• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना : कल्लोल चक्रवर्ती

रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना : कल्लोल चक्रवर्ती

by arun dev
August 7, 2026
in आलेख
Reading Time: 14 mins read
A A
रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना : कल्लोल चक्रवर्ती
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना
(7 मई, 1861 – 7 अगस्त 1941)


कल्लोल चक्रवर्ती

अगस्त का पहला सप्ताह रवींद्रनाथ ठाकुर की पुण्यतिथि के रूप में जाना जाता है. हिंदी की तरह बाँग्ला में भी यह श्रावण (सावन) का महीना है. बाँग्ला की जिन दो तिथियों को बाँग्लाभाषी निर्विवाद रूप से याद रखते हैं, वे दोनों रवींद्रनाथ से जुड़ी हैं.

पहली तिथि है- पचीसे बैसाख (बैसाख महीने की 25 तारीख), जो रवींद्रनाथ की जन्मतिथि है. और दूसरी तिथि है-बाईशे श्रावण (सावन महीने की 22 तारीख), जिस दिन कविगुरु का निधन हुआ था. यह दिन बंगाल के लिए शोक का दिन है. बाँग्ला साहित्य, संगीत और सिनेमा ने शोक की यह तारीख याद रखी है.

‘बाईशे श्रावण’ नाम से मृणाल सेन ने 1960 में और सृजित मुखर्जी ने 2011 में फिल्म बनाई. अगस्त, 2020 के 22 श्रावण को हिंदुस्तान रिकॉर्ड ने ‘स्मरणे रवींद्रनाथ’ नाम से एक अलबम जारी किया था, जो रवींद्रनाथ के अलावा कुंदनलाल सहगल, देवव्रत विश्वास और कनिका बंद्योपाध्याय जैसे दिग्गज संगीतज्ञों के गाये रवींद्र संगीत का संकलन है. रवींद्रनाथ की स्मृति में बुद्धदेव बसु, यतींद्रनाथ सेनगुप्त, बरुण हालदार आदि ने ‘बाईसे श्रावण’ शीर्षक से कविताएँ लिखी हैं. निर्मल कुमारी महलानवीस ने रवींद्रनाथ पर अपनी संस्मरणात्मक पुस्तक का शीर्षक भी ‘बाइसे श्रावण’ रखा.

रवींद्रनाथ के इस मृत्यु मास में मृत्यु के बारे में खुद रवींद्रनाथ के नजरिये के बारे में जानना कम दिलचस्प नहीं है. हर व्यक्ति अपने जीवन में सुख के साथ दुख का भी सामना करता है. परिजनों की मृत्यु उसे व्यथित करती है. वह व्यक्ति अगर कवि, लेखक हुआ, तो अपनी रचनाओं में मृत्यु को व्यक्त और अभिव्यक्त करता है. हमारे यहाँ महात्मा बुद्ध हुए हैं, जिन्होंने मृत्यु के जरिये जीवन को पहचाना. हमारे जीवन दर्शन में मृत्यु को बहुत महत्व दिया गया है. विश्व कविता में मृत्यु पर अनेक कवियों ने लिखा. इनमें मात्र पच्चीस साल तक जीवित रहे दिग्गज अंग्रेज कवि जॉन कीट्स हैं, तो 80 वसंत देखने वाले रवींद्रनाथ भी. हिंदी में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने मृत्यु और शोक को अपनी कविता का विषय बनाया. कीट्स और निराला की तरह रवींद्रनाथ को भी अपने परिजनों के बिछोह का सामना करना पड़ा था. बल्कि अपने लंबे जीवन में कविगुरु को बार-बार अपने परिजनों की मृत्यु का शोक सहना पड़ा, जिसने उनके जीवन को गहरे तौर पर प्रभावित किया. अमीर परिवार से होने के कारण रवींद्रनाथ के बारे में अनेक भ्रांत धारणाएँ रही हैं. सच्चाई यह है कि उनका जीवन उतना ही दुखद और संघर्ष भरा था, जितना किसी सामान्य व्यक्ति का हो सकता है.

रवींद्रनाथ सामान्य परिवार से नहीं थे. उनके दादा प्रिंस द्वारकानाथ टैगोर (अंग्रेज ठाकुर को टैगोर कहते थे) तत्कालीन कलकत्ते के, जो लंदन के बाद दूसरा सबसे बड़ा औपनिवेशिक शहर था, दिग्गज व्यापारी थे. प्रिंस द्वारकानाथ को भारत के पहले उद्यमी (इंटरप्रेन्योर) के रूप में याद किया जाता है, जिनका यूरोप में स्वागत क्वीन विक्टोरिया करती थीं.1

हालाँकि प्रिंस द्वारकानाथ बहुत कर्ज छोड़कर मरे थे. इसके बावजूद ठाकुर परिवार के पास अविभाजित बंगाल की कई जगहों में जमींदारियाँ थीं. तब भी रवींद्रनाथ और उनके भाई-बहनों का बचपन सामान्य बच्चों की तरह बीता था. अपने बचपन के बारे में रवींद्रनाथ ने लिखा है,

‘हमारे भोजन में शौकीनता का लेश मात्र नहीं था. कपड़े इतने मामूली थे कि आज के दौर में उससे सम्मानहानि की आशंका होती. दस साल की उम्र से पहले कभी मैंने मोजे नहीं पहने थे. जाड़े के दिनों में एक सफेद कुर्ते पर एक और सफेद कुर्ता पहन लेना ही काफी होता था. इसके लिए हमने कभी भाग्य को दोष नहीं दिया, हां, घर के दर्जी नियामत खलीफा हमारी कमीज में जेब नहीं रखते थे, इस कारण दुख जरूर होता था….घर के बड़े लोगों की गतिविधियाँ, वेश-भूषा, आहार-विहार, आराम-आनंद, बातचीत आदि हमारी पहुंच से बाहर थीं. …आसानी से हमें कुछ भी नहीं मिला. तुच्छ सामग्रियाँ भी हमारे लिए दुर्लभ थीं. …भवन के बाहरी हिस्से की दूसरी मंजिल पर दक्षिण-पूर्व दिशा में नौकरों के अधीन हमारे दिन बीतते थे. एक नौकर था, श्याम. वह कमरे की एक निर्दिष्ट जगह पर मुझे बैठाकर चारों तरफ एक घेरा बना देता, फिर तर्जनी दिखाकर गंभीरता से कहता, इस घेरे के बाहर निकलने का नतीजा भीषण होगा….घेरे से बाहर निकलने का कितना भयानक नतीजा सीता माता ने भुगता था, इस बारे में रामायण में पढ़ा था. इसलिए श्याम की धमकी को मैं गंभीरता से लेता था.’ 2

जीवन की कठोर सच्चाई ने बड़े होने पर रवींद्रनाथ को मृत्यु के प्रति भी यथार्थवादी बनाया. इसका एक कारण संभवत: यह भी था कि उन्होंने लगातार मौतें देखीं. जब वह चौदह वर्ष के थे, तब उनकी माँ शारदा देवी की मृत्यु हुई थी. उन्नीस अप्रैल, 1884 को अपनी प्रिय भाभी कादबंरी देवी की आत्महत्या ने रवींद्रनाथ को स्तब्ध कर दिया था. तब रवींद्रनाथ 24 साल के थे. नवंबर, 1902 में उनकी पत्नी मृणालिनी देवी की मृत्यु हो गयी, जिनके साथ कवि की 19 साल की गृहस्थी थी. रवींद्रनाथ तब 41 साल के थे. उसके कुछ ही महीनों बाद रवींद्रनाथ की दूसरी बेटी रेणुका की 13 साल की उम्र में सितंबर, 1903 में मृत्यु हो गयी. वर्ष 1905 में उनके पिता देवेंद्रनाथ ठाकुर की मृत्यु हो गयी. उसके बाद कवि के छोटे बेटे शमींद्रनाथ की 13 साल की उम्र में हैजे से मृत्यु हो गयी.

माँ की मृत्यु के बारे में रवींद्रनाथ ने ‘जीवन स्मृति’ में लिखा है,

‘जिस रात उनकी मृत्यु हुई, हम सब सोए पड़े थे. रात कितनी थी, पता नहीं, अचानक एक दासी हमारे कमरे में घुसकर रो पड़ी, तुम लोगों का कितना बड़ा सर्वनाश हो गया. दीये की मंद रोशनी में मैं थोड़ी देर के लिए जग गया, पर क्या हुआ, समझ में नहीं आया था. सुबह उठकर बाहर के बरामदे पर आकर देखा कि अंतिम यात्रा के लिए उनकी सुसज्जित देह खाट पर रखी गयी है.’

भाभी कादंबरी देवी (19 अप्रैल, 1884) की मृत्यु ने जीवन के बारे में कवि की सोच बदल दी थी. किशोर रवींद्रनाथ के मानसिक गठन में कादंबरी देवी का योगदान बहुत अधिक था. उन्होंने किशोर रवींद्रनाथ को जीवन के नए अर्थ सिखाए थे. इसलिए उनकी अकाल मृत्यु ने रवींद्रनाथ पर गहरा असर छोड़ा. साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित रवींद्रनाथ के मोनोग्राफ में शिशिर कुमार घोष ने लिखा है,

‘नौ दिसंबर, 1883 को अप्रत्याशित रूप से रवींद्रनाथ की शादी अपनी जमींदारी में कार्यरत एक कनिष्ठ अधिकारी की बेटी से हुई. उसके छह महीने बाद उनकी प्रिय भाभी कादंबरी देवी ने आत्महत्या कर ली. इसका रहस्य कभी नहीं सुलझा. वर्षों बाद कवि ने ‘छवि’ कविता में तुमि कि केबलि छवि! (तुम क्या सिर्फ चित्र हो!) लिखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी’.3.

