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समालोचन

Home » प्रभात की नई कविताएँ

प्रभात की नई कविताएँ

by arun dev
March 5, 2026
in कविता
Reading Time: 2 mins read
A A
प्रभात की नई कविताएँ
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प्रभात की नई कविताएँ

 

1.

बघेरे का जोड़ा

सोता पड़ गया कॉलोनी में
अर्द्धरात्री का अँधेरा झर रहा है घरों पर
एकाएक कुत्ते भौंकने लगे हैं
सूखे नाले की ओर मुँह करके
बघेरे का जोड़ा गुजर रहा है उधर से
जंगल से निकलकर रोज आते हैं वे इधर
मैं उठकर आता हूँ खिड़की पर
एक झलक दिख जाए उनकी
कैसी सरलता से जा रहे होंगे वे खेतों की तरफ
ऐसी सरलता दुर्लभ हो गई है इन दिनों
जिनमें है वे दिखते नहीं हैं
फिर भी हर रात देखता हूँ खिड़की पर आकर
जब कुत्ते तेज तेज भौंकते हैं एकाएक
अँधेरे में डूबे नाले की ओर मुँह कर

 

 

2.

घुमन्तू गायक-गायिका के घर एक दोपहर

उजाड़ में बसे उन सात आठ घरों पर
चिलचिलाती धूप पड़ रही थी
घर थे पर जमीन नहीं थी उनकी
कर रखा था एक ठिया भर
जहाँ रह लेते थे
महीने छह महीने में कभी आकर
खाली घर खुले ही पड़े रहते थे
जंगल के जानवरों की माँद की तरह

सिर नीचा कर घर में घुसा तो पाया
गायिका बुखार में नहक रही थी
गायक उसके पास ही जमीन पर लेटा था
राह चलते हुई
कुछ पल की मुलाकात थी उनसे
पर जैसे चली गई सदियों के परिचित हों
‘आओ आओ’ – कहा
मुझे देखते ही गायक ने
फिर गायिका से कहा-‘उठ गाना है’
कहते ही उठ बैठी
मैंने कहा-‘अभी इनकी हालत नहीं गाने की
मैं तो ऐसे ही देखने चला आया यह संसार’
‘अरे नहीं अब आ ही गए हो तो…!’ कहते हुए
गायक ने उठाया रावणहत्था
तारों पर गज घुमायी
खुसरो की मुकरी गाई
मीरा की कविता सुनाई
बुखार में तपती गायिका ने परवान चढ़ाई

घटाएँ घिर आई बंजर भूमि में
मोर बोलने लगे हवाएँ चलने लगीं
पेड़ सरसराने लगे जंगल में
पैसे के बिना कोई पानी नहीं पिलाता इस जमाने में
पर मैं दे न सका, वे ले न सके मुझसे कुछ पैसे
जिससे हो पाती बुखार में गा रही गायिका की गोली दवाई

 

 

3.

गाड़िया लुहार

कब की बुझ गई लोहा गलाने वाली
जमीनी भट्टियाँ
कब की समा चुकी वक्त के गर्त में
धरती को अपना घर समझ कर
चलने वाली काली बैलगाड़ियाँ

आधी रात को नशे में बड़बड़ाता
जा रहा है एक लुहार
करते हुए बद्दुआओं की वर्षा
उनके घुमन्तू डेरे
हटा गया है आज सरकारी महकमा

डेरा जब रहा नहीं
रोजी जब बिखर गई
कहाँ गई बीवी
कहाँ गई बेटी
कहाँ धरी धरती पर
बीवी और बेटी ने
देह की गठरी

उसके पीछे पड़े कुत्तों का भौंकना अब भी सुनाई दे रहा है
किस दिशा में खोया वह अँधेरी हवाओं में पाँव धरते हुए
कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है

 

 

4.

तालाब

दिशाओं के नाम कम पड़ जाएँ
इतनी ओर से आया तालाब में पानी
घास फूस फूल पत्तियाँ
लक्कड़ टहनियाँ और आषाढ़ की
रेत घुली भूरी बारिश भरी है इसमें
चौमासे चौमासे तो ऐसा ही
आँधी तूफान मचा रहेगा
धरती अम्बर के बीच में

धीरे धीरे छँटेंगे मेघ
विदा लेंगे धीरे धीरे
जाएँगे मंथर चाल से
कास फूलों को हिलाते हुए

हौले हौले निथरेगा नौरा पानी
दिखने लगेंगे जल पाँखी
डुबकियाँ लेती जल-कागलियाँ
किनारे पर सारस, घासों में
चकवा चकवी
तब आ जाएँगी सर्दियाँ
धुंध छाया करेगी घनी
कहाँ है किनारा
कहाँ से शुरू हो रहा है पानी
पाँव दे-देकर देखा करेंगी
मुँह अँधेरे ही आ जाने वाली
कातिक नहाने वालियाँ
धुंध भरे ताल में उतरकर
खिलखिलाने वाली कुँवारियाँ
बातों की डुबकी लगाने वालियाँ

जिस गाँव में होगा ब्याह
उस गाँव में तालाब होगा कि नहीं
पानी बिना बालम से निबाह होगा कि नहीं
हमारे गाँव जैसा गाँव होगा कि नहीं

 

 

5.

