अकेला इसे न संभाल सकूँ. शायद अब न संभाल सकूँ.”

मैंने नुसरत की तरफ़ देखा. उसकी आँखों में डर था. फिर भी वो मुस्कुराने की कोशिश कर रही थी.

“अगर तुम इसको बातों में लगा लो”,  बूढ़े जर्राह ने फिर सरगोशी की,  “ऐसी बातें करो कि इसका ध्यान मेरी तरफ़ से हट जाए, बिल्कुल हट जाए. वरना अगर इसने पैर झटक दिए तो बुरा होगा. इसके बाएँ पैर की उँगलियाँ टूट जाएँगी. ये न होने देना. जब मैं इशारा करूँ तो इसका ध्यान इधर से हटा देना. बिल्कुल. वो हिलने न पाए. बिल्कुल.”

इसके बाद उसने कोई मज़ाक़िया बात कह कर नुसरत को हँसाने की कोशिश की और मैंने नुसरत को बूढ़े के पुराने क़िस्से सुनाने शुरू किए. मैंने उसकी जर्राही के वो कारनामे बताए जिनका मैंने ज़िक्र सुना था. इस पूरे वक़्त में बूढा उसके पैरों को अलग-अलग तरह से देखता और अलग-अलग तरीक़े से ज़मीन पर टिकाता रहा.

मैं देर तक बोलता रहा. मैंने नुसरत को अपने घर की मज़ेदार कहानियाँ सुनाईं. फिर मैं ख़ुद उसके बारे में बातें करने लगा. ये बेकार की बातें थी इसलिए कि मैं उसे बहुत कम जानता था, मगर मैंने कोशिश की कि ये बात उसे मालूम न होने पाए. अब मैं महसूस कर रहा था कि बूढ़ा जर्राह नुसरत के ज़ेहन से निकल चुका है. मैं थोड़ी-थोड़ी देर बाद एक उचटती हुए नज़र बूढ़े पर ज़रूर डाल लेता था. आख़िर उसने मुझे तैयार हो जाने का इशारा किया.

“और जानती हो नुसरत, जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा तो मुझे क्या ख़याल आया था?” मुझे याद न आ सका कि पहली बार मैंने उसे कब देखा था, फिर भी मैंने कहा:

“जानती हो मुझे क्या ख़याल आया था? मुझे ख़याल आया था कि तुम फूलों पर चल रही हो.” फिर मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ और मैंने फ़ौरन कहा:

“नुसरत मैं तुम्हारे हाथों के बारे में एक बात बताऊँ जो तुम्हें किसी ने न बताई होगी!” तब ही मैंने बूढ़े का इशारा साफ़-साफ़ देखा और नुसरत के दोनों हाथ पकड़ कर उन्हें ज़ोर से दबाया.

“बताऊँ?” मैंने सरगोशी में कहा. उसी वक़्त मुझे बाहरी कमरे की तरफ़ से दूर होती हुई सख़्त आवाज़ें सुनाई दीं और उसी वक़्त नुसरत के हाथ मेरे हाथों में कपकपाए. मैंने देखा कि उसके चेहरे पर नीलाहट दौड़ गई, फिर लाली, फिर उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया. उसने दाँतों से अपने होंठ दबा लिए थे और उसकी आँखों से बहुत दर्द ज़ाहिर हो रहा था.

“ठीक है.” बूढ़ा जर्राह कह रहा था, “बिल्कुल ठीक, शाबाश. अब मैं इसे ठीक कर लूँगा. अब देखना.”

मैं बूढ़े की तरफ़ मुड़ा. वो नुसरत के पैरों को अपने हाथों से छुपाए हुए था. मैं देखना चाहता था कि उसने क्या किया है लेकिन उसने मुझे झिड़क दिया.

“इधर मत देखो.” उसने कहा, “उसे भी न देखने दो.” मैंने उधर से मुँह फेर लिया. और ऊपर दरख़्त की डालों में लगे हुए जालों को देखने लगा. जर्राही के औज़ार की हल्की खनखनाहट के सिवा कहीं कोई आवाज़ नहीं थी. मैं इंतेज़ार करता रहा कि बूढ़ा कुछ बोले. आख़िर उसने कहा:

“अब तुम चाहो तो जा के अपना काम करो. बाक़ी सब मैं देख लूँगा.”