रवींद्रनाथ की मानें, तो भाभी कादंबरी देवी की मृत्यु ने पहली बार उन्हें जीवन की नश्वरता से परिचित कराया. उन्होंने लिखा,

‘चौबीस की उम्र में मृत्यु से मेरा जो परिचय हुआ, वह स्थायी परिचय था. बाद के हर शोक के साथ मिलकर उसने आँसू की लंबी माला गूँथ दी. बालपन का लघु जीवन बड़ी-बड़ी मौतों के बगल से अनायास ही निकल जाता है, लेकिन अधिक उम्र में इतनी सहजता से मृत्यु को धोखा देकर बगल के रास्ते से चुपचाप निकल जाना आसान नहीं है. इसलिए उस दिन के दुख को उसकी संपूर्णता में अपने हृदय में रखना पड़ा था….फिर भी इस दु:सह दुख के भीतर से मेरे हृदय में आनंद की बयार बहने लगी. इससे मैं चकित रह गया….जिसको पकड़ रखा था, उसे छोड़ना पड़ा, तो इसे क्षति मानकर जिस तरह मुझे वेदना सहनी पड़ी, उसी तरह इसे मुक्ति के रूप में देखकर शांति का एहसास हुआ.’4

रवींद्रनाथ के लिए कादंबरी देवी नोतून बौठान थीं. बौठान बाँग्ला में बड़ी भाभी के लिए आदरसूचक शब्द है. नोतून बौठान-यानी नयी भाभी. लेकिन इसका एक और अर्थ है. नोतून असल में बड़े भाई ज्योतिरिंद्रनाथ के घर का नाम था. इस अर्थ में नोतून दा की पत्नी को रवि ठाकुर नोतून बौठान के रूप में संबोधित करते रहे हों, तो आश्चर्य नहीं. कादंबरी देवी सुंदर और साँवली थीं. उनकी आँखें और लहराते बाल बेहद आकर्षक थे. रवींद्रनाथ ने लिखा है,

‘नयी भाभी की दो आँखें मन में इस तरह बस गयी हैं कि किसी मनुष्य का चित्र बनाते हुए कई बार वे आँखें मेरे सामने चमकती रहती हैं.’5

नयी भाभी से मिलकर रवींद्रनाथ बेहद प्रभावित हुए थे. कादंबरी देवी ने ठाकुरबाड़ी में आते ही छत पर जैसे नंदनकानन बसा लिया था. प्रकृति और साहित्य, दोनों उन्हें प्रिय थे. रवींद्रनाथ के सौंदर्यबोध को विकसित करने वाली कादंबरी देवी ही थीं. ज्योतिरिंद्रनाथ ने बड़े भाई सत्येंद्रनाथ और भाभी ज्ञानदानंदिनी की सोहबत में पत्नी कादंबरी को आधुनिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. कादंबरी देवी पति के साथ घोड़े पर सवार होकर ठाकुरबाड़ी से सैर के लिए निकलती थीं. ठाकुरबाड़ी के अंत:पुर में स्त्री स्वाधीनता की शुरुआत वस्तुत: सत्येंद्रनाथ ठाकुर ने की थी. इंडियन सिविल सर्विस में जाने वाले वह प्रथम भारतीय थे. पत्नी ज्ञानदानंदिनी को वह बाहर घुमाने ले जाते थे, और बॉम्बे (मुंबई) भी ले गये थे. ज्योतिरिंद्रनाथ तब स्त्री स्वाधीनता के उतने आग्रही नहीं थे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी सोच बदली. जब उनकी शादी हुई, तब वह उन्नीस साल के थे और कादंबरी देवी नौ वर्ष की थी.

कादंबरी देवी का रवींद्रनाथ के साथ किस तरह का रिश्ता था? उम्र में मात्र एक साल छोटे देवर रवींद्रनाथ के साथ कादंबरी देवी परिहास ही ज्यादा करती थीं. दोनों में नोकझोंक भी खूब होती. तब के प्रसिद्ध बाँग्ला कवि बिहारीलाल चक्रवर्ती को आदर्श मानने वाली कादंबरी देवी साहित्य प्रेमी थीं. ठाकुर परिवार की पत्रिका, ‘भारती’ में बेशक उनका नाम नहीं जाता था, लेकिन पत्रिका में उनकी मेहनत और प्रेरणा झलकती थी. साहित्यप्रेमी होने के अलावा कादंबरी देवी ठाकुरबाड़ी में होने वाले नाटकों में भूमिकाएँ भी निभाती थीं. हमउम्र ननद और लेखिका स्वर्णकुमारी देवी से उनकी गहरी छनती थी, तो इसका बड़ा कारण दोनों का साहित्यानुरागी होना भी था.6

कादंबरी देवी रवींद्रनाथ का लिखा हुआ न सिर्फ पढ़तीं, बल्कि उन्हें लिखने के लिए प्रोत्साहित भी करती थीं. लेकिन प्रकटत: वह जताती थीं कि रवि का लेखन उन्हें अच्छा नहीं लगता. देवर को उलाहना देते हुए वह कहतीं, ‘कभी बिहारी (लाल) चक्रवर्ती की तरह लिख नहीं पाओगे’. वह देवर को काला बतातीं और कहतीं कि तुमसे अच्छा तो सत्य (सत्येंद्रनाथ) गाते हैं. मजाक में वह कहतीं कि रवि में सिर्फ एक गुण है-वह सुपारी बहुत अच्छी तरह कतरता है.

कादंबरी देवी की आत्महत्या के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है. चूँकि रवींद्रनाथ की शादी के कुछ ही महीने बाद उन्होंने आत्महत्या कर ली थी, ऐसे में रवींद्रनाथ से उनके संबंधों पर भी बात हुई है. लेकिन उनकी आत्महत्या के कारणों पर एक राय नहीं है. रवींद्र जीवनीकार प्रभात कुमार मुखोपाध्याय के मुताबिक, कादंबरी देवी नि:संतान थी, इस कारण पति ज्योतिरिंद्रनाथ का ध्यान उनकी ओर कम था. ज्योतिरिंद्रनाथ बड़ी भाभी ज्ञानदानंदिनी और उनके बच्चों के साथ समय बिताना उसी तरह पसंद करते थे, जिस तरह रवींद्रनाथ को अपनी नयी भाभी का साथ पसंद था. एक बार ज्ञानदानंदिनी और उनके बच्चों के साथ ज्योतिरिंद्रनाथ स्टीमर पर सैर को गये थे. शाम को उन्हें लौटना था, लेकिन स्टीमर के रेत में फंस जाने के कारण लौटने में देरी हुई. कादंबरी देवी इस कारण कुछ नाराज थीं. एक और घटना यह बताई जाती है कि ज्योतिरिंद्रनाथ का एक कोट धोबी को दिया गया था, जिसकी जेब में एक अभिनेत्री के साथ ज्योतिरिंद्रनाथ की अंतरंगता से संबंधित कुछ चिट्ठियाँ कादंबरी देवी के हाथ लग गयी थीं. यह भी कहा जाता है कि अपने जीवन से हताश कादंबरी देवी ने पहले भी आत्महत्या करने की कोशिश की थी.

रवींद्रनाथ के जीवनीकार कृष्ण कृपलानी ने (रवींद्रनाथ टैगोर-ए बायोग्राफी) इस मामले में संतुलित रुख अपनाया. उन्होंने लिखा, ‘कादंबरी देवी की आत्महत्या का रहस्य ठाकुर परिवार के किसी सदस्य को अगर पता था, तो उनकी मृत्यु के साथ वह रहस्य भी दफन हो गया.’

रवींद्रनाथ ने अनेक जगह अपनी नयी भाभी को याद किया है,

‘बाँग्लादेश में देवर-भाभी का संबंध बेहद मधुर होता है. ऐसा और कहीं नहीं है. नयी भाभी (नोतून बौठान) की याद आती है. मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी. भाभी भी मुझे स्नेह करती थीं….जिनकी मृत्यु हो जाती है, वे फिर नहीं लौटते. उन्हें फिर हम कभी देख नहीं सकते. सुना था कि पुकारने पर आत्मा मिलने आती है. गलत सुना था. नयी भाभी की मृत्यु मेरे हृदय में शूल-सी चुभी थी. याद है, उस रात बहुत देर तक मैंने छत पर टहलते हुए आसमान की ओर देखकर कहा था, आप कहाँ हैं नयी भाभी? एक बार सामने आइये’.7

 

Face of a woman, inspired by Kadambari Devi, by Rabindranath Tagore

रवींद्रनाथ की कविताओं और गीतों में कादंबरी देवी की व्यापक उपस्थिति है. कुछ जगह पर उनकी उपस्थिति स्पष्ट है, तो अधिकांश जगह पर अस्पष्ट है. उनके अनेक गीतों में कादंबरी देवी की उपस्थिति है. रवींद्रनाथ ने कभी इस बारे में लिखा था,

‘शुक्र है कि नयी भाभी की मृत्यु हो चुकी है. इसी कारण तो आज तक उन पर कविताएँ लिख पा रहा हूँ. अगर वह जीवित होतीं, तो शायद मुझ पर मुकदमा ठोक दिया जाता’. 8

कृष्ण दत्त और एंड्र्यू रॉबिन्सन ने लिखा है,

‘कादंबरी देवी के जीवित रहते ही रवींद्रनाथ ने अपनी चार कृतियाँ उन्हें समर्पित की थीं. भाभी की मृत्यु के बाद दो और किताबें उन्होंने समर्पित की. वर्ष 1901 में उन्होंने कादंबरी देवी को संपूर्ण रूप में ‘नष्टनीड़’ की चारुलता के रूप में चित्रित किया. बाद में इसी नाम से सत्यजित राय ने फिल्म बनाई. कविताओं में तो रवींद्रनाथ ताउम्र कादंबरी देवी को याद करते ही रहे. उनके चित्रों में एक रहस्यमयी स्त्री बार-बार आती है. अपने एक चित्रकार मित्र को उन्होंने बताया था कि यह स्त्री कादंबरी देवी है. दरअसल चित्र बनाते समय नोतून बौठान की बड़ी-बड़ी आँखें मेरे सामने आ जाती हैं. 9

रवींद्रनाथ के चर्चित गीत, ‘तुम क्या केवल एक चित्र हो’, का अर्थ इससे ज्यादा स्पष्ट होता है.

 

Mrinalini Devi

२.

