| जेन ज़ी के लिए कविताएँ शैलेन्द्र चौहान |
1.
ऐतराज
उन्हें
जेन जी की गालियाँ पसंद नहीं.
उन्हें पसंद हैं
सदियों से चली आती
सभ्य मुस्कानें
जिनके पीछे
छिपी रहती हैं
जातियाँ, ऊँच-नीच, स्त्री के लिए नियम
पुरुष के लिए छूट
और धर्म के नाम पर सजा हुआ पाखंड
दोहरे मानदंड.
वे कहते हैं
“बेटा, भाषा ठीक रखो.”
कोई उनसे पूछे
भाषा पहले बिगड़ी या समाज?
किसने सिखाया
कि अपमान को संस्कार कहा जाए
और विरोध को असभ्यता?
युवाओं की ज़ुबान पर उन्हें ऐतराज़ है
पर अपनी सदियों पुरानी गालियों पर नहीं
जो कभी जाति बनकर निकलीं
कभी लिंग बनकर
कभी धर्म बनकर
कभी सत्ता बनकर.
वे शब्दों को कटघरे में
खड़ा करते हैं
और इतिहास चुपचाप
उनकी ओर देखकर मुसकुरा देता है.
क्योंकि हर पीढ़ी जानती है
गाली हमेशा मुँह से नहीं निकलती
कभी-कभी पूरा समाज ही
एक गाली की तरह जीया जाता है.
2.
हाँ, मैं भी..
हाँ, मैं भी गालियाँ देता हूँ
लेकिन किसी की माँ को नहीं
किसी की बहन को नहीं
किसी स्त्री के अस्तित्व को
अपमानित करके नहीं.
मेरी गालियाँ
उन सिंहासनों के लिए हैं
जो झूठ को संविधान की तरह पढ़ते हैं
उन चेहरों के लिए
जो मुस्कान में छल छिपाए रखते हैं.
मैं गाली देता हूँ
भूख पर भाषण देने वालों को
रोटी छीनकर
उपदेश बाँटने वालों को
नफ़रत की खेती कर
शांति का पुरस्कार लेने वालों को.
मेरी गालियाँ
शब्दकोश की अश्लीलता नहीं
समय की चोट हैं.
वे उस क्षण जन्म लेती हैं
जब अन्याय
सभ्यता का मुखौटा पहन लेता है.
हाँ,
मैं भी गालियाँ देता हूँ
क्योंकि हर बार
संयम ही सबसे बड़ा सद्गुण नहीं होता
कभी-कभी
प्रतिरोध का पहला शब्द
गुस्सा होता है.
और अगर
मेरी भाषा तुम्हें असभ्य लगती है
तो ज़रा उस व्यवस्था की भाषा भी सुनो
जो रोज़
बेरोज़गारी को सपना
लूट को विकास,
और चुप्पी को राष्ट्रभक्ति कहती है.
यक़ीन मानो
मेरी गालियाँ
उस झूठ से कहीं कम हिंसक हैं
जो हर दिन
लाखों लोगों के जीवन पर लिखा जाता है.
मैं भी गालियाँ देता हूँ
पर मनुष्य को नहीं
मनुष्यता के शत्रुओं को
शब्दों की मर्यादा तोड़ने के लिए नहीं
मर्यादा का गला घोंटने वालों के विरुद्ध.

3.
लड़ाई
लड़ती हुई लड़कियाँ
सिर्फ़ सड़कों पर नहीं होतीं
वे घरों की चौखटों पर भी
हर रोज़ लड़ती हैं.
वे लड़ती हैं
अपनी आवाज़ बचाने के लिए
अपने सपनों के रंग
फीके पड़ जाने से पहले.
वे लड़ती हैं
किताबों के पन्नों में जगह के लिए
विद्यालयों, विश्वविद्यालयों
कारखानों और दफ़्तरों में
बराबरी की एक कुर्सी के लिए.
वे लड़ती हैं
उन नज़रों से
जो उन्हें इंसान नहीं
एक वस्तु समझती हैं.
वे लड़ती हैं
अपने शरीर पर
अपने अधिकार के लिए
अपने निर्णयों पर
अपने हस्ताक्षर के लिए.
उनकी लड़ाई
हमेशा नारों में नहीं होती
कभी वह माँ की चुप्पी में होती है
कभी बेटी के इनकार में
कभी एक छात्रा के प्रश्न में
कभी किसी मज़दूर स्त्री की
थकी हुई हथेलियों में.
वे जानती हैं
कि हर जीत के बाद
एक नई लड़ाई इंतज़ार करती है
फिर भी वे रुकती नहीं.
क्योंकि उन्हें मालूम है
यदि वे हार गईं
तो आने वाली पीढ़ियों की
बहुत-सी लड़कियाँ
जन्म लेने से पहले ही
हार जाएँगी.
इसलिए
लड़ती हुई लड़कियाँ
दरअसल
सिर्फ़ अपना भविष्य नहीं बचातीं
वे बचाती हैं
समाज का विवेक
लोकतंत्र की साँस
और मनुष्यता की सबसे सुंदर संभावना.
4.
वे फिर आएँगे
लाठी-डंडे बरसेंगे
आँसू गैस के गोले छोड़े जाएँगे
पैलेट गन दागी जाएगी
लोहे के जूतों से
सड़कों की छाती कुचली जाएगी
वे फिर आएँगे
हेलमेट, ढाल और आदेश लेकर
मानो लोकतंत्र नहीं
किसी युद्धभूमि पर उतरे हों.
वे समझते हैं
कि खोपड़ियाँ फोड़ देने से
विचार मर जाते हैं
कि आँखें छलनी कर देने से
सपने अंधे हो जाते हैं
उन्हें कौन बताए
इतिहास की आँखों पर
कभी पैलेट गन का असर नहीं हुआ.
जितनी बार
लाठी उठी है जनता पर
उतनी ही बार
सत्ता की नैतिक पराजय लिखी गई है.
खून के धब्बे
बारिश से धुल जाते हैं
पर अन्याय के दाग
पीढ़ियाँ याद रखती हैं
हर घायल छात्र
हर लहूलुहान नौजवान
हर काँपती हुई माँ
हर बेचैन पिता
लोकतंत्र की अधूरी इबारत हैं.
तुम जितनी चाहे
बाड़ें खड़ी कर लो
सड़कों को कँटीले तारों से बाँध लो
आवाज़ों को अपराध घोषित कर दो
अख़बारों में सच की जगह
विज्ञापन छाप दो.
