| युद्ध के विरुद्ध सविता सिंह की कविताएँ |
शैतान नहीं
सुबह-सुबह उठते ही धुआँ-धुआँ सा भीतर से कुछ उठा
कहीं कुछ नेस्तनाबूद हुआ
अभी ठीक से आँख भी न खुली थी
जले पंखों वाली एक चिड़िया खिड़की के पास गिरी
उसमें जान कम हिम्मत बहुत थी
वह जीवित थी मगर काँप नहीं रही थी
मैं उसे उठाकर भीतर ले आई
ठीक से देखा तो जाना
यह तो कब से मेरे भीतर की
चिड़िया है
अभी दिखती मेरी किसी दूर की बहन जैसी घायल
तभी आते दिखे ढेर सारे बच्चे
उनके कंकाल बल्कि
और हिरणों का एक जोड़ा
उनको संरक्षण देता
मैं ठीक से जगी और सोचा कहाँ क्या हो रहा है?
बच्चों ने कहा हमारे ख़िलाफ़ अमेरिका और यूरोप में युद्ध हो रहा है
ग़ज़ा में हम भूख और बमों से मारे जा रहे हैं
हमारी तस्करी हो रही है
मैं हिली हुई मोबाइल के स्क्रीन पर देखती हूँ
लिखा है खाड़ी में युद्ध हो रहा है
ग़ज़ा वाला नरसंहार अब भीषण युद्ध में बदल गया है
मैं क्या करूँ इस चिड़िया का बच्चों और हिरणों का?
अभी सोच ही रही थी कि एक और ख़बर आई
लाखों कौवों का तेल अवीव के आसमान में मंडराने की
हिचकॉक की फ़िल्म बर्ड्स का मंज़र सामने आ गया
अपशकुन ज़रूर होने वाला है
कुछ सचमुच भयानक होगा
शैतान मरेगा परन्तु साथ में मारेगा भी बहुतों को
मृत्यु नाच रही है आसमान में अपना ग्रास ग्रहण करने
जली चिड़िया ने आख़िर अपनी चुप्पी तोड़ी कहा
“हो सकता है नए फूलों के उगने की बारी है पृथ्वी पर अब
हो सकता है मारे गए लाखों बच्चे फिर से जन्म लें
पूरी करें अपनी जीवनगाथा”
मैं सुबह-सुबह धुआँ देख रही हूँ
बच्चे चिड़िया हिरण और कौए भी
मैं शैतान को संघर्ष करते देख रही हूँ
और मृत्यु को मंडराते भी
मैं आसमान देख रही हूँ और कह रही हूँ
अब और युद्ध नहीं
शैतान नहीं
मलूक-अल-अरबिया नहीं
अब पृथ्वी और फूल हों साथ
धड़कता हुआ जीवन
जीव-जंतु सुकून और शांति हो
चिड़िया ने “हाँ” कहा
और दम तोड़ दिया
सोचती हूँ यह कैसी सुबह रही मेरे लिए!
सच का कैसा घायल रूप दिखा अभी!

यह युद्ध को जानने का समय है
इतने कम लोगों को मैं जानती हूँ
कि भौचक रहती हूँ
जीवों से भरी इस दुनिया में
कैसे रहती रही हूँ?
कैसे कटता रहा सारा जीवन?
जो थोड़े जानने में आए
उन्हें भी बस उतना ही जानना चाहा
जितना से न भंग होती हो उनकी निजता
बेशक कुछ पेड़ों पक्षियों
या फिर तारों को अधिक जाना
उनका भरोसा भी रहा
विराट को ही जानने में खपाती रही
सारी ऊर्जा सारी जिज्ञासा
शायद बेवजह
याद करती हूँ मगर एक वाक़या
कितनी बार घर के दालान में
लटके पिंजरे में बंद तोतों को उड़ा दिया
वे यही चाहते थे
घर के लोगों को समझा दिया
कोई किसी की क़ैद में नहीं रहना चाहता
किसी को जबरन हथिया लेना
एक अन्याय है
जैसे एक देश का दूसरे की संपदा हथिया लेना
एक अन्याय ही
मुक्त हुए पक्षी के लिए शोक मनाना
आत्मदया से अधिक कुछ नहीं
न ही दूसरे की अस्मिता लूट लेने में विफल हो जाना
क्रोध और दुःख के उचित कारण
‘रश्मिरथी’ सस्वर पढ़ने वाले हमारे चाचा
कर्ण के लिए दग्ध
अर्जुन की वीरता पर मुग्ध
परशुराम से खिन्न
कृष्ण के विराट रूप का बखान करने वाले
एक तोते के मुक्त हो जाने की पीड़ा को
नहीं छिपा पा रहे थे
मगर उनको जानने के लिए यही काफ़ी नहीं था
मुझे लगता रहा है उन्हें और ठीक से जानूँ
एक पुत्र की लालसा में
उन्हें झुलसते भी देखा है
पेड़ों-बागों में चुपचाप
अपनी नियति पर विचार करते
विचरते भी देखा है
उन्हें इस तरह जानना
अकूत संपदा से भरी इस दुनिया के लिए
स्पृहा करते एक पुरुष को भी
एक तरह से जानना है
एक त्रासदी
जहाँ गहरे अफ़सोस की तरह
किसी की छाती में गड़ जाती है
“हाय यह मेरा न हुआ!”