कादंबरी देवी की तरह पत्नी मृणालिनी देवी की मृत्यु ने भी कवि को विचलित किया. ‘ठाकुरबाड़ीर अंदरमहल’ में चित्रा देब ने रवींद्रनाथ की पत्नी का जो खाका खींचा है, उससे स्पष्ट है कि ज्ञानदानंदिनी और कादंबरी देवी जैसी अपनी जेठानियों और ननद स्वर्णकुमारी के विपरीत मृणालिनी देवी घरेलू महिला थीं. हालाँकि ठाकुरबाड़ी में जो नाटक होते थे, उनमें शुरुआती दौर में मृणालिनी देवी ने रवींद्रनाथ के ‘राजा ओ रानी’ नाटक में भाग लिया था और नारायणी का किरदार निभाया था. नायक देवोत्तम की भूमिका में उनके जेठ सत्येंद्रनाथ थे. लेकिन एक-दो बार के अभिनय के बाद उनका वह सिलसिला छूट गया. सिलाइदह में जमींदारी का काम सँभालते हुए रवींद्रनाथ ने पत्नी को ‘रामायण’ के सहज और संक्षिप्त अनुवाद का काम दिया था. लेकिन वह उसे पूरा नहीं कर पाईं. मृणालिनी देवी की लेखन क्षमता के बारे में पूछे जाने पर उनकी ननद स्वर्णकुमारी ने एक बार कहा था,

‘उनके पति बंगाल के श्रेष्ठ लेखक हैं, इसलिए उन्होंने कुछ लिखने की जरूरत महसूस नहीं की’. 10

मृणालिनी देवी की मृत्यु 23 सितंबर, 1902 को हुई. रवींद्रनाथ के बड़े बेटे रथींद्रनाथ ने लिखा है,

‘कलकत्ते में माँ अपने लोगों के बीच एक बृहत परिवार के परिवेश में थीं. उन्हें सब प्यार करते थे, जोड़ासाँको के घर में सही अर्थ में वही मालकिन थीं. इसलिए कलकत्ता छोड़कर शांतिनिकेतन में रहना उनके लिए सुखद नहीं रहा. उन्हें अतिथिशाला के कुछ कमरों में अस्थायी तौर पर रहना पड़ा, जहाँ गृहस्थी सँवारने की गुंजाइश नहीं थी. लेकिन असुविधा सहकर भी वह मुस्कराते हुए पिता की मदद करने लगी थीं. पिता के लिए उन्होंने बहुत त्याग किया. जब-जब जरूरत पड़ी, तब-तब उन्होंने अपने गहने बेचकर पिता को रुपये दिए. अंत में उनके पास कुछ चूड़ियों और एक चेन के अलावा कुछ नहीं बचा था. शादी में उन्हें काफी गहने मिले थे, इसके अलावा अपनी सास के भी बहुत गहने उनके पास थे. लेकिन शांतिनिकेतन के विद्यालय का खर्च चलाने के लिए उन्होंने सारे गहने झोंक दिए. पिता अपनी कीमती संपत्ति पहले ही बेच चुके थे….शांतिनिकेतन एक विद्यालय मात्र नहीं था, वह पिता के आदर्श का स्वरूप था और माँ उनके आदर्श को धरातल पर उतारने के लिए लगातार त्याग करती रहीं. इसके लिए उन्हें अपने रिश्तेदारों की आलोचना भी सहनी पड़ी, जो पिता को गैरजिम्मेदार मानते थे.

शांतिनिकेतन में कुछ महीने रहने के बाद माँ की तबीयत खराब होने लगी. जब वह एकदम अस्वस्थ हो गईं, तब इलाज के लिए उन्हें कलकत्ते ले जाने की व्यवस्था की गई. पिता तब कलकत्ते में ही थे. उन्होंने दीपेंद्रनाथ भैया से माँ को कलकत्ता ले आने के लिए कहा. बोलपुर से ट्रेन में माँ को कलकत्ता ले जाने का दृश्य एक सामान्य वजह से मुझे हमेशा याद रहेगा. माँ सोई हुई थीं और मैं खिड़की से बाहर का दृश्य देख रहा था.

कलकत्ते में माँ की बीमारी और बढ़ गई. ऐलोपैथ डॉक्टर जब माँ की बीमारी पकड़ नहीं पाए, तब पिता ने होम्योपैथी चिकित्सा शुरू कराई. डॉक्टरों की चिकित्सा और पिता की निरंतर सेवा के बावजूद माँ स्वस्थ नहीं हुईं. अब मुझे संदेह होता है कि माँ को एपेंडिसाइटिस हुआ था. तब इस बारे में खास जानकारी नहीं थी, इसके ऑपरेशन की भी शुरुआत नहीं हुई थी. माँ की मृत्यु से एक दिन पहले पिता ने मुझे उनके कमरे में उनके बिस्तर पर बैठने के लिए कहा. तब तक माँ की बोलने की शक्ति चली गई थी. सिर्फ उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे. माँ से वही मेरी आखिरी मुलाकात थी. उस रात पिता ने हम सभी भाई-बहनों को पुराने घर के तिमंजिले पर सोने के लिए भेज दिया. हम सब ने आशंका के बीच रात बिताई. मुँह अँधेरे उठकर बरामदे से हम उस घर की ओर देख रहे थे. पूरी तरह शांति थी. तभी हम लोग समझ गए कि माँ नहीं रहीं, उन्हें अंतिम यात्रा के लिए ले जाया गया है. उस दिन देर रात तक घर पर लोगों की भीड़ थी.

पिता संयम के साथ सबसे बात कर रहे थे, लेकिन वह किस दुख में थे, यह हम सब समझ रहे थे. एक महीने से वह लगातार माँ की सेवा कर रहे थे, उन्होंने नर्स रखने नहीं दिया था. उनके थककर निढाल हो जाने की बात थी. तिस पर अब वह इस शोक का सामना कर रहे थे. जब सब लोग चले गए, तब पिता ने मुझे बुलाकर माँ की चप्पल सौंपते हुए कहा, ‘इसे अपने पास रखना, मैंने तुम्हें दिया’. यह कहकर वह अपने कमरे में चले गए. माँ की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद हम शांतिनिकेतन लौट गए. पिता ने विद्यालय के कामकाज में अपना ध्यान और बढ़ा दिया. जब भी समय मिलता, अपने शोकाकुल हृदय को वह कविता में उँड़ेल देते थे, जो बाद में पुस्तक के रूप में ‘स्मरण’ नाम से निकली.-11

कृष्ण कृपलानी के मुताबिक, पत्नी की मृत्यु का शोक रवींद्रनाथ की 27 कविताओं के एक छोटे-से संग्रह के रूप में सामने आया.

रवींद्रनाथ ने अपनी बीमार पत्नी की किस तरह सेवा की थी, इसका विवरण मैत्रेयी देवी ने भी अपनी किताब, ‘रवींद्रनाथ : गृहे ओ विश्वे’ में दिया है,

‘लगभग दो महीने वह (कवि पत्नी) बिस्तर पर थीं, लेकिन भाड़े के नर्सों को उन्होंने पत्नी की सेवा का दायित्व नहीं सौंपा….तब बिजली के पंखे नहीं आये थे. हाथपंखे से दिन-रात वह पत्नी को हवा करते थे’. 12

 

 

3.

पत्नी के देहांत के बाद रवींद्रनाथ को मझली बेटी रेणुका की मृत्यु का शोक सहना पड़ा. रवींद्रनाथ की तीन बेटियाँ थीं-माधुरीलता यानी बेला, रेणुका यानी रानी और अतसी यानी मीरा. इनमें से मझली बेटी रेणुका की किशोरी उम्र में ही मृत्यु हो गयी थी. बेहद जिद्दी रेणुका की ग्यारह साल की उम्र में शादी हो गयी थी. माँ की मृत्यु और पति के विदेश से विफल होकर लौटने के कारण रेणुका अवसाद में चली गई थी. रेणुका के बारे में रवींद्रनाथ ने प्रशांतचंद्र महालनवीस (भारतीय साँख्यिकी के जनक) की पत्नी रानी को बताया था,

‘तुम्हें मैंने मझली बेटी रानी के बारे में बहुत बार बताया है. उसकी मृत्यु के समय उसकी माँ जीवित नहीं थीं. बीमारियों के दौरान मैंने ही उसकी सेवा-सुश्रुषा आखिर तक की थी….कितनी बार तो पूरी रात मैं उसे पंखा झलता रहा था, लेकिन जरा भी नहीं थका. अपने पिता के हाथों से ही दवा और पथ्य लेना उसे भाता था. हमेशा उसे उसका पिता चाहिए था. उसकी शादी हो चुकी थी, लेकिन पिता ही उसकी धारणा के केंद्र में था. जब मैं उसे चेंज के लिए अल्मोड़ा ले गया था, तब वह ज्यादा ही बीमार थी. उसे खुश रखने के लिए मैं रोज कविता लिखकर बिस्तर पर उसके बगल में बैठकर सुनाता था, जिससे कि उसे पीड़ा से थोड़ी राहत मिले. 

मेरा ‘शिशु’ काव्यग्रंथ उन्हीं कविताओं का संग्रह है. वे सारी कविताएँ मैंने रानी की बीमारी के दौरान लिखी थी. जब उसकी बीमारी और बढ़ गई, तब मुझे समझ में आया कि उसे वहाँ और रखना ठीक नहीं. इसलिए उस दिन ही मैं उसे लेकर पहाड़ से नीचे उतर गया. रानी को वहाँ से ले आने का फैसला तो मैंने कर लिया, लेकिन वाहन की कोई व्यवस्था नहीं कर पाया था. उसकी स्थिति इतनी गंभीर थी कि उसे लिटाकर ही लाया जा सकता था. बहुत मुश्किल से ज्यादा रुपये देकर कुलियों के सहारे रानी को पलंग समेत नीचे ले आने में मैं सफल रहा था. काठगोदाम रेलवे स्टेशन अल्मोड़ा की बड़ी सड़क से लगभग अस्सी मील दूर था. लेकिन पहाड़ी रास्तों से जाने पर वह दूरी तीस-बत्तीस मील ही थी. तय हुआ कि रानी खाट पर जाएगी और मैं उसके साथ-साथ पैदल चलूंगा. शाम को थक-हारकर स्टेशन पहुँचने पर पता चला कि ट्रेन निकल गई है. पूरी रात वहाँ रुककर अगले दिन गाड़ी पकड़नी पड़ेगी. रानी की तबियत और बिगड़ गई थी. मैं खुद पैदल चलकर थक चुका था. पर अब समस्या स्टेशन पर रात बिताने की थी. डाक बंगले में कुछ अंग्रेज स्त्री-पुरुष थे. लेकिन उन्होंने हमें वहां रुकने ही नहीं दिया. मैंने उनसे विनती की कि मेरी बेटी बहुत बीमार है, रात भर रुकने दीजिए. लेकिन शायद बेटी की बीमारी के कारण ही वे हमें वहाँ रुकने नहीं देना चाहते थे. वैसे में, स्टेशन के पास एक छोटी-सी धर्मशाला ढूँढ़कर दोमंजिले पर एक कमरे में मैंने रानी को सुलाया. नीचे लकड़ी का टाल था, और ऊपर यात्रियों के रहने के लिए दो कमरे थे. बेटी के सिरहाने बैठकर पूरी रात बीत गई….अगले दिन रेल से मैं रवाना तो हो गया, लेकिन एक और विपत्ति हमारा पीछा कर रही थी. कोई एक स्टेशन था, नाम याद नहीं, शायद मुगलसराय रहा होगा. गाड़ी के रुकते ही रानी के लिए थोड़े दूध का इंतजाम करने के लिए मैं उतरा. बेंच पर अपना मनीबैग रख गया था. लौटकर देखा कि थैली गायब है. बहुत गुस्सा आया. साथ में एक मरीज है, लेकिन एक पैसा नहीं है….रानी को कलकत्ता लाने के कुछ ही दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई. मृत्यु से ठीक पहले उसने मुझसे कहा, ‘बाबा, एक बार ‘पिता नोहसि’ (‘आप ही हमारे पिता हैं’) का पाठ कीजिए’. वह पाठ पूरा होते ही उसने आखिरी साँस ली’.-13

शांतिनिकेतन में ब्रह्म समाज की सुबह की उपासना में गुरुदेव इसी का पाठ करते थे-‘ओउम, पिता नोहसि! पिता नो बोधि! नमस्तेहस्तु’-यानी आप हमारे पिता हैं. हम आपको अपने पिता की तरह समझ पाएँ. आप तक मेरा प्रणाम पहुँचे.

