लम्बी कविता
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उसके स्वप्नों में भविष्य के भयावह चित्र थे
जिनमें काला रंग अपनी सांद्रता में
पृथ्वी के कैनवास पर फैल रहा था
उसके संज्ञान में था आनेवाला वह क्षण
जिसके क्रूर आधिपत्य में
पृथ्वी का आसमान आग का गोला बन चुका था
लोग भाप बनकर उड़ रहे थे
और उनके लिए
समंदर की देह से
पानी के वाष्प बनकर उड़ जाने का
काव्यात्मक बिम्ब पर्याप्त नहीं लग रहा था
पत्थरों पर थीं उनकी अंतिम परछाइयाँ1
जिनमें उनकी अपनी कोई पहचान शेष न थी
आसमान से बरस रहा था रेडियोधर्मी कचरा
कई सौ किलोमीटर की रफ्तार से बह रही थीं
शॉक वेव की आंधियाँ
रास्ते में आने वाली हर चीज़ तबाह कर रही थीं
स्कूल, दफ़्तर, सड़कें और अस्पताल की इमारतें
पेड़-पौधे, बच्चों के झूले, किताबें, खिलौने, ऊर्जा संयंत्र
और किसी गृहिणी की रसोई में पकता
परतदार बामकुचेन केक
उड़ रहे थे विध्वंस के भयावह पक्षी
खिड़कियों से टूटे नुकीले शीशों के पर लगाए
काल अपने डैनों में दबोचकर
अनगिनत मासूमों की जान ले रहा था
सिर्फ चीखें थी वहाँ आसमान की ओर उठती हुई
जिन्हें सुनने वाले कानों के परदे फट चुके थे
चार हज़ार डिग्री तापमान पर गर्म होती पृथ्वी
जीते जी कर रही थी बूढ़ों और बच्चों का अंतिम संस्कार
वहीं कहीं दुनिया के दूसरे छोर पर
विस्फोट की सफलता का उत्सव मनाते लोगों के बीच
परोसी जाने वाली शैम्पेन के प्यालों में
दया का कोई अक्स नहीं दिखाई दे रहा था
वर्तमान की वीथिकाओं से सुनाई दे रहे थे
हिटलर के अट्टहास जिनमें शक्ति का उन्माद था2
स्जिलार्ड और विग्नेर3 की चिंताओं में
जर्मनी की बढ़ती ताकत का अनुमान था
रुज़वेल्ट की टेबल पर रखी थी आइन्स्टाइन की वह चिठ्ठी4
जिस पर भविष्य के ख़तरों का पेपरवेट रखा था
आनेवाले ख़तरों से बेखबर
कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की कक्षाओं में
क्वांटम मेंकेनिक्स और न्यूक्लियर फिजिक्स का यह प्रोफ़ेसर
अपने युवा छात्रों को
दुनिया में विज्ञान की अहमियत बता रहा था
उसकी चाहत में युद्ध की विभीषिका से बची
एक खुशहाल दुनिया थी
जहाँ रोज़ सवेरे काम पर जाते माता पिता थे
जो घर लौटकर बच्चों के साथ समय बिताते थे
खेलते थे लूडो, साँप-सीढ़ी, ताश, शतरंज
पार्लर और पेपर एँड पेन गेम्स
व्यंजनों की खुशबू से महकते थे रसोईघर
रोज़, मेंरीगोल्ड और लेवेंडर के फूल मुसकुराते थे बागीचों में
जंगलों में हवाएँ आज़ादी की साँस लेती थीं
दुनिया को मुट्ठी में कर लेने का स्वप्न देखने वाले
कुछ लोगों के आलीशान सभागृहों में
बिछी राजनीति की बिसात पर
अधिनायकों के बीच हार जीत का खेल जारी था
जो अपने बदलते रूपों में
भविष्य की शताब्दियों में भी उपस्थित रहने वाला था
ओपेनहाइमर सिर्फ एक मोहरा था
जो न्यूक्लियर बम का निर्माण कर
एक चाल चल सकता था
और बाजी उनके पक्ष में कर सकता था
लाशों से पटी युद्धभूमि नहीं था उसका मन
वहाँ सर्वहारा क्रांति के बीज से बड़े हो चुके पौधों से भरा
एक खुशहाल बाग़ था
जहाँ उगे लाल गुलाबों से
प्रेम, अपनत्व और भाईचारे की खुशबू आ रही थी
लेकिन उसकी देह पर पीढ़ियों से चली आ रही
विदेशी होने की छाप थी
अपने वतन से निर्वासित वह
और इस नए देश में
जिसकी नींव
वहाँ के मूल निवासियों के रक्त से सने गारे से बनी थी
उसे अपनी राष्ट्रभक्ति का प्रमाण देना था
उसके मन में उपजे द्वंद्व में
एक ओर देश था एक ओर दुनिया
जिसका भविष्य वह देख सकता था
उसे ज्ञात था न्यूक्लियर फिशन5 कैसे काम करता है
एक मुक्त न्यूट्रान एक एटम के केंद्र से प्रतिक्रिया कर
उसे विभाजित कर दो न्यूक्लीई बनाता है
फिर उससे और न्यूट्रान बनते हैं और यह श्रृंखला बढ़ती है
कुछ उसी तरह जैसे आग की एक चिंगारी
अनगिनत चिंगारियों को जन्म देते हुए
भीषण अग्नि में बदल जाती है
अपनी ज़द में ले लेती है आसपास का सब कुछ
और लपटों की यह विकराल श्रृंखला
सब कुछ भस्म करते हुए आगे बढ़ती जाती है
वह विस्फोट की विभीषिका को नहीं जानता था
आग को जानता था
इर्दगिर्द नज़र आती थीं उसे जली हुई बेशुमार लाशें
दुनिया का नक्शा उसे
राख के अनगिनत निशानों से भरा नज़र आता था
वह जानता था प्रस्ताव स्वीकार करने का अर्थ
विज्ञान की दुनिया में हमेशा के लिए अमर हो जाना है
प्रस्ताव ठुकराने की सज़ा भी वह जानता था
फिर भी देश और दुनिया के इस द्वंद्व में
जहाँ देश का विकल्प चुनने के अलावा कोई और रास्ता न था
विडंबनाओं से भरे इस संसार में
घटित होने जा रहा था एक तमाशा
दुनिया को बचाने की चाहत रखने वाले एक शख्स को
दुनिया नष्ट करने का काम सौंपा जा रहा था
उसने उतारकर रख दी अपनी लाल कमीज़
और पहन लिया मैनहट्टन प्रोजेक्ट डाइरेक्टर का सूट
जिसके नीचे छुप गया उसका करुणा से भरा दिल
जिसमें दुनिया भर के लोगों की चिंता थी
फिर भी मन से एक वैज्ञानिक था वह और देह से मज़दूर
श्रम की भांति उसे अपनी बुद्धि का विक्रय करना था
कि अब उसकी देखरेख में ही बम का निर्माण होना था
इतना भोला भी नहीं था वह कि न जान सके
एक प्रायोगिक परीक्षण के बाद उसे दागा जाना था
हिरोशिमा और नागासाकी की खुशहाल बस्तियों पर
सैन्य गोपनीयता में चल रही थी यह परियोजना
एक लाख तीस हज़ार जीवन6 साँस ले रहे थे उसकी छत्रछाया में