फिर भी
एक दिन
किसी विश्वविद्यालय की सीढ़ियों पर
किसी गाँव की चौपाल में
किसी कारखाने के फाटक पर
किसी किसान की मेड़ पर
कोई फिर कहेगा
जितना चाहे जुल्म करो
मौजूद हमारे सर हैं
सीने हैं
हमने डरना छोड़ दिया है.
5.
जब सत्ता अहंकार ओढ़ लेती है
वे बच्चे
किसी अपनी हार से नहीं मरे थे
उन्हें मारा था उस विश्वास के टूटने ने
कि मेहनत न्याय तक पहुँचती है.
उन्होंने वर्षों तक नींद गिरवी रखी
त्योहारों को किताबों के बीच दफ़न किया
माँ की हथेलियों की गर्मी और पिता के कंधों का भरोसा
अपनी आँखों में लेकर वे परीक्षा हॉल तक पहुँचे थे.
लेकिन लौटे एक ऐसे समय में
जहाँ उत्तर पुस्तिकाओं से अधिक सवालों पर पहरे थे
सत्ता ने कहा “सब सामान्य है.”
जबकि सामान्य तो सिर्फ़ माताओं का विलाप था
पिताओं की चुप्पी थी
और उन कमरों का सन्नाटा
जहाँ मेज़ पर अब भी खुली पड़ी है
मानव शरीर रचना की किताब.
अहंकारी सत्ता कभी आँसू नहीं गिनती
वह आँकड़े गिनती है,
प्रेस विज्ञप्तियाँ लिखती है
सफलताओं के पोस्टर छापती है
और शोक को ‘दुर्भाग्यपूर्ण घटना’
कहकर आगे बढ़ जाती है.
पर एक माँ आज भी
दरवाज़े की आहट पर चौंकती है
एक पिता रात के अँधेरे में
उस कुर्सी को सीधा कर देता है
जिस पर उसका बच्चा आख़िरी बार बैठा था.
वे जानते हैं
मृत्यु सिर्फ़ एक शरीर की नहीं हुई
एक पूरे घर का भविष्य चुपचाप दफ़न हुआ है.
इतिहास गवाह है
जब सत्ता अहंकार ओढ़ लेती है
तो सबसे पहले न्याय की आवाज़ कुचली जाती है.
और जब न्याय की आवाज़ दबती है
तो कई बार बच्चों के सपने
उनकी साँसों से पहले मर जाते हैं.
किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पराजय
युद्ध हारना नहीं
अपने युवाओं का विश्वास हार जाना है.
सिंहासनों पर बैठे लोगों
याद रखो
हर अधूरा सपना
समय की अदालत में तुमसे प्रश्न करेगा
हर माँ का आँसू
तुम्हारे भाषणों से बड़ा दस्तावेज़ होगा
और हर पिता की चुप्पी
तुम्हारी विजय-घोषणाओं से अधिक दूर तक
सुनाई देगी.
6.
ये कैसा स्वप्नभंग?
उस रिज़ल्ट की उस सूची में
सिर्फ़ एक नाम नहीं छूटा था
उनके घर का भविष्य
धीरे-धीरे मिट गया था
जिस मेज़ पर बैठकर
वह रात-रात भर पढ़ता था
वहाँ अब किताबें खुली हैं
पर पन्ने कोई नहीं पलटता
दीवार पर टँगा टाइम-टेबल
अब कैलेंडर नहीं
एक अधूरा जीवन है
नीट की परीक्षा रद्द हुई
समाचार आगे बढ़ गया
पर एक घर में
समय उसी दिन ठहर गया
माँ आज भी
उसके कमरे की धूल
धीरे-धीरे पोंछती है
जैसे कहीं से वह आकर कह देगा
“माँ, मेरी कॉपी कहाँ है?”
पिता देर तक
खाली कुर्सी को देखते रहते हैं
वे आँसू नहीं बहाते,
क्योंकि उन्हें लगता है
अगर वे टूट गए
तो घर की आख़िरी दीवार भी गिर जाएगी
कौन गिनेगा
उन सपनों की उम्र,
जो किसी प्रश्नपत्र से नहीं,
एक व्यवस्था की अव्यवस्था से
दम तोड़ बैठे?
अब उस घर में
रैंक, कटऑफ़ और मेरिट
शब्द नहीं
सिर्फ़ ज़ख्म हैं
हर बार
जब किसी नई परीक्षा की घोषणा होती है
उस माँ के भीतर
फिर एक सिसकी जन्म लेती है
रह गए माता-पिता
हर दिन मरते हैं
अपने ही बच्चे के
सपनों की राख पर चलते हुए
अरे ओ निष्ठुर समय
यदि न्याय कर सकते हो
तो अंकों का नहीं
उन टूटे हुए दिलों का करो
जिन्होंने अपने बच्चों को
डॉक्टर बनने के लिए नहीं
जीने के लिए पाला था
| शैलेन्द्र चौहान 8 फरवरी, 1954 ई. बी.ई. (इलेक्ट्रिकल) विदिशा
कहानी संग्रह: ‘नहीं यह कोई कहानी नहीं’ (1996); संस्मरणात्मक उपन्यास: ‘पांव जमीन पर’ (2010); आलोचना पुस्तक: ‘कविता का जनपक्ष’ (2020); ‘सदी के आखरी दौर में’ कविता संग्रह के बारह कवियों में से एक. संपादन: ‘धरती’ अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका, जिसके त्रिलोचन अंक, गजल अंक, समकालीन कविता अंक, शील अंक, शलभ श्रीराम सिंह अंक चर्चित रहे, श्री रामवृक्ष बेनीपुरी पर ‘सामान्य जन संदेश’ का बहुचर्चित विशेषांक एवं क्रमशः पत्रिका के राम कुमार कृषक एवं संजय कुमार गुप्ता पर विशेष अंक संपादित,सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कुंदनलाल गुप्त, एवं अमर शहीद महावीर सिंह की संक्षिप्त परिचयात्मक जीवनियाँ; अन्य : ‘अभिव्यक्ति’, ‘आपका तिस्ता हिमालय’ और ‘क्रमश:’ पत्रिकाओं में संपादन सहयोग. आप सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में लगातार सक्रिय हैं. संपर्क : 34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर -302033 |

कविता संग्रह: ‘नौ रुपये बीस पैसे के लिए’ (1983), ‘श्वेतपत्र’ (2002), ‘और कितने प्रकाश वर्ष’ (2003), ‘ईश्वर की चौखट पर’ (2004);


क्रूर समय के साथ महीन भाषा का बदलना अपने अधिकारों के साथ बेखौफ खड़े हो जाना जरूरी है।
शैलेन्द्र चौहान की यह पंकतिया सीधे दिल को छू लेती है जिसमें लापरवाह सरकार को चुनौति भी दी गई है; आज की पीढ़ी की ताकत के दर्शन भी कराये; एक बच्चे को खे देने वाली माँ के आसु भी दिखे तो एक जवान बेटा खाने के बुरे पिता का दर्द भी महसूस हुआ।