मगर मुझे कुछ और भी जानना चाहिए
यदि मुझे नहीं डूबना है अनस्तित्व में
जैसे मुझे उनके बारे में ठीक से जानना है
जो पराजित होते हैं
या वे जो नहीं होते
और युद्ध करते हैं
जो धरती को लाल कर देते हैं
और पश्चाताप नहीं करते
जो दूसरे मुल्कों की रीढ़ तोड़ देते हैं
उनके बच्चों को खा जाते हैं
जो शैतान की पूजा करते हैं
और ख़ुद को हैवान नहीं मानते
मैं कितना कम जानती हूँ इस दुनिया को
जिसमें मैं रहती हूँ
इस बात से उद्विग्न होती रहती हूँ
और आजकल हैरान भी
अब भी मानती हूँ
मैं तारों से बातें कर सकती हूँ
अपनी लाल धरती के बारे में
अपने सगे संबंधियों के बारे में
उनके लोभ-लालच के बारे में
धरती पर होती क्रूरताओं के बारे में
नष्ट होती जाती इस दुनिया के बारे में
मैं बातें कर सकती हूँ.
एक और युद्ध
जब सुबह उठी वह स्त्री
जो पिछले दस सालों से
ठीक इसी समय उठती रही है
तो उसे स्मरण आईं उसकी माँ बहनें
दादियाँ परदादियाँ भी
आख़िर वे भी ऐसे ही जगती रही हैं
भिनसारे
चूल्हा जलाने भात पकाने
तभी तो आज तक
उन्हें जीवन एक संग्राम ही लगता रहा है
न जाने कब बातों के तीर चलने लगें
लातें मिसाइलों-सी गिरने लगें
घरनिकाला की भी नौबत आ टपके
गर् वह सूरज निकलने के बाद उठे
इस संसार में
एक स्त्री हर रोज़ सुबह-सुबह उठती है
हाथ मुँह धोती है
और जीवन संग्राम में जुट जाती है
यह युद्ध कोई नहीं देखता
बस एक चिड़िया देखती है
छज्जे पर बैठी हुई
वह जानती है
इस स्त्री के घर में
सबका जीवन
इसी की मेहनत और मृत इच्छाओं से चलता है
एक ज़रा चूँ नहीं निकलती
कोई धुआँ नहीं उठता
वह एक सैनिक बनी
चलाती रहती है
टैंकनुमा कोई बैलगाड़ी
वाक़ई
यह सब करतब कोई नहीं देखता
उस पर सवार लोग तो और भी नहीं
यह भी एक युद्ध है
कब से चलता हुआ
जिसमें स्त्री के सिवाय
कोई और नहीं मरता.
आख़िरी बार
कब शाम ढली
कब हुआ हल्का अँधेरा
कब चिड़िया और पशु लौट गए
अपने आवासों में
कब एक इंसान सोचने लगा हिंसा के बारे में
तूफ़ान और तेज़ बारिश में भी
घोड़े की पीठ पर बैठ
युद्ध के मैदानों में भागते जाते पूर्वजों के बारे में
कब तय हुआ
अमानवीयता अपराध नहीं
मनुष्य जीवन में?
उसकी चीख़ की वैधता नहीं रणभूमि में
वह मामूली आवाज़ों के दर्जे में
कब डाल दी गई?
कब शांति के लिए
एक स्त्री का रुदन
बेमतलब हो गया?