शरद के रंग

हरी और लाल मिर्चियों से लड़झड़ खेत की
मेड़ की दूब में खड़ी है वह
काले लहँगे पर लाल लूगड़ी वाली युवती
शाम के चार बजे की पुआल सी नर्म धूप
उसके चेहरे पर पड़ रही है और पाँवों पर जिन्हें
वह बरूअे के बहते पानी में
हौले से डालकर पानी को हिला रही है
उसके इतना अपने में डूबे होने को टोह कर
पेड़ों से उतर आए हैं मोर खेत में
दूर कुएँ पर इंजन चला रहा कोई
बगुले के रंग के कुर्ते धोती वाला
ऑयल सने हाथों को युवती की दिशा में
उठाते हुए टेरता है
अरी ओ इंदर की परी
देख तो सरी
मोरों ने खेत को कर दिया है रड़ीथड़ी
वह चौंकती है
डो डो डो डो कहती हुई भागती है मोरों के पीछे
उसके इस तरह भागने से हिलते हुए हँसती है
कमर में बँधी चाँदी की करघनी
मोर भूरी मिट्टी में सलेटी पग धरते
भागते हैं चमकीले हरे पंखों को सरसराते
फिर उड़ते हैं खेत से जरा सा ही ऊपर उठते हुए
अभी अभी मेघमय हुए ओस की धूल भरे नीले में

 

pinterest से आभार सहित

6.

सरसराहट भरे दिन

वह एक सुंदर स्त्री थी
नीम के पेड़ सी सख्त
हरी सफेद फूलों से भरी

सुनसान सड़क पर मिली
मेरी साइकिल की घंटी पर
हाथ रखकर बातें करने लगी

ऐसी बातें कि मैं
वसंत के बगीचे की तरह हो गया

मुझे रोटी देने जाना था खेत में
न चाहते हुए भी
साइकिल आगे बढ़ा दी
जल्दी नहीं थी पर मैं
लौटा जल्दी ही
वह अभी भी वहीं खड़ी थी

वह फिर मेरी
साइकिल की घंटी पर
हाथ रखकर बातें करने लगी

न उसने कहा कि
अब मैं जाऊँ
पर जाना तो था ही
उसे चरागाह में
मुझे अपने घर

बहुत सारे दिन
सरसराते हुए बीत गए
हवाएँ चलती रहीं
फसलें बढ़ती रहीं

एक रोज उसी सुनसान राह में
उसी जगह वह फिर मिली

न उसने कुछ कहते हुए
मेरी साइकिल रोकी
न मैंने

यह वसंत के जाने
और गर्मियों के आने की
शुरूआत थी

 

 

7.

इशीता

बुआ से ऐसे कोई भी नहीं बोला
जैसे बोली इशीता

अकेली आई हो बुआ
फूफा को भी साथ ले आती
उनका यहाँ खूब मन लग जाता
उनको पसंद है जो सब है यहाँ
पेड़ मवेशी खेत तालाब चिड़िया
आते तो यह सब देखकर खुश ही हो जाते

छोटी बुआजियों से बात हो तो उनसे कहना
मेरा तो गाँव में खूब मन लगा
मैंने तो वहाँ खूब मजे किए

इशीता ही टेम्पो में बिठाने आई
बुआ जब जा रही थी
हाथ हिलाते हुए बोली
ऐसे ही आ जाया करो बुआ
मैं तो हमेशा ही चाहती हूँ
बुआ आए, हँसे बोले
हमारे साथ कुछ समय बिताए

टेम्पो आगे बढ़ गया
फिर आओगी न बुआ
कहती ही रह गई इशीता

 

 

8.

सुबह

एक चिड़िया सौन्दर्य बिखेरती है
धरती के खण्डहरों में अपनी फर फर से
तबाही के मंजर में भी होती है सुबह
हवा साँस लेने लायक बनती है
फिर से उगी घासें हिलती है
फिर से ओस चमकती है
फिर से आ जाती है छिपी हुई गिलहरी
गाती हुई
दिखाई देते हैं झुलसी हुई झाड़ी में
पके हुए लाल बेर
बच्चे आ जाते हैं उन्हें देखकर
खण्डहर में समाए डरवानेपन के बावजूद
मिटाए जाते हैं पर मिटते नहीं है
कुछ वजूद

तालाब रपेटे जा सकते हैं
पानी नहीं

पानी के किनारे
दो पल ज्यादा ही रुकती है सुबह
कम नहीं

 

9.

हमारे दिन

हमारी उम्र पक गई है
गेहूँ की बालियों की तरह
खेत में रहने के दिन
अब हमारे नहीं है

चक्की चूल्हों की ओर
बढ़ना चाहिए अब हमें

 

 

10.

