पीछा
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बहुत दिनों से मुझे लगा तो रहा था कि कोई है जो लगातार मेरा पीछा कर रहा है, मुझ पर नजर रख रहा है. लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है, मैं ऐसा करता भी क्या हूँ? बिल्कुल नियमित, नपा-तुला बोरियत भरा जीवन है मेरा. उसमें बताने लायक उछल-कूद जैसी चीज कुछ है नहीं. वही सुबह उठकर किसी लत के तहत टहलने चले जाना, आकर चाय पीना, देर तक अख़बार पढ़ना, नहाना और फिर नाश्ता. उसके बाद दिनभर क्या करता हूँ? मुझे नहीं पता. काम पर चला जाता हूँ और फिर वहीं उलझकर रह जाता हूँ. काम में भी मेरा मन नहीं लगता. काम भी कोई मेरी पसंद का नहीं है. काम किसकी पसंद का होता है? लेकिन करना तो पड़ता है. शाम को घर आ जाता हूँ. फिर कुछ करने लायक बचता भी क्या है? पहले टीवी देख लेता था, अब थोड़ा मोबाइल में ही टीवी आ गया है. टीवी से ज्यादा सोशल मीडिया जहाँ इतना कुछ उलझाए रखता है कि पता ही नहीं लगता कि मैं उसमें कितना समय दे डालता हूँ. मेरे बच्चे कहते हैं कि मैं हरदम मोबाइल से चिपका रहता हूँ जबकि मैं तो सोचता हूँ कि ऐसा नहीं है. मैं केवल काम की चीजों के लिए वहाँ जाता हूँ कि पता रहे देश-दुनिया में क्या हो रहा है. उसे देखने में क्या बुराई है? अख़बार तो खैर ये लोग कभी छूते भी न हों मगर मीडिया पर भी कोई बच्चा कोई न्यूज फॉलो नहीं करता. मैंने कल उन्हें शहर के बाहर लिंचिंग की खबर के बारे में बताया तो माँ-बेटे दोनों ऐसी नेगेटिव चीजें फॉलो करने के लिए मुझे ही तोहमत देने लगे.
अरे, मैं भी क्या बात करने लगा?
मैं क्या कुछ कहने चला था और कहाँ फंस गया.
हाँ, तो मैं यह कह रहा था कि कोई है जो मेरा पीछा कर रहा है. अब यह कैसे बताऊं कि मुझे क्यों लगा. मुझे सीधे-सीधे नहीं लगा क्योंकि जो पीछा करता है वह जरूर कोई चालक दिमाग है. वह सामने नहीं दिखता. उससे दुआ-सलाम नहीं होती जिससे कि मैं उसे पहचान सकूं. लेकिन वह मुझ पर नजर रखता है. मैं बताता हूँ कैसे. पहले मैं जब भी सोने जाता था तो मुझे आराम से नींद आ जाती थी. अब मुझे सोने में भी समय लगता है. दसियों करवट बदलता रहता हूँ. नींद के साथ एक युद्ध चलता है. कोई गोली नहीं खानी पड़ती मुझे, कोई दूसरी बीमारी नहीं है. शरीर में थकान होती है फिर भी नींद आने में परेशानी रहती है. अभी तक खूब भरपूर नींद लेता था. ऐसी नींद कि मुझे कुछ होश नहीं रहता था. मेरी पत्नी तक शिकायत करती थी कि ऐसे कोई कैसे सो सकता है कि सीधे बिस्तर पर पड़े और नींद में लुढ़क गए. शायद उसी की बात उसे लग गई होगी तो उसने अपना खेल करना शुरू कर दिया. लेकिन मैं सोचता हूँ जब तक ज्यादा परेशानी ना हो तो आदमी को शिकायत नहीं करनी चाहिए.
पता नहीं कितनी देर संघर्ष के बाद मुझे नींद तो आ जाती है मगर नींद के बाद क्या होता है यहीं से मेरी परेशानी शुरू होती है. मुझे बड़े अजीब तरह के सपने आते हैं. सपने यूं तो पहले भी आते थे और उसमें तमाम तरह की उल्टे-सीधे, न बताने लायक भी आते थे. लेकिन अब जो आते हैं या जो अब मैं देख रहा हूँ, वैसे नहीं है जैसे पहले थे. मसलन, पहले जो सपने आते थे उसमें मेरे कुछ परिचित लोग, मेरे बचपन के मित्र, मेरे कॉलेज के अध्यापक, मेरे दफ्तर की कोई सहयोगी अपनी अलग-अलग भूमिकाओं, बल्कि थोड़े उल्टे-सीधे क्रम में आते-जाते थे. लेकिन जो लोग अब आते हैं, ये वे लोग नहीं हैं जो पहले आते थे.
जैसे कल मेरे सपने में एक राक्षस आया. चिमपेंजी या गुरिल्ला जैसी शक्ल. भुक्खड़ विशाल काया, गंदे फटे पंजे, बड़े-बड़े नाखून, गंदली क्रूर आँखें. पूरा जंगली. इस सातवें माले के फ्लेट में कहाँ से आ गया? मैंने उसका क्या बिगाड़ा है. लेकिन वह आया और मुझे उठाकर कहने लगा कि चलो, तुम पर जो मेरी उधारी है उसे चुकाओ. अब बताइए मैंने जिसको कभी देखा नहीं, जानता नहीं, उससे मैं पैसे लूंगा? और वो दे देगा? जैसे उसके पास पैसे होंगे भी! मैं अकबका गया. लेकिन क्या मैं उसको जवाब दे सकता था? नहीं. वह सीधा तग़ादा कर रहा है. मैं उससे ठंडी शालीनता से, बल्कि गिड़गिड़ाते हुए कहता हूँ:
“भाई, मैं नहीं… आप शायद गलत…” बात पूरी करने से पहले पर उसने मेरा गला पकड़ लिया. देर तक उसका शिकंजा किसी औचक आफत की तरह मुझे लपेटे रहा. फिर कुछ करिश्मा-सा हुआ और किसी तरह उसकी जकड़ से छूटकर मैंने अपने फ्लेट से निकल अपने टावर की सीढ़ियां नापीं और नीचे सड़क पर आकर भागने लगा. लेकिन वह उसके लिए भी तैयार था. वह मेरा पीछा करने लगा. उसका एक कदम मेरे तीन कदमों जितना था. ताकत का तो कोई हिसाब ही नहीं. उससे भिड़ने का कोई मतलब नहीं था. हाँ, छकाने की कोई युक्ति हो सकती थी. मगर उस हालत में ऐसा कुछ सोचने की फुर्सत कहाँ थी. मैं बस यह सोच रहा था कि किसी चाय की टपरी या सड़क की दुकान के खोखे के पीछे छिपने का कोई ठीया-कोटर मिल जाए. लेकिन वह बदशक्ल वहाँ भी पहुंच लिया और तड़ी मारने लगा:
“तुमने सोच भी कैसे लिया रे कि बिना पैसे दिए मेरे चंगुल से निकल लोगे?”
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करूं. इसलिए सब्र रखते पूछा:
“भाई, मैंने कब लिए थे तुमसे पैसे?”
उसने बताया कि छह महीने पहले लिए थे जब मैं अपना घर बनवा रहा था, घर में कुछ पैसे कम पड़ रहे थे और खर्चा कुछ ज्यादा हो रहा था. शायद इंटीरियर का एस्टीमेट कुछ और ज्यादा हो गया था. “वो तो मैंने तो अपने दोस्त इरफ़ान से लिए थे”
मुझे याद आ गया. हालांकि हैरानी हुई कि मेरे मकान की बाबत उसे इतनी स्पेसिफिक जानकारी है.
“मुझे इरफ़ान ने ही भेजा है”
मुझे ताज्जुब हुआ कि इरफ़ान ऐसा कर या करा सकता है. जबकि उसने अभी तक एक बार भी तग़ादा तो छोड़िए इशारा तक नहीं किया. कभी कोई जिक्र नहीं चला. उसके पास थे या जो भी रहा हो मगर बात चलने पर पाँच लाख मेरे खाते में फ़ौरन से पेश्तर ट्रांसफर कर दिए थे. उसे सोलह लाख का रिफ़ंड मिला था. उसकी फंड-पोजिसन ठीक रही होगी. मैं तभी उसका मुरीद हो गया था. और आज? उसे अगर जरूरत थी तो मुझसे एक दफा तो कहता! ठीक है मेरे पास इस समय नहीं होंगे लेकिन मैं कुछ करता. इसका क्या मतलब है कि किसी जंगली को भेज दो. मैंने सुन रखा था कि लोन अदा न करने वालों के यहाँ वसूली करने के लिए गुंडे लोगों को रख लिया जाता है जो घरों में घुस जाते हैं, बदतमीजी और मारपीट भी करते हैं. लेकिन वे होते तो इंसान ही हैं! ये बनमानस इसमें कब से आ गए? क्या इन्हें पालना सस्ता पड़ता है?