तब मैंने देखा कि नुसरत के हाथ अभी तक मेरे हाथों में हैं. उसने फिर घुटनों पर अपना चेहरा टिका लिया था और उसके हाथ पसीज रहे थे. मैं उसके हाथ छोड़ कर उठ खड़ा हुआ. और ये मालूम होने के बावजूद कि मुझे देर हो गई है, मैं बाहरी कमरे की तरफ़ चला.

वहाँ अब सन्नाटा था. बैठने के आसन बेतरतीब हो चुके थे. कुछ आसनों के पास काग़ज़ के टुकड़े पड़े हुए थे जिन पर बड़ी जल्दबाज़ी में कुछ लिखा गया था. मैंने उन टुकड़ों को इकठ्ठा किया. ये बुज़ुर्गों और इज़्ज़तदार मेहमानों के आपसी मशवरे थे. मैंने आसनों की तरतीब ठीक की. फिर टुकड़ों की लिखावट को मुश्किल से पढ़-पढ़ कर ये अंदाज़ा लगाने की कोशिश करता रहा कि मेरी ग़ैर मौजूदगी में यहाँ क्या हुआ होगा. मैंने उन टुकड़ों को तरह-तरह से तरतीब दे कर पढ़ा मगर मेरी समझ में कुछ न आ सका,  इसलिए कि टुकड़ों की तरतीब में ज़रा से बदलाव से कुल कहानी बदल जाती थी. मैंने इस में बहुत वक़्त बर्बाद किया मगर मेरी समझ में कुछ न आ सका. यहाँ तक कि मेरी दिलचस्पी जो उन टुकड़ों को देख कर बहुत बढ़ गई थी धीरे-धीरे कम होने लगी. फिर ख़त्म हो गई. फिर अनोखी चीजों से सजे इस कमरे में मेरा दम घुटने लगा और मैं वहाँ ठहर न सका. बाहर निकलते हुए मैंने देखा कि दरवाज़े के पास शीशे का गिलास उसी तरह ज़मीन पर पड़ा है. मगर मैंने उसे उठाया नहीं. मैं सीधा दरख़्त की तरफ़ चला.

लेकिन दरख़्त के नीचे सिर्फ़ पीली पत्तियाँ बिछी हुई थीं. मैंने बूढ़े जर्राह के दालान की तरफ़ देखा. दालान ख़ाली था. लेकिन धुआँ उसमें अब तक भरा हुआ था.

 

 

 

4.

इसके बाद से मेरा घर ख़ाली होना शुरू हुआ. सभी लोग बिना देर किए एक के बाद एक ख़त्म होते चले गए और सारे बुज़ुर्ग तो यूँ ख़त्म हुए जैसे कोई चावलों की ढेरी पर गीला हाथ रख कर उठा ले. मैं ये सब देखता था और ख़ुद को ख़्वाब की हालत में ख़याल कर के जागने की उम्मीदें बाँधता था. कभी-कभी मुझे डर भी लगता था. बहरहाल आख़िर में मैंने ख़ुद को एक बहुत बड़े मकान में अकेला पाया और इस अकेलेपन से मानूस होने की कोशिश में लग गया. मैं मकान के हर हिस्से में जाता और हमेशा इस फ़िक्र में रहता कि मकान का कोई कोना ज़्यादा वक़्त तक मेरे वजूद से ख़ाली न रहने पाए. अगर इन दिनों कोई मुझे देख पाता तो ज़रूर यही समझता कि मैं किसी खोई हुई चीज़ की चाहत में हूँ.

लेकिन एक दिन मुझे ख़याल आया कि मैं बाहरी कमरे को भुलाए बैठा हूँ. तो मैं वहाँ पहुँचा. उसका बीच वाला दरवाज़ा हमेशा की तरह खुला हुआ था और उस पर पड़ा हुआ भारी पर्दा धीरे-धीरे हिल रहा था. कमरे में रौशनी कम थी और दूर बैठने की जगहें ठीक से दिखाई न देती थीं. लेकिन उस कम रौशनी में भी मैंने देखा कि अनोखी चीज़ों पर धूल की तह जम गई है. दीवारों पर भी धूल थी और बुज़ुर्गों की तस्वीरें धुँधला गई थीं. मैंने अनोखी चीज़ों को एक-एक कर के छुआ जिस से उन पर मेरी उँगलियों के निशान पड़ गए. मैंने बुज़ुर्गों की तस्वीरें हाथ से पोंछीं और वो इतनी उजागर हो गईं कि मेरा उनसे बातें करने को दिल चाहने लगा. और जब मैं बोला तो मेरी आवाज़ कमरे में गूँजी. मैं देर तक बातें करता रहा. एक तस्वीर के पास आ कर मैं रुका. मेहरबान चेहरा मुझे परेशान नज़रों से देख रहा था. बेकारी के एहसास ने मुझे घेर लिया और मैंने तस्वीर को अपने माथे से छुआ.