आज सबेरे उठते ही शैलेंद्र चौहान की जेंन ज़ी के लिए कविताएँ पढ़ी जिन कविताओं ने मन को छू लिया । आज के परिवेश की कठोर और गंदी सच्चाइयों को आईना दिखाती ये कविताएँ एक सच्चे इंसान के मुख निकली ऐसी भावनाएं हैं जिन्हें किसी तरह से नकारा नहीं जा सकता । ये सार्वभौमिक यथार्थ हैं , खुला विक्षोभ है और आम जन जीवन की व्यथा की एक जीवंत छवि है । सरल सहज भाषा में – प्रतीक बिम्बो को गढ़कर कर समय के सच को सामने लेन के लिए शैलेंद्र जी का और समालोचन का हार्दिक आभार ।
अपने समय, उसकी आबोहवा और उसमें विन्यस्त जेन जी की अभी तक अलक्षित चेतना और साहस का क्या खूब संयम से रची काव्याभिव्यक्ति! ये कविताएं चंद तथाकथित शुचिता आग्रहों का प्रतिकार मात्र नहीं है; पूरी समय संवेदना का नाद हैं। शैलेन्द्र जी को बधाई।
भारत वर्ष के लिए सबके समान शिक्षा व्यवस्था,
मौलिक भारतीय इतिहास की अस्मिता, सांस्कृतिक आत्मगौरव, सरस सुसमृद्ध साहित्य, विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र व वैश्विक मानव कल्याण को सृजित,संरक्षित व विकसित करने के मूल मन्त्रवत् विषय वस्तु के साथ विभिन्न वर्गों के सामाजिक प्नश्नों के
सर्व सामयिक व सर्व समावेशी निदान प्रस्तुत करने वाली एक या अनेक कविताओं से लोक हित करने का कष्ट करें।
Kya In kavitaon ko national newspapers, tv par nhi dikhaya jaana chahiye????
Poetry apna kaarya Karti hai.
नहीं, मुद्दा क्या(नीट पेपर) इसमें धर्म सभी बता दिया जो कि अलग है
मुझे ये कविताएँ जेन जी की नहीं लगीं I ये जेन जी पर हो सकती हैं I वो भी एक खास दृष्टि कोण से I ये क्षणिक हैं I वर्तमान से नहीं वर्तमान परिस्थितियों से उद्भूत I
दूसरी बात , लंबी लंबी ये कविताएँ कम, निबंध ज्यादा लगती हैं I
मैं एक जेन जी की कविता देता हूँ I अभी लिखी है:
“कॉकरोच”
मत गरजो मुझे देखकर,
न लाठी साधो।
मुझे अदना भी न समझो।
मुझे डराने की
भूल भी न करना।
मैं रेडिएशन-जयी।
क्या-क्या न आए और गए,
सभ्यताएँ बनीं और ढहीं,
मैं बचा रहा।
तुम्हारे रसायन,
तुम्हारा अहंकार…
सब मेरी जीजीविषा के आगे
पस्त हो जाते हैं।
मुझे छेड़ना मत।
सिर भी काट दो,
मुझे ज़िंदा पाओगे।
प्रकृति ने मुझे
हारना सिखाया ही नहीं।
मैं हर दरार से
तुम्हें देख रहा हूँ।
देवेन्द्र पंत
pant sahib …bura nahin manana Yeh bhi to nibadh jaise hi hain…..bilkul vahi ….jo cocroach ke baare mein sadion se jaante hain…shendar chauhan ki sabhi kavitayein sundr hai ……..aetraj aur ladkian to bahut hi sundr hai
Pankajeshwar
भाई शैलैंद्र चौहान की कविताई को अच्छा रेफरेंस पोईंट मिला है। बहुत साधुवाद। ऐसा नहीं कि शैलैंद्र की कविताई अप्रासंगिक हो ग ई थी। बल्कि वे एक बड़े आलोड़न की प्रतीक्षा में थी। उम्मीद है प्रतिरोध की तरंगें इवाल्व होते हुए आगे फैलें। बहुत आभार इन कविताओं के लिए
अति सराहनीय कविताएं जो हरेक नागरिक को उसकी स्वतंत्रता और अहंकार के बीच की अनचाही मनचाही भावनाओं को उजागर करता है। यहाँ Gen z के रूप में हमें दबे, कुचले, शोषित, वंचित और असहाय लोगों की आवाज बनकर आये अग्रदूत मिल गये। विशेष आभार। 🙏❤️
समय को उसकी सच्चाई के साथ छू लेना, और बगैर लाग लपेट के बयां कर देना, shailendra ji आप हमेशा याद किए जाओगे इन कविताओं के साथ,ये गवाह हैं आज के सच का जिसे बोलने कहने में तथाकथित बुद्धिजीवी डरता है।
सरल और सहज भाषा में लिखी गईं सामयिक व प्रभावशाली कविताएँ।
साथी शैलेन्द्र चौहान जी को इन कविताओं के लिए हार्दिक बधाई। ये वर्चस्ववादी संस्कृति की असलियत को सामने ले आती है। जिन्होंने जाति, लिंग, धर्म आदि के आधार पर गालियों की रचना की और हाशिए के समाज के लिए स्वाभाविक नियति बना दिया, छात्र युवा आंदोलन ने उस पर चोट की है। गालियों, उसकी भाषा को निरपेक्षता में नहीं देखा जाना चाहिए। शैलेन्द्र जी की कविता आज के प्रतिरोध को उसकी परंपरा में देखती है। जेन जी आंदोलन से सामाजिक आंदोलन को नया सांस्कृतिक आधार मिला है।
शैलेन्द्र चौहान की ये कविताएँ पढ़ते हुए सबसे पहले जो बात ध्यान खींचती है, वह यह कि कवि ने अपनी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच एक संवाद स्थापित करने का प्रयास किया है। ये कविताएँ केवल जेन-ज़ी पर लिखी गई कविताएँ नहीं हैं, बल्कि आज के युवा असंतोष, सामाजिक अन्याय, शिक्षा व्यवस्था के संकट और सत्ता-संरचनाओं के प्रति बढ़ती बेचैनी की कविताएँ हैं।
इनका मूल स्वर प्रतिरोध का है। कवि मानता है कि पीढ़ियाँ बदलती हैं, भाषा बदलती है, लेकिन न्याय, सम्मान और बेहतर जीवन की आकांक्षा मनुष्य की स्थायी चेतना है।
जेन-ज़ी की संवेदना से कितना जुड़ती हैं ये कविताएँ?