रथींद्रनाथ ने भी अपनी पुस्तक में छोटी बहन रानी की मृत्यु पर लिखा है,

‘माँ की मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद छोटी बहन रानी बीमार हो गई. तब तक उसकी शादी हो चुकी थी. माँ के जीवित रहते ही उसकी शादी कर दी गई थी. बहनोई सत्येंद्रनाथ तब विलायत में थे. डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पिता ने ही उन्हें विलायत भेजा था. रानी के इलाज की जिम्मेदारी भी उन्हें ही लेनी पड़ी. डॉक्टर ने क्षय रोग की आशंका जताई और बहन को किसी स्वास्थ्यकर जगह पर ले जाने की सलाह दी….रानी को लेकर पिता हजारीबाग चले गए. छोटे भाई शमी के साथ मैं आश्रम में रह गया. हजारीबाग में कोई लाभ न होने पर पिता ने रानी को पहाड़ की ओर ले जाने की योजना बनाई. अल्मोड़ा में एक घर की व्यवस्था हुई. लेकिन अल्मोड़ा जाने का रास्ता अत्यंत दुर्गम था. पर पिता किसी तरह उसे लेकर अल्मोड़ा पहुँचे थे. …अल्मोड़ा में रानी के स्वास्थ्य में सुधार न होने पर पिता उसे कलकत्ते ले आए थे. डॉक्टरों ने कहा था कि इस बीमारी में धूप का सेवन अच्छा है, इसलिए कलकत्ता आकर पिता ने घर की छत पर चारों तरफ से काँच से घिरा एक कमरा रानी के लिए बनवा दिया था. लेकिन काल को रोका नहीं जा सका. माँ की मृत्यु के नौ महीने बाद रानी हमें छोड़कर चली गई. सुना है, मृत्यु से पहले उसने कहा था, चारों ओर अँधेरा छा रहा है, कुछ दिखाई नहीं देता बाबा.’-14

बेटी की मृत्यु ने रवींद्रनाथ को भीतर से तोड़ दिया, पर बाहर से वह अविचल दिखे. चंद्रिल भट्टाचार्य लिखते हैं,

‘जिस दिन रानी की मृत्यु हुई, उस शाम रवींद्रनाथ के बैठकखाने में बड़े-बड़े नेता उनसे बंगभंग पर चर्चा करने के लिए आए थे. दस बजे रात तक बैठक चली थी. बैठक खत्म होने के बाद रवींद्रनाथ जब अतिथियों को बाहर तक छोड़ने के लिए आए, तब रामेंद्रसुंदर त्रिवेदी ने जूते का फीता बाँधते-बाँधते पूछा, ‘रवि बाबू, आज आपकी बेटी कैसी है? पहले से अच्छी है न?’

रवींद्रनाथ ने शांत स्वर में कहा,

‘आज दोपहर को उसकी मृत्यु हो गई’.

रवींद्रनाथ की यह तटस्थता नई नहीं थी. मुंगेर में उनके छोटे बेटे शमींद्रनाथ की हैजे में मौत हो गई थी. उसका दाह संस्कार करने के बाद रवींद्रनाथ और उनके दो सहयोगी अध्यापक ट्रेन से बोलपुर लौट रहे थे. साहेबगंज में उन्हीं में से एक अध्यापक के मामा उनसे मिलने आए. रवींद्रनाथ ने मुस्कराते हुए उनसे बहुत देर तक बात की. बाद में भानजे ने अपने मामा को दूर ले जाकर बताया कि रवि बाबू ने कुछ ही घंटे पहले अपने बेटे का दाह संस्कार किया है.’

रेणुका के बाद कविगुरु को प्राणों से प्यारे अपने छोटे बेटे की मृत्यु यंत्रणा सहनी पड़ी. नवंबर, 1907 में-यानी मृणालिनी देवी की मृत्यु के ठीक पाँच साल बाद शमींद्रनाथ यानी शमी की तेरह साल की उम्र में मृत्यु हो गई. उस साल रवींद्रनाथ ने शमी को दुर्गापूजा की छुट्टी में अपने दोस्त श्रीश चंद्र मजूमदार के यहाँ मुंगेर भेजा था. शमी संतोष चंद्र के बेटे भोला के साथ मुंगेर गये थे. रवींद्रनाथ के बड़े बेटे रथींद्रनाथ और श्रीशचंद्र मजूमदार के बेटे संतोष चंद्र से ही शांतिनिकेतन की शुरुआत हुई थी. संतोषचंद्र ने बाद में रथींद्रनाथ के साथ अमेरिका से कृषिविज्ञान में डिग्री ली थी और फिर शांतिनिकेतन के कामकाज से जुड़ गये थे. मुंगेर की पीरपहाड़ी में ठाकुर खानदान की हवेली भी थी. कहते हैं कि कविगुरु ने वहाँ कुछ गीत लिखे थे, जो बाद में ‘गीतांजलि’ में शामिल हुए. मुंगेर में शमी को हैजा हुआ और उसकी मृत्यु हो गई.

शमींद्रनाथ के चेहरे और स्वभाव में रवींद्रनाथ ने अपना बचपन देखा था. शमी रवींद्रनाथ और मृणालिनी देवी की सबसे छोटी संतान थे. पत्नी को लिखे एक पत्र में रवींद्रनाथ ने इच्छा जताई थी कि शमींद्र को वह कठोर और हर परिस्थितियों से जूझ सकने वाला व्यक्ति बनाएंगे. शमींद्र बचपन से ही कमजोर और बीमार रहते थे. इसलिए शांतिनिकेतन में उनकी देखभाल उम्र में उनसे बारह साल बड़े भैया रथींद्रनाथ किया करते थे. रथींद्रनाथ जब कृषि विज्ञान में उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका में थे, तब शांतिनिकेतन की खबर उन्हें शमी ही दिया करते थे. रवींद्र जीवनीकार प्रभातकुमार मुखोपाध्याय के मुताबिक, शमी के ही प्रयास से ही श्रीपंचमी के दिन शांतिनिकेतन में ऋतु उत्सव की शुरुआत हुई थी. शांतिनिकेतन में शमींद्रनाथ के सहपाठी रहे सुधीरंजन दास ने लिखा है,

‘गुरुदेव के छोटे बेटे शमी मेरे साथ पढ़ते थे. शमी का चेहरा हूबहू गुरुदेव की तरह था-रंग, चेहरे का गठन और देखने की मुद्रा-सब एक जैसी थी. बहुत अच्छा गाते भी थे.’-15

शमी की मृत्यु रवींद्रनाथ के लिए बड़ा झटका थी. हालाँकि बाहर से वह अविचल दिखे, लेकिन इस मृत्यु ने उन पर असर डाला. रथींद्रनाथ ने लिखा है,

‘पिता को चाहे जितना भी बड़ा आघात क्यों न लगा हो, उसे कभी वह व्यक्त नहीं करते थे. शमी की मृत्यु के बाद जितने भी लोग उपस्थित हुए, वे सब यह देखकर चकित थे कि किस तरह पिता ने अपने व्यक्तिगत दुख पर विजय पाई है. इस मामले में उनका आत्मसंयम महर्षि (देवेंद्रनाथ ठाकुर) की तरह था.’ 16

मैत्रेयी देवी ने अपनी पुस्तक में शमी के बारे में हेमलता ठाकुर (रवींद्रनाथ के सबसे बड़े भाई द्विजेंद्रनाथ ठाकुर की बड़ी पुत्रवधु) के हवाले से लिखा है-

‘…वह लड़का उनका बड़ा प्रिय था. शमी की मृत्यु के बाद मैंने एक दिन देखा कि वह (रवींद्रनाथ) उसके तमाम कपड़े लेकर बैठे हुए हैं. मुझे कहा, छोटी बहू (मृणालिनी देवी) ने उसके लिए मखमल का सूट तैयार करवाया था, मैंने ही नहीं पहनने दिया कि बेटा बाबूगीरी सीख जाएगा. मेरी गोद में रहना उसे अच्छा लगता था. लेकिन मैंने उसे गोद में नहीं लिया कि बाद में दुलरुआ हो जाएगा. मेरे पास सोना उसे बढ़िया लगता था, पर मैंने उसे अपने पास सोने भी नहीं दिया. सोचा था कि उसे सख्त इंसान बनाऊंगा. बालक शमी को जब पूछा जाता कि वह किससे सबसे अधिक प्यार करता है, तो वह कहता कि किसी को बताएंगे तो नहीं? बाबा को.’17

शमींद्र के बाद बड़ी बेटी माधुरीलता या बेला के जाने की बारी थी. माधुरीलता ने अपनी चचेरी बहनों की तरह लॉरेटो में पढ़ाई नहीं की थी. उनकी पढ़ाई घर में ही हुई की थी. अंग्रेज शिक्षिकाएँ उन्हें पढ़ाने आती थीं.

 

 

३.