सहस्र वर्षों का इतिहास देखती हूँ
पुरुष युद्ध करने से
ख़ुद को बचा नहीं पाए
मनुष्य बनने से हर पल डरते रहे
उन्हें ईश्वर बनना
ज़्यादा सुरक्षित लगता रहा
पूर्ण होने के लिए
हिंसा ही उपयुक्त थी
अकेले उन्होंने कैसे तय कर लिया
कोई बुद्ध कोई महावीर
उनके अपने नहीं हो सके?
अब हम जहाँ पहुँचे हैं
वहाँ आग ही आग है
प्रकृति का शायद अंतिम कोलाहल
जीत और मृत्यु
एक साथ दौड़ रहे हैं
जीवन अपना तर्क हार रहा है
आसमान लाल से काला हो चुका है
धरती एक लाल ग्रह बन रही है
मंगल की तरह गर्म और बंजर
हवा गुमसुम है
बच्चे घबराए हुए
बमों के धमाकों से दम तोड़ रहे हैं
चींटियाँ अभी ग़ायब हैं
दूसरे जीव अभी दिखते नहीं
सब कहते हैं समुद्र उमड़ रहे हैं
प्रलय नज़दीक है
चलकर आख़िरी बार आसमान देख आएँ
धरती के खनिजों को बता आएँ
उनके लिए क्या कुछ नहीं हो गया
इस पृथ्वी पर!
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सविता सिंह का जन्म फरवरी, 1962 को आरा, बिहार में हुआ. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एम.ए., एम.फिल., पी-एच.डी. की. मांट्रियाल (कनाडा) स्थित मैक्गिल विश्वविद्यालय में साढ़े चार वर्ष तक शोध व अध्यापन किया. ‘भारत में आधुनिकता का विमर्श’ उनके शोध का विषय रहा. सेंट स्टीफेन्स कॉलेज से अध्यापन आरम्भ करके डेढ़ दशक तक उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाया. वे अमेरिका के इंटरनेशनल हर्बर्ट मारक्यूस सोसायटी के निदेशक मंडल की सदस्य एवं को-चेयर हैं. उनके प्रकाशित कविता-संग्रह हैं—‘अपने जैसा जीवन’ (2001), ‘नींद थी और रात थी’ (2005), ‘स्वप्न समय’ (2013), ‘खोई चीज़ों का शोक’ (2021), ‘वासना एक नदी का नाम है’ (2024), ‘प्रेम भी एक यातना है’ (2024). दो द्विभाषिक काव्य-संग्रह ‘रोविंग टुगेदर’ (अंग्रेज़ी-हिन्दी) तथा ‘ज़ स्वी ला मेजों दे जेत्वाल’ (फ्रेंच-हिन्दी) (2008). उड़िया में ‘जेयुर रास्ता मोरा निजारा’ शीर्षक से संकलन प्रकाशित. ‘प्रेम भी एक यातना है’ का उड़िया अनुवाद प्रकाशित (2021). अंग्रेज़ी में कवयित्रियों के अन्तर्राष्ट्रीय चयन ‘सेवेन लीव्स, वन ऑटम’ (2011) का सम्पादन जिसमें प्रतिनिधि कविताएँ शामिल. ‘पचास कविताएँ : नई सदी के लिए’ चयन शृंखला के तहत प्रतिनिधि कविताएँ प्रकाशित. प्रतिरोध का स्त्री-स्वर : समकालीन हिन्दी कविता, सम्पादित (2023, राधाकृष्ण प्रकाशन). ल फाउंडेशन मेजों देस साइंसेज ल दे’होम, पेरिस की पोस्ट-डॉक्टरल फैलोशिप के तहत कृष्णा सोबती के ‘मित्रो मरजानी’ तथा ‘ऐ लड़की’ उपन्यासों पर काम प्रकाशित. राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में ‘रियलिटी एंड इट्स डेप्थ : ए कन्वर्सेशन बिटवीन सविता सिंह एंड रॉय भास्कर’ प्रकाशित. आधुनिकता, भारतीय राजनीतिक सिद्धान्त और भारत में नारीवाद आदि विषयों पर तीन बड़ी परियोजनाओं पर काम जारी. ‘पोएट्री एट संगम’ के अप्रैल 2021 अंक का अतिथि-सम्पादन. ‘खोयी चीज़ों का शोक’ का बंगला तथा मराठी अनुवाद इसी वर्ष छपा है:‘हारिये जावा जिनिसेर शोक’ (भाषा संसद प्रकाशन), मराठी में : ‘हारवालेला वस्तूंचा शोक’ (कॉपर क्वाइन, 2024). कई विदेशी और भारतीय भाषाओं में कविताएँ अनूदित-प्रकाशित. कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में कविताएँ शामिल और उन पर शोध कार्य. हिन्दी अकादमी और रजा फाउंडेशन के अलावा ‘महादेवी वर्मा पुरस्कार’ (2016), ‘युनिस डि सूजा अवार्ड’ (2020) तथा ‘केदार सम्मान’ (2022) से सम्मानित. सम्प्रति इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) में प्रोफेसर, स्कूल ऑव ज़ेंडर एंड डेवलपमेंट स्टडीज़ की संस्थापक निदेशक. |