इन कविताओं की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि ये जेन-ज़ी के नैतिक क्रोध को समझती हैं।
आज का युवा केवल नौकरी या परीक्षा परिणाम के लिए संघर्ष नहीं कर रहा; वह व्यवस्था में भरोसे के संकट से जूझ रहा है। जब वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठते हैं, जब योग्यता और अवसर के बीच दूरी दिखाई देती है, तब पैदा होने वाला आक्रोश इन कविताओं में दिखाई देता है।
“ये कैसा स्वप्नभंग?” और “जब सत्ता अहंकार ओढ़ लेती है” जैसी कविताएँ इस पीड़ा को मानवीय स्तर पर पकड़ती हैं। यहाँ आँकड़ों के पीछे छिपे हुए घर हैं, माता-पिता हैं, अधूरे सपने हैं। “खाली कुर्सी”, “धूल पोंछती माँ”, “मौन पिता” जैसे दृश्य कविता को भावनात्मक शक्ति देते हैं।
इसी तरह “लड़ाई” कविता स्त्री संघर्ष को केवल सड़क के आंदोलन तक सीमित नहीं रखती, बल्कि घर, शिक्षा, रोजगार और आत्मनिर्णय तक ले जाती है। यह कविता आज की युवा स्त्री की आकांक्षाओं से जुड़ती है।
लेकिन क्या ये पूरी तरह आज के जेन-ज़ी की आवाज़ हैं?
यहीं आलोचना का महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है।
इन कविताओं ने जेन-ज़ी के संघर्ष का विषय तो पकड़ा है, लेकिन उसकी जीवन-भाषा को पूरी तरह नहीं पकड़ा।
2026 का जेन-ज़ी केवल सड़कों पर प्रदर्शन करने वाली पीढ़ी नहीं है। उसका आंदोलन सोशल मीडिया, मीम, डिजिटल व्यंग्य, वायरल वीडियो, लाइव स्ट्रीम, AI संस्कृति और इंटरनेट की नई भाषा से निर्मित होता है।
आज का युवा केवल नारा नहीं लगाता, वह मीम बनाता है। वह केवल क्रोधित नहीं होता, वह व्यंग्य करता है। वह गंभीर राजनीतिक प्रश्नों को भी हास्य और डिजिटल रचनात्मकता के माध्यम से व्यक्त करता है।
शैलेन्द्र चौहान की कविताओं में यह डिजिटल संसार लगभग अनुपस्थित है।
ऐसा लगता है कि वरिष्ठ जनवादी कविता की परंपरा से आए हुए कवि ने 2026 के युवा संघर्ष को अपनी वैचारिक भाषा में व्यक्त किया है।
सबसे बड़ा प्रश्न: क्या जेन-ज़ी स्वयं बोल रहा है?
इन कविताओं की एक सीमा यह है कि इनमें जेन-ज़ी विषय अधिक है, वक्ता कम।
कवि युवा पीढ़ी के पक्ष में खड़ा है, उसकी पीड़ा को समझता है, लेकिन युवा की अपनी भाषा, उसका हास्य, उसकी विडंबना और उसकी डिजिटल चेतना कविता में कम दिखाई देती है।
काव्यात्मक शक्ति और सीमा
इन कविताओं की शक्ति इनकी स्पष्ट नैतिक स्थिति है। कवि अन्याय, असमानता, पितृसत्ता और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध बिना किसी संकोच के खड़ा होता है।
लेकिन कई जगह कविता अनुभव से अधिक वक्तव्य बन जाती है। “सत्ता”, “व्यवस्था”, “अन्याय”, “इतिहास” जैसे बड़े शब्द बार-बार आते हैं। कविता कई बार पाठक को सोचने का अवसर देने के बजाय अपना निष्कर्ष पहले ही बता देती है।
श्रेष्ठ राजनीतिक कविता में विचार और कला का संतुलन आवश्यक होता है। मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय या दुष्यंत कुमार की कविताओं में राजनीति जीवन के अनुभवों में घुली हुई दिखाई देती है। शैलेन्द्र चौहान की कविताओं में कई बार राजनीति कविता का मुख्य वक्तव्य बन जाती है।
समालोचन में प्रकाशन का महत्व
इन कविताओं का प्रकाशन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि हिंदी कविता आज भी सार्वजनिक जीवन के प्रश्नों से जुड़ना चाहती है। जब कविता पर निजी अनुभवों तक सीमित होने का आरोप लगाया जाता है, तब ये कविताएँ शिक्षा, लोकतंत्र, युवा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को केंद्र में लाती हैं।
शैलेन्द्र चौहान ने जेन-ज़ी के दर्द, असंतोष और न्याय की आकांक्षा को ईमानदारी से पकड़ा है। उन्होंने युवा पीढ़ी के पक्ष में खड़े होने का साहस दिखाया है।
लेकिन वे जेन-ज़ी की पूरी सांस्कृतिक दुनिया तक नहीं पहुँच पाते।
उन्होंने लिखा है—
* जेन-ज़ी का क्रोध,
* उसका संघर्ष,
* उसका अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध।
लेकिन कम लिखा है—
* उसका डिजिटल हास्य,
* उसकी मीम संस्कृति,
* उसकी भाषा की नई संरचना,
* उसका अकेलापन और तकनीकी युग की मानसिकता।
इसलिए ये कविताएँ जेन-ज़ी के बारे में लिखी गई महत्वपूर्ण जनपक्षधर कविताएँ हैं, लेकिन पूरी तरह जेन-ज़ी की अपनी आवाज़ नहीं बन पातीं।
इन कविताओं की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि एक वरिष्ठ कवि नई पीढ़ी के संघर्ष को खारिज नहीं करता, बल्कि उसके साथ खड़ा होता है। और यही साहित्य की सबसे बड़ी भूमिका है—पीढ़ियों के बीच संवाद का पुल बनना।
आदरणीय शैलेंद्र जी,
ज़ेन जी पर आपकी लिखी हुई सुंदर कविता पढ़कर मन बहुत प्रसन्न हुआ। आपने अपने शब्दों के माध्यम से उनके व्यक्तित्व को अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है। आपकी लेखनी सचमुच प्रशंसनीय है।
इस उत्कृष्ट रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई एवं हृदय से धन्यवाद। ईश्वर करे आपकी कलम यूँ ही प्रेरणादायक और सार्थक सृजन करती रहे।
सादर प्रणाम।