माधुरीलता मात्र 31 साल तक जीवित रहीं. रवींद्र पूर्व बाँग्ला साहित्य के दिग्गज कवि बिहारीलाल चक्रवर्ती के वकील बेटे शरत के साथ उनका रिश्ता तय हुआ था. शरत मुजफ्फरपुर में वकील थे. यह बिहारीलाल चक्रवर्ती वही थे, रवींद्रनाथ की भाभी कादंबरी देवी जिनकी कविताओं की मुरीद थीं. उनकी बैठक में बिहारीलाल चक्रवर्ती विशेष आमंत्रित अतिथि होते थे. पर बेला की शादी के समय बिहारीलाल जीवित नहीं थे. उनकी पत्नी ने दहेज में दस हजार रुपये की मांग की थी. शादी के बाद जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी की लड़की बेला को मुजफ्फरपुर में एक और बाँग्ला लेखिका अनुरूपा देवी का साथ मिला. दोनों ने मिलकर वहाँ पर्दा प्रथा के खिलाफ मुहिम शुरू की और लेडीज कमेटी का गठन किया था. इन दोनों के प्रयत्न से मुजफ्फरपुर में चैपमैन बालिका विद्यालय भी खुला. कमोबेश यह वही समय था, जब भागलपुर में एक और बंगाली महिला बेगम रुकैया सखावत हुसैन ने पर्दा प्रथा के खिलाफ मुहिम शुरू की थी.

रवींद्रनाथ के पत्रों में बड़ी बेटी के पास मुजफ्फरपुर जाने का वर्णन मिलता है, जहाँ लोग उन्हें घेरे रहते थे. हालाँकि शरत के विदेश चले जाने के बाद माधुरी जोड़ासाँको लौट गईं. माधुरीलता में साहित्यिक प्रतिभा थी और उन्होंने कुछ कहानियों में भी हाथ आजमाया था. रवींद्रनाथ को लगता था कि तमाम संतानों में से माधुरी में ही लेखकीय प्रतिभा है. तब तक मझली बहन रेणुका का निधन हो चुका था और माधुरी पति के साथ कलकत्ते स्थित ससुराल में रहने चली गयी. वहाँ बीमारी ने उसे जकड़ लिया. रवींद्रनाथ उन दिनों बहुत व्यस्त थे लगातार विदेश यात्रा पर जाते रहते थे. इसलिए बड़ी बेटी को पर्याप्त समय नहीं दे पाए. जिस टीबी ने रेणुका को असमय छीन लिया, उसी बीमारी ने माधुरी को जकड़ लिया था. रवींद्रनाथ रोज अपनी बेटी से मिलने जाते. वहां दामाद उनका अपमान करता, उनके सामने मेज पर पैर रखकर सिगरेट पीता. उसने अपने ससुर पर यह आरोप तक लगाया कि उन्होंने शांतिनिकेतन की स्थापना इसलिए की है, ताकि गलत-सलत काम कर सकें.-18.

जबकि बड़े दामाद को वकालत पढ़ने के लिए रवींद्रनाथ ने विदेश भेजा था. एक दिन कवि बेला को देखने जा रहे थे. रास्ते में ही उन्हें उसकी मौत की खबर मिली. वह वापस लौट आये. प्रभातकुमार मुखोपाध्याय ने लिखा है,

‘कवि को अमेरिका जाना था. लेकिन इस बीच यह खबर आई कि सैनफ्रांसिस्को में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचते कुछ भारतीयों की गिरफ्तारी हुई है. दस्तावेजों से पता चलता है कि रवींद्रनाथ के उन युवकों से संबंध थे. रवींद्रनाथ इससे बहुत चिंतित थे. इस बीच उनकी बड़ी बेटी मृत्यु शय्या पर थी. सोलह मई को बड़ी बेटी बेला की मृत्यु हो गई. कवि रोज दोपहर को बड़ी बेटी से मिलने जाते थे. उस दिन भी जा रहे थे. तभी उन्हें बेटी की मृत्यु की खबर मिली. वह बेटी के यहां नहीं गए’.19

अद्भुत संयोग है कि बेला जब छोटी थी, तब उसे केंद्र में रखकर रवींद्रनाथ ने ‘जेते नाहीं देबो’ (जाने नहीं दूंगी) जैसी मार्मिक, दार्शनिक कविता लिखी थी. इसमें एक छोटी-सी बेटी काम के लिए बाहर जा रहे अपने पिता का रास्ता रोकती है. कविता में कवि कहते हैं, ‘कोई जाने नहीं देना चाहता, पर सब को जाने देना पड़ता है.’ बेला की मृत्यु पर रवींद्रनाथ को वही कविता बार-बार याद आती रही.

रथींद्रनाथ ने अपनी दीदी बेला के बारे में लिखा,

‘दीदी पिता की चहेती थी. हम भाई-बहनों को यह पता था, लेकिन इस कारण हममें कभी ईर्ष्या भाव पैदा नहीं हुआ, क्योंकि हम सब भी दीदी को प्यार करते और उन्हें मानते थे. दीदी की बुद्धि हम सब से ज्यादा है, यह स्वीकारने में हमें शर्म नहीं थी. वह अद्भुत सुंदर थीं, इस कारण घर में सभी उन्हें खूब प्यार करते थे. सिलाइदह में जब हमारी पढ़ाई शुरू हुई, तब दीदी पढ़ाई में हम सबसे बहुत आगे निकल गई थीं. पिता उन्हें अलग से पढ़ाते थे. तभी वह समझ गए थे कि दीदी में लेखन क्षमता है. पिता ने उन्हें उत्साहित किया, तो दीदी ने कुछ कहानियाँ लिखीं’.-20

वर्ष 1921 में एक और मृत्यु ने रवींद्रनाथ को झटका दिया. हालांकि यह मृत्यु उनके परिवार से जुड़ी नहीं थी. इस बार काल ने साहित्यकार उपेंद्रकिशोर रायचौधुरी के बेटे और सत्यजित राय के पिता सुकुमार राय को छीन लिया. रवींद्रनाथ सुकुमार राय से स्नेह करते थे. शांतिनिकेतन में कवि के 51वें जन्मदिवस पर जो आयोजन हुआ था, उसमें सुकुमार राय की मौजूदगी थी. वर्ष 1912 में रवींद्रनाथ जब लंदन गए थे, तब सुकुमार राय वहाँ की रॉयल फॉटोग्राफिक सोसाइटी के सदस्य थे. सत्यजित राय के जन्म के कुछ समय बाद ही सुकुमार राय कालाजार से पीड़ित हुए और उनके बचने की आशा न रही. यह सुनकर कविगुरु सुकुमार राय से मिलने पहुँचे. बासठ साल के रवींद्रनाथ छत्तीस साल के सुकुमार राय के सिरहाने बैठे थे और अपने से करीब आधी उम्र की साहित्यिक प्रतिभा को मरते हुए देख रहे थे. बीमार राय ने उनसे दो गीत सुनाने के लिए कहा. वह बात करने की स्थिति में नहीं थे, ऐसे में, रवींद्रनाथ की किताब से गाने निकाल कर उन्होंने दिखाया. उनमें से एक गीत ‘गीतांजलि’ से था,

‘आछे दुक्खो, आछे मृत्यु, विरहदहन लागे, तबु ओ शांति, तबु आनंदो, तबु अनंत जागे.’

(दुख है, मृत्यु है, अलग होने की पीड़ा है, फिर भी शांति है, आनंद है, इसके जरिये अनंत, आनंद तक हम पहुंचते हैं.)

बताया जाता है कि कविगुरु ने यह गीत पत्नी मृणालिनी देवी की मृत्यु के बाद लिखा था. सुकुमार राय की मृत्यु के अगले दिन रवींद्रनाथ ने शांतिनिकेतन में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए जो कुछ कहा, वह मृत्यु के बारे में कवि के नजरिये के बारे में बताता है. उन्होंने कहा,

‘मैंने अनेक मौतें देखी हैं. लेकिन इस कमउम्र युवा को, अपनी अल्पायु लिए मृत्यु के सामने इतनी निष्ठा के साथ परम पुरुष को अर्घ्यदान करते नहीं पाया. मनुष्य जब भीषण बीमारी से ग्रस्त होता है, तब मृत्यु के साथ उसकी जीवनी शक्ति का संघर्ष ही सबसे प्रमुख होता है. लेकिन दूसरे जीवों की तरह मनुष्य केवल प्राणी नहीं है. जो प्राणशक्ति हमें जीवन के घाट से मृत्यु के घाट तक पहुंचाती है, हम लोग उससे पड़ा पाथेय लेकर पैदा हुए हैं. यह पाथेय मृत्यु को पीछे छोड़ अमृतलोक तक हमें पहुंचाने के निमित्त है. जो सिर्फ प्राणी हैं, उनके लिए मृत्यु ही अंतिम सत्य है. लेकिन मनुष्य के जीवन में मृत्यु अंतिम सत्य नहीं है. अपनी जीवन यात्रा में बहुत बार हम यह सच्चाई भूल जाते हैं….’

वृद्धावस्था में भी मृत्युशोक ने रवींद्रनाथ का पीछा नहीं छोड़ा. बेटे-बेटियों के बाद अब नाती की बारी थी. सात अगस्त, 1932 को छोटी बेटी मीरा के बेटे नीतींद्रनाथ यानी नीतू की मृत्यु हो गयी. छोटे बेटे के अलावा दो बेटियों को रवींद्रनाथ खो चुके थे, इसलिए अपने नाती नीतींद्र से वह बेहद स्नेह करते थे. वर्ष 1932 में ही रवींद्रनाथ ने बीस साल के नीतींद्र को छापाखाने का काम सीखने जर्मनी भेजा था. उसी साल जून में नीतींद्र की टीबी की बीमारी पकड़ी गई. रवींद्रनाथ की सूचना पर सी.एफ. एंड्र्यूज नीतींद्र के पास जर्मनी पहुँचे. उनका इलाज चला. माँ मीरा देवी और पिता नगेंद्रनाथ भी जर्मनी पहुँचे. एक सेनिटोरियम में नीतू को रखा गया था. आखिरकार सात अगस्त को उसकी मृत्यु हो गई. बाँग्ला में वह श्रावण की 22 तारीख थी. नौ साल बाद इसी तारीख को रवींद्रनाथ का निधन हुआ. प्रशांतचंद्र महालनवीस और रथींद्रनाथ ने कविगुरु को नीतू की मृत्यु की खबर सुनाई.