“मुझे सब याद आता है.” मैंने कहा, “मुझे सब याद आता है.”

परेशान नज़रें उसी तरह मेरी तरफ़ लगी रहीं.

“मगर अब कुछ नहीं हो सकता. पहले मुझे नहीं मालूम था कि एक ही मकान इतना आबाद और इतना ख़ाली हो सकता है. यही कमरा…..” मैंने कमरे में चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई, “यही कमरा कभी…” और मैंने देखा कि दरवाज़े के पास ज़मीन पर शीशे का गिलास पड़ा है, यहाँ तक कि बदकार औरत भी…” उस वक़्त मुझे लिबास की सरसराहट सुनाई दी और मैंने मुड़कर देखा.

दूर अँधेरे में डूबे हुए एक आसन से कोई उठ कर मेरी तरफ़ आ रहा था. वो कोई औरत थी. बदकार औरत? मैंने सोचा. मगर इतने में उसकी आवाज़ सुनाई दी.

“मुझे पहचाना न होगा?” उसने आहिस्ता से कहा. अब वो क़रीब आ गई थी. मैं झुका और मैंने उसके पैरों को छू कर देखा.

“मुबारक हो.” मैंने कहा, “मुझे ख़ुशी है नुसरत कि तुम्हारे पैर ठीक हो गए.” उसके बाद कुछ देर तक ख़ामोशी रही. फिर मैं बोला:

“उम्मीद है निशान बाक़ी न रहे होंगे.”

उसने भारी पर्दे के नीचे से आती हुई रौशनी की तरफ़ अपने दोनों पैर बारी-बारी बढ़ाए.

“निशान भी नहीं रहे.” उसने कहा.

फिर देर तक ख़ामोशी रही जिसे तोड़ना मैंने ज़रूरी समझा.

“अब कुछ दिन में तुम्हें याद भी न रहेगा”,  मैंने कहा, “कि कभी तुम किस दर्द में थीं. निशान होते तो याद रहता.”

“मुझे याद रहेगा.”

“सब शुरू में यही समझते हैं. निशान नहीं तो कुछ याद न रहेगा. न वो ज़ख्म, न वो बूढ़ा जर्राह.”

इस पर शायद वो उलझन में पड़ गई, और अब बोली तो यूँ रुक-रुक कर जैसे अपनी किसी ग़लती का जवाब दे रही हो.

“निशान ज़रूर रह जाते. मगर बाबा ने ख़ुद ही….उसने कहा था कोई निशान बाक़ी न रहना चाहिए.” फिर उसने दो-तीन बार एक ही बात कही. “मैंने कुछ नहीं कहा था.”

“सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं.” मैंने हाथ उठा कर कहा, “मैं तुमको इल्ज़ाम कब दे रहा हूँ. बहरहाल निशान नहीं रहे.” मैंने अपने लहजे की सख़्ती को ख़ुद भी महसूस किया.

ये ठीक नहीं,  मैंने सोचा. मगर मैं क्या करता. उस वक़्त मुझ को बहुतों के न होने का दुख था.

“तुम हैरान होगी नुसरत कि मैं इस तरह क्यूँ बात कर रहा हूँ.” मैंने कहा, “तुम सोच रही होगी कि उस दिन दरख़्त के नीचे तो मैंने तुमसे इस तरह बात नहीं की थी.”

“वो दिन और था.” नुसरत ने कहा. वो अपने पैरों की तरफ़ देख रही थी. फिर उसकी आवाज़ और धीमी हो गई, “उस दिन मेरी हालत रहम के क़ाबिल थी.”

अब उसने सर उठा कर मेरी तरफ़ देखा. कुछ देर चुप रही, फिर और भी धीमी आवाज़ में बोली:

“वो दुख भरा दिन था.”