जब इरफ़ान का जिक्र आया तब लगा कि वह हवा में बात नहीं कर रहा था क्योंकि मकान और इरफ़ान दोनों मुझसे जुड़े थे. मैं थोड़ा सहम गया. मैंने उससे कहा कि भाई रकम बड़ी है, मुझे महीने दो-महीने की मोहलत दो तो मैं कुछ कर लूंगा. मैंने उससे कहा कि ईश्वर गवाह है मैंने यहाँ आज तक किसी का पैसा नहीं मारा है. मैं पाई-पाई चुका दूंगा और ब्याज देनी हो तो वह भी दे दूंगा. मेरे पास नहीं हैं तो कहीं से जुगाड़ करूंगा. लेकिन मेरा गला तो छोड़ो. उसके जिस्म से बू रिस रही थी. जैसे वह सड़ांध ही ब्रीड करता हो. उसकी रक्तिम आंखों में रहम नाम की चीज दूर-दूर तक नहीं थी. केवल नफरत और नृशंसता थी जो किसी भी वक्त मेरे खून में बदल सकती थी. लेकिन पता नहीं क्यों उसे मेरी बात थोड़ी जँची और उसने मेरे गले से अपनी गिरफ्त ढीली कर एक धक्का देकर मुझे छोड़ दिया.
उस छोड़ने के साथ ही मेरा सपना टूट गया.
मैं बता नहीं सकता कि मुझे कितनी राहत मिली कि मेरी जान बच गई.
तो यह एक सपना था. शुक्र है.
सपने का क्या है, उसका कोई नियम-कायदा थोड़े होता है. बचपन में जब मैं गंदे सपने देखकर डर से उठ जाता तब माँ अपने आँचल का कवच देते हुए वह उस सपने के बारे में पूछती थी. मैं जो-जितना बताता तो वह ढाढ़स बँधाती:
“चल सो जा, गंदे सपने अच्छे होते हैं”
यह उसकी मान्यता थी.
“कैसे?”
वजह वह नहीं बताती थी. शायद नानी ने उसे यह मंत्र पकड़ाया हो. नानी को उसकी नानी ने. जो भी हो मैं अभी तक इसी खयाल को बरतता रहा. और उससे काम भी चलता रहा. लेकिन अब मुझे सब बदला हुआ लगता है. मतलब पहले जो भी गंदे सपने आते थे, जेहन में टिकते नहीं थे. भूल-भुला जाते थे. परले मोहल्ले वाला कटखना कुत्ता, जब-तब सुना आदमखोर बघर्रा, भेड़िया, खेतों पर पोखर के पास बिल बनाकर रहता फुर्तीला काला सांप या अमूर्त राक्षस… सपनों में आते रहते थे मगर सबकी शक्लें गड्डमड्ड हो जातीं. उनसे मेरा सामना कैसे-कहाँ हुआ, सब गायब हो जाता. कोशिश करने पर भी कुछ हासिल नहीं होता.
मगर इधर आने वाले सपने ऐसे नहीं थे. कई बार पहले देखे किसी सपने का तार जुड़ा आता. जैसे कोई धारावाहिक हो. इसलिए अगली रात जब मैं सोने लगता तो मन में एक अंदेशा उगने लगता कि कहीं आज सपने में वही राक्षस तो नहीं आएगा? जागने के बाद खूंखार से खूंखार सपने को हँसकर उड़ा दो मगर सपने के दौरान थोड़े पता रहता है कि सपना चल रहा है! एकाएक मुझे यही सोचकर राहत महसूस हुई कि इरफ़ान नाम का तो मेरा कोई दोस्त है ही नहीं! शाहिद है, इरशाद है या फिर नईम है. लेकिन इरफ़ान तो नहीं है. दोस्त क्या, इस नाम का कोई परिचित तक नहीं है. इस नाम के एक एक्टर के नाम से जरूर वाकिफ़ हूँ लेकिन अब तो वह भी दुनिया से चला गया. फिर मुझे ख्याल आया कि मैं कोई मकान कहाँ बनवा रहा हूँ जो फसाद की जड़ है? तो यह माजरा क्यों हुआ? सपनों में हम जो घुमक्कड़ी करते हैं, उसका कोई ओर-छोर हमारे जीवन या चेतना से जुड़ा होता बताया गया ह.
लेकिन यहाँ तो न सूत है न कपास!
भले ऊपर-ऊपर से सही मगर मेरा खुद पर थोड़ा भरोसा बहाल हो आया.
दो)
अगले रोज जैसा मैंने सोचा था वैसा या उसके आसपास का कोई सपना नहीं आया. लेकिन जो सपना आया वह कुछ दूसरी तरह का था. वो कुछ यूं था कि मैं जिस दफ्तर में काम करता हूँ वहाँ एक औरत बीमा पॉलिसी बेचने के लिए मेरे पास आई थी. दफ्तर में ऐसे लोग आते रहते हैं और गले भी पड़ जाते हैं. उनको टालने-टरकाने कि अब आदत भी पड़ गई है. पहले मैं जल्दी पसीज जाता था. सोचता था कि बेचारा परेशान है, इतनी बेरोजगारी है, इनके अभी घर-परिवार होता होगा तो ज्यादा ना सही कुछ मदद कर दी जाए. इस चक्कर में मैंने पता नहीं कितनी तरह के रुमाल खरीद लिए, एक से घटिया बॉलपेन मेरे कब्जे में आ गए, मोबाइल के चार्जर ले लिए गए. लेकिन उनका इस्तेमाल करने के बाद मुझे लगा कि मेरी औकात नहीं है कि मैं दुनिया की परेशानियों का बोझ उठा सकूं. अब तो मैं बहुत जल्द और कड़क ढंग से उनसे माफी मांग लेता हूँ हालांकि माफी मांगने की दिक्कत यह है कि वे फिर भी आपके पीछे पड़े रहते हैं. वे जैसे आँखों का पानी कूत लेते हैं. इसलिए बेअदबी करनी पड़ जाती है. जान छुड़ाने के लिए कई दफा तो दफ्तर में चपरासी या सिक्योरिटी गार्ड का भी सहारा लिया है. बल्कि एकाध दफा उन्हें डाँटा भी है कि यह दफ्तर है या मछली बाजार, जहाँ हर कोई मुंह उठाकर चला आता है. उस दफा अधनंगे साधुओं की टोली केबिन में घुस आई थी.
मैं फिर उलझ गया हूँ. हाँ, तो मैं बात सपनों की ही कर रहा था. इस सपने में एक औरत मेरे पास एक बीमा पॉलिसी बेचने आई थी. और जानते हैं यह अधेड़ गदबदी-सी औरत कौन थी ? हमारे देश की वित्त मंत्री! उसका नाम लेने से कोई फायदा नहीं और न वहाँ आकर उसे बताने की जरूरत पड़ी… वही खिचड़ी बाल, हल्का सांवला रंग, सूती साड़ी और पूरी बाँहों वाली ब्लाउज. टीवी पर जैसी दिखती है उससे जरा अलग. कुछ थकी हुई. स्टील-ग्रे कलर की साड़ी में वह ग्रेसफुल लग रही थी. मैं हैरान कि यह क्या हो रहा है. एक बैंक मेनेजर के केबिन में …. केबिन के बाहर जरूर मजमा लग गया होगा. मैंने चाय मंगाने की पेशकश की तो उसने सख्ती से बरज दिया. उसने अपनी एसीडिटी का हवाला नहीं दिया होता तो मैं उसकी सुनता भी नहीं.
“मैं रोज के तीन या चार ऑफिस ही कवर करती हूँ. इससे ज्यादा टाइम मैं अपने लिए नहीं दे सकती”. मुझे हैरान-सा देख उसने सफाई में कहना शुरू किया. उसने बताया कि “देखिए कोई काम छोटा या बुरा नहीं होता है. मंत्री होना भी एक काम है लेकिन उससे मुझे जितने पैसे सरकार देती है, मेरे घर का गुजारा नहीं हो पाता है. बच्चों के जो खर्चे हैं, जो उनकी फीस और कोचिंग रहती है उसके लिए जरूरी है कि मैं कुछ और काम भी करूँ. फिर कुछ और क्यों जब मंत्री बनने से पहले मैं यही, बीमा बेचने का काम करती भी थी. दो दफा मुझे अपने शहर की बेस्ट (वीमेन) एजेंट का शील्ड मिला है. इसलिए जब भी काम कम रहता है तो मैं घंटे-दो-घंटे वहाँ से निकल लेती हूँ और आसपास जो भी दफ्तर हैं, वहाँ बीमा पॉलिसी बेच आती हूँ. आप यकीन मानेंगे (उसने आदतन नकुए फड़फड़ाए) कि मेरे किसी ग्राहक को आज तक मेरी सेवाओं से कोई शिकायत नहीं रही. पहले एक रजिस्टर में सबके लेजर अपटुडेट रखती थी, आजकल बेटी की मदद से एक्सेल शीट पर मॉनिटर करती हूँ.”
मेरा एक और पॉलिसी लेने का कोई मन ही नहीं था. लेकिन मैं क्या करता. ठीक है कि वह कोई जोर-जबरदस्ती नहीं कर रही थी लेकिन थी तो वह वित्त-मंत्री ही. वित्त-मंत्री को आप कैसे मना कर सकते हैं? उसके एक इशारे पर मेरी कुर्सी चली जाए! कुर्सी छोड़ो कंपनी ही बंद हो जाए. मैंने बेहिचक एक पॉलिसी के लिए हामी भर दी, यह सोचकर कि चलो एक-दो प्रीमियम की तो बात है. मौका लगा तो आगे नहीं भरूंगा. जो नुकसान होगा बर्दाश्त करूंगा. नौकरी और इज्जत बचाने के लिए आदमी इतना तो कर ही सकता है. उसने वहीं पूछ-पूछकर एक फॉर्म भरा और बाद में मेरे सामने साइन करने के लिए आगे रख दिया. मैं उसके क्रॉस किए चिन्हों पर अभी हस्ताक्षर कर ही रहा था कि केबिन में सफारी सूट चढ़ाए चार मुस्टंडे घुस आए और आनन-फानन में मुझे वहीं घेर लिया. नहीं दबोच लिया. मैं अकबकाया, हड़बड़ाया, गिड़गिड़ाया… कि भाई यह क्या है, यह दफ्तर है … मैडम आप इनसे कहिए ना…. लेकिन तब तक मुझे पता चल चुका था कि वह औरत किसी इल्जाम में मुझे फंसाने आई थी. जिस चीज पर उसने अभी मेरे हस्ताक्षर लिए, वे कोई बीमा प्रीमियम संबंधी नहीं थे. साफ था कि जिस अपराध की वह बात कर रही थी, मैं कर चुका था.