नीतू की मृत्यु के बाद रवींद्रनाथ ने मीरा को लिखे पत्र में कहा था,

‘मैं इस पृथ्वी में आकर जिन-जिन लोगों से मिला, उनमें से ज्यादातर को काल की पुकार पर चले जाना पड़ा. ऐसा बार-बार हुआ, बार-बार होगा. मेरे परिवार में जितनी भी विपत्तियाँ आए, हमारा बृहत परिवार अविचल है, उसके साथ कदम मिलाकर तो चलना ही पड़ेगा….घर-घर में कितने दुख, कितनी वेदनाएँ हैं, काल रोज उसे थोड़ा-थोड़ा करके पोंछ दे रहा है. मेरे जीवन में भी उस अदृश्य काल का हाथ है….नीतू से मैं बहुत स्नेह करता था, इसके अलावा तुम्हारे बारे में सोचकर भी बहुत दुख होता था. लेकिन तमाम लोगों के सामने अपने दुख की चर्चा करते हुए शर्म आती है. ऐसा हम तब करते हैं, जब व्यक्तिगत शोक हमारी सहज जीवन यात्रा को प्रभावित करता है, और जो लोगों को दिखता है. मैं किसी से नहीं कहता कि मेरे लिए रास्ता छोड़ दो, सब जिस तरह चल रहे हैं, मैं उसी तरह चलूंगा….जिस रात शमी नहीं रहा, उस रात मैंने पूरे मन से यह कहा था कि विराट विश्व सत्ता में उसकी अबाध गति हो, मेरा शोक उसे पल भर के लिए पीछे की तरफ न लौटाए. इसी तरह नीतू के न रहने की बात जिस दिन सुनी, तब से खुद को बार-बार यही कह रहा हूँ कि अब तो मेरे लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहा. केवल यह कामना कर सकता हूँ कि इस विराट सत्ता में नीतू को जो जगह मिली होगी, वहाँ उसका कल्याण हो. वहाँ तक हमारी सेवा नहीं पहुँचती, लेकिन हमारा स्नेह भाव शायद पहुँचता है. ऐसा न होता, तो प्रेम और स्नेह भला स्थायी क्यों होता? शमी की जिस रात मृत्यु हुई, उसकी अगली रात ट्रेन से आते हुए मैंने देखा कि आकाश चाँदनी से भरपूर है, किसी भी जगह ज्योत्स्ना की कोई कमी नहीं दिखी. लगा नहीं कि आकाश में कोई जगह खाली बची है. मेरे अंतर्मन से आवाज आई, सभी के बीच सब व्याप्त हैं, मैं भी उन्हीं में हूं. उस समस्त के साथ मेरा काम अभी बाकी है. जब तक जीवित रहूंगा, वह काम चलता रहेगा. प्रार्थना करता हूँ कि तब तक मुझमें साहस रहे, मन में अवसाद न आए, कहीं से कोई सूत्र अलग न हो जाए-जो कुछ घटित हो रहा है, मैं उसे सहजता से स्वीकार कर सकूँ’. 21

नीतू की मृत्यु के संदर्भ में रवींद्रनाथ को अपने छोटे बेटे शमी की मृत्यु याद आई थी. बेटे के दाह संस्कार के बाद चाँदनी रात में ट्रेन से लौटते हुए रवींद्रनाथ के मन में जो अनुभूति हुई थी, वह बाद में चाँदनी रात से संबंधित उनके एक प्रसिद्ध गीत के रूप में सामने आई, ‘आज ज्योत्स्ना राते सबाई गैछे बने‘ (चाँदनी रात में सभी जंगल की ओर गए हैं). रवींद्र अध्येता इस गीत को शमी की मृत्यु की स्मृति से जोड़ते हैं.

लेखक चारुचंद्र बंद्योपाध्याय ने रवींद्रनाथ के इस चर्चित गीत के बारे में लिखा है,

‘किसी एक उत्सव के सिलसिले में हम बहुत से लोग बोलपुर गये थे. शायद ‘राजा’ नाटक का मंचन होना था. वसंत ऋतु थी, चाँदनी बरस रही थी. जितने स्त्री-पुरुष आये थे, सब बोलपुर के पास ही पारुलडांगा नाम के एक सुंदर वन में घूमने गये थे. सिर्फ मैं नहीं गया था, क्योंकि बहुत रात में लौटना होता….रात गहरा गयी थी. तभी अचानक मैंने मेरी नींद टूट गयी. महसूस हुआ, शांतिनिकेतन के निचले तल्ले में सामने के मैदान की ओर से किसी के गाने की आवाज आ रही है. छत पर जाकर मैंने देखा, कविगुरु चाँदनी से भरपूर रास्ते में टहल रहे हैं, और धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रहे हैं. मैं धीरे-धीरे बेआवाज नीचे उतरा, उनका ध्यान मेरी ओर नहीं गया. अपने मन में गुनगुनाते हुए वह उसी तरह टहल रहे थे. वह गा रहे थे, ‘आज ज्योत्स्ना राते…’ पुत्र शमींद्रनाथ की मृत्यु के बाद किसी एक चाँदनी रात को याद करते हुए रवींद्रनाथ ने यह गीत लिखा था, ऐसा बांग्ला समाज में प्रचलित है. यह गीत उस परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है या नहीं, मुझे नहीं मालूम. लेकिन इतना जरूर है कि किसी प्रिय व्यक्ति के प्रेम और उसकी वेदना भरी प्रतीक्षा इतने दर्द के साथ किसी और रचना में सामने नहीं आई.‘

 

४.

रवींद्रनाथ की तीसरी बेटी अतसी या मीरा का जीवन भी सुखद नहीं रहा. मीरा ने बचपन में ही माँ, भाई और दीदी को खो दिया था. चाची ज्ञानदानंदिनी ने उन्हें पाला था. मीरा का विवाहित जीवन भी सुखी नहीं हुआ. दामाद नगेंद्र ने अमेरिका भेजे जाने की शर्त पर मीरा से शादी की थी. जोड़ासाँको में शरत-माधुरी से नगेंद्र का विवाद हुआ था. बाद में नगेंद्र ईसाई बनकर मीरा के जीवन से दूर चले गये. मीरा की दो संतानें भी बीमारी में असमय चली गयीं.

रवींद्रनाथ का व्यक्तिगत जीवन दुखों से निर्मित था. मृत्यु बार-बार विविध रूपों में उनको निशाना बनाती रही. मृत्यु के साथ रवींद्रनाथ का इतना गहरा संबंध था कि ऐन उनकी शादी के दिन भी उसने उनके घर पर धावा बोला था. ठाकुरबाड़ी में दूल्हे के ससुराल जाने के बजाय दुल्हन के ही पालकी में बैठकर ससुराल आने की प्रथा थी. जब नवोढ़ा मृणालिनी देवी की पालकी ठाकुरबाड़ी की देहरी में घुस रही थी, तभी रवींद्रनाथ की दीदी सौदामिनी देवी के पति शारदा प्रसाद की अचानक मृत्यु हो गयी. शारदा प्रसाद ठाकुरबाड़ी में ही घर जमाई की हैसियत से रहते थे. अजीब दुर्योग था कि जिस दिन रवींद्रनाथ विवाहित जीवन शुरू करने जा रहे थे, उसी दिन उनकी दीदी का सुहाग उजड़ गया. तब से सौदामिनी देवी ने अपना जीवन पिता की सेवा में समर्पित कर दिया था. पिता महर्षि देवेंद्रनाथ जोड़ासाँको से दूर पार्क स्ट्रीट के एक घर में रहते थे.

अस्सी साल के लंबे जीवन काल में रवीद्रनाथ ने परिजनों और परिचितों की लगभग चालीस मौतें देखी थीं. लेकिन कवि के लिए मृत्यु शोक के साथ सीख भी थी. रवींद्र संगीत और रवींद्र काव्य विशेषज्ञ पूर्णेंदु विकास सरकार के शब्दों में,

‘जो मृत्यु बार-बार कवि के लंबे जीवन में हमला करती रही, उसी मृत्यु ने उन्हें इसके शोक से उबरने का रास्ता भी बताया. गहरे मानसिक आघात या दुनिया की जटिलताओं के कारण कवि का मन जब बेचैन हो उठता, तब वह अपने गीतों में इससे उबरने का रास्ता खोजते थे’. 22

कृष्ण कृपलानी ने लिखा है,

‘मृत्यु रवींद्रनाथ को तोड़ नहीं पायी, इसने उनमें जीवन के प्रति गहरी समझ विकसित की. कम से कम उनकी रचनाओं में परिवार की सिलसिलेवार मौतों से व्याप्त दुख नहीं दिखता. यही उन्हें एक बड़ा रचनाकार साबित करता है.’

रथींद्रनाथ ठाकुर ने लिखा है,

‘जीवन के उतार-चढ़ाव, दुख या वेदना ने मेरे पिता के मानस को कभी प्रभावित नहीं किया. अपने पिता महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर की तरह वह हमेशा शांत बने रहे और भीषण त्रासदी भी उनकी आंतरिक शांति को परेशान नहीं कर सकी….निरंतर त्रासदियों के बीच भी उनकी कलम ने विराम नहीं लिया. जब वह रानी की देखभाल कर रहे थे और उसे एक से दूसरे हिल स्टेशन में ले जा रहे थे, तब भी वह ‘चोखेर बाली’ (‘आँख की किरकिरी’) और ‘नौकाडुबी’ (‘नौका दुर्घटना’) जैसे उपन्यासों के लेखन में व्यस्त थे. शायद ही कभी ऐसा मौका आया, जब पिता ने कोई उपन्यास लगातार लिखते हुए पूरा कर दिया हो. जब भी किसी उपन्यास का एक अध्याय पूरा होता, वह उसे पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशन के लिए भेज देते. यहां तक कि जब वह व्यक्तिगत त्रासदियों से गुजर रहे होते थे, तब भी कभी पत्रिकाओं के संपादकों को उनके उपन्यास अंश के लिए इंतजार नहीं करना पड़ा. अपनी भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण तथा रचनात्मक अभिव्यक्ति की दुर्निवार इच्छाशक्ति ही उनकी कविताओं, उपन्यासों, छोटी कहानियों, निबंधों और दूसरी रचनाओं में दिखती है. इन रचनाओं से यह पता नहीं चलता कि लेखन के समय उनकी शारीरिक, मानसिक स्थिति क्या थी या वह कहां थे’. 23

पत्नी और बेटे-बेटियों की असमय मृत्यु के अलावा दामादों के व्यवहार ने भी रवींद्रनाथ को व्यथित किया. बड़ी बेटी बेला के पति को उन्होंने वकालत पढ़ने विदेश भेजा था. वह पढ़ाई पूरी किये बिना लौट आये. रानी के पति को उन्होंने डॉक्टरी पढ़ने विदेश भेजा था. वह भी पढ़ाई पूरी किये बिना लौट आये थे. छोटी बेटी अतसी के पति को अमेरिका में कृषि विज्ञान की पढ़ाई के लिए भेजा था. छोटा दामाद बार-बार उनसे पैसे भेजने के लिए चिट्ठी लिखता. उसके देश लौटने के कुछ समय बाद अतसी की मौत हो गयी. मैत्रेयी देवी ने अपनी पुस्तक में ठाकुरबाड़ी की स्त्री हेमलता देवी से अपनी बातचीत का हवाला दिया है. हेमलता ठाकुर कहती हैं,

