| बारिश की कविताएँ अदनान कफ़ील दरवेश |
१.
बारिश की आवाज़
मूसलाधार बारिश में
भीग रहा था शहर
जब मैं स्टेशन से घर लौट रहा था
रिक्शेवाले ने अचानक
ठण्डी सड़क की ओर
रिक्शा मोड़ दिया
यह सड़क पेड़ों से इस तरह ढकी थी
जैसे किसी ने
सितारों का हरा आँचल
फैला दिया हो
वह हाँफते हुए
तेज़-तेज़ रिक्शा चला रहा था
जैसे मुझसे भी पहले
उसे घर जाना हो
इतने में कहीं से एक जुगनू
मेरी कमीज़ पर
ऐन दिल के पास आकर बैठ गया
और मेरा दिल
बत्ती की तरह जलने-बुझने लगा
मैंने घड़ी निकाली
और उसे एक घंटा पीछे कर दिया
मेरे हाथ ठंड से काँपने लगे
जब मेरी शर्ट
पीछे से भी गीली हो गयी
और मैंने हवा में हाथ घुमाकर लिखा
बारिश से भी मीठी है
बारिश की आवाज़!

२.
रात में बारिश
पानी पर सिर्फ़
पानी के निशान थे
जहाँ तुमने हाथ रखा था
वहाँ पर भी
पुल के नीचे से
अंगुल भर बहता पानी
फुसफुसा रहा था
दूर पेड़ों के पीछे
दूसरी पहाड़ी पर
एक पत्थर के घर से
लालटेन की रौशनी टिमटिमा रही थी
शहर की कोई आवाज़ नहीं थी
सिवाय घर लौटते
राहगीरों के क़दमों की आवाज़ के
पानी को पानी पुकार रहा था
और पेड़ ध्यान में डूबे थे
तभी एक ज़ोर की आंधी ने
उन्हें जगा दिया
उन्हें याद आया वे
ख़ुद पानी से बने थे
वे अब हमारी बातों में शरीक थे
मैंने काले आसमान की तरफ़ इशारा किया
तुमने उसे देखते ही कहा
बारिश !!!
और बारिश होने लगी

३.
बारिश का रण
तेज़ बारिश में
तुम्हारा हाथ थामे
बस-स्टॉप की तरफ़
दौड़ रहा हूँ
तुम्हारी चुनमुनी पीली छतरी में
दो लोग
आधे-आधे ही समा सकते हैं
इसलिए अच्छा है
मैं बिना छतरी के ही
तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँ
उफ़्फ़!
पानी की तलवारें हैं
कि चलती ही जा रही हैं
मुझे पानी का मीठा ज़ख़्म लगाती हुईं
इस रण में
तुम्हारी हथेली का कवच ही
बहुत है मुझे
बस थामे रहना मेरा यह हाथ
जब गिरूँ
बस स्टॉप पर
लतपथ-श्लथ!
४.
तुम कहाँ हो?
जैसे सिनेमा का टिकट भीगता है
बारिश में
वैसे भीगता है ये शहर
एक हूक भीगती है भीतर
चुपचाप अपने होंठ फरकाती
मेरी कमीज़ भीगती है
जैसे भीगता है कपास का कोई फूल
आधी भीगी बालकनी पर
भीगती है एक ख़ुशनुमा रात
एक गीत भीगता है अपने सुरों में तरबतर
मेरी आँखों में
आसमान की मेहराबों पर भीगता है
नीला चंद्रमा
ठेस लगे दिल की मानिंद
पीले छाते की मूठ भीगती है
पुरानी आदतों की तरह
एक सफ़ेद घोड़े के भीगते हैं अयाल
सुल्तानगढ़ी के खण्डहरों में
धुंध में डूबी
भीगती है एक सुनसान सड़क
हरे पेड़ों से ढकी
सावन में भीगती है
फूल की तरह मेरी आत्मा
5.
सावन के दिन
नौकरी के इश्तहार पढ़ने में
भूल चुका था
ये सावन के दिन हैं
और बारिश ने तरबतर कर दिया
उस रात जब घर लौटा
बिना खाये ही सो गया
और सपने में
घर का रास्ता भूल गया