प्रस्तुत कविताएँ समकालीन हिंदी कविता के उस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं जहाँ कविता केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं रह जाती, बल्कि अपने समय की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक जटिलताओं से सक्रिय संवाद करती है। इन रचनाओं का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इनमें प्रतिरोध किसी वैचारिक घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और न्याय की आकांक्षा से उपजता है। कवि का सरोकार सत्ता-विरोध से अधिक मनुष्यता के पक्ष में खड़े होने का है।
इन कविताओं में भाषा अत्यंत सरल, सीधी और संवादधर्मी है। यह सरलता किसी कलात्मक कमी का परिणाम नहीं, बल्कि एक सजग काव्य-रणनीति है। कवि जटिल बिंबों या दुर्बोध प्रतीकों के पीछे नहीं छिपता; वह पाठक से सीधे बात करता है। यही कारण है कि कविता का प्रभाव तात्कालिक होने के बावजूद सतही नहीं होता। हर कविता अपने भीतर एक नैतिक प्रश्न छोड़ जाती है, जिसका उत्तर पाठक को स्वयं तलाशना पड़ता है।
‘ऐतराज’ इस श्रृंखला की केंद्रीय कविता कही जा सकती है। यहाँ पीढ़ियों के बीच भाषा को लेकर चल रहे विवाद के बहाने समाज की गहरी संरचनात्मक हिंसा पर प्रश्न उठाया गया है। कविता का सबसे सशक्त पक्ष यह है कि वह गाली को केवल शब्द नहीं मानती, बल्कि सामाजिक व्यवहार और सत्ता-संबंधों के रूप में देखती है। जाति, लिंग, धर्म और पाखंड को “सदियों पुरानी गालियाँ” कहना अत्यंत प्रभावी काव्य-उद्घाटन है। कविता यह स्थापित करती है कि भाषा की शुचिता का आग्रह तब तक अधूरा है, जब तक समाज की संरचना अपमान और असमानता पर आधारित है।
‘हाँ, मैं भी गालियाँ देता हूँ’ प्रतिरोध की भाषा का नैतिक पक्ष प्रस्तुत करती है। यहाँ कवि अश्लीलता का समर्थन नहीं करता, बल्कि गाली को अन्याय के विरुद्ध आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में पुनर्परिभाषित करता है। “मैं भी गालियाँ देता हूँ, पर मनुष्य को नहीं / मनुष्यता के शत्रुओं को” जैसी पंक्तियाँ कविता को नैतिक ऊँचाई प्रदान करती हैं। इस रचना में आक्रोश है, पर वह अराजक नहीं है; वह विवेकपूर्ण और मूल्यनिष्ठ है।
‘लड़ाई’ स्त्री-अस्मिता और समानता की कविता है। इसकी विशेषता यह है कि यह स्त्री-संघर्ष को केवल सड़कों के आंदोलनों तक सीमित नहीं करती, बल्कि घर, विद्यालय, कार्यस्थल और निजी जीवन की सूक्ष्म लड़ाइयों को भी उतना ही महत्त्व देती है। “कभी वह माँ की चुप्पी में होती है / कभी बेटी के इंकार में” जैसी पंक्तियाँ संघर्ष की बहुआयामी प्रकृति को अत्यंत मार्मिक ढंग से सामने लाती हैं। कविता नारेबाज़ी से बचते हुए सामाजिक यथार्थ को मानवीय संवेदना के साथ प्रस्तुत करती है।
‘वे फिर आएँगे’ लोकतांत्रिक अधिकारों और राज्य-सत्ता के संबंधों पर लिखी गई प्रभावशाली कविता है। इसमें दमन के दृश्य केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि इतिहास की पुनरावृत्ति के रूप में सामने आते हैं। “इतिहास की आँखों पर / कभी पैलेट गन का असर नहीं हुआ” कविता की सबसे यादगार पंक्तियों में से है। यह पंक्ति समय के विरुद्ध मनुष्य की जिजीविषा का रूपक बन जाती है। कविता का आशावाद भी उल्लेखनीय है; वह भय नहीं, प्रतिरोध की निरंतरता पर विश्वास करती है।
श्रृंखला की अंतिम तीन कविताएँ—’जब सत्ता अहंकार ओढ़ लेती है’, ‘ये कैसा स्वप्नभंग?’ तथा परीक्षा-व्यवस्था और युवाओं के टूटे सपनों पर केंद्रित रचनाएँ—संवेदना की दृष्टि से अत्यंत मार्मिक हैं। यहाँ कवि किसी राजनीतिक बहस में नहीं उलझता, बल्कि उन परिवारों के भीतर प्रवेश करता है जहाँ एक असफल या विवादित परीक्षा केवल परिणाम नहीं, पूरे जीवन की दिशा बदल देती है। माँ की प्रतीक्षा, पिता की चुप्पी, खाली कुर्सी, खुली किताब और धूल पोंछती हथेलियाँ—ये सभी बिंब निजी दुःख को सामाजिक त्रासदी में बदल देते हैं।
समग्र रूप से इन कविताओं में तथाकथित “Gen Z की भाषा” नहीं है। बल्कि इनमें समकालीन जनपक्षधर हिंदी कविता की भाषा है। यदि कोई पाठक केवल शीर्षक ‘ऐतराज’ या ‘हाँ, मैं भी गालियाँ देता हूँ’ देखकर यह अपेक्षा करे कि कविता में Gen Z की बोलचाल, इंटरनेट स्लैंग या तीखे अपशब्द होंगे, तो उसे आश्चर्य होगा कि कविताएँ अत्यंत संयत, नैतिक और साहित्यिक भाषा में लिखी गई हैं।
वास्तव में इन कविताओं की भाषा की परंपरा धूमिल, रघुवीर सहाय, गोरख पांडेय और समकालीन जनवादी कविता की संवादधर्मी शैली से अधिक निकट दिखाई देती है, न कि सोशल मीडिया की Gen Z अभिव्यक्ति से।
इसलिए यदि कोई आलोचक इन कविताओं को “Gen Z की भाषा” कहकर खारिज करता है, तो वह संभवतः कविता के विषय (युवा प्रतिरोध) और उसकी भाषा (साहित्यिक, संयमित, नैतिक) के बीच का अंतर नहीं देख रहा है। यहाँ युवा चेतना अवश्य है, पर भाषा अभी भी हिंदी कविता की परिपक्व साहित्यिक परंपरा के भीतर ही संचरित होती है।
कविताओं की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि इनमें आँकड़ों या समाचारों की भाषा नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव की भाषा है। कवि जानता है कि किसी भी सार्वजनिक दुर्घटना का सबसे गहरा प्रभाव उन घरों में दिखाई देता है जहाँ भविष्य अचानक रुक जाता है। इसीलिए उसकी दृष्टि घटना से अधिक उसके मानवीय परिणामों पर केंद्रित रहती है।