“और ये?” मैंने कहा और मेरी आवाज़ तेज़ हो गई. “ये दुख भरा दिन नहीं? तुम्हें इसी दिन का इंतज़ार नहीं था?” मैं तेज़ी से आगे बढ़ा और उसके बिल्कुल क़रीब पहुँच गया.

“मगर मैं तुम्हें बताऊँ नुसरत, मेरी हालत रहम के क़ाबिल नहीं है.”

“ये मैंने कब कहा.” उसकी आँखों में दर्द और आवाज़ में ख़ौफ़ था, “मैंने तो ये सोचा भी न था.”

आवाज़ उसके गले में घुट गई और मैंने देखा कि वो ज़मीन पर गिरने वाली है. मैंने उसका बाज़ू पकड़ कर उसको संभाला. फिर मैं उसे छोड़ कर पीछे हट आया. उसका चेहरा बेरंग हो गया और वो इतनी देर तक गुमसुम खड़ी रही कि कमरे की अनोखी चीज़ों में से एक लगने लगी. उसके बाज़ू पर मेरी धूल लगी उँगलियों के निशान थे.

अब मुझे कुछ पछतावा महसूस हुआ.

“मुझे अफ़सोस है नुसरत”, मैंने कहा, “यहाँ धूल बहुत जमा हो गई है और तुम्हें सफ़ेद लिबास पसंद है. तुम पर अच्छा भी लगता है. मैंने कइयों से तारीफ़ सुनी है. हालाँकि ख़ुद मुझे स्याह रंग पसंद है. जानती हो क्यूँ?” उसने सर उठा कर मेरी तरफ़ देखा और मैंने वो जुमला दोहराया जो मैंने कहीं लिखा हुआ देखा था और मुझे बार-बार याद आता था:

“इसलिए कि स्याह रंग अदम (आरंभ, अस्तित्वहीनता, किसी भी चीज़ के अस्तित्व में न होने की अवस्था, non-existence) का रंग है.”

और बेकारी के एहसास ने फिर मुझे घेर लिया. मुझे अंदाज़ा नहीं कि उसके बाद नुसरत कितनी देर तक इस इंतेज़ार में रुकी रही कि मैं कुछ और कहूँ. लेकिन आख़िर मैंने देखा कि वो आहिस्ता से मुड़ी और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ने लगी. मैंने शीशा टूटने की घुटी-घुटी सी आवाज़ सुनी और नुसरत को देखा कि दरवाज़े के पास पल भर को रुकी. फिर उसने भारी पर्दा उठाया. कमरे में बाहर की रौशनी फैली और ग़ायब हो गई.

वो हल्के क़दमों से चलने वाली लड़की थी. उसकी दूर होती हुई चाप मुझे सुनाई नहीं दी.

मुझे ख़याल आया कि मकान के दूसरे हिस्से बहुत देर से ख़ाली हैं. तो मैं बाहर चला. दरवाज़े के पास पहुँच कर मैंने देखा कि ज़मीन पर पड़ा हुआ शीशे का गिलास टूट चुका है. मैंने उसके टुकड़ों को पैर से सरका कर एक तरफ़ कर दिया. मैंने ये भी देखा कि कुछ टुकड़ों के किनारे किसी चीज़ से भर गए हैं. कम रौशनी के बावजूद उस चीज़ को पहचानने में मुझे देर नहीं लगी. वो ताज़ा ख़ून था.

Painting- Sajal Sarkar, Birth of Another God, 2026

५.

उसके बाद भी मैं बार-बार दरख़्त के नीचे से गुज़रा. अब वो फिर ख़ूब हरा-भरा हो गया था. उसकी डालें पत्तियों से लद कर इतनी लटक आई थीं कि मुझे उनके नीचे से झुक कर निकलना पड़ता. अगर कभी बेख़याली में उधर से गुज़रता तो नर्म पत्तियाँ मेरे चेहरे से टकरातीं. कभी-कभी मैं सोचने लगता कि उन डालों को काट दूँ जिनसे मेरी आवाजाही में रुकावट होती है.