६.
आ जाना
इन्हीं सुनसान सड़कों पर धँस कर
चट से टूट जाएगा मेरा दिल
हवा में सफ़ेद रूमाल की तरह
लहराएंगे मेरे ये बेजान हाथ
तुम्हारी याद के भारी पत्थर
नशेब में लुढ़क जाएँगे
पेड़ सहसा चौंक पड़ेंगे
भूल जाऊँगा थोड़ी देर के लिए
कि कितना जटिल है जीवन
और साँसें कम-कम
अगर बारिश होने लगे
तो सुनो !
तुम भी आ जाना
७.
पीली बारिश
सूरज का टूटा हुआ रथ
मलगजे आसमान पर घिसट रहा है
और पीछे मेंह बरस रहा है
बादलों की इस घन-गरज में
बच्चों की आवाज़ें पिघल रही हैं
और बैठकों और दीवानख़ानों से
ख़ुशगप्पियों की लपटें आ रही हैं
मोम-गरों की गली से एक लिफ़ाफ़े में
मोमबत्तियाँ लिए मैं
घर की तरफ़ लौट रहा हूँ
और बारिश मेरे पीछे-पीछे
दौड़ लगा रही है
अब देखना ये है
कि इनमें घर पहले कौन पहुँचता है!
8.
जुलाई में बारिश
जब विभाग से बाहर निकला
मैं अपमान और शर्म से पानी-पानी था
यह जुलाई का उमस से भरा मौसम था
मैं जैसे ही आगे बढ़ा
बारिश ने आ लिया
मेरे पास छाता तो था
लेकिन मैंने उसे नहीं ताना
मैं बारिश में भीगता रहा
एक पेड़ की तरह
चुपचाप
इत्तेफ़ाक़न
पहली बार बारिश ने
मेरी लाज रख ली.

९.
दिल्ली में बारिश
जब मेरी नींद खुली
बारिश हो रही थी
मैं कपड़ों को उठाकर अंदर ले आया
खिड़की बंद की
जो कैसे भी पूरी तरह से
बंद नहीं होती थी
मैंने समय देखा, रात के तीन बज रहे थे
बारिश बढ़ती जा रही थी
अब उसने कमरे में घुसने की कोशिश की
मैंने उसे कपड़े लगाकर रोका
मुझे एहसास हुआ बारिश मेरे लिए आई है
उसे रोकना फ़िज़ूल है
मैं बाहर निकल आया
और बारिश में पूरी तरह भीग गया
अब बारिश मेरे सपने में मुझे भिगोना चाहती थी
जहाँ मैं मिट्टी के बर्तन बना रहा था
मैंने अपना कारोबार समेटा
लेकिन पानी ने मुझे मौक़ा नहीं दिया
सब धुल गया
मिट्टी के अंदर से, पत्थर की नोक उभर आई
और घर काँपने लगा
मैं समझ गया बारिश बुनियाद तक पहुँचना चाहती है
बारिश ने लैम्प गुल कर दिया
और टिन-शेड को
हवा के साथ उड़ाने की कोशिश की
मैं दहल गया
पिता ने कहा— कोई बात नहीं
मैं पैर समेट कर एक कोने में बैठ गया
मैंने देखा
पिता की सफ़ेद दाढ़ी बौछार में भीग रही थी
और सामने की दीवार पानी से तरबतर थी
अचानक बिजली चमकती थी और मैं डर जाता था
बिजली की चमक में घर अधिक दयनीय लगता
उसकी पुरानी शहतीरें फूल रही थीं जिनसे पानी टपकता
एक बिल्ली के रोने की आवाज़ आती
आँगन में गुलाब और साइकिल भीगते
मेरी रबड़ की चप्पलें भीगतीं
मेरी काग़ज़ की नाव भीगती
पानी पानी पर चलते हुए
घर की ड्योढ़ी को छूता
हमें और कुछ नहीं सूझता
कितनी बारिशों में मैं भीगा
स्कूल जाते हुए जोंकों से मिलते हुए
कमल का फूल तोड़ते हुए
मछलियाँ पकड़ते हुए
सिंघाड़े तोड़ते हुए
बारिश के बाद,
पेड़ों की बारिश के छींटे खाये
जिन्हें अचानक हवा ने छेड़ा था
बारिश में आन्हीं-बूनी और चिरैय्या के ढोल बजाए
नाचे-गाये
बारिश हाथी पर सवार हो आती
बारिश में मैं ख़ुश होता
और बाज़ दफ़े रोता भी
वह आती रही
आती रही पूर्ववत्
मेरा हालचाल लेने हर बार
यहाँ तक कि मैं ही भूल गया दिल्ली में
बारिश की वह पुरानी दिलकश आवाज़ भी
10.
बारिश से मुलाक़ात
इस शहर में सबसे अप्रत्याशित था
बारिश का आना
जब मैं ऑफिस जा रहा था
उसका दूर-दूर तक कोई आसार न था
जब मैं शाम को घर लौट रहा था
वह अचानक आ गयी
मैं हिसाब-किताब और भविष्य की योजनाओं में लगा था
अपनी ज़रूरतों की फ़ेहरिस्त से
कम-ज़रूरी चीज़ें काटता हुआ
तरकारी लेने की सोच में पड़ा हुआ
या यह सोचता हुआ
कि आख़िर कब तक यह दुनिया नहीं बदलेगी
जबकि मैं कितना बदल गया
इतने में ही बारिश ने मुझे
मुख़ातिब करके पूछ लिया
क्या तुमने मुझे पहचाना?
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अदनान कफ़ील दरवेश ठिठुरते लैम्प पोस्ट, नीली बयाज़ तथा ‘लानत का प्याला‘ कविता संग्रह राजकमल से प्रकाशित. ‘भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार’ (2018), ‘रविशंकर उपाध्याय स्मृति कविता पुरस्कार’ (2018), ‘वेणुगोपाल स्मृति कविता पुरस्कार’ (2019-2020) से सम्मानित |