आऊँगा

तुम तक न आने के
बहुत से कारण हैं
मैं आऊँगा फिर भी

ऐसा ही करना तुम भी

 

प्रभात
१९७२  (करौली, राजस्थान)

राजस्थान में माड़, जगरौटी, तड़ैटी, आदि व राजस्थान से बाहर बैगा, बज्जिका, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी भाषाओं के लोक साहित्य पर संकलन, दस्तावेजीकरण, सम्पादन.

‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’, ‘बंजारा नमक लाया’ तथा  ‘अबके मरेंगे तो बदली बनेंगे’ कविता संग्रह,  पानियों की गाडि़यों में, साइकिल पर था कव्वा, मेघ की छाया, घुमंतुओं का डेरा,  ऊँट के अंडे, मिट्टी की दीवार, सात भेडिये, नाच, नाव में गाँव आदि  प्रकाशित

२०१० में सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार और भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार और २०१२ में युवा कविता समय सम्मान आदि से सम्मानित
prabhaaat@gmail.com

Tags: 20262026 कविताप्रभात
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Comments 9

  1. विनोद पदरज says:
    5 months ago

    प्रभात दुर्लभ कवि हैं उलझी हुई भाषा की कविताओं के बरक्स कितनी गहरी साफ सुथरी कैसी ह्रदय मरोड़ देने वाली कविताएं हैं ये।
    सुबह बन गई ऐसे हिंसक माहौल में भी जी जुड़ा गया।

    Reply
  2. Sadashiv Shrotriya says:
    5 months ago

    कविता वही है जो हमारे अनुभव संसार को अपनी नवीनता से समृद्ध करे। मैं उम्मीद करता हूं कि आज के समय में प्रभात की ये कविताएं पढ़ते हुए मेरी तरह हर पाठक यह बात महसूस करेगा। यह आश्वस्ति जनक है कि इस निरंतर कुरूप होती दुनिया में कविता जैसी सुंदर वस्तु फिर भी बची रहेगी।
    सदाशिव श्रोत्रिय

    Reply
  3. Vijay Rahi says:
    5 months ago

    प्रिय कवि को बहुत बधाई और शुभकामनाएँ। बहुत सुंदर और महत्वपूर्ण कविताएं हैं। संक्षिप्त में सादगी के साथ कविता में कैसे कोई बात कही जाती है, हिन्दी कविता यह बात प्रभात से सीख सकती है। कवि ने आने वाली हिन्दी कविता के लिए कभी एक बात कही थी-
    “हिन्दी कविता
    ऐसे मिलेगी अपने पढ़ने वालों से
    जैसे दो प्रेमी कर रहे हो बातें।”
    इन कविताओं को पढ़कर बिल्कुल ऐसा ही लग रहा है। होली पर जबकि देश-दुनिया के लोग लड़ाई-दंगों और युद्धों में उलझे हुए हैं, ऐसी सुलझी हुई कविताएं पढ़वाने के लिए अरुण जी और समालोचन का बेहद शुक्रिया 🌼

    Reply
  4. ललन चतुर्वेदी says:
    5 months ago

    कितनी प्यारी कविताएँ हैं कि मन डूब जाता है. यहाँ बौद्धिकता का कोई आतंक नहीं.सचमुच कविता कृत्रिम बुद्धिमत्ता से नहीं आती है.कुछ तो बात है प्रभात में कि उन्हें सुप्रभात कहना चाहता हूँ.कविताएँ दूध में शक्कर की तरह घुल रहीं हैं.स्वाद लेने दीजिये चुपचाप.

    Reply
  5. माताचंद्र मिश्र says:
    5 months ago

    प्रभात को पढ़ते हुए हम विस्मय से भर जाते हैं ,इन विलक्षण कविताओं में बघेरों की आहटें हैं, लोकगीत गाते गायक और गायिका हैं,रेतीले सहरा में पगथलियों केछापे हैं और विस्मय से भरा मानव जीवन है,प्रभात जीवन की घनी अनुभूतियों के विलक्षण कवि हैं,,,

    Reply
  6. कुमार अम्बुज says:
    5 months ago

    शुरु की आठ कविताएँ तो जैसे लाइफस्केप हैं। इनमें से कुछ घुमंतू जीवन की दुर्लभ जिजीविषा और तकलीफ़ को एकाकार करते हुए। प्रभात की कविताएँ सूक्ष्म संवेदनाओं को मार्मिकता से दर्ज करती चलती हैं। रह जाती है एक टीस।

    Reply
    • Rp Singh says:
      5 months ago

      Khoob pehchana , aapki binaie ( drishti ) bdee sookhdham hai !

      Reply
  7. राजु0 says:
    5 months ago

    प्रभात सरल हैं, सरलता दुर्लभ होती जा रही।

    Reply
  8. Vinita Badmera says:
    5 months ago

    प्रभात ही ऐसी कविताएं लिख सकते हैं। पानी जैसी भाषा जो भीतर की तहों को भी गीला कर देती हैं।

    Reply

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