‘तुम्हें मालूम नहीं मैत्रेयी, उनके (रवींद्रनाथ) जीवन में पारिवारिक शांति नहीं थी. सिर्फ स्त्री या संतानों की मृत्यु नहीं-और भी अनेक लांछना का शिकार उन्हें होना पड़ा था. बेला उनकी बहुत दुलारी संतान थी. उसी संतान ने उनसे एक दिन कहा था, अमुक ने मेरा अपमान किया, उसे अभी ही घर से बाहर कर दीजिए. क्या वह ऐसा कर पाये? वह तो बेला की बात नहीं रख पाये. ऐसे में, बेला अपने पति के साथ वहां से चली गयीं’. 24

आसपास का माहौल भी रवींद्रनाथ के अनुकूल नहीं था. कृष्ण कृपलानी लिखते हैं,

‘अपने लोगों के बीच वह (रवींद्रनाथ) कभी बहुत लोकप्रिय नहीं थे. वह अपने समकालीनों की ईर्ष्या-द्वेष की प्रवृत्ति से बहुत दूर तथा अपने समय से बहुत आगे के मनुष्य थे. यहाँ तक कि उनकी साहित्यिक प्रतिभा पर भी लोग जलते-चिढ़ते थे. सिर्फ एक बार अपने लोगों के बीच वह तब लोकप्रिय हुए थे, जब उन्होंने बंगभंग का विरोध किया था. हालाँकि अपने क्रियाकलापों से तब उन्होंने ब्रिटिशों को नाराज कर दिया था’. 25

 

५.

अपने परिजनों की मृत्यु देखते रहने वाले रवींद्रनाथ के आखिरी दिनों में मृत्यु एक बार उन्हें छूकर निकल गई थी. दस सितंबर, 1937 को 77 वर्ष के रवींद्रनाथ अचानक बेहोश हो गए थे. चूंकि शांतिनिकेतन में तब टेलीफोन की सुविधा नहीं थी, इस कारण डॉक्टरों की एक टीम के उनके इलाज के लिए पहुँचने से पहले साठ घंटे तक वह कोमा में थे. इलाज शुरू होने के बाद वह स्वस्थ होने लगे. पंद्रह सितंबर को होश में आने पर उन्होंने एक कैनवास तथा रंग माँगा, फिर पास में ही पड़े प्लाइवुड के एक टुकड़े पर प्राकृतिक दृश्य अंकित किया, जो इस तरह था-घनघोर जंगल के अँधेरे के बीच से पीली रोशनी फूट रही है.

कुछ आलोचकों ने इसे कविगुरु की असाधारण प्रतीकात्मक शिल्पकर्म के रूप में रेखांकित किया. फिर 25 सितंबर को उन्होंने मृत्यु और मरणोत्तर मुद्दे पर केंद्रित काव्य पुस्तक ‘प्रांतिक’ की पहली कविता लिखी. इस संग्रह की अंतिम कविता रवींद्रनाथ ने 25 दिसंबर को लिखी, और विशेषज्ञों के मुताबिक, ये मृत्यु और मरणोत्तर विषयों पर श्रेष्ठतम रचनाएं हैं. गूढ़ होने के बावजूद ‘प्रांतिक’ की कई कविताएं मृत्यु को सीधे संबोधित हैं. जैसे, पाँचवीं कविता में एक जगह कवि कहते हैं-‘मुझे मृत्यु को लौटा दो’. नौवीं कविता में अपने कोमा में चले जाने की ओर इंगित करते हुए कहते हैं,

‘मृत्यु का दूत आया था, पर मुझे नहीं ले जा पाया. फिर जब वह आएगा, तब कवि पके हुए फल की तरह जीवन रूपी वृक्ष से गिर पड़ेगा’.

‘प्रांतिक’ की कविताओं का रवींद्रनाथ ने अंग्रेजी में अनुवाद भी किया.

हालाँकि प्रांतिक से बहुत पहले रवींद्रनाथ ने मृत्यु को जीवन का अनिवार्य सत्य समझा था, जो उनकी रचनाओं में भी दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, ‘गीतांजलि’ की कई कविताओं में मृत्यु को प्रिय अतिथि के रूप में संबोधित किया गया है. ‘मृत्यु’ कविता में वह कहते हैं,

‘हे जीवन की अंतिम पूर्णता, मृत्यु, मेरी मृत्यु…’.

रवींद्रनाथ के पत्रों में हालांकि दैनंदिन जीवन के ब्योरे अधिक हैं, लेकिन वहाँ उनकी मृत्यु चेतना संभवत: सबसे स्पष्ट है. पुत्रवधु प्रतिमा को लिखी एक चिट्ठी में वह कहते हैं,

‘जीवन के साथ-साथ मृत्यु को मिलाकर न देखने से सत्य को महसूस नहीं किया जा सकता. हम रोज जब जीवन को महसूस करते हैं, उसके साथ मृत्यु को महसूस नहीं करते, इसीलिए अपनी पूरी क्षमता के साथ अपनी गृहस्थी में सिमटे रहते हैं. हमारी चाह ही हमारा बंधन बन जाती है. उसे मृत्यु के साथ मिलाकर देखने से ही पृथ्वी का भार हल्का होता है. मृत्यु को जीवन के साथ जोड़कर न देखने के कारण ही हमारी शोक की ज्वाला इतनी प्रबल हो उठती है. मृत्यु जीवन को ही वहन करती है, जीवन मृत्यु के प्रवाह को लेकर आगे बढ़ रहा है, इसे समझ जाने पर हमारा मन मुक्त होता है.’ 26

मित्र सी.एफ. एंड्र्यूज को लिखे पत्रों (लेटर्स टू ए फ्रैंड, रवींद्रनाथ ठाकुर) में मृत्यु के बारे में उनकी सोच उभर कर सामने आती है. यहाँ उनकी एक चिट्ठी उल्लेखनीय है,

‘मैं निर्जन वन-प्रदेश से होकर अपनी यात्रा आगे बढ़ा रहा हूँ. पर्वत-शिखर के उस पार से आती हुई ज्योति निर्मल और उज्ज्वल है; किंतु इस अंधेरी घाटी की ढलानों पर छायाएँ तिरछी और गहन होकर फैली हुई हैं. मेरे चरण रक्तरंजित हो चुके हैं और मैं हाँफती हुई साँसों के साथ कठिन परिश्रम से आगे बढ़ रहा हूँ. थककर मैं धूल में ही लेट जाता हूँ, रो पड़ता हूँ और उसी का नाम पुकारता हूँ. मैं जानता हूँ कि मुझे मृत्यु के मार्ग से होकर ही गुजरना होगा. ईश्वर जानता है कि यही मृत्यु-वेदना मेरे हृदय को भीतर तक चीर रही है. …हमें अपने भीतर उस वस्तु का पोषण नहीं करना चाहिए, जो पहले ही मृत हो चुकी है, क्योंकि जो मृत है, वही मृत्यु का कारण बनता है.’ 27

दोस्त एंड्र्यूज को लिखी एक और चिट्ठी में उन्होंने कहा,

‘मुझे पूरा विश्वास है कि शारीरिक मृत्यु का हमारे लिए वही अर्थ है- यानी हमारी आत्मा की रचनात्मक प्रेरणा का अपनी पूर्णता के लिए नये रूपों को पाना. मृत्यु भले ही एक समाधि तक सीमित हो जाए, लेकिन जीवन को निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए; अन्यथा वह जेल बन जाता है.’-28.

कोलकाता स्थित रवींद्र भारती यूनिवर्सिटी के उपकुलपति रहे डॉक्टर पवित्र सरकार ने रवींद्रनाथ की मृत्यु कविताओं पर एक दिलचस्प लेख लिखा, जिसे देखा जाना चाहिए-

‘वर्ष 1969 में एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी-ऑन डेथ एंड डाइंग. इसकी लेखिका डॉ. एलिजाबेथ क्यूबलर रस थीं. तब वह शिकागो विश्वविद्यालय के बिलिंग्स हॉस्पिटल में कार्यरत थीं. डॉक्टर होने के अलावा वह मनोवैज्ञानिक भी थीं. छपने के बाद उस किताब की बिक्री का आंकड़ा दस लाख कॉपी को पार कर गया था….शिकागो स्थित एक गुजराती दोस्त ने जब मुझे इस पुस्तक से परिचित कराया, तब इसकी एक अप्रत्याशित चीज ने मुझे चौंका दिया. वह यह थी कि पुस्तक के बारहों अध्याय के प्रारंभ में, तथा बारहवें अध्याय के अंत में-यानी कुल तेरह जगहों पर मात्र एक व्यक्ति की रचनाओं को लेखिका ने उद्धृत किया था. वह व्यक्ति रवींद्रनाथ ठाकुर थे….डॉ एलिजाबेथ से मुलाकात तब हुई, जब 1974 में मैं मिनेसोटा विश्वविद्यालय में पढ़ा रहा था. वह वहां के मेडिकल कॉलेज में भाषण देने आई थीं. दोपहर के भोजन के समय एक ही मेज पर बैठीं क्यूबलर से बातचीत शुरू करते ही मैंने पूछा, आपने रवींद्रनाथ को ही क्यों चुना? वह उच्छवसित होकर बोलीं, ‘माई फेवरेट पोएट…’. फिर उन्होंने बताया कि 1942 में उन्हें मेडिकल वॉलंटियर के तौर पर भारत आना था. उसी वक्त उन्होंने रवींद्रनाथ को पढ़ा था. हालांकि भारत आना नहीं हुआ. फिर उन्होंने कहा, रवींद्रनाथ को पहली बार पढ़ते ही मुझे यह महसूस हुआ था कि मृत्यु के बारे में इस कवि ने इतनी सारी बातें कही हैं, और इस तरह से कही हैं, जिस तरह और कहीं नहीं कही गई. मेरी धारणा यह भी है कि उनकी उक्तियां ही मृत्यु को देख-समझ पाने का सबसे सच्चा तरीका है. फिर उन्होंने कहा, मुझे गलत मत समझना. मृत्यु के बारे में रवींद्रनाथ ने सबसे यथार्थवादी बातें कही हैं, इसीलिए वह जीवन के भी बड़े कवि हैं. तुम्हें पता ही होगा कि मनुष्य का जन्म, प्रेम, घृणा, दुख, मृत्यु-इन सब संस्कृतियों से परे हैं, और सभी के जीवन के हिस्से हैं. इसलिए जीवन और मृत्यु के बारे में रवींद्रनाथ की कही गई बातें किसी एक संस्कृति की नहीं हो सकतीं.’-29