कैनेडा के उत्तर में निर्मित एल्डोराडो खदान
और बेल्जियाई कांगो की शिन्कोलोबवे खदान से
आ रहा था युरेनियम
उनकी रसोई के लिए आलू और सब्जियाँ उगा रहे थे किसान
जैसे चाकू बनाने वाला नहीं जानता
कि उसका बनाया चाकू सब्ज़ियों पर चलेगा या किसी जीव पर
वे भी कहाँ जानते थे कि उनकी साँसे
सिर्फ इसलिए लिए चल रही हैं
कि एक दिन उनके बनाए परमाणु बम से
लाखों लोगों की साँसे रुक जाएँ

2
रॉबर्ट ओपेनहाइमर
गुलाबी गालों वाला दुबला पतला शर्मीला
मासूम-सा यह अक्लमंद बालक
जेन डीडीशाइम7 का प्यारा दोस्त
चांदी का चम्मच मुख में लेकर नहीं पैदा हुआ था
जर्मनी से आकर बसी पहली पीढ़ी के यहूदियों में
शामिल था उसका संघर्षरत परिवार
मिनरल क्लब8 को लिखी जाने वाली चिट्ठियों में
वह खनिजों के बारे में लिखता था
उसकी आँखें धरती की परत के नीचे छिपी
चट्टानों को देख लेती थीं
जाने कब उसके मस्तिष्क के बाग़ीचे में पनप रहे
अवसाद के पेड़ पर
छुपकर आ बैठा शैतान
जिसके कुटिल षड़यंत्र उसकी मेधा को भरमाने के लिए काफी थे
अपने सिद्धांतों के बोझ तले दब गया एक जीनियस का व्यक्तित्व
फिर एक दिन उसकी हताशा और ईर्ष्या ने मिलकर
अपने ही ट्यूटर को ज़हरीला सेब9 देने की कोशिश की
यह हत्या की नहीं बल्कि सबका ध्यान अपनी ओर खींचने
और आत्मपीड़ा से सुख पाने का एक विकृत तरीका था
विश्वविद्यालय के सूचना पटल पर
उसके नाम के आगे निष्कासन की सज़ा लिख दी गई
व्यक्तित्व के नाज़ुक शीशे पर फेंके गए पत्थर की तरह थी यह सज़ा
जिसने उनकी अस्मिता में दरारें पैदा कर दीं
लेकिन पिता के रसूख ने उन्हें टूटकर बिखरने से बचा लिया
अनगिनत नोट्स, थीसिस, कविताओं के ढेर के बीच उपस्थित
यह शैतान उसके मन का ही प्रतिरूप था
जिसने द्वैत रूप धारण कर उसे एक ओर दयालु वैज्ञानिक
और दूसरी ओर विध्वंसक शक्ति का जनक बनाया
घंटों अकेले बैठकर वह
टी एस इलियट की उदास कविताएँ पढ़ता
अपने अकेलेपन में दीवारों से बात करता
और अनियंत्रित भावनाओं के बार-बार कोंचने पर
दर्द से कराहते हुए चीख-चीख कर कहता
हाँ मैं कचरा लिखता हूँ
प्रयोगशालाओं में बदबू पैदा करता हूँ
चाय परोसता हूँ बेस्वाद
गुमनाम लोगों के साथ
पढ़े-लिखे इंसान की तरह बात करता हूँ
और इस तरह मिली घटिया दर्ज़े की इस ऊर्जा को
वीकेंड में ठहाकों और भड़ास में निकाल देता हूँ
अवचेतन के गहन अंधकार के कटघरे में
एक अपराधी की तरह खड़े होकर
वह चीखता.. हाँ मी लॉर्ड हाँ..
मैं ग्रीक साहित्य पढ़ता हूँ,
काम में ग़लतियाँ करता हूँ
मेज़ पर बदहवास-सा दोस्तों की चिट्टियाँ तलाशता हूँ
रातों को उठकर ज़ार ज़ार रोता हूँ
पाँव पटकता हूँ, चीखता हूँ
और निराशा के गहन अन्धकार में सोचता हूँ
ऐसे जीने से अच्छा होता, काश! मैं मर जाता
अपने मानसिक विचलन के इन क्षणों में
स्वयं की मृत्यु की कामना करने वाला यह इंसान
सेरोटोनीन और डोपामाइन ट्रांसमीटर्स के शांत होते ही
नए तंत्रिका संबंधों में अध्यात्म की ओर झुक जाता
गीता में ढूंढता वह आत्मा और परमात्मा का संबंध
अनादि अनंत काल के विविध अंतरालों में
खोजता मृत्यु और जीवन का अंतर्संबंध
उसकी नज़रों में वह इंसान सबसे अच्छा था
जो हर काम सफलतापूर्वक करे
फिर भी उसके चेहरे पर उदासी
और सूखे हुए आंसुओं की लकीरें दिखाई देती रहें

3
इधर लास अलामोस की प्रयोगशाला में
एटॉमिक बम के निर्माण
और विखंडन की राह देखता
यूरेनियम से भरा कटोरा
हर रात थोड़ा और भर जाता
धीरे-धीरे गुम हो जाती अँधेरे में दूर जाते हुए
ब्रिगेडियर जनरल लेस्ली ग्रोव्स10 के भारी भरकम बूटों की आवाज़
अपनी महत्वाकांक्षा के उजास में
दूर-दूर तक उसे नज़र नहीं आता अपना कोई प्रतिद्वंद्वी
फिर भी हर रात उसकी छाती पर सवार हो जातीं
भविष्य में मारे जाने वाले लोगों की निर्दोष आत्माएँ
बेचैनी में उमड़ने लगतीं उसकी रक्तवाहिनियाँ
उत्तेजना में अपने दिमाग़ पर डाल देता वह
बेशर्मी का पर्दा
सोच को देश निकाला दे देता
अपने आदिम होने में टूट पड़ता वह स्त्री देह पर
मानो अपने आप से बदला ले रहा हो
एक नंगा बदन तेज़ साँसों की किश्ती पर सवार होता
और अंत में पसीने के सैलाब में डूब जाता
अपने स्खलित वीर्य में वह
उन करोड़ों जीवों की हत्या महसूस करता
जिनका जन्म कभी नहीं होना है
और जिनका जन्म होना है
उन्हें अंततः किसी की साम्राज्यलिप्सा के लिए मर जाना है
देहसुख भोगने के बाद
अपने नंगे जिस्म से पसीना पोंछते हुए
उसके भीतर का शैतान कहकहे लगाता
“ख़त्म कर दूंगा, सब कुछ जला कर राख कर दूंगा”
लास एलामोस की रेतीली घाटियों में
जहाँ हवाएँ तक खामोश थीं
भविष्य के विनाश और उससे उपजने वाले
शोर की सुगबुगाहट जन्म ले रही थी
काल का एक अदृश्य साया
अपने दृश्य रूप में आने के लिए व्यग्र हो रहा था
आसमान तक लहराती ख़तरे की परछाइयों में
जन्म ले रहा था ओपेनहाइमर की चेतना में अदृश्य मशरूम क्लाउड
शांत जिस्मों में धीरे-धीरे उठ रहा था परमाणु ऊर्जा का कम्पन
जो पदार्थ से मुक्त होने के लिए छटपटा रहा था
अहंकार की बुर्जियों से गूंज रही थी
अदम्य साहस और आत्मविश्वास की आवाज़
हाँ मैं काल हूँ, काल बन गया हूँ मैं
“कालो s स्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त:..”