शिल्प की दृष्टि से ये कविताएँ मुक्तछंद की परंपरा में लिखी गई हैं। छोटी-छोटी पंक्तियाँ, क्रमिक पुनरावृत्ति, प्रश्नवाचक शैली और संवादात्मक संरचना इनके प्रभाव को बढ़ाती है। इनमें अलंकरण की अपेक्षा विचार और संवेदना का प्रवाह अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह शैली समकालीन हिंदी कविता की उस धारा से जुड़ती है जो पाठक तक बिना किसी अनावश्यक भाषिक आडंबर के पहुँचना चाहती है।
यह संसार किसी एक घटना का नहीं, बल्कि हमारे समय की सामूहिक बेचैनी का दस्तावेज़ है। कवि की दृष्टि व्यक्ति से समाज और समाज से इतिहास तक लगातार विस्तृत होती रहती है।
इन रचनाओं का सबसे बड़ा गुण उनकी नैतिक स्पष्टता है। कवि किसी भी प्रकार की अमानवीयता, असमानता, पाखंड या दमन के प्रति तटस्थ नहीं रहता। साथ ही, वह प्रतिरोध को भी मनुष्य-विरोधी नहीं बनने देता। उसकी चिंता अंततः मनुष्य और उसकी गरिमा को बचाने की है। यही कारण है कि इन कविताओं में आक्रोश होने के बावजूद करुणा का स्रोत कभी सूखता नहीं।
समग्रतः ये कविताएँ हमारे समय के सामाजिक अंतर्विरोधों, लोकतांत्रिक संकटों, युवा पीढ़ी की बेचैनी, स्त्री-संघर्ष, भाषा के प्रश्न और न्याय की आकांक्षा को एक साथ समेटने वाला सशक्त काव्य-समूह हैं। इनमें प्रतिरोध है, पर प्रतिशोध नहीं; आक्रोश है, पर अमानवीयता नहीं; विचार है, पर संवेदना के बिना नहीं। यही संतुलन इन्हें समकालीन हिंदी कविता में सार्थक और प्रासंगिक बनाता है। इन रचनाओं को पढ़ते हुए बार-बार यह अनुभव होता है कि कविता केवल सौंदर्य का उपक्रम नहीं, बल्कि समाज की नैतिक चेतना को जीवित रखने का एक आवश्यक माध्यम भी है। ऐसी कविताएँ पाठक को केवल प्रभावित नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने समय के प्रति अधिक सजग, अधिक संवेदनशील और अधिक उत्तरदायी बनने के लिए प्रेरित करती हैं।
आप सभी मित्रों का आपकी बहुमूल्य सम्मतियों हेतु बहुत बहुत आभार।
Excellent poems Chauhan ji keep the flag flying Gid bless you
Bahot hi Dil ko cho leni wali kavitayen likhi he Shailendra ji ne
Sachmuch aankhon se aasoon nikal aaye
Jo kisi ko rula de ab unhe duniya ke kisi or purushkar ki jarurat nahi
इन कविताओं पर यह आपत्ति की गई है कि इनमें Gen Z की वास्तविक भाषा नहीं है; इसलिए इन्हें Gen Z की कविताएँ नहीं कहा जा सकता। साथ ही यह भी कहा गया कि इनमें काव्य-तत्व अपेक्षाकृत कम हैं और ये पर्याप्त रूप से संप्रेष्य नहीं बन पातीं। यह आपत्ति विचारणीय अवश्य है, पर कविता की प्रकृति और उसके इतिहास को ध्यान में रखकर देखने पर यह निष्कर्ष एकांगी प्रतीत होता है।
सबसे पहले यह समझना होगा कि किसी भी पीढ़ी का साहित्य उसकी बोलचाल की हूबहू प्रतिलिपि नहीं होता। यदि ऐसा होता, तो कबीर की भाषा केवल पंद्रहवीं शताब्दी के लोगों तक सीमित रह जाती, निराला या मुक्तिबोध आज के पाठकों तक नहीं पहुँचते, और धूमिल की कविता भी अपने समय के बाहर अर्थहीन हो जाती। साहित्य का कार्य बोलचाल का दस्तावेज़ बनना नहीं, बल्कि अनुभव को ऐसे रूप में व्यक्त करना है जो अपने समय से संवाद करते हुए समय की सीमाओं का अतिक्रमण भी कर सके।
इन कविताओं में Gen Z की शब्दावली भले न हो, पर Gen Z की बेचैनी, उसके प्रश्न, उसके असंतोष, उसके लोकतांत्रिक आग्रह और न्याय की आकांक्षा स्पष्ट रूप से उपस्थित हैं। किसी पीढ़ी की पहचान केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसकी संवेदना और उसके सरोकारों से होती है। यदि कोई कविता युवाओं की असुरक्षाओं, संघर्षों और स्वप्नों को ईमानदारी से व्यक्त करती है, तो वह उस पीढ़ी की कविता है, चाहे उसकी भाषा साहित्यिक हो या बोलचाल की।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि भाषा का संयम संप्रेषण में बाधा नहीं बनता। इसके विपरीत, अत्यधिक स्थानीय या क्षणिक स्लैंग कई बार कविता को सीमित कर देता है। इन कविताओं की भाषा अपेक्षाकृत सरल, सीधी और संवादधर्मी है। उसमें अनावश्यक अलंकरण नहीं है, पर भावों की स्पष्टता है। यही कारण है कि इन्हें केवल युवा पाठक ही नहीं, विभिन्न आयु-वर्ग के पाठक भी सहजता से पढ़ और समझ सकते हैं। व्यापक संप्रेषणीयता साहित्य की एक बड़ी उपलब्धि है, कमजोरी नहीं।
जहाँ तक काव्य-तत्व की बात है, उसे केवल बिंबों, प्रतीकों या जटिल भाषिक संरचना से नहीं आँका जा सकता। आधुनिक हिंदी कविता ने लंबे समय से यह सिद्ध किया है कि कविता की शक्ति उसके नैतिक तनाव, उसके लयबोध, उसकी आंतरिक संरचना और उसकी संवेदनात्मक ऊर्जा में भी निहित होती है। छोटी-छोटी पंक्तियाँ, अर्थ की क्रमिक परतें, मौन का उपयोग, प्रश्नवाचक शैली और संवादात्मक विन्यास भी कविता के वैध शिल्प हैं। यदि कोई कविता पाठक को भीतर तक विचलित करती है, उसे सोचने के लिए विवश करती है और उसके अनुभव को व्यापक मानवीय संदर्भ में बदल देती है, तो वह अपने काव्यत्व को सिद्ध करती है।