एक बार मैं बग़ल वाले दरवाज़े की तरफ़ आ रहा था. दरख़्त के क़रीब पहुँच कर मैं बिना इरादे के थोड़ा झुक गया. लेकिन इसके बावजूद उसकी पत्तियाँ मेरे चेहरे से टकराईं और मैंने देखा कि डालें कुछ और लटक आई हैं. मुझे झुंझलाहट महसूस हुई और मैंने हाथ मार-मार कर डालों को इधर-उधर हटाना शुरू किया. मगर डालें पहले से ज़्यादा ताक़त के साथ पलट-पलट कर मुझ से टकराती थीं. मेरे चेहरे और गर्दन में खुजली होने लगी और मैंने झटके दे-दे कर कई डालें तोड़ डालीं. बहुत नीचे झुक कर मैं उस मुसीबत से निकल सका और जब मैं सीधा खड़ा होकर अपने बदन को झाड़ रहा था तो मैंने देखा कि दरख़्त के तने से टेक लगाए कोई बैठा है. दरख़्त की घनी छाँव में उसकी सूरत नज़र न आती थी लेकिन मैंने उसे पहचान लिया.

“नुसरत!” मैंने उसकी तरफ़ बढ़ते हुए कहा. क़रीब पहुँच कर मैंने देखा कि उसके लिबास का रंग स्याह है.

“नुसरत!” मैंने आहिस्ता से पुकारा और मेरी नज़र उसके चेहरे पर पड़ी. उसका हुलिया दिखाई नहीं दे रहा था. मेरी समझ में कुछ न आ सका. मैंने झुक कर ग़ौर से देखा. उसके चेहरे पर सूखी हुई पीली पत्तियाँ नक़ाब की तरह पड़ी हुई थीं. मैंने चाहा कि इन पत्तियों को उसके चेहरे पर से हटा दूँ. लेकिन मैंने देखा कि ये पत्तियाँ मकड़ी के जाले में लिपटी हुई हैं और मेरा बढ़ता हुआ हाथ रुक गया.

“नुसरत!” मैंने फिर पुकारा. मेरी आवाज़ धीमी होती जा रही थी. मैंने देखा कि स्याह ओढ़नी उसको पैरों से कंधों तक ढंके हुए है. उसका सिर्फ़ एक हाथ बाहर निकल कर ज़मीन पर टिका हुआ नज़र आ रहा था. उसकी उँगलियों पर धूल जम गई थी और ज़मीन पर अनगिनत लकीरें खींची हुई थीं.

“नुसरत!” मैंने कहा, लेकिन यूँ जैसे अपने आप से ही बात कर रहा हूँ. मैंने उसे हिला कर चौंकाना चाहा. मैंने चाहा कि उसके पैरों को आहिस्ता से हिला दूँ. तब मैंने देखा, उसके पैरों के ऊपर पड़ी हुई स्याह ओढ़नी बिगड़ कर उभर गई थी. मैंने उसे नहीं छुआ. मैं जानता था कि स्याह ओढ़नी के नीचे उसके पैर बिगड़ चुके हैं.

मैंने चारों तरफ़ देखा. बूढ़े जर्राह के दालान पर जा कर मेरी नज़र ठहर गई. उसके फ़र्श पर छत का मलबा जमा था. कहीं कोई आवाज़, कोई हलचल नहीं थी. दरख़्त के नीचे सर्दी अचानक बढ़ गई थी और एक बार मेरा बदन ज़ोर से कपकपाया.

मैं उठा और भागता हुआ बग़ल वाले दरवाज़े में दाख़िल हो गया. कुछ क़दम अन्दर जाने के बाद मैं पलटा. मैंने दरवाज़े के दोनों पट मज़बूती से पकड़े और उन्हें आपस में मिला दिया. बंद होते हुए दरवाज़े की आख़री झिर्री से झाँक कर मैंने देखा कि क्या नुसरत अब भी उसी तरह बैठी है. वो अब भी उसी तरह बैठी थी.

मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया और फिर वो मुझ से कभी न खुला.

नोट: कोष्ठक ( ) के शब्द/वाक्य/अनुवाद, अनुवादक के ख़ुद के हैं. 

 

आयशा आरफ़ीन ने जे.एन.यू., नई दिल्ली से समाजशास्त्र में एम.फिल और पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं. उनकी कहानियाँ हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, साथ ही हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं की पत्रिकाओं में उनके लेख और अनुवाद भी प्रकाशित होते रहे हैं. उनका कहानी-संग्रह ‘मिर्र’ वर्ष 2025 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.