“हाँ काल हूँ मैं…”
“मैं ही हूँ वह महाकाल”
“जो समस्त लोकों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ है”
लेकिन काल नहीं था वह
पेशेवर हत्यारा भी नहीं
हत्यारे के पर्याय में
खूनी, कातिल, घातक, हिंसक, वधकर्ता कुछ भी नहीं
वह तो बस हाड़-मांस से बना एक साधारण-सा पदार्थ था
जिसकी चेतना में मनुष्य की संवेदनाएँ थीं
जो नींद की गहराई में भी बच्चों की भूख की चिंता करता था
अपने मित्रों, परिजनों की इच्छाओं का सम्मान करता था
दुनिया के लोगों का दुःख और पीड़ा
अपनी पसलियों में महसूस करता था
जाने कितनी कमज़ोरियों से भरा
भावनाओं की कच्ची मिट्टी का एक पुतला था वह
जो अपनी कठोरता के बावजूद
संवेदना की ज़रा सी ठोकर से छिन्न भिन्न हो सकता था

4
वह प्रथम परमाणु परीक्षण ‘ट्रिनिटी’11 की रात थी
दुनिया के खुशहाल चेहरे को ढांक देने वाली भविष्य की काली राख
फैलती जा रही थी उदासी बनकर उसके चेहरे पर
कई रातों से सोया नहीं था वह
कच्ची नींद में चौंककर जाग उठता
और भविष्य में मारे जाने वाले उन लोगों के बारे में सोचता
जिन्हें बिना किसी कसूर के मौत की सज़ा दी जाने वाली थी
फिर किसी दिन मन के भीतर छुपा शैतान सर उठाता
सोच पर पड़ा संवेदना का आवरण उतर जाता
और भीतर से निकल आता
सफलता की गणना करता एक शुष्क मस्तिष्क
आश्चर्य ! उसके निर्विकार चेहरे पर उभरी लकीरों में
ग़रीबों की कोई चिंता नहीं दिखाई देती
एक निष्ठावान राष्ट्रप्रेमी की तरह
वह अपने सहयोगी सैनिकों से कहता
ध्यान रहे कि बम बारिश या कोहरे में नहीं गिरे
अन्यथा वह व्यर्थ हो जाता है12
और सुनो, अधिक दूरी पर जाकर धमाका मत करना
वरना बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं हो पाएगा
बादलों की ओट में मौत को ज़ाया मत होने देना
वरना तबाही का ज़ायका कम हो जाएगा
और सुनो, ऊँचाई का गणित भी ठीक ठीक रखना
ताकि धरती के सीने से टकराने से पहले ही
हवा की कोख में महाविस्फोट हो सके
सैनिकों ने ठीक वैसा ही किया जैसा उसने कहा था
फिर एक दिन हत्यारों में बदल गए तमाम राष्ट्रप्रेमी
अघोषित तानाशाह की जयघोषों के बीच भी
सारी दुनिया को सुनाई दे गई बम के धमाकों की आवाज़
साम्राज्यवादी आकाश के असीमित साम्राज्य
और उसके उपनिवेश धरती के बीच
राख और रक्त से बने एक नए क्षितिज ने जन्म लिया
पहली बार एक साथ दिखाई दिए
शोर, चमक, ताप, राख, रक्त, आँसू और धुआँ
सफलता के उन्मादकारी शोर में
दब गईं जाने कितने निर्दोष मासूमों की चीखें और कराह
ब्राउन सूट, स्टाउट टाई और फ्लैट हैट में सजा ओपेनहाइमर
सभ्य दुनिया के नए मसीहा का खिदमतगार
समस्त साम्राज्यवादी दुनिया के लिए हीरो बन चुका था
उसकी कामयाबी के ऐलान में
उसका साथ दे रही थी हवा में तनी उसकी मुठ्ठियाँ
उसकी उंगलियाँ इतिहास के इन पन्नों पर
खूनी हस्ताक्षर कर रही थीं
खुशी इतनी चेहरे पर
कि दुश्चिंताओं के लिए कोई जगह शेष नहीं थी
लेकिन विकिरण के बरसों रहने वाले प्रभाव की भांति
स्थायी नहीं रहने वाली थी यह प्रसन्नता
वह एक मनुष्य था और उसके भीतर भी
मानवीय संवेदनाओं से भरा धड़कता हुआ दिल था
एक अपराधी की तरह खड़ा था वह प्रेसिडेंट ट्रूमैन13 के सामने
आवाज़ में उन्माद को स्थानापन्न कर चुका था अपराध बोध
‘मिस्टर प्रेसिडेंट, मुझे लगता है मेरे हाथ खून से रंगे हुए हैं’
अपने शस्त्र उतारकर धरा पर रख दिए थे अर्जुन ने
और ब्रह्माण्ड में कृष्ण की वाणी गुंजायमान थी
आप्तजनों के रक्तपात के लिए तुम उत्तरदायी नहीं हो पार्थ
यह मेरी सृष्टि है, मैं ही हूँ इसका हन्ता और नियंता
जिन्हें तुम मृत समझ रहे हो
वे तो पहले ही मारे जा चुके हैं
आत्मग्लानि से उबार लिया था उसे प्रेसिडेंट ने
लेकिन उस तरह नहीं
जैसे माँ अपने बच्चे को चोरी के इलज़ाम से उबार लेती है
अपितु उस तरह जैसे कोई चतुर स्वामी
अपने सेवक को
अपराध के बोझ से मुक्त कर
पुनः काम पर लगा देता है
वे जानते थे कि यह भौतिक विज्ञानी
हिंसा का अपराधी बन कटघरे में खड़ा रहकर भी
मनुष्यता के पक्ष में ही गवाही देगा
अपने विरोधाभासी चरित्र में सदी का यह नायक
झूल रहा था खुशी और उदासी के झूलों पर
महत्वाकांक्षा चेहरे की नसों को लाल कर रही थी
बीमार कर देने वाली पीली मटमैली उदासी
धीरे-धीरे उसे और बूढ़ा बनाती जा रही थी
काली अँधेरी रातों में उठकर खाँसता हुआ
अपनी चित्रकार माँ एला फ्रीडमैन14 का यह बेटा
विविध रंगों से भरी दुनिया में एक अमर कृति बन चुका था
लेकिन इस अनमोल तस्वीर में कुछ बदनुमा दाग़ थे
इन दाग़ों में उसे नज़र आते जले हुए बेशुमार काले कंकाल
जो उसके मन के अकेलेपन में उसे घेर लेते
धूल बन हवा में उड़ चुके
जाने कितने बूढ़े बच्चे और औरतें उससे सवाल करते
ज़रा बताओ तो क्या दोष था हमारा
हम तो अपनी छोटी सी दुनिया में खुश थे
क्यों छीन ली तुमने हमसे हमारी फूलों से भरी दुनिया
क्यों छीन लिया हमारा आकाश और हमारी ज़मीन
और उसे एक रेडियोधर्मी मरघट में बदल दिया
जहाँ की राख कभी ठंडी नहीं होती
और मौत अनगिनत पीढ़ियों के रक्त में विकिरण बनकर तैरती है
अपनी आँखों के सामने जमी धुंध की तरह
वह विचार के इन सायों को हटाने की कोशिश करता
लेकिन अपराध बोध की वह राख उसकी आँखों में समा जाती
जिससे बचने के लिए वह बार-बार
समय के दरवाज़े बंद करने की कवायद करता
और अपनी स्मृति के रिवर्स गियर में जाकर
अतीत की पगडंडियों पर अपनी पहचान ढूँढता
उसे याद आता अपना वह अधूरा प्रेम
जिस पर साम्राज्यवादी सत्ता की पैनी निगाहों के पहरे लग चुके थे
जिसके लिए लाल रंग प्रेम का नहीं
वतन से ग़द्दारी का पर्याय था
निरंतर धीमी होती हुई मिलन की आँच में
कच्चा रह जाना ही जिसकी नियति थी
फिर भी अपनी प्रेमिका जीन टैटलॉक15 के जिस्म से आती
मखमली खुशबू की याद
उसके लिए एक सुरक्षित टापू थी
जली हुई लाशों की गंध से बचने के लिए
जहाँ वह छुप जाना चाहता था
अतीत की मटमैली यादों की उस गैलरी में
दुल्हन के धवल लिबास में खड़ी थी
उसकी प्रिया कॉमरेड कैथरीन16
जिसकी आँखों में गृहस्थी के सुनहरे स्वप्नों की जगह
माइक्रोस्कोप की स्लाइड्स पर रखी कोशिकाओं से झाँकते
अदृश्य संहार के मूक गवाह थे
वह विकिरण के शिकार लोगों के रक्त में
परमाणु धमाके बाद पैदा होने वाले
विकिरण के खतरों के निशान ढूँढती थी
भविष्य का यह ऐसा विलाप था
जिसे उसके पति ने ही जन्म दिया था
फिर भी वह अपने बच्चों के साथ फ़ुटबाल खेलते हुए
एक खूबसूरत कामयाब खुशहाल दुनिया के स्वप्न देखता था
जहाँ परमाणु विस्फोट की घातक चमक नहीं