एक तो वह वित्त-मंत्री नहीं थी! तो फिर उसकी शक्लो-सूरत, बोल-चाल और नकुए फड़फड़ाती यह अधेड़ कौन थी? मैंने उनको कहा भी कि भाई मैडम से पूछो तो सही कि मैंने इनका क्या बिगाड़ा है? लेकिन मैडम तो पहले से ही तैयार थी. उसने कंधे पर टंगे अपने जेएनयू वाले झोले से कागजों और चित्रों का जखीरा सामने रख दिया. मेरी निजी करतूतों का कच्चा चिट्ठा! उसने मुझे बासबूत बताया कि मैं किस-किस होटल-रेस्टोरेंट में किसके साथ जाता रहा हूँ, मैंने पिछले बरसों में क्या-क्या खरीदी की है (वह भी जो नकद में थी) मैं अकेले, दुकेले और परिवार के साथ कहाँ-कहाँ घूमने गया था, क्या गुलछर्रे उड़ाए थे, सबके प्रमाण सामने रखे थे. और तो और उसने वहीं खड़े-खड़े मुझे कुछ फोटो भी दिखा दीं जिनमें मैं कुछ युवतियों के साथ अश्लील मुद्राओं में था. उनमें कोई मेरी पहचान की नहीं थी. मैं और घबरा गया. मैं कह ही नहीं सकता था कि मैं लड़कियों को नहीं पहचानता.
मैनेजर की इज्जत-आबरू छोड़ मैं सीधे मैडम के पैरों में लेट गया. मैडम आप जो भी हैं, जैसा कहेंगी मैं वैसा करूंगा. तब तक सारा दफ्तर मुझे घेरकर देखने लगा कि मैंने क्या किया है. जब मैं पैरों पड़कर भीख मांग रहा हूँ तो जरूर कुछ किया ही होगा! लेकिन वह औरत जो वित्त-मंत्री सी लगती थी खासी बेरहम निकली. उसने अपनी सैंडल मेरे माथे पर दे मारी और कहा कि जब मैं यह सब कर रहा था तब मुझे ख्याल नहीं आया? “जब तू इतना पैसा उड़ा रहा था तब एक बार भी सोचा कि गलत कर रहा हूँ… फिजूल कमाने की आदत तो डाल ली मगर कभी खयाल नहीं आया कि पकड़ लिया जाऊंगा तो? तेरे जैसो ने समाज को परेशान कर रखा है. अब तो जेल जाना पड़ेगा. पड़ेगा ही”.
अपने खोल से निकल वह पूरी नीचता पर उतर आई.
और जब उसने अपने मुस्टंडों को इशारा किया तो उन्होंने मुझे अपनी गिरफ्त में केबिन से बाहर खींचा और कॉरिडोर के रास्ते सीढ़ियों से उतरते हुए मुझे बाहर ले गए. मुझे याद नहीं कि मैंने अपना चेहरा रुमाल से ढका भी था कि नहीं जैसा कभी मैंने अपराधियों को इस तरह से अपनी शर्म छुपाने के लिए देखा था. शायद नहीं ही. यहाँ तो सब सरेआम शर्मशार हो रहा था. कोई राहत-रहम नहीं. और फिर उसी खदेड़ते हुए उन्होंने काले रंग की एक जीप में मुझे बेरहमी से पटक दिया.
जब सीट पर जाकर गिरा होऊँगा तब, हाँ तब, मेरी नींद टूटी! झटके से.
ओह गॉड, यह सपना था?
मुझे पसीने आ रहे थे. पीछे तक गर्दन गीली हुई पड़ी थी.
पता नहीं कितनी देर से यह सब चल रहा था.
लेकिन राहत थी कि जो कुछ अभी-अभी मेरे साथ हुआ वह सपने का हिस्सा था, वास्तव का नहीं.
मैंने उठकर पानी पिया और बिस्तर छोड़कर बाहर ड्राइंग रूम में आकर बैठ गया. सारा दृश्य, सारी कहानी ताज़ा थी. उसके बारे में सोचते हुए दिल बैठा जा रहा था. फिर खयाल आया, मैं तो किसी बैंक में काम नहीं करता. सपने को सपना यानी झूठा मानने के लिए यही सहूलियत काफी थी. फिर भी दिल में धधका बैठा था. यह सब क्या हुआ, क्यों हुआ या कल भी तो ऐसा ही कुछ हुआ था? कल के सपने में और आज मतलब अभी वाले सपने में कोई कनेक्शन है? सपनों का कोई कनेक्शन थोड़ी होता है. वे अपनी तरफ से आते हैं. उनसे क्या डरना जब उनका कोई गणित होता ही नहीं है!
सपनों का गणित भले न होता हो, घबराहट का तो होता है. इस घबराहट में मेरे साथ कुछ भी हो सकता था. सोते हुए किसी को खबर भी नहीं होती. अपने काम में आधे-अधूरे मन से उलझे रहकर भी मैं इस बारे में सोचता रहा. बात केवल इन दो सपनों की नहीं थी. उससे पहले भी कुछ सपने आते रहे थे लेकिन एक के बाद एक और ऐसे डरावने तो हरगिज नहीं. मेरे दायरे में बहुत ज्यादा डॉक्टर नहीं आते हैं लेकिन सोचने वाली बात है कि क्या कोई चिकित्सकीय स्पेसियलिटी ऐसी आ गई है जो मेरे काम की हो. मतलब, वे कोई दवा-गोली लिख दें जिसके सेवन से इस अजाब से छुटकारा मिले. मनोचिकित्सक? तौबा! मैंने तो जितने भी देखे, लगा उन्हें पहले इलाज की जरूरत है. कैसे घूरते हुए तो सवाल करते हैं! यह बात अब मुझे इतनी डराती लगी कि मैं गूगल पर या आजकल जो नए ऐप आए हैं, जो इस तरह के सवालों की जानकारी देने को तत्पर रहते हैं, मैंने वहाँ भी गुहार लगा दी कि पता लगा सके कि क्या इनका कोई मतलब है?
वहाँ से सिर्फ खुली बकवास सुनने को मिली जिसका मैं कुछ नहीं कर सकता था.
इसके बाद मैं अपनी तरह से अपने सपनों से लड़ने की कोशिश करने लगा. शाम का खाना लगभग आधा कर दिया. सोने से तीन घंटे पहले बेनागा खाने भी लगा. सुबह मेडिटेशन करने लगा और रात को सोने से पहले एक शावर भी लेता. मोबाइल को आठ बजे के बाद साइलेंट पर और दूर रख देता. किसी ने सोने से पहले योग-निद्रा करने का सुझाव दिया तो यूट्यूब पर उसका भी एक बढ़िया क्लिप ढूंढकर फॉलो करने लगा. दुनिया को मेरी जरा नहीं पड़ी और न आइंदा पड़ेगी तो भाई मैं किस चिंता में पतला होता रहूँ ? रात को परेशान मैं होता हूँ, दुनिया नहीं. हाँ नहीं तो. कल एक बार फिर से सारे टेस्ट कर लूंगा… खासकर बीपी, शुगर और हार्ट संबंधी…कहीं कुछ ऊपर-नीचे तो नहीं हुआ है इधर. मुझे कहीं लग रहा था कि इससे चीजों पर फर्क पड़ता है.
लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कुच्छो नहीं.

तीन)
मेरा साक्षात्कार होने जा रहा है. एक अखिल भारतीय प्रतियोगिता परीक्षा का लिखित भाग पास कर लिया है. अब पर्सनल्टी टेस्ट है. मैं क्या सोचता हूँ, क्या बोलता हूँ, कितना तार्किक हूँ, कैसे चीजों को देखता-समेटता हूँ, उसी सब की जांच होने जा रही है. मैं वहाँ पहुंच गया हूँ. गोलाकार कॉरीडोर है. एक कमरे के बाहर लगी डेस्क पर एक महिला बैठी है जो वहाँ आए हुए परीक्षार्थियों के दस्तावेजों की देख-परख कर रही है. उसने क्रीम कलर के साड़ी के ऊपर नेवी ब्लू कोट डाला हुआ है. चहकता मगर संजीदा चेहरा है. बॉब-कट. सामने कुर्सियों पर दूसरे परीक्षार्थी बैठे हैं. सबके हाथों में अपनी-अपनी फ़ाइलें हैं. सभी सूट-बूट चढ़ाए हैं. और मैंने एक सामान्य सी गुलाबी रंग की राउंड नेक की टी-शर्ट पहनी है. पैरों में हवाई चप्पलें हैं.
नेवी ब्लू कोट वाली लड़की को मैं अपना परिचय देता हूँ .