संपर्क: ayesha.nida.arq@gmail.com

Tags: 20262026 कहानीआयशा आरफ़ीननय्यर मसूदनुसरत
ShareTweetSend
Previous Post

कला की मौजूदगी समाज में एक जीवित मौजूदगी है. : रज़ा स्मरण : मनोज मोहन

Next Post

विश्लेषण : जंतर-मंतर पर नागरिकता का रंगमंच : रविन्द्र कुमार

Related Posts

बारिश की कविताएँ : अदनान कफ़ील दरवेश
कविता

बारिश की कविताएँ : अदनान कफ़ील दरवेश

रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना : कल्लोल चक्रवर्ती
आलेख

रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना : कल्लोल चक्रवर्ती

अपनी धुन में रस्किन बांड :  पवन करण
समीक्षा

अपनी धुन में रस्किन बांड : पवन करण

Comments 2

  1. Rajendra Joshi says:
    2 weeks ago

    ‘नुसरत’ — एक कहानी नहीं, स्मृति और अपराधबोध की भूलभुलैया

    नय्यर मसूद की ‘नुसरत’ उन कहानियों में है जिन्हें पढ़कर “समझ लेने” का संतोष नहीं मिलता, बल्कि एक गहरी बेचैनी साथ रह जाती है। कहानी समाप्त होने के बाद भी उसके दृश्य—पीली पत्तियाँ, बूढ़ा जर्राह, खाली होता मकान, टूटा हुआ शीशे का गिलास और दरवाज़े के बाहर बैठी नुसरत—मन में लंबे समय तक बने रहते हैं। यही इस कहानी की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।

    मसूद की कथा-भाषा यथार्थ का प्रत्यक्ष चित्र नहीं बनाती; वह वातावरण रचती है। उनके यहाँ घटनाएँ कम और संकेत अधिक हैं। पाठक को हर दृश्य के भीतर छिपे अर्थ की तलाश स्वयं करनी पड़ती है। इस दृष्टि से ‘नुसरत’ हिंदी कथा-साहित्य की सामान्य यथार्थवादी परंपरा से अलग खड़ी दिखाई देती है।

    कहानी का सबसे प्रभावशाली पक्ष उसका रूपकात्मक संसार है। “बदकार औरत” का मुक़दमा, प्रतिष्ठित लोगों की बैठक, दूसरी ओर नुसरत के कुचले हुए पैर और बूढ़े जर्राह का उसे बचाने का प्रयास—ये सब समानांतर घटनाएँ नहीं हैं; वे समाज की नैतिक प्राथमिकताओं पर तीखा व्यंग्य हैं। समाज एक स्त्री के नैतिक अपराध पर लंबी पंचायत कर सकता है, लेकिन उसके सामने उपस्थित वास्तविक पीड़ा की ओर उसकी दृष्टि नहीं जाती। यह विरोधाभास कहानी की सबसे तीखी आलोचना बनकर उभरता है।

    नुसरत स्वयं केवल एक पात्र नहीं रह जाती; वह घायल मनुष्यता का प्रतीक बन जाती है। उसके कुचले हुए पैर केवल दुर्घटना का परिणाम नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का रूपक हैं जो जल्दी में दौड़ती हुई मनुष्य को रौंद देती है और बिना रुके आगे निकल जाती है। उसका वाक्य—“देखी मेरी लाचारी”—पूरी कहानी का नैतिक केंद्र है। यह एक घायल लड़की का वाक्य भर नहीं, बल्कि उन असंख्य मनुष्यों की आवाज़ है जिन्हें सभ्यता सुनना ही नहीं चाहती।

    बूढ़ा जर्राह भी अत्यंत महत्वपूर्ण चरित्र है। वह केवल चिकित्सक नहीं, एक ऐसी पुरानी मानवीय परंपरा का प्रतिनिधि है जो टूटे हुए मनुष्य को जोड़ने का प्रयास करती है। उसके मर जाने के बाद कहानी का संसार तेजी से खाली होता जाता है। ऐसा लगता है जैसे करुणा की मृत्यु के बाद घर नहीं, पूरा समय उजड़ गया हो।