इन रचनाओं का उद्देश्य भाषिक कौशल का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के बीच टूटते हुए संबंधों पर नैतिक हस्तक्षेप करना है। इसलिए इनमें भाषा साधन है, साध्य नहीं। कविता की सफलता इस बात में है कि वह अपने पाठक तक पहुँचे और उसके भीतर कोई प्रश्न, कोई असुविधा, कोई आत्मसंवाद छोड़ जाए। इस दृष्टि से ये कविताएँ अत्यंत संप्रेष्य हैं।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि Gen Z स्वयं एकरूप नहीं है। उसकी भाषा भी एक नहीं है। विश्वविद्यालय का छात्र, छोटे कस्बे का युवा, गाँव की युवती, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा अभ्यर्थी, सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय नौजवान और सोशल मीडिया पर सक्रिय शहरी युवक—सभी की भाषाएँ अलग-अलग हैं। इसलिए Gen Z की कोई एक प्रामाणिक भाषा मान लेना ही एक सरलीकरण है। कविता यदि उस पीढ़ी की जटिलताओं को अभिव्यक्त कर रही है, तो उसकी साहित्यिक भाषा भी उतनी ही वैध है जितनी उसकी बोलचाल।
दरअसल, इन कविताओं का बल उनकी भाषिक सनसनी में नहीं, बल्कि उनकी नैतिक विश्वसनीयता में है। वे आक्रोश को उत्तेजना नहीं बनने देतीं, प्रतिरोध को अमानवीयता में नहीं बदलने देतीं और विचार को संवेदना से अलग नहीं करतीं। यही गुण उन्हें क्षणिक सोशल मीडिया अभिव्यक्ति से अलग करता है और कविता की दीर्घजीवी परंपरा से जोड़ता है।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि ये Gen Z की भाषा में लिखी गई कविताएँ नहीं हैं, बल्कि Gen Z के समय, उसके संकट, उसके प्रश्न और उसकी आकांक्षाओं पर लिखी गई कविताएँ हैं। इनकी भाषा साहित्यिक है, और संवेदना समकालीन है; अभिव्यक्ति संयत है, पर चिंता आज की है; शिल्प परंपरा से जुड़ा है, पर दृष्टि वर्तमान की है। यही संतुलन इन्हें व्यापक पाठकीय समुदाय के लिए अर्थवान और संप्रेषणीय बनाता है।
बात निकलती है तो फिर दूर तलक जाती है I
मुझे एक कविता की कुछ पंक्तियां याद आती हैं:
“मेरे घर में आज भी
चल रही है पन्द्रहवीं सदी
दफ्तर में बीसवीं
स्कूल, कॉलेज, विश्व विद्यालय में पच्चीसवीं
चाय हाउस, कहवा घरों में पचासवीं I ”
ये जेन x की कविता है I
ये जेन जी के बाद जेन अल्फा की भी सच्चाई है I
अब तो जेन बिटा भी दो साल का हो गया है I
ये भारत है I ये कविता आगे जेन ओमेगा तक यूँ ही प्रासंगिक रहेगी I
अभी तो अनाज राशन में मुफ्त मिलता है I एक समय ऐसा था जब राशन मिलता ही नहीं था I अनाज था ही नहीं I
युवा तब भी भड़कते थे I बबाल तब भी होते थे I प्रदर्शन तब भी था I मार तब भी पड़ती थी I नकल तब भी थी I परीक्षा में गोलमाल तब भी था I नौकरी के लाले तब भी थे I गालियाँ तब भी दी जाती थीं I कविता तब भी लिखीं गई I
सब कुछ था जो अभी है I
जेन x गया I जेन y भी I जेन z भी अब जेन बीटा का दादाजी हो चुका है I
मैं कहना क्या चाहता हूँ?
जेन x के समय महान शायर मजरूह सुल्तानपुरी ने एक गीत लिखा था 1971 में:
” पिया तू अब तो आजा …..”
बाद में उन्होंने कहा था: “ऐसे गीत अब कभी न लिखूँगा जो मैं अपनी बेटियों के साथ बांट न सकूँ I ”
इसी गीतकार ने 1957 में लिखा था:
छोड़ दो आँचल ज़माना क्या कहेगा….”I
दोनों गाने सुपर हिट थे I उससे क्या होता है I दूसरे जैसा उन्होंने फिर कभी नहीं लिखा I
Very good bro I am a genz too
Nice lines for Gen. Z youth.
समालोचन पर कविता और पाठक : एक आत्मीय अनुभव
किसी भी रचनाकार के लिए रचना का प्रकाशित होना जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उससे कम महत्त्वपूर्ण उसका पढ़ा जाना नहीं होता। कविता अंततः पाठक के भीतर ही अपना वास्तविक जीवन प्राप्त करती है। वह केवल पत्रिका या वेबसाइट के पृष्ठ पर नहीं रहती, बल्कि पाठकों की स्मृति, उनकी संवेदना और उनकी प्रतिक्रियाओं में जीवित रहती है। पिछले वर्षों में मेरी कविताएँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं, वेब पत्रिकाओं और साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित होती रही हैं। हर प्रकाशन अपने साथ एक अलग प्रकार का संतोष लेकर आता है, क्योंकि प्रत्येक मंच का अपना पाठक-वर्ग और अपना साहित्यिक परिवेश होता है। फिर भी यदि अपने अनुभव के आधार पर कहूँ तो मुझे सबसे अधिक आत्मीय और विचारोत्तेजक प्रतिसाद समालोचन पर प्राप्त हुआ है।
यह केवल प्रतिक्रियाओं की संख्या का प्रश्न नहीं है। सोशल मीडिया पर किसी रचना को सैकड़ों ‘लाइक’ मिल सकते हैं, अनेक लोग उसे साझा भी कर सकते हैं, लेकिन साहित्य में किसी कविता की वास्तविक स्वीकृति उसके साथ होने वाले संवाद से बनती है। समालोचन पर मेरी कविताओं के साथ यही संवाद बार-बार देखने को मिला। वहाँ पाठक कविता को धैर्यपूर्वक पढ़ते हैं, उसके अर्थ-संकेतों पर विचार करते हैं और फिर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करते हैं। कई बार उनकी टिप्पणियाँ स्वयं कविता के अर्थ-क्षेत्र का विस्तार कर देती हैं।