अजब इत्तेफ़ाक़ है, बाहर रात से बरस रहा है।ऐसे में समालोचन की पोस्ट में। अदनान कफ़ील की दरवेशना अंदाज़ में शराबोर कविताएं पढ़ीं। कविताएं दरवेशना सही,लेकिन इसमें कफ़ील की होशयारी भी नुमायां है। शुक्रिया सुसंगत कलाकृतियों के लिए भी।
यह बहूत ही सहज और शानदार कविताएँ है। मुझे बहूत पसंद आई। अदनान की खामोशी जैसी है। एक रात मैं मिला था इससे, उस वक़्त बारिश नही हो रही थी। उस रात की बारिश
मुझ पर आज हुई है
चौथी कविता का वितान बहुआयामी है।
नौवीं कविता में अनेक बारिशें हैं।
सब तरफ़ स्मृतियों के छींटे हैं।
बढ़िया कविताएँ हैं। सभी।
अदनान काफिल दरवेश जी की कविताएं विविध आयामों से होकर गुजरती है बारिश को जितने अंदर तक उन्होंने महसूस किया है वहीं बारिश के थपेड़ों का संघर्ष भी लिखते है बारिशमे प्रेयसी का हाथ थामे रहना ही काफी तो ,नौकरी के संघर्ष से जूझते हुए बारिश, तो बारिश के दिनों में गुरबत की व्यथा, जटिल जीवन में बारिश सा साथ आहा खूब चित्रण बहुत मुबारक!
हरहराती और बलखाती बरसाती नदियों की तरह इन कविताओं का प्रवाह है, गति है, क्षिप्रता और काट है। यह जितनी तेज़ी से हमारी सुप्त चट्टानी कगारों को काटती है उतना ही दीर्घ और विलंबित इसका असर होता है। कई बार ये कविताएँ उफान और आवाज़ के साथ गति करती हैं और कई बार बेआवाज़ चुपचाप बहती रहती हैं पर भीतर ही भीतर हमारे कुछ जड़ हो चुके अनुभव-अंशों को काटती और छीलती चलती हैं, उन्हें नया नया रूप देती हैं। दरवेश की कविताओं में प्रवाह बहुत अधिक है। धार भी खूब है। यह और धारदार हो यदि कहीं एक जगह रुककर उसपर शान चढ़ाई जाय।
अदनान की यह कविताएं धीरे धीरे खामोशी के साथ बरसती बारिश की तरह ही है । मुझे एक मित्र की कही हुई बात याद आती है ” जब बारिश धीरे धीरे होती है तो लगता है कोई सुबक सुबक कर रो रहा है।” अदनान की इन कविताओं में बारिश के हमारे जाने पहचाने चित्र हैं । इनमें बिल्ली की आवाज़ है, आंगन में भीगती साइकिल और भीगते गुलाब हैं, वहीं कहीं जेहन में हिचकोले खाकर चलती काग़ज़ की नाव है । जीवन की आपाधापी में हम ऐसी बारिशों को भूलते जा रहे हैं ।इसीलिए बारिश पूछती है आजकल “क्या तुमने मुझे पहचाना?” कविताओं को अनावश्यक शब्दावली और भारी भरकम बिम्बो से लाद देने के इस दौर में ऐसी सहज सरल कविताएं बहुत देर तक मन को भिगोती रहती हैं –शरद कोकास
बारिस में कवि के अमिट हस्ताक्षर
अदनान भाई की कविताएं मैंने पढ़ी अच्छी लगी, आपने कुछ अप्रत्याशित प्रयोग किए हैं जैसे बारिश हो रही है जुगनू आकर आपके दिल पर बैठ जाता है, बारिश हो रही है सितारे दिखाई दे रहे है,रात के 3:00 बजे,अच्छी बात है ,इससे आपकी प्रयोगधर्मिता और साफ होती है,नीरज का एक बड़ा मशहूर गाना है,जो आज भी बजता है तमाम साहित्यिक कमजोरी के बावजूद,झिलमिल सितारों का आंगन होगा, रिमझिम बरसता सावन होगा तमाम आलोचनाओं के बावजूद भी बजता है और लोग बड़े प्रेम से ही गाते हैं और स्वीकार करते हैं आपको साधुवाद
Kya likhte hai. Bahut badhiya
Aisa l
agta jaise ye meri Rachana Jis Tarah Barish Ki Vyakhya ki gai hai lajawab
Aap ISI Tarah likhate rahiye
पानी की तलवारें हैं
कि चलती ही जा रही हैं
मुझे पानी का मीठा ज़ख़्म लगाती हुईं….।
बढ़िया कविताएं हैं।
अदनान कफ़ील दरवेश जी की कविताएं प्रभावित कर गई। इनमें सौंदर्य भी है और संवेदनाएं भी। यह होती कविता की खरी बुनावट। अभिनंदन कवि