बल्कि रोज उगने वाले सूरज की सुनहरी धूप हो
भूल जाना चाहता था वह चेन रिएक्शन का समीकरण
जिसमें मृत्यु की निरंतर आवृत्तियाँ थीं

5
फिर एक सुबह दृढ़निश्चयी होकर उसने सूरज से मुँह नहीं चुराया
फिर से पहन ली अपनी लाल कमीज़
जो बरसों पहले बक्से में दफन कर दी गई थी
वह मुक्त होना चाहता था अपनी अंतरात्मा पर लगे आरोप से
जो उसने खुद ही खुद पर लगाए थे
वह दुनिया की नदियों में खून बहता हुआ नहीं देखना चाहता था
और अंततः अपनी इस मुक्ति में वह सफल हुआ
जैसा कि सदियों से होता आया है
प्रेम ने मानवता के पक्ष में फिर वही काम किया
दया में बदल चुकी थी उसकी क्रूरता
भीतर बढ़ते हुए संवेदना के स्तर
उसे एक अहिंसक मनुष्य बना चुके थे
उसके बयानों में शामिल होने लगा था
परमाणु हथियारों का विरोध
साम्राज्यवादी सत्ता के नए बसाये शहर में
शक्ति और गौरव की ऊँची इमारतें थीं
जिनमें सेंध लगाना नामुमकिन था
अन्य देशों के संसाधनों पर नियंत्रण करने वाली
ज़मीनों के लिए निरपराध मनुष्यों का खून बहाने वाली
साम्राज्यवादी सत्ता के लिए अब उसकी सोच
एक अपराधी की सोच थी
इसलिए कि वह इंसानों की बराबरी
और दुनिया में अमन चैन के बारे में सोचता था
तमाम जाँच एजेंसियों के निशाने पर था वह
लेविस स्ट्रास17 की कुटिल मुस्कान के पार्श्व में
बिछ चुकी थी एक सियासी बिसात
जिसमें वजीर और दरबारियों का बोलबाला था
एक जाल था लेविस स्ट्रास का बिछाया हुआ
अपने मजबूत डैनों पर इतराने वाला बाज
उसमें फँस चुका था
वाशिंगटन डी सी के परमाणु ऊर्जा आयोग कार्यालय की दीवारें
सुरक्षा मंजूरी सुनवाई की मूक गवाह बन रही थीं
अंततः उसके समस्त अस्तित्व को धराशायी करता हुआ
न्यायाधीश की कलम से निकला एक फैसला
और जीवन भर अपने देश से प्यार करने वाला एक शख्स
रूस का जासूस और देश का गद्दार घोषित कर दिया गया
कितना शर्मनाक होता है एक देशप्रेमी के लिए
स्वयं पर गद्दारी का बेबुनियाद आरोप लिए मर जाना
और कितना विक्षुब्धकारी
सरकार द्वारा सुरक्षा मामलों में मिली रियायतें छीन लिया जाना
और उससे भी अधिक हास्यास्पद
उसकी मृत्यु के पचपन साल बाद 18
अपनी गलती स्वीकार कर फिर उन्हें बहाल किया जाना

6
रिचर्ड रोड्स 19 की किताब
‘द मेंकिंग ऑफ़ दि एटॉमिक बॉम्ब’ के पृष्ठों पर
बेचैनी में टहलता हुआ
इसीडोर राबी 20 के संस्मरणों का नायक ओपेनहाइमर
अपने सहकर्मी जेरेमी बर्नस्टेइन 21 का अजीब-सा दोस्त
काई बर्ड और मार्टिन जे शेर्विन 22 के लिए पहेली बना
विरोधाभासी तत्वों का एक जीता जागता पुतला
अपनी शेष ज़िंदगी सिगरेट के धुएँ में उड़ाता रहा
अवचेतन में उठने वाले आशंकाओं के बवंडर
जीवन भर उसे डराते रहे
रातों में नींद से जाग जाता वह
और कवि जॉन डन23 के शब्दों में बुदबुदाता
“टुकड़ों टुकड़ों में बंट गया है सब कुछ
खंड खंड हो गई है सारी बनावट
नहीं नहीं, फिर भी मैं अपराधी नहीं हूँ”
उपेक्षा का एक दैत्याकार पक्षी
रोज़ आकर इस ‘अमेरिकन प्रोमेंथ्युस’ 24 के जिगर को
नोच नोच कर खाता रहा
सार्वजनिक जीवन में वह जीवित रहा
लेकिन समाज की स्मृतियों में धीरे-धीरे मरता रहा
वह जीवन भर अलबर्ट आइन्स्टाइन 25 और बर्टेंड्र रसेल 26 के साथ
पगडंडियों पर चलते हुए गपियाता रहा
विज्ञान की जटिलताओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए
कला और मानवशास्त्र की हिमायत करता रहा
अपने एकांत में वह सुनता रहा
परमाणु विस्फोट के शोर में अतीत के जयघोष
न्यायाधीश की कलम से कागज़ पर उपजी
अपमान की सरसराहट
फिर एक दिन सुनी उसने
जर्जर काया की पगडण्डी पर मृत्यु की पदचाप
मृत्यु से कुछ नहीं कहा उसने
कीट्स 27 की कविताओं का सिरहाना बनाया
और चुपचाप मृत्यु शैया पर सो गया
उसके मानस से बाहर निकलकर
आज भी वातावरण में गूँज रही हैं जॉन डन की कविताएँ
जिनमें वह कहता था
मुझे काल कवलित मत समझो
हो सकता है मैं फिर उठूँ और खड़ा हो जाऊं
तुम मुझे फिर से उखाड़ फेंको
और अपनी ताकत को मोड़कर मुझे तोड़ दो
उड़ा दो, जला दो, नष्ट कर दो मुझे
मैं फिर उपस्थित हो जाऊँगा
दुनिया में अमन चैन की चाहना करने वाले
अपने नए व्यक्तित्व के साथ.
संदर्भ :
1. परमाणु विस्फोट से निकली तीव्र ऊष्मीय विकिरण (Thermal Radiation) इतनी शक्तिशाली थी कि उसने आसपास के कंक्रीट और पत्थरों का रंग उड़ा दिया (Bleach कर दिया). लेकिन जहाँ कोई व्यक्ति खड़ा था या कोई वस्तु थी, उसने उस हिस्से के विकिरण को सोख लिया, जिसके कारण पीछे की दीवार या ज़मीन का वह हिस्सा अपने मूल रंग में ही बचा रहा. परिणामस्वरूप, पत्थर पर उस व्यक्ति की एक ‘गहरी परछाई’ स्थायी रूप से अंकित हो गई. इतिहास में इसे ‘न्यूक्लियर शैडो’ कहा गया अर्थात एक ऐसा प्रमाण जहाँ शरीर तो शेष नहीं रहा, पर उसकी अंतिम चीख परछाई के रूप में पत्थर पर हमेशा के लिए दर्ज हो गई.
2. हिटलर का अट्टहास और उन्माद : हिटलर की विस्तारवादी नीति और उसका अजेय होने का भ्रम ही वह मुख्य कारण था जिसने मित्र देशों के वैज्ञानिकों को डरा दिया था. जर्मनी में उस समय ‘यूरेनियम क्लब’ (Uranium Club) सक्रिय था, जो परमाणु बम बनाने की कोशिश कर रहा था.
3. स्जिलार्ड और विग्नेर (Szilard and Wigner) : लियो स्जिलार्ड (Leo Szilard) ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने सबसे पहले ‘चेन रिएक्शन’ की कल्पना की थी. बाद में उन्होंने ओपेनहाइमर के साथ मिलकर इस बम के उपयोग के खिलाफ एक याचिका (Petition) भी तैयार की थी. उनके मन का यह द्वन्द्व था कि जिन लोगों ने बम बनाने की शुरुआत की, वही बाद में उसे रोकने की कोशिश भी कर रहे थे.
4.यूजीन विग्नेर (Eugene Wigner) और स्जिलार्ड ही वे लोग थे जिन्होंने आइंस्टीन को मनाया था कि वे राष्ट्रपति रुज़वेल्ट को पत्र लिखें. आइंस्टीन को डर था कि नाजी जर्मनी के वैज्ञानिक परमाणु विखंडन (Nuclear Fission) का उपयोग करके एक अत्यंत शक्तिशाली बम बना सकते हैं. उन्होंने रुज़वेल्ट को सलाह दी कि अमेरिकी को यूरेनियम की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए और अपने स्वयं के परमाणु अनुसंधान में तेजी लानी चाहिए ताकि जर्मनी से पहले यह शक्ति हासिल की जा सके.
5. न्यूक्लियर फिशन (Nuclear Fission): वह प्रक्रिया जिसमें एक भारी परमाणु (जैसे यूरेनियम-235) का नाभिक एक न्यूट्रॉन की टक्कर से दो हिस्सों में टूट जाता है, जिससे अपार ऊर्जा और अतिरिक्त न्यूट्रॉन निकलते हैं. यही न्यूट्रॉन आगे अन्य परमाणुओं को तोड़ते हैं, जिसे ‘चेन रिएक्शन’ (Chain Reaction) कहा जाता है.