    कहानी का अंतिम भाग सबसे अधिक मार्मिक है। नुसरत के पैर ठीक हो जाते हैं, निशान मिट जाते हैं, लेकिन स्मृति नहीं मिटती। इसके बाद अंतिम दृश्य में वही पैर फिर बिगड़े हुए प्रतीत होते हैं। यह यथार्थ नहीं, स्मृति और अपराधबोध का दृश्य है। मसूद यहाँ बताना चाहते हैं कि इतिहास के घाव शरीर से नहीं, मन से रिसते हैं। जिन्हें हम भर चुका समझते हैं, वे भीतर लगातार जीवित रहते हैं।

    आयशा आरफ़ीन का अनुवाद अत्यंत संयमित और विश्वसनीय है। उन्होंने उर्दू की तहज़ीबी लय और नफ़ासत को हिंदी में काफी हद तक सुरक्षित रखा है। कई स्थानों पर कठिन फ़ारसी-उर्दू शब्दावली सामान्य हिंदी पाठक की गति को धीमा अवश्य करती है, किंतु यह मूल रचना के स्वभाव का भी हिस्सा है। अनुवादक ने कहानी को सरल बनाने के लोभ में उसकी रहस्यमयता नष्ट नहीं की, यह उनकी बड़ी सफलता है।

    फिर भी एक आलोचनात्मक टिप्पणी आवश्यक है। नय्यर मसूद की यह शैली हर पाठक के लिए नहीं है। जो पाठक स्पष्ट कथानक, मनोवैज्ञानिक व्याख्या या सामाजिक निष्कर्ष चाहते हैं, उन्हें कहानी कई जगह अस्पष्ट और अत्यधिक सांकेतिक लग सकती है। कहीं-कहीं कथा अपनी ही निर्मित धुंध में इतनी दूर चली जाती है कि भावात्मक संप्रेषण कमज़ोर पड़ने लगता है। कुछ पाठकों को यह “अर्थ की गहराई” नहीं, बल्कि “अर्थ का टल जाना” भी लग सकता है। यह आपत्ति पूरी तरह अनुचित नहीं है।

    इसके बावजूद ‘नुसरत’ का महत्व इसी बात में है कि वह उत्तर नहीं देती; वह पाठक के भीतर प्रश्न छोड़ जाती है। यह कहानी पढ़ने के बाद याद नहीं रहती कि बदकार औरत के मुक़दमे का निर्णय क्या हुआ; याद रहता है तो केवल वह लड़की, जिसके कुचले हुए पैर किसी सभ्यता के मौन अभियोग बन जाते हैं।
    एक सामान्य पाठक के रूप में यह कहानी मुझे उदास से अधिक बेचैन करती है। इसे पढ़ते समय बार-बार लगता है कि हम सब उस बाहरी कमरे में बैठे “इज़्ज़तदार मेहमान” हैं, जहाँ नैतिकता पर बहस चल रही है, जबकि घर के पिछवाड़े कोई नुसरत अपने पैरों के साथ अकेली छूट गई है। कहानी समाप्त होने के बाद भी दरवाज़ा बंद नहीं होता; वह भीतर खुला रह जाता है।

    यह कहानी पढ़ी नहीं जाती, धीरे-धीरे भीतर उतरती है। और शायद इसी कारण नय्यर मसूद उर्दू कहानी के उन विरल कथाकारों में गिने जाते हैं जिनकी रचनाएँ समय बीतने के साथ और अधिक अर्थवान होती जाती हैं।