सीट से नजरें ऊपर करते ही वह मुझे बेहिस घूरती रह जाती है:
“आप इंटरव्यू देने आए हैं… ऐसे?”
उसके ‘ऐसे’ के गिर्द फैली हैरत मुझे निर्वस्त्र कर दे रही है.
“मुझे कुछ पता नहीं था मैम कि इस मौके पर क्या पहना जाता है.”
वहाँ खड़े होकर मुझे खुद अटपटा लगने लगा है.
“घुसने के साथ ही आपको बाहर कर देंगे. आप इतनी बड़ी नौकरी के लिए आए हैं और यह नहीं पता इंटरव्यू के लिए क्या पहनना होता है?”
वह मुझे धिक्कार रही है.
मैम क्या बताऊँ? सोता रह गया था. जब नींद खुली तो काफी देर हो चुकी थी. जब खुली तो जैसा था उठकर भाग लिया. रास्ते में ट्रैफिक भी था.”
“मैं कुछ नहीं नहीं जानती. मैंने आजतक कोई ऐसा केनडिडेट नहीं देखा जो यूं ही उठकर, चप्पल डाले इंटरव्यू देने चला आया हो.”
“आयम सॉरी मैम. आप बताइये, मैं क्या करूँ? मुझसे चूक तो हो गई. लेकिन जानबूझकर नहीं. मुझे अन्दर जाने दीजिए, मैं उन लोगों से माफी मांग लूंगा. वे लोग व्यक्तित्व की परख करते हैं ना, कपड़ों से क्या होता है. प्लीज़.”
मैं गिड़गिड़ाने लगा हूँ. मन ही मन ईश्वर से त्वरित राहत की प्रार्थना किये जा रहा हूँ.
“आपको मैंने यूं अंदर जाने दिया तो वे लोग मुझे नौकरी से निकाल देंगे… कि मैं अपना काम ठीक से नहीं करती हूँ.”
“मैम हो सकता है वे आप पर वे गुस्सा करें, माना. लेकिन मुझे अन्दर नहीं जाने को मिला तो मेरी नौकरी तो गई … आपको तो पता ही है ना कि कितनी मुश्किल ने यहाँ तक पहुंचा जाता है. कई साल लगे हैं मेरे…”
इसी तरह की बहस कुछ देर और चलती है.
मेरा दिल बैठे जा रहा है.
चंद पल सोचते हुए वह एक रास्ता सुझाती है.
“आपका नंबर तीसरा है. पहला केनडिडेट अंदर है, दूसरा वेटिंग मैं है. तीसरे की जगह मैं कह दूँगी कि अभी केनडिडेट नहीं आया है. तब तक आप कुछ इंतजाम कर लें.”
“मैं क्या इन्तजाम कर लूंगा इतनी देर में?” मैं रूआँसा सा होने लगा हूँ.
” जो केनडिडेट आपसे पहले इंटरव्यू देकर आयेंगे, उनके कपड़े-जूते ट्राई का लेना, कुछ तो बेहतर
हो जाएगा…”
मैं इस स्त्री पर वैसे ही गुस्सा करने लगा था. ये तो बहुत सूझबूझ वाली और रहमदिल निकली.
मैं तैयार हो जाता हूँ.
मुझसे पहले के सभी प्रत्याशी दुर्भाग्य से बड़ी कद-काठी के हैं. उनका तो कुछ फिट नहीं आएगा. जो अन्तिम है, वह मेरे आसपास पड़ता दिखता है.
मैं उसके इंटरव्यू के खत्म होने का इन्तजार करता हूँ.
जैसे ही वह बाहर आता है, मैं उससे मिन्नतें करता हूँ- मुझे बचाने की.
जरा संकोच के बाद वह मान जाता है.
हम दोनों फट से वाश-रूम में चले जाते हैं जहाँ जाकर मैं उसके कपड़े पहनता हूँ. वह मेरे कपड़ों से खुद को ढकता है. उसके कपड़े मुझे पूरी तरह ठीक तो नहीं आए हैं लेकिन काम चल जाएगा. जूते तो अन्दर से काट रहे हैं. लेकिन पहले से तो लाख बेहतर है.
बाहर निकलने से पहले मैं एक बार चेहरे पर पानी मारता हूँ, इतनी देर से चिपकी बदहवासी पोंछते हुए. बाहर निकलकर डेस्क के पास जाकर बॉब कट से को बताता हूँ कि मैं तैयार हूँ.
“ओह, आयम सॉरी मिस्टर प्रामाणिक … बोर्ड तो उठ गया. वे लोग अगले प्रत्याशी के लिए दो-तीन मिनट इन्तजार करते हैं. आपके लिए भी किया. आप आये नहीं तो उन्होंने सब बंद कर दिया. इट्स ओवर फोर द डे.”
“तो अब … मेरा इंटरव्यू मैम?”
मैं हाँफते हुए पूछता हूँ. रुलाई छूटने को है.
“आई डॉन्ट नो. मैं कुछ नहीं कह सकती, सर. आपको मौका मिला आपने गंवा दिया, किसकी गलती है?”
अपना काम समेटते हुए जैसे वह उठ खड़ी होती है.
और तभी… तभी मेरी नींद खुलती है.
उफ, तो ये भी सपना था!
ये भी!
ये हो क्या रहा है?

चार)
रेस्त्रां में भीड़ थी. शायद इसलिए कि हैप्पी आवर था. उसके लंबे कॉरीडोर के दूसरे कौने पर बैठे पहले मुझे वह चिमपेंजी-सा आदमी दिखा. तो यह आदमी ही है. उस रात मुझे चिमपेंजी गलत लगा. शायद रात होने के कारण. अंधेरे और घबराहट में कहाँ सही दिखता है. उसकी पीठ मेरी तरफ थी मगर जब वह मेरी मेज के पास से किसी से बात करते हुए गुजर रहा था तब मुझे पूरी झलक मिल गई थी. घिनौना तब भी लगा. फिल्म अभिनेता इरफ़ान उसके सामने था. उसे देखकर मुझे लगा यह कोई प्रोड्यूसर होगा. लेकिन मुझे हैरत तब हुई जब वित्तमंत्री की शक्ल वाली वह अधेड़ उस बॉब-कट के साथ मजे से खिलखिलाते उन्हीं के पास जाती लगी.
मैं दूर से उन चारों को देर तक देखता रहा.
उनकी बातें, हंसी-ठहाके और खिलखिलाहटें खत्म ही नहीं हो रही थीं.
कौन हैं ये लोग? आपस में कैसे जुड़े हैं?
और मुझे किस हिसाब से अपने घेरे में लिए हुए हैं?
क्या कोई गैंग है इनका? या दूसरा मेरी समझ से परे कुछ और?
मैंने अपना बिल पे किया, मामूली सी टिप भी छोड़ी और बाहर निकल आया.
पांच मिनट लगे मेरे वाहन को आने में.
जैसे ही मैं उसमें घुसा, मेरा कलेजा बैठ गया!
वे चारों उसमें थे.
मैंने बस दरवाज़ा खोला था.
एक पुख्ता हाथ ने झटके से मुझे अंदर धर लिया.
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ओमा शर्मा
मुंबई में रहते हैं. |

एम. ए., एम. फिल (अर्थशास्त्र) भविष्यदृष्टा’, ‘कारोबार’ और ‘दुश्मन मेमना’ कहानी संग्रह तथा स्टीफ़न स्वाइग की आत्मकथा और उनकी कहानियों के हिन्दी अनुवाद आदि प्रकाशित. विजय वर्मा, इफको सम्मान, रमाकांत स्मृति कथा सम्मान, स्पंदन कथा सम्मान, शिवकुमार मिश्र स्मृति सम्मान आदि से सम्मानित.


कितनी बढ़िया कहानी है…..शानदार। याद रहेगी।
भयावह सपने और यथार्थ का असली जीवन में एकाकार होना! यहीं तो है कहानी और ज़िन्दगी का सच! अच्छी मगर डराने वाली कहानी!
कहानी पढ़ ली।सपनों का अल्गोरिथम…. पीछा…शानदार कहानी।यह भयावह घेरा जो बन रहा इन सबका पैटर्न एक जैसा है।मुझे अच्छी लगी आपकी कहानी।ओमा सर को बहुत शुभकामनाएं।कहानी अंत तक पाठक को बांधे रखती है।
ओमा साहब की कहानी में सत्यता है । आरंभ में समझा कि किसी महिला का नाम है । मुझे लगता है ओमा जी ने मनोरोग की बीमारी से ग्रसित लोगों की ज़िंदगी की किताबें पढ़ी हैं ।
डरावने सपने आना मनोरोग की शुरुआती अवस्था में आते हैं । मुझे भी. 8 मई को एक अज़ीज़ कुछ अधेड़ उम्र [43 वर्ष] का छोटा भाई अमित [रिंकू] मंदबुद्धि है । हाँसी में ही एक ट्रेक्टर एजेंसी में नौकरी करता है । उसके ज़िम्मे चाय बनाना और पीने के लिए पानी देना है । अमूमन ग्राहकों के लिए और दो बार मालिक के लिए ।
मालिक ने अज़ीज़ रितेश कुमार को फ़ोन किया और कहा कि अमित बड़बड़ाने लगा है ।
तब हम हिसार में एक मनोरोग विशेषज्ञ श्री अमन मनचंदा के अस्पताल में दिखाने गए थे । वे डॉक्टर 8 दिसंबर 2024 से मुझसे वाक़िफ़ हैं । अपनी छोटी बहन के मानसिक स्वास्थ्य की जाँच कराने जाता था ।
30 अगस्त 2025 को मैंने भी अपनी ओपीडी टिकट बनवाई । यह ख़ूबसूरत फ़ाइल है । मुझे डरावने सपने आते हैं । उसके बाद 8 May 2026 को रितेश और अमित के साथ गया ताकि उसे नैतिक बल मिले । पहले उसे दिखाया । अमित को राहत मिली । हो सकता कि सी॰टी॰ स्कैन न कराना पड़े । क्योंकि पिछली दफ़ा डॉक्टर मनचंदा साहब ने कहा था ।
मुझसे पूछा कि कब आना चाहोगे । जवाब दिया कि जिस दिन अमित को बुलाओगे ।
हमने 19 दिन दवा खाई । मुझे नई तरह की गोली लिखी । अस्पताल में दुकान से लेना ज़रूरी है । मुझे पचानवे फ़ीसदी आराम आ गया ।
एक महीने की नई तरह की गोली लिखी । मुझे पुनः डरावने सपने आते हैं । तफ़सील से लिखने की ज़रूरत नहीं समझता ।
पीछा में सारे ही स्वप्न यथार्थ के निकट हैं , भयावह और त्रासद। इन दिनों एक नागरिक के तौर पर जीना किस कदर मुश्किल होते जा रहा है ।
महानगरीय जीवन और वातावरण में आच्छादित राजनीति की छाया कैसे हमारे अचेतन मन को गड़मड़ा कर रखती है ; इसे बहुत खूबसूरती से ओमा जी कहानी ‘पीछा’दिखाती है। कहानी पढ़ते पढ़ते लग रहा था कि लगातार कोई मेरे पीछे -पीछे चल रहा है, मुझ पर पूरी नज़र रखे हुए। जीवन के तीन महत्वपूर्ण पड़ाव कैसी जीवंतता से यह कहानी पकड़ती है- घर का निर्माण से जुड़े तनाव, आय और कर के डर, हाथ से फिसलता हुआ नौकरी से जुड़ा साक्षात्कार। ये सारे डर जो प्रकटत : अतार्किक लगते है, उस जीवन को समझने के जैसे सूत्र देते हैं जहाँ तरक्की और तार्किकता फेल हो चुकी है। जीवन एक विराट एब्सर्डिटी में तब्दील हो चुका है मगर जिसका कुछ हमारे पीछे पड़ा है। बहुत पहले एक ऐड आता था – डर के आगे जीत है। पर डर से आगे बढ़े तब तो। भूत, भविष्य और वर्तमान के ताने बाने में बुनी यह कहानी और उस पर से हर समय सर्विलांस का डर! आधुनिक जीवन की परतों को छीलती इस मनोवैज्ञानिक कहानी के लिए ओमा जी और समालोचन को साधुवाद !
ग़ज़ब टेक्नीक इस्तेमाल किया है भाई आपने इस कहानी में। इस समय के दुरूह सच को दुःस्वप्नों की फंतासी से छान कर निकाल लाए हैं आप।
हम आज जिस अनिर्दिष्ट भय से घिरे रहते हैं उसके चेहरे जाने पहचाने होते हुए भी कितने अबूझ हैं। खुद को बहलाते हुए हम जानबूझ कर उनके ट्रैप में कूद जाते हैं।
एक अच्छी कहानी के लिए बधाई है मित्र
आज के समय के भयावह यथार्थ को अन्वेषित करती ओमा शर्मा की शानदार कहानी।
ओमा शर्मा की यह कहानी लंबे समय तक याद रहेगी। हमारे समकालीन समय में इंसानी वजूद को हर स्तर पर घेरने वाली प्रबंध व्यवस्थाओं , उनकी उद्देश्यपरकता ,नौकरशाही , नियंत्रण और संबंधों के नियोजन की निर्मम घेराबंदियों तथा एक कससाती जकड़न के भीतर मनोभावों के किसी अव्यक्त अलक्षित भीतरी त्रास को कथाकार ने बड़े संवेदनशील तरीके से एक सर्वथा नए शिल्प में विन्यस्त किया है । कथा के नरेटिव में एब्सर्डिटी का यह इस्तेमाल एक ऐसी दुनिया को मूर्त कर रहा है जहां मनुष्य के जीने की सहज साधारण इच्छाओं और उसके चारों ओर के निरपेक्ष संसार के बीच भयावह अंतराल मौजूद हैं । एक खौफनाक बाहरी यथार्थ और अवचेतन पर उसके अक्सों को दर्ज करती इस कहानी का वस्तुजगत एकदम नया है । किसी भी समग्रता और कार्य कारण भाव की अपेक्षाओं को खारिज करता हुआ यह कथ्य एक अंधेरे संसार में मानवीय अस्तित्व के एलियनेशन और उसके त्रासद आंतरिक निर्वासन को रचता है जहां ऊलजुलूल स्थितियों,विखंडन , क्रमभंगताओं ,अतार्किकता,भय, असहायता, अकेलेपन , दिग्भ्रम और विषाद का एक समूचा संसार पसरा हुआ है और बाहर निकालने के सारे दरवाजे बंद कर दिए गए हैं । अवचेतन में बसी दुस्वप्नों की दुनिया और जागृत अवस्था के सारे फ़र्क मिट गए हैं।एक नए समय के सच की इतनी प्रभावशाली अभिव्यक्ति हमारे कथा संसार में हमेशा संभव नहीं हुई है। ओमा शर्मा को इस महत्वपूर्ण कहानी के लिए बहुत बधाई।
विजय कुमार जी की मीमांसा से शत प्रतिशत सहमत होते हुए यही कहूँगा कि यह स्वप्नवादी यथार्थ की बेजोड़ कहानी है। कथाकार बहुत ही आसान यत्न से आपको अपने स्वप्नों बल्कि दुःस्वप्नों में शरीक कर लेता है। यह तभी संभव है जब पाठक अपने यथार्थ से त्रस्त हो। मेरे विचार से यहाँ पाठक दोहरी यातना झेल रहा है। अपने यथार्थ से भागकर जब वह लेखक के स्वप्नों में प्रवेश करता है तो ज्ञात होता है कि वहाँ भी दुःस्वप्नों को एक श्रृंखला है। बहुत कम कहानियाँ ऐसी होती हैं जो फैंटसी के स्तर पर लेखक और पाठक को इस तरह तदाकार कर सके। इतनी शानदार कहानी के लिए भाई ओमा शर्मा को दिली मुबारकबाद।
ओमा शर्मा की यह कहानी डर के फैलाव की कहानी है। जीवन में डर है और वह मनुष्य को खाली पाते ही जकड़ लेता है, लेकिन इस कहानी में डर और जकड़न पीछा ही नहीं छोड़ती। जीवन की सहजता और इंसानी सामर्थ्य का मजाक बनता दिखाई दे रहा है जैसे किसी ने कठपुतलियों की सारी डोरियों को अपने हाथ में ले रखा हो। पात्र की नियति में निरंतर भागना, हैरान होना, घिर जाना और मारे जाने की ओर जाना ही दिखाई दे रहा है क्योंकि तर्क- अतर्क, जागना- सोना, अपना – पराया कई तरह के कार्य-कारण सम्बन्ध टूट गए हैं। यहाँ तक कि टाइम- मशीन भी बेतरतीब हो गयी है।
खतरों को नजदीक से देखने- दिखाने के लिए लेखक को बधाई।
कितना अजीब है न कि हम अपने सपनों का पीछा नहीं कर पाते, लेकिन कोई और है जो जबरन अनधिकृत हमारे सपने में प्रवेश कर जाता है और हमारे सपनों को नियंत्रित करने लगता है…
जी हाँ, बिलकुल यही होता है जब राज्य यानि ‘स्टेट’ हमारे सपनो का पीछा करने लगता है. और हम विवश उसे रोक नहीं पाते. ओमा शर्मा जी की नई कहानी ‘पीछा’ को पढ़ते हुए मेरे दिमाग में बहुत कुछ कौंधने लगा…स्टेट कैसे हमारे सपनो के माध्यम से हमारे जीवन में प्रवेश कर जाता है और अधिकांशतः हम एक डरा हुआ जीवन जीने को अभिशप्त हो जाते हैं.
एक खूबसूरत दुनिया बनाने का ख़ाब देखा था/है, हमने भी…किया भी क्या था –किसानों, मजदूरों, औरतों के हक़ की बातें की थीं. अपने अधिकार मांगे थे. कुछ कहानियां, कुछ कवितायें लिखी थीं, बच्चों को दुनिया बदलने के लिए गाये जाने वाले कुछ गीत सिखाये थे. एक रोज़ रजनीगंधा के बिरवे और फूलों से महकते हमारे कमरे में कुछ पुलिस वाले (स्टेट) दाख़िल होते हैं और हमें हमारे देखे जाने वाले सपनो का हवाला देकर गिरफ़्तार कर लेते हैं. अब तक लिखी हमारी सारी कहानियां, कवितायें, डायरियां चोरी कर लेते हैं…
आठ महीने जेल में बिताने के बाद 14 मार्च 2020 को हम जेल से ज़मानत पर रिहा होकर इलाहाबाद आ जाते हैं. 20 मार्च से कोविड के दौरान लॉकडाउन (स्टेट) फिर से हमारे जीवन में प्रवेश कर जाता है. भोपाल के जिस नायाब स्कूल में मैं बच्चों के साथ जीवन जीती थी वह भी बंद हो जाता है और हमारी मनपसंद नौकरी भी चली जाती है.
तबसे हम जीवन जीने के लिए के लिए संघर्ष करते रहे…हाँ सपने देखना बदस्तूर जारी रहा तभी 5 सितम्बर 2023 एक बार फिर अकल्पनीय रूप से NIA (स्टेट) हमारे घर और जीवन पर छापा मारती है. जैसे हम कोई खूंखार आतंकवादी हों…वे दंगानिरोधी वज्र वाहन हमारे दरवाज़े पर खड़ी कर देते हैं, सुबह हमारे कमरों में दाखिल होते हैं और वे हमारी एकमात्र अर्जित पूँजी किताबों को उलट-पलट देते हैं…हमारी अलमारियों के निजी स्पेस में दाख़िल हो जाते हैं…मेरी साड़ियाँ, सूट और बाकी कपड़े बिखेर देते हैं…एक बार फिर से हमारी कवितायें, कहानियां, लेख हमारे (मेरे और मनीष के) लैपटॉप जब्त कर ले जाते हैं.
तभी से राज्य एक दु:स्वप्न की तरह हमारे सपनों में दाखिल हो गया है. वे लगातार हमारे सपनों का ‘पीछा’ कर रहे हैं. यह अलग बात है कि हम उनसे डरते नहीं! और हमने सपने देखना कभी नहीं छोड़ा!
ओमा जी अपनी कहानी के माध्यम से हमारे सपनों में एक सकारात्मक सेंध लगाने के लिए शुक्रिया!
अमिता शीरीं
यह कहानी स्वप्न और यथार्थ के बीच फंसे नायक की ही कहानी नहीं,
भौतिकवाद की दौड़ में फंसे,
जीने की कोशिश में,
दुःस्वप्न सी ज़िंदगी जीने वाले हर आम आदमी की कहानी लगती है।
आप की शैली में सहजता और लिखावट में मैचुरिटी झलकती है। साधुवाद।
‘पीछा’ : स्वप्न और यथार्थ के बीच की विभाजक रेखा को ध्वस्त कर देने वाली एक प्रभावशाली कहानी। लंबे समय बाद ऐसी कहानी पढ़ने को मिली जो बाज़ार के यत्र-तत्र-सर्वत्र फैले हुए स्वरूप और उसकी अदृश्य सत्ता को इतनी सजगता, सूक्ष्मता और कलात्मक संवेदना के साथ प्रस्तुत करती है। कहानी अपने समय की बेचैनियों को केवल दर्ज़ नहीं करती, बल्कि पाठक को उनके भीतर उतरने के लिए विवश भी करती है।
यह देखकर प्रसन्नता होती है कि वरिष्ठ कथाकार ओमा शर्मा सर निरंतर नए विषयों, परिवेशों और कथात्मक प्रयोगों के साथ हिंदी कथा-साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। इस उल्लेखनीय कहानी के लिए उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।
इस महत्त्वपूर्ण कहानी को पाठकों तक पहुँचाने के लिए ‘समालोचन’ और आदरणीय अरुण देव सर का आभार। 🙂🙏🏻
क्या ओमा शर्मा सपने और यथार्थ को मिक्स करना चाहते हैं? क्या कहानीकार सपने की टेक्नीक अपनाकर कुछ सनसनीखे़ज़-सा रचना चाहता है? क्या यह कहानी केवल काली आशंकाओं का प्रतिबिम्ब भर है?
मुझे लगता है कि यह सपना नहीं एक भूमिगत यथार्थ का दृश्य है। वह भूमिगत यथार्थ जो सतह बाहरी यथार्थ के समानांतर पलता-बढ़ता और खूंखार होता गया है। चूंकि वह दूर से नहीं दिखता, इसलिए उसका ठीक-ठीक आकलन नहीं किया जाता। हम उसे महज़ आभासी या वायवीय कहकर टालना चाहते हैं। लेकिन, अगर कोई चीज़ हमारे रोज़मर्रा के जीवन को अस्त-व्यस्त करने की क्षमता रखती है तो इस बात का कोई ज़्यादा मतलब नहीं रह जाता कि वह अदृश्य है या मूर्त है। मसलन, पिछले कई वर्षों से हम बार-बार देख रहे हैं कि व्यवस्था के किसी निर्णय पर जनता ‘ना’ कहती है, लेकिन अंतिम परिणाम निर्णय के अनुमोदन में निकलता है। आख़िर जनता के निर्णय को कौन उलट देता है?
कहानी के ज़ाविए से बात करें तो असल में, व्यवस्था के प्रकट संसार के नीचे एक और नेटवर्क बन चुका है। राक्षस (बनमानुष/चिम्पैंजी), बीमा पॉलिसी वाली औरत और उसके मुस्टंडे, साक्षात्कार के लिए आए परीक्षार्थियों के दस्तावेज़ों की जांच-परख कर रही नेवी-ब्लू कोट वाली बॉब-कट महिला— सब इसी नेटवर्क का हिस्सा हैं। सब एक-दूसरे से परिचित हैं।
अब, एक बार सपने की घटनाओं को बाहरी स्पेस और समय में शिफ़्ट करके देखें— क्या रोज़मर्रा की दुनिया में ऐसी घटनाओं का होना असंभव है? अगर यह असंभव नहीं है तो फिर इसे केवल सपने की बात कहकर कैसे समझा किया जा सकता है?
शायद, यह कहानी चाहती है कि हम इस अदृश्य और भूमिगत यथार्थ का सख़्ती से नोटिस लें। उससे आंख चुराना छोड़ें और स्वीकार करें कि यथार्थ को लेकर हमने जो औसत सहमति गढ़ रखी है, अब उससे बाहर आना पड़ेगा।
लेकिन, हम अभी भी मानने को तैयार नहीं हैं कि जिसे हम अपना सजग और जाग्रत जीवन कह रहे हैं, उसके सूत्र अदृश्य प्रबंधकों के हाथों में चले गए हैं।
इस तरह, ‘पीछा’ हमारी व्यवस्था के अदृश्य यथार्थ की कहानी है।
ओमा शर्मा की कहानी ‘ पीछा’ का शिल्प और कथ्य दोनों इसे अल्ट्रा माडर्न फिक्शन के सटीक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं.
मैं खुद एक अज्ञात भय से ग्रसित रहता हूँ और किसके भय से इसका अंदाज़ नहीं लगा पाता। एक बेचैनी किसी बिंदु पर बहुत देर तक ध्यान केंद्रित नहीं करने देती।
सारे सपनों के पात्र उसकी कार में पहले से बैठ कर उसका इंतज़ार कर रहे हैं.यह देखकर जितना वह नहीं डरता उससे ज़्यादा पाठक डर जाता है और पीछा शीर्षक अपना अर्थ पा जाता है.ओमा जी अपनी हर कहानी में नयी ज़मीन तलाश कर प्रस्तुत करते हैं।
ओमा शर्मा हिन्दी के अच्छे कथाकारों में गिने जाते हैं, अपने पहले कथासंग्रह भविष्यदृष्टा से उन्होंने कहानी के श्रेष्ठ पाठकों में जगह बना ली थी, अरुण देव ने समालोचन में उनकी पीछा कहानी को स्थान दिया, स्वप्न और यथार्थ के बीच लगातार मुठभेड़ करते नायक को गहरी जद्दोजहद करनी पड़ती है,इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे हेमलेट का पीछा करते डैगर की याद आई,टू बी आर नाट टू बी,,,यह शाश्वत प्रश्न है जिससे हर कथा नायक को जूझना पड़ता है,और वह हेमलेट शायद हर कहानी में हैं जिसका पीछा एक खूनी डैगर हमेशा से करता रहा है,एक और कहानी मोहन राकेश की एक ठहरा चाकू की भी मुझे याद आई जिसमें एक गुंडे का चाकू हमारे नायक को हर जगह परेशान करता दिखाई पड़ता है, इसे डैगर या चाकू यह हमारे समय का भीषण यथार्थ भी हो सकता है या है, जीवन के हर मोड़ पर अनिश्चय की भीतियां हैं जिनसे जीवन में हमें जूझना पड़ता है और यह हमारी नियति में सम्मिलित हो गया है ,ओमान बड़ी होशियारी से इन अन्तरसंघर्षो से रूबरू होते हैं , यही इस कहानी का गहरा सत्य है या पिकासो का सांड जिससे वे हमेशा टकराते रहे हैं,ओमा ने अपनी इस कहानी के द्वारा एक नयी जगह बनाई है, मेरी ओर से उनके भविष्य के प्रति हार्दिक शुभकामनाएं 🙏,,,,,
ओमा जी की यह कहानी हमारे समय, हमारे जीवन और हमारे आंतरिक जगत की भयावहता को बेजोड़ यानी seamless तरीके से खोलती है। व्यक्ति के तौर पर हम इतने बेबस और घिरे हुए हैं कि हमारे यथार्थ का आइना दु:स्वप्न हो गए हैं। इनके जरिए तीनों स्फीयर एक साथ खुलते हैं जबकि वे दृश्य केवल अवचेतन के रच रहे होते हैं। डरावने सपनों के दो दृश्यों के बाद लेखक अगले दृश्य को सपना कहने की जरूरत नहीं समझता। पाठक खुद ब खुद उस सांचे में खुद को फिट कर लेता है कि जो दृश्य है वह असल में स्वप्न है पर अतियथार्थ है। यह अतियथार्थ एक तरह से हमारे यथार्थ की प्रतिकृति है। कठोर और विकल्पहीन।
ओमा शर्मा की कहानी नींद में भी पीछा करती रही देर तक। हड्डियों में सिहरन पैदा करती रही। सपनों की दुनिया में आदमी थोड़ी राहत पाता था, एक अदृश्य भय ने सपनों की दुनिया पर भी कब्ज़ा कर लिया और खतरनाक यह है कि यह सिर्फ सपना नहीं है।
ओमा शर्मा की कहानी से जब भी गुजरता हूँ कुछ लेकर लौटता हूं। इस पीछा कहानी को पढ़कर भी बहुत कुछ मिला। कहानी का दुःस्वप्नात्मक वातावरण दिलचस्प लगा। पर एक बात आश्चर्य चकित कर गई कि कहानी का मूल तनाव “कोई मेरा पीछा कर रहा है” है, लेकिन उसके बीच सूत्रधार बार-बार विषयांतर करता रह गया कभी अखबार, बच्चे, मोबाइल, दफ्तर, चपरासी आदि में इससे कथा की गति धीमी पड़ी है,ऐसे लगा। फिर भी कहानी बहुआयामी तो लगी।
ओमा अभिनंदन
‘पीछा’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह साधारण मध्यवर्गीय जीवन के भीतर छिपे असाधारण भय को अत्यंत विश्वसनीय ढंग से रचती है। स्वप्न और यथार्थ का क्रमिक विलयन, कथावाचक की आत्मीय वाचिक शैली और अंत तक बना रहने वाला तनाव कहानी को विशिष्ट बनाते हैं। लेखक बिना किसी कृत्रिम रहस्य या चमत्कार के पाठक को नायक की मानसिक दुनिया में ले जाता है, जहाँ हर अगला स्वप्न पिछले से अधिक बेचैन करने वाला बन जाता है।
यह कहानी पढ़ते हुए फ्रांज़ काफ्का के ‘द ट्रायल (The Trial)’, स्टेफ़न स्वाइग की ‘फ़ियर (Angst)’ और डिनो बुज़ाती की ‘द टार्टर स्टेप (The Tartar Steppe)’ जैसी रचनाएँ स्मरण हो आती हैं, जहाँ भय किसी एक घटना का नहीं, बल्कि पूरे अस्तित्व का अनुभव बन जाता है। हिंदी में इसकी ध्वनि उदय प्रकाश की ‘मोहनदास’, निर्मल वर्मा की ‘कव्वे और काला पानी’ तथा ज्ञानरंजन की कहानियों में उपस्थित मानसिक और सामाजिक असुरक्षा की याद दिलाती है।
हाँ, कुछ स्थानों पर स्वप्नों की संरचना में पुनरावृत्ति का आभास होता है और कथावाचक के कुछ प्रसंग अपेक्षाकृत अधिक विस्तार माँगते प्रतीत होते हैं। थोड़ी और संपादकीय कसावट कथा के प्रभाव को और तीखा बना सकती थी।
फिर भी ये छोटी-सी सीमाएँ कहानी की समग्र उपलब्धि को कम नहीं करतीं। ‘पीछा’ समकालीन हिंदी कहानी की उन उल्लेखनीय रचनाओं में है जो हमारे समय के अदृश्य भय, निगरानी और मानसिक असुरक्षा को कलात्मक संवेदना के साथ अभिव्यक्त करती हैं। यह ऐसी कहानी है जिसका प्रभाव पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक पाठक का पीछा करता रहता है।
अच्छी सच्ची कहानी है। मैने यह कहानी एक दोस्त के रिकमेंड करने पर पढ़ी। संदर्भ यह था कि मेरी जेल डायरी में एक अध्याय जेल में बंद लोगों द्वारा देखे जाने वाले सपने के बारे में है। मुझे आश्चर्य होता था कि वे इतने डरावने सपने क्यों देखते हैं? और सुबह उठकर इकट्ठा होकर एक दूसरे को उसके बारे में बताती थीं। सुनकर मैं उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने की कोशिश करती थी। तीन चार महीने जेल में रहने के बाद बाद मैं भी ऐसे ही डरावने सपने देखने लगी और जेल से निकलने के बाद भी ऐसे ही सपने आते रहे। कहानी पढ़ते हुए, जेल के वो ढाई साल दिमाग में घूम गए। अब जबकि यह पूरा देश एक घनीभूत जेल में तब्दील होता जा रहा है, ऐसे सपने सामाजिक सच्चाई बन गए हैं। इस संदर्भ से यह कहानी ऐसी सामाजिक सच्चाई को उजागर करने वाली बेहतरीन कहानी लगी, जिस ओर ध्यान कम जाता है।
ओमा जी ने अपनी इस कहानी के साथ खुलकर Rapid Eye Movement प्रयोग किया है, कहानी में प्रत्येक सपने के साथ कुछ लेयर्स भी रखें हैं ताकि पाठक अगले सपने को ध्यानपूर्वक पढ़ें। साथ ही कहानी में Threat Recognition का भी एक दृश्य है जिसे ओमा जी ने बहुत सावधानी से परत दर परत प्रस्तुत किया है। हालांकि विज़ुअल इमेजरी बस एक अपने-आप होने वाली प्रतिक्रिया है, जिसके लिए किसी बाहरी संकेत की ज़रूरत नहीं होती लेकिन इस कहानी में संकेत को भी engaging hook की तरह इस्तेमाल किया गया है। सपने idiosyncratic होते हैं लेकिन हर व्यक्ति के सपने अलग-अलग और अनोखे होते हैं। यादें और निजी चिंताएं सपनों पर असर डालती हैं, लेकिन समय के साथ ये असर कैसे बदलते हैं और व्यक्ति के स्वभाव की स्थायी विशेषताएं सपनों को कैसे आकार देती हैं, यह अभी भी साफ़ नहीं है, कुछ सपने बेमतलब के भी होते हैं जिनका हमारे जीवन से कोई लेना देना नहीं होता है लेकिन ओमा जी ने कहानी में अपने उत्कृष्ट narrative arc के ज़रिए एक शानदार पढ़त का हमें भागी बनाया है। Dead of Night (1945) मूवी याद आ गयी। आप देखिए एक शोध के अनुसार लॉकडाउन के दौरान, सपनों में सीमाओं और ज़्यादा भावनात्मक तीव्रता का ज़िक्र ज़्यादा देखने को मिला, ये असर आने वाले सालों में धीरे-धीरे सामान्य हो गए। ये नतीजे दिखाते हैं कि व्यक्ति की स्थिर खूबियां और अचानक हुए अनुभव मिलकर सपनों के अर्थ को आकार देते हैं और कभी कभी बिना किसी अर्थ के भी हमें डराते या प्रसन्न करते हैं, ओमा जी ने भी इसी प्रकार अपनी रचनात्मक ‘Bob and Weave’ प्रविधि से एक शानदार कहानी लिख डाली है। कहानी को अगर ‘एक शब्द’ मुझे कोई कहे देने के लिए तो मैं कहूंगी ‘ललाम’।
– जोशना बैनर्जी
कहानी के साथ दी गई भूमिका (इंट्रो) थोड़ा-सा भ्रम पैदा करती है। उसमें कहा गया है कि आज हमारी लगभग सारी सूचनाएँ या तो सार्वजनिक हो चुकी हैं या आसानी से उपलब्ध हैं; निजता (प्राइवेसी) लगातार सिमटती जा रही है। हम किसी चीज़ को ख़रीदने के बारे में सोचते भर हैं और उसके विज्ञापन हमारी स्क्रीन पर स्वतः प्रकट होने लगते हैं। बेशक यह हमारे समय का एक अहम सच है, लेकिन कहानी पढ़ने के बाद ऐसा नहीं लगता कि उसका केंद्रीय कथ्य यही है। यह महज़ निजता के क्षरण की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समकालीन यथार्थ की कहानी है जो दिन-ब-दिन अधिक पेचीदा, ख़ौफ़नाक और अधिक शिकंजा कसने वाला होता जा रहा है।
इसे पढ़ते हुए बार-बार मंगलेश डबराल की कविता ‘यथार्थ इन दिनों’ याद आती रही। इस कविता में यथार्थ कोई स्थिर या निष्क्रिय वस्तु नहीं, एक ज़िन्दा, सक्रिय और लगभग हिंस्र उपस्थिति की तरह सामने आता है। कवि यथार्थ का ‘पीछा’ करता है, लेकिन उसे महसूस होता है कि यथार्थ ही उसका पीछा कर रहा है, उससे भी कहीं ज़्यादा तेज़ी से। वह नींद में जाता है तो यथार्थ वहाँ भी उसका इंतज़ार करता मिलता है। एक स्वप्न से निकलकर दूसरे स्वप्न में पहुँचता है तो वह पहले से ही घात लगाए बैठा होता है। उसे पकड़ने की कोशिश करो तो वह किसी हिंस्र जानवर की तरह हमला करके ओझल हो जाता है; पीछे केवल उसके नाखूनों के निशान रह जाते हैं।
यही बोध इस कहानी का भी केंद्रीय स्वर है। यहाँ यथार्थ केवल हमारे चारों ओर मौजूद नहीं है; वह हमारी चेतना, हमारी यादों, सपनों और अवचेतन तक में दाख़िल हो चुका है। उसके नुकीले पंजे हमारी निजी दुनिया को लगातार कुरेदते रहते हैं। आदमी जागता है तो उससे घिरा रहता है, सोता है तो वही उसके सपनों की शक्ल अख़्तियार कर लेता है।
यही वजह है कि यह कहानी तकनीकी निगरानी (सर्विलांस) या निजता के संकट की कहानी भर नहीं रह जाती। यह हमारे समय के उस सर्वव्यापी, पीछा करते हुए और लगातार अधिक आतंककारी होते जा रहे यथार्थ की कहानी बन जाती है, जिससे बच निकलने की कोई राह दिखाई नहीं देती। मंगलेश डबराल ने अपनी कविता में जिस अस्तित्वगत बेचैनी और भय को रचा था, ओमा शर्मा उसी अनुभव को कथा के माध्यम से मूर्त करते हैं। इस अर्थ में यह कहानी बेहद प्रभावशाली है।
स्वप्न और यथार्थ के घात प्रतिघात की बेजोड़ कहानी जो समकालीन समय की बेचैनी , भयावहता और डर के सहमेल से ग्रस्त त्रस्त जिंदगी का नायाब चित्र खींचती है। कहानी का शीर्षक बहुत सार्थक है
बेहतरीन कहानी है. वर्तमान समय को बखूबी चित्रित करती है.
डरा दिया कहानी ने।अपने कई दुःस्वप्न
आये।ओमा शर्मा को अपने विषम सपने याद रहे।अपनी मुसीबत है कि सपने सता कर भाग लेते हैं।अक्सर ये कि रास्ता भूल गयी हूँ।कई बार अपने ही घर का रास्ता भूल गयी हूँ।गूगल नही काम आता।चार्जिंग खत्म है।नींद खुलने पर अपने को बिस्तर पर पड़े पाकर शुक्र मनाती हूँ
ओमा पीछा पढ़ी। एक साथ नहीं पढ़ पाया दो बार दो अलग अलग जगह और समय में पढ़ी । पर इन दो जगहों और समयों को कहानी ने कभी टूटने नहीं दिया कुछ भी खंडित नहीं हुआ ना कहानी की लय ना उसका रोमांच बल्कि इन दो ध्रुवों के बीच कहानी ने एक सुंदर विस्तार लिया । इस अंतराल के समय में बतौर पाठक थोड़ी कहानी मेरे मन ने भी रची ।
अभी अपनी खिड़की के पास बैठ का कहानी पूर्ण रूप से पढ़ पाया। तीन अलग अलग सपनों को जिस तरह ओमा जी ने जोड़ा है वह एक आकर्षक रोमांच पैदा करता रहा। सपने में बेइज्जत होना, किसी अनजान के द्वारा डराया जाना, जीवन का कुछ महत्त्वपूर्ण छूट जाना । विफल होना ।असहाय होना ।निर्दोष होते हुए भी अपराधबोध से ग्रसित होना। कहानी के पात्र पर एक अजीब से दबाव का बादल हर वक़्त सर पर मंडराता रहता है। इस कहानी का पात्र पाठक है ।
जो सपने को पढ़ता है कहानी में
रचे हिस्सों में ।
ओमा जी की कहानी पीछा वाक्य दर वाक्य जो दृश्य रचती है उने हम अपनी अपनी दृश्य स्मृति से गढ़ते चले जाते है और कहानी पूर्ण करते हैं ।
ओमा शर्मा हमारे समय के एक प्रौढ़ कथाकार है। वे एक विधा (कहानी) के अलावा कई विधाओं पर निरंतर सक्रिय बने रहते है, साथ ही वे लेखक से ज्यादा अपने अंदर छुपे पाठक को अधिक महत्व देते है। यही कारण है कि वे निरंतर पढ़ते रहते है, जबकि उनके चाहने वाले चाहते है कि वे निरंतर लिखते रहे।
‘पीछा’ कहानी एक प्रतीकात्मक कहानी है, जिसमें दो स्थितियां हमारा किसी ब्लैक शेडो की तरह पीछा करती रहती है- पहली जुर्म क्या है तथा दूसरी असुरक्षा । वर्तमान संदर्भ मे असुरक्षा एक बड़ा प्रश्न है। पूर्व में दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस प्रश्न की व्यापकता लगभग पश्चिम के हर साहित्य में देखी गई है । और आज हम भारतीय भी इसकी चपेट में हैं। ओमा शर्मा हमे अपनी कहानी के द्वारा काफ्का की याद दिलाते हैं। परिवार, अफसरशाही और राजनीति इन तीनों के मध्य एक आम आदमी की जलती-बुझती जिंदगी है।
पीछा कहानी में आधुनिक बोध के साथ शिल्प का भी बखूबी प्रयोग हुआ हैं। बेशक ओम शर्मा आधुनिक बोध के कथाकार हैं।
समकालीन दौर के महत्वपूर्ण कहानीकार ओमा शर्मा को पढ़ना अपने समय से आंखें मिलाने जैसा अहसास कराता है। हम कितनी ही बार आज के इस गझिन, जटिल, व दिन ब दिन क्रूर होते समय में जीने की विडंबना को जीते चले जा रहे हैं। आधुनिक युगा का सबसे बड़ा संकट यही कि हम दिन ब दिन अकेले पड़ते जा रहे है और दुस्वप्न हमारा पीछा नही छोड़ते। इन दुस्वप्नों की बेतरतीबी से कथा में बुनने का कथा कौशल ओमा शर्मा के पास है कि वे कितनी खूबसूरती से सृजनात्मकता के रसायन से कलासूत्रों को पकड़कर मंजे कथाकार की तरह अनूठे ढंग से पाठकों को ऐसे यथार्थ से अवगत कराते हैं, जो अवचेतन में हमेशा हमारे दिलोदिमाग में तैरता रहता है। पीछा, कहानी में कई विधाओं की आवाजाही है जिसमें वैयक्तिकता, एकांत, अकेलापन, रिश्तों की उधेड़बुन के बीच आज के जीवन के सच से रू ब रू कराया गया है। सूक्ष्मता से ब्यौरों के डिटेल्स दर्शाकर अलग अलग खंडों में सपनों की जद्दोजहद से पाठक कनेक्ट होते होते अंतत: तमाम तहर के भय व असुरक्षा की खाई में गिरने लगता है। आज के भयावह यथार्थ का जीवंत दस्तावेज है ये कहानी।
रजनी गुप्त
बहुत शानदार कहानी।
ओमा की ” पीछा ” पढ़ ली. ये अब तक की सबसे अलग कहानी है . इसमें सोशल औऱ साइकोलॉजिकल पहलू कुछ इस तरह से उलझ गए हैं, कि बाद में यही उलझन इस कहानी के शिल्प में बदल गई है. ये कहानी इतनी एकरेखिय नहीं है कि इसे किसी निश्चित अवधारणा के खूंटे से लपेट दिया जाए.
ओमा शर्मा की कहानी “पीछा” हमारे इर्द-गिर्द बदलते रोजमर्रा के संसार का आकलन करती है. यथार्थ के विद्रुपीकरण को ये कहानी अलहदा ढंग से दिखाती है. स्वप्न की तकनीक के रास्ते कहानी आगे बढती है. पाठक यथार्थ की सतह के भीतर की सुरंग में प्रवेश करता है. स्वप्न के भीतर चीज़ें बेतरतीब नहीं है- बल्कि संगतपूर्ण है.
चिम्पांजी या गुर्रिला की शक्ल जैसा एक राक्षस स्वप्न में उसका पीछा करता है और उसे याद आता है कि उसने किसी इरफ़ान से क़र्ज़ लिया है, जिसे वसूलने के लिए वह पीछे पड़ा है. स्वप्न में वह उसके होने का तर्क ढूँढ़ लेता है, स्वप्न की बेतरतीबी के भीतर एक तरतीब है. आँख खुलते ही उसे याद आता है- दरअसल कोई इरफ़ान है ही नहीं, जिसे वह जानता है. इसी तरह के दो और प्रसंग है. स्वप्न और यथार्थ के बीच की कशमकश के रास्ते अवचेतन को उद्घाटित करने का प्रयास. हालाँकि इस कहानी का सबसे सबल पक्ष है, स्वप्न और यथार्थ के बीच की विभाजन रेखा का मिट जाना.
लेकिन कहानी के अंत में वही तनाव ढीला हो जाता है. तीनो प्रसंग आपस में एक जगह मिल जाते हैं, लगता है जैसे लेखक यथार्थ में लौटकर चीज़ों को स्पष्ट कर देना चाहता है. अस्पष्टता, धुंधलापन ही इस कहानी को बहुआयामी बनाता है, लेकिन अंत में जाकर लेखक कहानी की उस जमीन को छोड़ देती है. पाठक की नाव किनारे लग जाती है.
ओमा शर्मा जी को इस बेहतरीन कहानी के लिए बहुत-बहुत बधाई .
समालोचन पर ओमा शर्मा की नई कहानी ‘पीछा’ अभी पढ़ी, बहुत अच्छी है।
यह कहानी हमारे समय की अदृश्य व्यवस्थाओं, नियंत्रण और उनसे उपजे मानवीय अकेलेपन को एक नए और प्रभावशाली शिल्प में व्यक्त करती है। असंगति के सधे हुए प्रयोग से यह बाहरी यथार्थ और भीतर के भय, विस्थापन तथा अस्तित्वगत बेचैनी को इस तरह रचती है कि कहानी लंबे समय तक स्मृति में बनी रहेगी। एक उल्लेखनीय कहानी के लिए हार्दिक बधाई।