6. मैनहट्टन प्रोजेक्ट द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1943 में अमेंरिका के नेतृत्व में प्रारंभ की गई एक अत्यधिक गुप्त परमाणु हथियार विकास परियोजना थी. इसमें वैज्ञानिक और सैन्य विशेषज्ञ शामिल थे. न्यू मेंक्सिको स्थित लॉस अलामोस मैनहट्टन प्रोजेक्ट का मुख्य अनुसंधान केंद्र था जहाँ परमाणु बम का डिजाइन तैयार हो रहा था. रॉबर्ट ओपेन हाइमर इसके डाइरेक्टर थे. प्रोजेक्ट के चरम पर लगभग 1,30,000 लोग इसमें कार्यरत थे. इनमें से 99% लोगों को यह पता ही नहीं था कि वे क्या बना रहे हैं. वे बस अपना मजदूरी, किसानी, क्लर्क, रसोइया, वैज्ञानिक आदि का काम कर रहे थे.
7. जेन डीडीशाइम, रॉबर्ट ओपेनहाइमर की बचपन की सबसे करीबी दोस्त थीं. ओपेनहाइमर स्वभाव से बहुत शर्मीले और एकाकी थे, एकमात्र जेन थीं जिनके साथ वे खुलकर बात कर पाते थे. जेन ने ही ओपेनहाइमर के उस ‘मासूम और संवेदनशील’ पक्ष को दुनिया के सामने रखा, जो बाद में परमाणु बम बनाने वाले कठोर वैज्ञानिक के पीछे कहीं छुप गया था. वह उनके बचपन की स्मृतियों का एक अनिवार्य हिस्सा हैं.
8. न्यूयॉर्क मिनरलॉजिकल क्लब (New York Mineralogical Club) ओपेनहाइमर को बचपन से ही पत्थरों और खनिजों (Minerals) को इकट्ठा करने का जुनून था. मात्र 12 साल की उम्र में वे खनिजों के बारे में इतनी विद्वत्तापूर्ण चिट्ठियाँ लिखते थे कि ‘न्यूयॉर्क मिनरलॉजिकल क्लब’ ने उन्हें एक विशेषज्ञ समझकर अपना व्याख्यान (Lecture) देने के लिए आमंत्रित कर लिया. जब वे वहाँ पहुँचे, तो लोग यह देखकर हैरान रह गए कि जिस ‘विशेषज्ञ’ को उन्होंने बुलाया है, वह दरअसल एक छोटा सा बालक है. उन्हें लकड़ी के एक बक्से पर खड़े होकर अपना भाषण देना पड़ा था ताकि वे पोडियम तक पहुँच सकें.
9. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ओपेनहाइमर गहरे मानसिक अवसाद (Depression) और अकेलेपन से गुज़र रहे थे. इसी दौरान एक बार उन्होंने अपने ट्यूटर पैट्रिक ब्लैकेट की मेंज पर प्रयोगशाला के रसायनों (संभवतः साइनाइड) से भरा एक ज़हरीला सेब रख दिया था. यह घटना ओपेनहाइमर के भीतर पल रहे उस ‘अदृश्य शैतान’ या मानसिक अस्थिरता को दिखाती है, जो बाद में परमाणु बम जैसे विनाशकारी हथियार बनाने के उनके आंतरिक द्वंद्व और अंतर्विरोधों का आधार बनी. निष्कासन और पुनर्जीवन: कैम्ब्रिज (कवेंडिश लेबोरेटरी) में ओपेनहाइमर को ‘ज़हरीले सेब’ वाली घटना के बाद निष्कासन की सज़ा सुनाई गई थी. यह उनके उभरते हुए करियर और नाज़ुक मानसिक स्थिति के लिए एक आत्मघाती प्रहार (शीशे पर पत्थर) जैसा था. उनके पिता, जूलियस ओपेनहाइमर, जो एक सफल व्यवसायी थे, ने अपने रसूख और विश्वविद्यालय के अधिकारियों के साथ बातचीत के ज़रिए इस सज़ा को ‘प्रोबेशन’ (निगरानी) और मनोचिकित्सक से इलाज की शर्त पर बदलवा दिया था.
10. ब्रिगेडियर जनरल लेस्ली ग्रोव्स: मैनहट्टन प्रोजेक्ट के सैन्य निदेशक, जिन्होंने ओपेनहाइमर की क्षमताओं पर भरोसा किया और परमाणु बम के निर्माण की पूरी प्रक्रिया की कड़ाई से निगरानी की. वे भारी भरकम बूटों के साथ लैब में घूमते थे.
11.ट्रिनिटी टेस्ट (Trinity Test): 16 जुलाई, 1945 को न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में किया गया दुनिया का पहला परमाणु परीक्षण. इसी की सफलता के बाद ओपेनहाइमर ने भगवद गीता का वह प्रसिद्ध श्लोक याद किया था— “अब मैं काल (मृत्यु) बन गया हूँ…” भगवद्गीता (11.32) : ओपेनहाइमर ने संस्कृत सीखी थी ताकि वे गीता को मूल रूप में पढ़ सकें. ट्रिनिटी टेस्ट के समय उन्होंने इसी श्लोक को उद्धृत किया था, जिसका अर्थ है कि वे स्वयं को उस ‘दैवीय विनाश’ का एक माध्यम मान रहे थे जो मानवता का इतिहास बदलने वाला था. उनके मन में ‘विश्वरूप दर्शन’ की वह भयावहता थी जिसे अर्जुन ने देखा था. यहाँ यह परमाणु मशरूम क्लाउड की भयावहता को सीधे जोड़ देता है.
12. अधिक ऊँचाई पर जाकर धमाका मत करना, वरना इससे बहुत ज़्यादा नुकसान नहीं हो पाएगा”. ओपेनहाइमर और उनकी टीम ने वास्तव में यह गणना की थी कि बम को ज़मीन से टकराने से पहले हवा में ही (लगभग 1,900 फीट की ऊँचाई पर) फटना चाहिए. इसे ‘एयरबर्स्ट’ कहा गया. अगर यह ज़मीन पर फटता, तो ऊर्जा मिट्टी सोख लेती, लेकिन हवा में फटने से इसकी ‘शॉक वेव’ (Shock Wave) मीलों दूर तक सब कुछ सपाट कर देती. अधिक ऊँचाई पर भी यह काम नहीं करता.
13.प्रेसिडेंट हैरी एस. ट्रूमैन (Harry S. Truman) अमेंरिका के 33 वें राष्ट्रपति, जिन्होंने हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने का अंतिम आदेश दिया था. ओपेनहाइमर ने उनके सामने स्वीकार किया था कि उन्हें अपने ‘हाथों पर खून’ महसूस होता है, जिस पर ट्रूमैन ने चिढ़कर उन्हें एक ‘रोतलू वैज्ञानिक’ (Cry-baby scientist) कहा था.
14. एला फ्रीडमैन (Ella Friedman) रॉबर्ट ओपेनहाइमर की माता, जो एक प्रतिष्ठित चित्रकार (Painter) थीं. उन्होंने रॉबर्ट को कला, सौंदर्य और बारीकियों को देखने की दृष्टि दी थी. ओपेनहाइमर के जटिल और विरोधाभासी व्यक्तित्व में जो ‘संवेदनशीलता’ और ‘कलात्मक झुकाव’ था, उसका श्रेय उनकी माँ के पालन-पोषण और उनके कला-प्रेम को ही जाता है.
15. जीन टैटलॉक (Jean Tatlock): ओपेनहाइमर की प्रेमिका और एक मनोचिकित्सक थीं. वे कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य थीं, जिसके कारण एफ.बी.आई. ओपेनहाइमर पर शक करती थी. ओपेनहाइमर ने लॉस एलामोस जाने के लिए उनसे दूरी बनाई. 1944 में जीन की आत्महत्या ने ओपेनहाइमर को भावनात्मक रूप से तोड़ दिया था, और वह इसे अपनी ‘व्यक्तिगत विफलता’ मानते थे.
16. कैथरीन (किटी): ओपेनहाइमर की पत्नी, जो स्वयं एक वैज्ञानिक थीं और मैनहट्टन प्रोजेक्ट के दौरान विकिरण के जैविक प्रभावों पर नज़र रखती थीं.
17. लेविस स्ट्रास (Lewis Strauss): अमेरिकी परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष, जिन्होंने व्यक्तिगत प्रतिशोध और राजनीतिक मतभेदों के चलते ओपेनहाइमर को अपमानित करने के लिए उनके विरुद्ध एक ‘कंगारू कोर्ट’ (एकतरफा सुनवाई) का आयोजन किया. उन्हीं के प्रयासों से ओपेनहाइमर को ‘सुरक्षा के लिए खतरा’ और ‘गद्दार’ घोषित किया गया.
18. पचपन साल बाद बहाली: ओपेनहाइमर की सुरक्षा मंजूरी (Security Clearance) 1954 में छीन ली गई थी, ओपेनहाईमर की मृत्यु 1967 में हुई. उनकी मृत्यु के पचपन साल बाद अमेंरिकी सरकार ने इस निष्कासन को अपनी गलती मानते हुए दिसंबर 2022 में इस मंजूरी को औपचारिक रूप से वापस बहाल किया.
19. रिचर्ड रोड्स (Richard Rhodes): ‘द मेंकिंग ऑफ़ दि एटॉमिक बॉम्ब’ के लेखक. इस पुस्तक को परमाणु युग के इतिहास का ‘बाइबल’ माना जाता है.
20 इसीडोर राबी (Isidor Rabi): ओपेनहाइमर के अभिन्न मित्र और नोबेल विजेता, जिन्होंने ओपेनहाइमर के ‘गद्दारी’ वाले ट्रायल के दौरान उनके पक्ष में निडर होकर गवाही दी थी.
21. जेरेमी बर्नस्टेइन (Jeremy Bernstein): ओपेनहाइमर के सहकर्मी और लेखक, जिन्होंने ‘Oppenheimer: Portrait of an Enigma’ लिखकर उनके रहस्यमयी व्यक्तित्व को समझने की कोशिश की.
22. काई बर्ड और मार्टिन जे. शेर्विन (Kai Bird & Martin J. Sherwin): ओपेनहाइमर की सबसे प्रामाणिक जीवनी ‘अमेरिकन प्रोमेंथ्युस’ के लेखक, जिसे लिखने में उन्हें 25 साल का समय लगा था.
23. जॉन डन (John Donne): प्रसिद्ध मेंटाफिज़िकल कवि. ओपेनहाइमर उनकी कविताओं से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने परमाणु परीक्षण स्थल का नाम ‘ट्रिनिटी’ उनकी एक कविता ‘Batter my heart, three-person’d God’ से लिया था.
24. अमेरिकन प्रोमेंथ्युस: काई बर्ड और मार्टिन जे. शेर्विन द्वारा लिखित ओपेनहाइमर की जीवनी का शीर्षक. प्रोमेंथ्युस वह यूनानी पात्र है जिसने स्वर्ग से आग चुराकर मानव जाति को दी और अनंत पीड़ा की सज़ा पाई.
25. अलबर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein): सुविख्यात वैज्ञानिक ,ओपेनहाइमर के वरिष्ठ सहयोगी और मार्गदर्शक. प्रिंसटन में दोनों अक्सर पगडंडियों पर टहलते हुए भौतिकी और मानवता के भविष्य पर चर्चा करते थे. आइंस्टीन ने ही ओपेनहाइमर को चेताया था कि अमेरिका उन्हें ‘गद्दारी’ के नाम पर इस्तेमाल कर फेंक देगा.
26.बर्ट्रेंड रसेल (Bertrand Russell): महान गणितज्ञ और दार्शनिक, जिन्होंने परमाणु हथियारों के विरुद्ध ‘रसेल-आइंस्टीन मेंनिफेस्टो’ (1955) जारी किया था. ओपेनहाइमर जीवन भर इन दोनों के विचारों के साथ उस ‘अहिंसक’ मार्ग की तलाश करते रहे.
27. कीट्स (Keats): जॉन कीट्स अंग्रेजी के प्रसिद्ध रोमांटिक कवि जिन्होंने केवल 25 वर्ष का जीवन जिया. ओपेनहाइमर कीट्स को बहुत पसंद करते थे और अंत तक उनके साहित्य के सान्निध्य में रहे.
| शरद कोकास दुर्ग छत्तीसगढ़ ![]() पहल’ पत्रिका में प्रकाशित वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इतिहास बोध को लेकर लिखी साठ पृष्ठों की लम्बी कविता ‘पुरातत्त्ववेत्ता‘(2005) तथा दीर्घ कविता ‘देह’ (पहल 104 वर्ष 2016) के लिए चर्चित कवि, कथाकार, लेखक, दर्शन एवं मनोविज्ञान के अध्येता, नवें दशक के कवि शरद कोकास के छह कविता संकलन ‘गुनगुनी धूप में बैठकर’ (1993),’हमसे तो बेहतर हैं रंग’ (2014),शरद कोकास की चयनित कविताएँ ‘समकाल की आवाज़’ (2022), ‘अनकही’ : बीसवीं सदी की कविताएँ (2025), ‘सुख एकम दुःख’ : सुख दुःख की कविताएँ (2025) एवं बिजूका (2025) प्रकाशित हैं. कविता के अलावा नवसाक्षर साहित्य के अंतर्गत शरद कोकास की तीन कहानी पुस्तिकाएँ ‘पसीने की कमाई’,’प्रेतनी की बेटी’,’राधा की सूझ’(1994),चिठ्ठियों की एक किताब ‘कोकास परिवार की चिठ्ठियाँ’ (2004), एक पुरातत्त्ववेत्ता की डायरी (2025 ),‘बैतूल से भंडारा : एक जन इतिहास’(2025 ) भी प्रकाशित हैं. मनोविज्ञान एवं मस्तिष्क पर लिखी उनकी पुस्तक ‘मन मशीन’ (2023) इन दिनों बेस्ट सेलर है जिसे ‘साकीबा लक्ष्मण सीताराम भागवत सम्मान’ प्राप्त हुआ है. इसके अलावा प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिकाओं व अखबारों में उनकी पाँच सौ से अधिक कविताएँ, समीक्षाएं व लेख प्रकाशित हो चुके हैं. कविताओं के लिए उन्हें वर्ष 2024 का ठा.पूरन सिंह स्मृति ‘सूत्र सम्मान’ प्राप्त हुआ है. सम्प्रति वे दुर्ग छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं. .ई मेल : sharadkokas.60@gmail.com |





आपका बहुत-बहुत आभार अरुण भाई । मैं उम्मीद करता हूं कि समालोचन के पाठकों को यह कविता बहुत पसंद आएगी।
ओपनहाइमर कविता पढ़कर परमाणु विस्फोट की पूरी प्रक्रिया और मनुष्यता के साथ सारी कायनात का नामोनिशान न रहना,,, यहां तक कि आंसुओं के साथ खून का भी कालिख में बदल जाना,,, मनुष्य के साथ असंख्य जीव जंतुओं और प्रकृति का न होना,,, यह दृश्य ऐसा है, जहां भयावह शब्द भी मुझे छोटा लगता है।पूरी कविता पढ़कर मन विचलित है,,, ऐसा लगता है, क्या हम सब काल का ग्रास बनने के लिए ही जिंदा हैं, क्योंकि फिलवक्त हठधर्मी अधिपतियों के दिमाग में वही पैशाचिक वृत्ति दिखाई दे रही है,,, काश! ऐसा न हो।आपकी कविता मनुष्यता को बचाए रखने की जुगत में, परमाणु बम की भयावहता से दिया गया संकेत का अर्थ ही यही है कि हिटलरशाही का विचार ये अधिपति त्याग दें, और इस खूबसूरत कायनात को बचा के रखें,,, अरुण सातले
ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों से शुरू हुए खाड़ी युद्ध ने एक बार फिर परमाणु बम की विनाशकारी आशंकाओं को लेकर बहस छेड़ दी है। दूसरे विश्व युद्ध में अमेरिका ने जापान में परमाणु बम गिराए थे, जिसके दंश से आज तक दुनिया उबर नहीं सकी है। बीते बरसों में हुए युद्धों ने साबित कर दिया कि परमाणु कवच नाकाम साबित हुआ है।
इस समय यही प्रार्थना की जा सकती है कि दुनिया में कभी परमाणु बम का प्रयोग न हो। परमाणु बम के जनक ओपेनहाइमर को केंद्र में रख कर हमारे समय के एक महत्वपूर्ण कवि Sharad Kokas जी ने यह लंबी कविता लिखी है। कविता लंबी है, लिहाजा पढ़ने के लिए धैर्य मांगती है। समालोचन में आप यह कविता पढ़ सकते हैं।
कविता की ये पंक्तियां देखिए….
फिर एक दिन हत्यारों में बदल गए तमाम राष्ट्रप्रेमी
अघोषित तानाशाह की जयघोषों के बीच भी
सारी दुनिया को सुनाई दे गई बम के धमाकों की आवाज़
ओपेन हाइमर हमारे इतिहास का एक ऐसा कैरेक्टर है इसके बारे में बहुत कम लिखा गया है । लेकिन आज जब युद्ध हो रहे हैं और पूरी दुनिया पर परमाणु बम का खतरा जारी हो रहा है ऐसे टाइम में परमाणु बम के जनक के मन की क्या स्थिति थी और वह जो कामरेड था कम्युनिस्ट था जो दुनिया को खूबसूरत देखना चाहता था जैसे कि कम्युनिस्ट लोग देखना चाहते हैं तो उसकी दुनिया के लोगों को बम से क्यों मारना पड़ा यह इस कविता में बहुत अच्छे से बोला है।
प्यारे भाई शरद
आपकी कविता “ओपेनहाइमर” पढ़ा,पढ़ता ही चला गया
ओपेनहाइमर का और उसके साथ जुड़े लोगों का चित्रण ,समय विशेष की त्रासदी ने झझकोर कर रख दिया
काश अब भी हम समझ जाएँ आने वाले वक़्त में अमन ओ अमान के साथ ज़िन्दगी गुज़ार सकें
कविता ने सबसे पहले तो चकित किया। यह कविता उस विरल साहस का उदाहरण है, जहाँ कवि अपने सुरक्षित और परिचित प्रदेशों से बाहर निकलकर ऐसे विषय को छूता है, जो सामान्यतः इतिहास, विज्ञान या राजनीति के दस्तावेज़ों में सीमित रहता है। यहाँ संवेदना का विस्तार इतना व्यापक है कि वह निजी से वैश्विक और वर्तमान से भविष्य की भयावह संभावनाओं तक पहुँच जाता है।
यह जोखिम केवल विषय का नहीं, शिल्प का भी है जहाँ कविता कथात्मक, वैचारिक, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक स्तरों को एक साथ साधने का प्रयास करती है।
किसी भी रचनाकार के लिए यह आवश्यक है कि वह स्वयं को एक ही भावभूमि या एक ही प्रकार की भाषा में सीमित न कर दे। यहाँ कविता यह संकेत देती है कि रचना का स्वभाव बहुरूपी होना चाहिए; वह कभी करुणा का सूक्ष्म स्पर्श हो, कभी इतिहास का पुनर्पाठ, और कभी मनुष्य की अंतःचेतना का विखंडन। एक ही लय, एक ही शब्द-संसार या एक ही भाव-क्षेत्र में टिके रहना रचना को सुविधाजनक तो बना सकता है, पर जीवित नहीं रखता।
इस दृष्टि से यह कविता केवल एक विषय का विस्तार नहीं, बल्कि कविता के लिए एक संभावना का उद्घाटन भी है, जहाँ वह अपने ही स्थापित सीमाओं को तोड़ते हुए नए जोखिम उठाती है और उन्हीं जोखिमों में अपनी प्रासंगिकता और जीवंतता खोजती है।
आपकी आलोचना दृष्टि काबिले तारीफ है दीप्ति जी। आपने बहुत सही मूल्यांकन किया है। अनेकानेक शुभकामनाएं।
शरद कोकास की यह कविता दीर्घ होने के बावजूद ख़ुद को पढ़वा ले जाती है। कविता समयानुकूल तो है ही।
ऐसी कविताएं लगातार लिखी जानी चाहिए।
क्या इस कविता की प्रेरणा आपको क्रिस्टोफर नोलन की फिल्म ओपनहाइमर से मिली है?
अजय सिंह जी , हिरोशिमा नागासाकी के विध्वंस पर केंद्रित कुछ कविताएं मैंने पहले लिखी थी । ओपेनहाइमर पर एक कविता लिखने का विचार मन में पल रहा था कुछ पन्ने लिखे भी थे । उसका अन्तर्द्वंद मुझे विचलित कर रहा था । मैनहट्टन परियोजना पर विस्तृत सामग्री इंटरनेट पर और पुस्तकों में उपलब्ध थी । घटनाओं के समानांतर उसके अंतर्द्वंद्व को फोकस करते हुए कविता आगे बढ़ी । फिल्म ने दृश्यों की इमेजिंग में मेरी मदद अवश्य की । यद्यपि कविता में बिंबों के साथ इसे बांधना बहुत मुश्किल काम था । पता नहीं मैं इसमें सफल हुआ या नहीं ।
अपनी सफलता पर भी पराजय बोध ओपनहाइमर के हृदय कारुणिकता और नैतिकता बोध की अभिव्यक्ति है।
लम्बी कविता के फॉर्म को शरद कोकास पूरी शिद्दत से निभा ले गये हैं। बधाई।
यह मात्र एक कविता न होकर एक त्रासद ऐतिहासिक कालखंड का दस्तावेज है. ओपनहाइमर के व्यक्तित्व की अनेक परतों को उजागर करती, उनके भाव संवेदनाओ के अनेक पहलूओं को छूती, एक महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक के अंतर्द्वंद्व , विवशता, मानवीय मूल्यों की चिंता और अपराध बोध जैसे अनेक तथ्यों से रुबरू करती है.
आज भी वैसे ही क्रूर शासक और उनकी मनमर्जी को पूरा करती वैज्ञानिकों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों की जमात मौजूद है, इस नाते आज भी कविता उतनी ही प्रासंगिक है.
शरद कोकास जी ने परकाया प्रवेश कर , तमाम रेफरेंस का सहारा लेकर तत्कालीन समय का बेहतरीन लेखा जोखा रखा है।
आपकी कविताओं को पढ़ना , अपने आप को समृद्ध करना होता है।
अब वैज्ञानिक आविष्कार – वरदान हैं या अभिशाप ??
यह तो उपयोग करने वाले की मानसिकता पर निर्भर करता है।
कवि शरद कोकास की इस लंबी कविता की ताकत बहु कोणीय है। कविता में संवेदनाओं और प्रतीकात्मकता की ज़मीन अनूठी बनावट से रची गई है । दूसरे यह है कि कविता उस वैज्ञानिक पर है जो ओपेनहाइमर जोमैनहट्टन प्रोजेक्ट के डायरेक्टर थे जो परमाणु बम के सूत्रधार थे।
कविता का शीर्षक भले ही ओपेनहाइमर हो परन्तु यह कविता का मुख्य पात्र प्रतीकात्मक है। यही इस कविता की सुंदरता है। कविता वैज्ञानिक व्यक्तित्व के सामने शिकायती अंदाज में नहीं बुनी गई है बल्कि शरद कविता की पंक्तियों में वैज्ञानिकों के लिए मानते हैं कि
“जिसके नीचे छुप गया उसका करुणा से भरा दिल
जिसमें दुनिया भर के लोगों की चिंता थी”
इसी अर्थ में कविता अपने हर अंदाज़ में और अपनी पंक्ति, पंक्ति में विनाशक शक्तियों के विपरीत खड़ी मिलती है। कविता में इस विडंबना का बयान है कि वैज्ञानिक
“जो दुनिया को बचाना चाहता था, उसी से दुनिया नष्ट करने का काम करवाया गया”
वैज्ञानिक का दिल दयालु है पर उसे विनाश का औजार बनना पड़ता है
शरद ने इस लंबी कविता में भी वही करिश्मा कर दिखाया है जो उसने पुरातत्ववेत्ता कविता में किया था।
इस विस्तृत कविता में शरद कोकास ने तथ्य भी सुरक्षित रखें है और संवेदना भी और कविता को सार्थकता के मजबूत मुकाम तक पहुंचा दिया है।
अद्भुत है। बधाइयां कवि शरद कोकास 🌷
ओपेनहाइमर कविता पढ़ गया।अभी ईरान पर ट्रंप और नेतन्याहू के संयुक्त हमले से विचलित हूं।आज ऐसी कविता की आवश्यकता है।भाई शरद कोकाश को हार्दिक बधाई।
जितेन्द्र कुमार,आरा,मो नं 9113426600
बहुत दिनों बाद एक लंबी कविता पढ़ने का सुख मिला। यह कविता पढ़ते हुए पढ़ने की अजीब विवशता पैदा करती है। आज ओपेनहाइमर की अदृश्य उपस्थिति का साम्राज्य जीवन के विघटन को सुनिश्चित करता सा प्रतीत हो रहा है। मनुष्यता के विकास के औजार विनाश के कारण बन रहे हैं। आज का भयावह वैश्विक संकट साम्राज्य वादी हनक की उपज है। देश प्रेम की आड़ में उन्माद का ताण्डव है। ओपेनहाइमर में जो मानवीयता के तंतु दिख रहे हैं, आज के हिटलरशाहों में वे भी नदारद हैं।
खास तो यह कि हिंदी कविता में ऐसी मशक्कत कौन कर रहा? तानाशाहों को बेपर्दा करती शरद कोकास जी को इस रचना की बधाई!