    Reply
  2. Mohd Raza Husain says:
    2 weeks ago

    अफसाने पर बात करने से पहले तर्जुमे/अनुवाद की खूबियों और खामियों का ज़िक्र जरूरी है।
    इस से पहले ये बता देना जरूरी है कि मेंने असल उर्दू तहरीर और अनुवाद को एक साथ पढ़ा है। इन दोनों का comparison किया है
    खूबियां
    1 अल्फ़ाज़/शब्द : ज़बान का मखसूस रस्म उल ख़त ( लिपि ) होता है। तलफ़्फ़ुज़ ( शब्द को उसके सही वर्णों के साथ लिखने का अम्ल) के लिए रस्म उल ख़त को जानना बे हद ज़रूरी। एक ज़बान का अदबी सरमाया दूसरी ज़बान में ले जाना, तब ही मुमकिन जब अनुवाद दोनों जवानों से पूरी वाक़फ़ियत रखता हो।
    इस अनुवाद में इस बात पूरा ख्याल रखा गया है। मिसाल के तौर पर ये पैराग्राफ देखिए;
    “बदकार (बुरी) औरत का क़िस्सा मुझे अब याद नहीं लेकिन उस वक़्त मुझे उसमें बड़ी दिलचस्पी थी. इसलिए जब मुझको मालूम हुआ कि उसका मामला हमारे यहाँ पेश होगा और वो इसके हल के लिए हमारे घर आएगी तो मैं बहुत ख़ुश हुआ. इससे पहले भी एक मशहूर बदकार औरत का मामला हमारे घर में पेश हो चुका था और मेरे बुज़ुर्गों ने उसे ठीक तरीक़े से हल कर दिया था लेकिन वो मेरे होश संभालने से पहले की बात थी. मैंने उसका ज़िक्र ही ज़िक्र सुना था और ये ज़िक्र उस वक़्त तक जारी था जब तक इस दूसरी बदकार औरत का क़िस्सा शुरू नहीं हुआ.”
    अल्फ़ाज़ क़िस्सा,वक़्त,तरीक़े,बुज़ुर्गों वगैरा को सही तलफ़्फ़ुज़ के साथ इस्तेमाल किया गया है।
    ये एक बारीक काम, और इस में मेहनत बहुत है। इस लिए अक्सर अनुवादक/लेखक इस पर ध्यान नहीं देते। लेकिन यही वो काम है जो एक तर्जुमे को सार्थक करता है।
    2 असल से क़ुर्बत : अनुवाद की एक खासियत ये भी होती है कि असल तहरीर से करीब तर हो। यानी ज़रूरत के हिसाब से असल तहरीर में कुछ फेर बदल किया जा सकता है, लेकिन असल तहरीर, इस का रंग और मानी ज़ाईल न होने पाएं।
    इस अनुवाद में इस बात का पूरा ख़्याल रखा गया है।

    खामियां
    इन को खामियां न कह कर सलाह कहना ज़्यादा सही होगा, क्योंकि हर अदीब का अपना मख़्सूस लहजा, अल्फ़ाज़ को बरतने का तरीका और उस्लूब होता है। जिस का असर अनुवाद पर भी होता है।
    चंद अल्फ़ाज़ : चंद ऐसे अल्फ़ाज़ को दर्ज किया जाता है जिन के मुतल्लिक मेरी राय अनुवाद से अलग है,
    इस और उस का मसला – उर्दू में अक्सर ज़ेर, जबर और पेश वगैरा नहीं लगाए जाते,लिहाज़ा इस और उस में कोई फर्क़ मालूम नहीं होता। अभी तक जितना मैने पढ़ा है इस की रोशनी में कह सकता हूं कि आम तौर पर जानदारों के लिए उस, और बेजानों के लिए इस का इस्तेमाल होता है। हालांकि ये मेरी राय है। मुझे लगता है इस की तरफ अनुवाद में ध्यान दिया जा सकता है।

    नवादिर या अनोखी चीज़ें –
    “कमरे की ज़्यादा सजावट के लिए उसमें कई अनोखी चीज़ों को बढ़ा दिया गया जिनमें से कुछ सैकड़ों साल पुरानी थीं.”
    इस जुमले नवादिर (असल) के पर्यायवाची के रूप में अनोखी चीज़ें का इस्तेमाल किया गया है, जिस से अनुवाद और असल में एक मामूली फर्क़ आ गया है। अनोखी चीज़ें ( स्त्रीलिंग) के लिए थी का इस्तेमाल हुआ है, असल तहरीर में नवादिर ( पुल्लिंग) के लिए था का इस्तेमाल हुआ था।
    यही मसला शिगाफ( असल तहरीर) के लिए
    पर्यायवाची दरार के साथ है।
    इस पर ग़ौर की जा सकती है।

    अफसाने के बारे : मुख्तसर इतना कह देना काफ़ी है कि इस अफसाने में इंसान की जिज्ञासा( इस अनुवाद में ये लफ्ज़ इस्तेमाल किया गया है, जो भला मालूम होता है।) , इस के दर्द और डर( अकेला रह जाने और ख़त्म हो जाने का), और याद ( जो इसे डराती है और सहारा भी देती है) को बड़ी खूबसूरती से आपबीती के अंदाज़ में बयान किया गया है।

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक