| ‘रंगयात्रियों के राहे गुज़र’ से गुजरते हुए विजय पण्डित |
हिन्दी साहित्य का यह चिंतनीय पक्ष है कि कथा-कविता व उपन्यास के अलावा कला के लिए कम स्पेस है. विशेषकर रंगकर्म को लेकर यह रिक्ति और भी बड़ी है. यह अलग बात है कि जिन रंगकर्मियों का जुड़ाव फिल्मों से रहा है, उन पर या उनके द्वारा काम ज़रूर हुआ है, लेकिन वह भी अङ्ग्रेज़ी या अन्य भारतीय भाषाओं में. फिर वे हिन्दी में अनूदित हुए. हिन्दी रंग-इतिहास, परंपरा और रंग व्यक्तित्व पर अपेक्षित कार्य नहीं हो पाया है. उसके मूल में यही रहा है कि जब आपको किसी भी विशेष विधा से प्रेम ही नहीं होगा, तो उस पर कुछ लिख भी नहीं पाएंगे. सुप्रसिद्ध नाटककार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ और एलेन टेरी के बीच पत्र व्यवहार को एक महत्वपूर्ण किताब के रूप में सामने लाने का जुनून यहाँ नहीं मिलेगा और न ही के ग्लोब थिएटर को पुनर्जीवित करने के लिए अपनी पूरी उम्र झोंक देने वाले सैम वानामेकर और उन के साथ काम करने वाली डायना डेवलीन मिलेंगी, जिन्होने अपने जीवन के दो दशक सैम के साथ बिताकर उस यात्रा को पुस्तक का रूप दिया.
सत्यदेव त्रिपाठी कृत ‘रंग यात्रियों के राहे गुजर’ हिन्दी रंगमंच में उसी रिक्ति की एक श्रमसाध्य पूर्ति है. यह केवल राह से ही नहीं, अपितु उन रंग-पुरोधाओं के जीवन से भी होकर गुजरता है, जहां से हिन्दी रंगकर्म अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित होता है.
सत्यदेव त्रिपाठी जितना साहित्य, फिल्म, लोक और तुलसी के हैं, उतने ही वह रंगमंच के भी हैं. मैं तो कहूँगा कि उससे भी बढ़ कर हैं. मुंबई में रहते हुए विगत चार दशक से वे सतत रूप से रंगमंच पर लिखते रहे हैं.
इस पुस्तक में डॉ. श्रीराम लागू, ए. के. हंगल, हबीब तनवीर, सत्यदेव दुबे, बंसी कौल, दिनेश ठाकुर, अरुण पांडेय एवं विजय कुमार जैसे रंगकर्मियों के जीवन व समूचे रंगकर्म का लेखक द्वारा देखा-समझा-अनुभव किया लेखा-जोखा है. उन की रंगमंच की यात्रा को ही नहीं, अपितु उनके जीवन की यात्रा को भी बहुत आत्मीयता के साथ उन्होंने सहेजा है. इसके लिए उन्होने सभी के साथ खूब वक़्त बिताया है और उन सबके आत्मीय भी रहे हैं. लेकिन इसके बावजूद वे अपनी बात को बहुत ही साफगोई और दृढ़ता पूर्वक रखते हैं. जहाँ विरोध करना होता है, बिना भय और संकोच के करते हैं. इस कारण कभी-कभी उनकी आत्मीयता दुश्मनी में भी बदल जाती हैं, लेकिन वे कभी विचलित नहीं होते.
सत्यदेव त्रिपाठी का कर्म और निवास स्थल मुंबई रहा है. जिन आठ रंग-व्यक्तित्व के बारे में यह किताब है, उनमें- ए. के. हंगल, पण्डित सत्यदेव दुबे, दिनेश ठाकुर व विजय कुमार मुम्बई वासी रहे हैं. जबकि डॉ. लागू पुणे में रहते थे. हबीब तनवीर, बंशी कौल और अरुण पाण्डेय का सम्बन्ध मध्य प्रदेश से रहा है. इस तरह मुंबई में रहकर दूर प्रदेश के व्यक्तित्व के काम को देखना, उनके साथ समय बिताना और लिखना बहुत आसान काम नहीं होता. वैसे भी मुंबई में रंगमंच पर लिखने वाले बहुत ही कम हैं, नहीं के बराबर. अंग्रेजी में तो कई हैं, लेकिन हिंदी में नहीं. रमेश राजहंस जैसे इक्का-दुक्का नाम हैं. लेकिन त्रिपाठी जी ने प्रतिबद्ध रूप से इस कमी को पूरा करते हुए खूब लिखा है.
सत्यदेव त्रिपाठी का स्वभाव ऐसा है कि वे लोगों को अपना बना लेते हैं, बन भी जाते हैं और फिर सब कुछ जानना-समझना आसान हो जाता है- रंग चिंतन, रंग प्रक्रिया और सम्बंधित व्यक्ति का थियेटर भी. जैसा उन्होंने कहा भी है- ‘सम्बन्धित शीर्ष रंग व्यक्तित्वों की मानवीय प्रवृत्तियाँ नाटक की सीमाओं को लाँघकर जीवन-परक भी हो गयीं– सिर्फ नाटक करने-होने की मोहताज न रहीं. ’ लेकिन बहुत आत्मीयता के बाद भी वे अपने बेलाग टिप्पणी किये बिना भी नहीं रह पाते, चाहे उनके अति प्रिय विजय कुमार व दिनेश ठाकुर हों या उनकी प्रस्तुतियों में जब भी कोई कमी खटकी हो.
इस किताब की उपलब्धि है वरिष्ठ अभिनेता और इप्टा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष ए. के. हंगल को याद करना. सिनेमा में उनके अभिनय की बात तो होती है, लेकिन रंगमंच के जीवन के बारे में कम ही लिखा गया. साथ ही साथ मुंबई इप्टा, उसकी गतिविधियों और नाटक ‘बीवी-ओ-बीवी’ को लेकर तीखा लिखने के कारण इप्टा द्वारा लेखक का बहिष्कार और इन सब पर हंगल जी का धृतराष्ट्र की तरह रुख अख्तियार करना, मुंबई के रंग परिवेश और उनके व्यक्तित्व को इस रूप से सामने लाता है, जिस से हम परिचित नहीं है. इप्टा के ‘बीवी-ओ-बीवी’ नाटक के उस मंचन-प्रसंग को उन्होंने विस्तार से लिखा है, जिसको लेकर इप्टा ने लेखक का बहिष्कार किया.
‘आगरा बाज़ार’ देखना लेखक के लिए जीवन का अद्भुत अनुभव था कि कैसे अपने बेटे के जन्मदिन की पार्टी छोड़ कर उन्होंने हबीब सा’ब का प्ले देखा. ‘हबीब साब कुछ भी करें, वह लोक का हो जाता है. वर्ना संस्कृत का शूद्रक लिखित क्लासिक नाटक ‘मृच्छकटिकम’ भी खांटी लोकनाटक बन कर ही अपनी अक्षय कीर्ति अर्जित कर सका. ’ इस तरह वे केवल हबीब सा’ब के रंगमंच के बारे में लिखते ही नहीं हैं, पाठक को एक अविस्मरणीय यात्रा पर भी ले जाते हैं, जिस यात्रा के कारण हबीब तनवीर और उनके रंगमंच को जानना बहुत आसान हो जाता है. हाँ, उन्होंने ‘आगरा बाज़ार’ को जगह -जगह ‘आगरे बाज़ार’ लिखा हैं. इसका क्या कारण हो सकता है, ये मुझे समझ में नहीं आया.
पण्डित सत्यदेव दुबे का संस्मरण और भी मार्मिक है. ‘थिएटर के जीनियस बोहेमियन’ संज्ञा से विभूषित दुबे के बारे में लिखना सत्यदेव त्रिपाठी से ही सम्भव था. ’तू डाल-डाल तो हम पात-पात’. दुबे जी किसी के जल्दी पकड़ में न आने वाले और त्रिपाठी जल्दी छोड़ने वाले नही. पढ़ते –पढ़ते दुबे जी का पूरा व्यक्तित्व और बहुत से रहस्य सामने आते हैं- उनका क्रोध, प्रेम और समर्पण सब कुछ. हॉलाकि दुबे और त्रिपाठी का इस सम्बन्ध का अंत दुखद ही था.
लेखक का दिनेश ठाकुर से बड़ा ही अपनापा रहा है, लिखते हैं -‘मेरा दिनेश जी से सम्बन्ध ऐसा ही बन गया था, जिसमें अविश्वास के विरेचन की समस्या भी आ जाती और ‘रसवद अलंकार’ का सुख भी जुड़ जाता. यह धीरे-धीरे हुआ. नियमित समीक्षा-कर्म की नियति के चलते उनका व कमोबेश सभी रंगमंडलों का नेपथ्य इतना देखा, इतना जाना कि ऐसा होना लाजमी हो गया था. लेकिन बाकी लोगों से व्यक्तिगत स्तर पर उतनी घराय नहीं हुई. ’ दिनेश ठाकुर के बारे में कुछ और बातें – ‘वो पूछते सबसे थे, पर मानते किसी के न थे. गोया न मानने के लिए पूछते. कुछ बता देने पर बहस करते और अपनी मनवाने की कोशिश करते. ज़िद पर आ जाते, और बदलते बिल्कुल नही. उनसे अगाध प्रेम और संवाद हीनता दोनों को स्पष्ट किया है इस किताब में.
बंसी कौल से स्नेहवत् सरोकार व सान्निध्य, अरुण पाण्डेय की आत्मीयता – और उनके सम्मान में लेखक का कथन – ‘पूरे देश में यदि ऐसे दस- बीस भी होते, तो अपने देश का तमाम ‘लोक ‘रंग’ विहीन मही मैं जानी’ न होता’ मन को छू जाता है. और उन्ही अरुण पाण्डेय को लेकर लेखक की संवेदना – ‘जिस ‘विवेचना’ को अरुण ने अपना जीवन बना लिया और अपना सर्वोत्तम देकर एक वक़्त उस प्रस्थान बिंदु तक पहुंचा दिया था, जहाँ से वह ‘नया थियेटर’ व ‘कोरस’ जैसे मुकाम तक पहुंचने की यात्रायें कर सकता था. जैसा कि आम है परिवार हो या संस्थाएं, टूटती हैं प्रायः आर्थिक कारणों से. निर्णायक होते हैं काग़ज-फाइलें और मुख्य कर्ता होकर भी अरुण ने ये दोनों अपने पास न रखे. इतना टूटे कि किसी से बात ही करनी बन्द कर दी थी, शायद बात करने लायक कुछ बचा न था. कहीं शून्य में ताकते बैठा रह जाता था. उसी अवसाद में वह अरुण, जो पी कर बाहोश बना रहता था, बेहोश होने के लिए पीने लगा. ‘
‘मंच’ के विजय कुमार का सम्बध त्रिपाठी से घर जैसा रहा है. इसका कारण भी है. वे बहुत ही उदारमना हैं और मुम्बई में उनके जानने वाले हर नये-पुराने रंगकर्मी के लिए उनका घर अपना ही हो जाता है. बहुत से लोगों ने वहां रिहर्सल किये हैं- विजय कुमार, के. के. रैना, इला अरुण आदि-आदि. इन आठों रंग व्यक्तित्व में विजय कुमार सबसे कम उम्र के हैं. त्रिपाठी ने विजयकुमार व उनके काम को उसी शिल्प में याद किया है, जैसे अन्य वरिष्ठों को. भले ही विजय के रंगकर्म पर कम बातें हों, लेकिन विजय के स्वभाव, वृत्ति और रंगमंच के लिए समर्पण की चर्चा उन्होंने खूब की है. विशेषकर घोर संकटों से जूझते रहने बाद भी विजय की रंगमंच के प्रति घोर आस्था उनके प्रति सम्मान में वृद्धि कर देता है.
सबसे महत्वपूर्ण है डॉ श्रीराम लागू जैसे महान अभिनेता से हुई लेखक की सोलह घंटे की बातचीत, जिसमें मराठी रंगवृत्ति के साथ उनके नाट्यकर्म व नाट्य मूल्यों की जानिब से मराठी रंगकर्म के आधी सदी के इतिहास की एक जीवंत झांकी भी देखी जा सकती है. उसमें डा. लागू का पूरा जीवन समाहित है. उनसे बात करने के लिए वे एक परीक्षार्थी की तरह तैयारी करते हैं. संस्मरणात्मक शैली में यह समग्र आकलन अत्यंत आत्मीय एवं ख़ासा जीवंत बन पड़ा है. यह एक दस्तावेज है जो सहेजने लायक है. इस बातचीत को वे बाकायदा किताब में कई शीर्षक देकर प्रस्तुत करते हैं, गोया शोध ग्रन्थ हो. मुझे लगता है कि अगर डॉ लागू का चैप्टर इस किताब का अंश न होता तो शायद एक अलग से पूरी किताब ही होती उन पर. इस बात को उनके शीर्षक विभाजन से देखा और समझा जा सकता है- पहली भेंट, साक्षात्कार की तैयारी, रूप रेखा एवम प्रक्रिया, अभिनय का आरम्भ: हादसा, द्वन्द व अदम्य इच्छा, विद्यार्थी जीवन में नाटक और परिवार, विद्यार्थी जीवन के बाद नाटक और तत्कालीन रंग परिदृश्य, पी. डी. ए. और उसका नाट्यकर्म, डॉ. लागू कनाडा फिर इग्लैंड में: थियेटर का अद्भुत रूप, देश वापसी और पी. डी. ए. से रंगायन में, फिर देश से बाहर-अफ्रीका, वापस देश में – थिएटर ही थियेटर, मरुभूमि में हरियाली, नाटकों के दौर में दिल का दौराः वरदान युक्त अभिशाप, ऐसे बना रूपवेध, नाटक के लिए सेंसर बोर्ड से लडाई, प्रोफेशनल बनाम व्यावसायिक थियेटर, सिनेमा और श्री राम लागू, लागू के विमर्श में हिंदी मीडिया एवम् नाट्य, अभिनय चिन्तन, हर रूप में जीवन का आनन्द होना.
तो क्या इतने शीर्षकों को लेकर डा. लागू पर एक अलग किताब नहीं लिखी जा सकती थी? लिखी जा सकती थी, ज़रूर लिखी जा सकती थी.
यहाँ एक प्रसंग की चर्चा करना आवश्यक होगा जहाँ डॉ. लागू दर्शक-संस्कार की चिंता करते हुए कहते हैं कि हम सब कुछ कर पाये या कर न कर पाये हों लेकिन अपने दर्शकों को संस्कार नहीं दे पाये. वे एक शो का जिक्र करते हुए कहते हैं कि वे विदेश में एक प्ले देख रहे थे. पिन ड्राप साइलेंस और कैसे उनके मुंह से किसी दृश्य को लेकर वाह निकल गया था. कई दर्शक उन्हें पलट कर देखने लगे थे, गोया उन्होंने बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो.
सत्यदेव त्रिपाठी ने अपनी साफगोई कभी छोड़ते नहीं. उन्होंने किसी के आभा मंडल और प्रभाव में आकर कभी समझौता नहीं किया. हिंदी में रंग समीक्षा के कुछ ही नाम हैं जो बिना किसी आग्रह, लालच और भय के अपनी बात रखते हैं.
हर रंग व्यक्तित्व को लेकर लिखे संस्मरणों के लिए बहुत ही आकर्षक शीर्षक है. यथा –‘एक अज़ीम शख़्सियत: ए. के. हंगल’, ‘महिमा उसकी ही रही, जिसका नाम ‘हबीब’ : हबीब तनवीर’, ‘थिएटर के जीनियस बोहेमियन:पण्डित सत्यदेव दुबे’, ‘जुनूँ में जिंदगी सारी बकार गुजरी : दिनेश ठाकुर’, ‘अन्तिम यात्रा की जानिब से रंग-विदूषक यायावर : बंसी कौल’, ’हम तुझे वली हैं समझे- गोकि बादाख़्वार है तू ! : अरुण पाण्डेय’, ‘बिहार में चुनाव लड़ने से निमकी मुखिया बनने तक:विजयकुमार’, और ‘नाटक ही जिनका जीवन, पर जीवन कतई नाटक नहीं : डॉ. श्रीराम लागू’.
लेखक ने इन संस्मरणों में अपनी भाषा खोजी है जिसमें देशज और लोक का भरपूर प्रयोग है. उनके शब्द और मुहावरों का प्रयोग पठनीयता बढाता है. उनके लेखन की अपनी विशेषता और शिल्प है. प्रयोग किये गए नीति वचनानि, ग़ालिब के शेर और मानस के उद्धरण उनकी लिखावट के प्रति आकर्षण पैदा करते हैं और यही कारण है कि तमाम रंगमंचीय व्याकरण और रंगमंच के तकनीकी शब्द भी हृदयंगम करते खूब बनता है. और एक बार जब कोई भी पाठक उनको पढ़ लेता है तो उनका मुरीद हो जाता है. फिर तो उनकी हर कृति को पढने में आनंद आता है.
सेतु प्रकाशन ने बहुत ही सौन्दर्य बोध के साथ इसे छापा है और मूल्य भी इतना जायज़ कि खरीदने के लिए एक बार भी न सोचना पड़े.
इस किताब में कुछ विशिष्ट रंगकर्मियों के संस्मरण ही नहीं, इन संस्मरणों के बहाने हिंदी रंगमंच की विगत पांच दशक की विकास-यात्रा भी है. इस किताब में बहुत से अनखुले पन्ने खुलते हैं. यह सामान्य संस्मरण की किताब नहीं है, अपितु इनमें वर्णित रंग पुरुषों के जीवन, सिद्धान्त और स्वभाव के बहुत से ऐसे पक्ष हैं जो अभी तक उद्भासित नहीं हो पाये हैं, यथा- प्रेम, राग-विराग, चिंता, आह्लाद, सुख-दुख, जिजीविषा, नैराश्य, अवसाद व क्रोध आदि. यह संग्रहणीय भी इसलिए है कि हिंदी रंगमंच और रंग व्यक्तित्व के बारे में जब भी कोई सवाल पैदा हो तो आप इसे एक सन्दर्भ ग्रन्थ की तरह देख सकते हैं.
और एक कथा- कृति की तरह पठनीयता तो घेलुवे में.
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संपर्क: बी, 101 |

विजय पण्डित


” रंगयात्रियों के राहे गुज़र’ शीर्षक इस पुस्तक का विजय पंडित ने जिस बौद्धिक संतुलन से विवेचन किया है वह स्पृहणीय है।क्योंकि प्रायः बौद्धिकजन अतिवादी छोरों पर जाकर जीवन स्थितियों को श्याम-श्वेत चश्मों से देखने के अभ्यस्त हैं।यह सच है उपनिवेशी शक्तियों ने अपनी कोशिश में स्थानीय ज्ञान-परम्पराओं को दबाने-कुचलने का क्रूर उद्यम किया,लेकिन यह भी सच है कि सदियों से चली आई देशज ज्ञानधारा ने ‘स्लो बट स्टीडी’ ढंग से ही सही उससे मुक़ाबला करते हुए अपनी मूल पहचान को विलोपित नहीं होने दिया।
एक सुंदर किताब से परिचय कराया है Vijay Pandit जी ने। भारत में पाठकों, दर्शकों और आम जनता में संस्कार की कमी बार बार उभर कर आती है।
संस्मरण विधा ने हिंदी के स्मारक साहित्य में अपने को स्थापित कर लिया।