संवेदनाओं से भरी महत्वपूर्ण लंबी कविता के रचयिता शरद कोकास जी को आत्मीय बधाई। यह ऐसे जटिल समय में आई है जब समूची दुनिया में विध्वंसक क्रूरतापूर्ण लोगों की वजह से आम जन जीवन तहश न् हश हो रहा है। इजरायल ईरान अमरीका व उन्के पक्ष विपक्ष के देशों के लोग फटा खों की तरह बम विस्फोट और धमाका हर पल हर जगह स हने को मजबूर हो रहे हैं। तीसरा विश्वयुद्ध मानों चल ही रहा है। परमाणु बम गिराने की आशंकाओं के बीच मानवता का अर्थ तिरोहित हो रहा है। नन्हें मासूम बच्चे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हो क्या और क्यों हो रहा है। अभी उनहोंने दूनिया में कदम रखा ही है । बहुत जरुरी कविता..
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बहुत ही अच्छी कविता है।आज अमेरिका के ईरान पर हमले ने जे ओपेनहामर की याद ताज़ा करवा दी है। पूंजी की हवस ने साम्राज्यवादी शक्ति अमेरिका को अंधा बना दिया है।ये युद्ध अपराधी है जो संप्रभु राष्ट्रों के प्राकृतिक संसाधनों को कब्जाने पर लगा हुआ है।
शरद भाई आपने बहुत अच्छी लंबी कविता लिखी है
युद्ध से किसी का भला नहीं होता,निर्दोष लोग भेंट हो जाते हैं
Your poem portrays a very comprehensive and factual account of life and times of Oppenheimer, a nuclear physics Professor who is credited with development and finally exploding “the gadget” as it was called then. I watched the movie on Netflix sometime back.
Your poem does the right amount of justice to his life while working in Las Almos lab in the deserts of New Maxico, his relationship with his long time friend Jean Tatlock who was shown as a communist sympathiser.
His relationship with his wife Kitty is also essayed very brilliantly in your poem.
Incidentally, both the ladies were member of communist party of America and I think after the bomb was exploded and when guilt overwhelmed Oppenheimer and he started opposing it, US government took the clue that his two ladies were communist and decided to frame him.
Even Albert Einstein once told him that US government might charge him of treason and throw him out. America does it all the time.
Anyway, that’s US and not us.
Congratulations to you for such a long poem which doesn’t get monotonous but keeps the readers interest alive and riveted.
शरद,
कितनी गहराई तक जाकर तुमने इस महत्वपूर्ण कविता का धरातल तलाशा है ….मैं हैरान हूँ इतनी अच्छी कविता के लिए !
नाभिकीय विखंडन के सिद्धांत पर बने नाभिकीय बम के विस्फोट के बाद की स्थितियों और वैज्ञानिक ओपनहाइमर के मन में लगातार चले वैचारिक द्वंद की कल्पना कर लिखी गई यह कविता पढ़ते समय सिरहन पैदा करती हैं । साथ ही, पाठकों के समक्ष मानवीयता के पक्ष में परमाणु आयुधों के इस्तेमाल के विरुद्ध घृणा, आक्रोश और मानसिकता को पैदा करती है ।
आज के परिपेक्ष में जब खाड़ी में अमेरिका द्वारा थोपा हुआ भीषण युद्ध चल रहा है और जो विश्व युद्ध के संकेत दे रहा है, यह कविता बहुत प्रासंगिक हो जाती है हम सबको सोने को मजबूर करती है। धन्यवाद शरद आपको….. इस बेहद संवेदनशील मुद्दे पर अत्यंत भावुक और मन को झकझोरने वाली कविता के लिए।
इतिहास में वर्तमान और वर्तमान में भविष्य को देखने की पड़ताल करना फिर उसे कविता में व्यक्त करना “शरद कोकास” का सबसे विशेष और महत्वपूर्ण कार्य रहा है,जैसे पहल में प्रकाशित लम्बी कविता “पुरातत्ववेत्ता की डायरी” या “देह”
शरद कोकास की कविताएं पाठक से बात करती हुई पहले इतिहास से परिचय करवाती हैं फिर तथ्यों को बड़ी शालीनता से व्यक्त करती हुई वर्तमान समय नब्ज़ टटोलती हुई समकालीन परिदृश्य को उजागर करती हैं.
“ओपेनहाइमर” ऐसी ही कविता है जो इतिहास के एक गूढ़ व्यक्ति की मानसिकता और उसके भीतर पनप रही विनाशकारी गतिविधियों की सूक्ष्म पड़ताल करती है और जो भविष्य में होने वाला है उसको भी विश्लेषित करती है.
समूची दुनिया को नष्ट करने वाले के मंतव्य और उसकी विचारधारा को समझाने की कोशिश करती यह कविता समूची दुनिया को सचेत करती है कि और भी कई
“ओपेनहाइमर” दुनिया को संचालित कर रहें है.
जो मनुष्य को मनुष्य से मरवा रहे हैं,इतना ही नहीं वे दुनिया को ही नष्ट करना चाहते हैं.
अनूठे शिल्प और प्रतीकों से कसी यह लम्बी कविता केवल कविता नहीं,वर्तमान समय की विडम्बनाओं का सटीक चित्रण भी है.
इस अद्भुत कविता के लिए शरद भाई को बधाई.
समालोचन की टीम को साधुवाद.
◆ज्योति खरे
वाह शरद दादा , ग़ज़ब लिखा है आपने 👌👌
आपने तो एक विस्तृत परिप्रेक्ष्य में उस त्रासदी के साथ साथ ओपेनहाइमर की मनोविश्लेषणात्मक जीवनी ही लिख दी हो जैसे। यह इतिहासकारों एवं शोधकर्ताओं के लिए एक उपयोगी दस्तावेज बन सकती है ।
कविता में स्थान स्थान पर उल्लेखित विभिन्न व्यक्ति एवं स्थानों को संदर्भांकित भी किया है जिससे विषयवस्तु की भावभूमि को समझने में किंचित मात्र कठिनाई नहीं रह जाती।
यह सिर्फ कविता नहीं बल्कि एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक का मनोवैज्ञानिक चरित्र विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। प्रत्येक व्यक्ति में दैवीय और दानवी दोनों ही शक्तियां विद्यमान होती हैं किंतु मन मशीन के बदलते गियर कब किस शक्ति को डोमिनेंट बना देतें हैं और उस क्षण में व्यक्ति द्वारा लिए गए निर्णय कालांतर में क्या परिवर्तन लातें है, यह उस समय निर्धारित करना कठिन है परंतु यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है कि व्यक्ति को अपने निर्णयों के दूरगामी परिणामों पर विचार कर लेना चाहिए।
बहुत ही उम्दा और भावों में बिंध देने वाली कविता के लिए आपको फिर से हार्दिक बधाई एवं साधुवाद ।। 💐🙏
इधर जब अमेरिका का राष्ट्रपति एक सभ्यता को ख़त्म करने की चेतावनी दे रहा है, मैं शरद कोकास जी की यह कविता पढ़ गया। परमाणु बम के उपयोग से हुए ऐतिहासिक विध्वंस ने उनके मन में भी करुणा जगाने का काम किया, जो इसके निर्माण में लगे थे। लेकिन इस करुणा की स्थिति किन द्वंद्वों के बीच थी, उसे यह कविता सामने रखती है। कविता ओपेनहाइमर के जीवन के और अंतर्मन के द्वंद्व के साथ राष्ट्र के बीच के द्वंद्व को भी सामने रखती है। विषय के दबाव के कारण कविता कहीं-कहीं अधिक जानकारी परक-सी हो गई है, इसके बावज़ूद वह अपना असर छोड़ने में कामयाब है।