मुझे यह भी अनुभव हुआ कि समालोचन का पाठक केवल प्रशंसा करने वाला पाठक नहीं है। वह सहमत भी होता है, असहमत भी; प्रश्न भी उठाता है और नई संभावनाओं की ओर भी संकेत करता है। यह आलोचनात्मक आत्मीयता किसी भी रचनाकार के लिए अत्यंत मूल्यवान होती है। कविता को केवल सराहना नहीं, बल्कि समझने और परखने वाले पाठकों की आवश्यकता होती है। समालोचन पर ऐसा पाठक-वर्ग सक्रिय दिखाई देता है।
समालोचन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वहाँ साहित्य को तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव से अलग रखकर देखा जाता है। वहाँ कविता को उसकी भाषा, संवेदना, शिल्प और वैचारिक ऊर्जा के आधार पर पढ़ने की परंपरा विकसित हुई है। यही कारण है कि वहाँ प्रकाशित रचनाएँ केवल कुछ दिनों की चर्चा बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि लंबे समय तक पढ़ी और उद्धृत की जाती हैं।
मेरी कई कविताओं पर ऐसी प्रतिक्रियाएँ मिलीं जिन्होंने मुझे स्वयं अपनी कविता को नए ढंग से देखने के लिए प्रेरित किया। कुछ पाठकों ने उन अर्थों की ओर संकेत किया जिनके बारे में लिखते समय मैंने सचेत रूप से नहीं सोचा था। कुछ ने कविता के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भों को रेखांकित किया, तो कुछ ने उसकी मानवीय संवेदना को। इस प्रकार पाठक और रचना के बीच बनने वाला यह संवाद मेरे लिए अत्यंत शिक्षाप्रद रहा।
एक और बात उल्लेखनीय है। आज का डिजिटल संसार बहुत तेज़ है। अधिकांश सामग्री कुछ ही घंटों या दिनों में विस्मृत हो जाती है। लेकिन समालोचन पर प्रकाशित रचनाएँ बार-बार पढ़ी जाती हैं। पुराने प्रकाशनों पर भी समय-समय पर नई प्रतिक्रियाएँ आती रहती हैं। इससे यह विश्वास बनता है कि कविता का जीवन तात्कालिक नहीं है और गंभीर पाठक आज भी मौजूद हैं।
मेरे लिए यह अनुभव इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि मैं कविता को केवल आत्माभिव्यक्ति नहीं मानता। वह समाज, समय और मनुष्य के साथ संवाद का माध्यम है। जब कोई पाठक कविता से जुड़कर अपनी बात कहता है, तब वह संवाद पूरा होता है। समालोचन ने इस संवाद को संभव बनाया है। वहाँ लेखक और पाठक के बीच किसी प्रकार की कृत्रिम दूरी नहीं दिखाई देती; बल्कि एक साझा साहित्यिक समुदाय का अनुभव होता है।
मैं यह नहीं कहता कि अन्य पत्रिकाओं या मंचों पर मेरी कविताओं को सम्मान नहीं मिला। अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने उन्हें प्रकाशित किया और अनेक संपादकों ने विश्वास व्यक्त किया। उन सभी के प्रति मेरे मन में गहरा आभार है। किन्तु यदि केवल पाठकीय सहभागिता और विचारपूर्ण प्रतिक्रियाओं की दृष्टि से देखूँ तो समालोचन का अनुभव विशिष्ट रहा है। वहाँ मुझे बार-बार यह लगा कि कविता वास्तव में अपने पाठकों तक पहुँची है।
अंततः किसी भी साहित्यिक मंच का मूल्य उसके द्वारा निर्मित पाठकीय संस्कृति से निर्धारित होता है। समालोचन ने हिंदी में गंभीर, विवेकशील और संवादधर्मी पाठकीय संस्कृति के निर्माण में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। यह केवल रचनाओं के प्रकाशन का मंच नहीं, बल्कि साहित्यिक विचार-विमर्श का एक जीवंत सार्वजनिक परिसर है। मेरी कविताओं को वहाँ जो अपनापन, ध्यान और प्रतिक्रियाएँ मिली हैं, वे मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं हैं। वे मुझे यह भरोसा देती हैं कि कविता अभी भी मनुष्य तक पहुँचती है, उसे सोचने के लिए प्रेरित करती है और उसके भीतर संवेदना की लौ को जीवित रखती है। यही किसी कवि के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।
शैलेंद्र चौहान
संपर्क : 34/242, सेक्टर-3, प्रतापनगर, जयपुर-302033
धुएँ के भीतर का उफान
ऐसा क्यों लगता है
कि छरहरे से बदन हैं
मानो, हों!
सिर्फ मटमैले धुएँ के गुड्डे,
जहरीली हवा के छर्रे दागोगे
झट फट जाएँगे —
गुब्बारों की तरह।
आँसू गैस की फुहारें
पेलेट गन के निर्मम ठहाके
लाठी की बर्बरता
पानी की तोपें भी
डाल पाएँगी
दरारें
उनके हौंसलों में —
क्यों,
लगता है ऐसा?
लबों पर सजी हुँकार
कभी रुकेगी नहीं,
सड़कें—अवारा होंने तक।
सड़क से पहले
एक और मैदान है—
इंस्टाग्राम के नक्शे पर।
हालांकि कुछ सोचते हैं—
कि वे अकेलेपन के हाथों ही
छोड़ देंगे अपने प्राण,
बेरोज़गारी से हारे हुए।
वीडियो गेम्स के बीच
छुपे रह रह कर
निकाल देंगे वे
अपना समस्त जीवन।
फ़ोन स्क्रीन के
नीले आग़ोश से लिपटे
चूमते रहेंगे
अपनी तनहाई की संगिनी।
सोचते हो क्या
कि भ्रम के हत्थे ही
ढह जाएगा
उनके —भविष्य का किला?
पर कौन सा भ्रम?
वह जो,
हम सब में भी जमा हुआ
बंजर बर्फ-सा???
नकारते रहें चाहे
चढ़ती पीढ़ी की भाषा,
उसके अजब रंग-ढंग,
मुस्कराने, हंसने की कला
और फिक्रों को चुटकी में
उड़ा देने की जीवन-शैली।
धुआँ, कोहरा, धुंधलका…
जो भी नाम दे दिए हैं
इस सुलगती तपिश को।
भ्रम की परत
जब छँटी है
तो हतप्रभ से देख रहे हैं —
कि उसी धुएँ के भीतर
कोई आडंबर नहीं,
बल्कि सुलगती
एक नग्न लाट है
विद्रोह की।
बूढ़ी हुई संस्कृतियों की
मुट्ठियों में
चुप से पड़े रहते हैं
अलसाये जुगनू
अपनी अंतिम साँसों को चुगते
पर
कब
दैत्यकाय से हो जाते हैं
कद में,
तब सिर्फ
सड़कें होती हैं
साक्षी…
@पंकजेश्वर
ब्राम्पटन
कनाडा
अगस्त 8, 2026