यह युद्ध कोई नहीं देखता
बस एक चिड़िया देखती है
छज्जे पर बैठी हुई…..अच्छी कविताएं है।
मन के भीतर मन में ठहर जाने वाली कविताएँ।
बहुत सुन्दर कविताएँ हैं। आभार कवि और समालोचन।
सविता सिंह की कविता-शैली में निजी संवेदना एक व्यापक राजनीतिक चेतना में रूपांतरित हो जाती है।ये कविताएं एक ‘आंतरिक प्रतिरोध’ की शैली में है। निजी ही राजनीतिक है। चिड़िया, बच्चे, युद्ध, स्त्री आदि प्रतीकों का उनका प्रयोग अत्यंत बहुस्तरीय है, जो दृश्य और अदृश्य दोनों तरह के हिंसक यथार्थ को एक साथ उद्घाटित करता है। मानो जैसे हर सभ्यता का दस्तावेज़ होता है , वैसे ही ये कविताएं बर्बरता का दस्तावेज़ हैं। इन कविता में नैरेटिव प्रवाह और दार्शनिक चिंतन का संतुलन है, जो आजकल कम दिखती है।
सविता जी ने युद्ध को सूक्ष्म ( घर- परिवार तथा निकट जीवन ) से वृहत्तर स्तर पर हिंसा की पराकाष्ठा के रूप में देखा है। प्रत्यक्ष व व्यापक हिंसा के तंतु रोजमर्रा की संरचनागत हिंसा से भी जुड़े होते हैं और उन्ही का वृहत्तर प्रतिफलन होते हैं। जैसा कि कहा जाता है, युद्ध के सर्वाधिक पीड़ित स्त्री, बच्चे और जीव- जंतु होते हैं, इन कविताओं में भी यह परिलक्षित है। सविता जी की कविताओं में आर्द्रता और आक्रोश स्वाभाविक रूप से अन्तर्लयित होते हैं।
सविता सिंह की ये कविताएँ युद्ध का विरोध मात्र नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना की पुनर्स्थापना का प्रयास हैं।चिड़िया, बच्चे, हिरण और कौए—ये सभी मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं जिसमें युद्ध केवल भौगोलिक घटना नहीं, बल्कि अस्तित्वगत संकट बन जाता है।
ग़ज़ा, खाड़ी, और वैश्विक संदर्भों का उल्लेख कविता को समकालीन राजनीतिक यथार्थ से जोड़ता है, परन्तु उसकी अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष न होकर प्रतीकात्मक और संवेदनात्मक है।ये कविताएँ सत्ता, हिंसा, प्रकृति और स्त्री-अस्तित्व के जटिल अंतर्संबंधों को उजागर करती हैं।
विनाश और हिंसा के भरे समय के संदर्भों से गहन रूप से जुड़ी सविता सिंह की ये कविताएं बहुत प्रभावशाली हैं। इनमें जो विकलता है वह सार्वजनिक समय और व्यक्ति मन के भेद को मिटा देती है।समाचारों और खबरों से ढकी हुई दुनिया के बीचों बीच कविता का जो स्पेस हो सकता है, जो अभी भी बचा हुआ है , और शायद वह दौर में बचा रहेगा, उस स्पेस की याद दिलाने वाली कविताएं हैं । अनुभूति का यह संसार एक हिंसक समय के व्यापक संदर्भ , जीव जगत , प्रकृति से जुड़ी वेदना और दैनंदिन की दुनिया के उन इलाकों से उठा है जहां समय के अंतर्विरोधों के तमाम कोने अंतरे हैं। सविता जी को इन सशक्त कविताओं के लिए बधाई दी जानी चाहिए।
समसामयिक भी।
इनके केंद्र में व्यग्रता और करुणा है।