 

संदर्भ-
1.-रवींद्रनाथ टैगोर, द मिरिएड माइंडेड मैन-कृष्ण दत्त, एंड्र्यू रॉबिंसन, पृष्ठ-आठ
2. जीवन स्मृति-रवींद्रनाथ ठाकुर, पेज-7-8
3. रवींद्रनाथ, शिशिर कुमार घोष, पृष्ठ-13-14.
4. जीवन स्मृति, पृष्ठ- 185-86.
5. कादंबरी देवी, सुब्रत रुद्र, पृष्ठ-12.
6. ज्योतिरिंद्रनाथ-मन्मथनाथ घोष, पृष्ठ-136.
7. कादंबरी देवी, सुब्रत रुद्र, पृष्ठ-78.
8. ठाकुरबाड़ीर अंदरमहल-चित्रा देब, पृष्ठ-66.
9.-रवींद्रनाथ टैगोर, द मिरिएड माइंडेड मैन-कृष्ण दत्त, एंड्र्यू रॉबिन्सन, पृष्ठ-आठ
10. ठाकुरबाड़ीर अंदरमहल-पृष्ठ-80
11.-पितृस्मृति, रथींद्रनाथ ठाकुर, पृष्ठ-79-82.
12. रवींद्रनाथ : गृहे ओ विश्वे-मैत्रेयी देवी-पृष्ठ- 34
13. -बाईसे श्रावण, निर्मलकुमारी महलानवीस, पृष्ठ-18.
14. पितृस्मृति-रथींद्रनाथ, पृष्ठ-85-86.
15. आमादेर शांतिनिकेतन-सुधीर रंजन दास, पृष्ठ- 29.
16. पितृस्मृति,-रथींद्रनाथ ठाकुर, पृष्ठ-89.
17. रवींद्रनाथ : गृहे ओ विश्वे-मैत्रेयी देवी-पृष्ठ-36-37.
18. चंद्रिल भट्टाचार्य ( आमार रवींद्रनाथ, पेज-79).
19. रवि जीवनी, प्रभातकुमार मुखोपाध्याय, दूसरा खंड, पृष्ठ-133-34.
20. पितृस्मृति-रथींद्रनाथ ठाकुर, पृष्ठ-90
21 पितृस्मृति-रथींद्रनाथ ठाकुर, पृष्ठ-93-94.
22. पुर्णेंदुविकास सरकार, रोबबार डिजिटल.
23. ऑन द एजेस ऑफ टाइम, रथींद्रनाथ ठाकुर, पृष्ठ-55-56.
24. रवींद्रनाथ : गृहे ओ विश्वे-मैत्रेयी देवी, पृष्ठ-28.
25. रवींद्रनाथ : ए बायोग्राफी-कृष्ण कृपलानी, (पेज-209)
26. चिठीपत्र, तीसरा खंड, पृष्ठ-13.
27. लेटर्स टू ए फ्रैंड-रवींद्रनाथ ठाकुर, पेज-42.
28. लेटर्स टू ए फ्रैंड, रवींद्रनाथ ठाकुर, पेज-60.
29. आमार रवींद्रनाथ, पत्र भारती प्रकाशन, कोलकाता, पृष्ठ-111-14.

कल्लोल चक्रवर्ती

तसलीमा नसरीन के लेखों और कविताओं के अनुवाद की तीन पुस्तकें, विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास ‘आरण्यक’ और ‘पथेर पाँचाली’, तथा साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत बाँग्ला उपन्यास ‘सेई निखोंज मानुषटा’ और जया मित्र की बाल कहानियों की एक पुस्तक का अनुवाद. एक कविता संग्रह, ‘कतार में अंतिम’ प्रकाशित. बाँग्ला साहित्यकारों पर कुछ लेख ‘पहल’ और ‘समालोचन’ में प्रकाशित. संप्रति ‘प्रभात खबर’, दिल्ली से संबद्ध.

Tags: 20262026 आलेखकल्लोल चक्रवर्तीरवींद्रनाथ की मृत्यु चेतनारवींद्रनाथ टैगोररवींद्रनाथ टैगोर की पुण्यतिथि
ShareTweetSend
Previous Post

अपनी धुन में रस्किन बांड : पवन करण

Next Post

बारिश की कविताएँ : अदनान कफ़ील दरवेश

Related Posts

फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज
फ़िल्म

फ़ा : मैं नहीं तुम : कुमार अम्‍बुज

खेल-खेल में बीता जीवन : गिरीश कारनाड
समीक्षा

खेल-खेल में बीता जीवन : गिरीश कारनाड

शोक से शब्द तक : गगन गिल
आत्म

शोक से शब्द तक : गगन गिल

Comments 6

  1. Shubhangi Chakraborty says:
    1 month ago

    कल्लोल चक्रवर्ती जी का यह आलेख पढ़कर मन एक अद्भुत आत्मिक शांति और दार्शनिक मंथन से भर गया। रवींद्रनाथ टैगोर के साहित्य और जीवन-दर्शन में ‘मृत्यु चेतना’ कोई नकारात्मक अवधारणा नहीं, बल्कि जीवन की पूर्णता का ही एक रूप है, इस विचार को लेखक ने अत्यंत खूबसूरती से स्पष्ट किया है।
    अक्सर मृत्यु को भय, दुख या अंत के रूप में देखा जाता है, लेकिन कल्लोल जी ने टैगोर के दृष्टिकोण को उकेरते हुए यह बखूबी दर्शाया है कि कैसे गुरुदेव के लिए मृत्यु जीवन का ही विस्तार, एक रूपांतरण और ईश्वर से मिलन का माध्यम थी। व्यक्तिगत त्रासदियों के बावजूद टैगोर का यह दार्शनिक संतुलन और उनका सौंदर्यबोध वास्तव में असीम है।
    लेखक की भाषा-शैली, विश्लेषणात्मक पकड़ और विषयों के चयन की जितनी तारीफ की जाए कम है। इतने गूढ़ और संवेदनशील विषय पर इतना सुव्यवस्थित और मर्मस्पर्शी आलेख प्रस्तुत करने के लिए कल्लोल चक्रवर्ती जी का हृदय से आभार! समालोचन का भी धन्यवाद जो ऐसे उत्कृष्ट और विचारशील साहित्य को पाठकों तक पहुँचा रहा है।

    Reply
  2. ऐश्वर्य मोहन गहराना says:
    1 month ago

    दिल्ली में आज कड़ी बारिश हो रही है, आकाश अंधिया जाता है, वृक्ष गिरे जाते हैं, वर्षा-जल जीवन के सभी वाहनों की गति को मंदतर किए देता हैं, तब जबकि वर्षा की रूमानियत रूहनियत के मार्ग प्रशस्त कर रही है, रवीन्द्रनाथ की मृत्यु-चेतना पर यह आलेख मेरी उदासियों में दूर चमकती विद्युत की तरह चमकता रहा। एक बार में पढ़ना संभव नहीं था तो इस तड़ित प्रवाह को देर तक समझता रहा।
    लेखक रवीद्र के जीवन में मृत्यु चेतना को इस तरह आते देखते हैं, यथा कोई प्रकाशपुञ्ज हर मृत्यु की तरह उनके ऊपर आ गिरता हो। इस तीव्र आड़ोलन को महाकवि ही संभाल सकते थे। लेखक ने शोध पूर्वक उस प्रकाश को समझा समझाया और संभाला है। आभार।

    Reply
  3. Dr. Vijay Sharma says:
    1 month ago

    कल्लोल चक्रवर्ती की कलम को नमन! पढ़ते हुए एवं पढ़ने के बाद एक अन्य महाकवि की एक पंक्ति बार-बार मन में घूम रही है, ‘दु:ख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ जो अब तक नहीं कही।’ ठाकुर के दु:ख को मूर्तिमान करता लेख कई बार आँखें नम कर गया। आज जमशेदपुर का आकाश बादल भरा है, मेरा मन भरा हुआ है। मृत्यु पर यह अध्यात्मिक लेख बहुत दिन मन में गूँजेगा। समालोचन एवं आपको धन्यवाद!

    Reply
  4. राजेन्द्र जोशी says:
    1 month ago

    अद्भुत!

    Reply
  5. अजेय * says:
    1 month ago

    नहीं जानता था टैगोर जीवनपर्यन्त इस क़दर मृत्यु से घिरे रहे ! कवि का दुख समझ आता है , इस आलेख को पढ़ने के बाद । कवि के यह पीड़ा, यह बुद्ध के दुख से अलग रहा होगा। अब मुझे एक बार गीतांजलि की कविताओं का पुनर्पाठ करना चाहिए। कल्लोल चक्रवर्ती को साधुवाद

    Reply
  6. रतन चंद 'रत्नेश' says:
    1 month ago

    रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना पर कल्लोल चक्रवर्ती का यह आलेख पठनीय है जिसमें गुरुदेव की मृत्यु-पीड़ा का विस्तृत उल्लेख है परंतु कहीं उनके अशरीरी आत्माओं को बुलाकर उनसे बातें करने का जिक्र नहीं आता। प्लांचेट के माध्यम से आत्माओं को बुलाने का यह सिलसिला कभी जोड़ासांको वाली ‘ठाकुर बाड़ी’ के तीसरे तले में जमता था तो कभी शांतिनिकेतन के ‘उदयन’ में और ठाकुर-परिवार के लोग उसमें शामिल रहते। रवींद्रनाथ पर कई पुस्तकें लिखनेवाले अमिताभ चौधरी ने गुरुदेव की परलोक चर्चा पर साक्ष्य जुटाते हुए एक पुस्तक भी लिखी है परंतु इस लेख को पढ़ने के बाद संशय होता है, जहाँ लिखा गया है-
    ‘भाभी जी मुझे स्नेह करती थीं… जिनकी मृत्यु हो जाती है, वे फिर नहीं लौटते। उन्हें हम कभी देख नहीं सकते। सुना था कि पुकारने पर आत्मा मिलने आती है। गलत सुना था।’

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2026 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक